मुण्डक उपनिषद्

Two Knowledges, Two Birds, and One Truth
अथर्ववेद की शौनकीय शाखा
तीन मुण्डक (अध्याय), हर एक में दो खण्ड। कुल 64 मन्त्र। नाम ‘मुण्डक’ का literal मतलब है ‘shaving the head’ (मुण्डन), यानी एक प्रतीक कि यह उपनिषद् पढ़कर साधक ब्रह्म-ज्ञान से बाक़ी सब भ्रम मुंडवा देता है।
॥ ओं भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ॥
हे देवों, हम कानों से कल्याणकारी सुनें, आँखों से कल्याणकारी देखें, स्थिर शरीर से तुम्हारी सेवा करें, हमें जो आयु मिली है उसमें कल्याण हो।
पढ़ने का समय: लगभग 35 मिनट

Background

मुण्डक उपनिषद् अथर्ववेद से ली गई है। नाम ‘मुण्डक’ एक प्रतीकात्मक है, मुंडन-संस्कार से। साधक यह उपनिषद् पढ़कर अपने अंदर के सब भ्रमों को मुंडवा देता है।

यह उपनिषद् अपनी काव्यात्मक भाषा के लिए जानी जाती है। यहाँ बहुत से famous श्लोक हैं, जिनमें से एक है ‘सत्यमेव जयते’ (3.1.6), जो भारत का राष्ट्रीय motto है।

तीन मुण्डक हैं, हर एक में दो खण्ड:

मुण्डक 1: ब्रह्म-विद्या का परिचय। दो ज्ञान, परा और अपरा। मुण्डक 2: ब्रह्म ही सब कुछ है, उसी से सब निकला। मुण्डक 3: ‘दो पक्षी’ का रूपक, और साधना का रास्ता।

मुण्डक की सबसे चर्चित बात है ‘दो विद्या’ का concept। पहली ‘अपरा-विद्या’, यानी ऋग, यजु, साम, अथर्व, बाक़ी सब किताबें, यज्ञ-नियम। दूसरी ‘परा-विद्या’, यानी जिससे वो अक्षर-ब्रह्म जाना जाता है। और एक बड़ी बात: ‘अपरा-विद्या’ के बिना ‘परा’ नहीं आती, मगर ‘परा’ के बिना सब किताबी ज्ञान काम के नहीं।

कथा-सार (Story in Brief)

एक राजा-ऋषि शौनक एक बड़े ऋषि अंगिरस के पास आता है और एक सीधा सवाल पूछता है, ‘किस को जानने से सब जाना जा सकता है?’ अंगिरस का जवाब बड़ा elegant है, ‘दो विद्या जानने वाली हैं। एक अपरा (lower), जिसमें सब चार वेद, उनके अंग, और बाक़ी शास्त्र हैं। दूसरी परा (higher), जिससे वो अक्षर ब्रह्म जाना जाता है।’

फिर अंगिरस यज्ञ-कर्म पर एक scathing कथन देते हैं, ‘ये यज्ञ-नौकाएँ कमज़ोर हैं। जो लोग इन्हें ही असली समझकर पकड़ते हैं, वो बार-बार जन्म-मरण में फँसते हैं।’ यह कुछ unexpected है, क्योंकि वेद यज्ञ की बात भी करते हैं। मगर मुण्डक कह रही है, यज्ञ-कर्म तब तक ठीक है जब तक तुम उसे final मंज़िल नहीं समझो।

दूसरे मुण्डक में ब्रह्म का वर्णन: सब का स्रोत, सब के अंदर, और सब के बाहर। ‘जैसे आग की लौ से चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही ब्रह्म से सब जीव।’

तीसरे मुण्डक का सबसे famous रूपक: दो पक्षी एक ही पेड़ पर बैठे हैं। एक खा रहा है, दूसरा बस देख रहा है। पहला जीवात्मा, दूसरा परमात्मा। जब जीवात्मा देखने वाले को पहचान लेता है, उसकी सारी चिंता मिट जाती है।

अंत में: ‘सत्य ही जीतता है, झूठ नहीं।’ और एक सिद्धान्त, कि आत्मा वाणी से, बुद्धि से, बहुत श्रुति से नहीं मिलती, वो उसी को मिलती है जिसे वो ख़ुद चुनती है।

Introduction

अगर कभी आपने सोचा हो, ‘मैं तो इतनी किताबें पढ़ चुका, इतने lectures सुन चुका, फिर भी कुछ बात missing लगती है,’ तो आप मुण्डक के main message को समझ जाएँगे।

उपनिषद् कह रही है कि किताबी ज्ञान एक ज़रूरी step है, मगर final नहीं। final चीज़ कुछ और है: एक भीतरी realization, जो किताबें नहीं देतीं। यह उपनिषद् उसी towards push करती है।

मुण्डक 1.1

दो विद्या: परा और अपरा
शौनक का सवाल, अंगिरस का जवाब। पहले अपरा-विद्या की पूरी list, फिर परा-विद्या का संकेत।

मन्त्र 1.1.1

ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता ।
स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥
साधारण अनुवाददेवताओं में सबसे पहले ब्रह्मा हुए, विश्व के कर्ता और रक्षक। उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को ब्रह्म-विद्या दी, जो सब विद्याओं की नींव है।

उपनिषद् की शुरुआत एक beautiful lineage statement से। ब्रह्मा ने अथर्वा को विद्या दी। एक पीढ़ी से दूसरी, मगर line कब कहाँ टूटी, यह नहीं बताया गया। बस यह कहा कि यह विद्या क़ीमती है, और यह ‘सब विद्याओं की प्रतिष्ठा’ है।

मन्त्र 1.1.2

अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्माथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् ।
स भारद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥
साधारण अनुवादअथर्वा ने यह विद्या पहले अंगिर को दी, अंगिर ने भारद्वाज सत्यवाह को, और भारद्वाज ने अंगिरस को। इसी तरह यह परंपरा से नीचे आई।

शिक्षा-परंपरा: ब्रह्मा से अथर्वा, अथर्वा से अंगिर, अंगिर से भारद्वाज, भारद्वाज से अंगिरस। यह ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ है, और यह बताती है कि कोई self-taught नहीं हो सकता इस विद्या में।

मन्त्र 1.1.3

शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ ।
कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥
साधारण अनुवादएक बार महा-गृहस्थ शौनक विधिवत् अंगिरस के पास आए और पूछा, ‘भगवन्, ऐसा क्या है जिसको जानने से यह सब जाना जा सकता है?’

शौनक एक ‘महाशाल’ (बड़ा घर वाला) है, यानी रईस। मगर वो विधि-पूर्वक (formally) अंगिरस के पास आते हैं। यह respect है।

उनका सवाल बड़ा है: ‘क्या कोई एक चीज़ है जिसको जानकर सब जाना जा सकता है?’ यह वो question है जो हर thinker पूछता है, ‘unified theory of everything।’

मन्त्र 1.1.4

तस्मै स होवाच ।
द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति
परा चैवापरा च ॥
साधारण अनुवादअंगिरस ने कहा, ‘दो विद्याएँ जानने योग्य हैं, ऐसा ब्रह्म-वेत्ता कहते हैं। एक परा, और एक अपरा।’

अंगिरस का जवाब साफ़: ‘दो विद्याएँ हैं। परा और अपरा।’ यानी एक final answer, मगर पहले हमें दो प्रकार जानने चाहिए।

मन्त्र 1.1.5

तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः
शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति ।
अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥
साधारण अनुवाद‘अपरा वो है, जिसमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, और ज्योतिष आते हैं। और परा वो है, जिससे वो अक्षर-ब्रह्म जाना जाता है।’

अपरा-विद्या की list:

चार वेद: ऋग, यजुष, साम, अथर्व। और छह वेदाङ्ग: शिक्षा (phonetics), कल्प (ritual), व्याकरण (grammar), निरुक्त (etymology), छन्द (meter), ज्योतिष (astronomy).

यह सब अपरा है? Yes। यह सब book-knowledge है। ज़रूरी, मगर final नहीं।

‘परा वो है, जिससे अक्षर-ब्रह्म जाना जाता है।’ और अक्षर-ब्रह्म क्या है, यह अगले श्लोक में।

मन्त्र 1.1.6

यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णम्
अचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् ।
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं
तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥
साधारण अनुवाद‘जो अदृश्य, अग्राह्य, गोत्र-रहित, वर्ण-रहित है, चक्षु-श्रोत्र-हाथ-पाँव-रहित है, नित्य, व्यापक, सर्व-गत, सूक्ष्म, अव्यय, सब का योनि है, ऐसे को धीर लोग देखते हैं।’

अक्षर-ब्रह्म का वर्णन: अदृश्य, अग्राह्य, बिना गोत्र-वर्ण, बिना इन्द्रियों के, नित्य, व्यापक, सर्व-गत, सूक्ष्म, अव्यय, सब का योनि।

यह सब ‘negative descriptions’ हैं। नेति-नेति। क्योंकि positive description object बना देगी। अब यह ‘धीर’ लोगों को दिखता है।

मन्त्र 1.1.7

यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च
यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति ।
यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि
तथाऽक्षरात्सम्भवतीह विश्वम् ॥
साधारण अनुवाद‘जैसे मकड़ी अपने जाल को निकालती है और समेटती है, जैसे पृथ्वी से ओषधि उगती हैं, जैसे पुरुष के सिर से बाल, वैसे ही अक्षर से यह सारा संसार उत्पन्न होता है।’

अब तीन analogies। मकड़ी से उसका जाल आता है, पृथ्वी से ओषधि उगती हैं, पुरुष के सिर से बाल। ये सब अपने substrate से अलग नहीं, मगर साथ ही expressions हैं।

वैसे ही ब्रह्म से यह सारा संसार। यह ‘सत्कार्यवाद’ का foundation है, कि कारण और कार्य fundamentally अलग नहीं।

मन्त्र 1.1.8

तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते ।
अन्नात् प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥
साधारण अनुवाद‘तप से ब्रह्म दीप्त होता है, उससे अन्न उत्पन्न होता है। अन्न से प्राण, मन, सत्य, लोक, और कर्मों में अमृत।’

तप से ब्रह्म पुष्ट होता है। फिर अन्न, फिर प्राण, मन, सत्य, लोक, और कर्मों में अमृत।

एक hierarchy है: ब्रह्म → तप → अन्न → प्राण-मन → सत्य-लोक → कर्म। और यह सब उसी सर्वज्ञ से।

मन्त्र 1.1.9

यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः ।
तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥
साधारण अनुवाद‘जो सर्वज्ञ, सर्व-विद्या वाला, जिसका तप ही ज्ञान है, उसी से यह ब्रह्म नाम-रूप-अन्न उत्पन्न होता है।’

तप से ब्रह्म पुष्ट होता है। फिर अन्न, फिर प्राण, मन, सत्य, लोक, और कर्मों में अमृत।

एक hierarchy है: ब्रह्म → तप → अन्न → प्राण-मन → सत्य-लोक → कर्म। और यह सब उसी सर्वज्ञ से।

सारएक वाक्य में: दो विद्या हैं, परा और अपरा। किताबी ज्ञान अपरा, ब्रह्म-ज्ञान परा। दोनों ज़रूरी, मगर लक्ष्य परा है।

मुण्डक 1.2

यज्ञ-कर्म की सीमा
यज्ञ करना ठीक है, मगर उसे final मंज़िल मत मानो। नौकाएँ कमज़ोर हैं।

मन्त्र 1.2.1

तदेतत् सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यन्
तानि त्रेतायां बहुधा सन्ततानि ।
तान्याचरथ नियतं सत्यकामा
एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥
साधारण अनुवाद‘यह सत्य है। कवियों ने मन्त्रों में जिन कर्मों को देखा, उन्हें त्रेता में (तीन वेदों में) बहुत तरह से फैलाया है। सत्य-काम वालो, इन्हें नियम से करते रहो, यही तुम्हारा पुण्य-लोक का रास्ता है।’

दूसरा खण्ड शुरू। एक यज्ञ-शास्त्र की कथा।

‘जो कर्म कवियों ने मन्त्रों में देखे, वो तीन वेदों में फैले हैं। सत्य-कामी इन्हें नियम से करते रहो, यही पुण्य-लोक का रास्ता है।’

अभी तो यज्ञ की praise हो रही है। मगर अगले मन्त्रों में twist आएगा।

मन्त्र 1.2.2

यदा लेलायते ह्यर्चिः समिद्धे हव्यवाहने ।
तदाज्यभागावन्तरेणाहुतीः प्रतिपादयेच्छ्रद्धया हुतम् ॥
साधारण अनुवाद‘जब यज्ञ-अग्नि की लौ हिलती है, तब घृत के बीच में आहुति श्रद्धा से देनी चाहिए।’

यज्ञ की technical details। आहुति कब-कैसे डालनी है। और एक warning: जो अग्निहोत्र दर्श-पौर्णमास के बिना है, atithi-satkar के बिना है, उसका असर ख़राब है।

मन्त्र 1.2.3

यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमासमचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च ।
अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुतमासप्तमांस्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥
साधारण अनुवाद‘जिसका अग्निहोत्र दर्श (अमावस्या यज्ञ), पौर्णमास (पूर्णिमा यज्ञ), चातुर्मास्य, आग्रयण (फसल यज्ञ), अतिथि-सत्कार, वैश्वदेव (देवों को offering), इन सब के बिना है, वो अपने सात लोकों को मार देता है।’

यज्ञ की technical details। आहुति कब-कैसे डालनी है। और एक warning: जो अग्निहोत्र दर्श-पौर्णमास के बिना है, atithi-satkar के बिना है, उसका असर ख़राब है।

मन्त्र 1.2.4

काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा ।
स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥
साधारण अनुवादअग्नि की सात जिह्वाएँ: काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्र-वर्णा, स्फुलिङ्गिनी, और विश्व-रुचि। हर एक देवी हिलती हुई।

अग्नि की सात जिह्वाएँ का famous वर्णन। हर एक का नाम: काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्र-वर्णा, स्फुलिङ्गिनी, और विश्व-रुचि। ‘हिलती हुई देवियाँ।’

‘जो इन चमकती हुई जिह्वाओं में समय से आहुति डालते हुए चलता है, उसे ये सूर्य-रश्मियाँ देवों के स्वामी के घर ले जाती हैं।’ यानी यज्ञ-कर्म का maximum benefit।

मन्त्र 1.2.5

एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्याददायन् ।
तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥
साधारण अनुवाद‘जो इन चमकती हुई जिह्वाओं में समय से आहुति डालते हुए चलता है, उसे ये सूर्य की किरणें वहाँ ले जाती हैं जहाँ देवताओं का स्वामी, एक मात्र, बसता है।’

अग्नि की सात जिह्वाएँ का famous वर्णन। हर एक का नाम: काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्र-वर्णा, स्फुलिङ्गिनी, और विश्व-रुचि। ‘हिलती हुई देवियाँ।’

‘जो इन चमकती हुई जिह्वाओं में समय से आहुति डालते हुए चलता है, उसे ये सूर्य-रश्मियाँ देवों के स्वामी के घर ले जाती हैं।’ यानी यज्ञ-कर्म का maximum benefit।

मन्त्र 1.2.6

एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति ।
प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥
साधारण अनुवाद‘दीप्त आहुतियाँ सूर्य की किरणों के साथ यजमान को कहती हैं, ”आओ, आओ।” उसे प्रिय वाणी से वहाँ ले जाती हैं, ”यह तुम्हारा पुण्य ब्रह्म-लोक है।”’

अग्नि की सात जिह्वाएँ का famous वर्णन। हर एक का नाम: काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्र-वर्णा, स्फुलिङ्गिनी, और विश्व-रुचि। ‘हिलती हुई देवियाँ।’

‘जो इन चमकती हुई जिह्वाओं में समय से आहुति डालते हुए चलता है, उसे ये सूर्य-रश्मियाँ देवों के स्वामी के घर ले जाती हैं।’ यानी यज्ञ-कर्म का maximum benefit।

मन्त्र 1.2.7

प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म ।
एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति ॥
साधारण अनुवाद‘मगर ये यज्ञ-नौकाएँ कमज़ोर हैं। अठारह विधियाँ हैं, और इनमें कर्म low-level है। जो मूर्ख इन्हीं को श्रेय समझकर खुश हो जाते हैं, वो जरा-मृत्यु में फिर लौटते हैं।’

अब twist आता है। ‘मगर ये यज्ञ-नौकाएँ कमज़ोर हैं।’ Wait, अभी तो praise हो रहा था!

‘जो मूर्ख इन्हीं को श्रेय समझकर खुश हो जाते हैं, वो जरा-मृत्यु में फिर लौटते हैं।’

उपनिषद् कह रही है, यज्ञ ठीक है, मगर final नहीं। अगर तुम सोचो ‘यह कर लिया तो काम पूरा,’ तो तुम चूक गए।

मन्त्र 1.2.8

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥
साधारण अनुवाद‘अविद्या में रहते हुए जो खुद को धीर-पंडित मान बैठते हैं, वो मारे जाते हुए भी इधर-उधर भटकते हैं, जैसे अंधा अंधे को रास्ता दिखाए।’

तीनों मन्त्र मिलकर एक critique। ‘अविद्या में फँसे हुए लोग खुद को धीर-पंडित मान बैठते हैं।’ ‘बच्चे (अनुभव-हीन) सोचते हैं हमने काम कर लिया, मगर वो असली बात तक पहुँचे ही नहीं।’

‘जो इष्ट-पूर्त को ही सबसे बड़ा मानते हैं, वो स्वर्ग में पुण्य भोगकर वापस आते हैं।’ कोई permanent solution नहीं।

मन्त्र 1.2.9

अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः ।
यत् कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात् तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥
साधारण अनुवाद‘अविद्या में कई तरह से फँसे हुए बच्चे (अनुभवहीन) सोचते हैं, ”हमने कृतार्थ हो गए।” मगर कर्मियों को राग से कुछ पता नहीं, वो आतुर होकर अपने लोकों से नीचे गिरते हैं।’

तीनों मन्त्र मिलकर एक critique। ‘अविद्या में फँसे हुए लोग खुद को धीर-पंडित मान बैठते हैं।’ ‘बच्चे (अनुभव-हीन) सोचते हैं हमने काम कर लिया, मगर वो असली बात तक पहुँचे ही नहीं।’

‘जो इष्ट-पूर्त को ही सबसे बड़ा मानते हैं, वो स्वर्ग में पुण्य भोगकर वापस आते हैं।’ कोई permanent solution नहीं।

मन्त्र 1.2.10

इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥
साधारण अनुवाद‘जो इष्ट-पूर्त (यज्ञ-दान) को ही सबसे बड़ा मानते हैं, उन्हें कुछ और श्रेय नहीं दिखता। ये मूढ़ स्वर्ग के ऊपर पुण्य भोगकर फिर इस लोक में, या इससे नीचे लोकों में जाते हैं।’

तीनों मन्त्र मिलकर एक critique। ‘अविद्या में फँसे हुए लोग खुद को धीर-पंडित मान बैठते हैं।’ ‘बच्चे (अनुभव-हीन) सोचते हैं हमने काम कर लिया, मगर वो असली बात तक पहुँचे ही नहीं।’

‘जो इष्ट-पूर्त को ही सबसे बड़ा मानते हैं, वो स्वर्ग में पुण्य भोगकर वापस आते हैं।’ कोई permanent solution नहीं।

मन्त्र 1.2.11

तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः ।
सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥
साधारण अनुवाद‘जो लोग अरण्य में तप-श्रद्धा से रहते हैं, शान्त, विद्वान्, भिक्षा-चर्या करते हैं, वो सूर्य-द्वार से, रजोगुण-रहित होकर, वहाँ जाते हैं जहाँ अमर पुरुष, अव्यय-आत्मा बसता है।’

तो रास्ता क्या है? ‘जो अरण्य में तप-श्रद्धा से रहते हैं, शान्त, विद्वान्, भिक्षा-चर्या करते हैं, वो सूर्य-द्वार से जाते हैं, जहाँ अमर पुरुष है।’

यानी अंदर मुड़ो। ऋषि-जीवन में जाओ। बाहरी कर्म तुम्हें सिर्फ़ swivel कर सकते हैं।

मन्त्र 1.2.12

परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन ।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥
साधारण अनुवाद‘कर्म से बने लोकों को परीक्षा करके, ब्राह्मण को निर्वेद आना चाहिए: ”किया हुआ काम अपने आप तो ब्रह्म नहीं देता।” तब वो समिधा हाथ में लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्म-निष्ठ गुरु के पास जाए।’

आख़िरी दो मन्त्र practical advice के साथ। ‘कर्म से बने लोक देखकर, ब्राह्मण को निर्वेद आ जाए कि किया हुआ अपने आप ब्रह्म नहीं देता।’ तब क्या करें?

‘समिधा हाथ में लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्म-निष्ठ गुरु के पास जाए।’ यानी एक qualified गुरु ढूँढो।

‘गुरु प्रशान्त-चित्त शिष्य को ब्रह्म-विद्या तत्त्वतः बताते हैं।’ यह transmission है, lecture नहीं।

मन्त्र 1.2.13

तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय ।
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥
साधारण अनुवाद‘उस विद्वान् को, जो शान्त-चित्त, शम (control) वाला है, गुरु इस ब्रह्म-विद्या को तत्त्वतः बताते हैं, जिससे अक्षर पुरुष का सच्चा ज्ञान होता है।’

आख़िरी दो मन्त्र practical advice के साथ। ‘कर्म से बने लोक देखकर, ब्राह्मण को निर्वेद आ जाए कि किया हुआ अपने आप ब्रह्म नहीं देता।’ तब क्या करें?

‘समिधा हाथ में लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्म-निष्ठ गुरु के पास जाए।’ यानी एक qualified गुरु ढूँढो।

‘गुरु प्रशान्त-चित्त शिष्य को ब्रह्म-विद्या तत्त्वतः बताते हैं।’ यह transmission है, lecture नहीं।

सारएक वाक्य में: यज्ञ-कर्म ठीक है, मगर final नहीं। नौकाएँ कमज़ोर हैं। अंदर मुड़ो, गुरु ढूँढो, और परा-विद्या के लिए तैयार हो।

मुण्डक 2.1

ब्रह्म ही सब है
ब्रह्म कैसा है? सब का स्रोत, सब का substrate। आग की लौ से चिनगारियों जैसे जीव।

मन्त्र 2.1.1

तदेतत् सत्यम् ।
यथा सुदीप्तात् पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।
तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति ॥
साधारण अनुवाद‘यह सत्य है। जैसे आग की लौ से हज़ारों चिनगारियाँ निकलती हैं, सब उसी रूप की, वैसे ही, हे सोम्य, अक्षर से अनेक रूप के जीव उत्पन्न होते हैं और उसी में लौट जाते हैं।’

दूसरा मुण्डक शुरू। ‘यह सत्य है। जैसे आग से चिनगारियाँ निकलती हैं, सब उसी रूप की, वैसे ही अक्षर से सब जीव।’

यह metaphor बहुत powerful है। चिनगारियाँ आग का हिस्सा हैं, मगर आग नहीं। फिर भी आग में लौट जाती हैं, identity गँवाकर।

मन्त्र 2.1.2

दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रोऽक्षरात् परतः परः ॥
साधारण अनुवाद‘वो दिव्य, अमूर्त पुरुष है, अंदर-बाहर वही, अजन्मा, प्राण-रहित, मन-रहित, शुभ्र, अक्षर से भी ऊपर।’

(मन्त्र 2.1.2 से 2.1.5:) पुरुष का वर्णन। दिव्य, अमूर्त, अंदर-बाहर, अजन्मा, प्राण-रहित, मन-रहित, शुभ्र, अक्षर से भी ऊपर।

‘उसी से प्राण, मन, इन्द्रियाँ, पाँच-महाभूत।’ सब एक ही source से।

‘अग्नि उसका सिर, चन्द्र-सूर्य आँखें, दिशाएँ कान, वेद वाणी, वायु प्राण, हृदय विश्व, और पाँव से पृथ्वी।’ यह ‘विराट पुरुष’ का famous रूपक है, ऋग्वेद के पुरुष-सूक्त से जुड़ा।

मन्त्र 2.1.3

एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ।
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥
साधारण अनुवाद‘उसी से प्राण, मन, और सब इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। उसी से आकाश, वायु, ज्योति, जल, और पृथ्वी, जो विश्व को धारण करती है।’

(मन्त्र 2.1.2 से 2.1.5:) पुरुष का वर्णन। दिव्य, अमूर्त, अंदर-बाहर, अजन्मा, प्राण-रहित, मन-रहित, शुभ्र, अक्षर से भी ऊपर।

‘उसी से प्राण, मन, इन्द्रियाँ, पाँच-महाभूत।’ सब एक ही source से।

‘अग्नि उसका सिर, चन्द्र-सूर्य आँखें, दिशाएँ कान, वेद वाणी, वायु प्राण, हृदय विश्व, और पाँव से पृथ्वी।’ यह ‘विराट पुरुष’ का famous रूपक है, ऋग्वेद के पुरुष-सूक्त से जुड़ा।

मन्त्र 2.1.4

अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः ।
वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥
साधारण अनुवाद‘अग्नि उसका सिर है, चन्द्र-सूर्य आँखें, दिशाएँ कान, फैले हुए वेद वाणी, वायु प्राण, हृदय विश्व, और पाँव से पृथ्वी। यही सब प्राणियों का अंतर्-आत्मा।’

(मन्त्र 2.1.2 से 2.1.5:) पुरुष का वर्णन। दिव्य, अमूर्त, अंदर-बाहर, अजन्मा, प्राण-रहित, मन-रहित, शुभ्र, अक्षर से भी ऊपर।

‘उसी से प्राण, मन, इन्द्रियाँ, पाँच-महाभूत।’ सब एक ही source से।

‘अग्नि उसका सिर, चन्द्र-सूर्य आँखें, दिशाएँ कान, वेद वाणी, वायु प्राण, हृदय विश्व, और पाँव से पृथ्वी।’ यह ‘विराट पुरुष’ का famous रूपक है, ऋग्वेद के पुरुष-सूक्त से जुड़ा।

मन्त्र 2.1.5

तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः सोमात् पर्जन्य ओषधयः पृथिव्याम् ।
पुमान् रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात् सम्प्रसूताः ॥
साधारण अनुवाद‘उसी से अग्नि, जिसकी समिधा सूर्य है। चन्द्र से बारिश, बारिश से पृथ्वी पर ओषधियाँ। पुरुष स्त्री में बीज छोड़ता है, और पुरुष से अनेक प्रजाएँ निकलती हैं।’

(मन्त्र 2.1.2 से 2.1.5:) पुरुष का वर्णन। दिव्य, अमूर्त, अंदर-बाहर, अजन्मा, प्राण-रहित, मन-रहित, शुभ्र, अक्षर से भी ऊपर।

‘उसी से प्राण, मन, इन्द्रियाँ, पाँच-महाभूत।’ सब एक ही source से।

‘अग्नि उसका सिर, चन्द्र-सूर्य आँखें, दिशाएँ कान, वेद वाणी, वायु प्राण, हृदय विश्व, और पाँव से पृथ्वी।’ यह ‘विराट पुरुष’ का famous रूपक है, ऋग्वेद के पुरुष-सूक्त से जुड़ा।

मन्त्र 2.1.6

तस्मादृचः साम यजूꣳषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च ।
संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥
साधारण अनुवाद‘उसी से ऋच, साम, यजुष, दीक्षा, सब यज्ञ, सब क्रतु, सब दक्षिणाएँ, संवत्सर, यजमान, लोक, जहाँ सोम बहता है, जहाँ सूर्य पवित्र करता है।’

उसी से सब वेद-वाणी, यज्ञ-कर्म, और सब सृष्टि निकलती है। यह comprehensive है। हर category cover।

‘सात प्राण उससे उत्पन्न।’ सात यानी सिर के सात openings।

‘अतः समुद्र-पहाड़, नदियाँ, ओषधि, रस।’ पूरी physical दुनिया।

मन्त्र 2.1.7

तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि ।
प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च ॥
साधारण अनुवाद‘उसी से देव बहुत तरह से उत्पन्न, साध्य, मनुष्य, पशु, पक्षी। प्राण-अपान, धान-जौ, तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य, और विधि।’

उसी से सब वेद-वाणी, यज्ञ-कर्म, और सब सृष्टि निकलती है। यह comprehensive है। हर category cover।

‘सात प्राण उससे उत्पन्न।’ सात यानी सिर के सात openings।

‘अतः समुद्र-पहाड़, नदियाँ, ओषधि, रस।’ पूरी physical दुनिया।

मन्त्र 2.1.8

सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः ।
सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥
साधारण अनुवाद‘सात प्राण उससे उत्पन्न, सात अग्नि-जिह्वाएँ, सात समिधाएँ, सात होम। सात लोक, जिनमें प्राण गुहा में बसकर चलते हैं, सात-सात।’

उसी से सब वेद-वाणी, यज्ञ-कर्म, और सब सृष्टि निकलती है। यह comprehensive है। हर category cover।

‘सात प्राण उससे उत्पन्न।’ सात यानी सिर के सात openings।

‘अतः समुद्र-पहाड़, नदियाँ, ओषधि, रस।’ पूरी physical दुनिया।

मन्त्र 2.1.9

अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वेऽस्मात् स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः ।
अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥
साधारण अनुवाद‘उसी से समुद्र-पहाड़ निकले हैं। उससे सब नदियाँ बहती हैं। उसी से ओषधि, रस, जिनसे यह अंतर्-आत्मा भूतों के साथ खड़ा रहता है।’

उसी से सब वेद-वाणी, यज्ञ-कर्म, और सब सृष्टि निकलती है। यह comprehensive है। हर category cover।

‘सात प्राण उससे उत्पन्न।’ सात यानी सिर के सात openings।

‘अतः समुद्र-पहाड़, नदियाँ, ओषधि, रस।’ पूरी physical दुनिया।

मन्त्र 2.1.10

पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् ।
एतद्यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य ॥
साधारण अनुवाद‘पुरुष ही यह विश्व, कर्म, तप, ब्रह्म, परम-अमृत है। हे सोम्य, जो इसे हृदय-गुहा में रखा हुआ जानता है, वो अविद्या की गाँठ खोल देता है।’

‘पुरुष ही यह विश्व, कर्म, तप, ब्रह्म, परम-अमृत है।’

एक identification। पुरुष = सब कुछ। और जो इसे हृदय-गुहा में जानता है, उसकी ‘अविद्या-ग्रन्थि’ खुल जाती है। यह practical effect है।

सारएक वाक्य में: ब्रह्म एक आग की लौ की तरह है, और हम सब उसकी चिनगारियाँ। सब उसी से, उसी में, और उसी की ओर।

मुण्डक 2.2

ब्रह्म को कैसे जाने?
धनुष-बाण का रूपक। ओम् धनुष, आत्मा बाण, ब्रह्म निशाना। और ‘अरे रथ-नाभि की तरह’ का famous मन्त्र।

मन्त्र 2.2.1

आविः सन्निहितं गुहाचरं नाम महत्पदमत्रैतत्समर्पितम् ।
एजत् प्राणन्निमिषच्च यदेतद् जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम् ॥
साधारण अनुवाद‘जो प्रकट, छिपा, गुहा में चलने वाला है, महान् पद, यहाँ समर्पित। चलते-साँस लेते-झपकते हर एक के लिए, यह जो है, जान लो, सत्-असत्, वरेण्य, विज्ञान से परे, प्रजाओं में सबसे ऊँचा।’

‘जो प्रकट है, और गुहा में चलने वाला, सब का महान् पद, यहाँ समर्पित।’ ब्रह्म दोनों है, बाहर और अंदर।

‘जो दीप्त, अणु से भी अणु, जिसमें लोक टिके हैं, वो अक्षर ब्रह्म, वो प्राण, वो वाणी-मन, वो सत्य-अमृत।’ सब एक ही चीज़।

मन्त्र 2.2.2

यदर्चिमद्यदणुभ्योऽणु च यस्मिँल्लोका निहिता लोकिनश्च ।
तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्य विद्धि ॥
साधारण अनुवाद‘जो दीप्त है, अणु से अणु, जिसमें लोक और लोकवासी टिके हैं, वही अक्षर ब्रह्म, वही प्राण, वही वाणी-मन, वही सत्य, वही अमृत, हे सोम्य, उसी को विद्ध (पकड़) ले।’

‘जो प्रकट है, और गुहा में चलने वाला, सब का महान् पद, यहाँ समर्पित।’ ब्रह्म दोनों है, बाहर और अंदर।

‘जो दीप्त, अणु से भी अणु, जिसमें लोक टिके हैं, वो अक्षर ब्रह्म, वो प्राण, वो वाणी-मन, वो सत्य-अमृत।’ सब एक ही चीज़।

मन्त्र 2.2.3

धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं
शरं ह्युपासानिशितं सन्धयीत ।
आयम्य तद्भावगतेन चेतसा
लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥
साधारण अनुवाद‘उपनिषद् के महान् धनुष को लो। उस पर एक तेज़ बाण रखो (उपासना से तेज़)। अपने मन को उसी की भावना में रखकर, उसे खींचो, और लक्ष्य उस अक्षर पर रखो, हे सोम्य।’

एक beautiful image: ब्रह्म-साधना धनुर्विद्या जैसी है।

‘धनुष: उपनिषद्। बाण: तेज़ किया हुआ साधक का चित्त। लक्ष्य: अक्षर ब्रह्म।’

‘प्रणव (ओम्) धनुष, आत्मा बाण, ब्रह्म लक्ष्य।’ और बाण को मारकर लक्ष्य में मिल जाना है। ‘शरवत् तन्मयो भवेत्।’ यह एक beautiful symbol।

मन्त्र 2.2.4

प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥
साधारण अनुवाद‘प्रणव (ओम्) धनुष है, आत्मा बाण, ब्रह्म लक्ष्य। बहुत सावधानी से बाण मारना है, और जैसे बाण लक्ष्य में लगकर एक हो जाता है, वैसे ही आत्मा को ब्रह्म में मिल जाना है।’

एक beautiful image: ब्रह्म-साधना धनुर्विद्या जैसी है।

‘धनुष: उपनिषद्। बाण: तेज़ किया हुआ साधक का चित्त। लक्ष्य: अक्षर ब्रह्म।’

‘प्रणव (ओम्) धनुष, आत्मा बाण, ब्रह्म लक्ष्य।’ और बाण को मारकर लक्ष्य में मिल जाना है। ‘शरवत् तन्मयो भवेत्।’ यह एक beautiful symbol।

मन्त्र 2.2.5

यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः ।
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥
साधारण अनुवाद‘जिसमें द्यौ, पृथिवी, अंतरिक्ष, सब इन्द्रियों समेत मन फैला है, उसी एक को आत्मा जानो। बाक़ी वाणियों को छोड़ दो। यही अमृत का सेतु है।’

‘जिसमें द्यौ, पृथिवी, अंतरिक्ष, मन सहित सब इन्द्रियाँ फैली हैं, उसी एक को आत्मा जानो।’

‘अन्या वाचो विमुञ्चथ’ = ‘बाक़ी वाणियों को छोड़ दो।’ यानी और कुछ सीखने की ज़रूरत नहीं अब। यह एक ब्रह्म-विद्या ही काफ़ी है।

‘अमृतस्य एष सेतुः।’ अमरता का यह पुल।

मन्त्र 2.2.6

अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः ।
ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ॥
साधारण अनुवाद‘जैसे रथ-नाभि (पहिये के center) में अरे टिकी हैं, वैसे ही जिसमें नाड़ियाँ टिकी हैं, वो भीतर अनेक रूपों में जन्म लेता हुआ चलता है। ”ओम्” कहकर आत्मा का ध्यान करो। अंधकार के पार जाने में तुम्हें कल्याण मिले।’

‘जैसे रथ-नाभि में अरे टिकी हैं, वैसे ही जिसमें नाड़ियाँ टिकी हैं, वो भीतर अनेक रूपों में जन्म लेता हुआ चलता है।’ यह बहुत powerful image है। हर रूप उसी का, जैसे पहिये के सब spokes एक ही center पर।

‘ओम् कहकर आत्मा का ध्यान करो।’ सीधा practical instruction।

मन्त्र 2.2.7

यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्यैष महिमा भुवि ।
दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः ॥
साधारण अनुवाद‘जो सर्वज्ञ है, सर्व-विद्या, उसकी महिमा यह पृथ्वी पर है। वो दिव्य ब्रह्म-नगर में, आकाश में, आत्म-रूप में टिका है।’

(अगले चार मन्त्र:) उसकी महिमा भूमि पर है, मगर वो दिव्य ब्रह्म-नगर में आत्म-रूप में टिका है।

‘मन-मय, प्राणों का नेता, अन्न में टिका, हृदय में।’ एक जगह-जगह description, मगर यह सब hint है।

‘हृदय-ग्रन्थि टूट जाती है।’ यह एक practical statement है। जब परा-अवर दिख जाएँ, तब वो inner knot, जो हमें संसार से बाँधती है, खुल जाती है।

मन्त्र 2.2.8

मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय ।
तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति ॥
साधारण अनुवाद‘मन-मय, प्राणों का नेता, अन्न में टिका है, हृदय को घर बनाकर। उसके विज्ञान से धीर लोग देखते हैं उस आनन्द-रूप अमृत को, जो विभासित है।’

(अगले चार मन्त्र:) उसकी महिमा भूमि पर है, मगर वो दिव्य ब्रह्म-नगर में आत्म-रूप में टिका है।

‘मन-मय, प्राणों का नेता, अन्न में टिका, हृदय में।’ एक जगह-जगह description, मगर यह सब hint है।

‘हृदय-ग्रन्थि टूट जाती है।’ यह एक practical statement है। जब परा-अवर दिख जाएँ, तब वो inner knot, जो हमें संसार से बाँधती है, खुल जाती है।

मन्त्र 2.2.9

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥
साधारण अनुवाद‘जब परावर (पर और अवर, यानी ब्रह्म और जीव दोनों) दिख जाते हैं, तब हृदय की गाँठ टूट जाती है, सब संशय कट जाते हैं, और कर्म क्षीण हो जाते हैं।’

(अगले चार मन्त्र:) उसकी महिमा भूमि पर है, मगर वो दिव्य ब्रह्म-नगर में आत्म-रूप में टिका है।

‘मन-मय, प्राणों का नेता, अन्न में टिका, हृदय में।’ एक जगह-जगह description, मगर यह सब hint है।

‘हृदय-ग्रन्थि टूट जाती है।’ यह एक practical statement है। जब परा-अवर दिख जाएँ, तब वो inner knot, जो हमें संसार से बाँधती है, खुल जाती है।

मन्त्र 2.2.10

हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् ।
तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥
साधारण अनुवाद‘हिरण्मय (सोने जैसे) सबसे ऊपर के कोश में निर्मल ब्रह्म, बिना भागों के। शुभ्र, ज्योतियों की ज्योति, जो आत्म-वेत्ता जानते हैं।’

(अगले चार मन्त्र:) उसकी महिमा भूमि पर है, मगर वो दिव्य ब्रह्म-नगर में आत्म-रूप में टिका है।

‘मन-मय, प्राणों का नेता, अन्न में टिका, हृदय में।’ एक जगह-जगह description, मगर यह सब hint है।

‘हृदय-ग्रन्थि टूट जाती है।’ यह एक practical statement है। जब परा-अवर दिख जाएँ, तब वो inner knot, जो हमें संसार से बाँधती है, खुल जाती है।

मन्त्र 2.2.11

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥
साधारण अनुवाद‘वहाँ न सूर्य चमकता है, न चन्द्र-तारे, न बिजली, न यह अग्नि। वो चमकता है, उसके पीछे सब चमकता है। उसकी ही दीप्ति से यह सब विभासित है।’ (तुलना: कठ 2.2.15)

‘न तत्र सूर्यो भाति।’ यह कठ 2.2.15 के बराबर है। ब्रह्म खुद ज्योतियों की ज्योति है। सूर्य, चन्द्र, बिजली, अग्नि, सब उससे रोशन।

सारएक वाक्य में: ओम् धनुष, आत्मा बाण, ब्रह्म लक्ष्य। ध्यान से मारो, और हृदय की गाँठ टूट जाएगी।

मुण्डक 3.1

दो पक्षी, और सत्यमेव जयते
मुण्डक का climax। दो पक्षियों का रूपक। और भारत का राष्ट्र-वाक्य।

मन्त्र 3.1.1

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥
साधारण अनुवाद‘दो पक्षी, जो सहचर हैं और मित्र हैं, एक ही पेड़ पर बैठे हैं। एक पीपल का फल (कर्म-फल) मीठा-मीठा खा रहा है, दूसरा बस देख रहा है, बिना खाए।’

तीसरा मुण्डक का सबसे famous श्लोक। ‘दो पक्षी, सहचर, मित्र, एक ही पेड़ पर बैठे हैं।’ द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया।

‘एक पीपल का फल मीठा-मीठा खा रहा है। दूसरा बस देख रहा है।’

क्या मतलब? पेड़ = शरीर। पहला पक्षी = जीवात्मा, जो कर्म-फल खा रहा है। दूसरा = परमात्मा, साक्षी।

दोनों एक ही पेड़ पर। दोनों मित्र। मगर एक experiences, दूसरा observes।

मन्त्र 3.1.2

समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः ।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥
साधारण अनुवाद‘उसी पेड़ पर पुरुष डूबा हुआ है, अनीशता (असमर्थता) से दुखी और मोह में। जब वो देख लेता है दूसरे को, जो ईश (स्वामी) है, उसकी महिमा को, तब वो वीतशोक हो जाता है।’

‘उसी पेड़ पर पुरुष डूबा है, अनीशता से दुखी।’ यानी जीवात्मा खुद को powerless मानकर शोक करता है।

‘जब वो देख लेता है दूसरे को, जो ईश है, उसकी महिमा को, तब वीतशोक होता है।’

यह turning point है। जीव जब अपने अंदर के साक्षी को पहचान लेता है, तब suffering ख़त्म।

मन्त्र 3.1.3

यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।
तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥
साधारण अनुवाद‘जब साधक उस रुक्म-वर्ण (सुनहरे) कर्ता, ईश पुरुष, ब्रह्म-योनि को देखता है, तब वो विद्वान् पुण्य-पाप को झाड़कर, निरञ्जन होकर परम साम्य पाता है।’

‘जब साधक उस रुक्म-वर्ण (सुनहरे) ईश पुरुष को देखता है, तब वो पुण्य-पाप झाड़कर परम साम्य पाता है।’

परम साम्य = equality with the Self। यानी ख़ुद को उसी रूप में देखना।

मन्त्र 3.1.4

प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी ।
आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥
साधारण अनुवाद‘जो प्राण-रूप में सब प्राणियों में चमकता है, उसको जानने वाला विद्वान् बहुत बोलने वाला नहीं होता। वो आत्म-क्रीडा करता है, आत्म-रति करता है, क्रियावान् है, ब्रह्म-वेत्ताओं में श्रेष्ठ है।’

‘जो प्राण-रूप में सब प्राणियों में चमकता है, उसको जानने वाला विद्वान् बहुत बोलने वाला नहीं होता।’ यानी talk less, knowing speaks for itself.

‘वो आत्म-क्रीडा करता है, आत्म-रति करता है।’ खुद के साथ खुश है।

मन्त्र 3.1.5

सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ।
अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥
साधारण अनुवाद‘यह आत्मा सत्य से मिलती है, तप से, सम्यक् ज्ञान से, और नित्य ब्रह्मचर्य से। शरीर के अंदर ज्योति-मय शुभ्र है, जिसे क्षीण-दोष यति देखते हैं।’

‘यह आत्मा सत्य से मिलती है, तप से, सम्यक् ज्ञान से, और नित्य ब्रह्मचर्य से।’

चार qualifications: सत्य, तप, ज्ञान, ब्रह्मचर्य। बिना इनके आत्मा नहीं मिलेगी।

मन्त्र 3.1.6

सत्यमेव जयते नानृतं
सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा
यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम् ॥
साधारण अनुवाद‘सत्य ही जीतता है, झूठ नहीं। सत्य से ही वो देवयान-पथ फैला है, जिस पर आप्त-काम ऋषि चलते हैं, और जहाँ सत्य का परम निधान है।’

यह मन्त्र भारत का राष्ट्र-वाक्य है। ‘सत्यमेव जयते नानृतम्।’ सत्य ही जीतता है, झूठ नहीं।

‘सत्य से वो देवयान-पथ फैला है।’ यानी जो रास्ता मुक्ति की ओर ले जाता है, वो सत्य से बना है।

‘जिस पर आप्त-काम ऋषि चलते हैं।’ आप्त-काम = जिनकी सब इच्छाएँ पूरी हो चुकीं। वो ही इस रास्ते पर चल सकते हैं।

‘जहाँ सत्य का परम निधान है।’ सत्य का final treasure। यानी मंजिल भी सत्य है।

मन्त्र 3.1.7

बृहच्च तद् दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति ।
दूरात् सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥
साधारण अनुवाद‘वो विशाल है, दिव्य, अचिन्त्य-रूप, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर। दूर से दूर है, और यहीं पास भी। यहीं देखने वालों के लिए हृदय-गुहा में रखा हुआ।’

‘वो विशाल है, दिव्य, अचिन्त्य-रूप, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर।’ सब superlatives।

‘दूर से दूर, और यहीं पास।’ Eshvasya 5 का echo।

‘पश्यत्सु इह एव निहितं गुहायाम्।’ देखने वालों के लिए यहीं हृदय में।

मन्त्र 3.1.8

न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा ।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥
साधारण अनुवाद‘वो चक्षु से नहीं पकड़ा जाता, न वाणी से, न अन्य देवों से, न तप-कर्म से। ज्ञान की प्रसन्नता और शुद्ध सत्त्व से, ध्यान करने वाला उसे निष्कल (बिना भागों के) देखता है।’

‘चक्षु से नहीं, वाणी से नहीं, बाक़ी देवों से नहीं, तप-कर्म से भी नहीं।’ तो किस से?

‘ज्ञान की प्रसन्नता और शुद्ध सत्त्व से।’ ज्ञान का एक gentle satisfaction। शुद्ध मन। फिर ध्यान। तब वो दिखता है।

मन्त्र 3.1.9

एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश ।
प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥
साधारण अनुवाद‘यह छोटा आत्मा चेतना से जाना जाता है, जिसमें प्राण पाँच रूपों में बैठ गए हैं। प्राणों से चित्त सब बँधा है। जब चित्त शुद्ध होता है, तब यह आत्मा प्रकट होता है।’

‘एषोऽणुरात्मा।’ यह छोटा आत्मा। जिसमें प्राण पाँच रूपों में बैठे हैं।

‘प्राणों से चित्त सब बँधा है।’ यानी हमारी मानसिक activities सब प्राण से connected हैं।

‘जब चित्त शुद्ध होता है, तब यह आत्मा प्रकट होता है।’ यह pre-condition है।

मन्त्र 3.1.10

यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् ।
तं तं लोकं जयते तांश्च कामांस्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद्भूतिकामः ॥
साधारण अनुवाद‘विशुद्ध-सत्त्व जिस लोक की चाह करे और जो इच्छाएँ रखे, उन्हें पाता है। इसलिए जो ऐश्वर्य चाहता है, वो आत्म-ज्ञानी की पूजा करे।’

एक practical bonus। ‘विशुद्ध-सत्त्व जिस लोक की चाह रखे, उसे पाता है। जो ऐश्वर्य चाहता है, वो आत्म-ज्ञानी की पूजा करे।’

यानी सब्र से सीखने वालों को बाहरी fruits भी मिलते हैं। पर यह side-effect है, main aim नहीं।

सारएक वाक्य में: दो पक्षी एक ही पेड़ पर हैं। एक खा रहा, एक देख रहा। जब खाने वाला देखने वाले को पहचान लेता है, उसका शोक मिट जाता है। और सत्यमेव जयते।

मुण्डक 3.2

साधना और मुक्ति
आख़िरी खण्ड। आत्मा prevent करने से नहीं मिलती, उसी को मिलती है जिसे वो चुनती है। एक practical सबक।

मन्त्र 3.2.1

स वेदैतत् परमं ब्रह्म धाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् ।
उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥
साधारण अनुवाद‘वो जानता है उस परम ब्रह्म-धाम को, जहाँ सब टिका है, शुभ्र चमकता है। निष्काम होकर पुरुष की उपासना करने वाले धीर, इस शुक्र (वीर्य, यानी जन्म-चक्र) से ऊपर निकल जाते हैं।’

‘निष्काम होकर पुरुष की उपासना करने वाले धीर शुक्र (जन्म-चक्र) से ऊपर निकल जाते हैं।’

‘जो कामनाएँ रखता है, उन्हीं से जन्म लेता है। कृत-आत्मा की कामनाएँ यहीं विलीन।’ यानी desire का loop तभी टूटता है जब आप पूरी तरह fulfilled हों।

मन्त्र 3.2.2

कामान् यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र ।
पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्तु इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥
साधारण अनुवाद‘जो कामनाएँ रखता है, वो उन्हीं कामनाओं से जन्म लेता है। मगर कृत-आत्मा (पूरा हो चुका), जिसकी सब कामनाएँ पूरी हैं, उसकी सब कामनाएँ यहीं विलीन हो जाती हैं।’

‘निष्काम होकर पुरुष की उपासना करने वाले धीर शुक्र (जन्म-चक्र) से ऊपर निकल जाते हैं।’

‘जो कामनाएँ रखता है, उन्हीं से जन्म लेता है। कृत-आत्मा की कामनाएँ यहीं विलीन।’ यानी desire का loop तभी टूटता है जब आप पूरी तरह fulfilled हों।

मन्त्र 3.2.3

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूꣳ स्वाम् ॥
साधारण अनुवाद‘यह आत्मा प्रवचन से नहीं मिलती, न बुद्धि से, न बहुत श्रुति से। यह उसी को मिलती है जिसे वो खुद चुनती है। उसके लिए यह अपना तन-रूप खोल देती है।’ (तुलना: कठ 1.2.23)

‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो।’ यह मन्त्र कठ 1.2.23 में भी है। बहुत famous।

‘यह आत्मा प्रवचन से नहीं मिलती, बुद्धि से नहीं, बहुत श्रुति से नहीं। यह उसे ही मिलती है जिसे वो खुद चुनती है।’

यह एक surprising statement है। आप कितनी भी मेहनत करें, final realization grace-driven है।

मन्त्र 3.2.4

नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात् तपसो वाप्यलिङ्गात् ।
एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥
साधारण अनुवाद‘यह आत्मा बल-हीन को नहीं मिलती, न प्रमाद से, न तपस्या से जो लिङ्ग (signs) के बिना है। जो विद्वान् इन सब उपायों से प्रयत्न करता है, उसके आत्मा में ब्रह्म-धाम प्रवेश करता है।’

‘मगर grace के बिना भी नहीं हो सकता।’ Balance है। ‘बल-हीन को नहीं मिलती, न प्रमाद से, न तप के बिना। जो विद्वान् यथा-शक्ति प्रयत्न करता है, उसके पास आत्मा आता है।’

तो रास्ता है: effort + grace। दोनों चाहिए।

मन्त्र 3.2.5

सम्प्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः ।
ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥
साधारण अनुवाद‘उस आत्मा को पाकर ऋषि, ज्ञान-तृप्त, कृत-आत्म, वीतराग, प्रशान्त, धीर, युक्तात्म, सर्व-गत को सब तरफ़ पाकर सब में प्रवेश कर जाते हैं।’

आत्मा को पाकर ऋषि क्या बनते हैं? ज्ञान-तृप्त, कृत-आत्म, वीतराग, प्रशान्त, धीर, युक्तात्म। और ‘सब में प्रवेश कर जाते हैं।’

‘वेदान्त-विज्ञान से अर्थ निश्चित किए, संन्यास-योग से शुद्ध-सत्त्व यति, मरण-काल में परम-अमृत होकर मुक्त।’ यह final liberation।

मन्त्र 3.2.6

वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः सन्न्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः ।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥
साधारण अनुवाद‘वेदान्त-विज्ञान से अर्थ निश्चित किए हुए, संन्यास-योग से शुद्ध-सत्त्व यति, मरण-काल में ब्रह्म-लोकों में परम-अमृत होकर मुक्त हो जाते हैं।’

आत्मा को पाकर ऋषि क्या बनते हैं? ज्ञान-तृप्त, कृत-आत्म, वीतराग, प्रशान्त, धीर, युक्तात्म। और ‘सब में प्रवेश कर जाते हैं।’

‘वेदान्त-विज्ञान से अर्थ निश्चित किए, संन्यास-योग से शुद्ध-सत्त्व यति, मरण-काल में परम-अमृत होकर मुक्त।’ यह final liberation।

मन्त्र 3.2.7

गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु ।
कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥
साधारण अनुवाद‘पन्द्रह कलाएँ अपनी प्रतिष्ठाओं में लौट जाती हैं, सब देव अपनी प्रतिदेवताओं में। कर्म और विज्ञानमय आत्मा, सब परम अव्यय में एकीभूत हो जाते हैं।’

‘पन्द्रह कलाएँ अपनी प्रतिष्ठाओं में लौट जाती हैं।’ मरते वक़्त, सब elements अपने मूल में लौटते हैं।

‘जैसे नदियाँ समुद्र में अस्त, नाम-रूप छोड़कर। वैसे ही विद्वान् नाम-रूप से मुक्त।’ यह प्रश्न 6.5 का echo है।

मन्त्र 3.2.8

यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय ।
तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥
साधारण अनुवाद‘जैसे बहती हुई नदियाँ समुद्र में अस्त हो जाती हैं, नाम-रूप छोड़कर, वैसे ही विद्वान् नाम-रूप से मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुष को पाता है।’

‘पन्द्रह कलाएँ अपनी प्रतिष्ठाओं में लौट जाती हैं।’ मरते वक़्त, सब elements अपने मूल में लौटते हैं।

‘जैसे नदियाँ समुद्र में अस्त, नाम-रूप छोड़कर। वैसे ही विद्वान् नाम-रूप से मुक्त।’ यह प्रश्न 6.5 का echo है।

मन्त्र 3.2.9

स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ।
नास्याब्रह्मवित्कुले भवति ।
तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥
साधारण अनुवाद‘जो उस परम ब्रह्म को जान लेता है, वो ब्रह्म ही हो जाता है। उसके कुल में कोई अब्रह्म-वित् नहीं रहता। वो शोक से पार, पाप से पार, हृदय-ग्रन्थियों से मुक्त, अमर हो जाता है।’

‘जो उस परम ब्रह्म को जान लेता है, वो ब्रह्म ही हो जाता है।’ सीधा identification।

‘उसके कुल में कोई अब्रह्म-वित् नहीं।’ Lineage भी sanctified।

‘वो शोक से पार, पाप से पार, हृदय-ग्रन्थियों से मुक्त, अमर।’ पाँच freedoms।

मन्त्र 3.2.10

तदेतदृचाभ्युक्तम् ।
क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वत एकर्षिꣳ श्रद्धयन्तः ।
तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद्यैस्तु चीर्णम् ॥
साधारण अनुवाद‘एक ऋग्वेद-मन्त्र भी कहता है: ”क्रियावान्, श्रोत्रिय, ब्रह्म-निष्ठ, जो स्वयं अग्नि में होम करते हैं श्रद्धा से, ऐसे लोगों को ही यह ब्रह्म-विद्या सिखानी चाहिए, जिन्होंने शिरो-व्रत किया है।”’

आख़िरी दो मन्त्र: ‘यह विद्या केवल qualified लोगों को दें: क्रियावान्, श्रोत्रिय, ब्रह्म-निष्ठ, जिन्होंने शिरो-व्रत किया है।’

शिरो-व्रत = आग के बर्तन को सिर पर रखने का व्रत। यानी extreme commitment वाले।

‘नमः परम-ऋषिभ्यः।’ Twice repeated, finality। उपनिषद् बंद।

मन्त्र 3.2.11

तदेतत् सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच नैतदचीर्णव्रतोऽधीते ।
नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥
साधारण अनुवाद‘यह सत्य है, ऐसा ऋषि अंगिरस ने पहले कहा। जो शिरो-व्रत नहीं कर चुका, वो इसे न पढ़े। नमस्कार है परम ऋषियों को, नमस्कार है परम ऋषियों को।’

आख़िरी दो मन्त्र: ‘यह विद्या केवल qualified लोगों को दें: क्रियावान्, श्रोत्रिय, ब्रह्म-निष्ठ, जिन्होंने शिरो-व्रत किया है।’

शिरो-व्रत = आग के बर्तन को सिर पर रखने का व्रत। यानी extreme commitment वाले।

‘नमः परम-ऋषिभ्यः।’ Twice repeated, finality। उपनिषद् बंद।

सारएक वाक्य में: यह आत्मा प्रयास से नहीं, चुनाव से मिलती है। मगर बिना प्रयास के चुनाव भी नहीं। नदियाँ समुद्र में लौटती हैं, हम पुरुष में।