अंग
248
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮੋਹਨ ਤੇਰੇ ਊਚੇ ਮੰਦਰ ਮਹਲ ਅਪਾਰਾ ॥
ਮੋਹਨ ਤੇਰੇ ਸੋਹਨਿ ਦੁਆਰ ਜੀਉ ਸੰਤ ਧਰਮ ਸਾਲਾ ॥
ਧਰਮ ਸਾਲ ਅਪਾਰ ਦੈਆਰ ਠਾਕੁਰ ਸਦਾ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਵਹੇ ॥
ਜਹ ਸਾਧ ਸੰਤ ਇਕਤ੍ਰ ਹੋਵਹਿ ਤਹਾ ਤੁਝਹਿ ਧਿਆਵਹੇ ॥
ਕਰਿ ਦਇਆ ਮਇਆ ਦਇਆਲ ਸੁਆਮੀ ਹੋਹੁ ਦੀਨ ਕ੍ਰਿਪਾਰਾ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਦਰਸ ਪਿਆਸੇ ਮਿਲਿ ਦਰਸਨ ਸੁਖੁ ਸਾਰਾ ॥੧॥
ਮੋਹਨ ਤੇਰੇ ਬਚਨ ਅਨੂਪ ਚਾਲ ਨਿਰਾਲੀ ॥
ਮੋਹਨ ਤੂੰ ਮਾਨਹਿ ਏਕੁ ਜੀ ਅਵਰ ਸਭ ਰਾਲੀ ॥
ਮਾਨਹਿ ਤ ਏਕੁ ਅਲੇਖੁ ਠਾਕੁਰੁ ਜਿਨਹਿ ਸਭ ਕਲ ਧਾਰੀਆ ॥
ਤੁਧੁ ਬਚਨਿ ਗੁਰ ਕੈ ਵਸਿ ਕੀਆ ਆਦਿ ਪੁਰਖੁ ਬਨਵਾਰੀਆ ॥
ਤੂੰ ਆਪਿ ਚਲਿਆ ਆਪਿ ਰਹਿਆ ਆਪਿ ਸਭ ਕਲ ਧਾਰੀਆ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਪੈਜ ਰਾਖਹੁ ਸਭ ਸੇਵਕ ਸਰਨਿ ਤੁਮਾਰੀਆ ॥੨॥
ਮੋਹਨ ਤੁਧੁ ਸਤਸੰਗਤਿ ਧਿਆਵੈ ਦਰਸ ਧਿਆਨਾ ॥
ਮੋਹਨ ਜਮੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ਤੁਧੁ ਜਪਹਿ ਨਿਦਾਨਾ ॥
ਜਮਕਾਲੁ ਤਿਨ ਕਉ ਲਗੈ ਨਾਹੀ ਜੋ ਇਕ ਮਨਿ ਧਿਆਵਹੇ ॥
ਮਨਿ ਬਚਨਿ ਕਰਮਿ ਜਿ ਤੁਧੁ ਅਰਾਧਹਿ ਸੇ ਸਭੇ ਫਲ ਪਾਵਹੇ ॥
ਮਲ ਮੂਤ ਮੂੜ ਜਿ ਮੁਗਧ ਹੋਤੇ ਸਿ ਦੇਖਿ ਦਰਸੁ ਸੁਗਿਆਨਾ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਰਾਜੁ ਨਿਹਚਲੁ ਪੂਰਨ ਪੁਰਖ ਭਗਵਾਨਾ ॥੩॥
ਮੋਹਨ ਤੂੰ ਸੁਫਲੁ ਫਲਿਆ ਸਣੁ ਪਰਵਾਰੇ ॥
ਮੋਹਨ ਪੁਤ੍ਰ ਮੀਤ ਭਾਈ ਕੁਟੰਬ ਸਭਿ ਤਾਰੇ ॥
ਤਾਰਿਆ ਜਹਾਨੁ ਲਹਿਆ ਅਭਿਮਾਨੁ ਜਿਨੀ ਦਰਸਨੁ ਪਾਇਆ ॥
ਜਿਨੀ ਤੁਧਨੋ ਧੰਨੁ ਕਹਿਆ ਤਿਨ ਜਮੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਇਆ ॥
ਬੇਅੰਤ ਗੁਣ ਤੇਰੇ ਕਥੇ ਨ ਜਾਹੀ ਸਤਿਗੁਰ ਪੁਰਖ ਮੁਰਾਰੇ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਟੇਕ ਰਾਖੀ ਜਿਤੁ ਲਗਿ ਤਰਿਆ ਸੰਸਾਰੇ ॥੪॥੨॥
ਮੋਹਨ ਤੇਰੇ ਊਚੇ ਮੰਦਰ ਮਹਲ ਅਪਾਰਾ ॥
ਮੋਹਨ ਤੇਰੇ ਸੋਹਨਿ ਦੁਆਰ ਜੀਉ ਸੰਤ ਧਰਮ ਸਾਲਾ ॥
ਧਰਮ ਸਾਲ ਅਪਾਰ ਦੈਆਰ ਠਾਕੁਰ ਸਦਾ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਵਹੇ ॥
ਜਹ ਸਾਧ ਸੰਤ ਇਕਤ੍ਰ ਹੋਵਹਿ ਤਹਾ ਤੁਝਹਿ ਧਿਆਵਹੇ ॥
ਕਰਿ ਦਇਆ ਮਇਆ ਦਇਆਲ ਸੁਆਮੀ ਹੋਹੁ ਦੀਨ ਕ੍ਰਿਪਾਰਾ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਦਰਸ ਪਿਆਸੇ ਮਿਲਿ ਦਰਸਨ ਸੁਖੁ ਸਾਰਾ ॥੧॥
ਮੋਹਨ ਤੇਰੇ ਬਚਨ ਅਨੂਪ ਚਾਲ ਨਿਰਾਲੀ ॥
ਮੋਹਨ ਤੂੰ ਮਾਨਹਿ ਏਕੁ ਜੀ ਅਵਰ ਸਭ ਰਾਲੀ ॥
ਮਾਨਹਿ ਤ ਏਕੁ ਅਲੇਖੁ ਠਾਕੁਰੁ ਜਿਨਹਿ ਸਭ ਕਲ ਧਾਰੀਆ ॥
ਤੁਧੁ ਬਚਨਿ ਗੁਰ ਕੈ ਵਸਿ ਕੀਆ ਆਦਿ ਪੁਰਖੁ ਬਨਵਾਰੀਆ ॥
ਤੂੰ ਆਪਿ ਚਲਿਆ ਆਪਿ ਰਹਿਆ ਆਪਿ ਸਭ ਕਲ ਧਾਰੀਆ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਪੈਜ ਰਾਖਹੁ ਸਭ ਸੇਵਕ ਸਰਨਿ ਤੁਮਾਰੀਆ ॥੨॥
ਮੋਹਨ ਤੁਧੁ ਸਤਸੰਗਤਿ ਧਿਆਵੈ ਦਰਸ ਧਿਆਨਾ ॥
ਮੋਹਨ ਜਮੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ਤੁਧੁ ਜਪਹਿ ਨਿਦਾਨਾ ॥
ਜਮਕਾਲੁ ਤਿਨ ਕਉ ਲਗੈ ਨਾਹੀ ਜੋ ਇਕ ਮਨਿ ਧਿਆਵਹੇ ॥
ਮਨਿ ਬਚਨਿ ਕਰਮਿ ਜਿ ਤੁਧੁ ਅਰਾਧਹਿ ਸੇ ਸਭੇ ਫਲ ਪਾਵਹੇ ॥
ਮਲ ਮੂਤ ਮੂੜ ਜਿ ਮੁਗਧ ਹੋਤੇ ਸਿ ਦੇਖਿ ਦਰਸੁ ਸੁਗਿਆਨਾ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਰਾਜੁ ਨਿਹਚਲੁ ਪੂਰਨ ਪੁਰਖ ਭਗਵਾਨਾ ॥੩॥
ਮੋਹਨ ਤੂੰ ਸੁਫਲੁ ਫਲਿਆ ਸਣੁ ਪਰਵਾਰੇ ॥
ਮੋਹਨ ਪੁਤ੍ਰ ਮੀਤ ਭਾਈ ਕੁਟੰਬ ਸਭਿ ਤਾਰੇ ॥
ਤਾਰਿਆ ਜਹਾਨੁ ਲਹਿਆ ਅਭਿਮਾਨੁ ਜਿਨੀ ਦਰਸਨੁ ਪਾਇਆ ॥
ਜਿਨੀ ਤੁਧਨੋ ਧੰਨੁ ਕਹਿਆ ਤਿਨ ਜਮੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਇਆ ॥
ਬੇਅੰਤ ਗੁਣ ਤੇਰੇ ਕਥੇ ਨ ਜਾਹੀ ਸਤਿਗੁਰ ਪੁਰਖ ਮੁਰਾਰੇ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਟੇਕ ਰਾਖੀ ਜਿਤੁ ਲਗਿ ਤਰਿਆ ਸੰਸਾਰੇ ॥੪॥੨॥
गउड़ी महला ५ ॥
मोहन तेरे ऊचे मंदर महल अपारा ॥
मोहन तेरे सोहनि दुआर जीउ संत धरम साला ॥
धरम साल अपार दैआर ठाकुर सदा कीरतनु गावहे ॥
जह साध संत इकत्र होवहि तहा तुझहि धिआवहे ॥
करि दइआ मइआ दइआल सुआमी होहु दीन क्रिपारा ॥
बिनवंति नानक दरस पिआसे मिलि दरसन सुखु सारा ॥१॥
मोहन तेरे बचन अनूप चाल निराली ॥
मोहन तूं मानहि एकु जी अवर सभ राली ॥
मानहि त एकु अलेखु ठाकुरु जिनहि सभ कल धारीआ ॥
तुधु बचनि गुर कै वसि कीआ आदि पुरखु बनवारीआ ॥
तूं आपि चलिआ आपि रहिआ आपि सभ कल धारीआ ॥
बिनवंति नानक पैज राखहु सभ सेवक सरनि तुमारीआ ॥२॥
मोहन तुधु सतसंगति धिआवै दरस धिआना ॥
मोहन जमु नेड़ि न आवै तुधु जपहि निदाना ॥
जमकालु तिन कउ लगै नाही जो इक मनि धिआवहे ॥
मनि बचनि करमि जि तुधु अराधहि से सभे फल पावहे ॥
मल मूत मूड़ जि मुगध होते सि देखि दरसु सुगिआना ॥
बिनवंति नानक राजु निहचलु पूरन पुरख भगवाना ॥३॥
मोहन तूं सुफलु फलिआ सणु परवारे ॥
मोहन पुत्र मीत भाई कुटंब सभि तारे ॥
तारिआ जहानु लहिआ अभिमानु जिनी दरसनु पाइआ ॥
जिनी तुधनो धंनु कहिआ तिन जमु नेड़ि न आइआ ॥
बेअंत गुण तेरे कथे न जाही सतिगुर पुरख मुरारे ॥
बिनवंति नानक टेक राखी जितु लगि तरिआ संसारे ॥४॥२॥
मोहन तेरे ऊचे मंदर महल अपारा ॥
मोहन तेरे सोहनि दुआर जीउ संत धरम साला ॥
धरम साल अपार दैआर ठाकुर सदा कीरतनु गावहे ॥
जह साध संत इकत्र होवहि तहा तुझहि धिआवहे ॥
करि दइआ मइआ दइआल सुआमी होहु दीन क्रिपारा ॥
बिनवंति नानक दरस पिआसे मिलि दरसन सुखु सारा ॥१॥
मोहन तेरे बचन अनूप चाल निराली ॥
मोहन तूं मानहि एकु जी अवर सभ राली ॥
मानहि त एकु अलेखु ठाकुरु जिनहि सभ कल धारीआ ॥
तुधु बचनि गुर कै वसि कीआ आदि पुरखु बनवारीआ ॥
तूं आपि चलिआ आपि रहिआ आपि सभ कल धारीआ ॥
बिनवंति नानक पैज राखहु सभ सेवक सरनि तुमारीआ ॥२॥
मोहन तुधु सतसंगति धिआवै दरस धिआना ॥
मोहन जमु नेड़ि न आवै तुधु जपहि निदाना ॥
जमकालु तिन कउ लगै नाही जो इक मनि धिआवहे ॥
मनि बचनि करमि जि तुधु अराधहि से सभे फल पावहे ॥
मल मूत मूड़ जि मुगध होते सि देखि दरसु सुगिआना ॥
बिनवंति नानक राजु निहचलु पूरन पुरख भगवाना ॥३॥
मोहन तूं सुफलु फलिआ सणु परवारे ॥
मोहन पुत्र मीत भाई कुटंब सभि तारे ॥
तारिआ जहानु लहिआ अभिमानु जिनी दरसनु पाइआ ॥
जिनी तुधनो धंनु कहिआ तिन जमु नेड़ि न आइआ ॥
बेअंत गुण तेरे कथे न जाही सतिगुर पुरख मुरारे ॥
बिनवंति नानक टेक राखी जितु लगि तरिआ संसारे ॥४॥२॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे मन को मोह लेने वाले प्रभू !तेरे ऊँचे मंदिर हैं। तेरे महल ऐसे हैं कि उनका परला छोर नहीं दिखता। हे मोहन ! तेरे दर पे तेरे धर्म-स्थानों में तेरे संत जन (बैठे) सुंदर लग रहे हैं। हे बेअंत प्रभू ! हे दयाल प्रभू ! हे ठाकुर ! तेरे धर्म स्थानों में तेरे संत जन सदा तेरा कीर्तन गाते हैं। (हे मोहन !) जहाँ भी साध-संत एकत्र होते हैं वहां तुझे ही ध्याते हैं। हे दया के घर मोहन ! हे सब के मालिक मोहन ! तू दया करके तरस करके गरीबों-अनाथों पर कृपा करता है। (हे मोहन !) नानक विनती करता है,तेरे दर्शन के प्यासे (तेरे संत जन) तुझे मिल के तेरे दर्शन का सुख प्राप्त करते हैं। 1। हे मोहन ! तेरी सिफत सालाह के बचन सुंदर लगते हैं, तेरी चाल (जगत के जीवों की चाल से) अलग है। हे मोहन जी ! (सारे जीव) सिर्फ तुझे ही (सदा कायम रहने वाला) मानते हैं और सारी सृष्टि नाशवंत है। हे मोहन ! सिर्फ तुझ एक को (स्थिर) मानते हैं, सिर्फ तुझे- जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। जो तू सबका पालणहार है और जिस तुझ ने सारी सृष्टि में अपनी सत्ता वरताई हुई है। हे मोहन ! तुझे (तेरे भक्तों ने) गुरू के बचनों द्वारा (प्यार-) वश किया हुआ है। तू सब का आदि है। तू सर्व-व्यापक है। तू सारे जगत का मालिक है। हे मोहन ! (सारे जीवों में मौजूद होने के कारण) तू स्वयं ही (उम्र भोग के जगत से) चला जाता है। फिर भी तू ही खुद सदा कायम रहने वाला है। तूने ही जगत में अपनी सत्ता पसारी हुई है। नानक विनती करता है, (अपने सेवकों की तू स्वयं ही) लाज रखता है। सारे सेवक-भगत तेरी ही शरण पड़ते हैं। 2। हे मोहन प्रभू !तुझे साध-संगति ध्याती है। तेरे दर्शन का ध्यान धरती है। हे मोहन प्रभू ! जो जीव तुझे जपते हैं। अंत के समय मौत का सहम उनके नजदीक नहीं फटकता। जो एकाग्र मन से तेरा ध्यान धरते हैं। मौत का सहम उन्हें छू नहीं सकता (आत्मिक मौत उन पर प्रभाव नहीं डाल सकती)। जो मनुष्य अपने मन से अपने बोलों से अपने कर्मों से तुझे याद करते रहते हैं, वे सारे (मन-इच्छित) फल प्राप्त कर लेते हैं। हे सर्व-व्यापक ! हे भगवान ! वह मनुष्य भी तेरा दर्शन करके ऊूंची समझ वाले हो जाते हैं जो (पहले) गंदे-कुकर्मी व महामूर्ख होते हैं। नानक विनती करता है, हे मोहन ! तेरा राज सदा कायम रहने वाला है। 3। हे मोहन प्रभू ! तू बहुत सुंदर फलीभूत है। तू बहुत बड़े परिवार वाला है। हे मोहन प्रभू ! पुत्र। भाईयों। मित्रों वाले बड़े-बड़े परिवार तू सारे के सारे (संसार समुंद्र से) पार लंघा देता है। हे मोहन ! जिन्होंने तेरा दर्शन किया। उनके अंदर से तूने अहंकार दूर कर दिया। तू सारे जहान को तारने की स्मर्था रखने वाला है। हे मोहन ! जिन (भाग्यशालियों ने) तेरी सिफत सालाह की। आत्मिक मौत उनके नजदीक नहीं फटकती। हे सबसे बड़े ! सर्व-व्यापक प्रभू ! तेरे गुण बेअंत हैं। बयान नहीं किए जा सकते। नानक विनती करता है, मैंने तेरा ही आसरा लिया है। जिस आसरे की बरकति से मैं इस संसार समुंद्र से पार लांघ रहा हूँ। 4। 2।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥
ਸਲੋਕੁ ॥
ਪਤਿਤ ਅਸੰਖ ਪੁਨੀਤ ਕਰਿ ਪੁਨਹ ਪੁਨਹ ਬਲਿਹਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਪਾਵਕੋ ਤਿਨ ਕਿਲਬਿਖ ਦਾਹਨਹਾਰ ॥੧॥
ਪਤਿਤ ਅਸੰਖ ਪੁਨੀਤ ਕਰਿ ਪੁਨਹ ਪੁਨਹ ਬਲਿਹਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਪਾਵਕੋ ਤਿਨ ਕਿਲਬਿਖ ਦਾਹਨਹਾਰ ॥੧॥
सलोकु ॥
पतित असंख पुनीत करि पुनह पुनह बलिहार ॥
नानक राम नामु जपि पावको तिन किलबिख दाहनहार ॥१॥
पतित असंख पुनीत करि पुनह पुनह बलिहार ॥
नानक राम नामु जपि पावको तिन किलबिख दाहनहार ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोक। (इस नाम से) बारंबार कुर्बान हो। ये नाम अनगिनत विकारियों को पवित्र कर देता है। हे नानक ! परमात्मा का नाम जप। (जैसे) आग (घास के) तीलों को। (वैसे ही ये हरी नाम) पापों को जलाने की ताकत रखता है। 1। छंत।
ਛੰਤ ॥
ਜਪਿ ਮਨਾ ਤੂੰ ਰਾਮ ਨਰਾਇਣੁ ਗੋਵਿੰਦਾ ਹਰਿ ਮਾਧੋ ॥
ਧਿਆਇ ਮਨਾ ਮੁਰਾਰਿ ਮੁਕੰਦੇ ਕਟੀਐ ਕਾਲ ਦੁਖ ਫਾਧੋ ॥
ਦੁਖਹਰਣ ਦੀਨ ਸਰਣ ਸ੍ਰੀਧਰ ਚਰਨ ਕਮਲ ਅਰਾਧੀਐ ॥
ਜਮ ਪੰਥੁ ਬਿਖੜਾ ਅਗਨਿ ਸਾਗਰੁ ਨਿਮਖ ਸਿਮਰਤ ਸਾਧੀਐ ॥
ਕਲਿਮਲਹ ਦਹਤਾ ਸੁਧੁ ਕਰਤਾ ਦਿਨਸੁ ਰੈਣਿ ਅਰਾਧੋ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਕਰਹੁ ਕਿਰਪਾ ਗੋਪਾਲ ਗੋਬਿੰਦ ਮਾਧੋ ॥੧॥
ਸਿਮਰਿ ਮਨਾ ਦਾਮੋਦਰੁ ਦੁਖਹਰੁ ਭੈ ਭੰਜਨੁ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥
ਸ੍ਰੀਰੰਗੋ ਦਇਆਲ ਮਨੋਹਰੁ ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਬਿਰਦਾਇਆ ॥
ਜਪਿ ਮਨਾ ਤੂੰ ਰਾਮ ਨਰਾਇਣੁ ਗੋਵਿੰਦਾ ਹਰਿ ਮਾਧੋ ॥
ਧਿਆਇ ਮਨਾ ਮੁਰਾਰਿ ਮੁਕੰਦੇ ਕਟੀਐ ਕਾਲ ਦੁਖ ਫਾਧੋ ॥
ਦੁਖਹਰਣ ਦੀਨ ਸਰਣ ਸ੍ਰੀਧਰ ਚਰਨ ਕਮਲ ਅਰਾਧੀਐ ॥
ਜਮ ਪੰਥੁ ਬਿਖੜਾ ਅਗਨਿ ਸਾਗਰੁ ਨਿਮਖ ਸਿਮਰਤ ਸਾਧੀਐ ॥
ਕਲਿਮਲਹ ਦਹਤਾ ਸੁਧੁ ਕਰਤਾ ਦਿਨਸੁ ਰੈਣਿ ਅਰਾਧੋ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਕਰਹੁ ਕਿਰਪਾ ਗੋਪਾਲ ਗੋਬਿੰਦ ਮਾਧੋ ॥੧॥
ਸਿਮਰਿ ਮਨਾ ਦਾਮੋਦਰੁ ਦੁਖਹਰੁ ਭੈ ਭੰਜਨੁ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥
ਸ੍ਰੀਰੰਗੋ ਦਇਆਲ ਮਨੋਹਰੁ ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਬਿਰਦਾਇਆ ॥
छंत ॥
जपि मना तूं राम नराइणु गोविंदा हरि माधो ॥
धिआइ मना मुरारि मुकंदे कटीऐ काल दुख फाधो ॥
दुखहरण दीन सरण स्रीधर चरन कमल अराधीऐ ॥
जम पंथु बिखड़ा अगनि सागरु निमख सिमरत साधीऐ ॥
कलिमलह दहता सुधु करता दिनसु रैणि अराधो ॥
बिनवंति नानक करहु किरपा गोपाल गोबिंद माधो ॥१॥
सिमरि मना दामोदरु दुखहरु भै भंजनु हरि राइआ ॥
स्रीरंगो दइआल मनोहरु भगति वछलु बिरदाइआ ॥
जपि मना तूं राम नराइणु गोविंदा हरि माधो ॥
धिआइ मना मुरारि मुकंदे कटीऐ काल दुख फाधो ॥
दुखहरण दीन सरण स्रीधर चरन कमल अराधीऐ ॥
जम पंथु बिखड़ा अगनि सागरु निमख सिमरत साधीऐ ॥
कलिमलह दहता सुधु करता दिनसु रैणि अराधो ॥
बिनवंति नानक करहु किरपा गोपाल गोबिंद माधो ॥१॥
सिमरि मना दामोदरु दुखहरु भै भंजनु हरि राइआ ॥
स्रीरंगो दइआल मनोहरु भगति वछलु बिरदाइआ ॥
हिन्दी अर्थ: छंद॥ हे मेरे मन ! तू राम नारायण गोबिंद हरी माधव (के नाम) को जप। हे मेरे मन ! तू मुकंद मुरारी की आराधना कर। (इस आराधना की बरकति से) मौत और दुखों की फाही काटी जाती है। (हे मन !) उस परमात्मा के सोहणे चरणों की आराधना करनी चाहिए। जो दुखों का नाश करने वाले हैं। जो गरीबों का सहारा हैं। जो लक्ष्मी का आसरा हैं। हे मन ! जमों का मुश्किल रास्ता। और (विकारों की) आग (से भरा हुआ संसार-) समुंद्र को रक्ती भर समय के नाम सिमरन से ही खूबसूरत बनाया जा सकता है। (हे मेरे मन ! इसलिए) दिन रात उस हरी के नाम को सिमरता रह। जो पापों को जलाने वाला है और जो पवित्र करने वाला है। नानक विनती करता है, हे गोपाल ! हे गोबिंद ! हे माधो ! मेहर कर (मैं तेरा नाम हमेशा सिमरता रहूँ)। 1। हे मेरे मन ! उस प्रभू पातशाह दामोदर को सिमर। जो दुखों को दूर करने वाला है। जो डरों का नाश करने वाला है। जो लक्ष्मी का पति है। जो दया का श्रोत है। जो मन को मोह लेने वाला है। और भक्ति से प्यार करना जिसका मेहर भरा मूल स्वाभाव है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 248 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
मानसून की पहली बारिश, दिल्ली के पुराने मोहल्ले में।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 248” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 249 →, पीछे का: ← अंग 247।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।