अंग 233

अंग
233
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਬਦਿ ਮਨੁ ਰੰਗਿਆ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਸਿਆ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਰਜਾਇ ॥੧॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿਐ ਜਾਇ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਗੋਵਿਦੁ ਪਾਈਐ ਗੁਣੀ ਨਿਧਾਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨੁ ਬੈਰਾਗੀ ਜਾ ਸਬਦਿ ਭਉ ਖਾਇ ॥
ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਨਿਰਮਲਾ ਸਭ ਤੈ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਇ ॥੨॥
ਹਰਿ ਦਾਸਨ ਕੋ ਦਾਸੁ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਮੇਰਾ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਇਨ ਬਿਧਿ ਪਾਇਆ ਜਾਏ ॥
ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਰਾਮ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥੩॥
ਧ੍ਰਿਗੁ ਬਹੁ ਜੀਵਣੁ ਜਿਤੁ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਨ ਲਗੈ ਪਿਆਰੁ ॥
ਧ੍ਰਿਗੁ ਸੇਜ ਸੁਖਾਲੀ ਕਾਮਣਿ ਮੋਹ ਗੁਬਾਰੁ ॥
ਤਿਨ ਸਫਲੁ ਜਨਮੁ ਜਿਨ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੁ ॥੪॥
ਧ੍ਰਿਗੁ ਧ੍ਰਿਗੁ ਗ੍ਰਿਹੁ ਕੁਟੰਬੁ ਜਿਤੁ ਹਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਹੋਇ ॥
ਸੋਈ ਹਮਾਰਾ ਮੀਤੁ ਜੋ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਸੋਇ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਮੈ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥੫॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਹਮ ਗਤਿ ਪਤਿ ਪਾਈ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਦੂਖੁ ਸਗਲ ਮਿਟਾਈ ॥
ਸਦਾ ਅਨੰਦੁ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥੬॥
ਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਹਮ ਕਉ ਸਰੀਰ ਸੁਧਿ ਭਈ ॥
ਹਉਮੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਸਭ ਅਗਨਿ ਬੁਝਈ ॥
ਬਿਨਸੇ ਕ੍ਰੋਧ ਖਿਮਾ ਗਹਿ ਲਈ ॥੭॥
ਹਰਿ ਆਪੇ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਨਾਮੁ ਦੇਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਤਨੁ ਕੋ ਵਿਰਲਾ ਲੇਵੈ ॥
ਨਾਨਕੁ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਹਰਿ ਅਲਖ ਅਭੇਵੈ ॥੮॥੮॥
सबदि मनु रंगिआ लिव लाइ ॥
निज घरि वसिआ प्रभ की रजाइ ॥१॥
सतिगुरु सेविऐ जाइ अभिमानु ॥
गोविदु पाईऐ गुणी निधानु ॥१॥ रहाउ ॥
मनु बैरागी जा सबदि भउ खाइ ॥
मेरा प्रभु निरमला सभ तै रहिआ समाइ ॥
गुर किरपा ते मिलै मिलाइ ॥२॥
हरि दासन को दासु सुखु पाए ॥
मेरा हरि प्रभु इन बिधि पाइआ जाए ॥
हरि किरपा ते राम गुण गाए ॥३॥
ध्रिगु बहु जीवणु जितु हरि नामि न लगै पिआरु ॥
ध्रिगु सेज सुखाली कामणि मोह गुबारु ॥
तिन सफलु जनमु जिन नामु अधारु ॥४॥
ध्रिगु ध्रिगु ग्रिहु कुटंबु जितु हरि प्रीति न होइ ॥
सोई हमारा मीतु जो हरि गुण गावै सोइ ॥
हरि नाम बिना मै अवरु न कोइ ॥५॥
सतिगुर ते हम गति पति पाई ॥
हरि नामु धिआइआ दूखु सगल मिटाई ॥
सदा अनंदु हरि नामि लिव लाई ॥६॥
गुरि मिलिऐ हम कउ सरीर सुधि भई ॥
हउमै त्रिसना सभ अगनि बुझई ॥
बिनसे क्रोध खिमा गहि लई ॥७॥
हरि आपे क्रिपा करे नामु देवै ॥
गुरमुखि रतनु को विरला लेवै ॥
नानकु गुण गावै हरि अलख अभेवै ॥८॥८॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जिस मनुष्य ने गुरू के शबद द्वारा (प्रभू के चरणों में) सुरति जोड़ के (अपने) मन को (प्रभू के प्रेम रंग में) रंग लिया है~ (गृहस्थ त्याग के कहीं बाहर जाने की आवश्यक्ता नहीं पड़ी)। वह मनुष्य प्रभू-चरणों में टिका रहता है~ वह मनुष्य प्रभू-रजा में राजी रहता है। 1। (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ने से (मन में से) अहंकार दूर हो जाता है और गुणों का खजाना परमात्मा मिल जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) जब (कोई मनुष्य इस) डर को (कि परमात्मा हरेक के अंदर बस रहा है और हरेक के दिल की जानता है~ अपनी आत्मा की) खुराक बनाता है~ (उस का) मन माया के मोह से उपराम हो जाता है~ उसे पवित्र स्वरूप प्यारा प्रभू हर जगह व्यापक दिखाई देता है। वह मनुष्य गुरू की कृपा से (गुरू का) मिलाया हुआ (परमात्मा को) मिल जाता है। 2। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा के सेवकों का सेवक बन जाता है~ वह आत्मिक आनंद पाता है। (हे भाई !) इस तरीके से (ही) प्यारे परमात्मा का मेल प्राप्त होता है। वह मनुष्य परमात्मा की मेहर से परमात्मा के गुण गाता रहता है। 3। (हे भाई ! प्राणयाम आदि द्वारा बढ़ाई गयी) लम्बी उम्र (बल्कि) धिक्कारयोग्य है~ अगर उससे परमात्मा के नाम में (उस लंबी उम्र वाले का) प्यार नहीं बनता। (दूसरी तरफ~ हे भाई ! सुंदर) स्त्री की सुखदाई सेज (भी) धिक्कारयोग्य है (अगर वह) मोह का गुबार (घोर अंधेरा) (पैदा करती) है। (हे भाई ! सिर्फ) उन मनुष्यों का जन्म ही कामयाब है~ जिन्होंने परमात्मा के नाम को (अपनी जिंदगी का) आसरा बनाया है। 4। (हे भाई !) वह गृहरथ जीवन धिक्कारयोग्य है~ वह परिवार (वाला जीवन) धिक्कार योग्य है~ जिससे परमात्मा की प्रीति नहीं बनती। (हे भाई !) हमारा तो मित्र वही मनुष्य है~ जो उस परमात्मा के गुण गाता है (और हमें भी सिफत सालाह के लिए प्रेरित करता है)। (हे भाई !) परमात्मा के नाम के बगैर मुझे और कोई (सदा साथ निभने वाला साथी) नहीं दिखता। 5। (हे भाई !) गुरू से हम उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त कर सकते हैं (जिसकी बरकति से हर जगह) इज्जत मिलती है। (गुरू की शरण में आ के जिसने) परमात्मा का नाम सिमरा है~ उसने अपना हरेक किस्म का दुख दूर कर लिया है~ वह मनुष्य परमात्मा के नाम में सुरति जोड़ के सदा आनंद पाता है। 6। (हे भाई !) अगर गुरू मिल जाए तो हम अपने शरीर को विकारों से बचा के रखने की समझ भी हासिल कर लेते हैं। (जो मनुष्य गुरू की शरण में आता है उसके अंदर से) अहम् व तृष्णा की सारी आग बुझ जाती है~ (उसके अंदर से) क्रोध खत्म हो जाता है~ वह सदैव क्षमा धारण किए रखता है। 7। (पर~ हे भाई !) परमात्मा स्वयं ही कृपा करता है~ और अपना नाम बख्शता है~ कोई विरला (भाग्यशाली) मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर ये नाम-रत्न पल्ले बाँधता है। नानक (तो गुरू की कृपा से ही) उस अलख व अभेव परमात्मा के गुण सदा गाता है। 8। 8।
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਬੈਰਾਗਣਿ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਜੋ ਮੁਹ ਫੇਰੇ ਤੇ ਵੇਮੁਖ ਬੁਰੇ ਦਿਸੰਨਿ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਬਧੇ ਮਾਰੀਅਨਿ ਫਿਰਿ ਵੇਲਾ ਨਾ ਲਹੰਨਿ ॥੧॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਾਖਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਧਾਰਿ ॥
ਸਤਸੰਗਤਿ ਮੇਲਾਇ ਪ੍ਰਭ ਹਰਿ ਹਿਰਦੈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਸਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੇ ਭਗਤ ਹਰਿ ਭਾਵਦੇ ਜੋ ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਾਇ ਚਲੰਨਿ ॥
ਆਪੁ ਛੋਡਿ ਸੇਵਾ ਕਰਨਿ ਜੀਵਤ ਮੁਏ ਰਹੰਨਿ ॥੨॥
ਜਿਸ ਦਾ ਪਿੰਡੁ ਪਰਾਣ ਹੈ ਤਿਸ ਕੀ ਸਿਰਿ ਕਾਰ ॥
ਓਹੁ ਕਿਉ ਮਨਹੁ ਵਿਸਾਰੀਐ ਹਰਿ ਰਖੀਐ ਹਿਰਦੈ ਧਾਰਿ ॥੩॥
ਨਾਮਿ ਮਿਲਿਐ ਪਤਿ ਪਾਈਐ ਨਾਮਿ ਮੰਨਿਐ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਨਾਮੁ ਪਾਈਐ ਕਰਮਿ ਮਿਲੈ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥੪॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਜੋ ਮੁਹੁ ਫੇਰੇ ਓਇ ਭ੍ਰਮਦੇ ਨਾ ਟਿਕੰਨਿ ॥
ਧਰਤਿ ਅਸਮਾਨੁ ਨ ਝਲਈ ਵਿਚਿ ਵਿਸਟਾ ਪਏ ਪਚੰਨਿ ॥੫॥
ਇਹੁ ਜਗੁ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇਆ ਮੋਹ ਠਗਉਲੀ ਪਾਇ ॥
ਜਿਨਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟਿਆ ਤਿਨ ਨੇੜਿ ਨ ਭਿਟੈ ਮਾਇ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਨਿ ਸੋ ਸੋਹਣੇ ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਗਵਾਇ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु गउड़ी बैरागणि महला ३ ॥
सतिगुर ते जो मुह फेरे ते वेमुख बुरे दिसंनि ॥
अनदिनु बधे मारीअनि फिरि वेला ना लहंनि ॥१॥
हरि हरि राखहु क्रिपा धारि ॥
सतसंगति मेलाइ प्रभ हरि हिरदै हरि गुण सारि ॥१॥ रहाउ ॥
से भगत हरि भावदे जो गुरमुखि भाइ चलंनि ॥
आपु छोडि सेवा करनि जीवत मुए रहंनि ॥२॥
जिस दा पिंडु पराण है तिस की सिरि कार ॥
ओहु किउ मनहु विसारीऐ हरि रखीऐ हिरदै धारि ॥३॥
नामि मिलिऐ पति पाईऐ नामि मंनिऐ सुखु होइ ॥
सतिगुर ते नामु पाईऐ करमि मिलै प्रभु सोइ ॥४॥
सतिगुर ते जो मुहु फेरे ओइ भ्रमदे ना टिकंनि ॥
धरति असमानु न झलई विचि विसटा पए पचंनि ॥५॥
इहु जगु भरमि भुलाइआ मोह ठगउली पाइ ॥
जिना सतिगुरु भेटिआ तिन नेड़ि न भिटै माइ ॥६॥
सतिगुरु सेवनि सो सोहणे हउमै मैलु गवाइ ॥

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु गउड़ी बैरागणि महला ३ ॥ (हे भाई !) जो मनुष्य गुरू से मुंह फेरे रखते हैं~ गुरू की ओर से बे-मुख हुए वो मनुष्य (देखने को ही भले) बुरे दिखते हैं। (माया के मोह के बंधनों में) बंधे हुए वह मनुष्य हर समय मोह की चोटें खाते रहते हैं~ (इन चोटों से बचने के लिए) उन्हें दुबारा समय हाथ नहीं लगेगा~ (अर्थात~ मार भी खाते रहते हैं~ फिर भी ये मोह इतना प्यारा लगता है कि इसमें से निकलने को जीअ नहीं करता)। 1। हे हरी ! हे हरी !मेहर कर~ (मुझे माया के पँजे से) बचा के रख। हे हरी ! हे प्रभू ! मुझे साध-संगत में मिला के रख~ ता कि मैं तेरे गुण अपने हृदय में संभाल के रखूँ। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा को वह भक्त प्यारे लगते हैं~ जो गुरू की शरण पड़ कर गुरू के दर्शाए मुताबिक जीवन व्यातीत करते हैं~ जो (गुरू के हुकम अनुसार) स्वैभाव (स्वार्थ) छोड़ के सेवा भक्ति करते हैं और दुनिया के कार्य-व्यवहार करते हुए भी माया के मोह की ओर से अछोह रहते हैं। 2। (हे भाई !) जिस परमात्मा का दिया हुआ ये शरीर है~ जिस परमात्मा की दी हुई ये जिंद है~ उसी का हुकम (ही) हरेक के शरीर पर चल रहा है। उसे किसी भी हालत में अपने मन से भुलाना नहीं चाहिए। उस परमात्मा को अपने हृदय में बसा के रखना चाहिए। 3। (हे भाई !) अगर परमात्मा का नाम मिल जाए तो (हर जगह) इज्जत मिलती है~ अगर परमात्मा के नाम से मन लग जाए तो आत्मिक आनंद हासिल होता है~ (पर~ हे भाई !) गुरू से ही परमात्मा का नाम मिलता है~ अपनी मेहर से ही वह परमात्मा मिलता है। 4। (हे भाई !) जो मनुष्य गुरू की ओर से मुंह मोड़े रखते हैं~ वो मनुष्य (माया के मोह में सदैव) भटकते फिरते हैं~ उन्हें कभी आत्मिक शांति नहीं मिलती। उन्हें ना धरती ना ही आसमान झेल सकता है (सारी सृष्टि में कोई अन्य जीव उन्हें आत्मिक सहारा नहीं दे सकता) वे माया के मोह की गंदगी में पड़े हुए ही आत्मिक जीवन जलाते रहते हैं। 5। (हे भाई !माया ने) इस जगत को (अपने मोह की) भटकना में (डाल के) मोह की ठगबूटी खिला के गलत जीवन राह पर डाला हुआ है। (पर~ हे भाई !) जिन्हें सतिगुरू मिल जाता है~ ये माया उनके नजदीक भी नहीं फटकती (उन पर अपने मोह का जादू नहीं चला सकती)। 6। (हे भाई !) जो मनुष्य सतिगुरू की शरण पड़ते हैं वह (अपने अंदर से) अहंकार की मैल दूर करके स्वच्छ जीवन वाले बन जाते हैं।

संदर्भ: यह अंग 233 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Diwali की पहली रात, अकेले बालकनी में पटाख़ों के बीच एक specific shift।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 233” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 234 →, पीछे का: ← अंग 232

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।