Background
मुण्डक उपनिषद् अथर्ववेद से ली गई है। नाम ‘मुण्डक’ एक प्रतीकात्मक है, मुंडन-संस्कार से। साधक यह उपनिषद् पढ़कर अपने अंदर के सब भ्रमों को मुंडवा देता है।
यह उपनिषद् अपनी काव्यात्मक भाषा के लिए जानी जाती है। यहाँ बहुत से famous श्लोक हैं, जिनमें से एक है ‘सत्यमेव जयते’ (3.1.6), जो भारत का राष्ट्रीय motto है।
तीन मुण्डक हैं, हर एक में दो खण्ड:
मुण्डक 1: ब्रह्म-विद्या का परिचय। दो ज्ञान, परा और अपरा। मुण्डक 2: ब्रह्म ही सब कुछ है, उसी से सब निकला। मुण्डक 3: ‘दो पक्षी’ का रूपक, और साधना का रास्ता।
कथा-सार (Story in Brief)
एक राजा-ऋषि शौनक एक बड़े ऋषि अंगिरस के पास आता है और एक सीधा सवाल पूछता है, ‘किस को जानने से सब जाना जा सकता है?’ अंगिरस का जवाब बड़ा elegant है, ‘दो विद्या जानने वाली हैं। एक अपरा (lower), जिसमें सब चार वेद, उनके अंग, और बाक़ी शास्त्र हैं। दूसरी परा (higher), जिससे वो अक्षर ब्रह्म जाना जाता है।’
फिर अंगिरस यज्ञ-कर्म पर एक scathing कथन देते हैं, ‘ये यज्ञ-नौकाएँ कमज़ोर हैं। जो लोग इन्हें ही असली समझकर पकड़ते हैं, वो बार-बार जन्म-मरण में फँसते हैं।’ यह कुछ unexpected है, क्योंकि वेद यज्ञ की बात भी करते हैं। मगर मुण्डक कह रही है, यज्ञ-कर्म तब तक ठीक है जब तक तुम उसे final मंज़िल नहीं समझो।
दूसरे मुण्डक में ब्रह्म का वर्णन: सब का स्रोत, सब के अंदर, और सब के बाहर। ‘जैसे आग की लौ से चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही ब्रह्म से सब जीव।’
तीसरे मुण्डक का सबसे famous रूपक: दो पक्षी एक ही पेड़ पर बैठे हैं। एक खा रहा है, दूसरा बस देख रहा है। पहला जीवात्मा, दूसरा परमात्मा। जब जीवात्मा देखने वाले को पहचान लेता है, उसकी सारी चिंता मिट जाती है।
अंत में: ‘सत्य ही जीतता है, झूठ नहीं।’ और एक सिद्धान्त, कि आत्मा वाणी से, बुद्धि से, बहुत श्रुति से नहीं मिलती, वो उसी को मिलती है जिसे वो ख़ुद चुनती है।
Introduction
अगर कभी आपने सोचा हो, ‘मैं तो इतनी किताबें पढ़ चुका, इतने lectures सुन चुका, फिर भी कुछ बात missing लगती है,’ तो आप मुण्डक के main message को समझ जाएँगे।
उपनिषद् कह रही है कि किताबी ज्ञान एक ज़रूरी step है, मगर final नहीं। final चीज़ कुछ और है: एक भीतरी realization, जो किताबें नहीं देतीं। यह उपनिषद् उसी towards push करती है।
मुण्डक 1.1
मन्त्र 1.1.1
स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥
मन्त्र 1.1.2
स भारद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥
शिक्षा-परंपरा: ब्रह्मा से अथर्वा, अथर्वा से अंगिर, अंगिर से भारद्वाज, भारद्वाज से अंगिरस। यह ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ है, और यह बताती है कि कोई self-taught नहीं हो सकता इस विद्या में।
मन्त्र 1.1.3
कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥
शौनक एक ‘महाशाल’ (बड़ा घर वाला) है, यानी रईस। मगर वो विधि-पूर्वक (formally) अंगिरस के पास आते हैं। यह respect है।
उनका सवाल बड़ा है: ‘क्या कोई एक चीज़ है जिसको जानकर सब जाना जा सकता है?’ यह वो question है जो हर thinker पूछता है, ‘unified theory of everything।’
मन्त्र 1.1.4
द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति
परा चैवापरा च ॥
अंगिरस का जवाब साफ़: ‘दो विद्याएँ हैं। परा और अपरा।’ यानी एक final answer, मगर पहले हमें दो प्रकार जानने चाहिए।
मन्त्र 1.1.5
शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति ।
अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥
अपरा-विद्या की list:
चार वेद: ऋग, यजुष, साम, अथर्व। और छह वेदाङ्ग: शिक्षा (phonetics), कल्प (ritual), व्याकरण (grammar), निरुक्त (etymology), छन्द (meter), ज्योतिष (astronomy).
यह सब अपरा है? Yes। यह सब book-knowledge है। ज़रूरी, मगर final नहीं।
‘परा वो है, जिससे अक्षर-ब्रह्म जाना जाता है।’ और अक्षर-ब्रह्म क्या है, यह अगले श्लोक में।
मन्त्र 1.1.6
अचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् ।
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं
तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥
अक्षर-ब्रह्म का वर्णन: अदृश्य, अग्राह्य, बिना गोत्र-वर्ण, बिना इन्द्रियों के, नित्य, व्यापक, सर्व-गत, सूक्ष्म, अव्यय, सब का योनि।
यह सब ‘negative descriptions’ हैं। नेति-नेति। क्योंकि positive description object बना देगी। अब यह ‘धीर’ लोगों को दिखता है।
मन्त्र 1.1.7
यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति ।
यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि
तथाऽक्षरात्सम्भवतीह विश्वम् ॥
अब तीन analogies। मकड़ी से उसका जाल आता है, पृथ्वी से ओषधि उगती हैं, पुरुष के सिर से बाल। ये सब अपने substrate से अलग नहीं, मगर साथ ही expressions हैं।
वैसे ही ब्रह्म से यह सारा संसार। यह ‘सत्कार्यवाद’ का foundation है, कि कारण और कार्य fundamentally अलग नहीं।
मन्त्र 1.1.8
अन्नात् प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥
तप से ब्रह्म पुष्ट होता है। फिर अन्न, फिर प्राण, मन, सत्य, लोक, और कर्मों में अमृत।
एक hierarchy है: ब्रह्म → तप → अन्न → प्राण-मन → सत्य-लोक → कर्म। और यह सब उसी सर्वज्ञ से।
मन्त्र 1.1.9
तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥
तप से ब्रह्म पुष्ट होता है। फिर अन्न, फिर प्राण, मन, सत्य, लोक, और कर्मों में अमृत।
एक hierarchy है: ब्रह्म → तप → अन्न → प्राण-मन → सत्य-लोक → कर्म। और यह सब उसी सर्वज्ञ से।
मुण्डक 1.2
मन्त्र 1.2.1
तानि त्रेतायां बहुधा सन्ततानि ।
तान्याचरथ नियतं सत्यकामा
एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥
दूसरा खण्ड शुरू। एक यज्ञ-शास्त्र की कथा।
‘जो कर्म कवियों ने मन्त्रों में देखे, वो तीन वेदों में फैले हैं। सत्य-कामी इन्हें नियम से करते रहो, यही पुण्य-लोक का रास्ता है।’
अभी तो यज्ञ की praise हो रही है। मगर अगले मन्त्रों में twist आएगा।
मन्त्र 1.2.2
तदाज्यभागावन्तरेणाहुतीः प्रतिपादयेच्छ्रद्धया हुतम् ॥
यज्ञ की technical details। आहुति कब-कैसे डालनी है। और एक warning: जो अग्निहोत्र दर्श-पौर्णमास के बिना है, atithi-satkar के बिना है, उसका असर ख़राब है।
मन्त्र 1.2.3
अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुतमासप्तमांस्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥
यज्ञ की technical details। आहुति कब-कैसे डालनी है। और एक warning: जो अग्निहोत्र दर्श-पौर्णमास के बिना है, atithi-satkar के बिना है, उसका असर ख़राब है।
मन्त्र 1.2.4
स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥
अग्नि की सात जिह्वाएँ का famous वर्णन। हर एक का नाम: काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्र-वर्णा, स्फुलिङ्गिनी, और विश्व-रुचि। ‘हिलती हुई देवियाँ।’
‘जो इन चमकती हुई जिह्वाओं में समय से आहुति डालते हुए चलता है, उसे ये सूर्य-रश्मियाँ देवों के स्वामी के घर ले जाती हैं।’ यानी यज्ञ-कर्म का maximum benefit।
मन्त्र 1.2.5
तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥
अग्नि की सात जिह्वाएँ का famous वर्णन। हर एक का नाम: काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्र-वर्णा, स्फुलिङ्गिनी, और विश्व-रुचि। ‘हिलती हुई देवियाँ।’
‘जो इन चमकती हुई जिह्वाओं में समय से आहुति डालते हुए चलता है, उसे ये सूर्य-रश्मियाँ देवों के स्वामी के घर ले जाती हैं।’ यानी यज्ञ-कर्म का maximum benefit।
मन्त्र 1.2.6
प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥
अग्नि की सात जिह्वाएँ का famous वर्णन। हर एक का नाम: काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्र-वर्णा, स्फुलिङ्गिनी, और विश्व-रुचि। ‘हिलती हुई देवियाँ।’
‘जो इन चमकती हुई जिह्वाओं में समय से आहुति डालते हुए चलता है, उसे ये सूर्य-रश्मियाँ देवों के स्वामी के घर ले जाती हैं।’ यानी यज्ञ-कर्म का maximum benefit।
मन्त्र 1.2.7
एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति ॥
अब twist आता है। ‘मगर ये यज्ञ-नौकाएँ कमज़ोर हैं।’ Wait, अभी तो praise हो रहा था!
‘जो मूर्ख इन्हीं को श्रेय समझकर खुश हो जाते हैं, वो जरा-मृत्यु में फिर लौटते हैं।’
उपनिषद् कह रही है, यज्ञ ठीक है, मगर final नहीं। अगर तुम सोचो ‘यह कर लिया तो काम पूरा,’ तो तुम चूक गए।
मन्त्र 1.2.8
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥
तीनों मन्त्र मिलकर एक critique। ‘अविद्या में फँसे हुए लोग खुद को धीर-पंडित मान बैठते हैं।’ ‘बच्चे (अनुभव-हीन) सोचते हैं हमने काम कर लिया, मगर वो असली बात तक पहुँचे ही नहीं।’
‘जो इष्ट-पूर्त को ही सबसे बड़ा मानते हैं, वो स्वर्ग में पुण्य भोगकर वापस आते हैं।’ कोई permanent solution नहीं।
मन्त्र 1.2.9
यत् कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात् तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥
तीनों मन्त्र मिलकर एक critique। ‘अविद्या में फँसे हुए लोग खुद को धीर-पंडित मान बैठते हैं।’ ‘बच्चे (अनुभव-हीन) सोचते हैं हमने काम कर लिया, मगर वो असली बात तक पहुँचे ही नहीं।’
‘जो इष्ट-पूर्त को ही सबसे बड़ा मानते हैं, वो स्वर्ग में पुण्य भोगकर वापस आते हैं।’ कोई permanent solution नहीं।
मन्त्र 1.2.10
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥
तीनों मन्त्र मिलकर एक critique। ‘अविद्या में फँसे हुए लोग खुद को धीर-पंडित मान बैठते हैं।’ ‘बच्चे (अनुभव-हीन) सोचते हैं हमने काम कर लिया, मगर वो असली बात तक पहुँचे ही नहीं।’
‘जो इष्ट-पूर्त को ही सबसे बड़ा मानते हैं, वो स्वर्ग में पुण्य भोगकर वापस आते हैं।’ कोई permanent solution नहीं।
मन्त्र 1.2.11
सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥
तो रास्ता क्या है? ‘जो अरण्य में तप-श्रद्धा से रहते हैं, शान्त, विद्वान्, भिक्षा-चर्या करते हैं, वो सूर्य-द्वार से जाते हैं, जहाँ अमर पुरुष है।’
यानी अंदर मुड़ो। ऋषि-जीवन में जाओ। बाहरी कर्म तुम्हें सिर्फ़ swivel कर सकते हैं।
मन्त्र 1.2.12
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥
आख़िरी दो मन्त्र practical advice के साथ। ‘कर्म से बने लोक देखकर, ब्राह्मण को निर्वेद आ जाए कि किया हुआ अपने आप ब्रह्म नहीं देता।’ तब क्या करें?
‘समिधा हाथ में लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्म-निष्ठ गुरु के पास जाए।’ यानी एक qualified गुरु ढूँढो।
‘गुरु प्रशान्त-चित्त शिष्य को ब्रह्म-विद्या तत्त्वतः बताते हैं।’ यह transmission है, lecture नहीं।
मन्त्र 1.2.13
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥
आख़िरी दो मन्त्र practical advice के साथ। ‘कर्म से बने लोक देखकर, ब्राह्मण को निर्वेद आ जाए कि किया हुआ अपने आप ब्रह्म नहीं देता।’ तब क्या करें?
‘समिधा हाथ में लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्म-निष्ठ गुरु के पास जाए।’ यानी एक qualified गुरु ढूँढो।
‘गुरु प्रशान्त-चित्त शिष्य को ब्रह्म-विद्या तत्त्वतः बताते हैं।’ यह transmission है, lecture नहीं।
मुण्डक 2.1
मन्त्र 2.1.1
यथा सुदीप्तात् पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।
तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति ॥
दूसरा मुण्डक शुरू। ‘यह सत्य है। जैसे आग से चिनगारियाँ निकलती हैं, सब उसी रूप की, वैसे ही अक्षर से सब जीव।’
यह metaphor बहुत powerful है। चिनगारियाँ आग का हिस्सा हैं, मगर आग नहीं। फिर भी आग में लौट जाती हैं, identity गँवाकर।
मन्त्र 2.1.2
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रोऽक्षरात् परतः परः ॥
(मन्त्र 2.1.2 से 2.1.5:) पुरुष का वर्णन। दिव्य, अमूर्त, अंदर-बाहर, अजन्मा, प्राण-रहित, मन-रहित, शुभ्र, अक्षर से भी ऊपर।
‘उसी से प्राण, मन, इन्द्रियाँ, पाँच-महाभूत।’ सब एक ही source से।
‘अग्नि उसका सिर, चन्द्र-सूर्य आँखें, दिशाएँ कान, वेद वाणी, वायु प्राण, हृदय विश्व, और पाँव से पृथ्वी।’ यह ‘विराट पुरुष’ का famous रूपक है, ऋग्वेद के पुरुष-सूक्त से जुड़ा।
मन्त्र 2.1.3
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥
(मन्त्र 2.1.2 से 2.1.5:) पुरुष का वर्णन। दिव्य, अमूर्त, अंदर-बाहर, अजन्मा, प्राण-रहित, मन-रहित, शुभ्र, अक्षर से भी ऊपर।
‘उसी से प्राण, मन, इन्द्रियाँ, पाँच-महाभूत।’ सब एक ही source से।
‘अग्नि उसका सिर, चन्द्र-सूर्य आँखें, दिशाएँ कान, वेद वाणी, वायु प्राण, हृदय विश्व, और पाँव से पृथ्वी।’ यह ‘विराट पुरुष’ का famous रूपक है, ऋग्वेद के पुरुष-सूक्त से जुड़ा।
मन्त्र 2.1.4
वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥
(मन्त्र 2.1.2 से 2.1.5:) पुरुष का वर्णन। दिव्य, अमूर्त, अंदर-बाहर, अजन्मा, प्राण-रहित, मन-रहित, शुभ्र, अक्षर से भी ऊपर।
‘उसी से प्राण, मन, इन्द्रियाँ, पाँच-महाभूत।’ सब एक ही source से।
‘अग्नि उसका सिर, चन्द्र-सूर्य आँखें, दिशाएँ कान, वेद वाणी, वायु प्राण, हृदय विश्व, और पाँव से पृथ्वी।’ यह ‘विराट पुरुष’ का famous रूपक है, ऋग्वेद के पुरुष-सूक्त से जुड़ा।
मन्त्र 2.1.5
पुमान् रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात् सम्प्रसूताः ॥
(मन्त्र 2.1.2 से 2.1.5:) पुरुष का वर्णन। दिव्य, अमूर्त, अंदर-बाहर, अजन्मा, प्राण-रहित, मन-रहित, शुभ्र, अक्षर से भी ऊपर।
‘उसी से प्राण, मन, इन्द्रियाँ, पाँच-महाभूत।’ सब एक ही source से।
‘अग्नि उसका सिर, चन्द्र-सूर्य आँखें, दिशाएँ कान, वेद वाणी, वायु प्राण, हृदय विश्व, और पाँव से पृथ्वी।’ यह ‘विराट पुरुष’ का famous रूपक है, ऋग्वेद के पुरुष-सूक्त से जुड़ा।
मन्त्र 2.1.6
संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥
उसी से सब वेद-वाणी, यज्ञ-कर्म, और सब सृष्टि निकलती है। यह comprehensive है। हर category cover।
‘सात प्राण उससे उत्पन्न।’ सात यानी सिर के सात openings।
‘अतः समुद्र-पहाड़, नदियाँ, ओषधि, रस।’ पूरी physical दुनिया।
मन्त्र 2.1.7
प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च ॥
उसी से सब वेद-वाणी, यज्ञ-कर्म, और सब सृष्टि निकलती है। यह comprehensive है। हर category cover।
‘सात प्राण उससे उत्पन्न।’ सात यानी सिर के सात openings।
‘अतः समुद्र-पहाड़, नदियाँ, ओषधि, रस।’ पूरी physical दुनिया।
मन्त्र 2.1.8
सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥
उसी से सब वेद-वाणी, यज्ञ-कर्म, और सब सृष्टि निकलती है। यह comprehensive है। हर category cover।
‘सात प्राण उससे उत्पन्न।’ सात यानी सिर के सात openings।
‘अतः समुद्र-पहाड़, नदियाँ, ओषधि, रस।’ पूरी physical दुनिया।
मन्त्र 2.1.9
अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥
उसी से सब वेद-वाणी, यज्ञ-कर्म, और सब सृष्टि निकलती है। यह comprehensive है। हर category cover।
‘सात प्राण उससे उत्पन्न।’ सात यानी सिर के सात openings।
‘अतः समुद्र-पहाड़, नदियाँ, ओषधि, रस।’ पूरी physical दुनिया।
मन्त्र 2.1.10
एतद्यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य ॥
‘पुरुष ही यह विश्व, कर्म, तप, ब्रह्म, परम-अमृत है।’
एक identification। पुरुष = सब कुछ। और जो इसे हृदय-गुहा में जानता है, उसकी ‘अविद्या-ग्रन्थि’ खुल जाती है। यह practical effect है।
मुण्डक 2.2
मन्त्र 2.2.1
एजत् प्राणन्निमिषच्च यदेतद् जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम् ॥
‘जो प्रकट है, और गुहा में चलने वाला, सब का महान् पद, यहाँ समर्पित।’ ब्रह्म दोनों है, बाहर और अंदर।
‘जो दीप्त, अणु से भी अणु, जिसमें लोक टिके हैं, वो अक्षर ब्रह्म, वो प्राण, वो वाणी-मन, वो सत्य-अमृत।’ सब एक ही चीज़।
मन्त्र 2.2.2
तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्य विद्धि ॥
‘जो प्रकट है, और गुहा में चलने वाला, सब का महान् पद, यहाँ समर्पित।’ ब्रह्म दोनों है, बाहर और अंदर।
‘जो दीप्त, अणु से भी अणु, जिसमें लोक टिके हैं, वो अक्षर ब्रह्म, वो प्राण, वो वाणी-मन, वो सत्य-अमृत।’ सब एक ही चीज़।
मन्त्र 2.2.3
शरं ह्युपासानिशितं सन्धयीत ।
आयम्य तद्भावगतेन चेतसा
लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥
एक beautiful image: ब्रह्म-साधना धनुर्विद्या जैसी है।
‘धनुष: उपनिषद्। बाण: तेज़ किया हुआ साधक का चित्त। लक्ष्य: अक्षर ब्रह्म।’
‘प्रणव (ओम्) धनुष, आत्मा बाण, ब्रह्म लक्ष्य।’ और बाण को मारकर लक्ष्य में मिल जाना है। ‘शरवत् तन्मयो भवेत्।’ यह एक beautiful symbol।
मन्त्र 2.2.4
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥
एक beautiful image: ब्रह्म-साधना धनुर्विद्या जैसी है।
‘धनुष: उपनिषद्। बाण: तेज़ किया हुआ साधक का चित्त। लक्ष्य: अक्षर ब्रह्म।’
‘प्रणव (ओम्) धनुष, आत्मा बाण, ब्रह्म लक्ष्य।’ और बाण को मारकर लक्ष्य में मिल जाना है। ‘शरवत् तन्मयो भवेत्।’ यह एक beautiful symbol।
मन्त्र 2.2.5
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥
‘जिसमें द्यौ, पृथिवी, अंतरिक्ष, मन सहित सब इन्द्रियाँ फैली हैं, उसी एक को आत्मा जानो।’
‘अन्या वाचो विमुञ्चथ’ = ‘बाक़ी वाणियों को छोड़ दो।’ यानी और कुछ सीखने की ज़रूरत नहीं अब। यह एक ब्रह्म-विद्या ही काफ़ी है।
‘अमृतस्य एष सेतुः।’ अमरता का यह पुल।
मन्त्र 2.2.6
ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ॥
‘जैसे रथ-नाभि में अरे टिकी हैं, वैसे ही जिसमें नाड़ियाँ टिकी हैं, वो भीतर अनेक रूपों में जन्म लेता हुआ चलता है।’ यह बहुत powerful image है। हर रूप उसी का, जैसे पहिये के सब spokes एक ही center पर।
‘ओम् कहकर आत्मा का ध्यान करो।’ सीधा practical instruction।
मन्त्र 2.2.7
दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः ॥
(अगले चार मन्त्र:) उसकी महिमा भूमि पर है, मगर वो दिव्य ब्रह्म-नगर में आत्म-रूप में टिका है।
‘मन-मय, प्राणों का नेता, अन्न में टिका, हृदय में।’ एक जगह-जगह description, मगर यह सब hint है।
‘हृदय-ग्रन्थि टूट जाती है।’ यह एक practical statement है। जब परा-अवर दिख जाएँ, तब वो inner knot, जो हमें संसार से बाँधती है, खुल जाती है।
मन्त्र 2.2.8
तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति ॥
(अगले चार मन्त्र:) उसकी महिमा भूमि पर है, मगर वो दिव्य ब्रह्म-नगर में आत्म-रूप में टिका है।
‘मन-मय, प्राणों का नेता, अन्न में टिका, हृदय में।’ एक जगह-जगह description, मगर यह सब hint है।
‘हृदय-ग्रन्थि टूट जाती है।’ यह एक practical statement है। जब परा-अवर दिख जाएँ, तब वो inner knot, जो हमें संसार से बाँधती है, खुल जाती है।
मन्त्र 2.2.9
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥
(अगले चार मन्त्र:) उसकी महिमा भूमि पर है, मगर वो दिव्य ब्रह्म-नगर में आत्म-रूप में टिका है।
‘मन-मय, प्राणों का नेता, अन्न में टिका, हृदय में।’ एक जगह-जगह description, मगर यह सब hint है।
‘हृदय-ग्रन्थि टूट जाती है।’ यह एक practical statement है। जब परा-अवर दिख जाएँ, तब वो inner knot, जो हमें संसार से बाँधती है, खुल जाती है।
मन्त्र 2.2.10
तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥
(अगले चार मन्त्र:) उसकी महिमा भूमि पर है, मगर वो दिव्य ब्रह्म-नगर में आत्म-रूप में टिका है।
‘मन-मय, प्राणों का नेता, अन्न में टिका, हृदय में।’ एक जगह-जगह description, मगर यह सब hint है।
‘हृदय-ग्रन्थि टूट जाती है।’ यह एक practical statement है। जब परा-अवर दिख जाएँ, तब वो inner knot, जो हमें संसार से बाँधती है, खुल जाती है।
मन्त्र 2.2.11
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥
‘न तत्र सूर्यो भाति।’ यह कठ 2.2.15 के बराबर है। ब्रह्म खुद ज्योतियों की ज्योति है। सूर्य, चन्द्र, बिजली, अग्नि, सब उससे रोशन।
मुण्डक 3.1
मन्त्र 3.1.1
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥
तीसरा मुण्डक का सबसे famous श्लोक। ‘दो पक्षी, सहचर, मित्र, एक ही पेड़ पर बैठे हैं।’ द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया।
‘एक पीपल का फल मीठा-मीठा खा रहा है। दूसरा बस देख रहा है।’
क्या मतलब? पेड़ = शरीर। पहला पक्षी = जीवात्मा, जो कर्म-फल खा रहा है। दूसरा = परमात्मा, साक्षी।
दोनों एक ही पेड़ पर। दोनों मित्र। मगर एक experiences, दूसरा observes।
मन्त्र 3.1.2
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥
‘उसी पेड़ पर पुरुष डूबा है, अनीशता से दुखी।’ यानी जीवात्मा खुद को powerless मानकर शोक करता है।
‘जब वो देख लेता है दूसरे को, जो ईश है, उसकी महिमा को, तब वीतशोक होता है।’
यह turning point है। जीव जब अपने अंदर के साक्षी को पहचान लेता है, तब suffering ख़त्म।
मन्त्र 3.1.3
तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥
‘जब साधक उस रुक्म-वर्ण (सुनहरे) ईश पुरुष को देखता है, तब वो पुण्य-पाप झाड़कर परम साम्य पाता है।’
परम साम्य = equality with the Self। यानी ख़ुद को उसी रूप में देखना।
मन्त्र 3.1.4
आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥
‘जो प्राण-रूप में सब प्राणियों में चमकता है, उसको जानने वाला विद्वान् बहुत बोलने वाला नहीं होता।’ यानी talk less, knowing speaks for itself.
‘वो आत्म-क्रीडा करता है, आत्म-रति करता है।’ खुद के साथ खुश है।
मन्त्र 3.1.5
अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥
‘यह आत्मा सत्य से मिलती है, तप से, सम्यक् ज्ञान से, और नित्य ब्रह्मचर्य से।’
चार qualifications: सत्य, तप, ज्ञान, ब्रह्मचर्य। बिना इनके आत्मा नहीं मिलेगी।
मन्त्र 3.1.6
सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा
यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम् ॥
यह मन्त्र भारत का राष्ट्र-वाक्य है। ‘सत्यमेव जयते नानृतम्।’ सत्य ही जीतता है, झूठ नहीं।
‘सत्य से वो देवयान-पथ फैला है।’ यानी जो रास्ता मुक्ति की ओर ले जाता है, वो सत्य से बना है।
‘जिस पर आप्त-काम ऋषि चलते हैं।’ आप्त-काम = जिनकी सब इच्छाएँ पूरी हो चुकीं। वो ही इस रास्ते पर चल सकते हैं।
‘जहाँ सत्य का परम निधान है।’ सत्य का final treasure। यानी मंजिल भी सत्य है।
मन्त्र 3.1.7
दूरात् सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥
‘वो विशाल है, दिव्य, अचिन्त्य-रूप, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर।’ सब superlatives।
‘दूर से दूर, और यहीं पास।’ Eshvasya 5 का echo।
‘पश्यत्सु इह एव निहितं गुहायाम्।’ देखने वालों के लिए यहीं हृदय में।
मन्त्र 3.1.8
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥
‘चक्षु से नहीं, वाणी से नहीं, बाक़ी देवों से नहीं, तप-कर्म से भी नहीं।’ तो किस से?
‘ज्ञान की प्रसन्नता और शुद्ध सत्त्व से।’ ज्ञान का एक gentle satisfaction। शुद्ध मन। फिर ध्यान। तब वो दिखता है।
मन्त्र 3.1.9
प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥
‘एषोऽणुरात्मा।’ यह छोटा आत्मा। जिसमें प्राण पाँच रूपों में बैठे हैं।
‘प्राणों से चित्त सब बँधा है।’ यानी हमारी मानसिक activities सब प्राण से connected हैं।
‘जब चित्त शुद्ध होता है, तब यह आत्मा प्रकट होता है।’ यह pre-condition है।
मन्त्र 3.1.10
तं तं लोकं जयते तांश्च कामांस्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद्भूतिकामः ॥
एक practical bonus। ‘विशुद्ध-सत्त्व जिस लोक की चाह रखे, उसे पाता है। जो ऐश्वर्य चाहता है, वो आत्म-ज्ञानी की पूजा करे।’
यानी सब्र से सीखने वालों को बाहरी fruits भी मिलते हैं। पर यह side-effect है, main aim नहीं।
मुण्डक 3.2
मन्त्र 3.2.1
उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥
‘निष्काम होकर पुरुष की उपासना करने वाले धीर शुक्र (जन्म-चक्र) से ऊपर निकल जाते हैं।’
‘जो कामनाएँ रखता है, उन्हीं से जन्म लेता है। कृत-आत्मा की कामनाएँ यहीं विलीन।’ यानी desire का loop तभी टूटता है जब आप पूरी तरह fulfilled हों।
मन्त्र 3.2.2
पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्तु इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥
‘निष्काम होकर पुरुष की उपासना करने वाले धीर शुक्र (जन्म-चक्र) से ऊपर निकल जाते हैं।’
‘जो कामनाएँ रखता है, उन्हीं से जन्म लेता है। कृत-आत्मा की कामनाएँ यहीं विलीन।’ यानी desire का loop तभी टूटता है जब आप पूरी तरह fulfilled हों।
मन्त्र 3.2.3
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूꣳ स्वाम् ॥
‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो।’ यह मन्त्र कठ 1.2.23 में भी है। बहुत famous।
‘यह आत्मा प्रवचन से नहीं मिलती, बुद्धि से नहीं, बहुत श्रुति से नहीं। यह उसे ही मिलती है जिसे वो खुद चुनती है।’
यह एक surprising statement है। आप कितनी भी मेहनत करें, final realization grace-driven है।
मन्त्र 3.2.4
एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥
‘मगर grace के बिना भी नहीं हो सकता।’ Balance है। ‘बल-हीन को नहीं मिलती, न प्रमाद से, न तप के बिना। जो विद्वान् यथा-शक्ति प्रयत्न करता है, उसके पास आत्मा आता है।’
तो रास्ता है: effort + grace। दोनों चाहिए।
मन्त्र 3.2.5
ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥
आत्मा को पाकर ऋषि क्या बनते हैं? ज्ञान-तृप्त, कृत-आत्म, वीतराग, प्रशान्त, धीर, युक्तात्म। और ‘सब में प्रवेश कर जाते हैं।’
‘वेदान्त-विज्ञान से अर्थ निश्चित किए, संन्यास-योग से शुद्ध-सत्त्व यति, मरण-काल में परम-अमृत होकर मुक्त।’ यह final liberation।
मन्त्र 3.2.6
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥
आत्मा को पाकर ऋषि क्या बनते हैं? ज्ञान-तृप्त, कृत-आत्म, वीतराग, प्रशान्त, धीर, युक्तात्म। और ‘सब में प्रवेश कर जाते हैं।’
‘वेदान्त-विज्ञान से अर्थ निश्चित किए, संन्यास-योग से शुद्ध-सत्त्व यति, मरण-काल में परम-अमृत होकर मुक्त।’ यह final liberation।
मन्त्र 3.2.7
कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥
‘पन्द्रह कलाएँ अपनी प्रतिष्ठाओं में लौट जाती हैं।’ मरते वक़्त, सब elements अपने मूल में लौटते हैं।
‘जैसे नदियाँ समुद्र में अस्त, नाम-रूप छोड़कर। वैसे ही विद्वान् नाम-रूप से मुक्त।’ यह प्रश्न 6.5 का echo है।
मन्त्र 3.2.8
तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥
‘पन्द्रह कलाएँ अपनी प्रतिष्ठाओं में लौट जाती हैं।’ मरते वक़्त, सब elements अपने मूल में लौटते हैं।
‘जैसे नदियाँ समुद्र में अस्त, नाम-रूप छोड़कर। वैसे ही विद्वान् नाम-रूप से मुक्त।’ यह प्रश्न 6.5 का echo है।
मन्त्र 3.2.9
नास्याब्रह्मवित्कुले भवति ।
तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥
‘जो उस परम ब्रह्म को जान लेता है, वो ब्रह्म ही हो जाता है।’ सीधा identification।
‘उसके कुल में कोई अब्रह्म-वित् नहीं।’ Lineage भी sanctified।
‘वो शोक से पार, पाप से पार, हृदय-ग्रन्थियों से मुक्त, अमर।’ पाँच freedoms।
मन्त्र 3.2.10
क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वत एकर्षिꣳ श्रद्धयन्तः ।
तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद्यैस्तु चीर्णम् ॥
आख़िरी दो मन्त्र: ‘यह विद्या केवल qualified लोगों को दें: क्रियावान्, श्रोत्रिय, ब्रह्म-निष्ठ, जिन्होंने शिरो-व्रत किया है।’
शिरो-व्रत = आग के बर्तन को सिर पर रखने का व्रत। यानी extreme commitment वाले।
‘नमः परम-ऋषिभ्यः।’ Twice repeated, finality। उपनिषद् बंद।
मन्त्र 3.2.11
नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥
आख़िरी दो मन्त्र: ‘यह विद्या केवल qualified लोगों को दें: क्रियावान्, श्रोत्रिय, ब्रह्म-निष्ठ, जिन्होंने शिरो-व्रत किया है।’
शिरो-व्रत = आग के बर्तन को सिर पर रखने का व्रत। यानी extreme commitment वाले।
‘नमः परम-ऋषिभ्यः।’ Twice repeated, finality। उपनिषद् बंद।
उपनिषद् की शुरुआत एक beautiful lineage statement से। ब्रह्मा ने अथर्वा को विद्या दी। एक पीढ़ी से दूसरी, मगर line कब कहाँ टूटी, यह नहीं बताया गया। बस यह कहा कि यह विद्या क़ीमती है, और यह ‘सब विद्याओं की प्रतिष्ठा’ है।