Lulla Family

अंग 153

अंग
153
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नाम संजोगी गोइलि थाटु ॥
काम क्रोध फूटै बिखु माटु ॥
बिनु वखर सूनो घरु हाटु ॥
गुर मिलि खोले बजर कपाट ॥4॥
साधु मिलै पूरब संजोग ॥
सचि रहसे पूरे हरि लोग ॥
मनु तनु दे लै सहजि सुभाइ ॥
नानक तिन कै लागउ पाइ ॥5॥6॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: जैसे मुश्किल आने पे (सूखे की हालत में) लोग दरियाओं के किनारे हरियाली वाली जगहें में कुछ दिनों का ठिकाना बना लेते हैं, वैसे ही प्रभू के नाम के साथ सांझ पाने वाले लोग जगत में चंद-रोजा ठिकाने की हकीकत को समझते हैं। उनके अंदर से काम-क्रोध के विषौला मटका टूट जाता है (भाव, उनके अंदर कामादिक विकार जोर नहीं डालते)। जो मनुष्य नाम-वस्तु से वंचित रहते हैं उनकी हृदय रूपी हाट (दुकान) खाली रहती है (उनके खाली हृदय-घर को जैसे ताले लगे रहते हैं)। गुरू को मिल के वह करड़े किवाड़ खुल जाते हैं। 4। जिन मनुष्यों को पूर्बले किए कर्मों के संस्कार अंकुरित होने से गुरू मिलता है, वे पूरे पुरुष सदा स्थिर प्रभू में जुड़ के खिले रहते हैं। हे नानक ! (कह) जो मनुष्य, मन गुरू के हवाले करके, शरीर गुरू के हवाले करके, अडोलता में टिक के, प्रेम में जुड़ के (नाम की दाति गुरू से) लेते हैं, मैं उनके चरणों में नत्मस्तक होता हूँ। 5। 6।
गउड़ी महला 1 ॥
कामु क्रोधु माइआ महि चीतु ॥
झूठ विकारि जागै हित चीतु ॥
पूंजी पाप लोभ की कीतु ॥
तरु तारी मनि नामु सुचीतु ॥1॥
वाहु वाहु साचे मै तेरी टेक ॥
हउ पापी तूं निरमलु एक ॥1॥ रहाउ ॥
अगनि पाणी बोलै भड़वाउ ॥
जिहवा इंद्री एकु सुआउ ॥
दिसटि विकारी नाही भउ भाउ ॥
आपु मारे ता पाए नाउ ॥2॥
सबदि मरै फिरि मरणु न होइ ॥
बिनु मूए किउ पूरा होइ ॥
परपंचि विआपि रहिआ मनु दोइ ॥
थिरु नाराइणु करे सु होइ ॥3॥
बोहिथि चड़उ जा आवै वारु ॥
ठाके बोहिथ दरगह मार ॥
सचु सालाही धंनु गुरदुआरु ॥
नानक दरि घरि एकंकारु ॥4॥7॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ (मेरे अंदर) काम (प्रबल) है, क्रोध (प्रबल) है। मेरा चित्त माया में (मगन रहता) है। झूठ बोलने की बुराई में मेरा हित जागता है मेरा चित्त तत्पर होता है। मैंने पाप व लोभ की राशि पूँजी एकत्र की हुई है। (आपकी मेहर से अगर मेरे) मन में आपका पवित्र करने वाला नाम (बस जाए तो यही मेरे लिए) तुलहा है, बेड़ी है। 1। हे सदा कायम रहने वाले प्रभू ! आप आश्चर्य है आप आश्चर्य है। (आपके जैसा और कोई नहीं); (कामादिक विकारों से बचने के लिए) मुझे सिर्फ आपका ही आसरा है। मैं पापी हूँ, सिर्फ आप ही पवित्र करने के स्मर्थ है। 1। रहाउ। (जीव के अंदर कभी) आग (का जोर पड़) जाता है (कभी) पानी (प्रबल हो जाता) है (इस वास्ते ये) गर्म-सर्द बोल बोलता रहता है। जीभ आदि हरेक इंद्रिय को अपना अपना चस्का (लगा हुआ) है। निगाहें विकारों में रहती हैं। (मन में) ना डर है ना प्रेम है (ऐसी हालत में प्रभू का नाम कैसे मिले?)। जीव अहम्भाव को कम करे, तो ही परमात्मा का नाम प्राप्त कर सकता है। 2। जब मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के अहम् भाव को खत्म करता है, तो उसे आत्मिक मौत नहीं होती। स्वैभाव के खत्म हुए बिना मनुष्य पूर्ण नहीं हो सकता। (कमियों से बच नहीं सकता, बल्कि) मन माया के छल के द्वैत में फंसा रहता है। (जीव के भी क्या वश?) जिसको परमात्मा खुद अडोल चित्त करता है वही होता है। 3। मैं (प्रभू के नाम) जहाज में (तभी) चढ़ सकता हूँ, जब (उसकी मेहर से) मुझे बारी मिले। जिन लोगों को नाम जहाज पर चढ़ना नहीं नसीब होता, उन्हें प्रभू की दरगाह में खुआरी मिलती है (धक्के पड़ते है, प्रभू का दीदार नसीब नहीं होता)। (असल बात ये है कि) गुरू का दर सबसे श्रेष्ठ है। (गुरू के दर पर रह के ही) मैं परमात्मा की सिफत सालाह कर सकता हूँ। हे नानक ! (गुरू के) दर पे रहने से हृदय में परमात्मा के दर्शन होते हैं। 4। 7।
गउड़ी महला 1 ॥
उलटिओ कमलु ब्रहमु बीचारि ॥
अंम्रित धार गगनि दस दुआरि ॥
त्रिभवणु बेधिआ आपि मुरारि ॥1॥
रे मन मेरे भरमु न कीजै ॥
मनि मानिऐ अंम्रित रसु पीजै ॥1॥ रहाउ ॥
जनमु जीति मरणि मनु मानिआ ॥
आपि मूआ मनु मन ते जानिआ ॥
नजरि भई घरु घर ते जानिआ ॥2॥
जतु सतु तीरथु मजनु नामि ॥
अधिक बिथारु करउ किसु कामि ॥
नर नाराइण अंतरजामि ॥3॥
आन मनउ तउ पर घर जाउ ॥
किसु जाचउ नाही को थाउ ॥
नानक गुरमति सहजि समाउ ॥4॥8॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ परमात्मा की सिफत सालाह में चित्त जोड़ने से हृदय कमल माया के मोह की तरफ से हट जाता है। दिमाग़ में भी (सिफत सालाह की बरकति से) नाम अमृत की वर्षा होती है (और माया वाले झमेलों की अशांति मिट के ठण्ड पड़ जाती है)। (फिर दिल को भी और दिमाग को भी ये यकीन हो जाता है कि) प्रभू खुद सारे जगत (के जॅरे-जॅरे) में मौजूद है। 1। हे मेरे मन ! (माया की खातिर) भटकना छोड़ दे (और प्रभू की सिफत सालाह में जुड़)। (हे भाई !) जब मन को परमात्मा की सिफत सालाह अच्छी लगने लग पड़ती है, तब ये सिफत सालाह का स्वाद लेने लग पड़ता है। 1। रहाउ । (सिफत सालाह में जुड़ने से) जनम उद्देश्य प्राप्त करके मन को स्वार्थ का समाप्त हो जाना पसंद आ जाता है। इस बात की सूझ मन के अंदर ही पड़ जाती है कि स्वैभाव समाप्त हो गया है। जब प्रभू की मेहर की नजर होती है तो हृदय में ही ये अनुभव हो जाता है कि सुरति प्रभू चरणों में जुड़ी हुई है। 2। परमात्मा के नाम में जुड़ना ही जत, सत व तीर्थ स्नान (का उद्यम) है। मैं (जत-सत आदि वाला) बहुता फैलाव भी क्यूँ फैलाऊँ? (ये सारे उद्यम तो लोक-दिखावे के ही हैं), और परमात्मा हरेक के दिल की जानता है। 3। (माया वाली भटकना मिटाने के लिए प्रभू दर के बिना और कोई जगह नहीं, सो) मैं तभी किसी और जगह जाऊँ अगर मैं (प्रभू के बिना) कोई और जगह मान ही लूँ। कोई और जगह है ही नहीं, मैं किससे ये मांग मांगू (कि मेरा मन भटकने से हट जाए) ? हे नानक ! (मुझे यकीन है कि गुरू का उपदेश हृदय में बसा के) उस आत्मिक अवस्था में लीन रह सकते हैं (जहां माया वाली भटकना का अस्तित्व नहीं है) जहां अडोलता है। 4। 8।
गउड़ी महला 1 ॥
सतिगुरु मिलै सु मरणु दिखाए ॥
मरण रहण रसु अंतरि भाए ॥
गरबु निवारि गगन पुरु पाए ॥1॥
मरणु लिखाइ आए नही रहणा ॥
हरि जपि जापि रहणु हरि सरणा ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरु मिलै त दुबिधा भागै ॥
कमलु बिगासि मनु हरि प्रभ लागै ॥
जीवतु मरै महा रसु आगै ॥2॥
सतिगुरि मिलिऐ सच संजमि सूचा ॥
गुर की पउड़ी ऊचो ऊचा ॥
करमि मिलै जम का भउ मूचा ॥3॥
गुरि मिलिऐ मिलि अंकि समाइआ ॥
करि किरपा घरु महलु दिखाइआ ॥
नानक हउमै मारि मिलाइआ ॥4॥9॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है उसे वह मौत दिखा देता है (उसकी जीवनशैली में विकारों की मौत हो जाती है) जिस मौत का आनंद (और उससे पैदा हुए) चिरंकाल का आत्मिक जीवन आनंद उस मनुष्य को अपने हृदय में प्यारा लगने लगता है। वह मनुष्य (शरीर आदि का) अहंकार दूर करके वह आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेता है जहाँ सुरति ऊँची उड़ाने लगाती रहे। 1। (हे भाई ! सारे जीव शारीरिक) मौत रूपी हुकम (प्रभू की हजूरी में से) लिखा के पैदा होते हैं। (भाव, यही ईश्वरीय नियम है कि जो पैदा होता है उसने मरना भी जरूर है)। सो, यहां शारीरिक तौर पर किसी ने सदा नहीं टिके रहना। (हां) प्रभू की सिफत सालाह करके, प्रभू की शरण में रह के सदीवी आत्मिक जीवन मिल जाता है। 1। रहाउ। अगर सतिगुरू मिल जाए, तो मनुष्य की दुबिधा दूर हो जाती है। हृदय का कमल फूल खिल के उसका मन प्रभू के चरणों में जुड़ा रहता है। मनुष्य दुनिया की किर्त-कार करता हुआ भी माया के मोह से ऊँचा रहता है। उसे प्रत्यक्ष तौर पर परमात्मा के सिमरन का महा आनंद अनुभव होता है। 2। अगर गुरू मिल जाए, तो मनुष्य सिमरन की जुगति में रह कर पवित्र आत्मा बन जाता है। गुरू की बताई हुई सीढ़ी के सहारे (आत्मिक जीवन में) ऊँचा ही ऊँचा होता जाता है। (पर, ये सिमरन प्रभू की) मेहर से मिलता है, (जिसे मिलता है उसका) मौत का डर उतर जाता है। 3। अगर गुरू मिल जाए तो मनुष्य प्रभू की याद में जुड़ के प्रभू के चरणों में लीन हुआ रहता है। गुरू मेहर करके उसे वह आत्मिक अवस्था दिखा देता है जहां प्रभू का मिलाप हुआ रहे। हे नानक ! उस मनुष्य के अहम् को दूर करके गुरू उसको प्रभू से एक-मेक कर देता है। 4। 9।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जैसे मुश्किल आने पे (सूखे की हालत में) लोग दरियाओं के किनारे हरियाली वाली जगहें में कुछ दिनों का ठिकाना बना लेते हैं, वैसे ही प्रभू के नाम के साथ सांझ पाने वाले लोग जगत में चंद-रोज।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।