अंग
294
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬਨਿ ਤਿਨਿ ਪਰਬਤਿ ਹੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ॥
ਜੈਸੀ ਆਗਿਆ ਤੈਸਾ ਕਰਮੁ ॥
ਪਉਣ ਪਾਣੀ ਬੈਸੰਤਰ ਮਾਹਿ ॥
ਚਾਰਿ ਕੁੰਟ ਦਹ ਦਿਸੇ ਸਮਾਹਿ ॥
ਤਿਸ ਤੇ ਭਿੰਨ ਨਹੀ ਕੋ ਠਾਉ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਸੁਖੁ ਪਾਉ ॥੨॥
ਜੈਸੀ ਆਗਿਆ ਤੈਸਾ ਕਰਮੁ ॥
ਪਉਣ ਪਾਣੀ ਬੈਸੰਤਰ ਮਾਹਿ ॥
ਚਾਰਿ ਕੁੰਟ ਦਹ ਦਿਸੇ ਸਮਾਹਿ ॥
ਤਿਸ ਤੇ ਭਿੰਨ ਨਹੀ ਕੋ ਠਾਉ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਸੁਖੁ ਪਾਉ ॥੨॥
बनि तिनि परबति है पारब्रहमु ॥
जैसी आगिआ तैसा करमु ॥
पउण पाणी बैसंतर माहि ॥
चारि कुंट दह दिसे समाहि ॥
तिस ते भिंन नही को ठाउ ॥
गुर प्रसादि नानक सुखु पाउ ॥२॥
जैसी आगिआ तैसा करमु ॥
पउण पाणी बैसंतर माहि ॥
चारि कुंट दह दिसे समाहि ॥
तिस ते भिंन नही को ठाउ ॥
गुर प्रसादि नानक सुखु पाउ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: वह पारब्रहम जंगल में है घास (आदि) में है और पर्वत में है; जैसा वह हुकम करता है वैसा ही (जीव) काम करता है। पवन में पानी में आग में चहुँ कुंटों में दसों दिशाओं में (सब जगह) समाया हुआ है। कोई (भी) जगह उस प्रभू से अलग नहीं है; (पर) हे नानक ! (इस निश्चय का) आनंद गुरू की कृपा से ही मिलता है।२।
ਬੇਦ ਪੁਰਾਨ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਮਹਿ ਦੇਖੁ ॥
ਸਸੀਅਰ ਸੂਰ ਨਖੵਤ੍ਰ ਮਹਿ ਏਕੁ ॥
ਬਾਣੀ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਸਭੁ ਕੋ ਬੋਲੈ ॥
ਆਪਿ ਅਡੋਲੁ ਨ ਕਬਹੂ ਡੋਲੈ ॥
ਸਰਬ ਕਲਾ ਕਰਿ ਖੇਲੈ ਖੇਲ ॥
ਮੋਲਿ ਨ ਪਾਈਐ ਗੁਣਹ ਅਮੋਲ ॥
ਸਰਬ ਜੋਤਿ ਮਹਿ ਜਾ ਕੀ ਜੋਤਿ ॥
ਧਾਰਿ ਰਹਿਓ ਸੁਆਮੀ ਓਤਿ ਪੋਤਿ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਭਰਮ ਕਾ ਨਾਸੁ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਮਹਿ ਏਹੁ ਬਿਸਾਸੁ ॥੩॥
ਸਸੀਅਰ ਸੂਰ ਨਖੵਤ੍ਰ ਮਹਿ ਏਕੁ ॥
ਬਾਣੀ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਸਭੁ ਕੋ ਬੋਲੈ ॥
ਆਪਿ ਅਡੋਲੁ ਨ ਕਬਹੂ ਡੋਲੈ ॥
ਸਰਬ ਕਲਾ ਕਰਿ ਖੇਲੈ ਖੇਲ ॥
ਮੋਲਿ ਨ ਪਾਈਐ ਗੁਣਹ ਅਮੋਲ ॥
ਸਰਬ ਜੋਤਿ ਮਹਿ ਜਾ ਕੀ ਜੋਤਿ ॥
ਧਾਰਿ ਰਹਿਓ ਸੁਆਮੀ ਓਤਿ ਪੋਤਿ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਭਰਮ ਕਾ ਨਾਸੁ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਮਹਿ ਏਹੁ ਬਿਸਾਸੁ ॥੩॥
बेद पुरान सिंम्रिति महि देखु ॥
ससीअर सूर नखॵत्र महि एकु ॥
बाणी प्रभ की सभु को बोलै ॥
आपि अडोलु न कबहू डोलै ॥
सरब कला करि खेलै खेल ॥
मोलि न पाईऐ गुणह अमोल ॥
सरब जोति महि जा की जोति ॥
धारि रहिओ सुआमी ओति पोति ॥
गुर परसादि भरम का नासु ॥
नानक तिन महि एहु बिसासु ॥३॥
ससीअर सूर नखॵत्र महि एकु ॥
बाणी प्रभ की सभु को बोलै ॥
आपि अडोलु न कबहू डोलै ॥
सरब कला करि खेलै खेल ॥
मोलि न पाईऐ गुणह अमोल ॥
सरब जोति महि जा की जोति ॥
धारि रहिओ सुआमी ओति पोति ॥
गुर परसादि भरम का नासु ॥
नानक तिन महि एहु बिसासु ॥३॥
हिन्दी अर्थ: वेदों में, पुराणों में, स्मृतियों में (उसी प्रभू को) देखो; चंद्रमा, सूरज, तारों में भी एक वही है। हरेक जीव अकाल-पुरख की ही बोली बोलता है; (पर सब में विद्यमान होते हुए भी) वह आप अडोल है कभी डोलता नहीं। सारी ताकतें रच के (जगत की) खेलें खेल रहा है। (पर वह) किसी मूल्य से नहीं मिलता (क्योंकि) अमूल्य गुणों वाला है। जिस प्रभू की ज्योति सारी ही ज्योतियों में (जल रही है) वह मालिक ताने बाने की तरह (सबको) आसरा दे रहा है। जिनका भरम गुरू की कृपा से मिट जाता है। (पर) हे नानक ! (अकाल-पुरख की इस सर्व-व्यापक हस्ती का) ये यकीन उन मनुष्यों के अंदर बनता है 3।
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕਾ ਪੇਖਨੁ ਸਭੁ ਬ੍ਰਹਮ ॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਸਭਿ ਧਰਮ ॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਸੁਨਹਿ ਸੁਭ ਬਚਨ ॥
ਸਰਬ ਬਿਆਪੀ ਰਾਮ ਸੰਗਿ ਰਚਨ ॥
ਜਿਨਿ ਜਾਤਾ ਤਿਸ ਕੀ ਇਹ ਰਹਤ ॥
ਸਤਿ ਬਚਨ ਸਾਧੂ ਸਭਿ ਕਹਤ ॥
ਜੋ ਜੋ ਹੋਇ ਸੋਈ ਸੁਖੁ ਮਾਨੈ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨਹਾਰੁ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਨੈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਸੇ ਬਾਹਰਿ ਭੀ ਓਹੀ ॥
ਨਾਨਕ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਸਭ ਮੋਹੀ ॥੪॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਸਭਿ ਧਰਮ ॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਸੁਨਹਿ ਸੁਭ ਬਚਨ ॥
ਸਰਬ ਬਿਆਪੀ ਰਾਮ ਸੰਗਿ ਰਚਨ ॥
ਜਿਨਿ ਜਾਤਾ ਤਿਸ ਕੀ ਇਹ ਰਹਤ ॥
ਸਤਿ ਬਚਨ ਸਾਧੂ ਸਭਿ ਕਹਤ ॥
ਜੋ ਜੋ ਹੋਇ ਸੋਈ ਸੁਖੁ ਮਾਨੈ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨਹਾਰੁ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਨੈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਸੇ ਬਾਹਰਿ ਭੀ ਓਹੀ ॥
ਨਾਨਕ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਸਭ ਮੋਹੀ ॥੪॥
संत जना का पेखनु सभु ब्रहम ॥
संत जना कै हिरदै सभि धरम ॥
संत जना सुनहि सुभ बचन ॥
सरब बिआपी राम संगि रचन ॥
जिनि जाता तिस की इह रहत ॥
सति बचन साधू सभि कहत ॥
जो जो होइ सोई सुखु मानै ॥
करन करावनहारु प्रभु जानै ॥
अंतरि बसे बाहरि भी ओही ॥
नानक दरसनु देखि सभ मोही ॥४॥
संत जना कै हिरदै सभि धरम ॥
संत जना सुनहि सुभ बचन ॥
सरब बिआपी राम संगि रचन ॥
जिनि जाता तिस की इह रहत ॥
सति बचन साधू सभि कहत ॥
जो जो होइ सोई सुखु मानै ॥
करन करावनहारु प्रभु जानै ॥
अंतरि बसे बाहरि भी ओही ॥
नानक दरसनु देखि सभ मोही ॥४॥
हिन्दी अर्थ: संत जन हरेक जगह अकाल-पुरख को ही देखते हैं। उनके हृदय में सारे (विचार) धर्म के ही (उठते हैं)। संत जन भले वचन ही सुनते हैं और सर्व-व्यापक अकाल-पुरख के साथ जुड़े रहते हैं। जिस जिस संत जन ने (प्रभू को) जान लिया है उसकी रहनी ही ये हो जाती है कि वह सदा सच्चे वचन बोलता है। (और) जो कुछ (प्रभू के द्वारा) होता है उसी को सुख मानता है। सब काम करने वाला और (जीवों से) करवाने वाला प्रभू को ही जानता है। (साधु जनों के लिए) अंदर बाहर (सब जगह) वही प्रभू बसता है। (प्रभू के सर्व-व्यापी) दर्शन करके सारी सृष्टि मस्त हो जाती है। 4।
ਆਪਿ ਸਤਿ ਕੀਆ ਸਭੁ ਸਤਿ ॥
ਤਿਸੁ ਪ੍ਰਭ ਤੇ ਸਗਲੀ ਉਤਪਤਿ ॥
ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਕਰੇ ਬਿਸਥਾਰੁ ॥
ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਏਕੰਕਾਰੁ ॥
ਅਨਿਕ ਕਲਾ ਲਖੀ ਨਹ ਜਾਇ ॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥
ਕਵਨ ਨਿਕਟਿ ਕਵਨ ਕਹੀਐ ਦੂਰਿ ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਆਪ ਭਰਪੂਰਿ ॥
ਅੰਤਰਗਤਿ ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਜਨਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਜਨ ਆਪਿ ਬੁਝਾਏ ॥੫॥
ਤਿਸੁ ਪ੍ਰਭ ਤੇ ਸਗਲੀ ਉਤਪਤਿ ॥
ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਕਰੇ ਬਿਸਥਾਰੁ ॥
ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਏਕੰਕਾਰੁ ॥
ਅਨਿਕ ਕਲਾ ਲਖੀ ਨਹ ਜਾਇ ॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥
ਕਵਨ ਨਿਕਟਿ ਕਵਨ ਕਹੀਐ ਦੂਰਿ ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਆਪ ਭਰਪੂਰਿ ॥
ਅੰਤਰਗਤਿ ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਜਨਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਜਨ ਆਪਿ ਬੁਝਾਏ ॥੫॥
आपि सति कीआ सभु सति ॥
तिसु प्रभ ते सगली उतपति ॥
तिसु भावै ता करे बिसथारु ॥
तिसु भावै ता एकंकारु ॥
अनिक कला लखी नह जाइ ॥
जिसु भावै तिसु लए मिलाइ ॥
कवन निकटि कवन कहीऐ दूरि ॥
आपे आपि आप भरपूरि ॥
अंतरगति जिसु आपि जनाए ॥
नानक तिसु जन आपि बुझाए ॥५॥
तिसु प्रभ ते सगली उतपति ॥
तिसु भावै ता करे बिसथारु ॥
तिसु भावै ता एकंकारु ॥
अनिक कला लखी नह जाइ ॥
जिसु भावै तिसु लए मिलाइ ॥
कवन निकटि कवन कहीऐ दूरि ॥
आपे आपि आप भरपूरि ॥
अंतरगति जिसु आपि जनाए ॥
नानक तिसु जन आपि बुझाए ॥५॥
हिन्दी अर्थ: प्रभू स्वयं हस्ती वाला है। जो कुछ उसने पैदा किया है वह सब अस्तित्व वाला है (भाव- भरम भुलेखा नहीं) सारी सृष्टि उस प्रभू से हुई है। अगर उसकी रजा हो तो जगत का पसारा कर देता है। अगर उसे भाए तो फिर एक खुद ही खुद हो जाता है। उसकी अनेक ताकतें हैं किसी का बयान नहीं हो सकता। जिस पर प्रसन्न होता है उसे अपने साथ मिला लेता है। वह प्रभू कितनों के नजदीक और कितनों से दूर कहा जा सकता है? वह प्रभू खुद ही हर जगह मौजूद है। जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं ही अंदर की उच्च अवस्था सुझाता है। हे नानक ! उस मनुष्य को (अपनी इस सर्व-व्यापक की) समझ बख्शता है। 5।
ਸਰਬ ਭੂਤ ਆਪਿ ਵਰਤਾਰਾ ॥
ਸਰਬ ਨੈਨ ਆਪਿ ਪੇਖਨਹਾਰਾ ॥
ਸਗਲ ਸਮਗ੍ਰੀ ਜਾ ਕਾ ਤਨਾ ॥
ਆਪਨ ਜਸੁ ਆਪ ਹੀ ਸੁਨਾ ॥
ਆਵਨ ਜਾਨੁ ਇਕੁ ਖੇਲੁ ਬਨਾਇਆ ॥
ਆਗਿਆਕਾਰੀ ਕੀਨੀ ਮਾਇਆ ॥
ਸਭ ਕੈ ਮਧਿ ਅਲਿਪਤੋ ਰਹੈ ॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਹਣਾ ਸੁ ਆਪੇ ਕਹੈ ॥
ਆਗਿਆ ਆਵੈ ਆਗਿਆ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾ ਭਾਵੈ ਤਾ ਲਏ ਸਮਾਇ ॥੬॥
ਸਰਬ ਨੈਨ ਆਪਿ ਪੇਖਨਹਾਰਾ ॥
ਸਗਲ ਸਮਗ੍ਰੀ ਜਾ ਕਾ ਤਨਾ ॥
ਆਪਨ ਜਸੁ ਆਪ ਹੀ ਸੁਨਾ ॥
ਆਵਨ ਜਾਨੁ ਇਕੁ ਖੇਲੁ ਬਨਾਇਆ ॥
ਆਗਿਆਕਾਰੀ ਕੀਨੀ ਮਾਇਆ ॥
ਸਭ ਕੈ ਮਧਿ ਅਲਿਪਤੋ ਰਹੈ ॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਹਣਾ ਸੁ ਆਪੇ ਕਹੈ ॥
ਆਗਿਆ ਆਵੈ ਆਗਿਆ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾ ਭਾਵੈ ਤਾ ਲਏ ਸਮਾਇ ॥੬॥
सरब भूत आपि वरतारा ॥
सरब नैन आपि पेखनहारा ॥
सगल समग्री जा का तना ॥
आपन जसु आप ही सुना ॥
आवन जानु इकु खेलु बनाइआ ॥
आगिआकारी कीनी माइआ ॥
सभ कै मधि अलिपतो रहै ॥
जो किछु कहणा सु आपे कहै ॥
आगिआ आवै आगिआ जाइ ॥
नानक जा भावै ता लए समाइ ॥६॥
सरब नैन आपि पेखनहारा ॥
सगल समग्री जा का तना ॥
आपन जसु आप ही सुना ॥
आवन जानु इकु खेलु बनाइआ ॥
आगिआकारी कीनी माइआ ॥
सभ कै मधि अलिपतो रहै ॥
जो किछु कहणा सु आपे कहै ॥
आगिआ आवै आगिआ जाइ ॥
नानक जा भावै ता लए समाइ ॥६॥
हिन्दी अर्थ: सारे जीवों में प्रभू स्वयं ही बरत रहा है। (उन जीवों की) सारी आँखों में से प्रभू खुद ही देख रहा है। (जगत के) सारे पदार्थ जिस प्रभू के शरीर हैं। (सब में व्यापक हो के) वह अपनी शोभा आप ही सुन रहा है। (जीवों का) पैदा होना मरना प्रभू ने एक खेल बनाई है और अपने हुकम में चलने वाली माया बना दी है। वह सब (माया के पसारे ) के बिच में रह के भी इस से अलिप्त रहता है जो कुछ भी कहना है वह स्वं ही कहता है हे नानक ! (जीव) अकाल-पुरख के हुकम में पैदा होता है और हुकम में मरता है। जब उसकी रजा होती है तो उनको अपने में लीन कर लेता है। 6।
ਇਸ ਤੇ ਹੋਇ ਸੁ ਨਾਹੀ ਬੁਰਾ ॥
ਓਰੈ ਕਹਹੁ ਕਿਨੈ ਕਛੁ ਕਰਾ ॥
ਆਪਿ ਭਲਾ ਕਰਤੂਤਿ ਅਤਿ ਨੀਕੀ ॥
ਆਪੇ ਜਾਨੈ ਅਪਨੇ ਜੀ ਕੀ ॥
ਆਪਿ ਸਾਚੁ ਧਾਰੀ ਸਭ ਸਾਚੁ ॥
ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਆਪਨ ਸੰਗਿ ਰਾਚੁ ॥
ਤਾ ਕੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥
ਦੂਸਰ ਹੋਇ ਤ ਸੋਝੀ ਪਾਇ ॥
ਤਿਸ ਕਾ ਕੀਆ ਸਭੁ ਪਰਵਾਨੁ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਇਹੁ ਜਾਨੁ ॥੭॥
ਓਰੈ ਕਹਹੁ ਕਿਨੈ ਕਛੁ ਕਰਾ ॥
ਆਪਿ ਭਲਾ ਕਰਤੂਤਿ ਅਤਿ ਨੀਕੀ ॥
ਆਪੇ ਜਾਨੈ ਅਪਨੇ ਜੀ ਕੀ ॥
ਆਪਿ ਸਾਚੁ ਧਾਰੀ ਸਭ ਸਾਚੁ ॥
ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਆਪਨ ਸੰਗਿ ਰਾਚੁ ॥
ਤਾ ਕੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥
ਦੂਸਰ ਹੋਇ ਤ ਸੋਝੀ ਪਾਇ ॥
ਤਿਸ ਕਾ ਕੀਆ ਸਭੁ ਪਰਵਾਨੁ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਇਹੁ ਜਾਨੁ ॥੭॥
इस ते होइ सु नाही बुरा ॥
ओरै कहहु किनै कछु करा ॥
आपि भला करतूति अति नीकी ॥
आपे जानै अपने जी की ॥
आपि साचु धारी सभ साचु ॥
ओति पोति आपन संगि राचु ॥
ता की गति मिति कही न जाइ ॥
दूसर होइ त सोझी पाइ ॥
तिस का कीआ सभु परवानु ॥
गुर प्रसादि नानक इहु जानु ॥७॥
ओरै कहहु किनै कछु करा ॥
आपि भला करतूति अति नीकी ॥
आपे जानै अपने जी की ॥
आपि साचु धारी सभ साचु ॥
ओति पोति आपन संगि राचु ॥
ता की गति मिति कही न जाइ ॥
दूसर होइ त सोझी पाइ ॥
तिस का कीआ सभु परवानु ॥
गुर प्रसादि नानक इहु जानु ॥७॥
हिन्दी अर्थ: जो कुछ प्रभू की ओर से होता है (जीवों के लिए) बुरा नहीं होता; और प्रभू के बिना बताओ किसी ने कुछ कर दिखाया है? प्रभू खुद ठीक है उसका काम भी ठीक है। अपने दिल की बात वह खुद ही जानता है। स्वयं हस्ती वाला है। सारी रचना जो उसके आसरे है। वह भी अस्तित्व वाली है (भरम नहीं)। ताने-पेटे की तरह उसने अपने साथ मिलाई हुई है। वह प्रभू कैसा है और कितना बड़ा है, ये बात बयान नहीं हो सकती। कोई दूसरा (अलग) हो तो समझ सके। प्रभू का किया हुआ सब कुछ (जीवों को) सिर-माथे मानना पड़ता है। (पर) हे नानक ! यह पहिचान गुरू की कृपा से आती है। 7।
ਜੋ ਜਾਨੈ ਤਿਸੁ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਆਪਿ ਮਿਲਾਇ ਲਏ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥
ਓਹੁ ਧਨਵੰਤੁ ਕੁਲਵੰਤੁ ਪਤਿਵੰਤੁ ॥
ਜੀਵਨ ਮੁਕਤਿ ਜਿਸੁ ਰਿਦੈ ਭਗਵੰਤੁ ॥
ਧੰਨੁ ਧੰਨੁ ਧੰਨੁ ਜਨੁ ਆਇਆ ॥
ਆਪਿ ਮਿਲਾਇ ਲਏ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥
ਓਹੁ ਧਨਵੰਤੁ ਕੁਲਵੰਤੁ ਪਤਿਵੰਤੁ ॥
ਜੀਵਨ ਮੁਕਤਿ ਜਿਸੁ ਰਿਦੈ ਭਗਵੰਤੁ ॥
ਧੰਨੁ ਧੰਨੁ ਧੰਨੁ ਜਨੁ ਆਇਆ ॥
जो जानै तिसु सदा सुखु होइ ॥
आपि मिलाइ लए प्रभु सोइ ॥
ओहु धनवंतु कुलवंतु पतिवंतु ॥
जीवन मुकति जिसु रिदै भगवंतु ॥
धंनु धंनु धंनु जनु आइआ ॥
आपि मिलाइ लए प्रभु सोइ ॥
ओहु धनवंतु कुलवंतु पतिवंतु ॥
जीवन मुकति जिसु रिदै भगवंतु ॥
धंनु धंनु धंनु जनु आइआ ॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य प्रभू से सांझ पा लेता है उसे सदा सुख होता है। प्रभू उसे अपने साथ आप मिला लेता है। वह धन वाला कुल वाला और इज्ज़त वाला बन जाता है। जिस मनुष्य के हृदय में भगवान बसता है वह जीवित ही मुक्त हो जाता है। उसका (जगत में) आना मुबारक है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 294 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
WhatsApp-family-group पर सुबह की good-morning messages का flood।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 61 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 294” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 295 →, पीछे का: ← अंग 293।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।