अंग 320

अंग
320
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪਉੜੀ ॥
ਤਿਸੈ ਸਰੇਵਹੁ ਪ੍ਰਾਣੀਹੋ ਜਿਸ ਦੈ ਨਾਉ ਪਲੈ ॥
ਐਥੈ ਰਹਹੁ ਸੁਹੇਲਿਆ ਅਗੈ ਨਾਲਿ ਚਲੈ ॥
ਘਰੁ ਬੰਧਹੁ ਸਚ ਧਰਮ ਕਾ ਗਡਿ ਥੰਮੁ ਅਹਲੈ ॥
ਓਟ ਲੈਹੁ ਨਾਰਾਇਣੈ ਦੀਨ ਦੁਨੀਆ ਝਲੈ ॥
ਨਾਨਕ ਪਕੜੇ ਚਰਣ ਹਰਿ ਤਿਸੁ ਦਰਗਹ ਮਲੈ ॥੮॥
पउड़ी ॥
तिसै सरेवहु प्राणीहो जिस दै नाउ पलै ॥
ऐथै रहहु सुहेलिआ अगै नालि चलै ॥
घरु बंधहु सच धरम का गडि थंमु अहलै ॥
ओट लैहु नाराइणै दीन दुनीआ झलै ॥
नानक पकड़े चरण हरि तिसु दरगह मलै ॥८॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ उस (गुरू) की। हे लोगो ! सेवा करो जिसके पल्ले प्रभू का नाम है (भाव। जिससे नाम मिल सकता है)। (इस तरह) यहाँ सुखी रहोगे और परलोक में (ये नाम) तुम्हारे साथ जाएगा। (ये नाम रूपी) पक्का स्तम्भ (खम्भा) गाड़ के सदा कायम रहने वाले धर्म का मंदिर (सत्संग) बनाओ। अकाल-पुरख की टेक रखो जो दीन और दुनिया का आसरा देने वाला है। हे नानक ! जिस मनुष्य ने प्रभू के पैर पकड़े हैं वह प्रभू की दरगाह में बना रहता है। 8।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਜਾਚਕੁ ਮੰਗੈ ਦਾਨੁ ਦੇਹਿ ਪਿਆਰਿਆ ॥
ਦੇਵਣਹਾਰੁ ਦਾਤਾਰੁ ਮੈ ਨਿਤ ਚਿਤਾਰਿਆ ॥
ਨਿਖੁਟਿ ਨ ਜਾਈ ਮੂਲਿ ਅਤੁਲ ਭੰਡਾਰਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਸਬਦੁ ਅਪਾਰੁ ਤਿਨਿ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਸਾਰਿਆ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
जाचकु मंगै दानु देहि पिआरिआ ॥
देवणहारु दातारु मै नित चितारिआ ॥
निखुटि न जाई मूलि अतुल भंडारिआ ॥
नानक सबदु अपारु तिनि सभु किछु सारिआ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ (हे प्रभू !) मैं मंगता (तेरे ‘अपार शबद’ की) ख़ैर मांगता हूँ। मुझे ख़ैर दे। तू दातें देने वाला है। तू दातें देने के स्मर्थ है। मैं तुझे सदा याद करता हूँ। तेरा खजाना बेअंत है (अगर उसमें से मुझे भी ख़ैर डाल दे तो) खत्म नहीं होता। हे नानक ! (प्रभू की सिफत सालाह की) बाणी अपार है। इस बाणी ने मेरा हरेक कार्य सँवार दिया है। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਸਿਖਹੁ ਸਬਦੁ ਪਿਆਰਿਹੋ ਜਨਮ ਮਰਨ ਕੀ ਟੇਕ ॥
ਮੁਖ ਊਜਲ ਸਦਾ ਸੁਖੀ ਨਾਨਕ ਸਿਮਰਤ ਏਕ ॥੨॥
मः ५ ॥
सिखहु सबदु पिआरिहो जनम मरन की टेक ॥
मुख ऊजल सदा सुखी नानक सिमरत एक ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ हे प्यारे सज्जनों ! (प्रभू की सिफत सालाह वाली) गुरबाणी याद रखने की आदत डालो। ये सारी उम्र का आसरा (बनती) है। हे नानक ! (इस बाणी के द्वारा) एक प्रभू को सिमरने से सदा सुखी रहते हैं और माथा खिला रहता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਓਥੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਵੰਡੀਐ ਸੁਖੀਆ ਹਰਿ ਕਰਣੇ ॥
ਜਮ ਕੈ ਪੰਥਿ ਨ ਪਾਈਅਹਿ ਫਿਰਿ ਨਾਹੀ ਮਰਣੇ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਆਇਆ ਪ੍ਰੇਮ ਰਸੁ ਤਿਸੈ ਹੀ ਜਰਣੇ ॥
ਬਾਣੀ ਉਚਰਹਿ ਸਾਧ ਜਨ ਅਮਿਉ ਚਲਹਿ ਝਰਣੇ ॥
ਪੇਖਿ ਦਰਸਨੁ ਨਾਨਕੁ ਜੀਵਿਆ ਮਨ ਅੰਦਰਿ ਧਰਣੇ ॥੯॥
पउड़ी ॥
ओथै अंम्रितु वंडीऐ सुखीआ हरि करणे ॥
जम कै पंथि न पाईअहि फिरि नाही मरणे ॥
जिस नो आइआ प्रेम रसु तिसै ही जरणे ॥
बाणी उचरहि साध जन अमिउ चलहि झरणे ॥
पेखि दरसनु नानकु जीविआ मन अंदरि धरणे ॥९॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ सब जीवों को सुखी करने वाला हरी-नाम अमृत उस सत्संग में बाँटते हैं। (जो मनुष्य वह अमृत प्राप्त करते हैं वह) जम के राह पर नहीं पाए जाते। उन्हें मुड़ मौत (का डर सताता) नहीं। जिस मनुष्य को हरी नाम के प्यार का स्वाद आता है। वह इस स्वाद को अपने अंदर टिकाता है। (सत्संग में) गुरमुख सिफत सालाह की बाणी उच्चारते हैं वहाँ अमृत के। जैसे। फुव्वारे चल पड़ते हैं। नानक (भी उस सत्संग का) दर्शन करके जी रहा है और मन में हरि-नाम को धारण कर रहा है। 9।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਸੇਵਿਐ ਦੂਖਾ ਕਾ ਹੋਇ ਨਾਸੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਅਰਾਧਿਐ ਕਾਰਜੁ ਆਵੈ ਰਾਸਿ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
सतिगुरि पूरै सेविऐ दूखा का होइ नासु ॥
नानक नामि अराधिऐ कारजु आवै रासि ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५ ॥ हे नानक ! अगर पूरे गुरू के बताए हुए मार्ग पर चलें तो दुखों का नाश हो जाता है और अगर तेरा नाम सिमरें तो जीवन का मनोरथ सफल हो जाता है। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਸੰਕਟ ਛੁਟਹਿ ਅਨਦ ਮੰਗਲ ਬਿਸ੍ਰਾਮ ॥
ਨਾਨਕ ਜਪੀਐ ਸਦਾ ਹਰਿ ਨਿਮਖ ਨ ਬਿਸਰਉ ਨਾਮੁ ॥੨॥
मः ५ ॥
जिसु सिमरत संकट छुटहि अनद मंगल बिस्राम ॥
नानक जपीऐ सदा हरि निमख न बिसरउ नामु ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ हे नानक ! जिस परमात्मा को सिमरने से सारे दुख दूर हो जाते हैं और (हृदय में) आनंद व खुशियों का निवास होता है उसको सदा सिमरें। कभी निमख मात्र भी वह हरी-नाम हमें ना भूले। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਤਿਨ ਕੀ ਸੋਭਾ ਕਿਆ ਗਣੀ ਜਿਨੀ ਹਰਿ ਹਰਿ ਲਧਾ ॥
ਸਾਧਾ ਸਰਣੀ ਜੋ ਪਵੈ ਸੋ ਛੁਟੈ ਬਧਾ ॥
ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਅਬਿਨਾਸੀਐ ਜੋਨਿ ਗਰਭਿ ਨ ਦਧਾ ॥
ਗੁਰੁ ਭੇਟਿਆ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਹਰਿ ਪੜਿ ਬੁਝਿ ਸਮਧਾ ॥
ਨਾਨਕ ਪਾਇਆ ਸੋ ਧਣੀ ਹਰਿ ਅਗਮ ਅਗਧਾ ॥੧੦॥
पउड़ी ॥
तिन की सोभा किआ गणी जिनी हरि हरि लधा ॥
साधा सरणी जो पवै सो छुटै बधा ॥
गुण गावै अबिनासीऐ जोनि गरभि न दधा ॥
गुरु भेटिआ पारब्रहमु हरि पड़ि बुझि समधा ॥
नानक पाइआ सो धणी हरि अगम अगधा ॥१०॥

हिन्दी अर्थ: पउडी॥ जिन (गुरमुखों) ने ईश्वर को पा लिया है उनका बड़प्पन बयान नहीं किया जा सकता। जो मनुष्य उन गुरमुखों की शरण आता है वह माया के बंधनों में बंधा हुआ मुक्त हो जाता है (भाव। उसके माया के बंधन टूट जाते हैं)। वह अविनाशी प्रभू के गुण गाता है और जूनियों में पड़-पड़ के नहीं सड़ता। उसे गुरू मिल जाता है। वह प्रभू की सिफत सालाह उचार के और समझ के शांति प्राप्त करता है। हे नानक ! उस मनुष्य ने अथाह और अपहुँच मालिक हरी को पा लिया है। 10।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਕਾਮੁ ਨ ਕਰਹੀ ਆਪਣਾ ਫਿਰਹਿ ਅਵਤਾ ਲੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਇ ਵਿਸਾਰਿਐ ਸੁਖੁ ਕਿਨੇਹਾ ਹੋਇ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
कामु न करही आपणा फिरहि अवता लोइ ॥
नानक नाइ विसारिऐ सुखु किनेहा होइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ (हे जीव !) तू अपना (असल) काम नहीं करता और जगत में आवारा फिर रहा है। हे नानक ! अगर प्रभू का नाम बिसार दिया जाए तो कोई भी सुख नहीं हो सकता। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਬਿਖੈ ਕਉੜਤਣਿ ਸਗਲ ਮਾਹਿ ਜਗਤਿ ਰਹੀ ਲਪਟਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਨਿ ਵੀਚਾਰਿਆ ਮੀਠਾ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਉ ॥੨॥
मः ५ ॥
बिखै कउड़तणि सगल माहि जगति रही लपटाइ ॥
नानक जनि वीचारिआ मीठा हरि का नाउ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ (माया) जहर की कड़वाहट सारे जीवों में है। जगत में सबको चिपकी हुई है। हे नानक ! (सिर्फ प्रभू के) सेवक ने ये विचार की है कि परमात्मा का नाम ही मीठा है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਇਹ ਨੀਸਾਣੀ ਸਾਧ ਕੀ ਜਿਸੁ ਭੇਟਤ ਤਰੀਐ ॥
ਜਮਕੰਕਰੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵਈ ਫਿਰਿ ਬਹੁੜਿ ਨ ਮਰੀਐ ॥
ਭਵ ਸਾਗਰੁ ਸੰਸਾਰੁ ਬਿਖੁ ਸੋ ਪਾਰਿ ਉਤਰੀਐ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗੁੰਫਹੁ ਮਨਿ ਮਾਲ ਹਰਿ ਸਭ ਮਲੁ ਪਰਹਰੀਐ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰੀਤਮ ਮਿਲਿ ਰਹੇ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਨਰਹਰੀਐ ॥੧੧॥
पउड़ी ॥
इह नीसाणी साध की जिसु भेटत तरीऐ ॥
जमकंकरु नेड़ि न आवई फिरि बहुड़ि न मरीऐ ॥
भव सागरु संसारु बिखु सो पारि उतरीऐ ॥
हरि गुण गुंफहु मनि माल हरि सभ मलु परहरीऐ ॥
नानक प्रीतम मिलि रहे पारब्रहम नरहरीऐ ॥११॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ साधू की ये निशानी है कि उसको मिल के (संसार) समुंद्र से तैर जाते हैं। जम का सेवक (भाव। जमदूत) नजदीक नहीं फटकता और बार-बार नहीं मरना पड़ता। जो जहर-रूपी संसार समुंद्र है इससे पार लांघ जाते हैं। हे भाई ! (साधू गुरमुख को मिल के) मन में परमात्मा के गुणों की माला गूँदो। मन की सारी मैल दूर हो जाती है। हे नानक ! (जिन्होंने ये माला गूँदी है) वे पारब्रहम परमात्मा को मिले रहते हैं। 11।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਨਾਨਕ ਆਏ ਸੇ ਪਰਵਾਣੁ ਹੈ ਜਿਨ ਹਰਿ ਵੁਠਾ ਚਿਤਿ ॥
ਗਾਲੑੀ ਅਲ ਪਲਾਲੀਆ ਕੰਮਿ ਨ ਆਵਹਿ ਮਿਤ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
नानक आए से परवाणु है जिन हरि वुठा चिति ॥
गाल॑ी अल पलालीआ कंमि न आवहि मित ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ हे नानक ! जिन मनुष्यों के चित्त में परमात्मा आ बसा है उनका आना सफल है। हे मित्र ! फोकी बातें किसी काम नहीं आतीं (नाम से टूट के फोकी बातों का कोई लाभ नहीं होता)। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪ੍ਰਭੁ ਦ੍ਰਿਸਟੀ ਆਇਆ ਪੂਰਨ ਅਗਮ ਬਿਸਮਾਦ ॥
मः ५ ॥
पारब्रहमु प्रभु द्रिसटी आइआ पूरन अगम बिसमाद ॥

हिन्दी अर्थ: महला ५II हे नानक ! (जिस मनुष्य ने) पूरे गुरू की कृपा से परमात्मा के नाम को अपना धन बनाया है।

संदर्भ: यह अंग 320 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Faridabad-Delhi border के पास सर्दियों की धुंध में सुबह का सूरज।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 49 पंक्तियों का है, 12 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 320” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 321 →, पीछे का: ← अंग 319

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।