अंग 284

अंग
284
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
ਨਾਨਕ ਕੈ ਮਨਿ ਇਹੁ ਅਨਰਾਉ ॥੧॥
नानक कै मनि इहु अनराउ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: नानक के मन में ये तमन्ना है
ਮਨਸਾ ਪੂਰਨ ਸਰਨਾ ਜੋਗ ॥
ਜੋ ਕਰਿ ਪਾਇਆ ਸੋਈ ਹੋਗੁ ॥
ਹਰਨ ਭਰਨ ਜਾ ਕਾ ਨੇਤ੍ਰ ਫੋਰੁ ॥
ਤਿਸ ਕਾ ਮੰਤ੍ਰੁ ਨ ਜਾਨੈ ਹੋਰੁ ॥
ਅਨਦ ਰੂਪ ਮੰਗਲ ਸਦ ਜਾ ਕੈ ॥
ਸਰਬ ਥੋਕ ਸੁਨੀਅਹਿ ਘਰਿ ਤਾ ਕੈ ॥
ਰਾਜ ਮਹਿ ਰਾਜੁ ਜੋਗ ਮਹਿ ਜੋਗੀ ॥
ਤਪ ਮਹਿ ਤਪੀਸਰੁ ਗ੍ਰਿਹਸਤ ਮਹਿ ਭੋਗੀ ॥
ਧਿਆਇ ਧਿਆਇ ਭਗਤਹ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਪੁਰਖ ਕਾ ਕਿਨੈ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥੨॥
मनसा पूरन सरना जोग ॥
जो करि पाइआ सोई होगु ॥
हरन भरन जा का नेत्र फोरु ॥
तिस का मंत्रु न जानै होरु ॥
अनद रूप मंगल सद जा कै ॥
सरब थोक सुनीअहि घरि ता कै ॥
राज महि राजु जोग महि जोगी ॥
तप महि तपीसरु ग्रिहसत महि भोगी ॥
धिआइ धिआइ भगतह सुखु पाइआ ॥
नानक तिसु पुरख का किनै अंतु न पाइआ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू (जीवों के) मन के फुरने पूरे करने व शरण आए की सहायता करने के समर्थ है। जो उसने (जीवों के) हाथों में लिख दिया है। वही होता है। जिस प्रभू का आँख फरकने का समय (जगत के) पालने और नाश करने के लिए (काफी) है। उसका छुपा हुआ भेद कोई और जीव नहीं जानता। जिस प्रभू के घर में सदा आनंद और खुशियां हैं। (जगत के) सारे पदार्थ उसके घर में (मौजूद) सुने जाते हैं। राजाओं में प्रभू खुद ही राजा है। जोगियों में जोगी है। तपस्वियों में स्वयं ही बड़ा तपस्वी है और गृहस्तियों में भी सवयं ही गृहस्ती है। भगत जनों ने (उस प्रभू को) सिमर सिमर के सुख पा लिया है। हे नानक ! किसी जीव ने उस अकाल-पुरख का अंत नहीं पाया। 2।
ਜਾ ਕੀ ਲੀਲਾ ਕੀ ਮਿਤਿ ਨਾਹਿ ॥
ਸਗਲ ਦੇਵ ਹਾਰੇ ਅਵਗਾਹਿ ॥
ਪਿਤਾ ਕਾ ਜਨਮੁ ਕਿ ਜਾਨੈ ਪੂਤੁ ॥
ਸਗਲ ਪਰੋਈ ਅਪੁਨੈ ਸੂਤਿ ॥
ਸੁਮਤਿ ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਜਿਨ ਦੇਇ ॥ ਜਨ ਦਾਸ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹਿ ਸੇਇ ॥
ਤਿਹੁ ਗੁਣ ਮਹਿ ਜਾ ਕਉ ਭਰਮਾਏ ॥
ਜਨਮਿ ਮਰੈ ਫਿਰਿ ਆਵੈ ਜਾਏ ॥
ਊਚ ਨੀਚ ਤਿਸ ਕੇ ਅਸਥਾਨ ॥
ਜੈਸਾ ਜਨਾਵੈ ਤੈਸਾ ਨਾਨਕ ਜਾਨ ॥੩॥
जा की लीला की मिति नाहि ॥
सगल देव हारे अवगाहि ॥
पिता का जनमु कि जानै पूतु ॥
सगल परोई अपुनै सूति ॥
सुमति गिआनु धिआनु जिन देइ ॥ जन दास नामु धिआवहि सेइ ॥
तिहु गुण महि जा कउ भरमाए ॥
जनमि मरै फिरि आवै जाए ॥
ऊच नीच तिस के असथान ॥
जैसा जनावै तैसा नानक जान ॥३॥

हिन्दी अर्थ: जिस प्रभू की (जगत रूपी) खेल का लेखा कोई नहीं लगा सकता। उसे खोज-खोज के सारे देवते भी थक गए हैं। (क्योंकि) पिता का जन्म पुत्र क्या जाने? (जैसे माला के मणके) धागे में परोए हुए होते हैं (वैसे ही) सारी रचना प्रभू ने अपने (हुकम रूपी) धागे में परोई हुई है। जिन लोगों को प्रभू सुमति, ऊँची समझ और सुरति जोड़ने की दाति देता है। वही सेवक और दास उसका नाम सिमरते हैं। (पर) जिनको (माया के) तीन गुणों में भटकाता है। वह पैदा होते मरते रहते हैं और बार बार (जगत में) आते और जाते रहते हैं। सुमति वाले ऊँचे लोगों के हृदय त्रिगुणी नीच लोगों के मन- ये सारे उस प्रभू के अपने ही ठिकाने हैं (भाव। सब में बसता है)। हे नानक ! जैसी बुद्धि-मति देता है। वैसी ही समझ वाला जीव बन जाता है। 3।
ਨਾਨਾ ਰੂਪ ਨਾਨਾ ਜਾ ਕੇ ਰੰਗ ॥
ਨਾਨਾ ਭੇਖ ਕਰਹਿ ਇਕ ਰੰਗ ॥
ਨਾਨਾ ਬਿਧਿ ਕੀਨੋ ਬਿਸਥਾਰੁ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਅਬਿਨਾਸੀ ਏਕੰਕਾਰੁ ॥
ਨਾਨਾ ਚਲਿਤ ਕਰੇ ਖਿਨ ਮਾਹਿ ॥
ਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਪੂਰਨੁ ਸਭ ਠਾਇ ॥
ਨਾਨਾ ਬਿਧਿ ਕਰਿ ਬਨਤ ਬਨਾਈ ॥
ਅਪਨੀ ਕੀਮਤਿ ਆਪੇ ਪਾਈ ॥
ਸਭ ਘਟ ਤਿਸ ਕੇ ਸਭ ਤਿਸ ਕੇ ਠਾਉ ॥
ਜਪਿ ਜਪਿ ਜੀਵੈ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥੪॥
नाना रूप नाना जा के रंग ॥
नाना भेख करहि इक रंग ॥
नाना बिधि कीनो बिसथारु ॥
प्रभु अबिनासी एकंकारु ॥
नाना चलित करे खिन माहि ॥
पूरि रहिओ पूरनु सभ ठाइ ॥
नाना बिधि करि बनत बनाई ॥
अपनी कीमति आपे पाई ॥
सभ घट तिस के सभ तिस के ठाउ ॥
जपि जपि जीवै नानक हरि नाउ ॥४॥

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! तू। जिस के कई रूप और रंग हैं। कई भेष धारण करता है (और फिर भी) एक ही तरह का है। उसने जगत का पसारा कई तरीकों से किया है। प्रभू नाश-रहित है और सब जगह एक खुद ही खुद है। कई तमाशे प्रभू पलक में कर देता है। वह पूरन पुरख सब जगह व्यापक है। जगत की रचना प्रभू ने कई तरीकों से रची है। अपनी (महिमा का) मूल्य वह खुद ही जानता है। सारे शरीर उस प्रभू के ही हैं। सारी जगहें उसी की ही हैं। हे नानक ! (उस का दास) उस का नाम जप-जप के जीता है। 4।
ਨਾਮ ਕੇ ਧਾਰੇ ਸਗਲੇ ਜੰਤ ॥
ਨਾਮ ਕੇ ਧਾਰੇ ਖੰਡ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ॥
ਨਾਮ ਕੇ ਧਾਰੇ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਬੇਦ ਪੁਰਾਨ ॥
ਨਾਮ ਕੇ ਧਾਰੇ ਸੁਨਨ ਗਿਆਨ ਧਿਆਨ ॥
ਨਾਮ ਕੇ ਧਾਰੇ ਆਗਾਸ ਪਾਤਾਲ ॥
ਨਾਮ ਕੇ ਧਾਰੇ ਸਗਲ ਆਕਾਰ ॥
ਨਾਮ ਕੇ ਧਾਰੇ ਪੁਰੀਆ ਸਭ ਭਵਨ ॥
ਨਾਮ ਕੈ ਸੰਗਿ ਉਧਰੇ ਸੁਨਿ ਸ੍ਰਵਨ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਜਿਸੁ ਆਪਨੈ ਨਾਮਿ ਲਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਚਉਥੇ ਪਦ ਮਹਿ ਸੋ ਜਨੁ ਗਤਿ ਪਾਏ ॥੫॥
नाम के धारे सगले जंत ॥
नाम के धारे खंड ब्रहमंड ॥
नाम के धारे सिम्रिति बेद पुरान ॥
नाम के धारे सुनन गिआन धिआन ॥
नाम के धारे आगास पाताल ॥
नाम के धारे सगल आकार ॥
नाम के धारे पुरीआ सभ भवन ॥
नाम कै संगि उधरे सुनि स्रवन ॥
करि किरपा जिसु आपनै नामि लाए ॥
नानक चउथे पद महि सो जनु गति पाए ॥५॥

हिन्दी अर्थ: सारे जीव-जंतु अकाल-पुरख के आसरे हैं। जगत के सारे (हिस्से) भी प्रभू के टिकाए हुए हैं। वेद, पुराण, स्मृतियां प्रभू के आधार पर हैं। ज्ञान की बातें सुननी और सुरति जोड़नी भी अकाल-पुरख के आसरे ही हैं। सारे आकाश-पाताल प्रभू-आसरे हैं। सारे शरीर ही प्रभू के आधार पर हैं। तीनों भवन और चौदह लोक अकाल-पुरख के टिकाए हुए हैं। जीव प्रभू में जुड़ के और उसका नाम कानों से सुन के विकारों से बचते हैं। जिस को मेहर करके अपने नाम में जोड़ता है। हे नानक ! वह मनुष्य (माया के असर से ऊपर) चौथे तल पर पहुँच कर उच्च अवस्था प्राप्त करता है। 5।
ਰੂਪੁ ਸਤਿ ਜਾ ਕਾ ਸਤਿ ਅਸਥਾਨੁ ॥
ਪੁਰਖੁ ਸਤਿ ਕੇਵਲ ਪਰਧਾਨੁ ॥
ਕਰਤੂਤਿ ਸਤਿ ਸਤਿ ਜਾ ਕੀ ਬਾਣੀ ॥
ਸਤਿ ਪੁਰਖ ਸਭ ਮਾਹਿ ਸਮਾਣੀ ॥
ਸਤਿ ਕਰਮੁ ਜਾ ਕੀ ਰਚਨਾ ਸਤਿ ॥
ਮੂਲੁ ਸਤਿ ਸਤਿ ਉਤਪਤਿ ॥
ਸਤਿ ਕਰਣੀ ਨਿਰਮਲ ਨਿਰਮਲੀ ॥
ਜਿਸਹਿ ਬੁਝਾਏ ਤਿਸਹਿ ਸਭ ਭਲੀ ॥
ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਸੁਖਦਾਈ ॥
ਬਿਸ੍ਵਾਸੁ ਸਤਿ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈ ॥੬॥
रूपु सति जा का सति असथानु ॥
पुरखु सति केवल परधानु ॥
करतूति सति सति जा की बाणी ॥
सति पुरख सभ माहि समाणी ॥
सति करमु जा की रचना सति ॥
मूलु सति सति उतपति ॥
सति करणी निरमल निरमली ॥
जिसहि बुझाए तिसहि सभ भली ॥
सति नामु प्रभ का सुखदाई ॥
बिस्वासु सति नानक गुर ते पाई ॥६॥

हिन्दी अर्थ: जिस प्रभू का रूप और ठिकाना सदा स्थिर रहने वाले हैं। केवल वही सर्व-व्यापक प्रभू सब के सिर पर है। जिस सदा अटल अकाल-पुरख की बाणी सब जीवों में रमी हुई है (भाव-जो प्रभू सब जीवों में बोल रहा है) उसके काम भी अटल हैं। जिस प्रभू की रचना सम्पूर्ण है (भाव। अधूरा नहीं)। जो (सबका) मूल (रूप) सदा स्थिर है। जिसका पैदा होना भी संपूर्ण है। उसकी बख्शिश सदा कायम है। प्रभू की महा पवित्र रजा है। जिस जीव को (रजा की) समझ देता है। उस को (वह रजा) पूरन तौर पर सुखदाई (लगती है)। प्रभू का सदा स्थिर रहने वाला नाम सुख दाता है। हे नानक ! (जीव को) ये अटॅल सिदक सतिगुरू से मिलता है। 6।
ਸਤਿ ਬਚਨ ਸਾਧੂ ਉਪਦੇਸ ॥
ਸਤਿ ਤੇ ਜਨ ਜਾ ਕੈ ਰਿਦੈ ਪ੍ਰਵੇਸ ॥
ਸਤਿ ਨਿਰਤਿ ਬੂਝੈ ਜੇ ਕੋਇ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਤਾ ਕੀ ਗਤਿ ਹੋਇ ॥
ਆਪਿ ਸਤਿ ਕੀਆ ਸਭੁ ਸਤਿ ॥
ਆਪੇ ਜਾਨੈ ਅਪਨੀ ਮਿਤਿ ਗਤਿ ॥
सति बचन साधू उपदेस ॥
सति ते जन जा कै रिदै प्रवेस ॥
सति निरति बूझै जे कोइ ॥
नामु जपत ता की गति होइ ॥
आपि सति कीआ सभु सति ॥
आपे जानै अपनी मिति गति ॥

हिन्दी अर्थ: गुरू के उपदेश अटल बचन हैं। जिनके हृदय में (इस उपदेश का) प्रवेश होता है। वह भी अटॅल (भाव। जनम-मरन से रहित) हो जाते हैं। अगर किसी मनुष्य को सदा स्थिर रहने वाले प्रभू के प्यार की सूझ आ जाए। तो नाम जप के वह उच्च अवस्था हासिल कर लेता है। प्रभू खुद सदा कायम रहने वाला है। उसका पैदा किया हुआ जगत भी सच-मुच अस्तित्व वाला है (भाव- मिथ्या नहीं है) प्रभू अपनी अवस्था और मर्यादा स्वयं ही जानता है।

संदर्भ: यह अंग 284 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Holi के दूसरे दिन (puddva), सब रंग धुल चुके, और घर का calm।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 56 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 284” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 285 →, पीछे का: ← अंग 283

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।