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अंग 344

अंग
344
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जुगु जुगु जीवहु अमर फल खाहु ॥10॥
दसमी दह दिस होइ अनंद ॥
छूटै भरमु मिलै गोबिंद ॥
जोति सरूपी तत अनूप ॥
अमल न मल न छाह नही धूप ॥11॥
एकादसी एक दिस धावै ॥
तउ जोनी संकट बहुरि न आवै ॥
सीतल निरमल भइआ सरीरा ॥
दूरि बतावत पाइआ नीरा ॥12॥
बारसि बारह उगवै सूर ॥
अहिनिसि बाजे अनहद तूर ॥
देखिआ तिहूं लोक का पीउ ॥
अचरजु भइआ जीव ते सीउ ॥13॥
तेरसि तेरह अगम बखाणि ॥
अरध उरध बिचि सम पहिचाणि ॥
नीच ऊच नही मान अमान ॥
बिआपिक राम सगल सामान ॥14॥
चउदसि चउदह लोक मझारि ॥
रोम रोम महि बसहि मुरारि ॥
सत संतोख का धरहु धिआन ॥
कथनी कथीऐ ब्रहम गिआन ॥15॥
पूनिउ पूरा चंद अकास ॥
पसरहि कला सहज परगास ॥
आदि अंति मधि होइ रहिआ थीर ॥
सुख सागर महि रमहि कबीर ॥16॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: (इस मेहनत का) ऐसा फल मिलेगा जो कभी खत्म नहीं होंगे। ऐसा सुंदर जीवन जीओगे जो सदा कायम रहेगा। 10। (ऐसे परमात्मा के साथ मेल होने से) सारे संसार में ही मनुष्य के लिए आनंद ही आनंद होता है (इस उद्यम से) मन की भटकना दूर हो जाती है; वह परमात्मा मिल जाता है। जो निरा नूर ही नूर है। जो सारे जगत का असल है। जिस जैसा और कोई नहीं। जिसमें विकारों की कोई भी मैल नहीं। ना उसमें अज्ञानता का अंधकार है और ना ही तृष्णा आदि विकारों की आग है।11। (जब मनुष्य का मन विकारों की ओर से हट के) एक परमात्मा (की याद) की तरफ जाता है। तब वह दुबारा जनम-मरन के कष्टों में नहीं आता। इसलिए उसके अंदर ठंड पड़ जाती है और उसका स्वै पवित्र हो जाता है। जो परमात्मा कहीं दुर बताया जाता था वह उसके नजदीक (अपने अंदर ही) मिल जाता है।12। (जिस मनुष्य का मन सिर्फ ‘ऐक दिस धावै’। जो मनुष्य सिर्फ एक प्रभू की याद में जुड़ता है। उसके अंदर। जैसे) बारह सूरज उग पड़ते हैं (भाव। उसके अंदर पूर्ण ज्ञान का प्रकाश हो जाता है)। उसके अंदर (मानो) दिन-रात एक-रस बाजे बजते हैं। उसे तीनों भवनों के मालिक प्रभू का दीदार हो जाता है; एक आश्चर्यजनक खेल बन जाती है कि वह मनुष्य एक साधारण मनुष्य से कल्याण-स्वरूप परमात्मा का रूप हो जाता है। 13। (जिस मनुष्य का मन केवल ‘ऐक दिस धावै’) वह अगम परमात्मा की सिफत सालाह करता है। (इस सिफत सालाह की बरकति से) वह सारे संसार में उस प्रभू को एक-समान पहचानता है (देखता है)। ना उसे कोई नीच दिखाई देता है ना ऊँचा। किसी से आदर हो या निरादरी। उसके लिए एक से हैं। क्योंकि उसे सारे जीवों में परमात्मा ही व्यापक दिखता है। 14। (हे भाई !) प्रभू जी सारी कायनात में सृष्टि के कण-कण में बस रहे हैं। उसकी सिफत सालाह की बातें करो। ता कि उसके इस सही स्वरूप की सूझ बनी रहे। (ये यकीन ला के कि वह प्रभू आपके अंदर बस रहा है और सब जीवों में भी बस रहा है) दूसरों की सेवा की और जो कुछ प्रभू ने आपको दिया है उसमें राजी रहने की सुरति पक्की करो। 15। जो परमात्मा सृष्टि के आरम्भ से आखिर तक और बीच के समय (इस अंतराल में) (भाव। सदा ही) मौजूद है। उस सुखों के समुंद्र प्रभू में। हे कबीर ! अगर आप डुबकी लगा के उसका सिमरन करे। तो जैसे पूरनमाशी को आकाश में पूरा चाँद चढ़ता है और चंद्रमा की सारी ही कलाएं प्रगट होती हैं वैसे ही आपके अंदर भी सहज अवस्था का प्रकाश होंगे। 16।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु गउड़ी वार कबीर जीउ के 7 ॥
बार बार हरि के गुन गावउ ॥
गुर गमि भेदु सु हरि का पावउ ॥1॥ रहाउ ॥
आदित करै भगति आरंभ ॥
काइआ मंदर मनसा थंभ ॥
अहिनिसि अखंड सुरही जाइ ॥
तउ अनहद बेणु सहज महि बाइ ॥1॥
सोमवारि ससि अंम्रितु झरै ॥
चाखत बेगि सगल बिख हरै ॥
बाणी रोकिआ रहै दुआर ॥
तउ मनु मतवारो पीवनहार ॥2॥
मंगलवारे ले माहीति ॥
पंच चोर की जाणै रीति ॥
घर छोडें बाहरि जिनि जाइ ॥
नातरु खरा रिसै है राइ ॥3॥
बुधवारि बुधि करै प्रगास ॥
हिरदै कमल महि हरि का बास ॥
गुर मिलि दोऊ एक सम धरै ॥
उरध पंक लै सूधा करै ॥4॥
ब्रिहसपति बिखिआ देइ बहाइ ॥
तीनि देव एक संगि लाइ ॥
तीनि नदी तह त्रिकुटी माहि ॥
अहिनिसि कसमल धोवहि नाहि ॥5॥
सुक्रितु सहारै सु इह ब्रति चड़ै ॥
अनदिन आपि आप सिउ लड़ै ॥
सुरखी पांचउ राखै सबै ॥
तउ दूजी द्रिसटि न पैसै कबै ॥6॥
थावर थिरु करि राखै सोइ ॥ जोति दी वटी घट महि जोइ ॥
बाहरि भीतरि भइआ प्रगासु ॥
तब हूआ सगल करम का नासु ॥7॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। राग गउड़ी सप्ताह के दिन कबीर जी के वार मैं हर समय परमात्मा के गुण गाता हूँ (भाव। प्रभू की सिफत सालाह ही प्रभू को मिलने का सही तरीका है)। गुरू के चरणों में पहुँच के मैंने वह भेद पा लिया है जिससे परमात्मा को मिल सकते हैं 1। रहाउ। (‘बार बार हरि के गुण’ गा के। जो मनुष्य) परमात्मा की भगती शुरू करता है। ये भगती उसके शरीर-घर के स्तम्भ का काम करती है। उसके मन के विचारों को सहारा देती है (भाव। उसकी ज्ञानेंद्रियां और उसके मन के फुरने भटकने से हट जाते हैं)। भगती से सुगंधित हुई उसकी सुरति दिन-रात लगातार (प्रभू चरणों में) जुड़ी रहती है। तब अडोलता में टिकने के कारण मन के अंदर (मानो) एक-रस बाँसुरी सी बजती है। 1। (‘बार बार हरि के गुण’ गाने से मनुष्य के मन में) शांति ठंड का अमृत बरसता है। (ये अमृत) चखने से मन तुरंत सारे विकार दूर कर देता है। सतिगुरू की बाणी की बरकति से (मनुष्य का विकारों से) रोका हुआ मन प्रभू के दर पर टिका रहता है और मस्त हुआ मन उस अमुत को पीता रहता है। 2। (‘बार बार हरि के गुण’ गा के) मनुष्य अपने मन के चारों तरफ जैसे, किला बना लेता है। कामादिक पाँच चोरों के (हमला करने का) ढंग-तरीका समझ लेता है (इस प्रकार उनके वार होने नहीं देता)। (हे भाई !) आप भी (ऐसे) किले को छोड़ के बाहर ना जाना (भाव। अपने मन को बाहर भटकने मत देना)। नहीं तो ये मन (विकारों में पड़ कर) बड़ा दुखी होंगे। 3। (‘बार बार हरि के गुन’ गा के। मनुष्य अपनी) सूझ में प्रभू के नाम का प्रकाश पैदा कर लेता है। हृदय-कमल में परमात्मा का निवास बना लेता है; सतिगुरू को मिल के आत्मा और परमात्मा की सांझ बना लेता है। (पहले माया की ओर) चल रहे मन को वश में करके (पलट के) प्रभू के सन्मुख कर देता है। 4। (‘बार बार हरि के गुन’ गा के। मनुष्य) माया के (प्रभाव) को (सिफत सालाह के प्रवाह में) बहा देता है। माया के तीनों ही (बली) गुणों को एक प्रभू (की याद में) लीन कर देता है। (जो लोग सिफत सालाह छोड़ के माया की) खिझ में रहते हैं। वे माया की त्रिगुणी नदियों में ही (गोते खाते) हैं। दिन रात बुरे कर्म (करते हैं। सिफत सालाह से वंचित रहने के कारण उन्हें) धोते नहीं हैं। 5। (‘बार बार हरि के गुन’ गा के। मनुष्य इस सिफत सालाह की) नेक कमाई को (अपने जीवन का) सहारा बना लेता है। और इस मुश्किल घाटी पर चढ़ता है कि हर समय अपने साथ लड़ाई करता है (भाव। अपने मन को बारंबार विकारों से रोकता है)। पाँचों ही ज्ञानेंद्रियों को बस में रखता है। तब (किसी पर भी) कभी उसकी मेर-तेर की निगाह नहीं पड़ती। 6। ईश्वरीय नूर की जो सुंदर सी छोटी सी ज्योति जो हरेक हृदय में होती है (‘बार बार हरि के गुण’ गा के। मनुष्य) उस जोति को अपने अंदर संभाल के रखता है (उसकी बरकति से उसके) अंदर-बाहर जोति का ही प्रकाश हो जाता है (भाव। उसको अपने अंदर और सारी सृष्टि में भी एक ही परमात्मा की ज्योति दिखाई देती है)। इस अवस्था में पहँच के उसके पिछले किए सारे कर्मों (के संस्कारों) का नाश हो जाता है। 7।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(इस मेहनत का) ऐसा फल मिलेगा जो कभी खत्म नहीं होंगे।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।