अंग 232

अंग
232
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਾਮੁ ਨ ਚੇਤਹਿ ਉਪਾਵਣਹਾਰਾ ॥
ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਫਿਰਿ ਵਾਰੋ ਵਾਰਾ ॥੨॥
ਅੰਧੇ ਗੁਰੂ ਤੇ ਭਰਮੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਮੂਲੁ ਛੋਡਿ ਲਾਗੇ ਦੂਜੈ ਭਾਈ ॥
ਬਿਖੁ ਕਾ ਮਾਤਾ ਬਿਖੁ ਮਾਹਿ ਸਮਾਈ ॥੩॥
ਮਾਇਆ ਕਰਿ ਮੂਲੁ ਜੰਤ੍ਰ ਭਰਮਾਏ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਵਿਸਰਿਆ ਦੂਜੈ ਭਾਏ ॥
ਜਿਸੁ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸੋ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਏ ॥੪॥
ਅੰਤਰਿ ਸਾਚੁ ਬਾਹਰਿ ਸਾਚੁ ਵਰਤਾਏ ॥
ਸਾਚੁ ਨ ਛਪੈ ਜੇ ਕੋ ਰਖੈ ਛਪਾਏ ॥
ਗਿਆਨੀ ਬੂਝਹਿ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚਿ ਰਹਿਆ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਇਆ ਸਬਦਿ ਜਲਾਏ ॥
ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਸਾਚਾ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਏ ॥
ਧਾਵਤੁ ਰਾਖੈ ਠਾਕਿ ਰਹਾਏ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਸੋਝੀ ਪਾਏ ॥੭॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਸਿਰਜਿ ਜਿਨਿ ਗੋਈ ॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥੮॥੬॥
नामु न चेतहि उपावणहारा ॥
मरि जंमहि फिरि वारो वारा ॥२॥
अंधे गुरू ते भरमु न जाई ॥
मूलु छोडि लागे दूजै भाई ॥
बिखु का माता बिखु माहि समाई ॥३॥
माइआ करि मूलु जंत्र भरमाए ॥
हरि जीउ विसरिआ दूजै भाए ॥
जिसु नदरि करे सो परम गति पाए ॥४॥
अंतरि साचु बाहरि साचु वरताए ॥
साचु न छपै जे को रखै छपाए ॥
गिआनी बूझहि सहजि सुभाए ॥५॥
गुरमुखि साचि रहिआ लिव लाए ॥
हउमै माइआ सबदि जलाए ॥
मेरा प्रभु साचा मेलि मिलाए ॥६॥
सतिगुरु दाता सबदु सुणाए ॥
धावतु राखै ठाकि रहाए ॥
पूरे गुर ते सोझी पाए ॥७॥
आपे करता स्रिसटि सिरजि जिनि गोई ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न कोई ॥
नानक गुरमुखि बूझै कोई ॥८॥६॥

हिन्दी अर्थ: वे सृजनहार परमात्मा का नाम कभी याद नहीं करते~ वह बार बार (जगत में) पैदा होते हैं~ मरते हैं~ पैदा होते हैं मरते हैं। 2। (पर~ हे भाई ! माया के मोह में खुद) अंधे हुए गुरू से (शरण आए सेवक के मन की) भटकना दूर नहीं हो सकती। (ऐसे गुरू की शरण पड़ के तो मनुष्य बल्कि) जगत के मूल करतार को छोड़ के माया के मोह में फसते हैं। (आत्मिक मौत पैदा करने वाली माया के) जहर में मस्त हुआ मनुष्य उस जहर में ही मस्त रहता है। 3। (अभागी) मनुष्य माया को (जिंदगी का) आसरा बना के (माया की खातिर ही) भटकते रहते हैं~ माया के प्यार के कारण उन्हें परमात्मा भूला रहता है। (पर~ हे भाई !) जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर की निगाह करता है~ वह मनुष्य सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है (जहाँ माया का मोह छू नहीं सकता)। 4। (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है~ गुरू उस के) हृदय में सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का प्रकाश कर देता है। जगत से बरतते हुए भी सारे जगत में उसको सदा स्थिर प्रभू दिखा देता है। (जिस मनुष्य के अंदर-बाहर प्रभू का प्रकाश हो जाए)~ वह जो इस (मिली दात) को छुपा के रखने का यत्न करे~ तो भी सदा-स्थिर प्रभू (का प्रकाश) छुपता नहीं। परमात्मा के साथ गहरी सांझ रखने वाले मनुष्य आत्मिक अडोलता में (टिक के) प्रभू प्रेम में जुड़ के (इस अस्लियत को) समझ लेते हैं। 5। (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य सदा कायम रहने वाले परमात्मा में अपनी सुरति जोड़े रखता है~ गुरू के शबद की बरकति से वह (अपने अंदर से) अहंकार और माया (का मोह) जला लेता है। (इस तरह) सदा स्थिर रहने वाला प्यारा प्रभू उसे अपने चरणों में मिलाए रखता है। 6। (हे भाई ! परमात्मा के नाम की) दाति देने वाला सतिगुरू जिस मनुष्य को अपना शबद सुनाता है~ वह माया के पीछे भटकते अपने मन को (माया के मोह से) बचा लेता है~ रोक के काबू कर लेता है पूर्ण गुरु से ऐसी समझ प्राप्त होती है । 7। जो स्वयं ही सृजक है जिस ने स्वयं ये सृष्टि पैदा करके स्वयं ही (अनेकों बार) नाश की उस परमात्मा के बगैर कोई अन्य (सदा स्थिर रहने वाला) नहीं है हे नानक ! (कह,हे भाई !) गुरू की शरण पड़ने वाला कोई (विरला भाग्यशाली) मनुष्य ये समझ लेता है। 8। 6।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਨਾਮੁ ਅਮੋਲਕੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਵੈ ॥
ਨਾਮੋ ਸੇਵੇ ਨਾਮਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮੁ ਰਸਨਾ ਨਿਤ ਗਾਵੈ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਸੋ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪਾਵੈ ॥੧॥
ਅਨਦਿਨੁ ਹਿਰਦੈ ਜਪਉ ਜਗਦੀਸਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਵਉ ਪਰਮ ਪਦੁ ਸੂਖਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਿਰਦੈ ਸੂਖੁ ਭਇਆ ਪਰਗਾਸੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਾਵਹਿ ਸਚੁ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥
ਦਾਸਨਿ ਦਾਸ ਨਿਤ ਹੋਵਹਿ ਦਾਸੁ ॥
ਗ੍ਰਿਹ ਕੁਟੰਬ ਮਹਿ ਸਦਾ ਉਦਾਸੁ ॥੨॥
ਜੀਵਨ ਮੁਕਤੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੋ ਹੋਈ ॥
ਪਰਮ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਵੈ ਸੋਈ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਮੇਟੇ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਈ ॥
ਸਹਜੇ ਸਾਚਿ ਮਿਲੈ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਈ ॥੩॥
ਮੋਹ ਕੁਟੰਬ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਹੋਇ ॥
ਜਾ ਹਿਰਦੈ ਵਸਿਆ ਸਚੁ ਸੋਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨੁ ਬੇਧਿਆ ਅਸਥਿਰੁ ਹੋਇ ॥
ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣੈ ਬੂਝੈ ਸਚੁ ਸੋਇ ॥੪॥
ਤੂੰ ਕਰਤਾ ਮੈ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਤੁਝੁ ਸੇਵੀ ਤੁਝ ਤੇ ਪਤਿ ਹੋਇ ॥
ਕਿਰਪਾ ਕਰਹਿ ਗਾਵਾ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥
ਨਾਮ ਰਤਨੁ ਸਭ ਜਗ ਮਹਿ ਲੋਇ ॥੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬਾਣੀ ਮੀਠੀ ਲਾਗੀ ॥
ਅੰਤਰੁ ਬਿਗਸੈ ਅਨਦਿਨੁ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
ਸਹਜੇ ਸਚੁ ਮਿਲਿਆ ਪਰਸਾਦੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ਪੂਰੈ ਵਡਭਾਗੀ ॥੬॥
ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਦੁਰਮਤਿ ਦੁਖ ਨਾਸੁ ॥
ਜਬ ਹਿਰਦੈ ਰਾਮ ਨਾਮ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੁਧਿ ਪ੍ਰਗਟੀ ਪ੍ਰਭ ਜਾਸੁ ॥
ਜਬ ਹਿਰਦੈ ਰਵਿਆ ਚਰਣ ਨਿਵਾਸੁ ॥੭॥
ਜਿਸੁ ਨਾਮੁ ਦੇਇ ਸੋਈ ਜਨੁ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੇਲੇ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਹਿਰਦੈ ਸਾਚਾ ਨਾਮੁ ਵਸਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਸਹਜੇ ਸਾਚਿ ਸਮਾਏ ॥੮॥੭॥
गउड़ी महला ३ ॥
नामु अमोलकु गुरमुखि पावै ॥
नामो सेवे नामि सहजि समावै ॥
अंम्रितु नामु रसना नित गावै ॥
जिस नो क्रिपा करे सो हरि रसु पावै ॥१॥
अनदिनु हिरदै जपउ जगदीसा ॥
गुरमुखि पावउ परम पदु सूखा ॥१॥ रहाउ ॥
हिरदै सूखु भइआ परगासु ॥
गुरमुखि गावहि सचु गुणतासु ॥
दासनि दास नित होवहि दासु ॥
ग्रिह कुटंब महि सदा उदासु ॥२॥
जीवन मुकतु गुरमुखि को होई ॥
परम पदारथु पावै सोई ॥
त्रै गुण मेटे निरमलु होई ॥
सहजे साचि मिलै प्रभु सोई ॥३॥
मोह कुटंब सिउ प्रीति न होइ ॥
जा हिरदै वसिआ सचु सोइ ॥
गुरमुखि मनु बेधिआ असथिरु होइ ॥
हुकमु पछाणै बूझै सचु सोइ ॥४॥
तूं करता मै अवरु न कोइ ॥
तुझु सेवी तुझ ते पति होइ ॥
किरपा करहि गावा प्रभु सोइ ॥
नाम रतनु सभ जग महि लोइ ॥५॥
गुरमुखि बाणी मीठी लागी ॥
अंतरु बिगसै अनदिनु लिव लागी ॥
सहजे सचु मिलिआ परसादी ॥
सतिगुरु पाइआ पूरै वडभागी ॥६॥
हउमै ममता दुरमति दुख नासु ॥
जब हिरदै राम नाम गुणतासु ॥
गुरमुखि बुधि प्रगटी प्रभ जासु ॥
जब हिरदै रविआ चरण निवासु ॥७॥
जिसु नामु देइ सोई जनु पाए ॥
गुरमुखि मेले आपु गवाए ॥
हिरदै साचा नामु वसाए ॥
नानक सहजे साचि समाए ॥८॥७॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ३ ॥ (हे भाई !) परमात्मा का नाम किसी भी मूल्य में मिल नहीं सकता। वही मनुष्य हासिल करता है जो गुरू की शरण पड़ता है। वह (हर वक्त) नाम ही सिमरता है और नाम से ही आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। नाम अमृत है और वह अपने मुख (जीभ ) से नित्य इसे गता है पर~ वही मनुष्य हरी नाम का रस पाता है जिस पर परमात्मा स्वयं कृपा करता है। 1। (हे भाई !) मैं हर समय अपने हृदय में जगत के मालिक परमात्मा का नाम जपता हूँ। गुरू की शरण पड़ कर मैंने सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लिया है~ मैं आत्मिक आनंद ले रहा हूँ। 1। रहाउ। उनके हृदय में आत्मिक आनंद बना रहता है~ उनके अंदर प्रकाश पैदा हो जाता है~ जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर गुणों के खजाने सदा स्थिर प्रभू के गुण गाते हैं~ वह सदा परमात्मा के सेवक बने रहते हैं~ वह मनुष्य गृहस्थ जीवन में रहते हुए परिवार में रहते हुए भी (माया के मोह से) उपराम रहते हैं। 2। (हे भाई !) कोई विरला मनुष्य जो गुरू की शरण पड़ता है दुनिया के कार्य-व्यवहार करता हुआ भी माया के बंधनों से आजाद होता है~ वही मनुष्य सारे पदार्थों से श्रेष्ठ नाम-पदार्थ हासिल करता है~ वह मनुष्य (अपने अंदर से माया के) तीन गुणों का प्रभाव मिटा लेता है और पवित्रात्मा बन जाता है। आत्मिक अडोलता में सदा स्थिर प्रभू के नाम में जुड़े रहने के कारण उसे वह प्रभू मिल जाता है। 3। (हे भाई ! ) उसका अपने परिवार से) वह मोह प्यार नहीं रहता (जो त्रैगुणी माया में फसाता है)। जब किसी मनुष्य के हृदय में वह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा आ बसता है~ गुरू की शरण पड़ कर जिस मनुष्य का मन (परमात्मा की याद में) बेधा जाता है और अडोल हो जाता है~ वह मनुष्य परमात्मा की रजा को पहिचानता है (परमात्मा के स्वभाव से अपना स्वभाव मिला लेता है) वह मनुष्य उस सदा स्थिर प्रभू को समझ लेता है। 4। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर जिस मनुष्य का मन परमात्मा की याद में बेधित हो जाता है~ वह ऐसे अरदास करता है, हे प्रभू !) तू ही जगत का पैदा करने वाला है~ मुझे तेरे बिना कोई आसरा नहीं दिखता~ मैं सदा तेरा ही सिमरन करता हूँ~ मुझे तेरे दर से ही इज्जत मिलती है। अगर तू खुद मेहर करे~ तो ही मैं तेरी सिफत सालाह कर सकता हूँ। तेरा नाम ही मेरे वास्ते सबसे श्रेष्ठ पदार्थ है~ तेरा नाम ही जगत में (आत्मिक जीवन के लिए) प्रकाश (पैदा करने वाला) है। 5। (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ के जिस मनुष्य को परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी मीठी लगने लग पड़ती है~ उसका हृदय खिल जाता है~ उसकी सुरति हर वक्त (प्रभू चरणों में) जुड़ी रहती है। गुरू की कृपा से आत्मिक अडोलता द्वारा उसे सदा स्थिर प्रभू मिल जाता है। (पर~ हे भाई !) गुरू पूरे भाग्यों से बड़े भाग्यों से ही मिलता है। 6। तब अंदर से अहंकार का~ अपनत्व का~ दुर्मति का~ दुखों का नाश हो जाता है। (हे भाई !) जब हृदय में परमात्मा का नाम आ बसता है गुणों का खजाना प्रभू आ बसता है~ प्रभू की सिफत सालाह सुनता है तो इसकी बुद्धि उज्जवल हो जाती है। (हे भाई !) जब मनुष्य गुरू की शरण पड़ के अपने हृदय में परमात्मा का नाम सिमरता है~ जब प्रभू के चरणों में टिकता है। 7। हे नानक ! वही मनुष्य परमात्मा का नाम हासिल करता है~ जिसे परमात्मा स्वयं अपना नाम बख्शता है। जिस मनुष्य को गुरू की शरण पा के प्रभू अपने साथ मिलाता है~ वह मनुष्य अपने अंदर से स्वैभाव दूर कर देता है~ वह मनुष्य अपने हृदय में सदा स्थिर रहने वाला हरि नाम बसाता है~ वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिका रहता है~ सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा में जुड़ा रहता है। 8। 7।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਮਨ ਹੀ ਮਨੁ ਸਵਾਰਿਆ ਭੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
गउड़ी महला ३ ॥
मन ही मनु सवारिआ भै सहजि सुभाइ ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ३ ॥ उसने प्रभू के डर-अदब में टिक के~ आत्मिक अडोलता में टिक के~ प्रभू प्रेम में जुड़ के अपने मन को अंतरात्मे ही सुंदर बना लिया है~

संदर्भ: यह अंग 232 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

दिल्ली के winter-fog में सुबह 5 बजे driver को waiting करवाना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 57 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 232” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 233 →, पीछे का: ← अंग 231

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।