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मुण्डक उपनिषद्

अथर्व वेद · उपनिषद्
दो तरह का जानना, दो पंछी एक डाल पर, और वह सत्य जो हमेशा जीतता है।
In the great sacrificial pavilion of Naimisharanya, the householder-sage Shaunaka bows with folded hands before the seated rishi Angiras, the blazing homa fire and chanting priests behind them, asking the one question that knows all.

नैमिषारण्य के विशाल यज्ञ-मण्डप में होम की अग्नि धधक रही है, ऋत्विज (यज्ञ कराने वाले पुरोहित) मन्त्र पढ़ रहे हैं, और मण्डप के दूसरी ओर ऋषियों की सभा विद्या-चर्चा में बैठी है। वहीं से शौनक नाम के एक बड़े गृहस्थ उठते हैं। ये कोई साधारण जिज्ञासु नहीं, इन्हें शौनक महाशाल कहा जाता है (महाशाल अर्थात् जिसकी यज्ञशाला कोसों तक फैली हो), क्योंकि इन्होंने सैकड़ों यज्ञ संपन्न किए हैं। इतना सब करने के बाद भी मन में एक काँटा बाकी है। विधिपूर्वक, सिर झुकाकर, ये अंगिरस ऋषि के पास जाते हैं (वही अंगिरस, जिन तक यह विद्या ब्रह्मा से आरंभ होकर अथर्वा, अंगि और भारद्वाज की परम्परा से उतरी है) और एक ही प्रश्न रखते हैं, जिसे स्वामी कृष्णानन्द एक अलौकिक प्रश्न कहते हैं: “हे भगवन्, वह कौन-सी वस्तु है, जिसे जान लेने पर यह सब कुछ अपने-आप जान लिया जाता है?” तर्क का नियम तो कहता है कि एक चीज़ जान लेने से दूसरी नहीं जानी जाती, फिर भी शौनक उसी एक मूल को खोज रहे हैं जिससे सारा ज्ञान फूट पड़े।

इसी प्रश्न और उसके उत्तर से यह उपनिषद् खुलता है, जो अथर्व वेद से आता है। इसका नाम मुण्डक है, और यह नाम ही इसका स्वभाव बता देता है: जैसे संन्यासी सिर मुँडाकर भीतर-बाहर का सारा कूड़ा काट देता है, वैसे ही यह उपनिषद् हमारी भ्रांतियों को मूल से काट डालता है। अंगिरस का उत्तर इसका ढाँचा बन जाता है: जानने योग्य दो विद्याएँ हैं, परा (उच्चतर, उस अक्षर ब्रह्म का ज्ञान) और अपरा (निम्नतर, जगत का ज्ञान)। स्वामी कृष्णानन्द यहाँ चौंकाने वाली बात कहते हैं कि चारों वेद और उनके छह अंग तक अपरा विद्या ही गिने गए हैं; और वे इसे समझाते हुए कहते हैं कि अपरा विद्या शरीर के पैरों जैसी है, पैर आत्मा के लिए अनिवार्य नहीं, फिर भी देह के लिए आवश्यक हैं। इसी भेद की नींव पर आगे यज्ञ-कर्म की सीमा, एक ही वृक्ष पर बैठे दो पंछियों का प्रसिद्ध रूपक, और “सत्यमेव जयते” (सत्य की ही जय होती है) का उद्घोष खड़ा होता है।

इस उपनिषद् के मुख्य किरदार

शौनक: एक बड़े गृहस्थ, जो विधिपूर्वक अंगिरस के पास गए और पूछा, वह क्या है जिसे जान लेने पर सब जान लिया जाता है।

अंगिरस: वह आचार्य जिन्होंने परा और अपरा विद्या का भेद खोलकर शौनक को ब्रह्म की ओर मोड़ा।

दो तरह का ज्ञान

परा और अपरा: दो तरह का जानना

घटना किसी आश्रम की है, जहाँ ज्ञान की एक लम्बी कड़ी पीढ़ी-दर-पीढ़ी सौंपी जाती रही है। मुण्डक उपनिषद् पहले यही कड़ी गिनाता है। ब्रह्मविद्या (वह विद्या जिसका विषय ब्रह्म है, यानी सबका मूल) आदि में स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्व को दी, फिर वह अंगि से सत्यवाह तक और अन्त में अंगिरस ऋषि तक पहुँची। अब उन्हीं अंगिरस के पास एक बड़े यज्ञकर्ता, शौनक महाशय, पूरे आदर के साथ आते हैं और एक ही सवाल रखते हैं, “हे भगवन्, वह कौन सी एक चीज़ है, जिसे जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है?”

स्वामी कृष्णानन्द इस सवाल को बहुत बारीकी से पकड़ते हैं। उनके अनुसार आम तौर पर एक चीज़ को जानने से दूसरी चीज़ नहीं जानी जाती; हर जानकारी अलग-अलग और टुकड़ों में बँटी रहती है। तो फिर एक को जानने से सब कैसे जाना जाए? वे कहते हैं कि इसका मतलब यही हो सकता है कि सब कुछ उसी एक तत्त्व का बना हुआ है। ब्रह्मविद्या ऐसा ज्ञान है जो बाक़ी ज्ञानों को बाहर नहीं रखता, उन सबको अपने भीतर पिघला लेता है। यह बौद्धिक जानकारी की तरह बँटा हुआ नहीं होता; यह वह अखण्ड अनुभव है जिसमें जानने वाले और जाने जाने वाले का सार आपस में एक हो जाता है।

शौनक के सवाल के जवाब में अंगिरस ऋषि दो विद्याएँ बताते हैं। वे कहते हैं कि दो तरह का ज्ञान पाने योग्य है, ऐसा ब्रह्म को जानने वालों ने घोषित किया है, एक अपरा (निचली विद्या) और एक परा (ऊँची विद्या)। निचली विद्या में चारों वेद (ऋग्, यजुर्, साम और अथर्व) के साथ-साथ शिक्षा (उच्चारण का शास्त्र), कल्प (कर्मकाण्ड की विधि), व्याकरण, निरुक्त (शब्दों की व्युत्पत्ति), छन्द (पिंगल) और ज्योतिष आते हैं। और परा विद्या वह है जिसके द्वारा वह अक्षर (जो कभी क्षीण न हो, अविनाशी ब्रह्म) पाया जाता है।

यहाँ स्वामी कृष्णानन्द एक सुन्दर बात उठाते हैं। शौनक महाशय ने तो पूछा था ऊँची विद्या के बारे में, फिर अंगिरस ऋषि पहले निचली विद्या क्यों समझाने लगते हैं? उनके अनुसार शिष्य के मन में यह सन्देह उठ सकता है कि इस सारी जानकारी का कोई मोल है भी या नहीं। अंगिरस ऋषि इसी सन्देह को पहले से भाँप लेते हैं और साफ़ कर देते हैं कि निचली विद्या ब्रह्म तक पहुँचने का अधूरा साधन है। यह विद्या देवताओं, उनकी उपासना और पुण्य कर्मों के द्वारा ऊँचे लोक पाने तक की बात बताती है। यह बेकार नहीं है, पर यह मंज़िल तक नहीं ले जाती।

स्वामी कृष्णानन्द दोनों का गहरा फ़र्क़ बताते हैं। उनके अनुसार निचली विद्या में ज्ञान कर्म को जन्म देता है, यानी कुछ जान लेने के बाद वह चीज़ पाने के लिए आगे प्रयास करना पड़ता है। जैसे किसी देवता का ज्ञान पाने पर उस देवता तक पहुँचने के लिए उपासना करनी होती है। पर ऊँची विद्या में ज्ञान के आने से पहले ही सारी क्रिया थम जाती है। वे आगे कहते हैं कि ऊँचा ज्ञान किसी ख़ास देवता का जानना नहीं है, और सच पूछिए तो वह सामान्य अर्थ में जानकारी है ही नहीं। यह जानने वाले और जाने जाने वाले के बीच का कोई रिश्ता नहीं, यह तो ख़ुद जानने वाले का ही ज्ञान है, जहाँ बीच में जानने या बोध का कोई परदा नहीं रह जाता।

इसी कड़ी में वे धर्म और ज्ञान का भेद भी खोलते हैं। उनके अनुसार धर्म का स्वभाव है आदमी को कर्म की ओर धकेलना। निचली विद्या वाला धर्म का ज्ञान पाकर कर्म में जुट जाता है, क्योंकि उस ज्ञान में अधूरेपन का जो भाव बचा रहता है, वही उसे आगे और कर्म करने को उकसाता है। पर ऊँचा ज्ञान अपने आप में पूरा है; उसे पा लेने के बाद कुछ और करने की ज़रूरत नहीं बचती। और वह अक्षर कैसा है? मुण्डक उपनिषद् बताता है, वह जो आँख से न दिखे, हाथ से न पकड़ा जाए, जिसका न कोई कुल हो न रंग, जो आँख-कान-हाथ-पैर से परे, अजन्मा, नित्य, सर्वव्यापी, सबके हृदय में बसा, अत्यन्त सूक्ष्म और सब प्राणियों का स्रोत है। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार यही अविनाशी तत्त्व परा विद्या का विषय है, और इसे केवल वही देख पाते हैं जिनकी दृष्टि भीतर की ओर मुड़ चुकी है।

सार: जानकारी और आत्म-ज्ञान दो अलग चीज़ें हैं। जानकारी, चाहे चारों वेद और सब शास्त्र क्यों न हों, टुकड़ों में बँटी रहती है और हमेशा आगे किसी कर्म की ओर धकेलती है, क्योंकि उसमें अधूरेपन का भाव बचा रहता है। आत्म-ज्ञान वह अखण्ड अनुभव है जो अपने आप में पूरा है; उसे पाने के बाद न कुछ और जानना बाक़ी रहता है, न कुछ और करना। एक चीज़ को जानने से सब इसीलिए जान लिया जाता है, क्योंकि वह एक ही अक्षर सबका मूल है।

यज्ञ की डगमगाती नावें

मुण्डक उपनिषद् का पहला मुण्डक अब अपने दूसरे खंड में पहुँचता है। पिछले खंड में दो तरह की विद्या (ज्ञान) गिनाई गई थी, अपरा विद्या (निचली, सांसारिक जानकारी) और परा विद्या (वह ऊँचा ज्ञान जिससे अक्षर ब्रह्म जाना जाता है)। यहाँ यह उपनिषद् पहले हमें अपरा विद्या के परम चमकीले रूप, यानी वेदों के यज्ञ-कर्मकांड, की सैर कराता है, और फिर बड़े धीरज से दिखाता है कि यह राह कहाँ तक ले जाती है और कहाँ छोड़ देती है।

A frail garlanded boat crowded with eighteen ritual priests and patrons tossing on a stormy ocean of samsara, sun-rays reaching down toward a distant heaven while the waves bubble up like bursting froth beneath the hull.

शुरुआत में यह उपनिषद् यज्ञ की महिमा को नकारता नहीं। वह कहता है कि ऋषियों ने जिन कर्मों के फल मंत्रों में देखे थे, वे त्रेता युग में फैलाकर बरते गए। होम (अग्नि में आहुति देना), अग्निहोत्र (नित्य अग्नि-यज्ञ), दर्श-पूर्णमास (अमावस्या और पूर्णिमा के यज्ञ) इन सबका अपना विधान है। यह उपनिषद् तो आहुति का बारीक क्षण तक बताता है, कि जब अग्नि की लपटें थरथराने लगें, तभी घी की मध्य-आहुति डालनी चाहिए। यज्ञ की सात लपटों के नाम तक गिनाए गए हैं, काली, कराली, मनोजवा और बाक़ी। जो समय पर, विधि से आहुति देता है, उसे सूर्य की किरणें ऊपर देवलोक तक ले जाती हैं, और आहुतियाँ साकार होकर मीठे वचनों में उसे बुलाती हैं, “आइए, आइए, यही आपका पुण्य से कमाया स्वर्गलोक है।”

पर ठीक इसी ऊँचाई पर यह उपनिषद् वह बात कहता है जो पूरे खंड की धुरी है। सातवें मंत्र में वह उन यज्ञों को, और यज्ञ से जुड़े अठारह लोगों (ऋत्विज, यजमान आदि) के पूरे ताम-झाम को, “डगमगाती और असुरक्षित नावें” कहता है, जिन पर चढ़कर कोई संसार-सागर पार करना चाहे। स्वामी कृष्णानन्द इस उपमा को खोलकर बताते हैं। मूल शब्द है प्लव, जिसका अर्थ है नाव, और पानी का बुलबुला भी। ये कर्म बुलबुले जैसे हैं, स्वामी जी कहते हैं, क्योंकि इनके फल अपनी सारी संचित शक्ति समेत बुलबुले की तरह फूट जाते हैं। उनका तर्क सीधा है, कोई भी कर्म देश और काल के भीतर ही होता है, इसलिए वह किसी ऐसी चीज़ तक नहीं पहुँचा सकता जो देश-काल से परे हो। नाव चाहे कितनी सजी हो, वह उसी पानी में तैरती है जिसे पार करना है।

आठवें मंत्र में यह उपनिषद् और तीखा होता है। जो लोग अविद्या (अज्ञान) के बीच डूबे हैं, पर अपने को बड़ा और विद्वान मान बैठे हैं, वे मूढ़ बुढ़ापे, रोग और मृत्यु की मार खाते हुए संसार के पहिये में बार-बार घूमते हैं, ठीक उन अंधों की तरह जो किसी अंधे का हाथ थामे चल रहे हों। स्वामी कृष्णानन्द इस “अंधे का अंधे को राह दिखाना” को बहुत मार्मिक ढंग से समझाते हैं। उनके अनुसार आदमी अपने ही स्वार्थ के हिसाब से चलने के लिए सलाह भी उन्हीं से लेता है जो उसके स्वार्थ को बढ़ावा दें। इच्छाओं से भरा मन बुद्धिमानों की सलाह सह ही नहीं पाता, क्योंकि सच्ची बुद्धि इच्छा के उलट जाती है। ज्ञान के वचन ठुकराकर वह अपने ही ढंग चुनता है, और अहंकार में मान लेता है कि मंज़िल पा ली। स्वामी जी कहते हैं कि फल के भोग में तीन दोष हैं, इच्छा तब तक टिकती नहीं जब तक फल मिले इसलिए जो मिलता है वह अब चाहा हुआ रह ही नहीं जाता; जो सुख दिखता है वह असल सुख नहीं, बस मनचाहे संपर्क से उठी क्षणिक हलचल है; और एक जन्म में सारी इच्छाएँ पूरी न होने से कई और जन्म लेने पड़ते हैं। इसी तरह दसवें मंत्र का स्वर्ग भी ठहरता नहीं, पुण्य चुकते ही जीव वापस इसी लोक में, कभी नीचे तक, गिर आता है।

फिर यह उपनिषद् राह दिखाता है, और यहीं डगमगाती नाव का सच्चा विकल्प आता है। बारहवें मंत्र में वह कहता है कि बुद्धिमान साधक कर्म से कमाए इन लोकों की असलियत जाँचकर उनसे पूरी तरह विरक्त हो जाए, क्योंकि जो बना ही नहीं (अकृत), वह बने हुए (कृत) से नहीं पाया जा सकता। स्वामी कृष्णानन्द इस पर ज़ोर देते हैं, रिश्ता समान वस्तुओं में बनता है, असमान में नहीं; और हर कर्म चूँकि बदलाव और हलचल से चलता है, उससे जो ज्ञान उपजेगा वह भी क्षणभंगुर ही होगा। ब्रह्म बनाया हुआ नहीं, इसलिए वह न किसी क्रिया से, न पवित्र करने से, न बदलने से मिलता है, केवल शुद्ध ज्ञान से। इसीलिए, स्वामी जी कहते हैं, चाहे कोई कितना ही पढ़ा-लिखा क्यों न हो, बिना अनुभवी गुरु के यह अंतर्ज्ञान नहीं उतरता। साधक को समिधा (यज्ञ की लकड़ी, शिष्यभाव का प्रतीक) हाथ में लेकर, श्रोत्रिय (शास्त्र में पारंगत) और ब्रह्मनिष्ठ (ब्रह्म में स्थिर) गुरु के पास जाना चाहिए।

तेरहवाँ मंत्र इसे पूरा करता है। जो शिष्य ठीक से, शांत मन और पूरे संयम के साथ गुरु के पास पहुँचता है, उसी को वह ज्ञानी गुरु ब्रह्मविद्या देता है, जिससे अक्षर पुरुष (अविनाशी सत्ता) जाना जाता है। स्वामी कृष्णानन्द शिष्य की पहली शर्त निरिच्छा (इच्छाओं का पूरा त्याग) बताते हैं, यहाँ तक कि देह में बने रहने की चाह भी छूटनी चाहिए। उनके अनुसार साधक में सिर और हृदय, दोनों के गुण मिले हों, विवेक (नित्य-अनित्य का भेद पहचानना, सिर का गुण) और वैराग्य (अनित्य को छोड़ देना, हृदय का गुण), जो साधन-चतुष्टय (साधना की चार तैयारियाँ) में सधते हैं। तभी डगमगाती नाव छूटती है और वह राह खुलती है जो सचमुच पार ले जाती है।

सार: यज्ञ और पुण्य-कर्म बुरे नहीं, पर वे देश-काल के भीतर बने हुए साधन हैं, इसलिए देश-काल से परे उस अक्षर तक नहीं पहुँचा सकते। जो इन्हीं को परम मानकर डगमगाती नाव पर सवार रहते हैं, वे अपने को बुद्धिमान समझते हुए भी अंधे के पीछे चलते अंधे की तरह जन्म-मृत्यु में घूमते हैं। असली राह है, फलों से विरक्त होकर, शांत और संयमी मन से, समिधा हाथ में लिए किसी ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना, क्योंकि जो बनाया हुआ नहीं, वह केवल शुद्ध ज्ञान से पाया जाता है, करने से नहीं।

ब्रह्म से ब्रह्म तक

जैसे आग से चिंगारियाँ: सबका एक स्रोत

अब उपनिषद् का दूसरा मुण्डक (अध्याय) शुरू होता है। पहले खंड में दो विद्याओं की बात हुई थी, अपरा विद्या (सांसारिक, क्रिया-कर्म वाला ज्ञान) और परा विद्या (ब्रह्मविद्या, यानी उस परम सत्ता का ज्ञान जिससे सब निकलता है)। अब ऋषि उसी परम स्रोत की ओर मुड़ते हैं और एक छोटी-सी, घर की-सी तस्वीर सामने रखते हैं। आँगन में रात के अँधेरे में कोई आग धधक रही है। लपटों में से हज़ारों चिंगारियाँ उछलती हैं, हर एक अलग दिशा में, अलग आकार की, और फिर पल भर में उसी आग में लौट जाती हैं।

A single tall blazing fire in a dark courtyard at night, countless golden sparks streaming outward in all directions and curving back to dissolve into the same flame, symbolizing all beings born from and returning to the imperishable Purusha.

ऋषि कहते हैं, यही सच है (यह उनका “एतत् सत्यम्”, यानी “यह सत्य है” वाला वचन है)। जैसे धधकती आग से अनगिनत चिंगारियाँ उठती हैं और उसी में समा जाती हैं, वैसे ही उस अक्षर पुरुष (अविनाशी परम सत्ता) से सारे प्राणी, सब लोक और सब देवता जन्म लेते हैं और फिर उसी में लौट जाते हैं।

यहाँ स्वामी कृष्णानन्द एक नाज़ुक बात पर रुकते हैं। उनके अनुसार चिंगारियों की यह उपमा यह सिखाने के लिए नहीं दी गई कि प्राणी अपने स्रोत से कटकर, स्वतंत्र होकर जीते हैं, जैसे चिंगारी उछलकर आग से जुदा हो जाती हो। उपमा का असली मक़सद यह दिखाना है कि कार्य (पैदा हुई चीज़) का स्वभाव अपने कारण (स्रोत) के स्वभाव से एक ही होता है। हर प्राणी में जो सच्चा है, जो टिकने वाला और शाश्वत है, वह सबमें एक-सा है। जो अलग जान पड़ता है, वह बस उसके सोचने का अपना-अपना ढंग है। स्वामी जी कहते हैं, इसीलिए मुक्ति (मोक्ष) का अर्थ है अपने इस सीमित, अलगाव वाले बोध की दीवार को तोड़कर उस साझा सार में घुल जाना।

इसी बात को गहरा करने के लिए स्वामी जी दो और तस्वीरें देते हैं। पहली, पेड़ों की। सब पेड़ों की जड़ें एक ही धरती में हैं, सब उसी एक धरती के रस से पलते हैं, पर शाखाएँ धरती को नहीं छूतीं और हर पेड़ ऊपर से अलग दिखता है। वैसे ही सब प्राणी उस एक सार्वभौम आत्मा में जड़ें जमाए हैं, ऊपरी रूप भर अलग है। दूसरी तस्वीर और भी बारीक है। अलग-अलग बर्तनों की हवा में अलग-अलग गंध हो सकती है, पर उन्हीं बर्तनों के भीतर का आकाश (अवकाश) गंध से अछूता रहता है। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार भेद बनाने वाले बस दो हैं, बर्तन और गंध, यानी देह और मन। इन दोनों को हटा दीजिए तो कोई भेद बचता ही नहीं। आत्मा सबमें वही है, मन के रंग चाहे जितने हों।

दूसरी और तीसरी ऋचा उसी पुरुष का स्वरूप खोलती हैं। वह पुरुष दिव्य है, निराकार है, भीतर भी है और बाहर भी, अजन्मा (जिसका कोई कारण नहीं, इसलिए जिसका जन्म नहीं), प्राण और मन से परे, निर्मल। स्वामी जी समझाते हैं कि “पुरुष” वही है जो सारे अवकाश को भरता है और हृदय की गुहा में भी बसता है। वह भीतर-बाहर इसलिए है कि वह अमूर्त है, किसी द्रव्य का बना नहीं। प्राण और मन तो सीमित करने वाले औज़ार हैं, इसलिए असीम पुरुष में उनकी कोई जगह नहीं। उसी एक से प्राण फूटता है, मन फूटता है, इन्द्रियाँ और पंचभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल और सबको थामने वाली पृथ्वी) निकलते हैं। नाम और रूप तो बस दिखावे का जगत हैं; स्वामी जी कहते हैं, असली सत्ता तो सच्चिदानन्द (सत्-चित्-आनन्द, यानी अस्तित्व-चेतना-आनन्द) है, और उसी की झलक पड़ने से ये नाम-रूप सच्चे जान पड़ते हैं।

तो स्वामी जी के लिए आँगन की वह एक आग और उससे उठती-लौटती असंख्य चिंगारियाँ, यही पूरे जगत की कहानी है। एक ही सत्ता का विस्तार, हज़ार रूपों में फैलकर, फिर एक में सिमटकर।

सार: चिंगारी आग से अलग नहीं होती, वह आग का ही स्वभाव लिए उछलती है। देह और मन वे दो बर्तन हैं जो भेद का भ्रम रचते हैं; इन्हें पार कर लीजिए तो भीतर का आकाश सबमें एक ही निकलता है। आप जिसे “मैं” और “वह” कहकर गिनते हैं, वह गहरे में एक ही पुरुष का फैलाव है।

“सत्यमेव जयते”: ॐ का धनुष, आत्मा का बाण

हम मुण्डक उपनिषद् के दूसरे मुण्डक (अध्याय) के उस मोड़ पर खड़े हैं जहाँ गुरु उपदेश का रुख़ अब शिष्य की ओर मोड़ते हैं। अब तक जिस परब्रह्म (परम सत्ता) की बात हुई थी, वह कोई दूर की वस्तु नहीं। वह तो आपके अपने हृदय की गुफ़ा में बैठा वही है जिस पर सारे लोक टिके हैं। गुरु उस ब्रह्म को बताते हैं, जो जीवन है, वाणी है, मन है, जो स्वयंप्रकाश है, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर। और फिर वह सीधा पुकारते हैं, “हे शिष्य! इसी पर ध्यान लगाइए।” यहीं से उपासना (ध्यान का अभ्यास) का वह रूपक खुलता है जो इस उपनिषद् की पहचान बन गया।

उसी सत्य की कड़ी आगे तीसरे मुण्डक में आकर एक घोषणा बन जाती है, सत्यमेव जयते (सत्य ही जीतता है)। उपनिषद् कहता है कि झूठ नहीं, सत्य ही जय पाता है। देवयान, यानी देवों की राह, जिससे सत्य के साधक उस परम पद तक पहुँचते हैं, वह राह सत्य से बँधी हुई है। ऋषि उस मार्ग को निष्कपट, निष्काम साधक का मार्ग कहते हैं, जिसका भीतर-बाहर एक हो।

A serene meditating seeker drawing a luminous bow shaped from the sacred syllable OM, the arrow of the Atman aglow at full draw, aimed at a radiant target-mandala of Brahman dissolving into light.

अब वह केन्द्रीय रूपक। गुरु कहते हैं, उपनिषदों के सार का जो महान धनुष है, उसे थाम लीजिए। उस पर आत्मा रूपी बाण को चढ़ाइए, ऐसा बाण जो निरन्तर मनन (बार-बार के चिन्तन) से नोकीला और तेज़ हो चुका हो। फिर उस लक्ष्य में चित्त को एकाग्र कर, उसी की चेतन भावना से प्रत्यंचा खींचिए। और हे शिष्य, उस अक्षर (जो कभी क्षय न हो, अविनाशी ब्रह्म) रूपी निशाने को बेध डालिए। फिर वह घोषणा जो याद रह जाती है, ॐ धनुष है, आत्मा बाण है, और ब्रह्म वह निशाना है जिसे बेधना है। इसे पूरी सावधानी से बेधिए, और जैसे बाण निशाने में धँसकर एक हो जाता है, वैसे ही आप ब्रह्म में लीन हो जाइए।

स्वामी कृष्णानन्द इस रूपक को बहुत बारीकी से खोलते हैं। उनके अनुसार ॐ पर निरन्तर ध्यान करने से सीमित व्यक्तिगत चेतना धीरे-धीरे ॐ का ही रूप ले लेती है, और ॐ तो अपने स्वभाव में असीम है। वह कहते हैं कि ध्यान करने वाला अन्ततः ध्यान के विषय में ही बदल जाता है (ध्याता ध्येय बन जाता है)। ॐ ब्रह्म का प्रतीक है, इसीलिए ॐ का ध्यान ब्रह्म के साक्षात्कार तक ले जाता है। ॐ पर टिकते ही मन शुद्ध होता है, अपनी बिखेरने वाली प्रवृत्ति छोड़ता है, और उस शान्त ॐ की निस्तरंग अवस्था में ठहर जाता है।

पर स्वामी जी एक गहरी बात पकड़ते हैं जिससे यह रूपक भीतर मुड़ जाता है। वह कहते हैं कि सामान्य बाण किसी बाहरी वस्तु की ओर जाता है, पर यह आत्मा रूपी बाण बाहर की ओर नहीं जाता, भीतर की ओर मुड़ता है। इसलिए ऐसा नहीं होता कि व्यक्ति ब्रह्म की ओर सरककर फिर उससे जा मिले। होता यह है कि व्यक्ति अपने ही निजी, सीमित अस्तित्व के पार जाकर भीतर-ही-भीतर बुझ जाता है। स्वामी कृष्णानन्द इसे विषय पर किया जाने वाला ध्यान न कहकर आत्म-केन्द्रित होना कहते हैं। ब्रह्म को निशाना इसलिए नहीं कहा गया कि वह कहीं दूर है जिसे बाण जाकर बेधे। वह तो इसलिए निशाना है कि जब साधक की अपनी व्यक्तित्व-भावना खो जाती है, तब जो परम अनुभव शेष रहता है, वही ब्रह्म है। मन जिस रूप पर देर तक टिकता है, अन्ततः वही रूप बन जाता है, और तब उसे वही रूप हर ओर दिखने लगता है। पर एक रूप को सब जगह देखते हुए मन अपनी अलग पहचान नहीं बचा पाता, इसलिए वह स्वयं मिट जाता है। यही आत्म-विलय और आत्मा की पुनः-प्राप्ति है।

स्वामी जी चेताते हैं कि यह बेधना असावधानी या भेदभाव-रहित आदत से नहीं होता। यह उसी शक्ति से होता है जो सारी वस्तुओं और अवस्थाओं के पूर्ण त्याग से आती है, जिससे मन परम वैराग्य (निष्कामता) में थिर हो जाता है। एक चीज़ दूसरी में तभी एक हो सकती है जब वह उसी का स्वभाव अपना ले। कोई भी इच्छा, चाहे प्रकट हो या भीतर दबी, इस एकत्व के विरुद्ध है। इसीलिए ब्रह्म का यह तदाकार होना, यानी लक्ष्य के साथ पूरी तरह एकरूप हो जाना, परम निष्काम होने पर ही आता है। बाण की तरह उस निशाने में धँसिए, और धँसकर उसी में मिट जाइए।

सार: ॐ का यह धनुष किसी दूर बैठे निशाने पर नहीं छूटता। बाण भीतर की ओर मुड़ता है, और आत्मा अपने ही सीमित होने के पार जाकर बुझ जाती है। ब्रह्म दूर का लक्ष्य नहीं, वह वही शेष अनुभव है जो आपके अलग होने का भाव गिर जाने पर बचता है। इसीलिए सत्य ही जीतता है, क्योंकि जिसने अपनी सारी चाह छोड़ दी, वही लक्ष्य के साथ तदाकार होकर एक रह जाता है।

मुक्ति

दो पंछी एक डाल पर: जो भोगता है और जो देखता रहता है

Two identical golden birds perched on one branch of a fruit-laden tree: the lower bird pecking a ripe fruit with bowed sorrowful head, the upper bird sitting calm and luminous, simply watching, light radiating around it.

मुण्डक उपनिषद् अब तीसरे मुण्डक में पहुँचता है और एक तस्वीर हमारे सामने रख देता है, जैसी कविता में ही मिल सकती है। एक ही पेड़ पर दो पंछी बैठे हैं, दोनों सुनहरे, दोनों एक-दूसरे के घनिष्ठ मित्र। एक पंछी उस पेड़ का मीठा फल चख रहा है, और दूसरा बस देखता रहता है, बिना कुछ खाए, बिना डाल हिलाए। यही चित्र इस खंड की पूरी पहेली है, और इसी में जीवन का पूरा भेद छिपा हुआ है।

स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार वे दोनों पंछी कोई बाहरी जोड़ी नहीं हैं, वे हम सबके भीतर बसते हैं। पहला पंछी जीव है (वह चेतना जो शरीर और मन से बँध गई हो), दूसरा ईश्वर है (वही चेतना अपने असली, अबाध रूप में)। वे साथ-साथ रहते हैं जैसे प्रतिबिम्ब और मूल साथ रहते हैं, और दोनों का एक ही आधार है, ब्रह्म (वह परम सत्ता जो दोनों की असलियत है)। जिस पेड़ पर वे बैठे हैं, वह यह देह है। स्वामी जी इसे पेड़ इसीलिए कहते हैं कि पेड़ की तरह इसे काटा जा सकता है, यह सदा रहने वाली चीज़ नहीं। इसी देह को वे क्षेत्र (कर्म और भोग की खेती की ज़मीन) कहते हैं, और जो इसे जानता है उसे क्षेत्रज्ञ (खेत का जानकार)।

फिर एक गहरी बात स्वामी कृष्णानन्द उठाते हैं, कि जीव और ईश्वर में फ़र्क़ सिर्फ़ एक चीज़ का है, और वह है मन। दरअसल मन ही जीव है। यही मन अविद्या (असलियत न जानने का अँधेरा), काम (चाहत) और कर्म (किए हुए कामों के बीज) से रंग जाता है, और इसी जुड़ाव के कारण उसे अपने कर्मों के फल भोगने पड़ते हैं, कभी सुख, कभी दुख। दूसरी ओर वह शांत पंछी, ईश्वर, किसी उपाधि से बँधा नहीं, उसके पास करने को कोई कर्म ही नहीं, इसलिए भोगने को कोई फल भी नहीं। स्वामी जी कहते हैं कि उसका होना ही उसकी क्रिया है, और उसके बस इस होने भर का मोल पूरे ब्रह्माण्ड की सारी हलचल से बड़ा है, क्योंकि वही होना सारी सृष्टि को चला रहा है।

अब उपनिषद् दूसरे मन्त्र में उसी पेड़ की बात आगे बढ़ाता है। वही जीव-पंछी अपने ही पेड़ पर शोक में डूबा बैठा है, मोह से ठगा हुआ और अपने को बेबस समझता हुआ। स्वामी कृष्णानन्द इस शोक की जड़ खोलकर बताते हैं, कि यह दुख बिना सोचे-समझे किए गए पुराने कर्मों का फल है। ऐसे कर्म सत्य के नियम से ताल नहीं मिलाते, इसलिए लौटकर कड़वे अनुभव बनकर सताते हैं, और हर नया अधूरा अनुभव पुराने दुख के ढेर में और दुख जोड़ देता है। अपनी ही चाहतों और कर्मों के साँचे में क़ैद होकर जीव अपने को असमर्थ, उलझा हुआ और लाचार महसूस करता है। उसे यह तक भरोसा हो जाता है कि बस यही एक अनुभव सच है, इससे परे कोई असलियत है ही नहीं। इसी भुलावे में वह चीज़ों से जुड़ता और बिछड़ता रहता है, जन्म लेता है, मरता है, और अपने कर्मों के अनुसार तरह-तरह की योनियों से गुज़रता रहता है।

पर वही मन्त्र मुक्ति का दरवाज़ा भी खोल देता है। जिस घड़ी वह भोगने वाला पंछी सिर उठाकर अपने पास बैठे उस दूसरे, शांत, आराध्य प्रभु को देख लेता है, उसी घड़ी उसका शोक झड़ जाता है। स्वामी कृष्णानन्द इसे यों समझाते हैं, कि जीव की असली आज़ादी इसी देखने में है, उस परम प्रभु के दर्शन में जो उससे अलग है ही नहीं, जो उसका अपना स्वरूप है। ईश्वर का यह साक्षात्कार दरअसल जीव की अपनी चेतना का ईश्वर की चेतना तक उठ जाना है। और जिस पल यह घटता है, वहाँ जीव नाम की कोई अलग चीज़ बचती ही नहीं, जैसे परदा हटते ही वह अपनी ही महिमा पहचान लेता है। यही परदा हटना, यही ईश्वर का दर्शन, सारी अधूरेपन और सारे शोक का अन्त है।

तो दोनों पंछी असल में एक ही चेतना के दो ढंग हैं, एक कर्ता-भोक्ता बनकर डाल पर डूबा है, दूसरा द्रष्टा (साक्षी आत्मा) बनकर शांत देख रहा है। फल चखता पंछी जब तक नीचे झुका हुआ है, शोक उसका साथी है। पर वह जैसे ही ऊपर अपने मित्र की ओर निगाह करता है, पता चलता है कि भोगने वाला और देखने वाला दो थे ही नहीं, और इसी पहचान में देह का पेड़ अपनी सारी कड़वाहट खो देता है।

सार: भीतर दो पंछी नहीं, एक ही चेतना के दो ढंग हैं, एक फल चखता-रोता कर्ता, दूसरा चुपचाप देखता साक्षी। शोक तब तक है जब तक निगाह फल पर झुकी है। जिस पल हम उस शांत द्रष्टा को, जो हमारा अपना स्वरूप है, पहचान लेते हैं, भोगने वाला और देखने वाला एक हो जाते हैं और शोक की जड़ ही कट जाती है।

हृदय की गाँठ का टूटना

मुण्डक उपनिषद् अपने आख़िरी पड़ाव पर खड़ा है। अब तक यह उपनिषद् बता चुका है कि दो विद्याएँ होती हैं, अपरा (छोटी, किताबी, बाहरी जानकारी) और परा (बड़ी, जिससे अक्षर ब्रह्म जाना जाता है)। यहाँ ऋषि उस आख़िरी सवाल पर आते हैं जिसके लिए पूरी यात्रा थी, कि वह आत्मा (अपना असली स्वरूप, जो ब्रह्म ही है) आख़िर मिलती कैसे है। और जवाब चौंकाने वाला है।

उपनिषद् कहता है, यह आत्मा न प्रवचनों से मिलती है, न तेज़ बुद्धि से, न बहुत-बहुत सुन लेने से। यानी जितना भी हम बोलें, सोचें या शास्त्र रट लें, वह सब बाहर का रास्ता है, और आत्मा बाहर पड़ी कोई चीज़ है ही नहीं। फिर मिलती कैसे है? उपनिषद् का उत्तर है, जिसे वह ख़ुद चुन ले, उसी को वह अपना सच्चा रूप दिखाती है।

स्वामी कृष्णानन्द इस “चुनने” को बड़े ध्यान से खोलते हैं। उनके अनुसार यहाँ कोई बाहरी देवता हमें छाँटकर पास नहीं बुला रहा। जिसे पाना है (आत्मा) और जो पाना चाहता है (खोजी), ये दो अलग चीज़ें हैं ही नहीं। आत्मा खोजी से भिन्न कोई वस्तु नहीं होती, वह तो खोजी का अपना ही असली स्वभाव है। स्वामी जी समझाते हैं कि इसीलिए इसे किसी क्रिया से, किसी बाहरी प्रयास से नहीं पाया जा सकता, ठीक वैसे ही जैसे हम अपने ही शरीर तक किसी यात्रा या कर्म के ज़रिए नहीं पहुँचते, वह तो पहले से हमारा है। एक ही शर्त है, और वह है तीव्र आकांक्षा। यहाँ जिसे समर्पण कहा जाता है, स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार वह किसी और के आगे ख़ुद को सौंप देना नहीं होता, वह तो झूठे “मैं” को छोड़ देना है, ताकि जो असली अनन्त स्वरूप है उसके अनुभव में जो रोड़ा है (यही नक़ली अहंकार) वह हट जाए।

अब उपनिषद् उस घड़ी का चित्र खींचता है जब यह दर्शन घटित होता है। कहता है, उसके दिखते ही हृदय की गाँठ (हृदय-ग्रन्थि, यानी “मैं और मेरा” की वह गहरी गिरह जो आत्मा को संसार से बाँधे रखती है) खुल जाती है, सारे संशय (संदेह, दुविधाएँ) कट जाते हैं, और कर्म (किए हुए कामों के बीज और उनके फल) झड़ जाते हैं। स्वामी कृष्णानन्द का बिंदु यहाँ बहुत साफ़ है, ज्ञान कोई नई चीज़ जोड़ता नहीं, वह तो सिर्फ़ अज्ञान को हटाता है। जिस क्षण अज्ञान मिटा, जिस क्षण दो होने का भाव रद्द हुआ, उसी क्षण मुक्ति है, बिना किसी रुकावट के। और रुकावट आती भी क्यों? स्वामी जी कहते हैं, विरोध और बाधाएँ तो उसी को घेरती हैं जो कोई सीमित, अलग चीज़ पाने निकलता है, क्योंकि बाक़ी सीमित चीज़ें उसका विरोध करती हैं। पर जो उस सर्वव्यापी सत्य को चाहता है जो सबका साझा है, उसका विरोध भला कौन करेगा? ऐसे खोजी की सहायता तो पूरा ब्रह्माण्ड करता है।

Wide rivers Ganga and Yamuna flowing into a vast luminous ocean and losing their names and separate forms, their waters merging into one boundless sea under a glowing sky, with the heart-knot dissolving as light upon the horizon.

फिर उपनिषद् वह उपमा देता है जो इस पूरे प्रसंग की आत्मा है। जैसे बहती हुई नदियाँ समुद्र में जा मिलती हैं और अपना नाम तथा रूप वहीं छोड़ देती हैं, गंगा अब गंगा नहीं रहती, यमुना अब यमुना नहीं, बस समुद्र रह जाता है, वैसे ही ज्ञानी अपने नाम-रूप से मुक्त होकर उस परम पुरुष में मिल जाता है जो ऊँचे से भी ऊँचा है। स्वामी कृष्णानन्द इसे यों पढ़ते हैं कि यह कोई हानि नहीं, नदी का पानी मिटता नहीं, उसका सीमित नाम और सीमित आकार भर घुल जाता है, और वह असीम हो जाता है।

अन्त में उपनिषद् घोषणा करता है, जो ब्रह्म को जान लेता है वह ब्रह्म ही हो जाता है। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार वह आत्मा फिर सारे देवताओं की भी आत्मा बन जाता है, इसलिए कोई उसका रास्ता रोक नहीं सकता। वह शोक के पार चला जाता है, पाप के पार चला जाता है, पुण्य-पाप जैसे जोड़ों से छूट जाता है, हृदय की गाँठें टूट जाती हैं, और वह अमर हो जाता है। यह अमरता समय में आगे की कोई घटना नहीं है, स्वामी जी ज़ोर देते हैं कि मोक्ष किसी अवस्था की ओर बढ़ना नहीं होता, यह तो यहीं और अभी का, न बदलने वाला अनुभव है।

सार: आत्मा बाहर पड़ी कोई वस्तु नहीं कि उसे पढ़कर, तर्क करके या ख़ूब सुनकर बटोर लें, वह तो हमारा अपना ही असली स्वरूप है, जिस तक किसी यात्रा से नहीं पहुँचा जाता। बस झूठे “मैं” को गिरने दीजिए, ज्ञान कुछ जोड़ता नहीं, सिर्फ़ अज्ञान का परदा हटाता है। और जैसे नदी समुद्र में अपना नाम-रूप छोड़कर असीम हो जाती है, वैसे ही हृदय की गाँठ खुलते ही सारे संदेह और कर्म झड़ जाते हैं, और जो रह जाता है वह आप ख़ुद हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

अब तक हम वन की उस कुटिया में बैठे रहे, जहाँ अंगिरा-कुल का एक बूढ़ा ऋषि, अथर्वा का वंशज, एक जिज्ञासु शिष्य को धीरे-धीरे सब कुछ खोलकर बता रहा था। उसने दो विद्याओं का फ़र्क़ समझाया, यज्ञ की लपटों से लेकर उस अक्षर तक की यात्रा कराई जिससे यह सारा संसार बुना गया है। पर पूरे मुण्डक उपनिषद् का जो एक वाक्य पाठक के भीतर देर-से-देर तक गूँजता रहता है, वह यही है, “भिद्यते हृदयग्रन्थिः”, हृदय की गाँठ टूट जाती है।

स्वामी कृष्णानन्द (ऋषिकेश की डिवाइन लाइफ़ सोसायटी के विद्वान संन्यासी) इस पंक्ति को कोई काव्य का अलंकार नहीं मानते। वे कहते हैं कि यह “गाँठ” (ग्रन्थि) सचमुच की एक गाँठ है, जो हर मनुष्य के भीतर बँधी पड़ी है, और तीन धागों से बनी है: अविद्या (अपने असली स्वरूप का न जानना), काम (उससे जागी हुई इच्छाओं की प्यास), और कर्म (उन इच्छाओं को पूरा करने की दौड़-भाग)। यही तीन मिलकर वह “मैं अलग हूँ, सब मुझसे बाहर है” वाला भाव खड़ा करते हैं, और स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार यही अहंकार की गिरह हृदय में कसकर बैठी रहती है, और इसी के कारण आदमी जन्म-दर-जन्म घूमता रहता है।

उनकी गहरे-से-गहरी बात यह है कि गाँठ का खुलना, संशयों का मिटना और कर्मों का झड़ना, ये तीन अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं जो बारी-बारी से होंगी। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि “तस्मिन् दृष्टे परावरे” (जिस घड़ी वह परम-और-निकट, ऊँचा-से-ऊँचा और पास-से-पास आत्मतत्त्व देख लिया जाता है), उसी एक ही क्षण में तीनों एक साथ हो जाते हैं। जैसे रस्सी को साँप समझकर डरने वाला आदमी जैसे ही दीया जला कर रस्सी देख ले, उसका डर, उसका भागना और उसकी गाँठ, सब एक ही पल में छूट जाते हैं। ज्ञान आता है तो टुकड़ों में नहीं आता, पूरा का पूरा आता है।

और यहीं उपनिषद् हमें फिर उन दो पंछियों की याद दिलाता है, जो एक ही पेड़ की डाल पर साथ बैठे हैं (आत्मा और परमात्मा का वह प्रसिद्ध रूपक)। एक पंछी पेड़ के फल चखता जाता है, कभी मीठे का सुख, कभी कड़वे का शोक, और इसी चखने में डूबा, बँधा, बेचैन रहता है। दूसरा पंछी कुछ नहीं खाता, बस शान्त बैठा देखता रहता है, उज्ज्वल, अछूता, अडोल। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि असली मोड़ उसी घड़ी आता है जब पहला पंछी, थका-हारा, ज़रा-सी नज़र उठाकर दूसरे की ओर देखता है, और पहचान लेता है कि देखने वाला वह दूसरा पंछी कोई पराया नहीं, वही उसका अपना असली रूप है।

तो जिस मुक्ति की बात यह उपनिषद् पूरे समय करता रहा, वह किसी दूर के स्वर्ग में, मरने के बाद किसी और लोक में नहीं रखी है। स्वामी कृष्णानन्द ज़ोर देकर कहते हैं कि वह “इहैव”, यहीं, इसी देह में, इसी जीवन में सम्भव है। गाँठ इसी हृदय में बँधी है, सो खुलेगी भी इसी हृदय में। बस उतनी ही देर है जितनी पहले पंछी को दूसरे की ओर गरदन मोड़ने में लगती है।

इसलिए अब किताब बन्द करते समय, सच पूछिए तो, यह कथा किसी प्राचीन शिष्य की नहीं रह जाती, हमारी अपनी बन जाती है। फल अब भी सामने टँगे हैं, मीठे भी, कड़वे भी, और हम अब भी उन्हें चखने में लगे हैं। पर ठीक उसी डाल पर, हमारे ही भीतर, वह शान्त देखने वाला बैठा है, चुपचाप, उज्ज्वल, हमारी ओर देखता हुआ। उपनिषद् ने अपना काम कर दिया; अब सिर्फ़ एक हल्का-सा मुड़ना बाक़ी है, बाहर लटके फलों से हटकर, भीतर बैठे उस साक्षी की ओर।

सार: हृदय की गाँठ अविद्या, इच्छा और कर्म, इन तीन धागों से बनी है, और जिस एक क्षण में भीतर का साक्षी देख लिया जाता है, उसी क्षण तीनों एक साथ छूट जाते हैं। वह क्षण किसी और लोक की नहीं, इसी जीवन की बात है; देर है तो बस फलों से हटकर देखने वाले पंछी की ओर मुड़ने भर की।

व्याख्या मुख्यतः स्वामी कृष्णानन्द (दिव्य जीवन संघ) की मुण्डक-उपनिषद्-व्याख्या पर आधारित।