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गीतासंकट के बीच संवाद

भगवद् गीता

अध्यायवार व्याख्या · चुने हुए श्लोक

18 अध्यायों की व्याख्या; मूल श्लोक चयन के रूप में।

दायरा और आधार-संस्करण

पाठ-जाँच के लिए BORI का The Bhagavadgita Reprinted From The Bhismaparvan, प्रो. एस. के. बेलवलकर, नामित संदर्भ है।

स्रोत और सीमाएँ →संग्रह का पूरा नक़्शा →

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भगवद् गीता

कुरुक्षेत्र के बीचों-बीच रथ पर खड़े दो लोगों की बातचीत
700 श्लोक, 18 अध्याय, और एक रथ पर खड़े दो लोग
भीष्म पर्व के अध्याय पच्चीस से बयालिस तक, युद्ध शुरू होने से ठीक पहले की बातचीत, जो आगे ढाई हज़ार साल भारतीय सोच का केन्द्र-बिन्दु बनी रही।
पूरा पाठ बिना जल्दबाज़ी के: कुछ घंटे

एक दिन हर इंसान अर्जुन बनता है। जो लड़ाई वह टालना चाहता है, वही उसे लड़नी पड़ती है। जिन रिश्तों के सामने उसके हाथ काँपते हैं, उन्हीं के बीच उसे फ़ैसला लेना पड़ता है। और तब, अपने रथ पर खड़े-खड़े, वह भीतर के सारथी से पूछता है, मैं क्या करूँ। गीता तब काम आती है।

घुमावदार पहाड़ी मार्ग पर पाँच घोड़ों का रथ हाँकते कृष्ण, पीछे बैठे अर्जुन; रास्ता ऊपर चोटी पर बने मन्दिर की ओर चढ़ता हुआ
रथ। एक तरफ़ कृष्ण, सारथी; दूसरी तरफ़ अर्जुन, धनुर्धर।

भगवद् गीता महाभारत के भीष्म पर्व का एक अंश है, अध्याय पच्चीस से बयालिस। संख्या में सात सौ श्लोक, अठारह अध्यायों में बँटे हुए। संदर्भ यह है कि कुरुक्षेत्र के मैदान में दो सेनाएँ आमने-सामने हैं, युद्ध छिड़ने में मिनट बाक़ी हैं, और एक रथ पर खड़ा अर्जुन अपने सारथी कृष्ण से पूछता है कि वह लड़े या न लड़े। बाक़ी सब इसी प्रश्न का खुलना है।

यह संवाद का तरीक़ा, गुरु और शिष्य के बीच का प्रश्नोत्तर, उपनिषद्-साहित्य की पुरानी शैली है। दसवीं-नवीं सदी ईसा-पूर्व के क़रीब, बृहदारण्यक और छान्दोग्य की वाणियाँ इसी तरह बँधी थीं। गीता उसी परम्परा को आगे लेकर चलती है, और शायद यही कारण है कि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में इसे अपने “प्रस्थान-त्रयी” (तीन-स्थान-त्रिक) में रखा, उपनिषदों और ब्रह्म-सूत्र के साथ। तीनों एक ही दर्शन-पथ के तीन प्रवेश-द्वार हैं।

पाठ का केन्द्रीय शिक्षण-वाक्य अब कहावत की तरह जीवित है। कर्म पर हमारा अधिकार है, फल पर नहीं। चिन्ता छोड़िए, काम कीजिए। यह सूत्र दूसरे अध्याय के सैंतालिसवें श्लोक से आता है, और गीता का आधा वज़न इसी एक वाक्य पर है। बाक़ी पाठ इस सूत्र की अनेक परतें खोलता है, ज्ञान, भक्ति, ध्यान, समर्पण के रूप में।

गीता को धार्मिक ग्रंथ के साथ-साथ एक जीवन-व्यवहार-मार्गदर्शिका के रूप में भी पढ़ा जाता रहा है। गांधी जी ने 1929 में गुजराती में इसका भाष्य (अनासक्ति योग) लिखा, और उन्होंने अपनी आत्म-कथा में लिखा कि गीता उनके सबसे कठिन निर्णयों में साथ रही। आज भी, कई पाठक इसे रोज़ाना उठाते हैं, किसी एक श्लोक पर बैठते हैं, उसी के साथ दिन शुरू करते हैं।

कथा-सार

पहले अध्याय में एक मनुष्य टूटता है। कुरुक्षेत्र के मैदान में दो सेनाएँ आमने-सामने हैं। अर्जुन अपने रथ को बीच में खड़ा कराते हैं, और सामने अपने ही चाचा, गुरु, भाई-बंधु देखते हैं। हाथ काँपते हैं, धनुष गिरता है। अर्जुन कहते हैं, मैं नहीं लड़ सकता। यही गीता का प्रारम्भ है। अध्याय का नाम भी इसी मानसिक अवस्था पर है, अर्जुन-विषाद-योग।

अगले पाँच अध्यायों में कृष्ण का उत्तर एक तरह का दार्शनिक-ज्ञान-दान है। आत्मा अमर है, शरीर नश्वर। जिसे आप मार रहे हैं, वह आत्मा नहीं है। और इसी के साथ कर्म-योग का सूत्र आता है, कर्म पर आपका अधिकार है, फल पर नहीं। फल की चिन्ता छोड़ कर काम करते रहिए। दूसरे अध्याय का सैंतालिसवाँ श्लोक यह कहता है, और शेष चार अध्याय इसी एक वाक्य की परतें खोलते हैं।

सातवें अध्याय से बारहवें तक का बीच का हिस्सा भक्ति-तत्त्व का है। कृष्ण अपनी विभूतियाँ बताते हैं, अपने ब्रह्माण्डीय रूप का परिचय देते हैं। ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन को विश्व-रूप का दर्शन होता है, एक ऐसी कल्पना जिसने जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर को 1945 में ट्रिनिटी-परीक्षण के बाद उद्धृत करने पर मजबूर किया, “अब मैं काल बन गया, संसार का संहार करने वाला।” अर्जुन काँप उठते हैं, और उसी पल कृष्ण उन्हें फिर शान्त करते हैं।

अंतिम छह अध्याय फिर ज्ञान पर लौटते हैं। तीन गुणों का विश्लेषण, पुरुषोत्तम का स्वरूप, दैवी और आसुरी सम्पदा। और सबसे अन्तिम पाठ-वाक्य, अठारहवें अध्याय का छियासठवाँ श्लोक, सब धर्मों को छोड़ कर मेरी शरण में आइए, मैं आपको सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कीजिए। अर्जुन का संदेह यहीं मिटता है, धनुष फिर उठ जाता है, और युद्ध शुरू हो जाता है।

पाठक के कुछ शुरुआती प्रश्न

उपनिषद् कितने हैं और गीता उनसे कैसे जुड़ी है। परंपरागत संख्या एक सौ आठ है, किन्तु मुख्य उपनिषदों की संख्या दस है, जिन पर शंकराचार्य ने भाष्य लिखे। ये वेदों के अंतिम भाग हैं, इसी कारण इन्हें “वेदान्त” भी कहा जाता है। गीता का दर्शन इन्हीं की धरती पर खड़ा है, और कई श्लोक सीधे उपनिषद्-वाक्यों की पुनर्व्याख्या हैं।

दस मुख्य उपनिषद् कौन-से हैं। ईशावास्य, कठ, केन, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, और बृहदारण्यक। हर एक की अपनी शैली है। कठ नचिकेता-यम-संवाद के नाटकीय रूप में, छान्दोग्य कथाओं से भरा, बृहदारण्यक सबसे विस्तृत और याज्ञवल्क्य-केन्द्रित।

गीता क्यों पढ़ें। सवाल अपने आप में पुराना है, और हर पाठक अपने उत्तर के साथ आता है। एक उपयोगी उत्तर यह है कि गीता एक ऐसा ग्रंथ है जो आपके निर्णयों के साथ रहता है, उन्हें थोड़ा-थोड़ा हल्का करता है। एक पंक्ति यदि उठ कर मन में बैठ जाए, तो दिन का आकार बदल जाता है।

संख्या में कितना है। अठारह अध्याय, सात सौ श्लोक। प्रति-अध्याय औसत उनतालिस श्लोक, सबसे छोटे अध्याय बारहवाँ और पंद्रहवाँ हैं, बीस-बीस श्लोक के, और सबसे लम्बा अठारहवाँ, अठहत्तर श्लोक का। पूरा पाठ बिना जल्दबाज़ी के पढ़ें तो कुछ घंटे लगते हैं।

अध्याय 2 और अध्याय 18 पूरी गीता का सार हैं। जल्दी हो तो इन्हीं दो से शुरू कर सकते हैं।

शुरुआत अध्याय 1 से कीजिए।

साथ में पढ़ें · सहचर ग्रन्थ

श्लोक खोजिए

अध्याय और श्लोक की संख्या लिखिए, जैसे 2.47 या 18 66।

विषय-सूची: प्रश्न से श्लोक तक

जो सवाल आपके मन में है, उसके सबसे सीधे श्लोक। हर पंक्ति उस श्लोक के पदच्छेद और अर्थ तक ले जाती है।

शोक और मोह 8
कर्म: करना पर फल न पकड़ना 8
स्थिर बुद्धि वाला इंसान 7
ध्यान और मन का संयम 8
भक्ति और शरण 8
अवतार और धर्म की रक्षा 7
ज्ञान: आत्मा और शरीर 8
तीन गुण और स्वभाव 8
मृत्यु और उसके पार 8
अपना धर्म, अपना काम 7
आहार, श्रद्धा और तप 8
संजय की आँख से अंत 4