अंग 321

अंग
321
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਧਨੁ ਕੀਤਾ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ॥੨॥
नानक राम नामु धनु कीता पूरे गुर परसादि ॥२॥

हिन्दी अर्थ: उसे अपहुँच और आश्चर्य रूप प्रभू हर जगह मौजूद दिखाई दे गया है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਧੋਹੁ ਨ ਚਲੀ ਖਸਮ ਨਾਲਿ ਲਬਿ ਮੋਹਿ ਵਿਗੁਤੇ ॥
ਕਰਤਬ ਕਰਨਿ ਭਲੇਰਿਆ ਮਦਿ ਮਾਇਆ ਸੁਤੇ ॥
ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਜੂਨਿ ਭਵਾਈਅਨਿ ਜਮ ਮਾਰਗਿ ਮੁਤੇ ॥
ਕੀਤਾ ਪਾਇਨਿ ਆਪਣਾ ਦੁਖ ਸੇਤੀ ਜੁਤੇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਇ ਵਿਸਾਰਿਐ ਸਭ ਮੰਦੀ ਰੁਤੇ ॥੧੨॥
पउड़ी ॥
धोहु न चली खसम नालि लबि मोहि विगुते ॥
करतब करनि भलेरिआ मदि माइआ सुते ॥
फिरि फिरि जूनि भवाईअनि जम मारगि मुते ॥
कीता पाइनि आपणा दुख सेती जुते ॥
नानक नाइ विसारिऐ सभ मंदी रुते ॥१२॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ पति (प्रभू) के साथ धोखा कामयाब नहीं हो सकता। जो मनुष्य लोभ में और मोह में फंसे हुए हैं वह ख्वार होते हैं। माया के नशे में सोए हुए लोग बुरी करतूतें करते हैं। बार-बार जूनों में धक्के खाते हैं और यमराज के राह में (पति-विहीन) छोड़े जाते हैं। अपने किए हुए (बुरे) कामों का फल पाते हैं। दुखों के साथ जोते जाते हैं। हे नानक ! अगर प्रभू का नाम बिसार दिया जाय तो (जीव के लिए) सारी ऋतुएं बुरी ही समझें। 12।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਉਠੰਦਿਆ ਬਹੰਦਿਆ ਸਵੰਦਿਆ ਸੁਖੁ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਲਾਹਿਐ ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਹੋਇ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
उठंदिआ बहंदिआ सवंदिआ सुखु सोइ ॥
नानक नामि सलाहिऐ मनु तनु सीतलु होइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ सुख एक-सार उठते-बैठते-सोते हर समय बना रहता है – हे नानक ! अगर प्रभू के नाम की वडिआई करते रहें तो मन और शरीर ठंडे-ठार रहते हैं । 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਲਾਲਚਿ ਅਟਿਆ ਨਿਤ ਫਿਰੈ ਸੁਆਰਥੁ ਕਰੇ ਨ ਕੋਇ ॥
ਜਿਸੁ ਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਨਾਨਕਾ ਤਿਸੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਸੋਇ ॥੨॥
मः ५ ॥
लालचि अटिआ नित फिरै सुआरथु करे न कोइ ॥
जिसु गुरु भेटै नानका तिसु मनि वसिआ सोइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ (जगत माया के) लालच से लिबड़ा हुआ सदा (भटकता) फिरता है। कोई भी आदमी अपने असल भले का काम नहीं करता। (पर) हे नानक ! जिस मनुष्य को सतिगुरू मिलता है उसके मन में वह प्रभू बस जाता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਸਭੇ ਵਸਤੂ ਕਉੜੀਆ ਸਚੇ ਨਾਉ ਮਿਠਾ ॥
ਸਾਦੁ ਆਇਆ ਤਿਨ ਹਰਿ ਜਨਾਂ ਚਖਿ ਸਾਧੀ ਡਿਠਾ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਜਿਸੁ ਲਿਖਿਆ ਮਨਿ ਤਿਸੈ ਵੁਠਾ ॥
ਇਕੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਭਾਉ ਦੁਯਾ ਕੁਠਾ ॥
ਹਰਿ ਨਾਨਕੁ ਮੰਗੈ ਜੋੜਿ ਕਰ ਪ੍ਰਭੁ ਦੇਵੈ ਤੁਠਾ ॥੧੩॥
पउड़ी ॥
सभे वसतू कउड़ीआ सचे नाउ मिठा ॥
सादु आइआ तिन हरि जनां चखि साधी डिठा ॥
पारब्रहमि जिसु लिखिआ मनि तिसै वुठा ॥
इकु निरंजनु रवि रहिआ भाउ दुया कुठा ॥
हरि नानकु मंगै जोड़ि कर प्रभु देवै तुठा ॥१३॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (दुनिया की बाकी) सारी चीजें (आखिर) कड़वी (हो जाती) हैं (एक) सच्चे प्रभू का नाम (ही सदा) मीठा (रहता) है। (पर) ये स्वाद उन साधुओं को हरी-जनों को ही आता है जिन्होंने (ये नाम रस) चख के देखा है। और उस मनुष्य के मन में (ये स्वाद) आ के बसता है जिसके भाग्य में प्रभू ने लिख दिया है। (ऐसे भाग्यशाली को) माया-रहित प्रभू ही हर जगह दिखाई देता है (उस मनुष्य का) दूसरा भाव नाश हो जाता है। नानक भी दोनों हाथ जोड़ के हरी से यह नाम-रसमांगता है। (पर) प्रभू (उसे) देता है (जिस पर) प्रसन्न होता है। 13।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਜਾਚੜੀ ਸਾ ਸਾਰੁ ਜੋ ਜਾਚੰਦੀ ਹੇਕੜੋ ॥
ਗਾਲੑੀ ਬਿਆ ਵਿਕਾਰ ਨਾਨਕ ਧਣੀ ਵਿਹੂਣੀਆ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
जाचड़ी सा सारु जो जाचंदी हेकड़ो ॥
गाल॑ी बिआ विकार नानक धणी विहूणीआ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ वह याचना सब से बढ़िया है जो (भाव। जिससे मनुष्य) एक प्रभू (के नाम) को मांगता है। हे नानक ! मालिक प्रभू से अन्य बाहरी बातें सब बेकार हैं। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਨੀਹਿ ਜਿ ਵਿਧਾ ਮੰਨੁ ਪਛਾਣੂ ਵਿਰਲੋ ਥਿਓ ॥
ਜੋੜਣਹਾਰਾ ਸੰਤੁ ਨਾਨਕ ਪਾਧਰੁ ਪਧਰੋ ॥੨॥
मः ५ ॥
नीहि जि विधा मंनु पछाणू विरलो थिओ ॥
जोड़णहारा संतु नानक पाधरु पधरो ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ ऐसा (ईश्वर की) पहचान वाला कोई दुर्लभ व्यक्ति ही होता है। जिसका मन प्रभु के प्रेम में भेद गया हो। हे नानक ! ऐसा संत (औरों को भी रॅब से) जोड़ने के स्मर्थ होता है और (रॅब को मिलने के लिए) सीधा राह दिखा देता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਸੋਈ ਸੇਵਿਹੁ ਜੀਅੜੇ ਦਾਤਾ ਬਖਸਿੰਦੁ ॥
ਕਿਲਵਿਖ ਸਭਿ ਬਿਨਾਸੁ ਹੋਨਿ ਸਿਮਰਤ ਗੋਵਿੰਦੁ ॥
ਹਰਿ ਮਾਰਗੁ ਸਾਧੂ ਦਸਿਆ ਜਪੀਐ ਗੁਰਮੰਤੁ ॥
ਮਾਇਆ ਸੁਆਦ ਸਭਿ ਫਿਕਿਆ ਹਰਿ ਮਨਿ ਭਾਵੰਦੁ ॥
ਧਿਆਇ ਨਾਨਕ ਪਰਮੇਸਰੈ ਜਿਨਿ ਦਿਤੀ ਜਿੰਦੁ ॥੧੪॥
पउड़ी ॥
सोई सेविहु जीअड़े दाता बखसिंदु ॥
किलविख सभि बिनासु होनि सिमरत गोविंदु ॥
हरि मारगु साधू दसिआ जपीऐ गुरमंतु ॥
माइआ सुआद सभि फिकिआ हरि मनि भावंदु ॥
धिआइ नानक परमेसरै जिनि दिती जिंदु ॥१४॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे मेरी जिंदे ! उस परमेश्वर को सिमर जो सब दातें देने वाला हैऔर बख्शिशें करने वाला है। परमेश्वर के सिमरन से सारे पाप नाश हो जाते हैं। गुरू ने प्रभू (को मिलने) का राह बताया है। गुरू का उपदेश सदा याद रखना चाहिए। (गुरू का उपदेश हमेशा याद रखने से) माया के सारे स्वाद फीके प्रतीत होते हैं और मन में परमेश्वर प्यारा लगने लगता है। हे नानक ! जिस परमेश्वर ने (ये) जिंद दी है। उसे (सदा) सिमर। 14।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਵਤ ਲਗੀ ਸਚੇ ਨਾਮ ਕੀ ਜੋ ਬੀਜੇ ਸੋ ਖਾਇ ॥
ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਨਾਨਕਾ ਜਿਸ ਨੋ ਲਿਖਿਆ ਆਇ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
वत लगी सचे नाम की जो बीजे सो खाइ ॥
तिसहि परापति नानका जिस नो लिखिआ आइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ (ये मानस जनम) सच्चा प्रभू नाम (रूपी बीज बीजने) के लिए फबवां समय मिला है। जो मनुष्य (‘नाम’-बीज) बीजता है वह (इसका फल) खाता है। हे नानक ! ये चीज उस मनुष्य को ही मिलती है जिसके भाग्यों में लिखी हो। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਮੰਗਣਾ ਤ ਸਚੁ ਇਕੁ ਜਿਸੁ ਤੁਸਿ ਦੇਵੈ ਆਪਿ ॥
ਜਿਤੁ ਖਾਧੈ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤੀਐ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਦਾਤਿ ॥੨॥
मः ५ ॥
मंगणा त सचु इकु जिसु तुसि देवै आपि ॥
जितु खाधै मनु त्रिपतीऐ नानक साहिब दाति ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ अगर मांगना है तो सिर्फ प्रभू का नाम मांगो (ये ‘नाम’ उसे ही मिलता है) जिस पर प्रभू स्वयं प्रसन्न हो के देता है। अगर ये (नाम वस्तु) खाई जाए तो मन (माया की ओर से) संतुष्ट हो जाता है। पर हे नानक ! है ये (निरोल। पूरी तरह से) मालिक की बख्शिश ही। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਲਾਹਾ ਜਗ ਮਹਿ ਸੇ ਖਟਹਿ ਜਿਨ ਹਰਿ ਧਨੁ ਰਾਸਿ ॥
ਦੁਤੀਆ ਭਾਉ ਨ ਜਾਣਨੀ ਸਚੇ ਦੀ ਆਸ ॥
ਨਿਹਚਲੁ ਏਕੁ ਸਰੇਵਿਆ ਹੋਰੁ ਸਭ ਵਿਣਾਸੁ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਜਿਸੁ ਵਿਸਰੈ ਤਿਸੁ ਬਿਰਥਾ ਸਾਸੁ ॥
ਕੰਠਿ ਲਾਇ ਜਨ ਰਖਿਆ ਨਾਨਕ ਬਲਿ ਜਾਸੁ ॥੧੫॥
पउड़ी ॥
लाहा जग महि से खटहि जिन हरि धनु रासि ॥
दुतीआ भाउ न जाणनी सचे दी आस ॥
निहचलु एकु सरेविआ होरु सभ विणासु ॥
पारब्रहमु जिसु विसरै तिसु बिरथा सासु ॥
कंठि लाइ जन रखिआ नानक बलि जासु ॥१५॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जगत में वही (मनुष्य-बन्जारे) लाभ कमाते हैं जिनके पास परमात्मा का नाम-रूप धन है। पूँजी है। वह (परमात्मा के बिना) किसी और से मोह करना नहीं जानते। उन्हें एक परमात्मा की ही आस होती है। उन्होंने सदा कायम रहने वाले प्रभू को ही सिमरा है (क्योंकि) और सारा जगत (उन्हें) नाशवान (दिखता) है। जिस मनुष्य को परमात्मा भूल जाता है उस की (हरेक) सांस व्यर्थ जाती है। परमात्मा ने अपने सेवकों को (‘दुतिया भाव’ से) स्वयं अपने गले से लगा के बचाया है। हे नानक ! मैं उस प्रभू से सदके जाता हूँ। 15।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਫੁਰਮਾਇਆ ਮੀਹੁ ਵੁਠਾ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਅੰਨੁ ਧੰਨੁ ਬਹੁਤੁ ਉਪਜਿਆ ਪ੍ਰਿਥਮੀ ਰਜੀ ਤਿਪਤਿ ਅਘਾਇ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਗੁਣ ਉਚਰੈ ਦੁਖੁ ਦਾਲਦੁ ਗਇਆ ਬਿਲਾਇ ॥
ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਪਾਇਆ ਮਿਲਿਆ ਤਿਸੈ ਰਜਾਇ ॥
ਪਰਮੇਸਰਿ ਜੀਵਾਲਿਆ ਨਾਨਕ ਤਿਸੈ ਧਿਆਇ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
पारब्रहमि फुरमाइआ मीहु वुठा सहजि सुभाइ ॥
अंनु धंनु बहुतु उपजिआ प्रिथमी रजी तिपति अघाइ ॥
सदा सदा गुण उचरै दुखु दालदु गइआ बिलाइ ॥
पूरबि लिखिआ पाइआ मिलिआ तिसै रजाइ ॥
परमेसरि जीवालिआ नानक तिसै धिआइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ जब परमात्मा ने हुकम दिया तो (जिस किसी भाग्यशाली के हृदय रूपी धरती पर) अपने आप नाम की बरखा होने लग पड़ी। उस (हृदय-धरती) में (प्रभू की सिफत सालाह का) अन्न बहुत पैदा हो जाता है। (उसका हृदय अच्छी तरह संतोख वाला हो जाता है)। वह मनुष्य सदा ही परमात्मा के गुण गाता है। उसकी दुख-दरिद्रता दूर हो जाती है। पर ये ‘नाम’ रूपी अन्न पूर्बले लिखे भाग्यों के अनुसार मिलता है और मिलता है परमात्मा की रजा मुताबिक। (माया में मरे हुए जिस किसी में) जान डाली है परमेश्वर ने ही (डाली है)। हे नानक ! उस प्रभू को सिमर। 1।
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥

संदर्भ: यह अंग 321 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Dwarka के नए-बसे sector में पहली बार आए परिवार का घर देखना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 50 पंक्तियों का है, 13 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 321” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 322 →, पीछे का: ← अंग 320

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।