अंग
225
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਦੈਤ ਸੰਘਾਰੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚਿ ਭਗਤਿ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥੮॥
ਬੂਡਾ ਦੁਰਜੋਧਨੁ ਪਤਿ ਖੋਈ ॥
ਰਾਮੁ ਨ ਜਾਨਿਆ ਕਰਤਾ ਸੋਈ ॥
ਜਨ ਕਉ ਦੂਖਿ ਪਚੈ ਦੁਖੁ ਹੋਈ ॥੯॥
ਜਨਮੇਜੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਨ ਜਾਨਿਆ ॥
ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਨਿਆ ॥
ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਭੂਲੇ ਬਹੁਰਿ ਪਛੁਤਾਨਿਆ ॥੧੦॥
ਕੰਸੁ ਕੇਸੁ ਚਾਂਡੂਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਰਾਮੁ ਨ ਚੀਨਿਆ ਅਪਨੀ ਪਤਿ ਖੋਈ ॥
ਬਿਨੁ ਜਗਦੀਸ ਨ ਰਾਖੈ ਕੋਈ ॥੧੧॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਗਰਬੁ ਨ ਮੇਟਿਆ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਧਰਮੁ ਧੀਰਜੁ ਹਰਿ ਨਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥੧੨॥੯॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚਿ ਭਗਤਿ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥੮॥
ਬੂਡਾ ਦੁਰਜੋਧਨੁ ਪਤਿ ਖੋਈ ॥
ਰਾਮੁ ਨ ਜਾਨਿਆ ਕਰਤਾ ਸੋਈ ॥
ਜਨ ਕਉ ਦੂਖਿ ਪਚੈ ਦੁਖੁ ਹੋਈ ॥੯॥
ਜਨਮੇਜੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਨ ਜਾਨਿਆ ॥
ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਨਿਆ ॥
ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਭੂਲੇ ਬਹੁਰਿ ਪਛੁਤਾਨਿਆ ॥੧੦॥
ਕੰਸੁ ਕੇਸੁ ਚਾਂਡੂਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਰਾਮੁ ਨ ਚੀਨਿਆ ਅਪਨੀ ਪਤਿ ਖੋਈ ॥
ਬਿਨੁ ਜਗਦੀਸ ਨ ਰਾਖੈ ਕੋਈ ॥੧੧॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਗਰਬੁ ਨ ਮੇਟਿਆ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਧਰਮੁ ਧੀਰਜੁ ਹਰਿ ਨਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥੧੨॥੯॥
दूजै भाइ दैत संघारे ॥
गुरमुखि साचि भगति निसतारे ॥८॥
बूडा दुरजोधनु पति खोई ॥
रामु न जानिआ करता सोई ॥
जन कउ दूखि पचै दुखु होई ॥९॥
जनमेजै गुर सबदु न जानिआ ॥
किउ सुखु पावै भरमि भुलानिआ ॥
इकु तिलु भूले बहुरि पछुतानिआ ॥१०॥
कंसु केसु चांडूरु न कोई ॥
रामु न चीनिआ अपनी पति खोई ॥
बिनु जगदीस न राखै कोई ॥११॥
बिनु गुर गरबु न मेटिआ जाइ ॥
गुरमति धरमु धीरजु हरि नाइ ॥
नानक नामु मिलै गुण गाइ ॥१२॥९॥
गुरमुखि साचि भगति निसतारे ॥८॥
बूडा दुरजोधनु पति खोई ॥
रामु न जानिआ करता सोई ॥
जन कउ दूखि पचै दुखु होई ॥९॥
जनमेजै गुर सबदु न जानिआ ॥
किउ सुखु पावै भरमि भुलानिआ ॥
इकु तिलु भूले बहुरि पछुतानिआ ॥१०॥
कंसु केसु चांडूरु न कोई ॥
रामु न चीनिआ अपनी पति खोई ॥
बिनु जगदीस न राखै कोई ॥११॥
बिनु गुर गरबु न मेटिआ जाइ ॥
गुरमति धरमु धीरजु हरि नाइ ॥
नानक नामु मिलै गुण गाइ ॥१२॥९॥
हिन्दी अर्थ: खुद ही दैत्यों को माया के मोह में फंसा के मारता है~ खुद ही गुरू की शरण पड़े लोगों को अपने सिमरन में अपनी भक्ति मेुं जोड़ के (संसार समुंद्र से) पार लंघाता है। 8। दुर्योधन (अहंकार में) डूबा~ और अपनी इज्जत गवा बैठा। (अहंकार में आ के) उसने परमात्मा को करतार को याद ना रखा (इस हद तक गिरा कि अनाथ द्रोपदी को बेआबरू करने पर उतर आया)। पर जो परमात्मा के दास को (दुख देता है वह उस) दुख के कारण खुद ही खुआर होता है। उसे खुद ही वह दुख (मार) देता है। 9। राजा जनमेजा ने अपने गुरू की शिक्षा को ना समझा (अपने धन और अक्ल पर गुमान किया। अहंकार के कारण) भुलेखे में पड़ के गलत राह पड़ गया~ फिर सुख कहाँ मिलता? (गुरू ने समझा के कुष्ठ की भारी बिपदा से बचाने का उद्यम किया~ पर फिर भी) थोड़ा सा थिरक गया~ और फिर पछताया। (अहंकार बड़े बड़े समझदारों की अक्ल को चक्कर में डाल देता है)। 10। कंस~ केसी और चांडूर (महान योद्धा थे~ शूरबीरता में इनके बराबर का) और कोई नहीं था। (पर अपने ताकत के अहंकार में) इन्होंने परमात्मा की लीला को नहीं समझा और अपनी इज्जत गवा ली। (अपनी शक्ति का मान झूठा है। ये ताकत कोई मदद नहीं करती) ईश्वर के बिना और कोई (किसी की) रक्षा नहीं कर सकता। 11। (अहंकार बड़ा बलशाली है) गुरू की शरण पड़े बिना इस अहंकार को (अंदर से) मिटाया नहीं जा सकता। जो मनुष्य गुरू की शिक्षा धारण करता है वह (अहंकार मिटा के) धीरज धारता है। (धैर्य बहुत ऊँचा) धर्म है। हे नानक ! गुरू की शिक्षा पर चलने से ही परमात्मा का नाम प्राप्त होता है~ और जीव परमात्मा की सिफत सालाह करता है। 12। 9।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਚੋਆ ਚੰਦਨੁ ਅੰਕਿ ਚੜਾਵਉ ॥
ਪਾਟ ਪਟੰਬਰ ਪਹਿਰਿ ਹਢਾਵਉ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ਕਹਾ ਸੁਖੁ ਪਾਵਉ ॥੧॥
ਕਿਆ ਪਹਿਰਉ ਕਿਆ ਓਢਿ ਦਿਖਾਵਉ ॥
ਬਿਨੁ ਜਗਦੀਸ ਕਹਾ ਸੁਖੁ ਪਾਵਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਨੀ ਕੁੰਡਲ ਗਲਿ ਮੋਤੀਅਨ ਕੀ ਮਾਲਾ ॥
ਲਾਲ ਨਿਹਾਲੀ ਫੂਲ ਗੁਲਾਲਾ ॥
ਬਿਨੁ ਜਗਦੀਸ ਕਹਾ ਸੁਖੁ ਭਾਲਾ ॥੨॥
ਨੈਨ ਸਲੋਨੀ ਸੁੰਦਰ ਨਾਰੀ ॥
ਖੋੜ ਸੀਗਾਰ ਕਰੈ ਅਤਿ ਪਿਆਰੀ ॥
ਬਿਨੁ ਜਗਦੀਸ ਭਜੇ ਨਿਤ ਖੁਆਰੀ ॥੩॥
ਦਰ ਘਰ ਮਹਲਾ ਸੇਜ ਸੁਖਾਲੀ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਫੂਲ ਬਿਛਾਵੈ ਮਾਲੀ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ਸੁ ਦੇਹ ਦੁਖਾਲੀ ॥੪॥
ਹੈਵਰ ਗੈਵਰ ਨੇਜੇ ਵਾਜੇ ॥
ਲਸਕਰ ਨੇਬ ਖਵਾਸੀ ਪਾਜੇ ॥
ਬਿਨੁ ਜਗਦੀਸ ਝੂਠੇ ਦਿਵਾਜੇ ॥੫॥
ਸਿਧੁ ਕਹਾਵਉ ਰਿਧਿ ਸਿਧਿ ਬੁਲਾਵਉ ॥
ਤਾਜ ਕੁਲਹ ਸਿਰਿ ਛਤ੍ਰੁ ਬਨਾਵਉ ॥
ਬਿਨੁ ਜਗਦੀਸ ਕਹਾ ਸਚੁ ਪਾਵਉ ॥੬॥
ਖਾਨੁ ਮਲੂਕੁ ਕਹਾਵਉ ਰਾਜਾ ॥
ਅਬੇ ਤਬੇ ਕੂੜੇ ਹੈ ਪਾਜਾ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦ ਨ ਸਵਰਸਿ ਕਾਜਾ ॥੭॥
ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਵਿਸਾਰੀ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਜਾਨਿਆ ਰਿਦੈ ਮੁਰਾਰੀ ॥
ਪ੍ਰਣਵਤਿ ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਤੁਮਾਰੀ ॥੮॥੧੦॥
ਚੋਆ ਚੰਦਨੁ ਅੰਕਿ ਚੜਾਵਉ ॥
ਪਾਟ ਪਟੰਬਰ ਪਹਿਰਿ ਹਢਾਵਉ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ਕਹਾ ਸੁਖੁ ਪਾਵਉ ॥੧॥
ਕਿਆ ਪਹਿਰਉ ਕਿਆ ਓਢਿ ਦਿਖਾਵਉ ॥
ਬਿਨੁ ਜਗਦੀਸ ਕਹਾ ਸੁਖੁ ਪਾਵਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਨੀ ਕੁੰਡਲ ਗਲਿ ਮੋਤੀਅਨ ਕੀ ਮਾਲਾ ॥
ਲਾਲ ਨਿਹਾਲੀ ਫੂਲ ਗੁਲਾਲਾ ॥
ਬਿਨੁ ਜਗਦੀਸ ਕਹਾ ਸੁਖੁ ਭਾਲਾ ॥੨॥
ਨੈਨ ਸਲੋਨੀ ਸੁੰਦਰ ਨਾਰੀ ॥
ਖੋੜ ਸੀਗਾਰ ਕਰੈ ਅਤਿ ਪਿਆਰੀ ॥
ਬਿਨੁ ਜਗਦੀਸ ਭਜੇ ਨਿਤ ਖੁਆਰੀ ॥੩॥
ਦਰ ਘਰ ਮਹਲਾ ਸੇਜ ਸੁਖਾਲੀ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਫੂਲ ਬਿਛਾਵੈ ਮਾਲੀ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ਸੁ ਦੇਹ ਦੁਖਾਲੀ ॥੪॥
ਹੈਵਰ ਗੈਵਰ ਨੇਜੇ ਵਾਜੇ ॥
ਲਸਕਰ ਨੇਬ ਖਵਾਸੀ ਪਾਜੇ ॥
ਬਿਨੁ ਜਗਦੀਸ ਝੂਠੇ ਦਿਵਾਜੇ ॥੫॥
ਸਿਧੁ ਕਹਾਵਉ ਰਿਧਿ ਸਿਧਿ ਬੁਲਾਵਉ ॥
ਤਾਜ ਕੁਲਹ ਸਿਰਿ ਛਤ੍ਰੁ ਬਨਾਵਉ ॥
ਬਿਨੁ ਜਗਦੀਸ ਕਹਾ ਸਚੁ ਪਾਵਉ ॥੬॥
ਖਾਨੁ ਮਲੂਕੁ ਕਹਾਵਉ ਰਾਜਾ ॥
ਅਬੇ ਤਬੇ ਕੂੜੇ ਹੈ ਪਾਜਾ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦ ਨ ਸਵਰਸਿ ਕਾਜਾ ॥੭॥
ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਵਿਸਾਰੀ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਜਾਨਿਆ ਰਿਦੈ ਮੁਰਾਰੀ ॥
ਪ੍ਰਣਵਤਿ ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਤੁਮਾਰੀ ॥੮॥੧੦॥
गउड़ी महला १ ॥
चोआ चंदनु अंकि चड़ावउ ॥
पाट पटंबर पहिरि हढावउ ॥
बिनु हरि नाम कहा सुखु पावउ ॥१॥
किआ पहिरउ किआ ओढि दिखावउ ॥
बिनु जगदीस कहा सुखु पावउ ॥१॥ रहाउ ॥
कानी कुंडल गलि मोतीअन की माला ॥
लाल निहाली फूल गुलाला ॥
बिनु जगदीस कहा सुखु भाला ॥२॥
नैन सलोनी सुंदर नारी ॥
खोड़ सीगार करै अति पिआरी ॥
बिनु जगदीस भजे नित खुआरी ॥३॥
दर घर महला सेज सुखाली ॥
अहिनिसि फूल बिछावै माली ॥
बिनु हरि नाम सु देह दुखाली ॥४॥
हैवर गैवर नेजे वाजे ॥
लसकर नेब खवासी पाजे ॥
बिनु जगदीस झूठे दिवाजे ॥५॥
सिधु कहावउ रिधि सिधि बुलावउ ॥
ताज कुलह सिरि छत्रु बनावउ ॥
बिनु जगदीस कहा सचु पावउ ॥६॥
खानु मलूकु कहावउ राजा ॥
अबे तबे कूड़े है पाजा ॥
बिनु गुर सबद न सवरसि काजा ॥७॥
हउमै ममता गुर सबदि विसारी ॥
गुरमति जानिआ रिदै मुरारी ॥
प्रणवति नानक सरणि तुमारी ॥८॥१०॥
चोआ चंदनु अंकि चड़ावउ ॥
पाट पटंबर पहिरि हढावउ ॥
बिनु हरि नाम कहा सुखु पावउ ॥१॥
किआ पहिरउ किआ ओढि दिखावउ ॥
बिनु जगदीस कहा सुखु पावउ ॥१॥ रहाउ ॥
कानी कुंडल गलि मोतीअन की माला ॥
लाल निहाली फूल गुलाला ॥
बिनु जगदीस कहा सुखु भाला ॥२॥
नैन सलोनी सुंदर नारी ॥
खोड़ सीगार करै अति पिआरी ॥
बिनु जगदीस भजे नित खुआरी ॥३॥
दर घर महला सेज सुखाली ॥
अहिनिसि फूल बिछावै माली ॥
बिनु हरि नाम सु देह दुखाली ॥४॥
हैवर गैवर नेजे वाजे ॥
लसकर नेब खवासी पाजे ॥
बिनु जगदीस झूठे दिवाजे ॥५॥
सिधु कहावउ रिधि सिधि बुलावउ ॥
ताज कुलह सिरि छत्रु बनावउ ॥
बिनु जगदीस कहा सचु पावउ ॥६॥
खानु मलूकु कहावउ राजा ॥
अबे तबे कूड़े है पाजा ॥
बिनु गुर सबद न सवरसि काजा ॥७॥
हउमै ममता गुर सबदि विसारी ॥
गुरमति जानिआ रिदै मुरारी ॥
प्रणवति नानक सरणि तुमारी ॥८॥१०॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला १ ॥ अगर मैं इत्र और चंदन अपने तन पर लगा लूँ~ अगर मैं रेशम व रेशमी कपड़े पहनूँ~ (फिर भी) अगर मैं परमात्मा के नाम से वंचित हूँ~ तो कहीं भी मुझे सुख नहीं मिल सकता। 1। बढ़िया बढ़िया कपड़े पहनने और पहन कर दूसरों को दिखाने से क्या लाभ है? परमात्मा (के चरणों में जुड़े) बिनां कहीं और सुख नहीं मिल सकता। 1। रहाउ। अगर मैं अपने कानों में कुण्डल डाल लूँ~ गले में मोतियों की माला पहन लूँ~ मेरे लाल रंग गद्दे पर गुलाल के फूल (बिखरे हुए) हों~ (फिर भी) परमात्मा के सिमरन के बिना मुझे कहीं भी सुख नहीं मिल सकता। 2। अगर सुंदर आँखों वाली खूबसूरत मेरी स्त्री हो~ वह सोलह तरह के हार-श्रृंगार करती हो~ और मुझे बहुत प्यारी लगती हो; फिर भी जगत के मालिक प्रभू का सिमरन किए बगैर सदा ख्वारी ही होती है। 3। अगर मेरे पास बसने के लिए महिल-माढ़ियां हों~ सुख देने वाला मेरा पलंघ हो~ उस पर माली दिन रात फूल बिछाता रहे~ (फिर भी) परमात्मा के नाम सिमरन के बगैर ये शरीर दुखों का घर ही बना रहता है। 4। अगर मेरे पास बढ़िया घोड़े हाथी हों~ शस्त्रों से लेस फौजें हों~ लश्कर हों~ हायब हों~ शाही नौकर हों~ ये सारा दिखावा हो~ (फिर भी) जगत के मालिक परमात्मा का सिमरन किए बिना ये (शक्ति के) दिखावे नाशवंत ही हैं। 5। अगर मैं (अपने आप को) करामाती साधु कहला लूँ~ (जब चाहूँ) चमत्कारी शक्तियों को (अपने पास) बुला सकूँ। मेरे सिर पर ताज की टोपी हो~ मैं अपने सिर पर (शाही) छत्र झुला सकूँ~ (फिर भी) जगत के मालिक प्रभू के सिमरन के बिना सदा टिके रहने वाली (आत्मिक) शक्ति कहीं से हासिल नहीं कर सकता। 6। यदि मैं अपने आप को खान कहलवा लूँ~ बादशाह कहलवाऊँ~ राजा कहलाऊँ~ नौकरों चाकरों को डांट-फटकार भी दे सकूँ~ (ताकत का सारा ये) दिखावा नाश हो जाने वाला है। गुरू के शबद का आसरा लिए बिना मानस जीवन का मनोर्थ सिरे नहीं चढ़ता। 7। मैं बड़ा बन जाऊँ~ और मेरी बहुत सारी मल्कियतें हों -ये चाहत गुरू के शबद में जुड़ने से ही मन से भूलती हैं। गुरू की मति पर चलने से ही परमात्मा हृदय में टिका पहचाना जा सकता है। (पर~ ये सब कुछ तभी हो सकता है अगर परमात्मा की अपनी मेहर हो। इस वास्ते) नानक प्रभू-दर पे विनती करता है – (हे प्रभू !) मैं तेरी शरण आया हूँ। 8। 10।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਸੇਵਾ ਏਕ ਨ ਜਾਨਸਿ ਅਵਰੇ ॥
ਪਰਪੰਚ ਬਿਆਧਿ ਤਿਆਗੈ ਕਵਰੇ ॥
ਭਾਇ ਮਿਲੈ ਸਚੁ ਸਾਚੈ ਸਚੁ ਰੇ ॥੧॥
ਐਸਾ ਰਾਮ ਭਗਤੁ ਜਨੁ ਹੋਈ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ਮਿਲੈ ਮਲੁ ਧੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਊਂਧੋ ਕਵਲੁ ਸਗਲ ਸੰਸਾਰੈ ॥
ਦੁਰਮਤਿ ਅਗਨਿ ਜਗਤ ਪਰਜਾਰੈ ॥
ਸੋ ਉਬਰੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰੈ ॥੨॥
ਭ੍ਰਿੰਗ ਪਤੰਗੁ ਕੁੰਚਰੁ ਅਰੁ ਮੀਨਾ ॥
ਮਿਰਗੁ ਮਰੈ ਸਹਿ ਅਪੁਨਾ ਕੀਨਾ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਰਾਚਿ ਤਤੁ ਨਹੀ ਬੀਨਾ ॥੩॥
ਕਾਮੁ ਚਿਤੈ ਕਾਮਣਿ ਹਿਤਕਾਰੀ ॥
ਕ੍ਰੋਧੁ ਬਿਨਾਸੈ ਸਗਲ ਵਿਕਾਰੀ ॥
ਪਤਿ ਮਤਿ ਖੋਵਹਿ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰੀ ॥੪॥
ਸੇਵਾ ਏਕ ਨ ਜਾਨਸਿ ਅਵਰੇ ॥
ਪਰਪੰਚ ਬਿਆਧਿ ਤਿਆਗੈ ਕਵਰੇ ॥
ਭਾਇ ਮਿਲੈ ਸਚੁ ਸਾਚੈ ਸਚੁ ਰੇ ॥੧॥
ਐਸਾ ਰਾਮ ਭਗਤੁ ਜਨੁ ਹੋਈ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ਮਿਲੈ ਮਲੁ ਧੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਊਂਧੋ ਕਵਲੁ ਸਗਲ ਸੰਸਾਰੈ ॥
ਦੁਰਮਤਿ ਅਗਨਿ ਜਗਤ ਪਰਜਾਰੈ ॥
ਸੋ ਉਬਰੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰੈ ॥੨॥
ਭ੍ਰਿੰਗ ਪਤੰਗੁ ਕੁੰਚਰੁ ਅਰੁ ਮੀਨਾ ॥
ਮਿਰਗੁ ਮਰੈ ਸਹਿ ਅਪੁਨਾ ਕੀਨਾ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਰਾਚਿ ਤਤੁ ਨਹੀ ਬੀਨਾ ॥੩॥
ਕਾਮੁ ਚਿਤੈ ਕਾਮਣਿ ਹਿਤਕਾਰੀ ॥
ਕ੍ਰੋਧੁ ਬਿਨਾਸੈ ਸਗਲ ਵਿਕਾਰੀ ॥
ਪਤਿ ਮਤਿ ਖੋਵਹਿ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰੀ ॥੪॥
गउड़ी महला १ ॥
सेवा एक न जानसि अवरे ॥
परपंच बिआधि तिआगै कवरे ॥
भाइ मिलै सचु साचै सचु रे ॥१॥
ऐसा राम भगतु जनु होई ॥
हरि गुण गाइ मिलै मलु धोई ॥१॥ रहाउ ॥
ऊंधो कवलु सगल संसारै ॥
दुरमति अगनि जगत परजारै ॥
सो उबरै गुर सबदु बीचारै ॥२॥
भ्रिंग पतंगु कुंचरु अरु मीना ॥
मिरगु मरै सहि अपुना कीना ॥
त्रिसना राचि ततु नही बीना ॥३॥
कामु चितै कामणि हितकारी ॥
क्रोधु बिनासै सगल विकारी ॥
पति मति खोवहि नामु विसारी ॥४॥
सेवा एक न जानसि अवरे ॥
परपंच बिआधि तिआगै कवरे ॥
भाइ मिलै सचु साचै सचु रे ॥१॥
ऐसा राम भगतु जनु होई ॥
हरि गुण गाइ मिलै मलु धोई ॥१॥ रहाउ ॥
ऊंधो कवलु सगल संसारै ॥
दुरमति अगनि जगत परजारै ॥
सो उबरै गुर सबदु बीचारै ॥२॥
भ्रिंग पतंगु कुंचरु अरु मीना ॥
मिरगु मरै सहि अपुना कीना ॥
त्रिसना राचि ततु नही बीना ॥३॥
कामु चितै कामणि हितकारी ॥
क्रोधु बिनासै सगल विकारी ॥
पति मति खोवहि नामु विसारी ॥४॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला १ ॥ हे भाई ! परमात्मा का भगत एक परमात्मा की सेवा (भगती) करता है~ किसी और को वह (परमात्मा के बराबर का) नहीं समझता। संसार के रोग (पैदा करने वाले भोगों) को वह कड़वा जान के त्याग देता है। (परमात्मा के) प्रेम में जुड़ के वह सदा स्थिर परमात्मा (के चरणों) में मिल जाता है~ वह सदा स्थिर प्रभू का रूप हो जाता है। 1। परमात्मा का भगत परमात्मा का सेवक इस तरह का होता है~ वह परमात्मा के गुण गा के (उसके चरणों में) मिलता है और (अपने मन के विकारों की) मैल धो लेता है। 1। रहाउ। सारे जगत (के जीवों) का हृदय कमल (परमात्मा के सिमरन की ओर से) उल्टा हुआ है। इस बुरी कोझी मति की आग संसार (के जीवों के आत्मिक जीवन) को अच्छी तरह जला रही है। (इस आग में से) वही मनुष्य बचता है जो गुरू के शबद को विचारता है। 2। भंवरा~ पतंगा~ हाथी~ मछली और हिरन – हरेक अपना अपना किया पा के मर जाते हैं। (इसी तरह दुरमति का मारा मनुष्य) तृष्णा में फंस के अपने असल (परमात्मा) को नहीं देखता (और आत्मिक मौत मरता है)। 3। (दुरमति के अधीन हो के) स्त्री का प्रेमी मनुष्य सदा काम वासना ही चितवता है। (फिर) क्रोध सारे विकारियों (के आत्मिक जीवन) को तबाह करता है। ऐसे मनुष्य प्रभू का नाम भुला के अपनी इज्जत और अक्ल गवा लेते हैं। 4।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 225 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Greater Kailash के बाज़ार में सर्दियों की धूप, और कोई पुराना दोस्त मिल जाए।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 56 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 225” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 226 →, पीछे का: ← अंग 224।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।