भगवद् गीता
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एक दिन हर इंसान अर्जुन बनता है। जो लड़ाई वह टालना चाहता है, वही उसे लड़नी पड़ती है। जिन रिश्तों के सामने उसके हाथ काँपते हैं, उन्हीं के बीच उसे फ़ैसला लेना पड़ता है। और तब, अपने रथ पर खड़े-खड़े, वह भीतर के सारथी से पूछता है, मैं क्या करूँ। गीता तब काम आती है।

भगवद् गीता महाभारत के भीष्म पर्व का एक अंश है, अध्याय पच्चीस से बयालिस। संख्या में सात सौ श्लोक, अठारह अध्यायों में बँटे हुए। संदर्भ यह है कि कुरुक्षेत्र के मैदान में दो सेनाएँ आमने-सामने हैं, युद्ध छिड़ने में मिनट बाक़ी हैं, और एक रथ पर खड़ा अर्जुन अपने सारथी कृष्ण से पूछता है कि वह लड़े या न लड़े। बाक़ी सब इसी प्रश्न का खुलना है।
यह संवाद का तरीक़ा, गुरु और शिष्य के बीच का प्रश्नोत्तर, उपनिषद्-साहित्य की पुरानी शैली है। दसवीं-नवीं सदी ईसा-पूर्व के क़रीब, बृहदारण्यक और छान्दोग्य की वाणियाँ इसी तरह बँधी थीं। गीता उसी परम्परा को आगे लेकर चलती है, और शायद यही कारण है कि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में इसे अपने “प्रस्थान-त्रयी” (तीन-स्थान-त्रिक) में रखा, उपनिषदों और ब्रह्म-सूत्र के साथ। तीनों एक ही दर्शन-पथ के तीन प्रवेश-द्वार हैं।
पाठ का केन्द्रीय शिक्षण-वाक्य अब कहावत की तरह जीवित है। कर्म पर हमारा अधिकार है, फल पर नहीं। चिन्ता छोड़िए, काम कीजिए। यह सूत्र दूसरे अध्याय के सैंतालिसवें श्लोक से आता है, और गीता का आधा वज़न इसी एक वाक्य पर है। बाक़ी पाठ इस सूत्र की अनेक परतें खोलता है, ज्ञान, भक्ति, ध्यान, समर्पण के रूप में।
कथा-सार
पहले अध्याय में एक मनुष्य टूटता है। कुरुक्षेत्र के मैदान में दो सेनाएँ आमने-सामने हैं। अर्जुन अपने रथ को बीच में खड़ा कराते हैं, और सामने अपने ही चाचा, गुरु, भाई-बंधु देखते हैं। हाथ काँपते हैं, धनुष गिरता है। अर्जुन कहते हैं, मैं नहीं लड़ सकता। यही गीता का प्रारम्भ है। अध्याय का नाम भी इसी मानसिक अवस्था पर है, अर्जुन-विषाद-योग।
अगले पाँच अध्यायों में कृष्ण का उत्तर एक तरह का दार्शनिक-ज्ञान-दान है। आत्मा अमर है, शरीर नश्वर। जिसे आप मार रहे हैं, वह आत्मा नहीं है। और इसी के साथ कर्म-योग का सूत्र आता है, कर्म पर आपका अधिकार है, फल पर नहीं। फल की चिन्ता छोड़ कर काम करते रहिए। दूसरे अध्याय का सैंतालिसवाँ श्लोक यह कहता है, और शेष चार अध्याय इसी एक वाक्य की परतें खोलते हैं।
सातवें अध्याय से बारहवें तक का बीच का हिस्सा भक्ति-तत्त्व का है। कृष्ण अपनी विभूतियाँ बताते हैं, अपने ब्रह्माण्डीय रूप का परिचय देते हैं। ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन को विश्व-रूप का दर्शन होता है, एक ऐसी कल्पना जिसने जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर को 1945 में ट्रिनिटी-परीक्षण के बाद उद्धृत करने पर मजबूर किया, “अब मैं काल बन गया, संसार का संहार करने वाला।” अर्जुन काँप उठते हैं, और उसी पल कृष्ण उन्हें फिर शान्त करते हैं।
अंतिम छह अध्याय फिर ज्ञान पर लौटते हैं। तीन गुणों का विश्लेषण, पुरुषोत्तम का स्वरूप, दैवी और आसुरी सम्पदा। और सबसे अन्तिम पाठ-वाक्य, अठारहवें अध्याय का छियासठवाँ श्लोक, सब धर्मों को छोड़ कर मेरी शरण में आइए, मैं आपको सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कीजिए। अर्जुन का संदेह यहीं मिटता है, धनुष फिर उठ जाता है, और युद्ध शुरू हो जाता है।
पाठक के कुछ शुरुआती प्रश्न
उपनिषद् कितने हैं और गीता उनसे कैसे जुड़ी है। परंपरागत संख्या एक सौ आठ है, किन्तु मुख्य उपनिषदों की संख्या दस है, जिन पर शंकराचार्य ने भाष्य लिखे। ये वेदों के अंतिम भाग हैं, इसी कारण इन्हें “वेदान्त” भी कहा जाता है। गीता का दर्शन इन्हीं की धरती पर खड़ा है, और कई श्लोक सीधे उपनिषद्-वाक्यों की पुनर्व्याख्या हैं।
दस मुख्य उपनिषद् कौन-से हैं। ईशावास्य, कठ, केन, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, और बृहदारण्यक। हर एक की अपनी शैली है। कठ नचिकेता-यम-संवाद के नाटकीय रूप में, छान्दोग्य कथाओं से भरा, बृहदारण्यक सबसे विस्तृत और याज्ञवल्क्य-केन्द्रित।
गीता क्यों पढ़ें। सवाल अपने आप में पुराना है, और हर पाठक अपने उत्तर के साथ आता है। एक उपयोगी उत्तर यह है कि गीता एक ऐसा ग्रंथ है जो आपके निर्णयों के साथ रहता है, उन्हें थोड़ा-थोड़ा हल्का करता है। एक पंक्ति यदि उठ कर मन में बैठ जाए, तो दिन का आकार बदल जाता है।
संख्या में कितना है। अठारह अध्याय, सात सौ श्लोक। प्रति-अध्याय औसत उनतालिस श्लोक, सबसे छोटे अध्याय बारहवाँ और पंद्रहवाँ हैं, बीस-बीस श्लोक के, और सबसे लम्बा अठारहवाँ, अठहत्तर श्लोक का। पूरा पाठ बिना जल्दबाज़ी के पढ़ें तो कुछ घंटे लगते हैं।
अध्याय 2 और अध्याय 18 पूरी गीता का सार हैं। जल्दी हो तो इन्हीं दो से शुरू कर सकते हैं।
शुरुआत अध्याय 1 से कीजिए।
साथ में पढ़ें · सहचर ग्रन्थ
- अष्टावक्र गीता गीता का सामने का स्वर, विशुद्ध अद्वैत।
- योग सूत्र मन की कार्य-विधि की पुस्तिका, गीता की पूरक।
- आदि ग्रंथ सिख परंपरा का मूल ग्रंथ, हर रचयिता में गीता की गूँज।
यही कथा वहाँ भी
- अध्याय 22 · गीता का क्षण (अर्जुन-विषाद, कृष्ण का उत्तर)
महाभारत (भीष्म पर्व): गीता का क्षण, कथा-रूप में - अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग
भगवद्गीता अध्याय 1: अर्जुन-विषाद - अनुगीता · अश्वमेध पर्व
अनुगीता: युद्ध के बाद अर्जुन को पुनः उपदेश (अश्वमेध पर्व) - उद्धव गीता
उद्धव गीता: प्रयाण से पूर्व उद्धव को उपदेश (श्रीमद्भागवत, स्कन्ध 11)
गीता एक पृष्ठ में: अठारह अध्याय एक-एक पंक्ति में और बारह श्लोक →
श्लोक खोजिए
अध्याय और श्लोक की संख्या लिखिए, जैसे 2.47 या 18 66।
विषय-सूची: प्रश्न से श्लोक तक
जो सवाल आपके मन में है, उसके सबसे सीधे श्लोक। हर पंक्ति उस श्लोक के पदच्छेद और अर्थ तक ले जाती है।
शोक और मोह 8
- 1.28 कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् · अत्यन्त करुणा से भरकर शोक करते हुए वे यह बोले। हे कृष्ण, मैं युद्ध की इच्छा से सामने खड़े इन अपने ही लोगों को देख रहा हूँ।
- 1.47 एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् · युद्धभूमि में इस प्रकार कहकर शोक से व्याकुल मन वाले अर्जुन बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए।
- 2.11 अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे · आप उनके लिए शोक करते हैं जो शोक के योग्य नहीं हैं, और साथ ही पण्डितों जैसे वचन बोलते हैं। ज्ञानी लोग न तो उनके लिए शोक करते हैं जिनके प्राण चले गए, न उनके लिए जिनके प्राण अभी हैं।
- 2.13 देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा · जैसे देहधारी आत्मा के इस देह में बालपन, युवावस्था और वृद्धावस्था आती हैं, वैसे ही दूसरे देह की प्राप्ति होती है। धीर पुरुष इस विषय में मोहित नहीं होता।
- 2.20 न जायते म्रियते वा कदा चिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः · यह आत्मा न कभी जन्मता है और न मरता है, न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
- 2.22 वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि · जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्र ग्रहण करता है, वैसे ही देहधारी आत्मा जीर्ण शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त करता है।
- 2.27 जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च · क्योंकि जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है और जो मरा है उसका जन्म निश्चित है। इसलिए जिस बात का कोई उपाय नहीं, उसके विषय में आपको शोक करना उचित नहीं है।
- 2.30 देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत · हे भारत, सबके देह में रहने वाला यह आत्मा सदा अवध्य है। इसलिए किसी भी प्राणी के लिए आपको शोक करना उचित नहीं है।
कर्म: करना पर फल न पकड़ना 8
- 2.47 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदा चन · आपका अधिकार केवल कर्म में है, उसके फलों में कभी नहीं। आप कर्मफल के हेतु मत बनिए, और कर्म न करने में भी आपकी आसक्ति न हो।
- 2.48 योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय · हे धनंजय, आसक्ति को त्यागकर, सिद्धि और असिद्धि में समान रहकर, योग में स्थित होकर कर्म कीजिए। यह समता ही योग कही जाती है।
- 2.50 बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते · समबुद्धि से युक्त पुरुष इस लोक में पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। इसलिए आप योग में लग जाइए, कर्मों में कुशलता ही योग है।
- 3.8 नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः · आप नियत कर्म कीजिए, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म न करने से तो आपके शरीर का निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।
- 3.19 तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर · इसलिए आप अनासक्त होकर निरन्तर कर्तव्य कर्म भली भाँति कीजिए। क्योंकि अनासक्त होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परम को प्राप्त करता है।
- 3.30 मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा · अध्यात्म में लगे चित्त से सब कर्मों को मुझमें अर्पण करके, आशा रहित, ममता रहित और सन्ताप रहित होकर युद्ध कीजिए।
- 4.18 कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः · जो कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है। वही योगी है और सब कर्मों का करने वाला है।
- 18.47 श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् · अच्छी तरह किए गए परधर्म से गुणरहित स्वधर्म भी श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं पाता।
स्थिर बुद्धि वाला इंसान 7
- 2.55 प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् · हे पार्थ, जब मनुष्य मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
- 2.56 दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः · जिसका मन दुःखों में उद्विग्न नहीं होता, जिसे सुखों की स्पृहा नहीं है और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त है, वह मुनि स्थिर बुद्धि वाला कहा जाता है।
- 2.58 यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः · जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों को उनके विषयों से सब ओर से समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है।
- 2.62 ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते · विषयों का चिन्तन करते हुए पुरुष की उनमें आसक्ति उत्पन्न हो जाती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।
- 2.63 क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः · क्रोध से मोह होता है और मोह से स्मृति में भ्रम हो जाता है। स्मृति के नाश से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश से मनुष्य नष्ट हो जाता है।
- 2.70 आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् · जैसे सब ओर से भरे जाते हुए भी अचल स्थिति वाले समुद्र में जल प्रवेश करता है, वैसे ही जिस पुरुष में सब भोग प्रवेश करते हैं, वह शान्ति को प्राप्त करता है। भोगों की कामना करने वाला शान्ति नहीं पाता।
- 2.71 विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः · जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्यागकर स्पृहा, ममता और अहंकार से रहित होकर विचरता है, वह शान्ति को प्राप्त करता है।
ध्यान और मन का संयम 8
- 6.5 उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् · मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपने को अधोगति में न गिराए। क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना बन्धु है और स्वयं ही अपना शत्रु है।
- 6.6 बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः · जिसने अपने द्वारा अपने को जीत लिया है, उसका आत्मा ही उसका बन्धु है। परन्तु जिसने अपने को नहीं जीता, उसका आत्मा ही शत्रु की भाँति शत्रुता में बर्तता है।
- 6.16 नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः · हे अर्जुन, बहुत खाने वाले का योग नहीं सिद्ध होता, और सर्वथा न खाने वाले का भी नहीं। बहुत सोने के स्वभाव वाले का भी नहीं, और अधिक जागने वाले का भी नहीं।
- 6.17 युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु · जिसका आहार और विहार नियमित है, कर्मों में जिसकी चेष्टा नियमित है, और जिसका सोना और जागना नियमित है, उसका योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।
- 6.19 यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता · जैसे वायु रहित स्थान में रखा दीपक चंचल नहीं होता, वैसी ही उपमा आत्मा के योग का अभ्यास करते हुए वश में किए चित्त वाले योगी के लिए कही गई है।
- 6.26 यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् · यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ जहाँ विचरता है, वहाँ वहाँ से इसे रोक कर आत्मा में ही वश में लाए।
- 6.34 चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् · हे कृष्ण, यह मन चंचल है, मथ देने वाला है, बलवान और दृढ़ है। इसका निग्रह हम वायु को रोकने के समान अत्यन्त कठिन मानते हैं।
- 6.35 असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् · हे महाबाहो, निःसन्देह मन चंचल है और कठिनता से वश में होता है। परन्तु हे कुन्तीपुत्र, अभ्यास और वैराग्य से यह वश में हो जाता है।
भक्ति और शरण 8
- 7.16 चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन · हे अर्जुन, हे भरतश्रेष्ठ, चार प्रकार के पुण्यकर्मी लोग मुझे भजते हैं। वे हैं दुखी, जिज्ञासु, धन चाहने वाले और ज्ञानी।
- 9.22 अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते · जो अनन्य भाव वाले लोग मेरा चिन्तन करते हुए सब प्रकार से मेरी उपासना करते हैं, नित्य मुझमें लगे हुए उन लोगों का योग और क्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।
- 9.26 पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति · जो शुद्ध चित्त वाला भक्त मुझे भक्ति से पत्र, पुष्प, फल, जल अर्पण करता है, उस भक्ति से अर्पित को मैं ग्रहण करता हूँ।
- 9.34 मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु · मुझमें मन वाले, मेरे भक्त और मेरा पूजन करने वाले होइए, मुझे नमस्कार कीजिए। इस प्रकार मेरे परायण होकर अपने को मुझमें युक्त करके आप मुझे ही प्राप्त होंगे।
- 12.13 अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च · जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और दयालु है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख और दुःख में समान है और क्षमाशील है,
- 12.14 संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः · जो निरन्तर सन्तुष्ट है, योगी है, मन को वश में रखने वाला और दृढ़ निश्चय वाला है, और जिसने मन और बुद्धि मुझमें अर्पण कर दिए हैं, वह मेरा भक्त मुझको प्रिय है।
- 18.65 मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु · मुझमें मन वाले, मेरे भक्त और मेरी पूजा करने वाले होइए, मुझे नमस्कार कीजिए। आप मुझे ही पाएँगे, यह मैं आपसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, आप मुझे प्रिय हैं।
- 18.66 सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज · सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आइए। मैं आपको सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कीजिए।
अवतार और धर्म की रक्षा 7
- 4.6 अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् · अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी, और समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी, मैं अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी माया से प्रकट होता हूँ।
- 4.7 यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत · हे भारत, जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब तब मैं अपने रूप को रचता हूँ।
- 4.8 परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् · साधु पुरुषों की रक्षा के लिए, दुष्कर्म करने वालों के विनाश के लिए और धर्म की भली प्रकार स्थापना के लिए मैं युग युग में प्रकट होता हूँ।
- 4.9 जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः · हे अर्जुन, जो मेरे दिव्य जन्म और कर्म को इस प्रकार तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर त्याग कर फिर जन्म नहीं पाता। वह मुझे ही प्राप्त होता है।
- 4.11 ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् · जो मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उन्हें उसी प्रकार भजता हूँ। हे पार्थ, सब मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
- 10.41 यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा · जो जो वस्तु विभूति से युक्त, शोभा से युक्त अथवा बल से युक्त है, उस उस को आप मेरे ही तेज के अंश से उत्पन्न जानिए।
- 11.32 कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः · मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूँ, और यहाँ लोकों का संहार करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। जो योद्धा विपक्षी सेनाओं में खड़े हैं, वे सब आपके बिना भी नहीं रहेंगे।
ज्ञान: आत्मा और शरीर 8
- 2.16 नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः · असत् का अस्तित्व नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। तत्त्व को देखने वाले ज्ञानियों ने इन दोनों का यह निर्णय देखा है।
- 2.17 अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् · जिससे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है, उसे आप अविनाशी जानिए। इस अव्यय का विनाश कोई भी नहीं कर सकता।
- 2.23 नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः · इस आत्मा को शस्त्र नहीं काटते, इसे अग्नि नहीं जलाती। इसे जल गीला नहीं करता और वायु नहीं सुखाता।
- 2.24 अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च · यह आत्मा काटा नहीं जा सकता, जलाया नहीं जा सकता, गीला नहीं किया जा सकता और सुखाया नहीं जा सकता। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।
- 4.38 न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते · इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निश्चय ही कुछ नहीं है। योग में भली प्रकार सिद्ध पुरुष उस ज्ञान को समय पाकर स्वयं अपने में पा लेता है।
- 13.1 इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते · हे कुन्तीपुत्र, यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है। जो इसको जानता है, उसको इन दोनों के तत्त्व को जानने वाले ज्ञानी क्षेत्रज्ञ कहते हैं।
- 13.2 क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत · हे भारत, सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मुझको ही जानिए। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही मेरे मत में ज्ञान है।
- 15.7 ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः · जीव लोक में जीव रूप हुआ यह सनातन अंश मेरा ही है। वह प्रकृति में स्थित मन सहित छह इन्द्रियों को अपनी ओर खींचता है।
तीन गुण और स्वभाव 8
- 3.27 प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः · सब कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं। अहंकार से मोहित अन्तःकरण वाला मनुष्य मानता है कि मैं ही कर्ता हूँ।
- 3.33 सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि · ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चेष्टा करता है। सब प्राणी प्रकृति का अनुसरण करते हैं, फिर हठ क्या करेगा?
- 14.5 सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः · हे महाबाहु, सत्त्व, रज और तम, ये प्रकृति से उत्पन्न गुण अविनाशी देही को देह में बाँधते हैं।
- 14.6 तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् · हे निष्पाप, उनमें सत्त्वगुण निर्मल होने से प्रकाश करने वाला और निर्विकार है। वह सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है।
- 14.7 रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् · हे कुन्तीपुत्र, रजोगुण को रागरूप और तृष्णा तथा आसक्ति से उत्पन्न जानिए। वह देही को कर्मों की आसक्ति से बाँधता है।
- 14.8 तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् · हे भारत, तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न और सब देहधारियों को मोहित करने वाला जानिए। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा से बाँधता है।
- 17.2 त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा · देहधारियों की वह स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा तीन प्रकार की होती है, सात्त्विकी, राजसी और तामसी। उसे आप सुनिए।
- 18.40 न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः · पृथ्वी पर, आकाश में या देवताओं में भी ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त हो।
मृत्यु और उसके पार 8
- 2.20 न जायते म्रियते वा कदा चिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः · यह आत्मा न कभी जन्मता है और न मरता है, न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
- 2.22 वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि · जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्र ग्रहण करता है, वैसे ही देहधारी आत्मा जीर्ण शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त करता है।
- 8.5 अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् · जो अन्तकाल में मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। इसमें कोई संशय नहीं है।
- 8.6 यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् · हे कौन्तेय, यह मनुष्य अन्तकाल में जिस जिस भाव का स्मरण करता हुआ शरीर छोड़ता है, उसी उसी को प्राप्त होता है, क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है।
- 8.7 तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च · इसलिए आप सब समय मेरा निरन्तर स्मरण कीजिए और युद्ध भी कीजिए। मुझमें मन और बुद्धि अर्पित करके आप निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होंगे।
- 8.12 सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च · जो साधक सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर, मन को हृदय में स्थिर करके और अपने प्राण को मस्तक में स्थापित करके योग की धारणा में स्थित होता है।
- 8.13 ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् · जो ओम् इस एक अक्षर रूप ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा निरन्तर स्मरण करता हुआ देह को त्यागकर जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
- 15.8 शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः · जैसे वायु गन्ध के आश्रय स्थान से गन्धों को ले जाती है, वैसे ही देह का स्वामी जीव, जब शरीर पाता है और जब उसे छोड़ता है, तब इन्हें ग्रहण करके साथ ले जाता है।
अपना धर्म, अपना काम 7
- 3.35 श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् · भली भाँति आचरण किये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है, दूसरे का धर्म भय देने वाला है।
- 18.41 ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप · हे परंतप, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों के द्वारा विभक्त किए गए हैं।
- 18.45 स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः · अपने अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि पाता है। अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि पाता है, वह सुनिए।
- 18.46 यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् · जिससे प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सब व्याप्त है, उसकी अपने कर्म से पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है।
- 18.47 श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् · अच्छी तरह किए गए परधर्म से गुणरहित स्वधर्म भी श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं पाता।
- 18.48 सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् · हे कौन्तेय, सहज कर्म को दोषयुक्त होने पर भी नहीं त्यागना चाहिए। क्योंकि सब कर्म धुएँ से अग्नि की तरह दोष से ढके हुए हैं।
- 18.63 इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया · इस प्रकार मैंने आपको गुह्य से भी गुह्यतर ज्ञान कह दिया। इस पर पूरी तरह विचार करके जैसा आप चाहते हैं वैसा कीजिए।
आहार, श्रद्धा और तप 8
- 6.16 नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः · हे अर्जुन, बहुत खाने वाले का योग नहीं सिद्ध होता, और सर्वथा न खाने वाले का भी नहीं। बहुत सोने के स्वभाव वाले का भी नहीं, और अधिक जागने वाले का भी नहीं।
- 6.17 युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु · जिसका आहार और विहार नियमित है, कर्मों में जिसकी चेष्टा नियमित है, और जिसका सोना और जागना नियमित है, उसका योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।
- 17.3 सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत · हे भारत, सब मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, जो जिस श्रद्धा वाला है, वह वही है।
- 17.7 आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः · सबका प्रिय भोजन भी तीन प्रकार का होता है, और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी। उनका यह भेद आप सुनिए।
- 17.8 आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः · आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने, स्थिर रहने वाले और हृदय को प्रिय लगने वाले भोजन सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।
- 17.14 देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् · देवता, द्विज, गुरु और ज्ञानी जनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा, यह शरीर सम्बन्धी तप कहा जाता है।
- 17.15 अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् · जो वचन उद्वेग न करने वाला, सत्य, प्रिय और हितकारी है, वह और स्वाध्याय का अभ्यास भी, यह वाणी सम्बन्धी तप कहा जाता है।
- 17.16 मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः · मन की प्रसन्नता, शान्त भाव, मौन, मन का निग्रह और भावों की शुद्धि, यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है।
संजय की आँख से अंत 4
- 18.73 नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत · हे अच्युत, आपकी कृपा से हमारा मोह नष्ट हो गया और हमने स्मृति पा ली। हम संशय से रहित होकर स्थित हैं, हम आपका वचन पूरा करेंगे।
- 18.74 इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः · इस प्रकार हमने वासुदेव और महात्मा पार्थ का यह अद्भुत और रोमांच कर देने वाला संवाद सुना।
- 18.76 राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् · हे राजन, केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पुण्यमय संवाद को बार बार स्मरण करके हम बार बार हर्षित होते हैं।
- 18.78 यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः · जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर पार्थ हैं, वहाँ श्री, विजय, ऐश्वर्य और अचल नीति है, ऐसा हमारा मत है।
