कठोपनिषद्

कृष्ण यजुर्वेद · कठ शाखा · उपनिषद्
एक बालक जो मौत के घर तीन रात रुका, और ख़ुद यमराज से वह राज़ पूछ बैठा जो देवता भी पूरा नहीं जानते।
In a smoky Vedic yajnashala, the rishi Vajashravas hands away frail, dying cows at the Vishvajit sacrifice while his small son Naciketas watches gravely from beside the fire-altar.

कल्पना कीजिए एक यज्ञशाला, जहाँ धुएँ और मंत्रों के बीच वाजश्रवस नाम के एक ऋषि (तपस्वी ब्राह्मण) स्वर्ग की कामना से ‘विश्वजित्’ नाम का वह यज्ञ कर रहे हैं जिसमें अपनी सारी सम्पत्ति दान कर देनी होती है। पर दान में जो गाएँ जा रही हैं, वे बूढ़ी और निर्बल हैं, जो आख़िरी बार पानी पी चुकीं, आख़िरी बार घास चर चुकीं, जिनका दूध सूख चुका है। पास खड़ा उनका छोटा-सा बेटा नचिकेता यह सब बड़े ध्यान से देख रहा है, और उसके भीतर एक प्रश्न उठता है। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि बालक भाँप लेता है कि सच्चा दान वही है जिसमें हमारा प्रिय हमसे छूटे; जिस दान से देने वाले का कुछ घटता ही नहीं, वह दान है ही नहीं। यही सोचकर वह पिता से पूछ बैठता है, “हे तात, आप मुझे किसको दान में देंगे?” एक बार, दो बार, तीन बार पूछने पर क्रोध में आकर पिता बोल उठते हैं, “मृत्यु को।” और यहीं से बालक मृत्यु के देवता यम (मृत्यु के अधिष्ठाता देव) के द्वार की ओर चल पड़ता है।

यह कठोपनिषद् है, जो कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा से आता है, और इसी “कठ” शाखा से इसका नाम पड़ा। स्वामी कृष्णानन्द बताते हैं कि जैसे भगवद्गीता एक जिज्ञासु शिष्य अर्जुन से आरम्भ होती है, वैसे ही यह उपनिषद् भी एक जिज्ञासु बालक, नचिकेता, से शुरू होता है, जो ज्ञान के लिए स्वयं को मृत्यु के देवता के सम्मुख समर्पित कर देता है। पूरा उपनिषद् इसी नचिकेता और यम के संवाद के रूप में बहता है, और इसका मूल सवाल वही है जो हर मनुष्य के मन में कभी-न-कभी उठता है: मरने के बाद आख़िर क्या बचता है, और वह अमर तत्त्व (कभी न मिटने वाला आत्मतत्त्व) क्या है। इसी खोज में आगे आता है श्रेय (कल्याणकारी) और प्रेय (केवल प्रिय लगने वाले) का प्रसिद्ध भेद, रथ का वह अमर रूपक जिसमें शरीर रथ है और आत्मा रथी, और ॐ की महिमा, जो उस परम लक्ष्य का सेतु बनकर आती है।

इस उपनिषद् के मुख्य किरदार

नचिकेता: एक श्रद्धालु बालक, जो सच और वचन का इतना पक्का था कि मृत्यु के द्वार पर भी डिगा नहीं।

वाजश्रवस (और्द्दालकि गौतम): नचिकेता के पिता, जिन्होंने क्रोध में बेटे को यम के हवाले कर दिया।

यम: मृत्यु और धर्म के देवता, जो अनिच्छा से नचिकेता के गुरु बने और आत्मा का परम रहस्य खोला।

मृत्यु के द्वार पर

नचिकेता और यम: तीन वरदान

कहानी एक यज्ञशाला से शुरू होती है। ऋषि वाजश्रवस (एक होता, यानी यज्ञ कराने वाला धर्मनिष्ठ ब्राह्मण) स्वर्ग की कामना से विश्वजित नाम का यज्ञ कर रहे हैं। इस यज्ञ का नियम कठिन है। स्वामी कृष्णानन्द बताते हैं कि जो स्वर्ग का सुख चाहता है, उसे अपना सब कुछ दान कर देना है, यहाँ तक कि “मेरा” कहने को कुछ बचे ही नहीं। उस युग में असली धन गायें मानी जाती थीं, सोना-चाँदी नहीं; इसलिए वाजश्रवस गायें दान कर रहे हैं। पास खड़ा उनका छोटा बालक नचिकेता यह सब बड़े ध्यान से देख रहा है। स्वामी जी कहते हैं कि बच्चे की एकाग्रता बड़ों से तीखी होती है, और इस नन्हे बालक ने वह देख लिया जो औरों की नज़र से छूट गया।

उसने देखा कि जो गायें दी जा रही हैं, वे आख़िरी बार पानी पी चुकी हैं, आख़िरी बार घास चर चुकी हैं, आख़िरी बार दुही जा चुकी हैं; इतनी दुर्बल कि ठीक से खड़ी भी नहीं हो पातीं। स्वामी कृष्णानन्द यहीं रुककर “दान” का असली अर्थ खोलते हैं। उनके अनुसार दान का अर्थ है उस वस्तु का त्याग जो हमें प्रिय हो; जिसे देने पर हृदय को कुछ कसक हो, हमारा अपना सुख थोड़ा घटे। यदि देने से हमें कोई हानि न हुई, तो हमने दिया ही क्या, और लेने वाले को मिला ही क्या? मरने को तैयार गायें खोटे सिक्कों की तरह बाँटना, स्वामी जी के शब्दों में, एक दिखावटी यज्ञ का खेल भर था, जिसका फल आनन्द-रहित लोक (निरानन्द, यानी दुःख से भरे लोक) ही हो सकता है।

The angry father Vajashravas, finger raised, condemns the boy Naciketas with the words 'I give you to Death,' the child standing calm and unshaken before him.

बालक के मन में एक विचित्र तर्क उठा, और यही इस उपनिषद् का मर्म है। नचिकेता ने सोचा कि मैं भी तो पिता की एक संपत्ति हूँ; यदि सब कुछ दान होना है, तो मुझे भी किसी को दिया जाना चाहिए। इसी से उसने पिता से पूछा, “हे तात, आप मुझे किसे देंगे?” वाजश्रवस ने इसे बालक की बकवास समझकर अनसुना कर दिया। नचिकेता ने दुबारा पूछा, फिर तीसरी बार पूछा। तीसरी बार पिता क्रोध में फट पड़े और बोल उठे, “आपको मैं मृत्यु को देता हूँ।” स्वामी जी कहते हैं कि क्रोध के उस क्षण में मनुष्य ऐसे वचन कह जाता है जिनका अर्थ भी उसे ठीक से नहीं पता होता, और जिन पर बाद में वह पछताता है।

पर बालक उन वचनों को हलके में नहीं लेता। वह पिता से कहता है, अपने वचन पर अटल रहिए, उसे वापस मत लीजिए। स्वामी कृष्णानन्द इसकी तुलना उस प्रसंग से करते हैं जब श्रीराम ने राजा दशरथ से यही कहा था कि वचन दे दिया तो उसे निभाइए। फिर नचिकेता एक गहरी बात कहता है: मृत्यु से डरने की क्या बात? जैसे पका हुआ अन्न खेत में गिरता है और फिर बीज बनकर उग आता है, वैसे ही मनुष्य मरता है और फिर जन्म लेता है। और इस तरह वह पिता के दिए वचन के अनुसार यम के द्वार पर पहुँच जाता है।

The boy Naciketas stands waiting through three nights, fasting and alone, at the great gate of Yama's abode in the realm of Death.

यम (मृत्यु के अधिपति, यमराज) उस समय घर पर नहीं थे। नचिकेता तीन रात उनके द्वार पर बिना अन्न और बिना जल के खड़ा रहता है। स्वामी जी बताते हैं कि बिना बुलाए आए मेहमान को अतिथि (यानी जिसके आने की कोई निश्चित तिथि न हो) कहते हैं, और ज्ञानी ब्राह्मण अतिथि घर में आग की लपट की तरह प्रवेश करता है; उसका सत्कार न हो तो वह घर का सारा पुण्य भस्म कर देता है। लौटने पर यम की रानी उन्हें सावधान करती हैं कि यह तेजस्वी बालक तीन दिन से भूखा खड़ा है, इसका सत्कार कीजिए, वरना सब कुछ नष्ट हो जाएगा। यम तुरन्त बालक के चरण पूजते हैं और कहते हैं, हे ब्रह्मनिष्ठ बालक, हमने आपको तीन रात भूखा रखा, यह हमसे भारी भूल हुई; इसके प्रायश्चित्त में हम आपको तीन वरदान देते हैं।

पहले वरदान में नचिकेता माँगता है कि जब वह घर लौटे तो उसके पिता का क्रोध शांत हो और वे उसे प्रेम से पहचानें और अपनाएँ। स्वामी कृष्णानन्द इसमें एक गूढ़ अर्थ देखते हैं। उनके अनुसार जिसने मृत्यु का सामना कर लिया, वह साधारण मनुष्य नहीं रह जाता, वह एक अतिमानव बन जाता है; और तब यह संसार, जो हम अज्ञानियों को भयभीत करता है, उसके लिए मित्र बन जाता है। पिता का प्रेम से अपनाना, स्वामी जी के पाठ में, इसी का संकेत है: जो जगत् की भीतरी रचना को जान लेता है, जगत् उसका दास बन जाता है, शत्रु नहीं रहता।

दूसरे वरदान में नचिकेता उस अग्नि-विद्या (नचिकेताग्नि, यानी स्वर्ग दिलाने वाला अग्नि-यज्ञ) का ज्ञान माँगता है जो मनुष्य को जरा और मृत्यु से रहित देवलोक तक पहुँचा दे। यम प्रसन्न होकर यह विद्या देते हैं, और स्वामी जी इसका अर्थ इस तरह खोलते हैं: इस यज्ञ की ईंटें मिट्टी की नहीं, “चेतना की ईंटें” हैं, यानी विचार के साँचे और मन को साधने की विधियाँ। यह वैश्वानर-अग्नि (जगत् का मूल, विराट्) जितना बाहर समूचे ब्रह्मांड में फैला है, उतना ही हर मनुष्य के हृदय की गुहा (गुफा) में बैठा है; इसी रहस्य को जान लेना ही असीम ऐश्वर्य और परम शांति की कुंजी है। प्रसन्न होकर यम एक चौथा वरदान भी दे देते हैं: यह विद्या अब से नचिकेता के नाम से जानी जाएगी, और साथ में कर्म तथा जन्म-मृत्यु के रहस्य की एक रंग-बिरंगी अदृश्य माला। तीसरा वरदान, मृत्यु के पार आत्मा का रहस्य, आगे की कथा है।

सार: दान वही है जिसमें कुछ प्रिय हमसे छूटे; बेकार का देना केवल देने का दिखावा है। एक बालक ने यह ताड़ लिया, और “मैं किसका हूँ” यह प्रश्न पूछते-पूछते मृत्यु के द्वार तक जा पहुँचा। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार जो मृत्यु का सामना करके लौटता है वह अतिमानव बन जाता है, और जिस परम अग्नि का ज्ञान यम देते हैं वह बाहर समूचे जगत् में और भीतर अपने ही हृदय की गुहा में एक साथ बसी है।

श्रेय और प्रेय: भला और प्रिय

नचिकेता अब मृत्यु के घर में खड़ा है। उसके सामने यम हैं, जिन्हें मृत्यु का अधिपति और देवताओं में परम गुरु माना गया है। दो वरदान बीत चुके हैं। यम ने प्रसन्न होकर कहा, “अब तीसरा वर माँगिए, बालक।” और जो प्रश्न नचिकेता ने रखा, वह यम के सिर पर मानो बिजली बनकर गिरा। नचिकेता पूछता है, “मनुष्य के इस देह को छोड़ देने के बाद कोई कहता है कि आत्मा (देह से परे रहने वाला चेतन तत्त्व) रहती है, कोई कहता है कि नहीं रहती। इस संशय का सच मुझे बताइए।” स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि नचिकेता केवल पुनर्जन्म की बात नहीं पूछ रहा; उसके शब्द हैं “महति साम्पराये” (महामृत्यु में), अर्थात् वह जानना चाहता है कि जब आत्मा अपने अलग-अलग होने के भाव से, अपनी व्यक्तिगत पहचान से ही छूट जाती है, तब उसकी क्या दशा होती है।

यम कतराते हैं। वे कहते हैं, “यह बात तो देवताओं के लिए भी संशय का विषय रही है; सूक्ष्म है, सहज समझ में नहीं आती। कृपया कोई और वर माँग लीजिए, मुझे इस बंधन से मुक्त कर दीजिए।” पर नचिकेता की बुद्धि तेज़ है। वह कहता है, “जब आप ही कहते हैं कि इसे देवता भी नहीं जानते, तो इसका अर्थ यही हुआ कि आप जानते हैं। और आप जैसा गुरु मुझे कहीं और न मिलेगा। इस वर के समान कोई दूसरा वर है ही नहीं।”

Enthroned Yama tempts Naciketas with heaps of gold, elephants, horses and celestial apsaras holding vinas and singing, while the boy serenely waves the riches away.

तब यम परीक्षा लेते हैं, प्रलोभन का जाल फैलाकर। वे कहते हैं, “पुत्र-पौत्र माँग लीजिए जो सौ बरस जिएँ; गौएँ, हाथी, घोड़े, सोना माँग लीजिए; समूची पृथ्वी का साम्राज्य माँग लीजिए, और जितने बरस चाहें उतनी आयु। यहाँ ये अप्सराएँ (स्वर्ग की सुंदरियाँ) हैं, वीणा और गान लिए, जो किसी मनुष्य को कभी नहीं मिलतीं; इन्हें ले लीजिए, पर मृत्यु की बात मुझसे न पूछिए।” नचिकेता शांत भाव से सब लौटा देता है। वह कहता है, “ये सारे भोग तो इन्द्रियों (आँख, कान आदि भोगने के साधन) से ही भोगे जाएँगे, और इन्द्रियों का तेज तो एक दिन क्षीण हो जाएगा। यह जगत बुलबुले-सा है, किसी भी क्षण फूट सकता है। धन से कोई मनुष्य कभी तृप्त नहीं हुआ। आप अमर हैं, मैं मरणधर्मा; जब मरणधर्मा अमर के सामने खड़ा हो, तो वह क्षणभंगुर वस्तुएँ क्यों माँगे? अपने रथ, अपना संगीत, अपना नृत्य आप वापस ले लीजिए।”

नचिकेता की इस दृढ़ता से यम प्रसन्न होते हैं, और यहीं उपनिषद् का असली उपदेश आरम्भ होता है। यम भला (श्रेय) और प्रिय (प्रेय) का भेद खोलते हैं। श्रेय वह है जो वास्तव में हित करता है, चाहे आरम्भ में कठिन और अप्रिय लगे; प्रेय वह है जो इसी क्षण मीठा लगता है, पर बाँधकर अंत में गिरा देता है। स्वामी कृष्णानन्द इसे गीता के सांख्य और योग के भेद जैसा मानते हैं, और उस वचन की याद दिलाते हैं कि जो आरम्भ में विष-सा लगे पर अंत में अमृत हो, वही उत्तम सुख है; और जो आरम्भ में अमृत-सा लगे पर अंत में विष बन जाए, वह त्याज्य है।

स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार ये दोनों, श्रेय और प्रेय, मनुष्य को एक साथ दो अलग दिशाओं में खींचते हैं, और जीवन का सार इसी चुनाव में है। जो विवेकी (परख रखने वाला) है, वह इन दोनों को तौलकर श्रेय को चुनता है और उसका कल्याण होता है; पर जो तत्काल की तृप्ति के लिए प्रेय को पकड़ता है, वह अपने लक्ष्य से गिर जाता है। ऐसे विवेकी को यह उपनिषद् “धीर” (शूरवीर, स्थिरबुद्धि) कहता है। स्वामी जी कहते हैं कि प्रेय का मार्ग अविद्या (अज्ञान, जो है उसे न देखना और जो नहीं है उसे देखना) है, और श्रेय का मार्ग विद्या (ज्ञान) है; ये दोनों उतने ही दूर और विपरीत हैं जितने रात और दिन, या रोग और आरोग्य। उनके अनुसार संसार के अधिकांश लोग धन के मद में चूर, स्वयं को पंडित मानते हुए अंधे हैं जिन्हें अंधे ही राह दिखा रहे हैं; वे समझते हैं कि यही जगत सब कुछ है, इससे परे कुछ नहीं। पर नचिकेता ने वह किया जो विरला ही करता है: तीनों लोकों का ऐश्वर्य सामने रखा हुआ ठुकराकर उसने आत्मा का कल्याण चुना। यम उसे श्रेष्ठ शिष्य कहकर सराहते हैं, “हे नचिकेता, धन की माला मैंने आपके आगे रखी, पर आप उसमें नहीं डूबे।”

सार: हर पल जीवन हमें दो ओर खींचता है, एक ओर प्रिय जो अभी मीठा लगे, दूसरी ओर भला जो अभी कठिन लगे पर अंत में थामे रखे। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि प्रिय इन्द्रियों के क्षणिक स्वाद का रास्ता है और भला आत्मा के कल्याण का; और धीर वही है जो दोनों को तौलकर, क्षणभंगुर को सादर लौटाकर, उस परम को चुनता है जिसे समय छीन नहीं सकता।

आत्मा का स्वरूप

रथ का रूपक: आत्मा रथी, शरीर रथ

नचिकेता अब भी मृत्यु के देवता यम के सामने बैठे हैं, उसी संवाद के बीच जो कठोपनिषद् का प्राण है। बालक नचिकेता ने वरदानों का लोभ ठुकराकर वही एक प्रश्न पकड़ रखा है, कि मरने के बाद आत्मा का क्या होता है, वह अमर तत्त्व क्या है। अब यम साधना की असली विधि खोलने पर आते हैं, और एक ऐसा चित्र खींचते हैं जो इस उपनिषद् की पहचान बन गया, रथ का रूपक। यम कहते हैं, इन श्लोकों को साधक रोज़ एक पवित्र मंत्र की तरह कंठस्थ रखे।

The chariot of the Self: the body as the chariot bearing the seated atman, buddhi as the charioteer, the mind as reins, and five horses (the senses) galloping along the roads of sense-objects.

चित्र यों है। शरीर एक रथ (वह गाड़ी जिसमें बैठकर यात्रा होती है) है। उस रथ में जो स्वामी विराजमान है, वही आत्मा है, जीवात्मा (देह में बैठी हुई आत्मा), रथी (रथ का मालिक)। बुद्धि (निश्चय करने वाली समझ) सारथी (रथ हाँकने वाला) है। मन (इच्छा और संकल्प करने वाला) लगाम है, वह डोर जिससे घोड़े साधे जाते हैं। इन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, ये पाँच ज्ञान के द्वार) घोड़े हैं। और विषय (इन्द्रियों के भोग, यानी रूप, शब्द, रस, गंध, स्पर्श) वे रास्ते हैं जिन पर यह रथ दौड़ता है।

स्वामी कृष्णानन्द यहाँ एक बारीक बात पर रुकते हैं, कि आख़िर भोग करने वाला (भोक्ता) है कौन। उनके अनुसार अकेली आत्मा भोग नहीं करती, क्योंकि वह तो सर्वव्यापी है। अकेली इन्द्रियाँ भी भोग नहीं करतीं, क्योंकि उनमें अपनी कोई चेतना नहीं, वे जड़ हैं; गहरी नींद में आँख-कान मौजूद रहकर भी कुछ नहीं भाँपते। अकेला मन भी भोक्ता नहीं, क्योंकि मन तो एक दर्पण-सा है, जिसमें अपनी कोई रोशनी नहीं; जब आत्मा का प्रकाश उस पर पड़ता है, तभी वह चमकता और सोचता जान पड़ता है। तो फिर जब हम कहते हैं कि “हम भोग रहे हैं”, तब बोलता कौन है? स्वामी जी कहते हैं, यह एक अजीब मेल है, आत्मा, मन और इन्द्रियों का एक क्षणिक संग, एक जुड़ाव। इसी जुड़ाव को मनीषी (विवेकी जन) भोक्ता कहते हैं। और यह भोक्ता अपने आप में कोई सच्ची हस्ती नहीं, यह तीनों के संयोग से बना एक आभासी रूप है। इसीलिए, वे कहते हैं, संसार का सारा भोग अंततः एक छलावा ठहरता है।

अब रास्तों की बात, जो प्रायः उलट समझी जाती है। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार विषय अपने आप में बाधा नहीं हैं। ग़लत दृष्टि से देखें, उन्हें भोग की चीज़ मान बैठें, तो वही विषय बंधन बन जाते हैं। सही दृष्टि से देखें, तो वही उस सीढ़ी के पहले डंडे हैं जिस पर चढ़कर ऊपर उठना है, उसी एक परम सत्ता का गहरे-से-गहरा छोर, जो स्थूल रूप में उतर आया है। रथ के दौड़ने को रास्ता तो चाहिए ही; रास्ता रोक नहीं, सहारा है। वे एक सीधी बात कहते हैं, कि यह संसार बंधन भी है और मुक्ति का साधन भी; ग़लत पकड़ो तो शत्रु, सही पकड़ो तो मित्र।

जिसकी बुद्धि-रूपी सारथी अनगढ़ है और मन-रूपी लगाम ढीली, उसके इन्द्रिय-घोड़े बेक़ाबू हो जाते हैं, जैसे किसी अनाड़ी हाँकने वाले के दुष्ट घोड़े (दुष्टाश्व, यानी बिगड़ैल घोड़े)। स्वामी जी यहाँ एक जीता-जागता दृश्य रखते हैं, ऋषिकेश से लक्ष्मणझूला जाती वह ताँगा-गाड़ी, जहाँ पानी की टंकी के पास घोड़ा अड़ जाता है; और ज़ोर दो तो आगे जाने के बजाय पीछे हटकर गाड़ी को खाई में ले जाता है, और सब सवारियों को उतरना पड़ता है। बेक़ाबू घोड़ों का रथी मंज़िल नहीं पाता, वह संसार (आवागमन का चक्र) में ही भटक जाता है। पर जिसकी बुद्धि निर्मल है और मन की लगाम कसी, उसके घोड़े साधे हुए सुंदर अश्व बन जाते हैं; वह रथ अपने मार्ग पर ठीक चलता है। पाँच घोड़े पाँच दिशाओं में भागें तो रथ का क्या हाल हो; पर वही पाँच एक दिशा में जुतें तो उनका बल कितना। और इन्द्रियों के लिए रास्ते भले अनेक दिखें, निर्मल बुद्धि के लिए रास्ता एक ही है, वह एक धारा जिसमें सारे मार्ग आकर मिल जाते हैं।

वही कसी हुई लगाम और निर्मल सारथी वाला रथी मार्ग के पार पहुँचता है, उस मंज़िल पर जिसे यम विष्णु का परम पद (सर्वव्यापी सत्ता का परम धाम) कहते हैं, आत्मा का असली घर। स्वामी कृष्णानन्द यहाँ चेताते हैं कि यह कोई जगह या ठिकाना नहीं है। यह आकाश की तरह, समुद्र की तरह सब ओर फैला हुआ है। जैसे नदी समुद्र में पहुँचकर किसी एक कोने में सिमटी नहीं रहती, सब ओर हो जाती है, वैसे ही जो जीव इस विष्णुपद में पहुँचता है, वह सीमित नहीं रहता। और अंत में वे जो कहते हैं वही इस रूपक का सार है, कि इन्द्रियों, मन और बुद्धि में अपने आप कोई दोष नहीं; दोष केवल दिशा का है। जो चीज़ अपनी जगह से हटी, वही मैल है। साधक का काम घोड़ों को मारना नहीं, उन्हें एक दिशा में जोतना है। जब बिखरी हुई सारी शक्ति एक ही नाली में बहने लगे, उसी एकाग्रता को धारणा (चित्त को एक बिंदु पर टिकाना) कहते हैं, और यही योग है।

सार: शरीर रथ है, आप उसके स्वामी; बुद्धि सारथी, मन लगाम, इन्द्रियाँ घोड़े। घोड़ों को काटना नहीं है, मोड़ना है। जिसकी लगाम ढीली, उसके घोड़े उसे खाई में ले जाते हैं; जिसकी कसी और सारथी निर्मल, वही पाँचों को एक दिशा में जोतकर अपने असली घर पहुँचता है, जो कोई दूर का ठिकाना नहीं, आकाश-सा सब ओर फैला आपका अपना परम पद है।

ॐ, और अंगूठे भर का पुरुष

मृत्यु के देवता यम अब अपने जिज्ञासु शिष्य नचिकेता को वह भेद सौंप रहे हैं जिसके इर्द-गिर्द सारे वेद घूमते हैं। यम कहते हैं कि जिस पद की तलाश में सारे वेद बावले हुए जाते हैं, जिसे पाने को लोग तप (देह और मन का संयमपूर्ण ताप) करते हैं और ब्रह्मचर्य (इन्द्रियों पर पहरा) साधते हैं, वह पद संक्षेप में एक ही अक्षर है, ॐ। और जो इसे जान ले, वह जो चाहे वही पा लेता है।

स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि ॐ कोई जल्दबाज़ी में रटा जाने वाला शब्द नहीं है। वह वाणी की मूल ध्वनि है जो नाभि के पास से उठती है और चार सीढ़ियाँ चढ़ती है, परा (बिना आवाज़ का शुद्ध दबाव), पश्यन्ती (पहली सूक्ष्म झलक), मध्यमा (मन के भीतर की ध्वनि) और वैखरी (वह स्थूल आवाज़ जो कान सुनते हैं)। उनके अनुसार ॐ का सही जाप वैखरी से शुरू होकर धीरे-धीरे पतला होता जाता है, जब तक कि वह आवाज़ की मोटाई छोड़कर एक नीरव, आकाश-सरीखे कम्पन में घुल न जाए। मांडूक्य उपनिषद् बताता है कि अ-उ-म, ये तीन मात्राएँ अन्त में अमात्र (मात्रा-रहित चौथी अवस्था) हो जाती हैं, जो आत्मा की व्यापकता के बराबर है।

स्वामी जी इस जाप को महज़ उच्चारण नहीं, एक मिलन मानते हैं। उनके अनुसार सारा विश्व एक विराट बल का कम्पन है और हम उसी समुद्र की एक नन्ही लहर हैं। ॐ कहते समय यह भाव रखिए कि पर्वतों का बल, सागर का बल, नदियों, सूरज, चाँद और आकाश का बल हम अपने भीतर खींच रहे हैं। पर यह बल तब तक भीतर नहीं आता जब तक अहंकार (मैं अलग हूँ, यह भाव) दरवाज़े पर खड़ा है। स्वामी जी कहते हैं कि जो सार्वभौम है वह कभी उस चीज़ को नहीं छूता जो अपने-आप को अलग और विशेष माने हुए है, इसलिए अहंकार का गलना ही जाप की असली शर्त है। तभी ॐ परम आलम्बन (सहारा) बन जाता है, ऐसा सहारा जिसके बराबर दूसरा कोई नहीं, और जिसे जानकर मनुष्य अन्त में ब्रह्मलोक में महिमा पाता है, जहाँ हर आत्मा दर्पण में दर्पण की तरह एक-दूसरे में झलकती है।

अब यम उस अक्षर के पीछे बैठी आत्मा की ओर इशारा करते हैं। स्वामी कृष्णानन्द एक सीधा दृष्टान्त देते हैं। जैसे एक बाल्टी में बन्द आकाश को देखकर लगता है कि बाल्टी बनी तो आकाश पैदा हुआ और बाल्टी टूटी तो आकाश मर गया, जबकि आकाश न तो जन्मा न मरा, सिर्फ़ बाल्टी की दीवारों ने यह भ्रम रचा, वैसे ही आत्मा देह, मन, प्राण और अहंकार की दीवारों में सिमटकर जन्मती-मरती जान पड़ती है। असल में वह अज (अजन्मा) है, नित्य है, पुरातन है, और शरीर के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती।

इसी से यम वह बात कहते हैं जिसे आगे गीता भी दोहराती है। स्वामी जी के अनुसार जो मारने वाला सोचता है कि मैं मारता हूँ, और जो मरता हुआ सोचता है कि मैं मारा गया, दोनों ही सच नहीं जानते। उनकी व्याख्या यों है कि हर क्रिया के पीछे, चाहे परम पुण्य का दान हो या घोर वध, एक चेतना खड़ी रहती है, मानो बल का समुद्र पीठ पर हो। उसके बिना देह जड़ है, कुछ नहीं हो सकता। पर वह चेतना न उस भले में फँसती है, न बुरे में। जैसे आकाश में टँगा सूरज, जिसके बिना संसार में कोई पाप-पुण्य संभव नहीं, फिर भी संसार के किसी पाप-पुण्य से बँधा नहीं, वैसे ही आत्मा हर कर्म का सहारा होकर भी किसी कर्म में लिप्त नहीं। इसलिए, उनके शब्दों में, न मारने वाला मारता है, न मरने वाला मरता है।

A double image of Hanuman scouting Ravana's palace in Lanka, shrunken cat-small in one half and towering to fill earth and sky in the other, illustrating the thumb-sized Self that is vaster than space.

फिर वही आत्मा कण से छोटी और आकाश से बड़ी कही जाती है, और हर जीव के हृदय की गुफा (अन्तर की वह गहरी कन्दरा) में बैठी बताई जाती है। परम्परा में इसी को अंगुष्ठमात्र पुरुष (अंगूठे भर का पुरुष) कहा गया है, वह सूक्ष्म आत्मा जो हृदय के भीतर अँगूठे जितनी जगह में विराजती जान पड़ती है, पर है आकाश से भी विशाल। स्वामी जी इसे हनुमान के रूप से समझाते हैं। लंका में रावण के महल की टोह लेते समय हनुमान बिल्ली या मच्छर जितने छोटे हो गए, और समुद्र लाँघते समय वही हनुमान धरती और आकाश को ढँक लेने वाले हो गए। जब सीता को विश्वास न हुआ कि यह नन्हा वानर उन्हें राम तक पहुँचा देगा, तब हनुमान ने अपना वही विराट रूप दिखाया जिसे देखना कठिन था। आत्मा भी ऐसी ही है, छोटे-से-छोटी और बड़े-से-बड़ी, गहरे-से-गहरी, और इसलिए हमारी पकड़ से परे।

स्वामी जी यह भी बताते हैं कि इस आत्मा को देखता कौन है। उपनिषद् कहता है कि अक्रतु (इच्छा और क्रिया से रहित, संकल्प छोड़ चुका) तथा वीतशोक (शोक से मुक्त) पुरुष ही इसे देखता है। पर इसके आगे एक शब्द है, धातुप्रसाद, जिस पर आचार्य बँट जाते हैं। स्वामी जी ईमानदारी से दोनों पाठ रखते हैं। आचार्य शंकर के अनुसार धातु का अर्थ देह और मन के घटक हैं, और इन घटकों का प्रसाद यानी उनका शान्त, सम और थिर हो जाना ही वह दशा है जिसमें भीतर से आत्मा झलकती है। पर रामानुज और मध्व जैसे भक्त आचार्य इसे ईश्वर की कृपा (प्रसाद) पढ़ते हैं, और मार्जार-न्याय (बिल्ली का दृष्टान्त) देते हैं, जैसे बिल्ली का बच्चा कोई ज़ोर नहीं लगाता, बस माँ के भरोसे रहता है, वैसे ही जीव प्रभु के भरोसे समर्पित रहे, क्योंकि जिसे आत्मा चुन ले, उसी को आत्मा मिलती है।

सार: ॐ कोई रटन नहीं, अहंकार को गलाकर विराट बल में घुल जाने का सहारा है। और जिस आत्मा तक वह पहुँचाता है, वह बाल्टी के भीतर के आकाश सी है, बाल्टी बने या टूटे, आकाश न जन्मता है न मरता। हर कर्म की पीठ पर खड़ी वह चेतना सूरज की तरह किसी पाप-पुण्य में नहीं फँसती, इसलिए न मारने वाला मारता है, न मरने वाला मरता है। अंगूठे भर सी दिखती वह आत्मा असल में आकाश से बड़ी है, और हृदय की गुफा में आपके भीतर ही बैठी है।

अमर की ओर

“उठो, जागो”: छुरे की धार जैसा रास्ता

यमराज (मृत्यु के स्वामी, जिनसे नचिकेता ने आत्मा का रहस्य माँगा था) अब तक रथ का रूपक खोल चुके हैं। शरीर रथ है, बुद्धि सारथी, मन लगाम, इन्द्रियाँ घोड़े, और रथ में बैठे हैं जीवात्मा (देह में बसा हुआ आत्मा)। अब वे एक सीढ़ी गिनवाते हैं, यह बताने को कि उस परम धाम तक पहुँचने का रास्ता किस ओर ऊपर चढ़ता है। इन्द्रियों से ऊँचे उनके विषय, विषयों से ऊँचा मन, मन से ऊँची बुद्धि, बुद्धि से ऊँचा महत् (समष्टि बुद्धि, समूची सृष्टि की एक विराट चेतना), उससे ऊँचा अव्यक्त (प्रकृति, सृष्टि की वह अनखुली सम्भावना), और उससे भी ऊँचा पुरुष। पुरुष से ऊँचा कुछ नहीं, वही अन्तिम पड़ाव है, वही परम गति।

स्वामी कृष्णानन्द इस क्रम को महज़ एक सूची नहीं मानते, उनके अनुसार यही ध्यान की विधि है। ध्यान में हमें चेतना को विषयों से खींचकर इन्द्रियों में टिकाना है, इन्द्रियों से खींचकर मन में, मन से बुद्धि में, बुद्धि से महत् में, और वहाँ से अव्यक्त होते हुए उस शान्त आत्मा (पूर्णतया शान्त परम सत्ता) में बैठा देना है। हर पायदान पिछले से सूक्ष्म है, और सूक्ष्म की ओर यह वापसी ही असली योग है।

यहाँ स्वामी जी एक बारीक़ बात कहते हैं। मनुष्य की बुद्धि उस महत् की एक बूँद-भर है, पर दुगुनी कमज़ोर बूँद। पहली बात, वह उस सागर का बहुत छोटा अंश है। दूसरी बात, वह असल नहीं, परछाईं है। जैसे हिलते पानी में सूरज टुकड़े-टुकड़े दिखता है और उसमें सूरज की गर्मी नहीं होती, वैसे ही हमारी बुद्धि उस विराट चेतना की काँपती हुई परछाईं है। इसीलिए उसे अकेले भरोसे का सारथी नहीं माना जा सकता, उसे पहले शुद्ध और लोभ-वासना से मुक्त करना होता है, तभी रथ रास्ते में कहीं उलट नहीं जाता।

और वह पुरुष कहीं दूर बैठा नहीं है। स्वामी कृष्णानन्द ज़ोर देकर कहते हैं कि वही पुरुष प्रकृति में, महत् में, बुद्धि में, मन में, इन्द्रियों में, और अन्ततः विषयों में भी झलकता है। इसीलिए परम सत्ता से सम्पर्क करना असम्भव नहीं, उसका सूत्र हर चीज़ में मौजूद है, जैसे सरकार का छोटे-से-छोटा कर्मचारी भी ऊपर तक पहुँचने का रास्ता रखता है। दिक़्क़त बस इतनी है कि इन्द्रियाँ हर चीज़ को बाहर फेंककर दिखाती हैं, इसलिए हमें लगता है कि वस्तु बाहर है और उसमें छिपा पुरुष पकड़ में नहीं आता। पूरा संसार ईश्वर-चेतना से भरा है, पर हम उसे बाहरी समझ बैठते हैं, जबकि ईश्वर तो व्यापकता है।

इसी मोड़ पर वह पुकार उठती है जो इस उपनिषद् का गहरे-से-गहरा जागता हुआ वाक्य है, “उठिए, जागिए, श्रेष्ठ पुरुषों के पास जाकर जान लीजिए।” स्वामी कृष्णानन्द इसे सीधे हमारे लिए ललकार मानते हैं, “सोइए नहीं, उठिए, कमर कस लीजिए।” उनके अनुसार यहाँ “श्रेष्ठ पुरुषों के पास जाइए” का मतलब है किसी ऐसे गुरु तक पहुँचना जो स्वयं उस ज्ञान से एकाकार हो, यानी ईश्वर को पा चुका व्यक्ति, क्योंकि जब तक मार्गदर्शक उस सत्ता में पगा न हो, तब तक यह विद्या तेज़ी से नहीं खुलती।

A lone seeker treading barefoot along the gleaming upturned edge of a giant razor stretching into mist, the perilous and near-invisible path to the immortal Self.

फिर वही प्रसिद्ध उपमा आती है, यह रास्ता छुरे की धार जैसा है, तीखा, काटने वाला, और आँखों से अनदेखा। स्वामी कृष्णानन्द समझाते हैं कि उस्तरे की धार धारदार तो होती है पर दिखती नहीं, और सम्भलकर न चलें तो वही धार काट देती है। आत्मा का यह मार्ग आकाश में उड़ते पंछी या पानी में तैरती मछली की राह जैसा है, मौजूद, पर अदृश्य, फिसलनभरा। तभी ज्ञानी इसे दुर्गम बताते हैं, अकुशल के लिए लगभग असम्भव। इसीलिए वे कहते हैं, किसी समर्थ गुरु की शरण लीजिए, नींद छोड़िए, सावधान खड़े हो जाइए। स्वामी जी का बिंदु यही है, “जागना” किसी रहस्यमय अनुभव का नाम नहीं, यह नादानी की नींद से होश में आना है, इन्द्रियों के झाँसे से निकलकर भीतर मुड़ना है।

सार: जागना यानी होश में आना। जिस परम सत्ता को हम ढूँढते हैं वह बाहर नहीं, हर पायदान में झलकती परछाईं के पीछे ख़ुद बैठी है, और इन्द्रियों से ऊपर मन, मन से बुद्धि, बुद्धि से महत्, और अन्त में पुरुष तक यह वापसी का सफ़र छुरे की धार जैसा बारीक़ है, जिसे किसी जागे हुए गुरु के साथ, होश में रहकर ही पार किया जाता है।

उलटा संसार-वृक्ष, और मरण से अमरता

The cosmic inverted ashvattha (peepal) tree with its single radiant root reaching up into Brahman and its leaf-laden branches spreading downward into the visible world.

कठोपनिषद् अब अपने आख़िरी पड़ाव पर है। मृत्यु के देवता यम (मरण के अधिपति) नचिकेता को, उस बालक को जो वरदान में धन और स्वर्ग ठुकराकर केवल आत्मा का रहस्य माँगने पर अड़ गया था, अपनी विद्या का सार सौंप रहे हैं। यहाँ वे एक चित्र खींचते हैं जो आँखों को उलटा जान पड़ता है, ऊर्ध्वमूल (जड़ें ऊपर) और अधःशाख (शाखाएँ नीचे)। यह संसार एक अश्वत्थ (पीपल का) वृक्ष है, सनातन (सदा बना रहने वाला), जिसकी जड़ ऊपर ब्रह्म में है और शाखाएँ नीचे फैली हैं।

स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार यह “ऊपर” और “नीचे” आकाश में लटके किसी पेड़ की तरह जगह का ऊपर-नीचे नहीं है। यह तो चेतना का ऊपर-नीचे है। जैसे हम कहते हैं कि कोई व्यक्ति हमसे बहुत ऊँचा है, तो उसका मतलब यह नहीं कि वह हमारे सिर पर बैठा है, उसी तरह ब्रह्म की उच्चता बुद्धि की पकड़ से परे होने की उच्चता है। मूल यानी जड़ स्वयं ईश्वर हैं, और चूँकि ईश्वर समस्त तर्क-बुद्धि से परे हैं, इसीलिए जड़ को “ऊपर” कहा गया है। फिर वही शक्ति, जो बीज में पूरी सिमटी रहती है, धीरे-धीरे बाहर की ओर रिसती है, और जितनी बाहर आती है उतनी ही देश-काल में फैल जाती है। नीचे की शाखाएँ, पत्ते, मीठे फल, यही हमारा दिखने वाला जगत है।

इसी वृक्ष पर हम सब जीव (देहधारी आत्माएँ) पंछियों की तरह बैठे हैं, बताते हैं स्वामी कृष्णानन्द। यह पेड़ इन्द्रियों के मीठे फलों से लदा है, और जो जीव अपने उद्गम को भूलकर केवल इन फलों को चखने में मगन रहता है, वह उस फल के नशे से बँध जाता है। इसीलिए यह वृक्ष एक अर्थ में सनातन है और दूसरे अर्थ में क्षणभंगुर भी। जैसे साँझ के धुँधलके में पड़ी रस्सी साँप-सी दिखती है, यह दिखना न कभी ठीक-ठीक शुरू हुआ न कभी रुकता है, फिर भी रस्सी कभी साँप बनी नहीं। उसी तरह ईश्वर ने यह जगत किसी दिन “बनाया” नहीं, यह तो दोषपूर्ण दृष्टि में सदा प्रकट होता रहता है। प्रकाश पड़ते ही साँप ग़ायब, और आत्मज्ञान का प्रकाश पड़ते ही यह वृक्ष भी ब्रह्म में घुल जाता है।

तो छूटने का मार्ग क्या है? स्वामी कृष्णानन्द इसे योग की चढ़ाई की तरह बताते हैं, प्रत्याहार (इन्द्रियों को विषयों से खींच लेना)। चेतना को विषयों से हटाकर इन्द्रियों में, इन्द्रियों से मन में, मन से बुद्धि में, बुद्धि से उस ब्रह्मांडीय बुद्धि (हिरण्यगर्भ-तत्त्व, समष्टि-चेतना) में, और फिर उससे भी ऊपर उस परम पुरुष में जो आपका अपना सार है, समेटते जाइए। तभी अमरता मिलती है, उससे पहले नहीं। पर वे चेताते भी हैं, अप्रमत्त (पूरी सावधानी से) रहिए। योग आता है और चला जाता है, टिकता नहीं, बड़े से बड़ा योगी भी इस संतुलन को सदा नहीं साध पाता। इच्छा की आँधियाँ इतनी प्रचंड हैं कि धरती में गड़े मज़बूत पेड़-सी हमारी बुद्धि को भी उखाड़ फेंकती हैं। इसीलिए सावधान, सावधान, सावधान।

अब आता है इस उपनिषद् का असली फल, वह बात जिस पर स्वामी कृष्णानन्द पूरा ज़ोर देते हैं। जिस क्षण हृदय में बसी सारी कामनाएँ झड़ जाती हैं, उसी क्षण मरणधर्मा अमर हो जाता है। स्वामी कृष्णानन्द पूछते हैं, ब्रह्म-साक्षात्कार में कितने दिन लगेंगे? उतने ही जितने आपको अपनी कामनाओं को मिटाने में लगें। और कहाँ मिलता है यह? अत्र (यहीं), इसी जगह, इसी आसन पर जहाँ आप बैठे हैं। कहीं दूर जाना नहीं पड़ता। जागना समय नहीं लेता, नींद चाहे कितनी लंबी रही हो, जाग तो एक पल में आती है।

और इसके साथ ही वह बात जो इस खंड का हृदय है, जब हृदय की सारी गाँठें खुल जाती हैं, तब मरणधर्मा अमर हो जाता है, एतावद् अनुशासनम् (बस इतनी ही शिक्षा है), इससे आगे कुछ कहने को नहीं। स्वामी कृष्णानन्द बताते हैं कि ये गाँठें असल में तीन हैं, अविद्या (सत्य को न पहचान पाना), काम (बाहर एक जगत देखने की मजबूरी जो उस अनदेखे से जन्मती है), और कर्म (उन इच्छाओं को पूरा करने का प्रयास)। इन्हें परम्परा में ब्रह्म-ग्रन्थि, विष्णु-ग्रन्थि, रुद्र-ग्रन्थि कहते हैं। इन गाँठों को या तो धीरे-धीरे खोला जाता है, या किसी उलझी हुई गाँठ को तलवार से काट देने की तरह एक ही वार में काटा जाता है। पर दोनों के लिए गुरु का मार्गदर्शन चाहिए। और जिस नचिकेता ने यह विद्या और सम्पूर्ण योगविधि पाकर ब्रह्म को प्राप्त किया, मृत्यु के बंधन से छूट गया, स्वामी जी याद दिलाते हैं, वही द्वार हमारे-आपके लिए भी खुला है, बशर्ते हम उसी लगन से, सारे आकर्षण ठुकराकर, उस सत्य पर मन टिकाए रहें।

सार: संसार उलटा पेड़ है, जड़ ऊपर ब्रह्म में, और वह जड़ ही अमर है। मुक्ति किसी दूर के लोक में नहीं, यहीं इसी जीवन में है। जिस दिन हृदय की गाँठें (अविद्या, काम, कर्म) खुल जाती हैं, उसी क्षण मरणधर्मा अमर हो जाता है। बस इतनी ही पूरी विद्या है, इससे आगे कहने को कुछ नहीं।

और अन्त में, अपनी ओर

कहानी अब अपने आख़िरी मोड़ पर है। एक नन्हा बालक नचिकेता, जिसे उसके पिता ने ग़ुस्से में मृत्यु के हवाले कर दिया था, स्वयं यमराज (मृत्यु के अधिपति) के द्वार पर तीन रात भूखा-प्यासा बैठा रहा। यमराज लौटे, लज्जित हुए, और बदले में तीन वर दिए। पहले दो वर नचिकेता ने सहज ही ले लिए, पर तीसरे पर अड़ गए, “मुझे वही बताइए जो मृत्यु के पार है। मरने के बाद कुछ बचता है या नहीं?” यमराज ने उन्हें स्वर्ग का राज, सोना, सुंदरियाँ, लंबी आयु, यह सब का लालच दिया कि यह प्रश्न छोड़ दें। पर बालक टस-से-मस न हुआ। और तभी, इसी अडिगपन के इनाम में, मृत्यु ने उसे वह सिखाया जो मृत्यु से परे है।

यमराज ने जो आख़िरी रहस्य खोला, स्वामी कृष्णानन्द उसे यों पढ़ते हैं। वे कहते हैं कि असली “मैं” वह छोटा-सा, अँगूठे-भर का पुरुष (भीतर बैठा द्रष्टा, आत्मा) है जो हर प्राणी के हृदय में सदा बसा रहता है। उसे देह से वैसे ही अलग खींच लेना है जैसे मूँज नाम की घास से उसका भीतरी कोमल रेशा सावधानी से बाहर निकाल लिया जाता है। बाहरी तिनका तो देह, मन, इन्द्रियाँ हैं; भीतर का रेशा वह शुद्ध चेतन है जिसे मृत्यु छू ही नहीं सकती। स्वामी जी के अनुसार जिस दिन यह रेशा अलग हो जाता है, वह तुरन्त अपने पूरे विश्वव्यापी तेज में चमक उठता है, ठीक वैसे जैसे क़ैदी जेल से छूटते ही खुली हवा में खड़ा हो जाता है। और इसी को उपनिषद् दो बार दोहराकर कहता है, “इसे शुद्ध जानिए, इसे अमर जानिए।”

यह अमरता किसी दूर के लोक में, किसी आने वाले कल में नहीं मिलती। स्वामी कृष्णानन्द ज़ोर देकर कहते हैं कि जिस क्षण हृदय में बैठी सारी कामनाएँ झड़ जाती हैं, उसी क्षण मरणधर्मा अमर हो जाता है, “अत्र”, यहीं, इसी जगह, इसी आसन पर। इसमें बरस नहीं लगते। जैसे गहरी नींद चाहे कितनी भी लंबी रही हो, जागना एक पल में हो जाता है, उसमें समय नहीं लगता, वैसे ही ब्रह्म में जाग उठना एक कालातीत प्रकाश है। बस हृदय की तीन गाँठें खुलनी हैं, जिन्हें स्वामी जी अविद्या (अपने स्वरूप को न पहचानना), काम (बाहर एक दुनिया की चाह), और कर्म (उस चाह को पूरा करने की भागदौड़) बताते हैं। ये गाँठें कटीं कि बस, “एतावत् अनुशासनम्”, इतना ही उपदेश है, इससे आगे कहने को कुछ नहीं बचता।

और उस अमर तक पहुँचने का रास्ता आसान नहीं। स्वामी जी इसी उपनिषद् की वह पुकार याद दिलाते हैं, “उत्तिष्ठत जाग्रत”, उठो, जागो। अज्ञान की नींद से उठ खड़े होइए, कमर कस लीजिए, किसी समर्थ गुरु के पास जाकर इस मार्ग का भेद जानिए, क्योंकि यह राह छुरे की धार जैसी पैनी और आँख से ओझल है, जैसे पानी में मछली का और आकाश में पंछी का रास्ता दिखता नहीं फिर भी होता है। पर इस पैनी राह के सिरे पर जो मिलता है, स्वामी जी कहते हैं, वह कोई वस्तु नहीं, वह शुद्ध “होना” मात्र है, वही “अस्ति” (बस है), जिसे न वाणी पकड़ती है, न मन, न आँख; उसे केवल इस रूप में जाना जाता है कि “वह है”।

कहानी का अन्त यही बताता है कि नचिकेता ने यही पूरी विद्या, यही योग का मार्ग, मृत्यु के मुख से सुना, और स्वयं ब्रह्म को पाकर निर्मल हो गए, मृत्यु के बंधन से छूट गए। पर स्वामी कृष्णानन्द यहीं रुककर हमारी ओर उँगली कर देते हैं। वे कहते हैं, यह केवल नचिकेता की बात नहीं; “अन्योऽपि एवम्”, आप और हम भी ठीक वही पा सकते हैं, बशर्ते हम वही राह चलें जो उस बालक ने चली, स्वर्ग के सारे लालच ठुकरा देना, और सत्य के प्रश्न पर अंत तक अड़े रहना। मृत्यु ने नचिकेता को जो असली पाठ दिया वह यही था, कि जिसे आप रोज़ “मैं” कहते हैं, वह देह-मन की उतार-चढ़ाव वाली परत नहीं, उसके पीछे चुपचाप देखता वह द्रष्टा है, जिस पर मृत्यु की कोई पकड़ नहीं।

सार: मृत्यु ने नचिकेता को यही सिखाया कि असली “मैं” वह अँगूठे-भर का भीतरी द्रष्टा है, जिसे देह, मन और साँस की तरह काल बहा नहीं ले जा सकता। उस अमर तक पहुँचना किसी दूर के लोक की यात्रा नहीं, हृदय की तीन गाँठें (अविद्या, काम, कर्म) खुलते ही यहीं, इसी पल हो जाने वाली जागृति है, जैसे नींद से जागना। इसलिए उपनिषद् हमें झिंझोड़कर कहता है, उठो, जागो; भीतर बैठे उस अमर की ओर मुड़ो, क्योंकि जो नचिकेता ने पाया वही आप भी पा सकते हैं, अगर लालच ठुकराकर सत्य के प्रश्न पर अंत तक अड़े रहें।

व्याख्या मुख्यतः स्वामी कृष्णानन्द (दिव्य जीवन संघ) की कठोपनिषद्-व्याख्या पर आधारित।