लुल्ला परिवारLulla Family
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उपनिषद्प्रश्न के भीतर का मौन

मुण्डक उपनिषद्: परा विद्या, दो पक्षी और सत्यमेव जयते

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अथर्ववेद · मुण्डक उपनिषद्
तीन मुण्डक, एक प्रश्न, और वह उत्तर जो कर्मकाण्ड की टपकती नावों से होता हुआ एक ही डाल पर बैठे दो पक्षियों तक पहुँचता है।

एक बड़ा गृहस्थ, जिसके घर में अन्न की कमी नहीं है, जिसके यहाँ यज्ञ की आग नियम से जलती है, जिसकी शाला में पढ़ने वाले लड़कों की गिनती लम्बी है, एक दिन चलकर अङ्गिरस के पास आता है। नाम शौनक। वह विधि के अनुसार पास बैठता है और एक ही वाक्य पूछता है। उस वाक्य में कोई शिकायत नहीं है, कोई दुख का किस्सा नहीं है, कोई मन्नत नहीं है। वह पूछता है, “कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति”, भगवन्, वह क्या है जिसे जान लेने पर यह सब जाना हुआ हो जाता है। मुण्डक उपनिषद् यहीं से खुलता है, और तीनों मुण्डकों तक इसी एक प्रश्न के पीछे चलता है।

यह उपनिषद् अथर्ववेद का है, और इसकी चाल बाक़ी उपनिषदों से थोड़ी अलग है। यहाँ गद्य कम है और छन्द ज़्यादा। तीन मुण्डक हैं, हर मुण्डक में दो खण्ड, कुल छह खण्ड, और पूरा पाठ पैंसठ मन्त्रों के आसपास निपट जाता है। इतनी छोटी जगह में यह बहुत बड़ा काम करता है। वह विद्या को दो हिस्सों में बाँटता है, यज्ञ के पूरे तन्त्र को नाप कर उसकी हद दिखाता है, अक्षर पुरुष का वर्णन करता है, ॐ को धनुष बनाता है, और अन्त में एक पेड़ पर बैठे दो पक्षियों की तस्वीर खींच कर बात पूरी करता है। बीच में वह एक पंक्ति छोड़ जाता है जिसे आज हर भारतीय पहचानता है, सत्यमेव जयते, बिना यह जाने कि वह यहीं की है।

इस उपनिषद् के मुख्य किरदार

ब्रह्मा: देवताओं में सबसे पहले हुए, विश्व के कर्ता और भुवन के रक्षक, जिन्होंने यह विद्या अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को कही

अथर्वा: ब्रह्मा के बड़े बेटे, जिनसे ब्रह्मविद्या अङ्गिर् तक पहुँची

अङ्गिर्: वह कड़ी जिन्होंने यह विद्या सत्यवाह भारद्वाज को सौंपी

सत्यवाह भारद्वाज: जिनसे यह विद्या अङ्गिरस तक आई, और परम्परा का पलड़ा सीधा रहा

अङ्गिरस: इस उपनिषद् के आचार्य, जो शौनक को परा और अपरा का भेद बताते हैं और अक्षर तक ले जाते हैं

शौनक: महाशाल गृहस्थ, जो विधिपूर्वक पास आकर वह प्रश्न पूछते हैं जिस पर पूरा पाठ टिका है

दो सुपर्ण: एक ही वृक्ष पर बैठे दो पक्षी, एक फल चखता हुआ, दूसरा बिना खाए देखता हुआ

ब्रह्मा से शौनक तक, और वह प्रश्न जिस पर सब टिका है

उपनिषद् अपनी बात एक वंशावली से शुरू करता है, और यह शुरुआत मामूली नहीं है। देवताओं में सबसे पहले ब्रह्मा हुए, जो इस विश्व के कर्ता हैं और भुवन के रक्षक। उन्होंने ब्रह्मविद्या को, जो सारी विद्याओं की नींव है, अपने सबसे बड़े बेटे अथर्वा को कहा। अथर्वा ने वही विद्या अङ्गिर् को सौंपी, अङ्गिर् ने सत्यवाह भारद्वाज को दी, और भारद्वाज ने अङ्गिरस को। पाँच नाम, चार हस्तान्तरण, और हर बार एक आदमी दूसरे आदमी के सामने बैठ कर बोलता है। यह विद्या आवाज़ से आवाज़ तक चलती है, और परम्परा ने हर कड़ी का नाम सँभाल कर रखा है।

इसी कड़ी के आख़िरी सिरे पर, अङ्गिरस के सामने, शौनक आकर बैठते हैं। पाठ उन्हें महाशाल कहता है, यानी बड़ी गृहस्थी वाला, बड़े घर वाला, वह आदमी जिसके यहाँ हवन की आग कभी ठण्डी नहीं पड़ती। वह विधि के अनुसार पास आते हैं, और पूछते हैं। उनके प्रश्न की बनावट में एक चतुराई है। वह किसी एक चीज़ के बारे में जानना नहीं चाहते। वह पूछते हैं कि ऐसा कौन सा एक है, जिसे जान लेने पर बाक़ी सब जानना बचता ही नहीं। जैसे कोई सुनार सोने को पहचान ले और हर गहना उसके लिए एक ही धातु के अलग-अलग नाम रह जाएँ।

अङ्गिरस उत्तर में कोई नाम नहीं उछालते। वे पहले ज्ञान को दो हिस्सों में काटते हैं। जो ब्रह्म को जानते हैं, वे कहते आए हैं कि जानने लायक़ दो विद्याएँ हैं, परा और अपरा। यह बँटवारा पूरे उपनिषद् की रीढ़ है। आगे जो कुछ आता है, वह इसी लकीर के दोनों तरफ़ खड़ा रहता है, और शौनक का प्रश्न इसी लकीर के पार वाली तरफ़ से उत्तर पाता है।

अपरा में क्या रखा गया है, यह सुनकर पहली बार में धक्का लगता है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, और उनके साथ छहों अङ्ग, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष। यानी उस ज़माने की पूरी पढ़ाई, वह सब कुछ जिसे सीखने में आदमी की आधी उम्र निकल जाती थी। यह पाठ ख़ुद अथर्ववेद का है, और वह अथर्ववेद को भी इसी पलड़े में रख देता है। इसमें वेदों की निन्दा कहीं नहीं है। इसमें उनकी हद बताई गई है, जैसे कोई सीढ़ी दिखा कर कह दे कि यह छत तक ले जाती है।

और परा की पहचान एक ही पंक्ति में निपटा दी जाती है, “अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते”, परा वह है जिससे उस अक्षर तक पहुँचा जाता है। बस इतना। परा विद्या की कोई सूची नहीं गिनाई जाती, कोई पाठ्यक्रम नहीं बताया जाता, कोई ग्रन्थ नहीं सुझाया जाता। उसकी पहचान उसके नतीजे से होती है। जिससे अक्षर मिल जाए, वही परा है। यह बहुत खुली बात है और बहुत सख़्त भी, क्योंकि अब कोई भी पढ़ाई अपने आप को परा नहीं कह सकती, जब तक वह वहाँ पहुँचा न दे।

अक्षर का वर्णन उपनिषद् नकारों की एक लड़ी से करता है। वह दिखाई नहीं देता, पकड़ में नहीं आता, उसका कोई गोत्र नहीं, कोई वर्ण नहीं। उसके आँख और कान नहीं, हाथ और पैर नहीं। वह नित्य है, सब जगह फैला हुआ, सबमें पहुँचा हुआ, बहुत सूक्ष्म, कभी न घटने वाला, और सब भूतों की योनि। धीर लोग उसे चारों ओर से देखते हैं। इस पूरे वर्णन में एक भी शब्द ऐसा नहीं है जो उसे किसी आकार में बाँधता हो, और फिर भी वर्णन पूरा लगता है, क्योंकि हर नकार कुछ हटा कर जगह खाली करता जाता है।

फिर तीन उपमाएँ आती हैं, और तीनों घर की हैं। “यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च”, जैसे मकड़ी अपना जाला बुनती है और फिर उसे अपने भीतर समेट लेती है। जैसे पृथ्वी पर ओषधियाँ अपने आप उग आती हैं, बिना किसी के बोए। जैसे जीते हुए आदमी की देह पर बाल उग आते हैं, बिना उसके किए। उसी तरह उस अक्षर से यह सारा विश्व निकलता है। तीनों उपमाओं में कारीगर और सामान अलग-अलग नहीं हैं। जाला मकड़ी का ही है, ओषधि पृथ्वी की ही है, बाल उसी देह के हैं।

आठवाँ मन्त्र सृष्टि की सीढ़ी उतारता है, और उसकी पहली सीढ़ी चौंकाने वाली है। तप से ब्रह्म का चयन होता है, उससे अन्न पैदा होता है, अन्न से प्राण, प्राण से मन, मन से सत्य, सत्य से लोक, और कर्मों में अमृत। तप यहाँ देह गलाने वाली साधना के अर्थ में लिया जाए तो बात अटक जाती है। शांकरभाष्य इसे ज्ञान के ताप की तरह पढ़ता है, और अगला मन्त्र उसी पढ़त को सहारा देता है, क्योंकि वह कहता है कि जो सर्वज्ञ है, सर्ववित् है, जिसका तप ज्ञानमय है, उसी से यह ब्रह्म नाम, रूप और अन्न के रूप में जन्म लेता है।

सार: शौनक एक ही प्रश्न लेकर आते हैं, वह कौन है जिसे जान लेने पर सब जाना हुआ हो जाए। अङ्गिरस उत्तर देने से पहले ज्ञान को परा और अपरा में बाँट देते हैं, और चारों वेद तक अपरा के पलड़े में रख देते हैं। परा की पहचान सिर्फ़ इतनी है कि उससे अक्षर तक पहुँचा जाता है, और वह अक्षर मकड़ी के जाले की तरह इस जगत् को अपने ही भीतर से निकालता है।

टपकती नावें, सात लपटें, और समिधा लेकर चला हुआ आदमी

दूसरा खण्ड एक झटके से शुरू होता है। अभी-अभी वेदों को अपरा कहा गया था, और अब वही उपनिषद् कहता है कि यह जो कर्म है, यह सत्य है। जिन कर्मों को कवियों ने मन्त्रों में देखा, वे त्रेता में बहुत तरह से फैले हुए हैं। सत्य की कामना रखने वालों को उन्हें नियम से करना चाहिए, यही सुकृत के लोक तक जाने वाला रास्ता है। यज्ञ को झूठ कहीं नहीं कहा गया। उसे उसकी जगह दी जा रही है, और वह जगह असली है, नापी हुई है, और आगे उसी नाप से उसकी सीमा भी निकलेगी।

फिर पाठ इतना बारीक हो जाता है कि हवन की आग का रंग दिखने लगता है। जब हव्यवाहन अच्छी तरह जल उठे और लपट लपलपाने लगे, तभी दोनों आज्यभागों के बीच आहुतियाँ डाली जाएँ। यह निर्देश उस आदमी की भाषा में है जो ख़ुद आग के सामने बैठता है। और इसी भाषा में अगला मन्त्र चेतावनी देता है। जिसका अग्निहोत्र दर्श से रहित हो, पौर्णमास से रहित, चातुर्मास्य से रहित, आग्रयण से रहित, अतिथि से वंचित, बिना आहुति का, बिना वैश्वदेव का, और विधि के विरुद्ध हवन किया हुआ, उसके सातों लोकों तक को वह चोट पहुँचाता है।

इसके बाद आग की सात जिह्वाओं के नाम आते हैं, और नाम ऐसे हैं जैसे किसी ने लपटों को देख कर उन्हें पुकारा हो। काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी और विश्वरुची। उपनिषद् इन्हें लेलायमाना कहता है, लपलपाती हुई। जो इन चमकती लपटों में समय पर चलता है, और आहुतियाँ जिसे ठीक समय पर उठा लेती हैं, उसे ये सूर्य की किरणें वहाँ ले जाती हैं जहाँ देवताओं का पति अकेला बसता है।

वह ले जाना भी बहुत सुन्दर लिखा गया है। आहुतियाँ ख़ुद तेजस्वी हो जाती हैं और यजमान को सूरज की किरणों पर बिठा कर ले चलती हैं। रास्ते भर वे उससे प्यारी बात करती हैं, उसका अर्चन करती हैं, और कहती हैं, आइए, आइए। यह आपका पुण्य है, आपके सुकृत से बना हुआ ब्रह्मलोक है। इससे मीठा चित्र यज्ञ के फल का शायद ही कहीं मिले। और ठीक इसी मिठास के बाद उपनिषद् चाकू चलाता है।

“प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा”, ये जो यज्ञरूप हैं, ये नावें हैं और कच्ची हैं। जिनमें अठारह अङ्गों वाला घटिया कर्म कहा गया है, शांकरभाष्य इस अठारह की गिनती सोलह ऋत्विज्, यजमान और उसकी पत्नी से पूरी करता है। जो मूढ़ इन नावों को ही सबसे बड़ा कल्याण मानकर उन पर ख़ुश होते हैं, वे बुढ़ापे और मौत तक फिर से पहुँच जाते हैं। ब्रह्मलोक तक पहुँचा देने वाली वही किरणें एक दिन उतार भी देती हैं, क्योंकि जो किए हुए से बना है, वह किए हुए की उमर तक ही टिकता है।

इसके आगे की तीन पंक्तियाँ इस उपनिषद् की सबसे तीखी पंक्तियाँ हैं। अविद्या के भीतर रहते हुए अपने आप को धीर और पण्डित मानने वाले लोग ठोकरें खाते हुए घूमते हैं, “अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः”, जैसे अन्धों को कोई अन्धा ही रास्ता दिखा रहा हो। अविद्या में बहुत तरह से बरतते हुए बच्चे समझते हैं कि हमने काम पूरा कर लिया। कर्म करने वाले राग के कारण जान नहीं पाते, इसलिए दुखी होते हैं और लोक चुक जाने पर गिर जाते हैं।

इष्टापूर्त को, यानी यज्ञ और कुआँ बावड़ी जैसे पुण्य कामों को, सबसे बड़ा मानने वाले किसी और कल्याण को पहचानते ही नहीं। वे नाक के पृष्ठ पर, यानी स्वर्ग की पीठ पर, अपने सुकृत का फल भोग लेते हैं, और फिर इसी लोक में लौट आते हैं या किसी हीनतर लोक में उतर जाते हैं। जो तप और श्रद्धा लेकर अरण्य में रहते हैं, शान्त हैं, विद्वान् हैं, भिक्षा माँग कर चलते हैं, वे सूर्य के द्वार से निर्मल होकर वहाँ जाते हैं जहाँ वह अमृत पुरुष है, जिसका आत्मा कभी घटता नहीं।

और तब वह मन्त्र आता है जो इस पूरे खण्ड का नतीजा है। कर्म से जोड़े हुए लोकों को परख कर ब्राह्मण को निर्वेद तक पहुँचना चाहिए, यह देख कर कि जो बनाया नहीं गया, वह बनाने से नहीं मिलता। उसे जानने के लिए, “तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्”, वह हाथ में समिधा लेकर गुरु के पास जाए, ऐसे गुरु के पास जो श्रोत्रिय हो और ब्रह्म में ठहरा हुआ हो। और उस विद्वान् ने भी, विधिपूर्वक पास आए हुए, प्रशान्त चित्त वाले, शम से भरे शिष्य को वह ब्रह्मविद्या तत्त्वतः कही, जिससे अक्षर पुरुष को, उस सत्य को, जाना जाता है।

सार: यह खण्ड यज्ञ को पूरी इज़्ज़त देता है, उसकी सात लपटों के नाम तक गिनाता है, और सूरज की किरणों पर होने वाली सवारी का चित्र खींचता है। फिर वह उसी नाव को कच्ची कह देता है। जो किए हुए से बना है, वह चुक जाता है, इसलिए परखने वाला आदमी एक दिन समिधा हाथ में लेकर ऐसे गुरु के पास चल पड़ता है जो ब्रह्म में ठहरा हो।

आग से उड़ती चिनगारियाँ, और वह पुरुष जिसकी देह यह जगत् है

दूसरा मुण्डक उसी शब्द से शुरू होता है जिससे पहले मुण्डक का दूसरा खण्ड शुरू हुआ था, यह सत्य है। पर इस बार उसके पीछे एक उपमा खड़ी है। “यथा सुदीप्तात् पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः”, जैसे ख़ूब धधकती आग से हज़ारों चिनगारियाँ उठती हैं और सब आग जैसी ही होती हैं, उसी तरह उस अक्षर से तरह-तरह के भाव पैदा होते हैं, सोम्य, और वहीं लौट भी जाते हैं। यह उपमा मकड़ी वाली उपमा से एक क़दम आगे जाती है, क्योंकि यहाँ निकली हुई चीज़ अपने स्रोत का रूप भी लिए हुए है।

उस पुरुष का परिचय इसके बाद आता है और वह किसी मूर्ति की तरह नहीं गढ़ा जाता। वह दिव्य है, अमूर्त है, बाहर भी है और भीतर भी, अजन्मा है। उसके प्राण नहीं, मन नहीं, वह शुभ्र है, और उस अक्षर से भी परे का परे है। यही वाक्य इस उपनिषद् की गहराई खोल देता है, क्योंकि अभी-अभी जिस अक्षर से विश्व निकला था, उससे भी आगे एक स्तर की बात यहाँ हो रही है, और उस आगे को भी उसी एक पुरुष की तरह कहा जा रहा है।

इसी से प्राण जन्मता है, मन जन्मता है, सारी इन्द्रियाँ जन्मती हैं। इसी से आकाश, वायु, ज्योति, जल और यह पृथ्वी जो सबको थामे रहती है। और फिर वह विराट चित्र आता है जिसे बाद की सारी भक्ति ने दोहराया। अग्नि उसका सिर है, चन्द्रमा और सूरज उसकी दो आँखें, दिशाएँ उसके कान, खुले हुए वेद उसकी वाणी, वायु उसका प्राण, यह सारा विश्व उसका हृदय, और उसके पैरों से यह पृथ्वी निकली। वही सब भूतों के भीतर बैठा आत्मा है।

इसके बाद उपनिषद् एक लम्बी सूची चलाता है, और सूची पढ़ते-पढ़ते यह समझ में आने लगता है कि वह क्या कर रहा है। उसी से वह अग्नि है जिसकी समिधा सूरज है। सोम से बादल, बादल से पृथ्वी की ओषधियाँ, और पुरुष स्त्री में बीज सींचता है, इस तरह उसी पुरुष से बहुत सारी सन्तानें फैलती हैं। उसी से ऋचाएँ, साम, यजुः, दीक्षा, सारे यज्ञ, सारे क्रतु, सारी दक्षिणाएँ, संवत्सर, यजमान, और वे लोक जहाँ सोम बहता है और जहाँ सूरज चलता है।

उसी से देवता बहुत तरह से फैले, साध्य, मनुष्य, पशु, पक्षी। उसी से प्राण और अपान, धान और जौ, तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य और विधि। ध्यान दीजिए कि इस गिनती में अनाज और श्रद्धा एक ही साँस में आ रहे हैं। उपनिषद् खाने की चीज़ और भीतर के भाव के बीच कोई दीवार नहीं खींचता, क्योंकि दोनों एक ही स्रोत से आ रहे हैं और एक ही जगह लौटेंगे।

फिर सात की लय पकड़ में आती है। सात प्राण उसी से निकलते हैं, सात अर्चियाँ, सात समिधाएँ, सात होम, और वे सात लोक जिनमें प्राण चलते हैं। गुहा में रखे हुए सात और सात। इसी तरह उसी से समुद्र और पहाड़, उसी से सब रूपों वाली नदियाँ बहती हैं, उसी से सारी ओषधियाँ और रस, जिनसे यह भीतर बैठा आत्मा भूतों के साथ ठहरा रहता है।

और खण्ड का आख़िरी मन्त्र पूरी सूची को एक मुट्ठी में बाँध देता है। यह सारा विश्व पुरुष ही है, कर्म भी वही, तप भी वही, ब्रह्म भी वही, और परम अमृत भी वही। जो इसे हृदय की गुफा में रखा हुआ जान लेता है, सोम्य, वह अविद्या की गाँठ यहीं बिखेर देता है। ग्रन्थि का यह शब्द यहाँ पहली बार आता है, और दूसरे मुण्डक के अगले खण्ड में यही शब्द फिर लौटेगा, इस बार हृदय के नाम के साथ।

सार: दूसरा मुण्डक अक्षर से निकले जगत् को चिनगारियों की तरह दिखाता है, हर चिनगारी अपने स्रोत के रूप की। फिर वह पुरुष का विराट चित्र खींचता है, जिसमें अग्नि सिर है और दिशाएँ कान। सूची में अनाज और श्रद्धा एक साथ आते हैं, और खण्ड यह कह कर बन्द होता है कि इसे गुफा में रखा हुआ जान लेने से अविद्या की गाँठ यहीं बिखर जाती है।

प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है, और गाँठ हृदय में है

यह खण्ड बहुत पास से शुरू होता है। वह प्रकट है, वह बिलकुल सटा हुआ है, वह गुहा में चलता है, और उसका नाम महत् पद है। जो कुछ हिलता है, जो साँस लेता है, जो पलक झपकाता है, वह सब उसी में अर्पित है। उसे जानिए, क्योंकि वही सत् और असत् दोनों से बढ़ कर वरेण्य है, विज्ञान से परे है, और प्रजा में सबसे श्रेष्ठ है। शुरुआत में ही दूरी ख़त्म कर दी गई है, और यही इस खण्ड का स्वर है।

अगला मन्त्र उस पर एक और परत चढ़ाता है। जो अर्चिमान् है, जो अणु से भी अणु है, जिसमें लोक टिके हैं और लोक में रहने वाले भी, वही यह अक्षर ब्रह्म है, वही प्राण है, वही वाणी और मन है। वही सत्य है, वही अमृत है। और फिर आचार्य की आवाज़ बदल जाती है, क्योंकि वे कहते हैं कि वही बेधने योग्य है, सोम्य, उसे बेधिए। बात समझने से निशाना लगाने की तरफ़ मुड़ चुकी है।

इसके बाद वह उपमा आती है जिसके लिए यह उपनिषद् याद किया जाता है। उपनिषद् का महास्त्र, यह धनुष उठाइए। उपासना से घिसा हुआ तेज़ बाण उस पर चढ़ाइए। जिस भाव में वह है, उसी भाव में डूबे चित्त से प्रत्यंचा खींचिए, और लक्ष्य वही अक्षर है। फिर वह उपमा को खोल कर रख देता है, “प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते”, ॐ धनुष है, आत्मा बाण है, ब्रह्म को लक्ष्य कहा जाता है। बिना चूके बेधना है, और बाण की तरह उसी में तन्मय हो जाना है।

इस उपमा की जान उसके आख़िरी हिस्से में है। तीरन्दाज़ी में बाण निशाने से टकरा कर गिर जाता है, यहाँ बाण निशाने में समा जाता है। जो चलाया गया था, वही पहुँच कर वही हो जाता है जहाँ पहुँचा। इसीलिए उपासना को यहाँ बाण घिसने का काम कहा गया है, कोई अलग आराधना नहीं। और धनुष को ॐ कहना इस बात का इशारा है कि वह अक्षर वही ज़ोर है जो साधक को निशाने की तरफ़ छोड़ता है।

आगे वह फिर चौड़ा हो जाता है। जिसमें आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष बुने हुए हैं, और मन भी, सारे प्राणों के साथ, उस एक आत्मा को जान लीजिए और बाक़ी वाणियाँ छोड़ दीजिए, यही अमृत का पुल है। जहाँ रथ की नाभि में अरे जुड़े रहते हैं, वैसे ही जहाँ नाड़ियाँ मिलती हैं, वह वहीं भीतर बहुत तरह से जन्मता हुआ चलता है। ॐ इस तरह आत्मा का ध्यान कीजिए, और अन्धकार के पार उतरने के लिए आपका कल्याण हो।

फिर वह आत्मा जहाँ रहता है, उसका पता दिया जाता है। जो सर्वज्ञ है, सर्ववित् है, जिसकी महिमा इस पृथ्वी पर फैली है, वह दिव्य ब्रह्मपुर के भीतर, आकाश में प्रतिष्ठित है। वह मनोमय है, प्राण और शरीर का नेता, अन्न में ठहरा हुआ, हृदय में अपने को रखे हुए। धीर लोग उसे विज्ञान से चारों ओर देखते हैं, आनन्दरूप, अमृत, जो चमकता रहता है। ब्रह्मपुर शब्द इस देह को नगर कह रहा है, और उस नगर के बीचोंबीच एक सूना कमरा है जिसमें वह बैठा है।

और फिर वह पंक्ति आती है जो पूरे वेदान्त में मुक्ति की परिभाषा बन गई। “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः”, हृदय की गाँठ टूट जाती है, सारे संशय कट जाते हैं, और उसके कर्म क्षीण हो जाते हैं, जब वह देख लिया जाता है जो पर भी है और अवर भी। उस सोने जैसे ऊपरी कोश में वह निर्मल ब्रह्म है, बिना किसी हिस्से के। वहाँ सूरज नहीं चमकता, न चाँद और तारे, न ये बिजलियाँ चमकती हैं, फिर यह आग कहाँ से। उसी के चमकने के पीछे सब चमकता है, उसी की आभा से यह सब दिख रहा है। और अन्त में चारों दिशाएँ नाप कर वह कहता है कि आगे भी ब्रह्म, पीछे भी ब्रह्म, दक्षिण में भी, उत्तर में भी, नीचे और ऊपर भी, यह सारा विश्व वही है।

सार: यह खण्ड दूरी मिटा कर शुरू होता है और निशाने पर ख़त्म। ॐ धनुष है, आत्मा बाण है, ब्रह्म लक्ष्य है, और बाण को निशाने में समा जाना है। जब वह दिख जाता है तो हृदय की गाँठ टूटती है, संशय कटते हैं, कर्म क्षीण होते हैं। और जिस रोशनी से सूरज भी उधार लेता है, वही चारों दिशाओं में फैली हुई है।

एक ही डाल पर दो पक्षी, और सत्य का वह रास्ता जो देवयान कहलाता है

तीसरा मुण्डक एक तस्वीर से खुलता है, और वह तस्वीर इतनी साफ़ है कि सुनने वाला उसे आँख बन्द किए बिना देख लेता है। “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते”, दो सुन्दर पंखों वाले पक्षी, साथ जुड़े हुए, आपस में सखा, एक ही पेड़ से लिपटे हुए बैठे हैं। उनमें से एक पीपल का मीठा फल चख रहा है। दूसरा कुछ नहीं खाता, बस देखता रहता है। इतना ही कहा गया है, और इसी में सारा वेदान्त रख दिया गया है।

अगला मन्त्र तस्वीर के भीतर घुस जाता है। उसी पेड़ पर वह पुरुष डूबा हुआ है, अपने बेबस होने से शोक करता है, मोह में पड़ा रहता है। जब वह उस दूसरे को देख लेता है, उस ईश को, जिसका सेवन किया जाता है, और उसकी महिमा देख लेता है, तब उसका शोक चला जाता है। ध्यान दीजिए कि इसमें पेड़ नहीं बदलता, फल नहीं बदलता, बैठना नहीं बदलता। सिर्फ़ नज़र उठती है, और शोक का बोझ उतर जाता है।

तीसरा मन्त्र इसी देखने का नतीजा बताता है। जब देखने वाला उस सुनहरे रंग वाले को देखता है, जो कर्ता है, ईश है, पुरुष है, ब्रह्म की योनि है, तब वह विद्वान् पुण्य और पाप दोनों को झाड़ देता है और निरञ्जन होकर परम साम्य तक पहुँच जाता है। पुण्य को भी झाड़ना पड़ता है, यह बात इस पाठ में पहले कही जा चुकी है, जब कच्ची नावों की बात हुई थी। यहाँ वही बात एक आदमी के भीतर घटती हुई दिखाई जा रही है।

फिर एक पंक्ति आती है जो ब्रह्मज्ञानी की पहचान बता देती है, और वह पहचान बहुत मामूली शक्ल में आती है। वह प्राण जो सब भूतों में चमक रहा है, उसे जानने वाला विद्वान् अतिवादी नहीं होता। यानी वह बहस में जीतने के लिए बोलने वाला आदमी नहीं रह जाता। वह आत्मा में खेलता है, आत्मा में रमता है, और फिर भी क्रिया करता रहता है। ब्रह्म को जानने वालों में यही सबसे श्रेष्ठ है। चुप्पी और काम, दोनों उसी एक आदमी में बैठे रहते हैं।

अगला मन्त्र क़ीमत बताता है। यह आत्मा सत्य से मिलता है, तप से मिलता है, सम्यक् ज्ञान से मिलता है, और नित्य ब्रह्मचर्य से मिलता है। वह शरीर के भीतर ज्योति से भरा हुआ, शुभ्र बैठा है, और जिन यतियों के दोष क्षीण हो गए हैं, वे उसे देखते हैं। चार शब्द, और चारों का भार अलग है। सत्य आचरण का है, तप सहने का, सम्यक् ज्ञान समझ का, और ब्रह्मचर्य शक्ति बचाने का। इन्हीं चार पायों पर अगला मन्त्र खड़ा होता है।

“सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः”, सत्य ही जीतता है, झूठ नहीं, और सत्य से ही वह रास्ता बिछा हुआ है जिसे देवयान कहते हैं। जिस पर चढ़ कर वे ऋषि जाते हैं जिनकी कामनाएँ पूरी हो चुकी हैं, और जहाँ सत्य का परम निधान रखा हुआ है। यह पंक्ति आज भारत के राजचिह्न के नीचे देवनागरी में लिखी रहती है, सारनाथ की सिंह-मूर्ति के आधार पर, और करोड़ों लोग उसे पढ़ते हैं। यहाँ अपनी जगह पर वह पिछले मन्त्र के सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान और ब्रह्मचर्य के बीच से निकला हुआ वाक्य है, और जिस जीत की वह बात कर रहा है, वह एक सड़क का नाम है, देवयान, जिस पर पूरी हुई कामनाओं वाले लोग चलते हैं।

इसके बाद वह उस निधान का वर्णन करता है। वह बड़ा है, दिव्य है, उसका रूप सोचा नहीं जा सकता, वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर होकर चमकता है। वह दूर से भी दूर है और यहीं, बिलकुल पास भी। देखने वालों के लिए वह यहीं गुफा में रखा हुआ है। और पकड़ने के सारे औज़ार एक-एक कर के छीन लिए जाते हैं। न आँख से पकड़ में आता है, न वाणी से, न दूसरे देवों से, न तप से, न कर्म से। ज्ञान के प्रसाद से जिसका सत्त्व विशुद्ध हो गया हो, वही ध्यान करते हुए उस निष्कल को देख पाता है।

खण्ड का अन्त फिर भीतर की तरफ़ मुड़ता है। यह अणु जैसा आत्मा चित्त से जानने योग्य है, जिसमें प्राण पाँच तरह से घुसा हुआ है। प्राणों के साथ सारी प्रजा का चित्त बुना हुआ है, और चित्त के विशुद्ध होने पर यह आत्मा प्रकट हो जाता है। जिस-जिस लोक की वह विशुद्ध सत्त्व वाला मन से कामना करता है, और जिन-जिन कामनाओं की, वह वही लोक जीत लेता है और वही कामनाएँ। इसीलिए जिसे ऐश्वर्य चाहिए, वह आत्मा को जानने वाले का अर्चन करे।

सार: एक ही डाल पर दो पक्षी, एक फल में डूबा हुआ, दूसरा देखता हुआ। पेड़ वही रहता है, सिर्फ़ नज़र उठती है और शोक उतर जाता है। सत्यमेव जयते इसी सिलसिले में आता है, सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान और ब्रह्मचर्य के ठीक बाद, और जिस जीत की बात है वह देवयान नाम की सड़क है। उस तक पहुँचने का एक ही रास्ता बचता है, ज्ञान के प्रसाद से निर्मल हुआ चित्त।

जिसे वह चुन ले, और नदियाँ जो समुद्र में नाम खो देती हैं

आख़िरी खण्ड उस आदमी से शुरू होता है जो जान चुका है। वह उस परम ब्रह्मधाम को जानता है जहाँ यह सारा विश्व रखा हुआ शुभ्र चमकता है। जो लोग कामना छोड़ कर उस पुरुष की उपासना करते हैं, वे धीर इस शुक्र को, इस बीज को, पार कर जाते हैं। और इसके ठीक उलट वाली बात अगले मन्त्र में आती है। जो कामनाओं की कामना करता है और उन्हीं में अपने को मानता रहता है, वह उन्हीं कामनाओं के पीछे वहाँ-वहाँ जन्म लेता रहता है।

पर जिसकी कामना पूरी हो चुकी है और जिसका आत्मा बन चुका है, उसकी सारी कामनाएँ यहीं, इसी जन्म में, विलीन हो जाती हैं। यह वाक्य इस उपनिषद् की बड़ी करुणा है। मुक्ति को कहीं आगे, किसी और लोक में, मरने के बाद नहीं टाला जा रहा। कामनाएँ यहीं बुझ जाती हैं, इसी शरीर में, इसी दुनिया के बीच, और आदमी वहीं खड़ा रहता है जहाँ वह था।

फिर वह मन्त्र आता है जिसने साधना की सारी अकड़ तोड़ दी। “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन”, यह आत्मा प्रवचन से नहीं मिलता, न तेज़ बुद्धि से, न बहुत सुन लेने से। जिसे यह ख़ुद चुन लेता है, उसी को यह मिलता है, और उसी के सामने यह आत्मा अपना रूप खोल देता है। सीखने की सारी सीढ़ियाँ एक झटके में किनारे रख दी जाती हैं, और चुनाव उस तरफ़ से आता हुआ बताया जाता है।

पर यहीं ढील दे देना उपनिषद् को मंज़ूर नहीं। अगला ही मन्त्र कहता है कि यह आत्मा बलहीन आदमी को नहीं मिलता, न प्रमाद से मिलता है, न ऐसे तप से जिसका कोई चिह्न ही न हो। जो विद्वान् इन उपायों से यत्न करता है, उसी का यह आत्मा ब्रह्मधाम में प्रवेश करता है। दोनों मन्त्र साथ पढ़े जाएँ तो बात बनती है। यत्न पूरा करना हमारा काम है, और खुलना उसकी तरफ़ से होता है।

इसके बाद पहुँचे हुए लोगों का एक छोटा सा चित्र है। उसे पाकर ऋषि ज्ञान से तृप्त हो जाते हैं, उनका आत्मा बन चुका होता है, उनका राग जा चुका होता है, वे शान्त हैं। वे धीर उस सर्वगत को सब ओर से पाकर, अपने को जोड़े हुए, सब में प्रवेश कर जाते हैं। और जिन यतियों ने वेदान्त के विज्ञान से अर्थ को अच्छी तरह निश्चित कर लिया है, संन्यास के योग से जिनका सत्त्व शुद्ध हो गया है, वे ब्रह्मलोकों में अन्तिम समय पर परम अमृत होकर सब ओर से मुक्त हो जाते हैं।

फिर वह बिखरने का दृश्य आता है। पन्द्रह कलाएँ अपनी-अपनी प्रतिष्ठा में लौट जाती हैं, सारे देव अपनी-अपनी देवताओं में, कर्म और विज्ञानमय आत्मा, ये सब उस पर अव्यय में एक हो जाते हैं। और इसे समझाने के लिए वह उपमा आती है जिसे बाद में सब ने दोहराया। जैसे बहती हुई नदियाँ समुद्र में पहुँच कर नाम और रूप छोड़ कर अस्त हो जाती हैं, वैसे ही विद्वान् नाम और रूप से छूट कर उस दिव्य पुरुष तक पहुँचता है जो पर से भी पर है।

और तब शौनक के प्रश्न का उत्तर पूरी गोलाई में लौट आता है। जो उस परम ब्रह्म को जान लेता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है। उसके कुल में कोई ऐसा नहीं होता जो ब्रह्म को न जानता हो। वह शोक के पार उतर जाता है, पाप के पार उतर जाता है, और हृदय की गुफा की गाँठों से छूट कर अमृत हो जाता है। जिस “जान लेने पर सब जाना हुआ हो जाता है” की बात पहले मन्त्र में शुरू हुई थी, वह यहाँ जानने वाले के ब्रह्म हो जाने पर आकर ठहरती है।

आख़िर में उपनिषद् एक शर्त रखता है, और यह शर्त इसका आख़िरी स्वर है। यह ब्रह्मविद्या उन्हीं से कहनी चाहिए जो क्रियावान् हों, श्रोत्रिय हों, ब्रह्म में ठहरे हों, जो ख़ुद श्रद्धा से एकर्षि अग्नि में आहुति देते हों, और जिन्होंने शिरोव्रत विधिपूर्वक पूरा किया हो। जिसने वह व्रत नहीं किया, वह इसे पढ़ता नहीं। शांकरभाष्य इस शिरोव्रत को अथर्ववेद की उस परम्परा से जोड़ता है जिसमें सिर पर अग्नि धारण की जाती है, और इसी व्रत से इस उपनिषद् का नाम भी जुड़ा हुआ माना जाता है। यह सत्य ऋषि अङ्गिरा ने पहले कहा था। परम ऋषियों को नमस्कार, परम ऋषियों को नमस्कार। इसी दोहराए हुए नमस्कार पर यह उपनिषद् पूरा होता है।

सार: आख़िरी खण्ड कहता है कि आत्मा प्रवचन, बुद्धि या बहुत सुनने से हाथ नहीं आता, और साथ ही यह भी कि बलहीन और प्रमादी को वह नहीं मिलता। यत्न हमारा है, खुलना उसका। नदियाँ समुद्र में नाम छोड़ देती हैं, और जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है। पाठ एक शर्त और दो बार दोहराए गए नमस्कार पर बन्द होता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस उपनिषद् की सबसे काम की चीज़ शायद उसका पहला ही वाक्य है। शौनक ने यह नहीं पूछा कि मुझे क्या मिलेगा। उन्होंने पूछा कि ऐसा क्या है जिसे जान लेने पर बाक़ी सब सुलझ जाए। हमारे दिन इसके उलट चलते हैं। हम एक-एक चीज़ का हल ढूँढ़ते हैं, एक-एक सवाल अलग से निपटाते हैं, और सूची कभी ख़त्म नहीं होती। शौनक का ढंग यह है कि सूची के नीचे जाकर देखा जाए कि इन सबका एक ही जड़ है या नहीं। यह सवाल पूछने में कुछ नहीं लगता, और यह पूछते ही दिन की शक्ल बदल जाती है।

दूसरी काम की चीज़ वे कच्ची नावें हैं। उपनिषद् यज्ञ की बुराई करके उसे गिराता नहीं। वह उसकी बनावट दिखा देता है कि जो किए हुए से बनता है, वह किए हुए की उमर तक चलता है। हमारी अपनी नावें भी ऐसी ही हैं, नौकरी की सीढ़ी, बचत का हिसाब, तारीफ़ का भरोसा, वह सब जो हमने जोड़ा है। इनमें बैठना ग़लत नहीं है, ये कुछ दूर तक ले भी जाती हैं। बस यह जान लेना कि इनमें पानी आता है, आदमी को उस दिन के लिए तैयार रखता है जिस दिन किनारा बदलना पड़ता है।

और आख़िर में वे दो पक्षी। वह तस्वीर हम सबकी है। भीतर एक हिस्सा फल में लगा हुआ है, स्वाद में, हिसाब में, अगली चीज़ में। और उसी डाल पर एक हिस्सा चुपचाप देख रहा है, बिना खाए, बिना उलझे। उपनिषद् किसी से खाना छोड़ने को नहीं कहता। वह इतना कहता है कि जो देख रहा है, उसकी तरफ़ एक बार नज़र उठा लीजिए। शोक उसी नज़र से उतरता है, और सत्यमेव जयते की वह पंक्ति पैरों के नीचे बिछी हुई सड़क की तरह लगने लगती है।

आधार: मुण्डक उपनिषद्, तीनों मुण्डक, खण्ड 1.1 से 3.2; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।