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अंग 320

अंग
320
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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पउड़ी ॥
तिसै सरेवहु प्राणीहो जिस दै नाउ पलै ॥
ऐथै रहहु सुहेलिआ अगै नालि चलै ॥
घरु बंधहु सच धरम का गडि थंमु अहलै ॥
ओट लैहु नाराइणै दीन दुनीआ झलै ॥
नानक पकड़े चरण हरि तिसु दरगह मलै ॥8॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ उस (गुरू) की। हे लोगो ! सेवा करो जिसके पल्ले प्रभू का नाम है (भाव। जिससे नाम मिल सकता है)। (इस तरह) यहाँ सुखी रहोगे और परलोक में (ये नाम) आपके साथ जाएगा। (ये नाम रूपी) पक्का स्तम्भ (खम्भा) गाड़ के सदा कायम रहने वाले धर्म का मंदिर (सत्संग) बनाओ। अकाल-पुरख की टेक रखो जो दीन और दुनिया का आसरा देने वाला है। हे नानक ! जिस मनुष्य ने प्रभू के पैर पकड़े हैं वह प्रभू की दरगाह में बना रहता है। 8।
सलोक मः 5 ॥
जाचकु मंगै दानु देहि पिआरिआ ॥
देवणहारु दातारु मै नित चितारिआ ॥
निखुटि न जाई मूलि अतुल भंडारिआ ॥
नानक सबदु अपारु तिनि सभु किछु सारिआ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ (हे प्रभू !) मैं मंगता (आपके ‘अपार शबद’ की) ख़ैर मांगता हूँ। मुझे ख़ैर दे। आप दातें देने वाला है। आप दातें देने के स्मर्थ है। मैं आपको सदा याद करता हूँ। आपका खजाना बेअंत है (अगर उसमें से मुझे भी ख़ैर डाल दे तो) खत्म नहीं होता। हे नानक ! (प्रभू की सिफत सालाह की) बाणी अपार है। इस बाणी ने मेरा हरेक कार्य सँवार दिया है। 1।
मः 5 ॥
सिखहु सबदु पिआरिहो जनम मरन की टेक ॥
मुख ऊजल सदा सुखी नानक सिमरत एक ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे प्यारे सज्जनों ! (प्रभू की सिफत सालाह वाली) गुरबाणी याद रखने की आदत डालो। ये सारी उम्र का आसरा (बनती) है। हे नानक ! (इस बाणी के द्वारा) एक प्रभू को सिमरने से सदा सुखी रहते हैं और माथा खिला रहता है। 2।
पउड़ी ॥
ओथै अंम्रितु वंडीऐ सुखीआ हरि करणे ॥
जम कै पंथि न पाईअहि फिरि नाही मरणे ॥
जिस नो आइआ प्रेम रसु तिसै ही जरणे ॥
बाणी उचरहि साध जन अमिउ चलहि झरणे ॥
पेखि दरसनु नानकु जीविआ मन अंदरि धरणे ॥9॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ सब जीवों को सुखी करने वाला हरी-नाम अमृत उस सत्संग में बाँटते हैं। (जो मनुष्य वह अमृत प्राप्त करते हैं वह) जम के राह पर नहीं पाए जाते। उन्हें मुड़ मौत (का डर सताता) नहीं। जिस मनुष्य को हरी नाम के प्यार का स्वाद आता है। वह इस स्वाद को अपने अंदर टिकाता है। (सत्संग में) गुरमुख सिफत सालाह की बाणी उच्चारते हैं वहाँ अमृत के। जैसे। फुव्वारे चल पड़ते हैं। नानक (भी उस सत्संग का) दर्शन करके जी रहा है और मन में हरि-नाम को धारण कर रहा है। 9।
सलोक मः 5 ॥
सतिगुरि पूरै सेविऐ दूखा का होइ नासु ॥
नानक नामि अराधिऐ कारजु आवै रासि ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5 ॥ हे नानक ! अगर पूरे गुरू के बताए हुए मार्ग पर चलें तो दुखों का नाश हो जाता है और अगर आपका नाम सिमरें तो जीवन का मनोरथ सफल हैं जाता है। 1।
मः 5 ॥
जिसु सिमरत संकट छुटहि अनद मंगल बिस्राम ॥
नानक जपीऐ सदा हरि निमख न बिसरउ नामु ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! जिस परमात्मा को सिमरने से सारे दुख दूर हो जाते हैं और (हृदय में) आनंद व खुशियों का निवास होता है उसको सदा सिमरें। कभी निमख मात्र भी वह हरी-नाम हमें ना भूले। 2।
पउड़ी ॥
तिन की सोभा किआ गणी जिनी हरि हरि लधा ॥
साधा सरणी जो पवै सो छुटै बधा ॥
गुण गावै अबिनासीऐ जोनि गरभि न दधा ॥
गुरु भेटिआ पारब्रहमु हरि पड़ि बुझि समधा ॥
नानक पाइआ सो धणी हरि अगम अगधा ॥10॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउडी॥ जिन (गुरमुखों) ने ईश्वर को पा लिया है उनका बड़प्पन बयान नहीं किया जा सकता। जो मनुष्य उन गुरमुखों की शरण आता है वह माया के बंधनों में बंधा हुआ मुक्त हो जाता है (भाव। उसके माया के बंधन टूट जाते हैं)। वह अविनाशी प्रभू के गुण गाता है और जूनियों में पड़-पड़ के नहीं सड़ता। उसे गुरू मिल जाता है। वह प्रभू की सिफत सालाह उचार के और समझ के शांति प्राप्त करता है। हे नानक ! उस मनुष्य ने अथाह और अपहुँच मालिक हरी को पा लिया है। 10।
सलोक मः 5 ॥
कामु न करही आपणा फिरहि अवता लोइ ॥
नानक नाइ विसारिऐ सुखु किनेहा होइ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ (हे जीव !) आप अपना (असल) काम नहीं करता और जगत में आवारा फिर रहा है। हे नानक ! अगर प्रभू का नाम बिसार दिया जाए तो कोई भी सुख नहीं हो सकता। 1।
मः 5 ॥
बिखै कउड़तणि सगल माहि जगति रही लपटाइ ॥
नानक जनि वीचारिआ मीठा हरि का नाउ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (माया) जहर की कड़वाहट सारे जीवों में है। जगत में सबको चिपकी हुई है। हे नानक ! (सिर्फ प्रभू के) सेवक ने ये विचार की है कि परमात्मा का नाम ही मीठा है। 2।
पउड़ी ॥
इह नीसाणी साध की जिसु भेटत तरीऐ ॥
जमकंकरु नेड़ि न आवई फिरि बहुड़ि न मरीऐ ॥
भव सागरु संसारु बिखु सो पारि उतरीऐ ॥
हरि गुण गुंफहु मनि माल हरि सभ मलु परहरीऐ ॥
नानक प्रीतम मिलि रहे पारब्रहम नरहरीऐ ॥11॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ साधू की ये निशानी है कि उसको मिल के (संसार) समुंद्र से तैर जाते हैं। जम का सेवक (भाव। जमदूत) नजदीक नहीं फटकता और बार-बार नहीं मरना पड़ता। जो जहर-रूपी संसार समुंद्र है इससे पार लांघ जाते हैं। हे भाई ! (साधू गुरमुख को मिल के) मन में परमात्मा के गुणों की माला गूँदो। मन की सारी मैल दूर हो जाती है। हे नानक ! (जिन्होंने ये माला गूँदी है) वे पारब्रहम परमात्मा को मिले रहते हैं। 11।
सलोक मः 5 ॥
नानक आए से परवाणु है जिन हरि वुठा चिति ॥
गाल॑ी अल पलालीआ कंमि न आवहि मित ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक ! जिन मनुष्यों के चित्त में परमात्मा आ बसा है उनका आना सफल है। हे मित्र ! फोकी बातें किसी काम नहीं आतीं (नाम से टूट के फोकी बातों का कोई लाभ नहीं होता)। 1।
मः 5 ॥
पारब्रहमु प्रभु द्रिसटी आइआ पूरन अगम बिसमाद ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5II हे नानक ! (जिस मनुष्य ने) पूरे गुरू की कृपा से परमात्मा के नाम को अपना धन बनाया है।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 12 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।