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यज्ञ पूरा हो चुका है और वाजश्रवस अपना सब कुछ दान कर रहे हैं। दक्षिणा में गायें निकाली जा रही हैं, एक के बाद एक, और उनकी कतार आँगन से निकलकर बाहर तक चली गई है। पुत्र नचिकेता वहीं खड़ा देख रहा है, और जो देख रहा है वह उसे चुभ रहा है। गायें बूढ़ी हैं। जिनका पानी पिया जा चुका, जिनकी घास चरी जा चुकी, जिनका दूध निकाला जा चुका, जिनमें अब कोई बल बचा नहीं। लड़के के भीतर उसी क्षण कुछ उतरता है। मूल उसे एक ही शब्द देता है, श्रद्धा, और उसी श्रद्धा के साथ एक कड़ा विचार भी उठता है, कि ऐसा दान देकर आदमी किन लोकों में जाता है।
यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा से आता है और दो अध्यायों में, तीन-तीन वल्लियों में पूरा होता है। इसका ढाँचा बहुत सीधा है, इतना सीधा कि पहली बार सुनने वाला बच्चा भी पकड़ लेता है: एक लड़का, एक द्वार, तीन वर। पर उसी सीधे ढाँचे के भीतर वह प्रश्न रखा गया है जिसे कोई सभा हल नहीं कर पाई, कि मरे हुए मनुष्य का क्या होता है, और उसका उत्तर देने वाला स्वयं मृत्यु है। जो कथा भूखी तीन रातों से शुरू होती है वह रथ के रूपक, छुरे की धार और उलटे लटके अश्वत्थ तक जाती है, और आख़िर में हृदय की गाँठ पर आकर रुकती है।
इस पाठ के मुख्य नाम
नचिकेता: वाजश्रवस का बेटा, जो पिता का दान देखकर एक ही प्रश्न तीन बार पूछता है और फिर मृत्यु के द्वार पर तीन रात भूखा बैठा रहता है।
वाजश्रवस: यज्ञ करने वाले पिता, जिन्हें मूल में गौतम और औद्दालकि आरुणि भी कहा गया है, और जिनका एक वाक्य पूरे उपनिषद् को चला देता है।
यम: मृत्यु के अधिपति, जो तीन रात की भूख का हिसाब तीन वरों से चुकाते हैं, पहले टालते हैं, फिर ललचाते हैं, और हार मानकर सबसे छिपी हुई विद्या खोल देते हैं।
श्रद्धा: वह जो दक्षिणा बँटते समय लड़के के भीतर उतर आई; मूल इसे एक ही शब्द में कहता है, और इसके बिना यह कथा शुरू ही नहीं होती।
नाचिकेत अग्नि: दूसरे वर में सिखाई गई वह वेदी, जिसकी ईंटें यम स्वयं गिनाते हैं और जो बाद में लड़के के ही नाम से पुकारी जाती है।
बूढ़ी गायें, और एक लड़के के तीन सवाल
वाजश्रवस ने वह यज्ञ किया था जिसमें दाता अपना सब कुछ दे देता है। मूल एक ही पंक्ति में यह बता देता है और फिर तुरन्त बेटे का नाम रख देता है। लड़का उस उम्र में है जहाँ आदमी सवाल पूछना सीख चुका होता है पर चुप रहना अभी नहीं सीखा। वह दक्षिणा में जाती हुई गायों को गिनता है और भीतर ही भीतर हिसाब लगाता है कि जिन गायों में देने को कुछ बचा नहीं, उन्हें देकर पिता कौन सा फल कमा रहे हैं। उपनिषद् इस हिसाब को छिपाता नहीं। वह कह देता है कि ऐसा दान देने वाला जिन लोकों में जाता है उनका नाम ही आनन्द से रहित है।
अब लड़के के सामने दो रास्ते हैं। चुप रह जाए, या पिता से कहे। वह तीसरा रास्ता निकालता है, जो बच्चों को ही सूझता है। वह अपने को ही दान की वस्तु बना देता है और पूछता है, “पिताजी, आप मुझे किसे देंगे?” एक बार पूछता है, उत्तर नहीं मिलता। दूसरी बार पूछता है, फिर नहीं मिलता। तीसरी बार पूछने पर पिता का धैर्य टूट जाता है और मुँह से निकल जाता है, “मृत्यवे त्वा ददामि”, यानी मैं आपको मृत्यु को देता हूँ। यज्ञ के आँगन में कहा गया यह वाक्य वापस नहीं लिया जा सकता, क्योंकि जिस घर में सब कुछ दिया जा रहा हो वहाँ शब्द भी दान की तरह ही सच्चा होता है।
यहाँ कथा का पहला मोड़ है, और सबसे मार्मिक भी। लड़का रोता नहीं, न पिता से बहस करता है। वह अपने मन को समझाता है, और जिस तरह समझाता है वह किसी बड़े से कम नहीं। वह कहता है कि बहुतों में मैं पहले चलता हूँ, बहुतों में बीच में चलता हूँ; आज मुझसे यम का ऐसा कौन सा काम पूरा होगा। फिर वह अपने को वह बात याद दिलाता है जो हर पीढ़ी भूल जाती है, कि आगे बढ़कर देखिए कि पहले वाले कैसे रहे और मुड़कर देखिए कि बाद वाले कैसे होंगे। और फिर वह पंक्ति आती है जो इस उपनिषद् की सबसे शान्त पंक्तियों में है, “सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः”, यानी मनुष्य अन्न की तरह पकता है और अन्न की तरह ही फिर उग आता है।
इस एक उपमा में लड़के ने अपने जाने का भय काट दिया। खेत में खड़ी फ़सल पकती है, काटी जाती है, और अगली बरसात में वही खेत फिर हरा हो जाता है। नचिकेता चल पड़ता है। मूल रास्ते का वर्णन नहीं करता, न विदाई का दृश्य देता है, न माँ का कोई शब्द। यह चुप्पी अपने आप में कठोर है और उपनिषद् इसे कठोर ही रहने देता है। अगली बात जो हमें बताई जाती है वह यह है कि लड़का यम के घर पहुँच चुका है और यम घर पर नहीं हैं।
तीन रात वह वहीं द्वार पर बैठा रहता है, बिना अन्न के। इन तीन रातों पर मूल दो पंक्तियाँ ख़र्च करता है और दोनों चेतावनी की हैं, विवस्वान के पुत्र को सम्बोधित करके कही गई हैं। पहली यह कि ब्राह्मण अतिथि घर में वैश्वानर की तरह प्रवेश करता है, इसलिए उसके लिए पानी लाइए और उस आग को शान्त कीजिए। दूसरी और भी कड़ी है। जिस अल्पबुद्धि के घर में ब्राह्मण भूखा बैठा रह जाए, उसके घर की आशा और प्रतीक्षा, संगति और मीठी वाणी, यज्ञ और पूर्त, पुत्र और पशु, सब का सब वह भूख खा जाती है। मृत्यु के घर में भी अतिथि का यही अधिकार है।
चौथे दिन यम लौटते हैं। जो पहला काम वे करते हैं वह किसी देवता के गर्व से नहीं, एक गृहस्थ की लज्जा से किया जाता है। वे हाथ जोड़कर कहते हैं कि हे ब्रह्मन्, आप तीन रातें मेरे घर में बिना खाए रहे, आप नमस्कार के योग्य अतिथि हैं, आपको नमस्कार हो और मेरा कल्याण हो; और इसके बदले तीन वर माँग लीजिए। तीन रातों के बदले तीन वर। मृत्यु का स्वामी अपने घर की भूल का मोल चुका रहा है, और उसी मोल के भीतर से यह पूरा उपनिषद् खुलने वाला है।
सार: कथा एक अधूरे दान से शुरू होती है, जहाँ पिता वह दे रहे हैं जो अब उनके किसी काम का नहीं। लड़के की श्रद्धा उसे तीन बार एक ही प्रश्न पूछने पर मजबूर करती है और पिता का क्रोध उसे मृत्यु के द्वार पर पहुँचा देता है। वह द्वार तीन रात बन्द रहता है, और खुलता है तो तीन वरों के साथ।
पहला वर, दूसरा वर, और एक अग्नि जिसे नाम मिल गया
पहला वर लड़का अपने लिए नहीं माँगता। वह पीछे छूटे हुए घर के लिए माँगता है। उसके शब्द हैं कि गौतम का संकल्प शान्त हो जाए, उनका मन प्रसन्न हो, उनका क्रोध चला जाए, और जब मैं आपके छोड़े हुए लौटूँ तो वे मुझे पहचानकर मुझसे बोलें। ध्यान दीजिए कि लड़का यह नहीं माँगता कि पिता को अपनी भूल का पछतावा हो। वह केवल इतना चाहता है कि पहचान बची रहे और बोलचाल बची रहे। मृत्यु के द्वार पर खड़े एक बच्चे की पहली इच्छा यह है कि घर लौटने पर पिता उससे बात करें।
यम यह वर उसी क्षण दे देते हैं, और देते हुए पिता का एक और नाम लेते हैं, औद्दालकि आरुणि। वे कहते हैं कि वे पहले जैसे ही पहचानने वाले हो जाएँगे, मेरे छोड़ देने से उनका क्रोध उतर जाएगा, वे रातों में सुख से सोएँगे, और आपको मृत्यु के मुख से छूटा हुआ देखेंगे। इस उत्तर में एक शब्द बहुत बड़ा है, सुखँ रात्रीः शयिता, रातों में चैन से सोना। जिस पिता ने क्रोध में बेटे को दे दिया हो उसकी सज़ा उसकी नींद ही होती, और बेटा पहले ही वर में वह सज़ा माफ़ करा लेता है।
दूसरा वर लड़का उस लोक के लिए माँगता है जिसमें भय नहीं है। वह पहले उस लोक का वर्णन करता है, और वर्णन करते हुए यम के मुँह पर ही यम की सीमा कह देता है, कि स्वर्ग में कोई भय नहीं है, वहाँ आप नहीं हैं, और वहाँ कोई बुढ़ापे से नहीं डरता; भूख और प्यास, दोनों को पार करके आदमी वहाँ शोक से परे आनन्द में रहता है। फिर वह माँगता है, कि आप उस स्वर्ग तक पहुँचाने वाली अग्नि को जानते हैं, वह मुझे कहिए, मैं श्रद्धा रखने वाला हूँ।
यम इसे टालते नहीं। वे उस अग्नि का विधान खोलकर रख देते हैं, कि वेदी में कौन सी ईंटें लगती हैं, कितनी लगती हैं, और किस क्रम से रखी जाती हैं। मूल यहाँ ब्योरा नहीं दोहराता, वह इतना कहता है कि यम ने लोक की आदि अग्नि उसे बता दी। असली बात इसके बाद है। लड़का सुनी हुई पूरी बात यम को ज्यों की त्यों लौटा देता है, जैसी कही गई थी वैसी ही। सीखने की यह परीक्षा उपनिषद् के लिए इतनी बड़ी है कि उसे एक अलग पंक्ति दी गई है, और यम इस पर प्रसन्न हो जाते हैं।
प्रसन्न होकर वे वह करते हैं जो वचन में नहीं था। वे कहते हैं कि आज मैं आपको एक वर और देता हूँ, बिना गिनती के: यह अग्नि अब आपके ही नाम से जानी जाएगी, और यह अनेक रूपों वाली सृङ्का भी लीजिए। यहीं से वह वेदी नाचिकेत कहलाती है। फिर यम उसका फल बताते हैं, कि जो तीन बार इस अग्नि को चुन ले, जो तीनों से मेल कर ले और तीन कर्म करता रहे, वह जन्म और मृत्यु को पार कर जाता है; और जो इस तीन को जानकर नाचिकेत अग्नि का चयन करता है, वह मृत्यु के फंदे सामने से हटाकर शोक के परे आनन्द में रहता है। शांकरभाष्य इन तीनों को माता, पिता और आचार्य पढ़ता है, और तीन कर्मों को यज्ञ, अध्ययन और दान।
दूसरा वर यहाँ पूरा हो जाता है। यम स्वयं उस पर मुहर लगाते हैं, कि यह रही आपकी स्वर्ग तक ले जाने वाली अग्नि, जो आपने दूसरे वर में माँगी थी, और लोग इसे आपके ही नाम से कहेंगे; अब तीसरा वर माँगिए। इस पूरे प्रसंग में एक बात चुपचाप चलती रहती है। लड़का हर बार ऐसा कुछ माँग रहा है जो लौटकर दूसरों के काम आएगा, और तीसरे वर से पहले उसने अपने लिए कुछ नहीं माँगा है।
सार: पहला वर घर के लिए है, कि पिता का क्रोध उतरे और पहचान बनी रहे। दूसरा वर उस अग्नि के लिए है जो भय से परे लोक तक ले जाती है, और लड़का उसे सुनकर ज्यों का त्यों दोहरा देता है। इसी दोहराने पर यम प्रसन्न होकर उस वेदी को उसका नाम दे देते हैं।
तीसरा वर, और वह सब जो यम बदले में देना चाहते हैं
तीसरा प्रश्न लड़का बहुत सँभालकर रखता है। वह कहता है कि मरे हुए मनुष्य के बारे में यह जो सन्देह है, कुछ कहते हैं वह है, कुछ कहते हैं वह नहीं है, यही मैं आपसे सीखकर जानना चाहता हूँ; वरों में मेरा तीसरा वर यही है। इस प्रश्न की बनावट देखिए। वह यह नहीं पूछता कि मरने के बाद क्या होता है, जिसका उत्तर कोई भी कथा गढ़कर दे सकता है। वह पूछता है कि जो सन्देह है वह किस चीज़ को लेकर है, और उस चीज़ का होना या न होना कैसे तय होता है।
यम पहली बार पीछे हटते हैं। वे कहते हैं कि इस विषय में तो पहले देवताओं को भी सन्देह हुआ था, यह धर्म सूक्ष्म है, सहज में जान लेने लायक़ नहीं; कोई और वर माँग लीजिए, मुझे इस पर मत बाँधिए, मुझे इससे छोड़ दीजिए। मृत्यु का स्वामी हाथ जोड़कर छूटना चाह रहा है, यह दृश्य इस उपनिषद् के अलावा कहीं नहीं मिलता। और लड़का वही उत्तर देता है जो एक सच्चा विद्यार्थी देता है। वह यम के अपने शब्द उन्हीं को लौटा देता है, कि देवताओं को भी सन्देह हुआ और आप स्वयं कह रहे हैं कि यह सहज में जानने लायक़ नहीं; इसका कहने वाला आप जैसा दूसरा मिलेगा नहीं, और इसके बराबर कोई वर है ही नहीं।
अब यम वह करते हैं जो हर बड़ा गुरु परीक्षा में करता है, और जो हर बड़ा प्रलोभन देने वाला भी करता है। वे सारा संसार मेज़ पर रख देते हैं। सौ बरस जीने वाले पुत्र और पौत्र माँग लीजिए, बहुत सारे पशु, हाथी, सोना, घोड़े; पृथ्वी का बड़ा विस्तार माँग लीजिए; और स्वयं जितने शरद चाहें उतने जिएँ। अगर इसके बराबर कोई वर सूझता हो तो वह माँगिए, धन माँगिए, लम्बी आयु माँगिए; इस बड़ी पृथ्वी पर आप ही बड़े होकर रहिए, मैं आपको सब कामनाओं का भोगने वाला बना देता हूँ।
फिर वे और नीचे उतरते हैं, क्योंकि प्रलोभन का नियम यही है कि वह हर बार पहले से ठोस होता जाता है। वे कहते हैं कि मनुष्यलोक में जो जो कामनाएँ दुर्लभ हैं, सब अपनी इच्छा से माँग लीजिए; ये रथों और बाजों के साथ खड़ी स्त्रियाँ लीजिए, ऐसी मनुष्यों को नहीं मिलतीं; मेरी दी हुई इनसे अपनी सेवा कराइए। और फिर वह वाक्य जिसमें पूरा भय खुल जाता है, कि हे नचिकेता, मरण के बारे में मत पूछिए। यम उत्तर टाल नहीं रहे, वे प्रश्न ही ख़रीद लेना चाहते हैं।
लड़का इस पूरे ढेर को एक साँस में हटा देता है, और हटाने का तर्क बहुत ठंडा है। वह कहता है कि हे अन्तक, यह सब कल तक ही रहने वाला है, और यह सब इन्द्रियों का तेज घिस डालता है; पूरा जीवन भी थोड़ा ही है; आपके रथ आपके ही रहें, आपका नाच और गाना आपका ही रहे। फिर वह सीधे धन की जड़ पर हाथ रखता है, “न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः”, धन से मनुष्य तृप्त होने वाला प्राणी है ही नहीं। और आगे जोड़ता है कि धन तो हमें मिल ही जाएगा जब हमने आपको देख लिया, और जिएँगे भी तब तक जब तक आप शासन करते हैं; वर तो मेरे लिए वही एक है जो माँगने योग्य है।
अन्तिम चोट सबसे सुन्दर है। वह पूछता है कि जो कभी बूढ़े नहीं होते, जो कभी मरते नहीं, उनके पास आकर, उनकी बात जानकर, नीचे धरती पर रहने वाला यह बूढ़ा होता जाता मरणशील रूप और रस के मज़े गिनता हुआ बैठा रहे, यह कैसे हो; बहुत लम्बे जीवन में रमेगा भी कौन। और वह अपनी बात वहीं लौटा लाता है जहाँ से चली थी, कि जिसमें यह सन्देह है, जो उस बड़े पार जाने में काम आता है, वही हमें कहिए; यह वर गूढ़ में घुसा हुआ है, और नचिकेता इसके सिवा कुछ नहीं माँगता।
सार: तीसरा वर एक सन्देह है, और यम उसे टालने के लिए पूरा संसार देने को तैयार हो जाते हैं। लड़का हर प्रस्ताव को एक ही तराज़ू पर तौलता है, कि यह कब तक रहेगा। जिस दिन कोई यह तराज़ू उठा लेता है उस दिन प्रलोभन अपने आप हल्का पड़ जाता है।
श्रेय और प्रेय, दो रस्सियाँ जो साथ-साथ खींचती हैं
यम हार मान लेते हैं, और हारते ही उनका स्वर बदल जाता है। अब तक वे द्वारपाल थे, अब आचार्य हो जाते हैं। पहली ही बात में वे वह भेद रख देते हैं जिस पर यह उपनिषद् टिका है, “अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयः”, श्रेय और है और प्रेय और ही है। दोनों अलग-अलग प्रयोजन लिए मनुष्य को बाँधते हैं। जो श्रेय को उठा लेता है उसका भला होता है, और जो प्रेय को चुनता है वह अपने असली अर्थ से गिर जाता है। यह भेद आदमी के बाहर नहीं, आदमी के भीतर खड़ा होता है।
यम आगे कहते हैं कि ये दोनों हर मनुष्य के पास आते हैं, दोनों आते हैं, किसी को छोड़ते नहीं। धीर आदमी उन्हें चारों ओर से घुमाकर देखता है और अलग कर लेता है; धीर प्रेय के मुक़ाबले श्रेय चुन लेता है, और मन्द आदमी योगक्षेम के लोभ में प्रेय चुन लेता है। योगक्षेम का अर्थ है, जो नहीं है उसे पा लेना और जो है उसे बचाए रखना। ज़्यादातर ज़िन्दगियाँ इसी दो काम में बीत जाती हैं, और ज़्यादातर आदमी को पता भी नहीं चलता कि उसने कभी कोई चुनाव किया था।
फिर यम लड़के की ओर मुड़ते हैं और उसे उसका किया हुआ काम दिखाते हैं। वे कहते हैं कि आपने प्रिय और प्रिय दिखने वाली कामनाओं को सोच-समझकर छोड़ दिया; आपने उस धनमयी सृङ्का को नहीं लिया जिसमें बहुत से मनुष्य डूब जाते हैं। और फिर वह पंक्ति जो हर पढ़ने वाले को अपनी जगह पर टटोलने पर मजबूर करती है, कि अविद्या और विद्या, ये दोनों दूर हैं, उलटी हैं, अलग-अलग दिशाओं में ले जाती हैं। जो विद्या चाहता है, यम उसे पहचान लेते हैं, और नचिकेता को वे वैसा ही मानते हैं, जिसे बहुत सी कामनाएँ लुभा न सकीं।
अविद्या में रहने वालों का चित्र यम कठोरता से खींचते हैं। वे अपने को धीर मानते हैं, अपने को पण्डित मानते हैं, और चक्कर काटते हुए भटकते रहते हैं; जैसे अंधे के पीछे चलने वाले अंधे। इस उपमा को समझने के लिए किसी टीका की ज़रूरत नहीं। जो ख़ुद नहीं देख पा रहा वह जिस भरोसे से रास्ता बताता है, वही भरोसा पीछे चलने वालों को और गहरे गड्ढे तक ले जाता है। यम आगे कहते हैं कि जो धन के मोह में बेसुध है, उस बालक को वह पार जाना दिखता ही नहीं; वह मानता है कि बस यही लोक है, कोई और नहीं, और वह बार-बार मेरे वश में आता रहता है।
इसके बाद यम उस बात पर आते हैं जो हर परम्परा में दोहराई जाती है, कि यह सुनने को भी बहुतों को नहीं मिलता, और सुनकर भी बहुत से इसे जान नहीं पाते। कहने वाला आश्चर्य है, पाने वाला कुशल है, और कुशल के सिखाए जानने वाले का मिलना भी आश्चर्य है। फिर वे कहते हैं कि यह किसी छोटे आदमी के कहे से ठीक से समझ में आने वाला नहीं, क्योंकि इस पर बहुत तरह से सोचा जाता रहा है, और यह अणु के माप से भी सूक्ष्म है। यह बुद्धि तर्क से नहीं मिलती, दूसरे के कहे से ही सहज में जानी जाती है, और आपने वह पा ली है, आप सचमुच सत्य में टिके हुए हैं; हमें आप जैसा पूछने वाला और मिले।
इस पूरी वल्ली में सबसे अनोखी बात यम अपने बारे में कहते हैं। वे मानते हैं कि मैं जानता हूँ कि जो निधि जोड़ी जाती है वह अनित्य है, और अनित्य साधनों से वह ध्रुव नहीं मिलता; फिर भी मैंने नाचिकेत अग्नि चुनी और अनित्य द्रव्यों से नित्य को पा लिया। कर्म की सीमा और कर्म की उपयोगिता, दोनों एक ही साँस में। इसके बाद वे कहते हैं कि कामना की पूर्ति, जगत का आधार, क्रतु का अनन्त फल, अभय का पार, वह बड़ा और बहुत गाया गया आश्रय, यह सब देखकर भी आपने धैर्य से उसे जाने दिया। और जो इसे सुनकर, समेटकर, उस सूक्ष्म को पाकर रहता है, वह आनन्दित होता है; यम कहते हैं कि नचिकेता के लिए तो वह घर खुला हुआ ही है।
सार: श्रेय और प्रेय दोनों हर आदमी के पास आते हैं और दोनों अपनी ओर खींचते हैं। धीर उन्हें अलग-अलग करके देखता है, मन्द उन्हें एक ही मान लेता है। यम यहाँ अपनी सीमा भी खोल देते हैं, कि अनित्य से नित्य पाने का रास्ता उन्होंने स्वयं चला है।
वह अक्षर, और वह जो न मरता है न मारा जाता है
अब नचिकेता वह प्रश्न पूछता है जिसके लिए वह तीन रात भूखा बैठा था, और इस बार वह उसे और तेज़ धार दे देता है। वह कहता है कि जो धर्म से अलग है, अधर्म से अलग है, इस किए हुए और न किए हुए से अलग है, बीते हुए और आने वाले से अलग है, जो आप देखते हैं, वह हमें कहिए। यह प्रश्न पुण्य और पाप, दोनों के बाहर खड़ा होकर पूछा गया है, और वह उस चीज़ का पता माँगता है जिस पर समय की पकड़ नहीं बैठती।
यम का उत्तर बहुत छोटा है। वे कहते हैं कि जिस पद को सारे वेद बार-बार कहते हैं, जिसे सारे तप कहते हैं, जिसे चाहकर लोग ब्रह्मचर्य में रहते हैं, वह पद संक्षेप में यह है, ॐ। फिर वे उसी पर तीन बार हाथ रखते हैं, कि यही अक्षर ब्रह्म है, यही अक्षर परम है, और इसे जानकर जो जिसे चाहता है वही उसका होता है। यही सबसे अच्छा आलम्बन है, यही परम आलम्बन है, और इसे जानकर आदमी ब्रह्मलोक में महिमा पाता है। आलम्बन का अर्थ है वह जिसे पकड़कर आदमी ऊपर चढ़ता है, जैसे कुएँ में उतरते समय रस्सी।
इसके बाद यम उस विषय पर आते हैं जिसके लिए यह सारी बातचीत हो रही थी, और वे बिना भूमिका के आते हैं। “न जायते म्रियते वा विपश्चित्”, वह जानने वाला न जन्म लेता है, न मरता है। वह कहीं से हुआ नहीं और उससे कोई हुआ नहीं; अजन्मा, नित्य, शाश्वत, पुराना, शरीर के मारे जाने पर भी वह मारा नहीं जाता। और तुरन्त इसका व्यावहारिक चेहरा भी सामने आता है, कि यदि मारने वाला समझे कि मैं मारता हूँ, और मारा गया समझे कि मैं मारा गया, तो वे दोनों नहीं जानते; यह न मारता है, न मारा जाता है।
फिर वह वर्णन आता है जो आकार को दोनों ओर से तोड़ देता है। वह अणु से भी अणु है और महान से भी महान है, और वह इस प्राणी की गुहा में रखा हुआ है। उसे वह देखता है जो कामना से रहित हो चुका, जिसका शोक उतर चुका, और वह उसे धातु के प्रसाद से देखता है। यह शब्द विवादित है; शांकरभाष्य धातुप्रसाद को इन्द्रियों और मन की निर्मलता पढ़ता है, यानी करण जब शान्त होते हैं तब वह महिमा दिखती है। बैठा हुआ वह दूर चला जाता है, लेटा हुआ वह सब ओर जाता है; यम पूछते हैं कि उस हर्ष और हर्षहीनता वाले देव को मेरे सिवा कौन जान सकता है।
अगली पंक्ति उन दो शब्दों में बँधी है जिन्हें बाद की सारी परम्परा दोहराती रही, कि वह शरीरों में अशरीर है और अस्थिर वस्तुओं के बीच स्थित है। ऐसे महान और व्यापक आत्मा को जानकर धीर शोक नहीं करता। यहाँ उपनिषद् शोक मिटाने का कोई अलग उपाय नहीं बताता, वह जानने को ही उपाय कहता है; जिसने अपने भीतर उस अशरीर को पहचान लिया, उसके लिए शोक का आधार ही खिसक जाता है।
और फिर वह पंक्ति आती है जो इस उपनिषद् को सबसे विनम्र बना देती है, “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः”, यह आत्मा प्रवचन से नहीं मिलता, न मेधा से, न बहुत सुनने से। जिसे यह चुन लेता है उसी को यह मिलता है, और उसी के आगे यह अपना रूप खोल देता है। इसके साथ ही शर्त भी रख दी जाती है, कि जो दुराचरण से हटा नहीं, जो शान्त नहीं, जिसका मन एकाग्र नहीं, जिसका मन बेचैन है, वह प्रज्ञा से भी इसे नहीं पा सकता। वल्ली एक कठोर चित्र पर पूरी होती है, कि जिसके लिए ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों भोजन हों और मृत्यु स्वयं चटनी हो, वह कहाँ है, यह कौन ऐसे जानता है।
सार: उत्तर एक अक्षर से शुरू होता है और एक अस्वीकार पर टिकता है। वह जानने वाला न जन्मता है न मरता है, इसलिए मारने और मरने का हिसाब उस पर लागू नहीं होता। और वह पढ़ने या याद करने से नहीं मिलता, उसके लिए आचरण और शान्ति पहली शर्त है।
रथ, सारथी, और छुरे की धार
तीसरी वल्ली एक चित्र से खुलती है। दो हैं जो सुकृत के लोक में ऋत पीते हैं, दोनों गुहा में घुसे हुए हैं, परम पराध्र्व में बैठे हैं; ब्रह्म को जानने वाले उन्हें छाया और धूप कहते हैं, और वे भी जो पाँच अग्नियों वाले हैं, और वे भी जो तीन बार नाचिकेत चुन चुके हैं। एक ही जगह पर दो, जिनमें एक भोगता है और एक देखता है, और दोनों का अन्तर वैसा ही है जैसा धूप और उसकी छाया का। इसके बाद उपनिषद् एक प्रार्थना करता है, कि वह नाचिकेत अग्नि, जो यज्ञ करने वालों का पुल है, जो अक्षर परम ब्रह्म है, जो पार जाने की इच्छा वालों के लिए अभय है, उसे हम साध सकें।
और फिर वह रूपक आता है जिसे इस उपनिषद् की सबसे बड़ी देन कहा जाता है। “आत्मानँ रथिनं विद्धि शरीरँ रथमेव तु”, आत्मा को रथ में बैठा हुआ जानिए और शरीर को ही रथ जानिए। आगे, बुद्धि को सारथी जानिए और मन को लगाम। इन्द्रियों को घोड़े कहा गया है और विषयों को वे रास्ते जिन पर ये घोड़े दौड़ते हैं। और जो आत्मा इन्द्रियों और मन से जुड़ा हुआ है, मनीषी उसी को भोक्ता कहते हैं। पूरा आदमी एक वाक्य में खुल गया, बिना किसी परिभाषा के।
अब इस रथ के दो हाल बताए जाते हैं। जिसमें विज्ञान नहीं है और जिसका मन हमेशा बेलगाम रहता है, उसकी इन्द्रियाँ वैसे ही क़ाबू से बाहर रहती हैं जैसे सारथी के दुष्ट घोड़े। और जिसमें विज्ञान है और जिसका मन हमेशा जुड़ा हुआ है, उसकी इन्द्रियाँ वैसे ही वश में रहती हैं जैसे अच्छे घोड़े। यह उपमा इसलिए काम करती है क्योंकि यह घोड़ों को बुरा नहीं कहती। घोड़े दोनों जगह वही हैं, दौड़ना उनका काम है; फ़र्क़ सारथी का है और लगाम का है।
अगली दो पंक्तियाँ नतीजा बताती हैं। जिसमें विज्ञान नहीं, जो मन से रहित है और हमेशा अशुद्ध है, वह उस पद को नहीं पाता और संसार में लौट आता है। और जिसमें विज्ञान है, जो मन वाला है और हमेशा शुद्ध है, वह उस पद को पाता है जहाँ से फिर जन्म नहीं होता। फिर इसे एक पंक्ति में बाँध दिया जाता है, कि जिस मनुष्य का सारथी विज्ञान है और जिसके हाथ में मन की लगाम है, वही रास्ते का पार पाता है, और वह विष्णु का परम पद है।
इसके बाद उपनिषद् एक सीढ़ी बनाता है, और यह सीढ़ी बाद की सारी परम्परा में दोहराई गई। इन्द्रियों से ऊपर उनके विषय हैं, विषयों से ऊपर मन है, मन से ऊपर बुद्धि है, बुद्धि से ऊपर महान आत्मा है। महान से ऊपर अव्यक्त है, अव्यक्त से ऊपर पुरुष है, और पुरुष से ऊपर कुछ नहीं है; वही अन्तिम सीमा है, वही परम गति है। इसी सीढ़ी पर हर पायदान से एक ही प्रश्न पूछा जा सकता है, कि जो मैं अभी हूँ, उसे जानने वाला कौन है।
फिर चेतावनी आती है, कि यह सबमें छिपा हुआ आत्मा प्रकट नहीं होता; यह उन सूक्ष्मदर्शियों को दिखता है जिनकी बुद्धि तेज और सूक्ष्म है। और साधन भी बताया जाता है, कि प्रज्ञावान वाणी को मन में समेट ले, मन को ज्ञानरूप आत्मा में, ज्ञान को महान आत्मा में, और उसे शान्त आत्मा में। इसके ठीक बाद वह पुकार आती है जिसे सदियों से भारत सुबह की तरह दोहराता आया है, “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत”, उठिए, जागिए, और जो श्रेष्ठ हैं उनके पास पहुँचकर जानिए। और साथ ही रास्ते की सच्चाई, “क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया”, छुरे की तेज़ की हुई धार, जिस पर से पार जाना कठिन है; कवि इस रास्ते को दुर्ग कहते हैं।
वल्ली उस वर्णन पर पूरी होती है जिसमें हर पकड़ छूट जाती है, कि वह शब्द से रहित है, स्पर्श से रहित, रूप से रहित, अव्यय, रस से रहित, नित्य, गन्ध से रहित, आदि और अन्त से रहित, महान से भी परे, ध्रुव; उसे पहचानकर आदमी मृत्यु के मुख से छूट जाता है। फिर उपनिषद् अपनी ही कथा पर मुहर लगाता है, कि मृत्यु की कही हुई यह सनातन नाचिकेत कथा कहकर और सुनकर मेधावी ब्रह्मलोक में महिमा पाता है, और जो इस परम गुह्य को ब्रह्म की सभा में या श्राद्ध के समय संयम से सुनाता है, वह अनन्तता के लिए समर्थ होता है।
सार: शरीर रथ है, बुद्धि सारथी, मन लगाम, इन्द्रियाँ घोड़े, और विषय वे रास्ते जिन पर वे दौड़ते हैं। घोड़ों को दोष नहीं दिया जाता, ध्यान लगाम पर रखा जाता है। और रास्ते के बारे में कोई झूठी दिलासा नहीं दी जाती, उसे छुरे की धार कहा जाता है।
बाहर की ओर खुले द्वार, और वह टेक जो लौट-लौटकर आती है
दूसरा अध्याय एक ऐसी बात से शुरू होता है जिसे पढ़ते ही आदमी अपनी आँखों को महसूस करने लगता है। स्वयम्भू ने इन्द्रियों के द्वार बाहर की ओर काटे, इसलिए आदमी बाहर देखता है, भीतर के आत्मा को नहीं देखता। कोई विरला धीर, अमृतत्व चाहता हुआ, अपनी आँख को उलटकर भीतर की ओर मोड़ लेता है और प्रत्यगात्मा को देख लेता है। आँख का बनना ही ऐसा है कि वह अपने को छोड़कर सब देख सकती है, और यही इस पूरे अध्याय का आधार है।
आगे कहा जाता है कि बालबुद्धि लोग बाहर की कामनाओं के पीछे जाते हैं और मृत्यु के फैले हुए फंदे में पहुँच जाते हैं; और धीर लोग अमृत को जानकर यहाँ की अस्थिर चीज़ों में ध्रुव की माँग नहीं करते। इसके बाद यम एक बहुत चतुर सवाल रखते हैं। जिससे आदमी रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श, इन सबको जानता है, उसी से वह यह सब जानता है; तो यहाँ बचता क्या है। और फिर वह टेक आती है जो इस अध्याय में बार-बार लौटेगी, “एतद्वै तत्”, यही तो वह है।
यह टेक इस उपनिषद् की एक ख़ास चाल है। हर बार यम कोई एक चीज़ दिखाते हैं, कभी जागना और सपना देखने वाला, कभी मधु खाने वाला जीव, कभी तप से पहले उत्पन्न हुआ, कभी प्राण के साथ आने वाली अदिति, कभी अरणियों में छिपा जातवेदा, कभी वह जहाँ से सूर्य उगता है और जहाँ वह डूबता है; और हर बार अन्त में वही वाक्य रख देते हैं, यही तो वह है। उँगली अलग-अलग जगह उठती है और इशारा हर बार एक ही ओर जाता है। यह टेक ही उस अध्याय का ढाँचा है।
इनमें एक चित्र ख़ास तौर पर याद रह जाता है, अरणियों में छिपी हुई आग, जो गर्भिणी स्त्रियों के सँभाले हुए गर्भ की तरह लकड़ी के भीतर पड़ी रहती है और रोज़-रोज़ जागने वाले हविष्मान मनुष्यों से पूजी जाती है। इनके बाद वह चेतावनी आती है जो दो बार, लगभग एक ही शब्दों में दोहराई जाती है, कि जो यहाँ अनेक की तरह देखता है वह मृत्यु से मृत्यु को पाता है। जो यहाँ है वही वहाँ है, और जो वहाँ है वही यहाँ भी।
फिर वह प्रसिद्ध माप आता है, अँगूठे भर का पुरुष, जो आत्मा के बीच में बैठा है, जो बीते और आने वाले का ईशान है; उसे जानकर आदमी अपने से घिन नहीं करता। और अगली पंक्ति उसे और चमका देती है, कि वह अँगूठे भर का पुरुष धुएँ रहित ज्योति की तरह है, वह आज भी वही है और कल भी वही। यह माप शरीर के भीतर एक जगह बताने के लिए है, नाप-तोल के लिए नहीं; उपनिषद् हृदय की ओर उँगली उठा रहा है, जैसे कोई कहे कि यह बात यहाँ रखी है।
वल्ली दो पानी की उपमाओं पर पूरी होती है, और दोनों आमने-सामने रखी गई हैं। जैसे ऊँची-नीची ज़मीन पर बरसा पानी पहाड़ों में बिखरकर बह जाता है, वैसे ही जो धर्मों को अलग-अलग देखता है वह उन्हीं के पीछे बिखरकर दौड़ता रहता है। और जैसे शुद्ध जल में शुद्ध जल डाला जाए तो वैसा ही हो जाता है, वैसे ही जानने वाले मुनि का आत्मा हो जाता है, हे गौतम। यहाँ यम नचिकेता को उसके गोत्र के नाम से पुकारते हैं, और उस एक सम्बोधन से पूरी बातचीत घरेलू हो जाती है।
सार: इन्द्रियों के द्वार बाहर की ओर खुलते हैं, इसलिए भीतर देखना उलटी चाल है और विरले ही चलते हैं। यम एक के बाद एक चीज़ दिखाते हैं और हर बार वही टेक रखते हैं, कि यही तो वह है। बिखरा हुआ पानी पहाड़ों में बहता है, शुद्ध में डाला हुआ शुद्ध ही रह जाता है।
ग्यारह द्वारों का नगर, और वह प्रकाश जिससे सब चमकता है
दूसरे अध्याय की दूसरी वल्ली शरीर को एक नगर बनाकर खोलती है। यह अजन्मा का, जिसका चित्त टेढ़ा नहीं है, ग्यारह द्वारों वाला नगर है; इसमें ठीक से बैठने वाला शोक नहीं करता, और छूटा हुआ वह पूरी तरह छूट जाता है। इसके बाद वह छन्द आता है जिसमें एक ही हंस को हर जगह बिठा दिया जाता है, कि वह शुचि आकाश में बैठा है, अन्तरिक्ष में वसु है, वेदी पर होता है, घर में अतिथि है, मनुष्यों में है, देवताओं में है, ऋत में है, व्योम में है; जल से जन्मा, पृथ्वी से जन्मा, ऋत से जन्मा, पर्वत से जन्मा, और स्वयं बड़ा ऋत है।
फिर उपनिषद् प्राणों पर आता है। वह प्राण को ऊपर ले जाता है और अपान को नीचे फेंकता है, और बीच में बैठे उस वामन की सारे देव उपासना करते हैं। इसके तुरन्त बाद वह सवाल आता है जो इस पूरे संवाद की जड़ है, कि जब यह शरीर ढीला पड़ जाता है और देही इस देह से छूटता है, तब यहाँ बचता क्या है। और उत्तर उलटकर दिया जाता है, कि कोई मरणशील न प्राण से जीता है न अपान से; लोग किसी और से जीते हैं, जिसके सहारे ये दोनों टिके हुए हैं।
अब यम जो कहते हैं वह इस उपनिषद् में सबसे नरम पंक्ति है। वे कहते हैं कि आइए, मैं आपको यह गुह्य सनातन ब्रह्म कहता हूँ, और यह भी कि मरण को पाकर आत्मा का क्या होता है, हे गौतम। और वे सीधा उत्तर देते हैं, कि कुछ देही शरीर पाने के लिए योनि में जाते हैं, और कुछ स्थाणु में चले जाते हैं, जैसा जिसका कर्म हो और जैसा जिसका श्रुत हो। यानी जो किया गया और जो सीखा गया, दोनों साथ चलते हैं। यह उस प्रश्न का पहला सीधा उत्तर है जो तीन रात के बाद माँगा गया था।
इसके बाद वह पंक्ति आती है जिसे नींद के अनुभव से हर आदमी टटोल सकता है, कि जो सोए हुओं में जागता रहता है और एक के बाद एक कामना गढ़ता रहता है, वही शुक्र है, वही ब्रह्म है, उसी को अमृत कहा जाता है; उसी में सारे लोक टिके हैं और उसे कोई लाँघ नहीं पाता। सपने में जो दृश्य बनते हैं वे किसी के बनाए हुए होते हैं, और बनाने वाला सो नहीं रहा होता। उपनिषद् इसी दरार में उँगली रखकर दिखाता है।
फिर तीन उपमाएँ लगातार आती हैं, और तीनों एक ही बात को तीन कोणों से कहती हैं। जैसे एक ही अग्नि संसार में घुसकर हर रूप के अनुसार उसी रूप की हो जाती है, और जैसे एक ही वायु हर रूप के अनुसार वैसी ही हो जाती है, वैसे ही सब भूतों का एक अन्तरात्मा हर रूप के अनुसार उसी रूप का हो जाता है, और बाहर भी रहता है। और जैसे सारे लोक की आँख सूर्य आँखों के बाहरी दोषों से लिप्त नहीं होता, वैसे ही वह अन्तरात्मा लोक के दुख से लिप्त नहीं होता।
इसके बाद दो पंक्तियाँ जुड़वाँ की तरह आती हैं। एक वशी, सब भूतों का अन्तरात्मा, जो एक रूप को बहुत तरह से बनाता है; जो धीर उसे अपने ही भीतर टिका हुआ देखते हैं, शाश्वत सुख उन्हीं का है, दूसरों का नहीं। और वह जो अनित्यों में नित्य है, चेतनों में चेतन है, जो अकेला बहुतों की कामनाएँ पूरी करता है; जो धीर उसे अपने ही भीतर देखते हैं, शाश्वती शान्ति उन्हीं की है, दूसरों की नहीं। यह दोहराव सुनने वाले को याद दिलाने के लिए है कि देखने की जगह बाहर नहीं है।
और फिर वह प्रश्न आता है जो नचिकेता के मन का ही होगा, कि लोग जिसे परम सुख मानते हैं वह तो बताया नहीं जा सकता; मैं उसे कैसे जानूँ, वह चमकता है या किसी के चमकने से चमकता है। उत्तर इस उपनिषद् का शिखर है। वहाँ सूर्य नहीं चमकता, न चन्द्र और तारे, न ये बिजलियाँ चमकती हैं, फिर यह आग कहाँ से; उसी के चमकने के पीछे सब चमकता है, “तस्य भासा सर्वमिदं विभाति”, उसी की आभा से यह सब चमक रहा है।
सार: शरीर ग्यारह द्वारों का नगर है और उसमें रहने वाला न प्राण से जीता है न अपान से। मरने के बाद जो होता है उसका उत्तर कर्म और श्रुत, दोनों पर टिका है। और जिस प्रकाश से सूर्य, चन्द्र और आग तक चमकते हैं, वह स्वयं किसी से चमकता नहीं।
उलटा पेड़, योग, और हृदय की गाँठें
आख़िरी वल्ली एक ऐसे चित्र से खुलती है जिसे देखकर मन एक क्षण को रुक जाता है। “ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः”, यह सनातन अश्वत्थ ऊपर जड़ वाला है और नीचे शाखाओं वाला। जिस पेड़ को हम रोज़ देखते हैं उसकी जड़ ज़मीन में है और डालें आकाश में; यहाँ वही पेड़ उलट दिया गया है, जड़ ऊपर, डालें नीचे। और तुरन्त वही वाक्य आता है जो पहले भी आ चुका है, कि वही शुक्र है, वही ब्रह्म है, उसी को अमृत कहते हैं, उसी में सारे लोक टिके हैं, उसे कोई लाँघ नहीं पाता।
इसके बाद डर की एक अनोखी बात कही जाती है। यह जो कुछ जगत है, सब प्राण में हिलता है, उसी से निकला हुआ; वह बड़ा भय है, उठाया हुआ वज्र है, और जो इसे जानते हैं वे अमृत हो जाते हैं। फिर उसी को खोलकर कहा जाता है, कि इसी के भय से अग्नि तपती है, इसी के भय से सूर्य तपता है, इसी के भय से इन्द्र और वायु, और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है। यहाँ भय का अर्थ आतंक नहीं, वह नियम है जिसके नीचे बड़े से बड़ा भी अपना काम छोड़कर भाग नहीं सकता।
अब उपनिषद् समय की कमी पर आता है, और बिना नरमी के आता है। यदि शरीर के गिरने से पहले यहीं इसे समझ लेने की सामर्थ्य हो जाए तो अच्छा; नहीं तो वह फिर रचे हुए लोकों में शरीर धारण करने लायक़ हो जाता है। और फिर वह तुलना आती है जो बताती है कि किस अवस्था में यह कितना साफ़ दिखता है, कि जैसा दर्पण में वैसा अपने आत्मा में, जैसा सपने में वैसा पितृलोक में, जैसा जल में लहराता हुआ दिखता है वैसा गन्धर्वलोक में, और ब्रह्मलोक में जैसा छाया और धूप में। सबसे साफ़ दिखने की जगह यहीं है, इसी जन्म में, अपने ही भीतर।
इसके बाद वह सीढ़ी दोबारा रखी जाती है, थोड़े बदले हुए क्रम से। इन्द्रियों से ऊपर मन, मन से ऊपर सत्त्व, सत्त्व से ऊपर महान आत्मा, महान से ऊपर अव्यक्त; और अव्यक्त से भी परे पुरुष, जो व्यापक है और जिसका कोई लिंग नहीं, कोई चिह्न नहीं। जिसे जानकर प्राणी छूट जाता है और अमृतत्व को जाता है। फिर साफ़ कह दिया जाता है कि उसका रूप दिखने में आता नहीं, उसे कोई आँख से नहीं देखता; वह हृदय से, मनीषा से और मन से पकड़ में आता है, और जो इसे जानते हैं वे अमृत हो जाते हैं।
अब वह परिभाषा आती है जिसे बाद में योग की सबसे पुरानी परिभाषाओं में गिना गया। जब पाँचों ज्ञान मन के साथ ठहर जाते हैं और बुद्धि हिलती नहीं, उसे परम गति कहते हैं। इन्द्रियों की उस स्थिर धारणा को ही योग माना जाता है, और तब आदमी अप्रमत्त होता है। इसी के साथ एक कठिन पंक्ति जुड़ी है, कि योग प्रभव और अप्यय वाला है; शांकरभाष्य इसे इस तरह पढ़ता है कि योग सधता भी है और छूट भी जाता है, इसीलिए सावधानी की बात कही गई। जो सधकर छूट सकता है उसे रोज़ फिर से साधना पड़ता है।
फिर उपनिषद् उस जगह पर आता है जहाँ भाषा हाथ खड़े कर देती है। न वाणी से, न मन से, न आँख से वह पाया जा सकता है; तो फिर उसे कैसे पकड़ा जाए। उत्तर एक ही शब्द में है, “अस्ति”, यानी है। उसे इसी तरह पकड़ना होता है कि वह है, और तब उसका तत्त्वभाव अपने आप प्रसन्न होकर खुल जाता है। यह उपनिषद् की सबसे सादी और सबसे कठिन सलाह है, कि पहले होने को मान लीजिए, फिर स्वभाव खुलेगा; न कि पहले स्वभाव सिद्ध कीजिए, फिर होना मानिए।
अन्त पास आता है और वह दो पंक्तियों में उतरता है। जब हृदय में टिकी हुई सारी कामनाएँ छूट जाती हैं, तब मरणशील अमृत हो जाता है और यहीं ब्रह्म को पा लेता है। जब हृदय की सारी गाँठें यहीं खुल जाती हैं, तब मरणशील अमृत हो जाता है; इतना ही अनुशासन है। फिर नाड़ियों की बात आती है, कि हृदय की एक सौ एक नाड़ियाँ हैं, उनमें से एक मूर्धा की ओर निकली हुई है; उससे ऊपर जाता हुआ आदमी अमृतत्व पाता है, और बाक़ी नाड़ियाँ अलग-अलग दिशाओं में निकल जाने के लिए होती हैं।
अन्तिम चित्र फिर वही अँगूठे भर का पुरुष है, जो लोगों के हृदय में हमेशा बैठा हुआ अन्तरात्मा है। उसे अपने ही शरीर से धैर्य के साथ खींच लेना चाहिए, जैसे मूँज से सींक अलग की जाती है। जो हाथ जल्दी करता है वह सींक तोड़ देता है; मूँज से सींक वही निकाल पाता है जो धीरज रखता है। और फिर कथा अपने लड़के पर लौटती है। मृत्यु की कही हुई यह विद्या और पूरा योगविधि पाकर नचिकेता ब्रह्म को प्राप्त हुआ, रज से रहित हुआ, मृत्यु से रहित हुआ; और जो कोई इस तरह अपने आत्मा को जानता है, उसका भी यही होता है। उपनिषद् उसी शान्तिपाठ पर पूरा होता है जिससे शुरू हुआ था, कि वह हम दोनों की रक्षा करे, हम दोनों को साथ खिलाए, हम साथ मिलकर बल पाएँ, और हमारे बीच द्वेष न हो।
सार: पेड़ उलटा है, जड़ ऊपर है, और उसी में सारे लोक टिके हैं। योग यहाँ इन्द्रियों की स्थिर धारणा कहा गया है, और साथ में चेतावनी कि वह छूट भी जाता है। अन्त हृदय की गाँठों पर आता है, और नचिकेता वही पाकर लौटता है जिसके लिए वह तीन रात भूखा बैठा था।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पूरी कथा में सबसे काम की बात शायद वह है जो सबसे पहले होती है। एक लड़का दान का दृश्य देखता है और उसे वह नक़ली लगता है, और वह चुप नहीं रहता। हम सब ऐसे दृश्य रोज़ देखते हैं, अपने घरों में, अपने दफ़्तरों में, अपने भीतर भी, जहाँ दिया वही जा रहा होता है जिसकी अब ज़रूरत नहीं रही। नचिकेता का पहला काम कोई साधना नहीं थी, बस यह था कि उसने देखी हुई बात को देखी हुई ही रहने दिया और उस पर सवाल पूछ लिया। जिस दिन कोई अपने भीतर वह सवाल दबाना बन्द कर देता है, उसकी यात्रा शुरू हो जाती है।
दूसरी बात तीन रातों की है। यम घर पर नहीं थे और लड़का लौट सकता था, पर वह बैठा रहा। जो चीज़ हमें सबसे ज़्यादा चाहिए वह अक्सर दरवाज़ा खुलने में देर करती है, और हम उस देर को ही उत्तर मान लेते हैं। यहाँ उपनिषद् एक साधारण सी बात कहता है, कि जो बैठा रहता है उसके लिए दरवाज़ा खुलता है, और खुलने पर हिसाब भी चुकता है। तीन रात की भूख तीन वर बन जाती है।
और तीसरी बात उस ढेर की है जो यम ने सामने रखा था। हाथी, सोना, घोड़े, सौ बरस के बेटे, पृथ्वी का बड़ा हिस्सा, और गाने-बजाने के साथ खड़ी सेवा। यह ढेर हमारे सामने भी रोज़ रखा जाता है, बस उसके नाम बदल जाते हैं। नचिकेता ने उसे नकारने के लिए कोई ऊँची बात नहीं कही, उसने बस एक सवाल पूछा, कि यह कब तक रहेगा। वही सवाल आज भी काम करता है। रथ हमारे पास है, घोड़े भी हैं, लगाम भी हाथ में ही है; इस उपनिषद् की पूरी माँग इतनी है कि सारथी जागता रहे।
आधार: कठ उपनिषद्, दोनों अध्याय, छहों वल्ली; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।