अंग
208
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਸੁਨਿ ਆਇਓ ਗੁਰ ਤੇ ॥
ਮੋ ਕਉ ਸਤਿਗੁਰ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਇਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਉ ਖੰਡ ਪ੍ਰਿਥਮੀ ਇਸੁ ਤਨ ਮਹਿ ਰਵਿਆ ਨਿਮਖ ਨਿਮਖ ਨਮਸਕਾਰਾ ॥
ਦੀਖਿਆ ਗੁਰ ਕੀ ਮੁੰਦ੍ਰਾ ਕਾਨੀ ਦ੍ਰਿੜਿਓ ਏਕੁ ਨਿਰੰਕਾਰਾ ॥੧॥
ਪੰਚ ਚੇਲੇ ਮਿਲਿ ਭਏ ਇਕਤ੍ਰਾ ਏਕਸੁ ਕੈ ਵਸਿ ਕੀਏ ॥
ਦਸ ਬੈਰਾਗਨਿ ਆਗਿਆਕਾਰੀ ਤਬ ਨਿਰਮਲ ਜੋਗੀ ਥੀਏ ॥੨॥
ਭਰਮੁ ਜਰਾਇ ਚਰਾਈ ਬਿਭੂਤਾ ਪੰਥੁ ਏਕੁ ਕਰਿ ਪੇਖਿਆ ॥
ਸਹਜ ਸੂਖ ਸੋ ਕੀਨੀ ਭੁਗਤਾ ਜੋ ਠਾਕੁਰਿ ਮਸਤਕਿ ਲੇਖਿਆ ॥੩॥
ਜਹ ਭਉ ਨਾਹੀ ਤਹਾ ਆਸਨੁ ਬਾਧਿਓ ਸਿੰਗੀ ਅਨਹਤ ਬਾਨੀ ॥
ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੁ ਡੰਡਾ ਕਰਿ ਰਾਖਿਓ ਜੁਗਤਿ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਭਾਨੀ ॥੪॥
ਐਸਾ ਜੋਗੀ ਵਡਭਾਗੀ ਭੇਟੈ ਮਾਇਆ ਕੇ ਬੰਧਨ ਕਾਟੈ ॥
ਸੇਵਾ ਪੂਜ ਕਰਉ ਤਿਸੁ ਮੂਰਤਿ ਕੀ ਨਾਨਕੁ ਤਿਸੁ ਪਗ ਚਾਟੈ ॥੫॥੧੧॥੧੩੨॥
ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਸੁਨਿ ਆਇਓ ਗੁਰ ਤੇ ॥
ਮੋ ਕਉ ਸਤਿਗੁਰ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਇਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਉ ਖੰਡ ਪ੍ਰਿਥਮੀ ਇਸੁ ਤਨ ਮਹਿ ਰਵਿਆ ਨਿਮਖ ਨਿਮਖ ਨਮਸਕਾਰਾ ॥
ਦੀਖਿਆ ਗੁਰ ਕੀ ਮੁੰਦ੍ਰਾ ਕਾਨੀ ਦ੍ਰਿੜਿਓ ਏਕੁ ਨਿਰੰਕਾਰਾ ॥੧॥
ਪੰਚ ਚੇਲੇ ਮਿਲਿ ਭਏ ਇਕਤ੍ਰਾ ਏਕਸੁ ਕੈ ਵਸਿ ਕੀਏ ॥
ਦਸ ਬੈਰਾਗਨਿ ਆਗਿਆਕਾਰੀ ਤਬ ਨਿਰਮਲ ਜੋਗੀ ਥੀਏ ॥੨॥
ਭਰਮੁ ਜਰਾਇ ਚਰਾਈ ਬਿਭੂਤਾ ਪੰਥੁ ਏਕੁ ਕਰਿ ਪੇਖਿਆ ॥
ਸਹਜ ਸੂਖ ਸੋ ਕੀਨੀ ਭੁਗਤਾ ਜੋ ਠਾਕੁਰਿ ਮਸਤਕਿ ਲੇਖਿਆ ॥੩॥
ਜਹ ਭਉ ਨਾਹੀ ਤਹਾ ਆਸਨੁ ਬਾਧਿਓ ਸਿੰਗੀ ਅਨਹਤ ਬਾਨੀ ॥
ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੁ ਡੰਡਾ ਕਰਿ ਰਾਖਿਓ ਜੁਗਤਿ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਭਾਨੀ ॥੪॥
ਐਸਾ ਜੋਗੀ ਵਡਭਾਗੀ ਭੇਟੈ ਮਾਇਆ ਕੇ ਬੰਧਨ ਕਾਟੈ ॥
ਸੇਵਾ ਪੂਜ ਕਰਉ ਤਿਸੁ ਮੂਰਤਿ ਕੀ ਨਾਨਕੁ ਤਿਸੁ ਪਗ ਚਾਟੈ ॥੫॥੧੧॥੧੩੨॥
गउड़ी महला ५ ॥
जोग जुगति सुनि आइओ गुर ते ॥
मो कउ सतिगुर सबदि बुझाइओ ॥१॥ रहाउ ॥
नउ खंड प्रिथमी इसु तन महि रविआ निमख निमख नमसकारा ॥
दीखिआ गुर की मुंद्रा कानी द्रिड़िओ एकु निरंकारा ॥१॥
पंच चेले मिलि भए इकत्रा एकसु कै वसि कीए ॥
दस बैरागनि आगिआकारी तब निरमल जोगी थीए ॥२॥
भरमु जराइ चराई बिभूता पंथु एकु करि पेखिआ ॥
सहज सूख सो कीनी भुगता जो ठाकुरि मसतकि लेखिआ ॥३॥
जह भउ नाही तहा आसनु बाधिओ सिंगी अनहत बानी ॥
ततु बीचारु डंडा करि राखिओ जुगति नामु मनि भानी ॥४॥
ऐसा जोगी वडभागी भेटै माइआ के बंधन काटै ॥
सेवा पूज करउ तिसु मूरति की नानकु तिसु पग चाटै ॥५॥११॥१३२॥
जोग जुगति सुनि आइओ गुर ते ॥
मो कउ सतिगुर सबदि बुझाइओ ॥१॥ रहाउ ॥
नउ खंड प्रिथमी इसु तन महि रविआ निमख निमख नमसकारा ॥
दीखिआ गुर की मुंद्रा कानी द्रिड़िओ एकु निरंकारा ॥१॥
पंच चेले मिलि भए इकत्रा एकसु कै वसि कीए ॥
दस बैरागनि आगिआकारी तब निरमल जोगी थीए ॥२॥
भरमु जराइ चराई बिभूता पंथु एकु करि पेखिआ ॥
सहज सूख सो कीनी भुगता जो ठाकुरि मसतकि लेखिआ ॥३॥
जह भउ नाही तहा आसनु बाधिओ सिंगी अनहत बानी ॥
ततु बीचारु डंडा करि राखिओ जुगति नामु मनि भानी ॥४॥
ऐसा जोगी वडभागी भेटै माइआ के बंधन काटै ॥
सेवा पूज करउ तिसु मूरति की नानकु तिसु पग चाटै ॥५॥११॥१३२॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ मैं गुरू से असल योग का तरीका सुन के आया हूँ। (हे भाई !) मुझे सतिगुरू के शबद ने (परमात्मा से मिलाप की युक्ति) समझा दी है।1। रहाउ। (हे भाई !) मैं पल पल उस परमात्मा को नमस्कार करता रहता हूँ~ जो इस मानस शरीर में ही मौजूद है (यही है मेरे वास्ते जोगियों वाला) सारी धरती (का रटन)। मैंने अपने गुरू का उपदेश अपने हृदय में दृढ़ कर लिया है (यही मेरे वास्ते) कानों की मुंद्रा (जो जोगी लोग पहनते हैं) मैं एक निरंकार को सदा अपने हृदय में बसाता हे1। (हे भाई ! गुरू के उपदेश की बरकति से) मेरी पाँचों ज्ञानेंद्रियां (दुनिया के पदार्थों की तरफ भटकने की जगह) मिल के इकट्ठी हो गई हैं। (भटकने से हट गए हैं)~ ये सारे एक ऊँची सुरति के अधीन हो गए हैं। (गुरू के उपदेश से जब से) विकारों से विरक्त हो के मेरी इंद्रियां (ऊूंची मति की) आज्ञा में चलने लग पड़ी हैं~ तब से मैं पवित्र जीवन वाला जोगी बन गया हूँ। 2। (हे भाई ! मन की) भटकन को जला के (ये) राख मैंने (अपने शरीर पर) लगा ली है~ मैं एक परमात्मा को ही सारे संसार में व्यापक देखता हूँ – ये है मेरा जोग पंथ। (हे भाई !) मैंने उस आत्मिक अडोलता के आनंद को (अपनी आत्मिक खुराक वास्ते जोगियों के भण्डारे वाला) चूरमा बनाया है~ जिसकी प्राप्ति ठाकुर प्रभू ने मेरे माथे पर लिख दी। 3। (हे भाई !) मैं परमात्मा के सिफत सालाह की एक रस सिंगी बजा रहा हूँ। (इसकी बरकति से) मैंने उस आत्मिक अवस्था में अपना आसन जमाया हुआ है जहाँ (दुनिया वाला) कोई डर मुझे छू नहीं सकता। (हे भाई !) जगत के मूल-प्रभू (के गुणों) को विचारते रहना- इसे (जोगियों वाला) डण्डा बना के मैंने अपने पास रखा हुआ है। (परमात्मा के) नाम (को सिमरते रहना बस ! यही जोगी की) जुगति मेरे मन को भा रही है। (हे भाई !) ऐसी (जुगति निभाने वाला) जोगी (जिस मनुष्य को) बड़े भाग्यों से मिल जाता है~ वह उसके माया के (मोह के) सारे बंधन काट देता है। मैं भी परमात्मा-के-रूप ऐसे जोगी की सेवा करता हूँ~ पूजा करता हूँ। नानक ऐसे जोगी के पैर परसता है। 5। 11। 132।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਨੂਪ ਪਦਾਰਥੁ ਨਾਮੁ ਸੁਨਹੁ ਸਗਲ ਧਿਆਇਲੇ ਮੀਤਾ ॥
ਹਰਿ ਅਉਖਧੁ ਜਾ ਕਉ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ਤਾ ਕੇ ਨਿਰਮਲ ਚੀਤਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅੰਧਕਾਰੁ ਮਿਟਿਓ ਤਿਹ ਤਨ ਤੇ ਗੁਰਿ ਸਬਦਿ ਦੀਪਕੁ ਪਰਗਾਸਾ ॥
ਭ੍ਰਮ ਕੀ ਜਾਲੀ ਤਾ ਕੀ ਕਾਟੀ ਜਾ ਕਉ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਬਿਸ੍ਵਾਸਾ ॥੧॥
ਤਾਰੀਲੇ ਭਵਜਲੁ ਤਾਰੂ ਬਿਖੜਾ ਬੋਹਿਥ ਸਾਧੂ ਸੰਗਾ ॥
ਪੂਰਨ ਹੋਈ ਮਨ ਕੀ ਆਸਾ ਗੁਰੁ ਭੇਟਿਓ ਹਰਿ ਰੰਗਾ ॥੨॥
ਨਾਮ ਖਜਾਨਾ ਭਗਤੀ ਪਾਇਆ ਮਨ ਤਨ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਜੀਉ ਤਾ ਕਉ ਦੇਵੈ ਜਾ ਕਉ ਹੁਕਮੁ ਮਨਾਏ ॥੩॥੧੨॥੧੩੩॥
ਅਨੂਪ ਪਦਾਰਥੁ ਨਾਮੁ ਸੁਨਹੁ ਸਗਲ ਧਿਆਇਲੇ ਮੀਤਾ ॥
ਹਰਿ ਅਉਖਧੁ ਜਾ ਕਉ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ਤਾ ਕੇ ਨਿਰਮਲ ਚੀਤਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅੰਧਕਾਰੁ ਮਿਟਿਓ ਤਿਹ ਤਨ ਤੇ ਗੁਰਿ ਸਬਦਿ ਦੀਪਕੁ ਪਰਗਾਸਾ ॥
ਭ੍ਰਮ ਕੀ ਜਾਲੀ ਤਾ ਕੀ ਕਾਟੀ ਜਾ ਕਉ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਬਿਸ੍ਵਾਸਾ ॥੧॥
ਤਾਰੀਲੇ ਭਵਜਲੁ ਤਾਰੂ ਬਿਖੜਾ ਬੋਹਿਥ ਸਾਧੂ ਸੰਗਾ ॥
ਪੂਰਨ ਹੋਈ ਮਨ ਕੀ ਆਸਾ ਗੁਰੁ ਭੇਟਿਓ ਹਰਿ ਰੰਗਾ ॥੨॥
ਨਾਮ ਖਜਾਨਾ ਭਗਤੀ ਪਾਇਆ ਮਨ ਤਨ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਜੀਉ ਤਾ ਕਉ ਦੇਵੈ ਜਾ ਕਉ ਹੁਕਮੁ ਮਨਾਏ ॥੩॥੧੨॥੧੩੩॥
गउड़ी महला ५ ॥
अनूप पदारथु नामु सुनहु सगल धिआइले मीता ॥
हरि अउखधु जा कउ गुरि दीआ ता के निरमल चीता ॥१॥ रहाउ ॥
अंधकारु मिटिओ तिह तन ते गुरि सबदि दीपकु परगासा ॥
भ्रम की जाली ता की काटी जा कउ साधसंगति बिस्वासा ॥१॥
तारीले भवजलु तारू बिखड़ा बोहिथ साधू संगा ॥
पूरन होई मन की आसा गुरु भेटिओ हरि रंगा ॥२॥
नाम खजाना भगती पाइआ मन तन त्रिपति अघाए ॥
नानक हरि जीउ ता कउ देवै जा कउ हुकमु मनाए ॥३॥१२॥१३३॥
अनूप पदारथु नामु सुनहु सगल धिआइले मीता ॥
हरि अउखधु जा कउ गुरि दीआ ता के निरमल चीता ॥१॥ रहाउ ॥
अंधकारु मिटिओ तिह तन ते गुरि सबदि दीपकु परगासा ॥
भ्रम की जाली ता की काटी जा कउ साधसंगति बिस्वासा ॥१॥
तारीले भवजलु तारू बिखड़ा बोहिथ साधू संगा ॥
पूरन होई मन की आसा गुरु भेटिओ हरि रंगा ॥२॥
नाम खजाना भगती पाइआ मन तन त्रिपति अघाए ॥
नानक हरि जीउ ता कउ देवै जा कउ हुकमु मनाए ॥३॥१२॥१३३॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे मित्रो ! सुनो~ परमात्मा का नाम एक ऐसा पदार्थ है जिस जैसा और कोई नहीं। (इस वास्ते हे मित्रो !) सारे (इस नाम को) सिमरो। जिन्हें गुरू ने नाम औषधि दिया उनके चित्त (हरेक किस्म के विकारों की) मैल से साफ हो गए। 1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू ने (जिस मनुष्य के अंदर अपने) शबद के द्वारा (आत्मिक ज्ञान का) दीपक जला दिया~ उसके हृदय में से (माया के मोह का) अंधकार दूर हो गया। (हे भाई !) साध-संगति में जिस मनुष्य की श्रद्धा बन गई~ (गुरू ने) उस (के मन) का (माया की खातिर) भटकन का जाल काट दिया। 1। (हे भाई ! जिस मनुष्य ने) गुरू की संगति रूपी जहाज का आसरा लिया~ वह इस अथाह और मुश्किल संसार समुंद्र से पार लांघ गया। (हे भाई !) जिस मनुष्य को परमात्मा से प्यार करने वाला गुरू मिल गया~ उसके मन की (हरेक) कामना पूरी हो गयी। 2। (हे भाई ! जिन) भक्त जनों ने परमात्मा के नाम का खजाना ढूँढ लिया~ उनके मन माया की तरफ से तृप्त हो गए~ उनके तन (हृदय माया की तरफ से) संतुष्ट हो गए। हे नानक ! (कह, ये नाम-खजाना) परमात्मा उनको ही देता है~ जिन्हें प्रभू अपना हुकम मानने के लिए प्रेरणा देता है। 3। 12। 133।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਦਇਆ ਮਇਆ ਕਰਿ ਪ੍ਰਾਨਪਤਿ ਮੋਰੇ ਮੋਹਿ ਅਨਾਥ ਸਰਣਿ ਪ੍ਰਭ ਤੋਰੀ ॥
ਅੰਧ ਕੂਪ ਮਹਿ ਹਾਥ ਦੇ ਰਾਖਹੁ ਕਛੂ ਸਿਆਨਪ ਉਕਤਿ ਨ ਮੋਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਸਭ ਕਿਛੁ ਤੁਮ ਹੀ ਤੁਮ ਸਮਰਥ ਨਾਹੀ ਅਨ ਹੋਰੀ ॥
ਤੁਮਰੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਤੁਮ ਹੀ ਜਾਨੀ ਸੇ ਸੇਵਕ ਜਿਨ ਭਾਗ ਮਥੋਰੀ ॥੧॥
ਅਪੁਨੇ ਸੇਵਕ ਸੰਗਿ ਤੁਮ ਪ੍ਰਭ ਰਾਤੇ ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਭਗਤਨ ਸੰਗਿ ਜੋਰੀ ॥
ਪ੍ਰਿਉ ਪ੍ਰਿਉ ਨਾਮੁ ਤੇਰਾ ਦਰਸਨੁ ਚਾਹੈ ਜੈਸੇ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਓਹ ਚੰਦ ਚਕੋਰੀ ॥੨॥
ਰਾਮ ਸੰਤ ਮਹਿ ਭੇਦੁ ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ਏਕੁ ਜਨੁ ਕਈ ਮਹਿ ਲਾਖ ਕਰੋਰੀ ॥
ਜਾ ਕੈ ਹੀਐ ਪ੍ਰਗਟੁ ਪ੍ਰਭੁ ਹੋਆ ਅਨਦਿਨੁ ਕੀਰਤਨੁ ਰਸਨ ਰਮੋਰੀ ॥੩॥
ਤੁਮ ਸਮਰਥ ਅਪਾਰ ਅਤਿ ਊਚੇ ਸੁਖਦਾਤੇ ਪ੍ਰਭ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧੋਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਕਉ ਪ੍ਰਭ ਕੀਜੈ ਕਿਰਪਾ ਉਨ ਸੰਤਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸੰਗੋਰੀ ॥੪॥੧੩॥੧੩੪॥
ਦਇਆ ਮਇਆ ਕਰਿ ਪ੍ਰਾਨਪਤਿ ਮੋਰੇ ਮੋਹਿ ਅਨਾਥ ਸਰਣਿ ਪ੍ਰਭ ਤੋਰੀ ॥
ਅੰਧ ਕੂਪ ਮਹਿ ਹਾਥ ਦੇ ਰਾਖਹੁ ਕਛੂ ਸਿਆਨਪ ਉਕਤਿ ਨ ਮੋਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਸਭ ਕਿਛੁ ਤੁਮ ਹੀ ਤੁਮ ਸਮਰਥ ਨਾਹੀ ਅਨ ਹੋਰੀ ॥
ਤੁਮਰੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਤੁਮ ਹੀ ਜਾਨੀ ਸੇ ਸੇਵਕ ਜਿਨ ਭਾਗ ਮਥੋਰੀ ॥੧॥
ਅਪੁਨੇ ਸੇਵਕ ਸੰਗਿ ਤੁਮ ਪ੍ਰਭ ਰਾਤੇ ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਭਗਤਨ ਸੰਗਿ ਜੋਰੀ ॥
ਪ੍ਰਿਉ ਪ੍ਰਿਉ ਨਾਮੁ ਤੇਰਾ ਦਰਸਨੁ ਚਾਹੈ ਜੈਸੇ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਓਹ ਚੰਦ ਚਕੋਰੀ ॥੨॥
ਰਾਮ ਸੰਤ ਮਹਿ ਭੇਦੁ ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ਏਕੁ ਜਨੁ ਕਈ ਮਹਿ ਲਾਖ ਕਰੋਰੀ ॥
ਜਾ ਕੈ ਹੀਐ ਪ੍ਰਗਟੁ ਪ੍ਰਭੁ ਹੋਆ ਅਨਦਿਨੁ ਕੀਰਤਨੁ ਰਸਨ ਰਮੋਰੀ ॥੩॥
ਤੁਮ ਸਮਰਥ ਅਪਾਰ ਅਤਿ ਊਚੇ ਸੁਖਦਾਤੇ ਪ੍ਰਭ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧੋਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਕਉ ਪ੍ਰਭ ਕੀਜੈ ਕਿਰਪਾ ਉਨ ਸੰਤਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸੰਗੋਰੀ ॥੪॥੧੩॥੧੩੪॥
गउड़ी महला ५ ॥
दइआ मइआ करि प्रानपति मोरे मोहि अनाथ सरणि प्रभ तोरी ॥
अंध कूप महि हाथ दे राखहु कछू सिआनप उकति न मोरी ॥१॥ रहाउ ॥
करन करावन सभ किछु तुम ही तुम समरथ नाही अन होरी ॥
तुमरी गति मिति तुम ही जानी से सेवक जिन भाग मथोरी ॥१॥
अपुने सेवक संगि तुम प्रभ राते ओति पोति भगतन संगि जोरी ॥
प्रिउ प्रिउ नामु तेरा दरसनु चाहै जैसे द्रिसटि ओह चंद चकोरी ॥२॥
राम संत महि भेदु किछु नाही एकु जनु कई महि लाख करोरी ॥
जा कै हीऐ प्रगटु प्रभु होआ अनदिनु कीरतनु रसन रमोरी ॥३॥
तुम समरथ अपार अति ऊचे सुखदाते प्रभ प्रान अधोरी ॥
नानक कउ प्रभ कीजै किरपा उन संतन कै संगि संगोरी ॥४॥१३॥१३४॥
दइआ मइआ करि प्रानपति मोरे मोहि अनाथ सरणि प्रभ तोरी ॥
अंध कूप महि हाथ दे राखहु कछू सिआनप उकति न मोरी ॥१॥ रहाउ ॥
करन करावन सभ किछु तुम ही तुम समरथ नाही अन होरी ॥
तुमरी गति मिति तुम ही जानी से सेवक जिन भाग मथोरी ॥१॥
अपुने सेवक संगि तुम प्रभ राते ओति पोति भगतन संगि जोरी ॥
प्रिउ प्रिउ नामु तेरा दरसनु चाहै जैसे द्रिसटि ओह चंद चकोरी ॥२॥
राम संत महि भेदु किछु नाही एकु जनु कई महि लाख करोरी ॥
जा कै हीऐ प्रगटु प्रभु होआ अनदिनु कीरतनु रसन रमोरी ॥३॥
तुम समरथ अपार अति ऊचे सुखदाते प्रभ प्रान अधोरी ॥
नानक कउ प्रभ कीजै किरपा उन संतन कै संगि संगोरी ॥४॥१३॥१३४॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे मेरी जीवात्मा के मालिक ! (मेरे पर) दया कर मेहर कर। हे प्रभू ! मैं अनाथ तेरी शरण आया हूँ। (मैं माया के मोह के अंधेरे कूएं में गिरा पड़ा हूँ~ अपना) हाथ दे के मुझे (इस अंधेरे कूएं में से) बचा ले। मेरी कोई सियानप~ कोई दलील (यहां) नहीं चल सकती। 1। रहाउ। हे मेरे प्रभू ! (सब जीवों में व्यापक हो के) तू खुद ही सब कुछ कर रहा है~ तू स्वयं ही सब कुछ कर रहा है~ तू हरेक ताकत का मालिक है~ तेरे बराबर का कोई और दूसरा नहीं। (हे प्रभू !) तू कैसा है~ तू कितना बड़ा है – ये भेद तू खुद ही जानता है। जिन लोगों के माथे पर (तेरी बख्शिश के) भाग्य जागते हैं~ वे तेरे सेवक बन जाते हैं। 1। हे मेरे प्रभू ! तू अपने सेवकों से हमेशा प्यार करता है। अपने भक्तों की तूने अपनी प्रीति ऐसे जोड़ी हुई है जैसे ताणे-पेटे में धागे ओत-प्रोत मिले होते हैं~ जैसे चकोर की निगाह चाँद की ओर ही रहती है~ वही निगाह तेरे भक्त की होती है। तेरा भक्त तुझे ‘प्यारा प्यारा’ कह कह के तेरा नाम जपता है~ और तेरे दीदार की चाहत रखता है। 2। (हे भाई !) परमात्मा और परमात्मा के संत में कोई फर्क नहीं होता~ पर ऐसा मनुष्य कई लाखों करोड़ों में कोई एक ही होता है। (हे भाई !) जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू अपना प्रकाश करता है~ वह मनुष्य हर वक्त अपनी जीभ से प्रभू की सिफत सालाह उचारता रहता है। 3। हे मेरे प्रभू !हे मेरी जिंद के आसरे ! हे बेअंत ऊँचे ! हे सबको सुख देने वाले ! तू सब ताकतों का मालिक है। हे प्रभू ! मुझ नानक पर कृपा कर~ मुझे उन संत जनों की संगति में स्थान दिए रख। 4। 13। 134।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 208 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Gurgaon-Delhi border पर शाम 8 बजे की रुकी हुई traffic।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 33 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 208” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 209 →, पीछे का: ← अंग 207।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।