यह उपनिषद् एक छोटे बालक नचिकेता और मृत्यु के देवता यम के बीच के एक असाधारण संवाद पर टिकी है।
Background
कठोपनिषद् दस मुख्य उपनिषदों में से है, जिन पर आदि शंकराचार्य ने भाष्य लिखा। यह कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा से ली गई है। कठ ऋषि की परंपरा थी, इसलिए नाम कठोपनिषद् पड़ा। शाब्दिक रूप से कहें तो यह “वैशम्पायन के शिष्य कठ की शाखा का उपनिषद्” है।
यह पूरी उपनिषद् एक कहानी के frame पर खड़ी है। एक छोटा सा लड़का नचिकेता मृत्यु के देवता यम के पास जाता है। यम तीन वर देते हैं। पहले दो वर सांसारिक हैं, तीसरा वर है: “मृत्यु के बाद क्या होता है?” यम पहले deflect करते हैं, फिर सब प्रलोभन दिखाते हैं, मगर नचिकेता अड़ जाता है। तब यम मृत्यु, आत्मा, और परमपद का रहस्य खोलते हैं।
मूल कहानी का पहला रूप ऋग्वेद में, फिर तैत्तिरीय ब्राह्मण में मिलता है। पर वहाँ नचिकेता का प्रश्न मुख्यतः अग्नि-यज्ञ तक सीमित है। कठोपनिषद् ने इसी कहानी को विस्तार दिया, और तीसरे वर को दर्शन की सबसे गहरी ऊँचाई तक पहुँचाया। इस कारण कठोपनिषद् को “मृत्यु के मुख से निकली शिक्षा” कहा जाता है। शाब्दिक रूप से सच, क्योंकि यम स्वयं इसे बताते हैं।
The Nachiketa Story (कथा-सार)
एक ब्राह्मण थे, नाम था वाजश्रवस (या उद्दालक का पुत्र, औद्दालकि-आरुणि, बाद में कहा गया)। उन्होंने “विश्वजित्” नामक एक बड़ा यज्ञ कराया। इस यज्ञ का नियम यह है कि यज्ञ करने वाला अपनी पूरी संपत्ति दान कर देता है, ताकि स्वर्ग का पुण्य मिले।
वाजश्रवस ने सब कुछ दान कर दिया, मगर एक चालाकी की। उन्होंने वो गायें दान में दीं जो अब बूढ़ी हो चुकी थीं, जो दूध नहीं देती थीं, जो पानी पीना तक छोड़ चुकी थीं। मतलब useless गायें। नचिकेता, उनका छोटा बेटा, यह देख रहा था। उसके मन में “श्रद्धा” का प्रवेश हुआ, यानी जिज्ञासा और भक्ति मिलकर एक तीखा भाव। उसने सोचा: “मेरे पिता ने सब कुछ दान करने का प्रण लिया है। तो मैं भी उनकी संपत्ति का हिस्सा हूँ। तो वो मुझे किसको देंगे?”
उसने पिता से पूछा: “मुझे किसको देंगे आप?” पहली बार कोई जवाब नहीं मिला। फिर दूसरी बार पूछा, फिर तीसरी बार। तीसरी बार पिता ने झुँझलाहट में कहा: “मृत्यु को दूँगा”। यह क्रोध में निकला शब्द था, मगर एक ब्राह्मण का वचन है, इसलिए सच्चा हो गया।
नचिकेता तब यम के घर चला गया। पर यम घर पर नहीं थे। नचिकेता तीन रात बिना भोजन के यम के द्वार पर बैठा रहा। एक अतिथि ब्राह्मण को बिना सेवा के द्वार पर बैठाना बहुत बड़ा दोष माना जाता था। जब यम लौटे, तो उन्होंने तुरन्त नचिकेता को सम्मान दिया और कहा: “तुमने तीन रात भूखे बिताईं। मैं तुम्हें तीन वर देता हूँ।”
पहला वर: “मेरे पिता का क्रोध शान्त हो। वो मुझे पहचान लें।” यम ने तुरन्त दिया।
दूसरा वर: “स्वर्ग की प्राप्ति का यज्ञ-विज्ञान बताइए।” यम ने वो “नाचिकेत अग्नि” का रहस्य बताया।
तीसरा वर: “मनुष्य के मरने के बाद कुछ रहता है या नहीं? कुछ कहते हैं हाँ, कुछ कहते हैं नहीं। मुझे सच बताइए।”
यम चौंक गए। यह तो उनका असली रहस्य था। उन्होंने नचिकेता को बहलाने की कोशिश की: “और कुछ माँग लो। पुत्र-पौत्र, अनेक पशु, बहुत सी भूमि, सौ वर्ष का जीवन, सोना, हाथी, घोड़े, अप्सराएँ जैसी रूपवती स्त्रियाँ, संगीत, वाहन। बस मृत्यु का प्रश्न मत पूछो।”
नचिकेता ने सब ठुकरा दिया। “जो आज है, कल नहीं। यह सब क्षणिक है। एक नर देख चुका हो आपको, मृत्यु को, तो उसे ये क्षणिक भोग कहाँ अच्छे लगेंगे? आप ही बताइए, मरने के बाद क्या है। यही मेरा वर है।”
यम प्रसन्न हुए। नचिकेता पास हो गया परीक्षा में। और तब शुरू हुआ वो उपदेश जो बाकी पाँच वल्लियों में है। यह उपदेश “अमृत-ज्ञान” है, मृत्यु को जीत लेने का ज्ञान। और दिलचस्प यह है कि यह उपदेश खुद मृत्यु के देवता से आया है। मानो मृत्यु ने अपने ही अंत का रास्ता बताया हो।
वल्ली 1.1
मन्त्र 1.1.1
तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥
मन्त्र 1.1.2
नीयमानासु श्रद्धाविवेश सोऽमन्यत ॥
नचिकेता अभी छोटा था, कुमार। जब दान दी जा रही गायों को ले जाया जा रहा था, तो उसके मन में “श्रद्धा” का प्रवेश हुआ। उसने सोचना शुरू किया।
“श्रद्धा” शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ इसका मतलब केवल “आस्था” नहीं है। यह जिज्ञासा, भक्ति, और भीतर की एक तीखी जागृति, तीनों मिलकर बना भाव है। नचिकेता को महसूस हुआ कि कुछ गलत हो रहा है। वो छोटा था मगर देख रहा था।
मन्त्र 1.1.3
अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥
नचिकेता ने देखा कि जो गायें दान में दी जा रही थीं, उनका हाल यह था: उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी का पानी पी लिया है, अपना पूरा घास खा लिया है, अपना पूरा दूध दे चुकी हैं, इन्द्रियाँ कमज़ोर हैं। यानी वो लगभग समाप्त गायें थीं। नचिकेता ने सोचा: “ऐसी गायें देकर मेरे पिता आनन्दहीन लोकों में जा रहे हैं।”
यह बहुत तीखा observation है। ब्राह्मण-पुत्र होते हुए नचिकेता शास्त्रों को जानता था। उसे पता था कि दान का नियम क्या है। जो असली नहीं देता, उसका यज्ञ-फल भी असली नहीं मिलता। पिता खुद को छल रहे थे। और इस छल की क़ीमत बाद में चुकानी पड़ती है।
मन्त्र 1.1.4
द्वितीयं तृतीयं तँ होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥
नचिकेता ने पिता से पूछा: “हे पिता, मुझे किसको देंगे?” यह सवाल बहुत साफ़ था। अगर सब कुछ देना है, तो मैं भी हिस्सा हूँ। पिता ने जवाब नहीं दिया। नचिकेता ने दूसरी बार पूछा, फिर तीसरी बार। तीसरी बार पिता ने झुँझलाहट में कहा: “मृत्यु को दूँगा तुझे।”
एक बालक का यह सवाल अपने पिता को आइना दिखा रहा था। पिता शायद यह नहीं सोचना चाहते थे कि उनका दान आधा-अधूरा है। नचिकेता ने उन्हें मजबूर किया कि वो सच का सामना करें। और जब वो ख़ुद को घेरा हुआ पाए, तो क्रोध में बोल पड़े।
मन्त्र 1.1.5
किँ स्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ॥
नचिकेता खुद से बात करने लगा: “बहुत लोगों में मैं श्रेष्ठ रहा हूँ। बहुत लोगों के बीच मध्यम भी रहा हूँ। पर सबसे नीचे कभी नहीं। तो यम का अब मुझसे क्या कराने का इरादा है? पिता ने जो वचन दिया है, उसका क्या होगा?”
यह आत्म-मूल्यांकन है, अहंकार नहीं। नचिकेता खुद को दिलासा दे रहा है। उसे यह तो पता है कि वो माँ-बाप का अच्छा बेटा रहा है। तो यम के द्वार पर जाना उसकी सजा नहीं है। यह कुछ और है।
मन्त्र 1.1.6
सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥
“पिछले लोगों को देखो जो जा चुके हैं, और जो आ रहे हैं उन्हें देखो। मनुष्य फसल की तरह पकता है, मरता है, और फसल की तरह फिर जन्म लेता है।” यह नचिकेता खुद को कह रहा है कि मृत्यु का इतना डर क्यों? सब को जाना है।
फसल का रूपक बहुत सटीक है। फसल पकती है, कटती है, और फिर बीज से उग आती है। यह cycle है। शरीर भी ऐसा ही है। यहाँ नचिकेता पुनर्जन्म की धारणा को इशारे से छू रहा है। और इसी से उसे साहस मिल रहा है, कि यम के द्वार पर जाना समाप्ति नहीं, एक यात्रा है।
मन्त्र 1.1.7
तस्यैताँ शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥
(यम के घर पर लोग कह रहे हैं:) “एक अतिथि ब्राह्मण घर में प्रवेश कर रहा है। वो वैश्वानर (अग्नि के समान, या “सबका जठराग्नि”) है। उसकी शान्ति का प्रबंध करना चाहिए। हे वैवस्वत यम, पैर धोने का पानी लाओ।”
“अतिथि” शब्द का मतलब है “जिसकी कोई तिथि नहीं”, यानी जो बिना सूचना के आए। हिंदू परंपरा में अतिथि “देव” समान माना जाता है। ब्राह्मण अतिथि का विशेष महत्व है। उसे बिना सेवा के द्वार पर बैठाना सबसे बड़ा दोष है।
मन्त्र 1.1.8
चेष्टापूर्ते पुत्रपशूँश्च सर्वान् ।
एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो
यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥
“जिसके घर ब्राह्मण अतिथि भूखा रहता है, वो उस मूर्ख आदमी की आशाएँ, उम्मीदें, साथ, मीठी बातें, संगति-दान-यज्ञ का पुण्य, पुत्र-पशु, सब छीन लेता है।” यानी जो ब्राह्मण-अतिथि का सत्कार नहीं करता, उसके सब पुण्य बर्बाद हो जाते हैं।
यह यम के नौकर या यम के दूत खुद कह रहे हैं। वो बता रहे हैं कि क्या होगा अगर इस बच्चे को तीन रात बिना भोजन के यम के द्वार पर बिठाया गया।
मन्त्र 1.1.9
ऽनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु
तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥
यम घर आए और नचिकेता को देखा। उन्होंने नचिकेता से कहा: “हे ब्राह्मण, तुम तीन रात मेरे घर बिना भोजन के रहे, और अतिथि हो जिसको नमस्कार होना चाहिए। तुम्हें मेरा नमस्कार। मेरा कल्याण हो। इसके लिए मैं तुम्हें तीन वर देता हूँ। माँगो।”
यम का व्यवहार बहुत आदर का है। वो खुद इस बच्चे को नमस्कार करते हैं। वो जानते हैं कि नियम क्या है। तीन रात का “उपवास-दण्ड” तीन वर माँगता है, एक-एक रात के बदले एक वर।
मन्त्र 1.1.10
वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो ।
त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत्प्रतीत
एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥
नचिकेता पहला वर माँगता है: “हे मृत्यु, मेरे पिता गौतम (वंश का) क्रोध से मुक्त हों, उनका मन शान्त हो, सुप्रसन्न हो। आप के द्वारा छोड़े जाने पर वो मुझे पहचानें और स्वीकार करें। तीन वरों में से यह मेरा पहला वर है।”
नचिकेता का पहला वर अपने पिता के लिए है। यह एक बच्चे का सबसे मानवीय वर है। उसे पिता का प्यार वापस चाहिए। उसे यह चिंता नहीं कि उसे कुछ मिले, बल्कि उसके पिता को शान्ति मिले।
मन्त्र 1.1.11
औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।
सुखँ रात्रीः शयिता वीतमन्युः
त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥
यम ने कहा: “औद्दालकि-आरुणि (तुम्हारे पिता) तुम्हें पहचान लेंगे जैसे पहले पहचानते थे, मेरे द्वारा छोड़े जाने पर। वो रातें सुख से सोएँगे, क्रोध से मुक्त, यह देखकर कि तुम मृत्यु के मुख से छूट आए।”
यम ने पहला वर पूरा कर दिया। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि नचिकेता के पिता का दूसरा नाम “औद्दालकि-आरुणि” दिया गया है। यह उन्हें छान्दोग्य और बृहदारण्यक उपनिषदों के सुप्रसिद्ध ऋषि उद्दालक से जोड़ता है।
मन्त्र 1.1.12
न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।
उभे तीर्त्वाऽशनायापिपासे
शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥
नचिकेता दूसरा वर माँगने से पहले स्वर्ग का वर्णन करता है: “स्वर्गलोक में कोई भय नहीं। वहाँ आप (मृत्यु) नहीं हैं, न बुढ़ापे का डर है। भूख-प्यास से पार होकर, शोक से ऊपर उठकर, स्वर्गलोक में आनन्द मिलता है।” यह verse एक setup है, यह बताता है कि नचिकेता का दूसरा वर स्वर्ग-संबंधी होगा।
मन्त्र 1.1.13
प्रब्रूहि त्वँ श्रद्दधानाय मह्यम् ।
स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त
एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥
“हे मृत्यु, आप उस स्वर्ग-प्राप्ति वाले अग्नि (यज्ञ) को जानते हैं। मुझे, जो श्रद्धा रखता है, बताइए। स्वर्ग-लोक के निवासी अमरत्व का अनुभव करते हैं। यह मेरा दूसरा वर है।”
नचिकेता का दूसरा वर यज्ञ-विद्या है। यह यज्ञ-विद्या “नाचिकेत अग्नि” कही जाएगी। यह एक specific यज्ञ है जो स्वर्ग देता है। ध्यान दीजिए, यह अभी भी सांसारिक उपलब्धि है, “स्वर्ग” यानी temporary heaven, जहाँ भी एक दिन वापस आना है।
मन्त्र 1.1.14
स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।
अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां
विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥
यम ने कहा: “मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो। हे नचिकेता, यह स्वर्ग-प्राप्ति वाला अग्नि अनन्त लोकों की प्राप्ति और इस सब सृष्टि की प्रतिष्ठा देता है। यह अग्नि गुहा में, यानी हृदय की गहरी जगह में, छिपा है।”
“गुहायाम्” शब्द बार-बार आएगा। इसका मतलब है “गुफा में”, प्रतीकात्मक रूप से हृदय की भीतरी गुफा में। यानी यह यज्ञ बाहर भी होता है, और अंदर भी इसका एक रूप होता है।
मन्त्र 1.1.15
या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।
स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तं
अथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥
यम ने उस “लोक का आरंभ” करने वाले अग्नि का पूरा विवरण दिया: कितनी ईंटें होंगी, कैसी होंगी, कैसे रखी जाएंगी। नचिकेता ने सब कुछ ध्यान से सुना और दोहराया। यम संतुष्ट हुए।
यह एक छात्र की परीक्षा थी। यम ने पूरी विधि बताई, और नचिकेता ने सब कुछ याद रखकर वापस दोहरा दिया। यह “उपासन-मार्ग” का एक मानक तरीका है: सुनना, सोचना, याद रखना, और फिर अभ्यास करना।
मन्त्र 1.1.16
वरं तवेहाद्य ददामि भूयः ।
तवैव नाम्ना भविताऽयमग्निः
सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥
यम बहुत खुश हुए। उन्होंने नचिकेता से कहा: “मैं तुम्हें यहाँ एक और वर देता हूँ। यह अग्नि तुम्हारे नाम से जाना जाएगा, ‘नाचिकेत अग्नि’। और यह माला, जो अनेक रूपों वाली है, इसे ग्रहण करो।”
यह bonus वर है। यम इतने प्रसन्न थे कि नचिकेता का नाम इस यज्ञ के साथ permanently जुड़ गया, और एक माला (किसी प्रतीकात्मक सम्पदा) भी मिली।
मन्त्र 1.1.17
त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू ।
ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा
निचाय्येमाँ शान्तिमत्यन्तमेति ॥
“जो तीन बार इस नाचिकेत अग्नि की उपासना करता है, तीन (माता, पिता, गुरु) से जुड़कर, तीन कर्म (यज्ञ, दान, तप) करता है, वो जन्म-मृत्यु को पार कर जाता है। और जो ब्रह्मा से उत्पन्न देव को (अग्नि को) पूज्य मानकर ध्यान करता है, वो परम शान्ति को प्राप्त करता है।”
“त्रिणाचिकेतस्” का मतलब है तीन बार नाचिकेत अग्नि की उपासना करने वाला। तीन कर्म पारंपरिक रूप से यज्ञ, अध्ययन, और दान माने गए हैं।
मन्त्र 1.1.18
य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम् ।
स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य
शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥
“जो तीन बार नाचिकेत अग्नि का अभ्यास करता है, और इन तीन (नियमों) को जानता है, और इस तरह विद्वान् होकर नाचिकेत अग्नि का संचय करता है, वो मृत्यु के पाशों को आगे से हटा देता है, शोक से पार होकर स्वर्ग में आनन्द पाता है।”
यह दूसरे वर के लाभ का summary है।
मन्त्र 1.1.19
यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।
एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासः
तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥
यम ने कहा: “हे नचिकेता, यह तुम्हारा स्वर्ग-प्राप्ति वाला अग्नि है, जो तुमने दूसरे वर से माँगा। लोग इसे तुम्हारे नाम से ही जानेंगे। अब तीसरा वर माँगो।”
यम आगे बढ़ने को कह रहे हैं। दो वर पूरे हो गए, एक बाकी है।
मन्त्र 1.1.20
ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं
वराणामेष वरस्तृतीयः ॥
नचिकेता ने तीसरा वर माँगा: “मनुष्य के मरने के बाद कुछ रहता है या नहीं, इस पर बहुत मतभेद है। कुछ कहते हैं हाँ, कुछ कहते हैं नहीं। मैं आपसे सीखकर यह जानना चाहता हूँ। यह मेरा तीसरा वर है।”
यह वो सवाल है जो हर सोचने वाले इंसान के मन में आता है। मरने के बाद क्या? कुछ भी? या सब खत्म? नचिकेता पूछ रहा है, और वो अपने सवाल का जवाब किसी और से नहीं माँग रहा, खुद मृत्यु से माँग रहा है। यह एक तर्क-संगत choice है, अगर कोई जानता है तो यम जानते हैं।
मन्त्र 1.1.21
न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः ।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व
मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥
यम चौंक गए। उन्होंने कहा: “इस विषय पर तो देवता भी पहले संदेह कर चुके हैं। यह अति-सूक्ष्म धर्म है, आसानी से समझने वाला नहीं। हे नचिकेता, कोई और वर माँगो। मुझे मत बाध्य करो। इस वर को छोड़ो।”
यह दिलचस्प है। मृत्यु के देवता खुद कह रहे हैं कि यह विषय आसान नहीं है। पर यह उनकी पहली deflection भी है। वो असली रहस्य बताना नहीं चाहते।
मन्त्र 1.1.22
त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ ।
वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो
नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥
नचिकेता ने जवाब दिया: “अगर देवता भी संदेह में रहे हैं, और आप खुद कह रहे हैं कि यह आसानी से ज्ञेय नहीं, तो फिर आप जैसा बताने वाला और कौन मिलेगा? कोई और वर इस वर के बराबर नहीं हो सकता।”
नचिकेता तर्क का इस्तेमाल कर रहा है। वो कह रहा है: आप ही expert हैं इस विषय के। तो मैं किसी और से क्यों पूछूँ? यह वर तो सबसे क़ीमती है।
मन्त्र 1.1.23
बहून्पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् ।
भूमेर्महदायतनं वृणीष्व
स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥
यम ने अब प्रलोभन शुरू किया: “सौ साल जीने वाले पुत्र-पौत्र माँगो। बहुत पशु, हाथी, सोना, घोड़े लो। बहुत बड़ी भूमि का स्वामी बन जाओ। और तुम खुद भी जितने साल चाहो उतने जियो।”
यह बहुत मानवीय सूची है। हर कोई यही चाहता है: संतान, धन-धान्य, भूमि, लम्बी आयु। यम सब कुछ देने को तैयार हैं। पर एक शर्त: तीसरा वर वापस लो।
मन्त्र 1.1.24
वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च ।
महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि
कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥
“अगर इसी जैसा कोई वर हो तो माँगो: धन, लम्बी जीविका। हे नचिकेता, बहुत बड़ी भूमि पर शासन करो। मैं तुम्हें इच्छाओं का भोक्ता बनाऊँगा।”
यम और भी offer बढ़ा रहे हैं। एक राज्य, सब इच्छाओं का पूरा होना। यह वो सब है जो किसी राजा के पास होता है।
मन्त्र 1.1.25
सर्वान् कामाँश्छन्दतः प्रार्थयस्व ।
इमा रामाः सरथाः सतूर्या
न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ।
आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व
नचिकेतो मरणं माऽनुप्राक्षीः ॥
“मनुष्य-लोक में जो भी इच्छाएँ कठिन हैं, सब को तुम जैसे चाहो प्रार्थना करो। ये देखो ये रामाएँ (अप्सरा-तुल्य स्त्रियाँ), अपने रथों और संगीत के साथ। ऐसी (स्त्रियाँ) मनुष्यों को मिलनी असंभव हैं। इन्हें मेरी ओर से लो, इन से सेवा कराओ। हे नचिकेता, मरण की बात मत पूछो।”
अब यम भोग का चरम रूप पेश कर रहे हैं। दिव्य स्त्रियाँ, रथ, संगीत। यह heavenly entertainment है, जो किसी इंसान को नहीं मिलती। और बीच में फिर वही प्रार्थना: यह वर मत माँगो।
मन्त्र 1.1.26
सर्वेंद्रियाणां जरयन्ति तेजः ।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव
तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥
नचिकेता ने जवाब दिया: “हे अन्तक (मृत्यु का नाम), यह सब चीज़ें कल तक ही ठहरती हैं (नश्वर हैं)। ये सब इन्द्रियों के तेज को घटा देती हैं। और सारा जीवन भी छोटा ही है। आपके वाहन, आपके नाच-गाने आप ही रखिए।”
यह नचिकेता का philosophical insight है। उसने एक झटके में सब कुछ reject किया। सब temporary। सब draining। सब finite। ये सब मेरे लिए नहीं।
मन्त्र 1.1.27
लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा ।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं
वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥
“धन से मनुष्य संतुष्ट नहीं होता। हमने जब आपको देख ही लिया है, तो धन तो हम पा ही लेंगे। और जब तक आप शासन करेंगे (तब तक तो मरना है ही), तब तक जिएँगे। मगर वर जो मुझे चाहिए, वो वही है।”
यह बहुत गहरी बात है। “धन से मनुष्य संतुष्ट नहीं होता।” यह एक eternal truth है। और दूसरी बात: “हमने आपको देख लिया है।” यानी जो मृत्यु को देख चुका हो, उसे फिर सांसारिक चीज़ें क्यों लुभाएँगी?
मन्त्र 1.1.28
जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् ।
अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदान्
अतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥
“जब (आप जैसे) अजर-अमर के पास पहुँचकर, यह जान कर कि मैं नश्वर हूँ और निचले स्तर पर हूँ, फिर रूप-रति-प्रमोद के बारे में सोचते हुए, बहुत लम्बे जीवन में भी कौन रम सकेगा?”
नचिकेता का तर्क यह है: मैं आपके पास पहुँच गया, जो खुद अमर हैं। मुझे पता चल गया कि असली अमरता कैसी होती है। अब मैं नाशवान चीज़ों में दिल कैसे लगाऊँगा? यह possibility का door मेरे लिए खुल गया है।
मन्त्र 1.1.29
यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।
योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो
नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥
“हे मृत्यु, जिस विषय पर इतना मतभेद है, जो परलोक के बारे में है, वो हमें बताइए। यह वर एक गहरे रहस्य में प्रवेश करता है। नचिकेता इसके अलावा कुछ नहीं माँगता।”
पहली वल्ली यहाँ खत्म होती है। नचिकेता ने सब प्रलोभन ठुकरा दिए। यम के सामने जो खड़ा है, वो असली शिष्य है। अब यम कुछ नहीं छिपा सकते। अगली वल्ली से असली उपदेश शुरू होता है।
वल्ली 1.2
मन्त्र 1.2.1
स्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः ।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु
भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥
यम कहते हैं: “एक है श्रेय, और एक है प्रेय। ये दोनों अलग-अलग लक्ष्य वाले हैं। पर दोनों पुरुष को बाँधते हैं। जो श्रेय को चुनता है, उसका कल्याण होता है। जो प्रेय को चुनता है, वो असली अर्थ से वंचित रह जाता है।”
यह कठोपनिषद् का सबसे basic और सबसे practical सबक है। “श्रेय” यानी जो दूरगामी रूप से अच्छा है, कल्याणकारी। “प्रेय” यानी जो अभी पसंद आ रहा है, सुख देने वाला।
हर रोज़ हम इस choice के सामने खड़े होते हैं। उठकर workout करूँ या sleep in करूँ? चीनी छोड़ूँ या एक और मिठाई खाऊँ? सच बोलूँ और थोड़ी असुविधा झेलूँ, या बहाना बना दूँ? Investment करूँ या आज खर्च कर डालूँ? हर बार दो रास्ते दिखते हैं। एक तुरंत सुख देता है, एक देर से। उपनिषद् हमें यह नहीं कहती कि प्रेय को छोड़ दो। यह कहती है: कम-से-कम पहचानो कि कौन क्या है। फिर choice तुम्हारी।
मन्त्र 1.2.2
तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते
प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ॥
“श्रेय और प्रेय, दोनों मनुष्य के पास आते हैं। धीर पुरुष दोनों की परीक्षा करके भेद करता है। धीर श्रेय को चुनता है, मन्द (बुद्धिहीन) प्रेय को चुनता है, सिर्फ़ इसलिए कि उसकी ‘योग-क्षेम’ (अभी की सुरक्षा और सुविधा) चलती रहे।”
“धीर” यानी जो स्थिर है, जो विचार करता है। “मन्द” यानी जो आलसी सोच का है, जो instant gratification में फँसा है। यह कोई moral judgement नहीं है, यह एक pattern का वर्णन है।
मन्त्र 1.2.3
अभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ।
नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो
यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥
“हे नचिकेता, तुमने प्रिय और प्रियरूप कामनाओं को विचार करके भी छोड़ दिया। तुमने उस धन-सम्पदा वाली माला (श्रृंखला) नहीं स्वीकार की, जिसमें बहुत से मनुष्य डूब जाते हैं।”
यम नचिकेता की तारीफ़ कर रहे हैं। उन्होंने सब प्रलोभन रखे थे, और एक छोटे बालक ने सब ठुकरा दिए। यह असाधारण है। बहुत से लोग धन की उस chain में फँसकर डूब जाते हैं। नचिकेता बच गया।
मन्त्र 1.2.4
अविद्या या च विद्येति ज्ञाता ।
विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये
न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥
“विद्या और अविद्या, ये दोनों दूर-दूर हैं, उलटी दिशा में जाने वाली। मैं तुम्हें विद्या का आकांक्षी मानता हूँ, हे नचिकेता। बहुत सी कामनाओं ने तुम्हें लोलुप नहीं बनाया।”
“विद्या” यानी आत्म-ज्ञान, जो मुक्ति की तरफ़ ले जाता है। “अविद्या” यानी सांसारिक कामनाओं की दिशा। दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं। नचिकेता विद्या का यात्री है, यह बात साबित हो चुकी है।
मन्त्र 1.2.5
स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा
अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥
“अविद्या में रहकर भी जो खुद को धीर और पंडित मान बैठते हैं, वो मूढ़ इधर-उधर भटकते रहते हैं, जैसे अंधे को अंधा रास्ता दिखाए।”
यह बहुत तीखा observation है। दुनिया में कई बार वो लोग leader होते हैं जो खुद भी रास्ता नहीं जानते। फिर वो दूसरों को ले जाते हैं, और सब मिलकर गड्ढे में गिर पड़ते हैं।
मन्त्र 1.2.6
प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी
पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥
“जो बालक (अनुभवहीन) है, प्रमाद और धन के मोह में मूढ़ है, उसे परलोक का ज्ञान नहीं चमकता। ‘यह लोक है, परलोक नहीं है’, ऐसा मानने वाला बार-बार मेरे (मृत्यु के) वश में आता है।”
यम mortality का logic स्पष्ट कर रहे हैं। जो सिर्फ़ इस लोक को मानता है, वो बार-बार जन्म और मृत्यु के चक्र में पड़ता है। उसे कभी आज़ादी नहीं मिलती।
मन्त्र 1.2.7
शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः ।
आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा
आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥
“जिस (आत्म-तत्व) को बहुत लोग सुनने को भी नहीं पाते, बहुत लोग सुनकर भी नहीं समझते। इसे बताने वाला (गुरु) आश्चर्यजनक है। इसे पाने वाला (शिष्य) कुशल है। और जानने वाला, जो किसी कुशल से शिक्षा लेकर आया है, वो भी आश्चर्यजनक है।”
यह तीन-स्तर का दुर्लभता बता रहा है। योग्य गुरु दुर्लभ। योग्य शिष्य दुर्लभ। और दोनों का मिलन और भी दुर्लभ। यह उपनिषदों में बार-बार आने वाली theme है।
मन्त्र 1.2.8
सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।
अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति
अणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥
“साधारण आदमी से सुनकर यह आत्म-तत्व अच्छी तरह नहीं समझा जा सकता, चाहे जितनी देर सोचो। अगर सीखा गया हो किसी आत्म-ज्ञानी से, तभी इस पर पकड़ होती है। यह अणु से भी अणु है, तर्क की पकड़ से बाहर।”
“अनन्य-प्रोक्त” यानी जो उससे जुड़ा हुआ हो, उससे ही सुना गया हो। यानी जो खुद आत्म-ज्ञान में स्थित हो, उसी से यह विद्या वास्तव में आती है।
मन्त्र 1.2.9
प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ।
यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि
त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥
“हे प्रिय (नचिकेता), यह बुद्धि (आत्म-ज्ञान) तर्क से नहीं पाई जाती। यह तो किसी दूसरे (आत्म-ज्ञानी) के द्वारा कही जाने पर ही ठीक समझ में आती है। तुमने सच्ची धृति (दृढ़ता) पाई है। तुम जैसा प्रश्न करने वाला हमें मिले।”
यम नचिकेता को अपना पुरस्कार दे रहे हैं। “तुम जैसा शिष्य हमें मिले।” यह एक गुरु की सबसे बड़ी प्रशंसा है।
मन्त्र 1.2.10
न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् ।
ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निः
अनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥
“मैं जानता हूँ कि (कर्मों से मिला हुआ) धन-कोश अनित्य है। नश्वर वस्तुओं से नित्य (अमर) तत्व नहीं मिलता। फिर भी मैंने नाचिकेत-अग्नि का संचय किया, और नश्वर साधनों से नित्य फल पाया।”
यम विरोधाभास बता रहे हैं। यज्ञ-कर्म से मिला फल अंततः नश्वर है। पर अगर ठीक से किया जाए, तो उसके माध्यम से नित्य तत्व की एक झलक मिल सकती है।
मन्त्र 1.2.11
क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् ।
स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा
धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥
“हे नचिकेता, तुमने काम की प्राप्ति, जगत् की प्रतिष्ठा, यज्ञ-कर्म का अनन्त फल, अभय का दूसरा किनारा, बड़े-बड़े स्तोत्र, विशाल कीर्ति, सब देखकर भी धैर्य से सब छोड़ दिया।”
यह उन सब चीज़ों की एक list है जो दुनिया मानती है कि “सब कुछ” हैं। और नचिकेता ने सब को देखकर, समझकर ठुकराया।
मन्त्र 1.2.12
गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ।
अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं
मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥
“वो (आत्म-तत्व) दुर्दर्श है (कठिनाई से दिखता है), गूढ़ है, गुहा में (हृदय की भीतरी जगह में) छिपा है, गह्वर (कठिन रास्ते) में स्थित है, पुरातन है। अध्यात्म-योग के अधिगम से उस देव को जानकर, धीर पुरुष हर्ष और शोक, दोनों को छोड़ देता है।”
“अध्यात्म-योग” यानी आत्मा का योग, आत्म-ज्ञान का अभ्यास। जब वो प्राप्त होता है, तब “हर्ष-शोक” यानी सुख-दुःख की जो उठा-पटक है, वो रुक जाती है। यह कोई emotional anesthesia नहीं है। यह एक स्थिरता है जिसमें भीतर का संतुलन सुख-दुःख से बड़ा हो जाता है।
मन्त्र 1.2.13
प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य ।
स मोदते मोदनीयँ हि लब्ध्वा
विवृतँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥
“यह सुनकर, अच्छी तरह ग्रहण करके, मरणधर्मा मनुष्य भी इस धर्म्य (धर्म-संबंधी) सूक्ष्म तत्व को निकाल कर पाता है, और आनन्द करता है, क्योंकि वो आनन्दयोग्य वस्तु को पा लेता है। मैं समझता हूँ, नचिकेता, अब तुम्हारे लिए (ज्ञान का) घर खुला है।”
यम कह रहे हैं कि नचिकेता अब receive करने की स्थिति में है।
मन्त्र 1.2.14
दन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च
यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥
नचिकेता ने एक धमाकेदार प्रश्न पूछा: “जो धर्म से भी परे है, अधर्म से भी परे है, किए और न-किए कर्मों से परे है, भूतकाल और भविष्यकाल से परे है, उस (तत्व) के बारे में, जो आप देखते हैं, मुझे बताइए।”
यह प्रश्न बहुत बारीक है। वो कुछ ऐसा पूछ रहा है जो हर सापेक्षता से ऊपर है। धर्म-अधर्म जैसी दार्शनिक श्रेणियों से ऊपर। समय से ऊपर। यानी जो absolute है।
मन्त्र 1.2.15
तपाꣳसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदꣳ सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥
यम का जवाब: “जिस पद को सब वेद कहते हैं, सारे तप जिसकी बात करते हैं, जिसकी इच्छा से लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस पद को मैं तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ। वो (पद) ‘ओम्’ है।”
एक शब्द में पूरा उत्तर: “ओम्”। यह कठोपनिषद् का एक central revelation है। “ओम्” केवल मन्त्र नहीं, बल्कि ब्रह्म का स्वरूप-वाचक है।
मन्त्र 1.2.16
एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥
“यह अक्षर ही ब्रह्म है, यह अक्षर ही परम है। इस अक्षर को जानकर, जो जो भी चाहता है, उसे वही मिलता है।”
“अक्षर” यानी जो क्षीण नहीं होता, अविनाशी। ओम् वो ध्वनि है जो हर ध्वनि का सार है। यह ब्रह्म का सबसे क़रीबी प्रतीक है।
मन्त्र 1.2.17
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥
“यह सबसे श्रेष्ठ आलम्बन (सहारा) है। यह परम आलम्बन है। इस आलम्बन को जानकर मनुष्य ब्रह्म-लोक में महिमामय होता है।”
“आलम्बन” यानी जिसका सहारा लो। ओम् एक ऐसा सहारा है जो ब्रह्म तक ले जाता है, खुद ब्रह्म का रूप है।
मन्त्र 1.2.18
न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
“यह विद्वान् (आत्मा) न जन्म लेता है, न मरता है। यह न किसी से उत्पन्न हुआ है, न इससे कुछ उत्पन्न हुआ। यह अजन्मा है, नित्य है, शाश्वत है, पुराण (बहुत पुराना) है। शरीर के हन्यमान (मारे जाने) पर भी यह हन्यमान नहीं होता।”
यह कठोपनिषद् का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है। भगवद् गीता 2.20 इसका लगभग शाब्दिक अनुवाद है: “न जायते म्रियते वा कदाचित्…” कृष्ण इस श्लोक को अर्जुन के सामने दोहराते हैं जब अर्जुन को मृत्यु का भय सता रहा होता है।
यहाँ यम स्पष्ट कर रहे हैं कि वो जो शरीर के साथ नहीं जाता, वो आत्मा है। शरीर मरता है, आत्मा नहीं। यह दार्शनिक तौर पर बहुत बड़ा statement है: चेतना और शरीर अलग हैं।
एक engineer के लिए यह claim बहुत counter-intuitive लगता है। मेरा brain ही मेरी चेतना है, इस पर modern neuroscience से मेरा confidence है। उपनिषद् कह रही है कि नहीं, brain एक उपकरण है। चेतना उससे अलग है। यह एक hypothesis है जिसकी जाँच की जा सकती है, मगर साधारण experiment से नहीं। उपनिषद् कहती है कि जो experiment उसकी जाँच का है, वो खुद की चेतना का गहरा अनुसंधान है, ध्यान।
मन्त्र 1.2.19
उभौ तौ न विजानीतो नायँ हन्ति न हन्यते ॥
“अगर मारने वाला सोचता है कि वो मार रहा है, और मरने वाला सोचता है कि वो मारा जा रहा है, तो दोनों नहीं जानते। यह (आत्मा) न मारती है, न मारी जाती है।”
गीता 2.19 भी यही श्लोक है। यह 1.2.18 का logical extension है। शरीर के स्तर पर हत्या होती है, मगर आत्मा के स्तर पर कुछ नहीं होता। हत्यारा और हत्या किया गया, दोनों इस सच्चाई से अनजान हैं।
मन्त्र 1.2.20
नात्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥
“अणु से भी छोटा, बड़े से भी बड़ा, इस प्राणी का आत्मा गुहा (हृदय) में स्थित है। जो अक्रतु (इच्छाओं से रहित) है, वीतशोक है, वही देखता है आत्मा की महिमा को, धातु (इन्द्रियों, मन) की प्रसन्नता से।”
आत्मा का विरोधाभासी वर्णन: सबसे छोटे से छोटा, सबसे बड़े से बड़ा। यह incomparable है, हर scale से बाहर। और वो जो इच्छाओं से मुक्त है, शोक से मुक्त है, उसकी इन्द्रियाँ शान्त हो जाती हैं, और तब वो आत्मा को देख पाता है।
मन्त्र 1.2.21
कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥
“बैठा हुआ भी दूर चलता है, लेटा हुआ भी सब जगह जाता है। मेरे (यम के) अलावा उस मद-अमद वाले देव को कौन जान सकता है?”
आत्मा का movement शरीर के movement से अलग है। बैठे-बैठे आत्मा कहीं भी पहुँच सकती है। मन एक उदाहरण है, अभी यहाँ, फिर पल भर में बचपन की किसी गली में। आत्मा इससे भी सूक्ष्म है।
“मद-अमद” का मतलब है harsha-shoka से रहित, या मद और मद-रहित दोनों स्थितियों से परे।
मन्त्र 1.2.22
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥
“शरीर-रहित होते हुए भी शरीरों में स्थित, अनवस्थित (परिवर्तनशील) में रहते हुए भी अवस्थित (स्थिर)। उस महान्, विभु (व्यापक) आत्मा को जानकर धीर शोक नहीं करता।”
आत्मा के दो विरोधाभासी पहलू: वो शरीर में रहती है मगर खुद शरीर नहीं है। वो बदलते हुए शरीर में स्थित है मगर खुद नहीं बदलती।
मन्त्र 1.2.23
न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूꣳ स्वाम् ॥
“यह आत्मा प्रवचन (बहुत बातें सुनने) से नहीं मिलती, न बुद्धि से, न बहुत श्रुति (शास्त्र) पढ़ने से। यह उसे ही मिलती है जिसे यह स्वयं चुनती है। उसके लिए यह आत्मा अपना तन-रूप खोल देती है।”
यह एक चौंकाने वाला statement है। आत्म-ज्ञान effort से नहीं मिलता, grace से मिलता है। यह आत्म-तत्व खुद उसे चुनती है जिसे वो खोलना चाहती है।
यह fatalism नहीं है। यह कह रही है कि जब आप तैयार हो जाते हैं, जब आपकी जिज्ञासा निःस्वार्थ हो जाती है, जब आप सब छोड़ चुके होते हैं, तब आत्मा खुद आपको खोलकर दिखाई देती है। तब तक effort जारी रखो, मगर ज्ञान मिलने का अंतिम moment “आत्मा का chooses” वाला है।
मन्त्र 1.2.24
नाशान्तमानसो वाऽपि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥
“जो दुश्चरितों (अनुचित कर्मों) से विरत नहीं है, जो शान्त नहीं है, जो समाहित (focused) नहीं है, जिसका मन शान्त नहीं है, वो प्रज्ञा से भी इस आत्मा को नहीं पा सकता।”
यह precondition है। पहले conduct ठीक करो, फिर मन को शान्त करो, फिर एकाग्रता लाओ। उसके बाद ही प्रज्ञा का काम शुरू होता है। बिना नींव के ऊँचाई संभव नहीं।
मन्त्र 1.2.25
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥
“जिसका ब्रह्म (ज्ञानी) और क्षत्र (शूरवीर), दोनों भोजन हैं, और मृत्यु जिसका चटनी (मसाला) है, ऐसी (परम सत्ता) को कौन जानता है, वो कहाँ है?”
यह एक poetic रूपक है। ब्रह्म-तत्व इतना बड़ा है कि सब ज्ञानी और सब वीर उसके सामने भोजन के बराबर हैं, और मृत्यु तो उस भोजन का मसाला भर। यानी वो सब को निगल जाता है।
वल्ली 1.3
मन्त्र 1.3.1
गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति
पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥
“दो (आत्माएँ) सुकृत-लोक में ऋत (सत्य) का रसपान कर रहे हैं, परम परार्ध (हृदय की गुहा) में प्रवेश किए हुए। ब्रह्मवेत्ता उन्हें छाया और प्रकाश की तरह बताते हैं। पञ्चाग्नि के साधक और त्रिणाचिकेत (तीन बार नाचिकेत अग्नि करने वाले) इन्हें जानते हैं।”
“दो” यानी जीवात्मा और परमात्मा, या भोक्ता और साक्षी। दोनों एक ही हृदय में हैं। एक छाया की तरह (जीवात्मा, जो भोग में लिप्त), एक प्रकाश की तरह (साक्षी)।
मन्त्र 1.3.2
अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतँ शकेमहि ॥
“जो (यज्ञ) यजमानों के लिए सेतु है, जो अक्षर है, जो परम ब्रह्म है, जो भय से पार जाने की इच्छा रखने वालों के लिए पार है, उस नाचिकेत-अग्नि का हम अभ्यास कर सकें।”
यह एक प्रार्थना है। नाचिकेत-अग्नि यहाँ केवल यज्ञ नहीं है, ब्रह्म का प्रतीक है, जो भय से पार ले जाता है।
मन्त्र 1.3.3
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥
“आत्मा को रथ का स्वामी (रथी) जानो। शरीर रथ है। बुद्धि सारथी है। मन लगाम है।”
यह कठोपनिषद् का सबसे प्रसिद्ध रूपक है। पूरा मनुष्य एक रथ-यात्रा की तरह दिखाया गया है। हर हिस्से का अपना role है। यह रूपक भगवद् गीता में भी आता है, और बाद में Plato के “Phaedrus” में भी रथ-रूपक मिलता है (हालाँकि भारत के काफ़ी बाद का है)।
मन्त्र 1.3.4
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥
“इन्द्रियों को घोड़े कहा गया है। विषय (इन्द्रियों के विषय) उनके लिए रास्ते हैं। आत्मा इन्द्रिय-मन से युक्त होकर भोक्ता कहलाती है।”
तो पूरा रूपक: आत्मा (रथी) रथ में बैठी है। बुद्धि (सारथी) घोड़ों को नियंत्रित करती है। मन (लगाम) सारथी का हाथ है। इन्द्रियाँ (घोड़े) दौड़ती हैं। और रास्ता है विषयों का, यानी रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द।
एक engineer यह सोच सकता है: रथ एक complex distributed system है। आत्मा end-user है, जिसके लिए सिस्टम बना है। शरीर hardware है। बुद्धि decision-making layer है (controller)। मन message-passing layer है (communication bus)। इन्द्रियाँ peripherals हैं (sensors, actuators)। विषय data हैं जो आते-जाते हैं।
अगर controller (बुद्धि) कमज़ोर है, और messaging (मन) loose है, तो peripherals (इन्द्रियाँ) अपनी मर्ज़ी से चलने लगते हैं। data (विषय) overflow कर देता है। end-user (आत्मा) को कुछ समझ नहीं आता। पूरा system चलता है मगर user को chaos। यही “अविवेकी जीवन” है।
मन्त्र 1.3.5
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥
“जो अविज्ञानी (बिना विवेक के) है, जिसका मन सदा अयुक्त (बिखरा हुआ) रहता है, उसकी इन्द्रियाँ नियंत्रण में नहीं रहतीं, जैसे एक सारथी के दुष्ट घोड़े।”
दुष्ट घोड़े अपनी मर्ज़ी से दौड़ते हैं। हर इन्द्रिय अपने अपने विषय की तरफ़ खिंचती है। तब आत्मा (रथी) एक यात्रा नहीं कर पाती, बस झटके खाती रहती है।
मन्त्र 1.3.6
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥
“और जो विज्ञानी (विवेकी) है, जिसका मन सदा युक्त (एकाग्र) है, उसकी इन्द्रियाँ वश्य (नियंत्रित) रहती हैं, जैसे एक सारथी के अच्छे घोड़े।”
अच्छे घोड़े सारथी की लगाम सुनते हैं। फिर रथ सुगमता से चलता है। यही “विवेकी जीवन” है।
मन्त्र 1.3.7
न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥
“जो अविज्ञानी है, मन-शून्य है, सदा अशुचि (मलिन) है, वो उस (परम) पद को नहीं पाता, बल्कि संसार-चक्र में फँसा रहता है।”
यह कोई judgment नहीं है, एक mechanical statement है। बिना विवेक के, बिना मन-नियंत्रण के, बिना शुद्धता के, परम-तत्व मिल नहीं सकता।
मन्त्र 1.3.8
स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥
“और जो विज्ञानी है, मन-संयुक्त है, सदा शुचि है, वो उस पद को पाता है, जहाँ से वो फिर जन्म नहीं लेता।”
तीन गुण: विवेक, मन-नियंत्रण, शुद्धता। ये तीनों मिलकर मुक्ति का रास्ता बनाते हैं।
मन्त्र 1.3.9
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥
“जिसका सारथी विज्ञान (विवेकी बुद्धि) है, और जिसके पास मन की लगाम है, वो मनुष्य यात्रा के पार पहुँचता है, उस विष्णु के परम पद को।”
यहाँ “विष्णु” का प्रयोग ब्रह्म के अर्थ में है। विष्णु यानी “व्यापक”, सर्वत्र फैले हुए। उपनिषदों के समय “विष्णु” अभी देवता-त्रिमूर्ति का व्यक्तिगत रूप नहीं बने थे, यह विशेषण रूप में था।
मन्त्र 1.3.10
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥
“इन्द्रियों से सूक्ष्म (परे) हैं विषय। विषयों से सूक्ष्म है मन। मन से सूक्ष्म है बुद्धि। बुद्धि से सूक्ष्म है महान् (आत्मा)।”
यह एक सीढ़ी है, सूक्ष्मता की। हम बाहर देखते हैं तो इन्द्रियाँ दिखती हैं। इन्द्रियाँ विषयों को पकड़ती हैं। विषय मन में आते हैं। मन को बुद्धि नियंत्रित करती है। बुद्धि के पीछे “महान्” है, यानी अहंकार के समक्ष का एक तत्व।
मन्त्र 1.3.11
पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥
“महान् से परे है अव्यक्त (मूल प्रकृति)। अव्यक्त से परे है पुरुष। पुरुष से परे कुछ नहीं। यही चरम सीमा है, यही परम गति है।”
सीढ़ी का अंत: पुरुष (परम चेतना)। इसके बाद कुछ नहीं। यही manzil है। यह सांख्य दर्शन की terminology से मिलती-जुलती है।
मन्त्र 1.3.12
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥
“यह आत्मा सब प्राणियों में गूढ़ (छिपी) है, सीधे प्रकट नहीं होती। मगर सूक्ष्म-दर्शियों को अपनी अग्र्य (तीखी), सूक्ष्म बुद्धि से दिखती है।”
“सूक्ष्मदर्शी” यानी वो जो बारीकी से देखते हैं। आत्मा सब में है मगर सब को नहीं दिखती। एक तीखी, साफ़ बुद्धि चाहिए।
मन्त्र 1.3.13
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥
“प्राज्ञ (विवेकी) पुरुष वाणी को मन में स्थित करे, मन को ज्ञान-आत्मा (बुद्धि) में, बुद्धि को महद्-आत्मा (अहंकार/महत्) में, और महद्-आत्मा को शान्त आत्मा में स्थित करे।”
यह ध्यान की methodology है, बाहर से अंदर की तरफ़। पहले वाणी रोको, फिर मन को रोको, फिर बुद्धि को, और अंत में सब “शान्त आत्मा” में मिल जाता है।
मन्त्र 1.3.14
प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया
दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥
“उठो! जागो! श्रेष्ठ पुरुषों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करो। यह रास्ता उस्तरे की धार जैसा तीखा है, पार करना कठिन है। कवि (मनीषी) इसे कठिन मार्ग कहते हैं।”
यह कठोपनिषद् का सबसे ऊर्जावान और प्रसिद्ध मन्त्र है। विवेकानन्द ने इस मन्त्र को अपना motto बनाया। उन्होंने इसे पूरी 19वीं और 20वीं शताब्दी के भारत के लिए एक wake-up call की तरह इस्तेमाल किया।
“उठो, जागो”। हम सब एक तरह की नींद में हैं। हमें यह नहीं पता कि हम क्या हैं। बाहर की चीज़ें हमें खींचती हैं, हम उनके पीछे भागते हैं, और एक दिन जीवन खत्म हो जाता है।
“उस्तरे की धार जैसा तीखा”। यानी पैर ज़रा भी इधर-उधर हुआ तो कट जाओगे। साधना का रास्ता ऐसा है। यहाँ हल्की-सी लापरवाही भी fatal है।
मन्त्र 1.3.15
तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं
निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥
“जो शब्द-रहित है, स्पर्श-रहित है, रूप-रहित है, अव्यय (नष्ट-न-होने वाला) है, रस-रहित है, नित्य है, गन्ध-रहित है, अनादि-अनन्त है, महान् (बुद्धि-तत्व) से भी परे है, ध्रुव (स्थिर) है, उसे जान कर मनुष्य मृत्यु के मुख से छूट जाता है।”
आत्मा का पूरा नकारात्मक वर्णन: कोई इन्द्रिय इसे पकड़ नहीं सकती। यह “नेति-नेति” का सबसे साफ़ रूप है।
मन्त्र 1.3.16
उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥
“नाचिकेत-उपाख्यान, जो मृत्यु (यम) के द्वारा सुनाया गया है, सनातन है। इसे कहने और सुनने वाला मेधावी ब्रह्म-लोक में महिमामय होता है।”
यह एक phala-shruti है, यानी सुनने का फल बताया जा रहा है। यह कथा अमर है, और जो इसे सुनता है, उसे भी अमरत्व की झलक मिलती है।
मन्त्र 1.3.17
प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते ।
तदानन्त्याय कल्पत इति ॥
“जो इस परम गुह्य को ब्रह्म-सभा में सुनाए, या श्राद्ध-काल में प्रयत्न से सुनाए, वो अनन्त (पद) के योग्य होता है। वो अनन्त के योग्य होता है।”
“अनन्त्याय कल्पते” दो बार दोहराया गया है, यह उपनिषदों का closing emphasis है।
यहाँ पहले अध्याय का अंत होता है। नचिकेता को मूल teaching मिल गई है। दूसरे अध्याय की तीन वल्लियों में यम और गहराई में जाएंगे।
वल्ली 2.1
मन्त्र 2.1.1
स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् ।
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष-
दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥
“स्वयम्भू (आत्म-जन्मा ब्रह्म) ने इन्द्रिय-रूपी छेद बाहर की तरफ़ बनाए। इसलिए मनुष्य बाहर देखता है, अंदर नहीं। पर कोई धीर पुरुष, अमरत्व की इच्छा से, आँख को मोड़कर भीतर के आत्मा को देखता है।”
यह बहुत practical observation है। हमारी आँख बाहर देखती है, कान बाहर सुनता है, मुँह बाहर बोलता है। डिज़ाइन ही ऐसा है। पर ज्ञान अंदर है। तो ज्ञानी वो है जो इस default को उलट देता है। आँख को बंद करता है, अंदर देखता है।
मन्त्र 2.1.2
स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् ।
अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा
ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥
“बालक (अपरिपक्व) बाहर की कामनाओं के पीछे जाते हैं और मृत्यु के फैले हुए पाश में फँस जाते हैं। पर धीर पुरुष अमरत्व को जानकर, अध्रुव (नश्वर) में ध्रुव (स्थायी) की प्रार्थना नहीं करते।”
नश्वर चीज़ों से स्थायी सुख की उम्मीद रखना यही सबसे बड़ी भूल है। पैसा गिर सकता है। शरीर ढल जाता है। रिश्ते बदल जाते हैं। इनसे “हमेशा वाला सुख” मिलने का intention ही misalignment है।
मन्त्र 2.1.3
एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥
“जिसके द्वारा (आत्मा द्वारा) रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और कामनाएँ जानी जाती हैं, उसी से सब कुछ जानता है। फिर क्या बच जाता है (जो उसे न पता हो)? यही (आत्मा) वो है।”
“एतद्वै तत्” एक refrain है, यानी “यही वो है”। इस वल्ली में कई मन्त्रों के बाद आएगा। यानी, जिस आत्मा की बात नचिकेता ने पूछी थी, यही वो है।
मन्त्र 2.1.4
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥
“जिसके द्वारा स्वप्न-अन्त और जागरण-अन्त, दोनों अवस्थाओं को कोई देखता है, उस महान् विभु आत्मा को जानकर धीर शोक नहीं करता।”
जागते हुए भी आप देखते हैं, सपने में भी। दोनों में देखने वाला एक ही है। यह witness self। नाटक बदलते हैं, audience वही है।
मन्त्र 2.1.5
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥
“जो इस मधु को खाने वाले (कर्म-फल का भोक्ता) आत्मा को, जो जीव-रूप में पास ही है, भूत-भविष्य का ईशान (स्वामी), जानता है, वो (अपनी या किसी की) रक्षा से व्याकुल नहीं रहता। यही वो है।”
मन्त्र 2.1.6
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥
“जो (आत्मा) तप से पहले उत्पन्न हुआ, जल से पहले उत्पन्न हुआ, जो गुहा में प्रवेश करके स्थित है, और जो हर भूत (प्राणी) के द्वारा देखा गया (दिखाई दिया) है। यही वो है।”
मन्त्र 2.1.7
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥
“जो प्राण से संयुक्त होकर ‘अदिति’ (सब देवताओं की माता) के रूप में प्रकट होती है, जो गुहा में प्रवेश करके स्थित है, जो सब प्राणियों के माध्यम से जन्म लेती है। यही वो है।”
मन्त्र 2.1.8
दिवे दिवे ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः । एतद्वै तत् ॥
“अरणि (काठ) में जातवेदा अग्नि स्थित है, जैसे गर्भिणी के गर्भ में बच्चा। हर दिन जागरूक, हविष्य-धारी मनुष्यों द्वारा यह अग्नि पूज्य है। यही वो है।”
अरणि वो लकड़ी है जिससे यज्ञ की अग्नि घर्षण से निकाली जाती है। यह रूपक है: अग्नि लकड़ी में अव्यक्त रूप से है, जैसे आत्मा शरीर में।
मन्त्र 2.1.9
तं देवाः सर्वेऽर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥
“जिससे सूर्य उगता है, और जहाँ अस्त होता है, उसी में सब देव स्थित हैं। उसे कोई भी पार नहीं कर सकता। यही वो है।”
जो सूर्य की भी source है, वो ब्रह्म है। सब देवता, सब शक्तियाँ उसी में हैं।
मन्त्र 2.1.10
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥
“जो यहाँ (इस लोक में) है, वही वहाँ (परलोक में) है। जो वहाँ है, वही यहाँ। जो यहाँ अनेकता देखता है, वो मृत्यु से मृत्यु को पाता है।”
“अनेकता” यानी सब को अलग-अलग देखना। यह माया है। असली सच्चाई यह है कि एक ही तत्व सब में है। यह अद्वैत वेदान्त की एक central declaration है।
मन्त्र 2.1.11
मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥
“इसे (आत्मा को) मन से ही प्राप्त करना है। यहाँ कुछ भी अनेक नहीं है। जो यहाँ अनेकता देखता है, वो मृत्यु से मृत्यु को जाता है।”
दो बातें: एक, मन से ही प्राप्ति है, बाहर खोज से नहीं। दो, अनेकता का दर्शन ही असली समस्या है।
मन्त्र 2.1.12
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥
“अंगूठे के बराबर एक पुरुष आत्मा के बीच में स्थित है। भूत-भविष्य का स्वामी। उसे जानकर मनुष्य (अपनी) रक्षा से व्याकुल नहीं रहता। यही वो है।”
“अंगूठे के बराबर” यह एक प्राचीन रूपक है। मतलब बहुत छोटा, पर हृदय में स्थित। आधुनिक भाषा में: “the size of your thumb” यानी हृदय की एक चिड़िया जैसी।
मन्त्र 2.1.13
ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः । एतद्वै तत् ॥
“अंगूठे के बराबर पुरुष धूँए-रहित ज्योति की तरह है। वो भूत-भविष्य का स्वामी है। वो आज भी है, कल भी होगा। यही वो है।”
“धूँए-रहित ज्योति” बहुत pure रूपक है। साधारण अग्नि में धूँआ होता है। आत्मा शुद्ध प्रकाश है।
मन्त्र 2.1.14
एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥
“जैसे ऊँचे पर्वतों पर बरसा हुआ पानी कई दिशाओं में बहता है, वैसे ही अनेक धर्मों (गुणों, रूपों) को अलग-अलग देखने वाला उन्हीं के पीछे भागता है।”
पानी एक ही है, मगर ऊँचाई से गिरने पर बिखर जाता है। मन भी ऐसा है। एक ही चेतना, बाहर अनेक रूपों में दिखती है, और हम अनेकता के पीछे भागते हैं।
मन्त्र 2.1.15
एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥
“जैसे शुद्ध पानी शुद्ध पानी में मिलकर एक ही शुद्ध हो जाता है, वैसे ही, हे गौतम (नचिकेता), विज्ञानी मुनि का आत्मा (परम आत्मा से) मिलकर एक ही हो जाता है।”
यह union का सबसे सरल रूपक है। पानी में पानी मिले तो अलग पहचान नहीं रहती। आत्मा का परम आत्मा में मिलना ऐसा ही है।
वल्ली 2.2
मन्त्र 2.2.1
अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद्वै तत् ॥
“ग्यारह द्वारों का एक नगर है, अजन्मा और स्थिर-चेतना वाले की। (इस ज्ञान का) अनुष्ठान करने वाला शोक नहीं करता, और मुक्त होकर मुक्त ही बना रहता है। यही वो है।”
ग्यारह द्वार: दो आँखें, दो कान, दो नथुने, मुँह, गुदा, मूत्र-द्वार, नाभि (कुछ टीकाकारों के अनुसार), और सिर का ब्रह्म-रन्ध्र (मूर्धा)। शरीर एक नगर है। आत्मा उसका राजा है।
मन्त्र 2.2.2
होता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ।
नृषद्वरसदृतसद्व्योमसद्
अब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥
“वो हँस (आकाश में स्थित), शुचि-सद् (पवित्र स्थान का निवासी), वसु (आकाश-निवासी), होता (वेदी पर बैठा यज्ञ-कर्ता), अतिथि (घर में रहने वाला अतिथि), नृषद् (मनुष्यों में), वरसद् (श्रेष्ठों में), ऋतसद् (सत्य में), व्योमसद् (आकाश में), जल से उत्पन्न, गाय से उत्पन्न, ऋत से उत्पन्न, पर्वत से उत्पन्न। वो विशाल ऋत है।”
यह एक प्राचीन ऋग्वेद-शैली का छंद है। हँस यानी आत्मा। यह हर जगह है। हर रूप में है।
मन्त्र 2.2.3
मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥
“जो प्राण को ऊपर ले जाता है, अपान को नीचे फेंकता है, बीच में बैठे वामन (छोटे, स्थित) की उपासना सब देव करते हैं।”
शरीर के अंदर प्राण और अपान, ऊर्जा का ऊपरी और निचला प्रवाह है। इन दोनों के बीच में जो स्थित है, वो आत्मा है।
मन्त्र 2.2.4
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥
“जब यह देही (आत्मा) इस गिरते हुए शरीर से मुक्त होता है, तो यहाँ क्या बच जाता है (जो उसे न पता हो)? यही वो है।”
शरीर गिर रहा है। आत्मा निकलने वाली है। उस moment में जो “बचा” रह जाएगा, वो है शुद्ध चेतना।
मन्त्र 2.2.5
इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥
“कोई भी मरणधर्मा न केवल प्राण से जीता है, न केवल अपान से। वो किसी और से जीते हैं, जिसमें ये दोनों आश्रित हैं।”
प्राण-अपान सिर्फ़ tools हैं। असली जीवन उसी से है जो उनको चलाता है। यह आत्मा है।
मन्त्र 2.2.6
यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥
“अब मैं तुम्हें यह सनातन गुह्य ब्रह्म बताता हूँ। और हे गौतम, मरण को पाकर आत्मा का क्या होता है, वो भी।”
यम अब वो रहस्य खोलने वाले हैं जो नचिकेता का असली प्रश्न था।
मन्त्र 2.2.7
स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥
“कुछ देही (आत्माएँ) फिर से शरीर पाने के लिए योनि (जन्म) में जाते हैं। कुछ स्थाणु (स्थावर रूप, जैसे पेड़-पौधे) में जाते हैं। यह अपने कर्म और श्रुति (ज्ञान) के अनुसार होता है।”
यहाँ पुनर्जन्म का सिद्धान्त साफ़ कहा गया है। कर्म और श्रुति (ज्ञान) के अनुसार अगला रूप मिलता है।
मन्त्र 2.2.8
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥
“जो सोते हुओं में जागता है, हर इच्छा को रचता हुआ, वो पुरुष ही शुक्र (दीप्त) है, वो ही ब्रह्म है, वो ही अमृत कहलाता है। उसी में सब लोक स्थित हैं, उसे कोई पार नहीं कर सकता। यही वो है।”
हम सब सोते हैं, सपने देखते हैं। सपने में नए-नए दृश्य बनते हैं। कौन बनाता है? वो जो “सोते में जागता है”। यह आत्मा है, सपने का drama-creator और स्वयं audience।
मन्त्र 2.2.9
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥
“जैसे एक ही अग्नि भुवन में प्रवेश करके हर रूप के अनुसार उस रूप में दिखती है, वैसे ही एक सर्व-भूतान्तर-आत्मा हर रूप में, और बाहर भी, उसी रूप में दिखता है।”
अग्नि लोहे में लाल-गर्म हो जाती है, सोने में चमक देती है, लकड़ी में रोशनी, कोयले में अंगारा। एक ही अग्नि, अनेक रूप। आत्मा भी ऐसी ही है, हर शरीर में अलग-अलग दिखती है।
मन्त्र 2.2.10
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥
“जैसे एक ही वायु भुवन में प्रवेश करके हर रूप के अनुसार उस रूप में हो जाती है, वैसे ही एक सर्व-भूतान्तर-आत्मा हर रूप में, और बाहर भी, उसी रूप में दिखता है।”
वही pattern, वायु के साथ। वायु बाँसुरी में संगीत बनती है, मेघ में बादल बनती है, फेफड़े में साँस बनती है। एक ही वायु, अनेक काम।
मन्त्र 2.2.11
न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥
“जैसे सूर्य, जो सब लोकों की आँख है, बाह्य आँखों के दोषों से लिप्त नहीं होता, वैसे ही एक सर्व-भूतान्तर-आत्मा, जो बाह्य है, लोक के दुःख से लिप्त नहीं होता।”
सूर्य गंदगी पर पड़ता है, मगर खुद गंदा नहीं होता। आत्मा भी हर अनुभव में मौजूद है, मगर उससे प्रभावित नहीं होती।
मन्त्र 2.2.12
एकं रूपं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीराः
तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥
“एक ही वशी (नियंत्रक) सर्व-भूतान्तर-आत्मा है, जो एक ही रूप को अनेक तरह से करता है। जो धीर पुरुष उसे आत्म-स्थित देखते हैं, उन्हीं को शाश्वत सुख है, दूसरों को नहीं।”
मन्त्र 2.2.13
एको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीराः
तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥
“वो अनित्य (नश्वर) चीज़ों में नित्य है, चेतनाओं में चेतन है, अनेकों में एक है, जो (सब की) इच्छाओं को व्यवस्थित करता है। जो धीर उसे आत्म-स्थित देखते हैं, उन्हीं को शाश्वत शान्ति है, दूसरों को नहीं।”
मन्त्र 2.2.14
कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥
(शिष्य पूछता है:) “जो परम सुख अनिर्देश्य (जिसे कहा न जा सके) है, उसे यह ‘तदेतत्’ (वही है) मानते हैं। मैं उसे कैसे पहचानूँ? वो खुद चमकता है, या उससे चीज़ें चमकती हैं?”
नचिकेता का सवाल आ रहा है: वो ब्रह्म दिखता कैसे है? खुद रोशनी देता है, या किसी और से रोशन है?
मन्त्र 2.2.15
न तत्र विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥
“वहाँ न सूर्य चमकता है, न चन्द्र, न तारे, न बिजलियाँ, न यह अग्नि। वो (ब्रह्म) ही चमकता है, उसके पीछे सब चमकता है। उसकी ही भा (दीप्ति) से यह सब चमकता है।”
यह कठोपनिषद् का सबसे प्रसिद्ध और काव्यात्मक श्लोक है। मुण्डक उपनिषद् में भी यही श्लोक आता है। इसका मतलब है: ब्रह्म खुद ज्योति है। सूर्य, चन्द्र, बिजली, अग्नि, ये सब उससे रोशन हैं।
एक scientific लेंस से: सूर्य फ्यूज़न से रोशनी देता है। वो energy कहाँ से? Bang-Bang से। और बैंग-बैंग? Quantum vacuum। और quantum vacuum? यहीं उपनिषद् कह रही है, उस आख़िरी substrate को ब्रह्म कहो।
वल्ली 2.3
मन्त्र 2.3.1
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥
“यह सनातन अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष ऊपर मूल वाला, नीचे शाखाओं वाला है। वो ही शुक्र है, वो ही ब्रह्म है, वो ही अमृत कहलाता है। उसी में सब लोक स्थित हैं, उसे कोई पार नहीं कर सकता। यही वो है।”
अश्वत्थ-वृक्ष का यह रूपक भगवद् गीता 15वें अध्याय में भी आता है। उल्टा क्यों? क्योंकि असली जड़ ऊपर (ब्रह्म में) है, और शाखाएँ नीचे (सृष्टि में) फैली हैं। हम पत्तियों के बीच घूम रहे हैं, मगर जड़ ऊपर है।
मन्त्र 2.3.2
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥
“यह सारा जगत् प्राण से निकलकर हिल रहा है। यह एक उठा हुआ वज्र है, एक महान् भय है। जो इसे जानते हैं, वो अमर हो जाते हैं।”
पूरी सृष्टि एक vibration है। प्राण (cosmic life-force) उस vibration का स्रोत है। यह एक “वज्र” है, यानी कठोर सच्चाई। इसे न जानना भयानक है।
मन्त्र 2.3.3
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥
“उसके भय से अग्नि तपती है, उसके भय से सूर्य तपता है, उसके भय से इन्द्र और वायु, और पाँचवाँ मृत्यु (यानी मैं, यम), भागता है।”
यम खुद कह रहे हैं कि ब्रह्म के भय से वो भी काम करते हैं। यानी मृत्यु भी एक duty है, ब्रह्म के command पर। मृत्यु independent नहीं है।
मन्त्र 2.3.4
ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥
“अगर इस शरीर के गिरने (मृत्यु) से पहले इस ज्ञान को बोध नहीं कर पाया, तो वो फिर सृष्टि-लोकों में शरीर लेने योग्य रह जाता है।”
यह warning है। जब तक यह जीवन है, तब तक मौक़ा है। शरीर छूटने के बाद, अगर अधूरा रहा, तो फिर जन्म।
मन्त्र 2.3.5
यथाऽप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके ।
छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥
“आत्मा का दर्शन अलग-अलग लोकों में अलग-अलग होता है। आत्म-शरीर में आइने जैसा। पितृ-लोक में सपने जैसा। गन्धर्व-लोक में पानी की लहर में पड़ी छाया जैसा। ब्रह्म-लोक में छाया-आतप जैसा (clear)।”
क्रमशः clearer होता जाता है। यहाँ (शरीर में) सबसे clear। पितृलोक में dreamy। गन्धर्व लोक में disturbed। ब्रह्मलोक में absolute contrast।
मन्त्र 2.3.6
पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥
“इन्द्रियों के पृथक्-भाव और उनके उदय-अस्त को, पृथक् उत्पन्न होते देखकर, धीर पुरुष शोक नहीं करता।”
हर इन्द्रिय अलग है, हर एक की उत्पत्ति-अंत है। ज्ञानी इनसे अपनी पहचान नहीं रखता।
मन्त्र 2.3.7
सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥
“इन्द्रियों से ऊँचा है मन। मन से उत्तम है सत्त्व (बुद्धि)। सत्त्व से ऊँचा है महान् आत्मा। महान् से उत्तम है अव्यक्त।”
वल्ली 1.3.10-11 की सीढ़ी फिर आ रही है।
मन्त्र 2.3.8
यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥
“अव्यक्त से परे है पुरुष, जो व्यापक है और अलिङ्ग (कोई चिह्न-रहित) है। जिसको जानकर मनुष्य मुक्त होता है और अमरत्व को जाता है।”
पुरुष का कोई identifier नहीं है। आप उसे नाम नहीं दे सकते, रूप नहीं दे सकते। मगर वही manzil है।
मन्त्र 2.3.9
न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् ।
हृदा मनीषा मनसाऽभिक्लृप्तो
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥
“उसका रूप दिखाई नहीं देता। कोई आँख से नहीं देख सकता। हृदय, मनीषा (बुद्धि की प्रगाढ़ता), और मन के द्वारा वो प्रकट होता है। जो इसे जानते हैं, अमर हो जाते हैं।”
मन्त्र 2.3.10
बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम् ॥
“जब पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मन के साथ ठहर जाती हैं, और बुद्धि भी हलचल नहीं करती, उसे ही परम गति कहते हैं।”
यह योग की definition है। पाँचों इन्द्रियाँ ठहरीं, मन शान्त, बुद्धि अचंचल। यह स्थिति “परम गति” है, यानी जीवन का सबसे ऊँचा destination।
मन्त्र 2.3.11
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥
“इस स्थिर इन्द्रिय-धारणा (इन्द्रियों के नियंत्रण) को ‘योग’ कहते हैं। उस समय मनुष्य अप्रमत्त (पूरी तरह सजग) हो जाता है। क्योंकि योग में उत्पत्ति और विनाश दोनों हैं (यानी यह एक प्रक्रिया है जो आती-जाती रहती है)।”
यह योग की पहली स्पष्ट परिभाषा वेदान्त-परंपरा में है। यह बाद में पतंजलि के योगसूत्र 1.2 (“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”) में और गहरा हो जाता है।
मन्त्र 2.3.12
अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥
“वाणी से नहीं, मन से नहीं, आँख से नहीं, इसे पाया जा सकता है। ‘वो है’ इतना कहने के अलावा और कैसे प्राप्त हो?”
ब्रह्म की उपलब्धि का एक ही approach है: स्वीकार करो कि “वो है”। यह existential affirmation है। बाक़ी कुछ और कहना ब्रह्म को object बना देगा।
मन्त्र 2.3.13
अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥
“‘वो है’ ऐसा ही उसे प्राप्त करना है। दोनों (अव्यक्त और व्यक्त) के तत्त्व-भाव से। जिसने ‘वो है’ ऐसा प्राप्त किया, उसका तत्त्व-भाव प्रसन्न होता है।”
एक बार आपने “वो है” स्वीकार कर लिया, बिना shape के, बिना concept के, तब उसका असली स्वरूप आप पर खुलने लगता है।
मन्त्र 2.3.14
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥
“जब इसके हृदय में जो भी कामनाएँ बसी हैं, सब छूट जाती हैं, तब मरणधर्मा अमर हो जाता है, यहीं (इस जीवन में) ब्रह्म का अनुभव कर लेता है।”
यह कठोपनिषद् का सबसे practical and powerful statement है। मुक्ति मरने के बाद नहीं, इसी जीवन में संभव है। शर्त: कामनाओं का छूटना। हृदय में जो भी attachment, चाहत, मोह है, सब को छूटना है।
मन्त्र 2.3.15
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम् ॥
“जब हृदय की सब गाँठें खुल जाती हैं, तब मनुष्य अमर हो जाता है। यही अनुशासन की पूरी बात है।”
“हृदय की गाँठें” वो psychological knots हैं जो हमें बाँधे रखते हैं: ईर्ष्या, क्रोध, भय, लोभ, मोह। हर एक गाँठ। जब सब खुल जाएँ, तब आप मुक्त हैं।
मन्त्र 2.3.16
स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति
विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥
“हृदय की एक सौ एक नाड़ियाँ हैं। उनमें से एक मूर्धा (सिर का ऊपरी हिस्सा) तक जाती है। उससे ऊपर निकलकर अमरत्व प्राप्त होता है। बाक़ी नाड़ियों से निकलने पर मनुष्य अलग-अलग दिशाओं में जाता है।”
यह योग-शरीर-शास्त्र की एक प्राचीन theory है। 101 nadis, में से 1 sushumna। उससे निकलने पर मोक्ष।
मन्त्र 2.3.17
सदा जनानां हृदये संनिविष्टः ।
तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ।
तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥
“अंगूठे के बराबर पुरुष, अन्तर-आत्मा, हमेशा लोगों के हृदय में स्थित है। उसे अपने शरीर से धैर्य से निकालना चाहिए, जैसे मुंज की पत्ती (एक प्रकार की घास) के अंदर से सरकंडा निकालते हैं। उसे शुक्र (दीप्त), अमृत जानो। हाँ, उसे शुक्र, अमृत जानो।”
एक beautiful image। मुंज की घास से सरकंडा निकालते समय धीरे-धीरे, धैर्य से निकालना पड़ता है। आत्म-निष्कर्षण भी ऐसा ही है।
मन्त्र 2.3.18
विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् ।
ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्यु-
रन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥
“मृत्यु (यम) द्वारा कही गई इस विद्या और पूरी योग-विधि को पाकर, नचिकेता ब्रह्म-प्राप्त हो गया। वो विरज (रजोगुण-रहित), विमृत्यु (मृत्यु-रहित) हो गया। ऐसा कोई और भी जो इस आत्म-विद्या को साधे, वैसा ही हो जाएगा।”
नचिकेता को उसका तीसरा वर मिल गया। उसने उपदेश सुना, अभ्यास किया, और ब्रह्म-प्राप्त हो गया। यह पूरी कथा का climax है। और एक vow भी है: ऐसा कोई भी कर सकता है, कभी भी।
मन्त्र 2.3.19 (शान्ति-मन्त्र)
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
“वो (ब्रह्म) हम दोनों की रक्षा करे। हम दोनों का पालन करे। हम दोनों मिलकर वीर्य (शक्ति) से अध्ययन करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो। हम कभी एक-दूसरे से विद्वेष न करें। ॐ शान्ति, शान्ति, शान्ति।”
यह कठोपनिषद् का closing शान्ति-मन्त्र है। यह उपनिषद् हमें मृत्यु से अमरत्व तक ले गई। अंत में बस यही प्रार्थना है: रक्षा, पालन, साथ-साथ अध्ययन, तेजस्विता, और परस्पर प्रेम।
एक ब्राह्मण थे, वाजश्रवस। “उशन्” यानी इच्छा रखते हुए (स्वर्ग की)। उन्होंने अपनी सारी संपत्ति दान कर दी, यह “विश्वजित्” यज्ञ का नियम था। उनके एक पुत्र थे, नाम नचिकेता। पूरी कठोपनिषद् इसी नचिकेता और यम के संवाद पर टिकी है।
“वाजश्रवस” नाम का मतलब है “अन्न के लिए प्रसिद्ध” या “अन्न-दानी”। यानी वो दानवीर माने जाते थे। यह उपनिषद् की कहानी का इरादा यह दिखाना है कि कैसे एक “दानवीर” ने भी असलियत में चालाकी की, और कैसे उसके अपने बेटे ने उस चालाकी को पकड़ा।