अंग
297
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਲਾਭੁ ਮਿਲੈ ਤੋਟਾ ਹਿਰੈ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਪਤਿਵੰਤ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਧਨੁ ਸੰਚਵੈ ਸਾਚ ਸਾਹ ਭਗਵੰਤ ॥
ਊਠਤ ਬੈਠਤ ਹਰਿ ਭਜਹੁ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਪਰੀਤਿ ॥
ਨਾਨਕ ਦੁਰਮਤਿ ਛੁਟਿ ਗਈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਬਸੇ ਚੀਤਿ ॥੨॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਧਨੁ ਸੰਚਵੈ ਸਾਚ ਸਾਹ ਭਗਵੰਤ ॥
ਊਠਤ ਬੈਠਤ ਹਰਿ ਭਜਹੁ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਪਰੀਤਿ ॥
ਨਾਨਕ ਦੁਰਮਤਿ ਛੁਟਿ ਗਈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਬਸੇ ਚੀਤਿ ॥੨॥
लाभु मिलै तोटा हिरै हरि दरगह पतिवंत ॥
राम नाम धनु संचवै साच साह भगवंत ॥
ऊठत बैठत हरि भजहु साधू संगि परीति ॥
नानक दुरमति छुटि गई पारब्रहम बसे चीति ॥२॥
राम नाम धनु संचवै साच साह भगवंत ॥
ऊठत बैठत हरि भजहु साधू संगि परीति ॥
नानक दुरमति छुटि गई पारब्रहम बसे चीति ॥२॥
हिन्दी अर्थ: (आत्मिक जीवन में उन्हें) फायदा ही फायदा होता है और (आत्मिक जीवन में पड़ रही) घाट (उनके अंदर से) निकल जाती है। वे परमात्मा की दरगाह में इज्ज़त वाले हो जाते हैं। (हे भाई !) जो जो मनुष्य परमात्मा का नाम धन इकट्ठा करता है। वे सब भाग्यशाली हो जाते हैं। वह सदा के लिए शाहूकार बन जाते हैं। (हे भाई !) उठते-बैठते हर वक्त परमात्मा का भजन करो और गुरू की संगति में प्रेम पैदा करो। हे नानक ! (जिस मनुष्य ने ये उद्यम किया उसकी) खोटी मति नहीं रही। परमात्मा सदा के लिए उसके चिक्त में आ बसा। 2।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਤੀਨਿ ਬਿਆਪਹਿ ਜਗਤ ਕਉ ਤੁਰੀਆ ਪਾਵੈ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਨਿਰਮਲ ਭਏ ਜਿਨ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਸੋਇ ॥੩॥
ਤੀਨਿ ਬਿਆਪਹਿ ਜਗਤ ਕਉ ਤੁਰੀਆ ਪਾਵੈ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਨਿਰਮਲ ਭਏ ਜਿਨ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਸੋਇ ॥੩॥
सलोकु ॥
तीनि बिआपहि जगत कउ तुरीआ पावै कोइ ॥
नानक संत निरमल भए जिन मनि वसिआ सोइ ॥३॥
तीनि बिआपहि जगत कउ तुरीआ पावै कोइ ॥
नानक संत निरमल भए जिन मनि वसिआ सोइ ॥३॥
हिन्दी अर्थ: सलोक – हे नानक ! जगत (के जीवों) पर (माया के) माया के तीन गुण अपना जोर डाल के रखते हैं। कोई विरला मनुष्य वह चौथी अवस्था प्राप्त करता है जहाँ वह परमात्मा से जुड़ा रहता है। जिन मनुष्यों के मन में वह परमात्मा ही सदा बसता है। वह संत जन पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। 3।
ਪਉੜੀ ॥
ਤ੍ਰਿਤੀਆ ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਬਿਖੈ ਫਲ ਕਬ ਉਤਮ ਕਬ ਨੀਚੁ ॥
ਨਰਕ ਸੁਰਗ ਭ੍ਰਮਤਉ ਘਣੋ ਸਦਾ ਸੰਘਾਰੈ ਮੀਚੁ ॥
ਹਰਖ ਸੋਗ ਸਹਸਾ ਸੰਸਾਰੁ ਹਉ ਹਉ ਕਰਤ ਬਿਹਾਇ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਏ ਤਿਸਹਿ ਨ ਜਾਣਨੀ ਚਿਤਵਹਿ ਅਨਿਕ ਉਪਾਇ ॥
ਆਧਿ ਬਿਆਧਿ ਉਪਾਧਿ ਰਸ ਕਬਹੁ ਨ ਤੂਟੈ ਤਾਪ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪੂਰਨ ਧਨੀ ਨਹ ਬੂਝੈ ਪਰਤਾਪ ॥
ਮੋਹ ਭਰਮ ਬੂਡਤ ਘਣੋ ਮਹਾ ਨਰਕ ਮਹਿ ਵਾਸ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਨਾਨਕ ਤੇਰੀ ਆਸ ॥੩॥
ਤ੍ਰਿਤੀਆ ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਬਿਖੈ ਫਲ ਕਬ ਉਤਮ ਕਬ ਨੀਚੁ ॥
ਨਰਕ ਸੁਰਗ ਭ੍ਰਮਤਉ ਘਣੋ ਸਦਾ ਸੰਘਾਰੈ ਮੀਚੁ ॥
ਹਰਖ ਸੋਗ ਸਹਸਾ ਸੰਸਾਰੁ ਹਉ ਹਉ ਕਰਤ ਬਿਹਾਇ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਏ ਤਿਸਹਿ ਨ ਜਾਣਨੀ ਚਿਤਵਹਿ ਅਨਿਕ ਉਪਾਇ ॥
ਆਧਿ ਬਿਆਧਿ ਉਪਾਧਿ ਰਸ ਕਬਹੁ ਨ ਤੂਟੈ ਤਾਪ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪੂਰਨ ਧਨੀ ਨਹ ਬੂਝੈ ਪਰਤਾਪ ॥
ਮੋਹ ਭਰਮ ਬੂਡਤ ਘਣੋ ਮਹਾ ਨਰਕ ਮਹਿ ਵਾਸ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਨਾਨਕ ਤੇਰੀ ਆਸ ॥੩॥
पउड़ी ॥
त्रितीआ त्रै गुण बिखै फल कब उतम कब नीचु ॥
नरक सुरग भ्रमतउ घणो सदा संघारै मीचु ॥
हरख सोग सहसा संसारु हउ हउ करत बिहाइ ॥
जिनि कीए तिसहि न जाणनी चितवहि अनिक उपाइ ॥
आधि बिआधि उपाधि रस कबहु न तूटै ताप ॥
पारब्रहम पूरन धनी नह बूझै परताप ॥
मोह भरम बूडत घणो महा नरक महि वास ॥
करि किरपा प्रभ राखि लेहु नानक तेरी आस ॥३॥
त्रितीआ त्रै गुण बिखै फल कब उतम कब नीचु ॥
नरक सुरग भ्रमतउ घणो सदा संघारै मीचु ॥
हरख सोग सहसा संसारु हउ हउ करत बिहाइ ॥
जिनि कीए तिसहि न जाणनी चितवहि अनिक उपाइ ॥
आधि बिआधि उपाधि रस कबहु न तूटै ताप ॥
पारब्रहम पूरन धनी नह बूझै परताप ॥
मोह भरम बूडत घणो महा नरक महि वास ॥
करि किरपा प्रभ राखि लेहु नानक तेरी आस ॥३॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- माया के तीनों गुणों के प्रभाव में जीवों को विषौ-विकार रूपी फल ही मिलते हैं। कभी कोई (थोड़े समय के लिए) अच्छी अवस्था पाते हैं कभी नीची अवस्था में गिर पड़ते हैं। जीवों को नर्क-स्वर्ग (दुख-सुख भोगने पड़ते हैं) बहुत भटकना लगी रहती है। और मौत का सहिम सदा उनकी आत्मिक मौत का कारण बना रहता है। (तीन गुणों के अधीन जीवों की उम्र) अहंकार में बीतती है। कभी खुशी। कभी ग़मी। कभी सहम- ये चक्र (उनके वास्ते सदा बना रहता है)। जिस परमात्मा ने पैदा किया है। उससे गहरी सांझ नहीं डालते और (तीर्थ-स्नान वगैरा) और और धार्मिक कर्मों (यत्नों) के बारे में वह सदा सोचते रहते हैं। दुनिया के रसों (चस्कों) के कारन जीव को मन के रोग। शरीर के रोग व अन्य झगड़े-झमेले चिपके ही रहते हैं। कभी इसके मन का दुख-कलेश मिटता ही नहीं। (रसों में फंसा मनुष्य) पूरन पारब्रहम मालिक प्रभू के प्रताप को नहीं समझता। बेअंत दुनिया माया के मोह और भटकना में गोते खा रही है। भारी नरकों (दुखों) में दिन काट रही है। (इससे बचने के लिए) हे नानक ! (अरदास कर और कह,) हे प्रभू ! किरपा करके मेरी रक्षा कर। मुझे तेरी (सहायता की) आस है। 3।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਚਤੁਰ ਸਿਆਣਾ ਸੁਘੜੁ ਸੋਇ ਜਿਨਿ ਤਜਿਆ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਅਸਟ ਸਿਧਿ ਭਜੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥੪॥
ਚਤੁਰ ਸਿਆਣਾ ਸੁਘੜੁ ਸੋਇ ਜਿਨਿ ਤਜਿਆ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਅਸਟ ਸਿਧਿ ਭਜੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥੪॥
सलोकु ॥
चतुर सिआणा सुघड़ु सोइ जिनि तजिआ अभिमानु ॥
चारि पदारथ असट सिधि भजु नानक हरि नामु ॥४॥
चतुर सिआणा सुघड़ु सोइ जिनि तजिआ अभिमानु ॥
चारि पदारथ असट सिधि भजु नानक हरि नामु ॥४॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु- (नाम की बरकति से) जिस मनुष्य ने (अपने मन में से) अहंकार दूर कर लिया है। वही है अक्लमंद। सयाना और सुजान। हे नानक ! परमात्मा का नाम (सदा) जपता रह (इसी में ही दुनिया के) चारों पदार्थ और (जोगियों वाली) आठों करामाती ताकतें। 4।
ਪਉੜੀ ॥
ਚਤੁਰਥਿ ਚਾਰੇ ਬੇਦ ਸੁਣਿ ਸੋਧਿਓ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਸਰਬ ਖੇਮ ਕਲਿਆਣ ਨਿਧਿ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਸਾਰੁ ॥
ਨਰਕ ਨਿਵਾਰੈ ਦੁਖ ਹਰੈ ਤੂਟਹਿ ਅਨਿਕ ਕਲੇਸ ॥
ਮੀਚੁ ਹੁਟੈ ਜਮ ਤੇ ਛੁਟੈ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨ ਪਰਵੇਸ ॥
ਭਉ ਬਿਨਸੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਰਸੈ ਰੰਗਿ ਰਤੇ ਨਿਰੰਕਾਰ ॥
ਦੁਖ ਦਾਰਿਦ ਅਪਵਿਤ੍ਰਤਾ ਨਾਸਹਿ ਨਾਮ ਅਧਾਰ ॥
ਸੁਰਿ ਨਰ ਮੁਨਿ ਜਨ ਖੋਜਤੇ ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਗੋਪਾਲ ॥
ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਮੁਖੁ ਊਜਲਾ ਹੋਇ ਨਾਨਕ ਸਾਧ ਰਵਾਲ ॥੪॥
ਚਤੁਰਥਿ ਚਾਰੇ ਬੇਦ ਸੁਣਿ ਸੋਧਿਓ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਸਰਬ ਖੇਮ ਕਲਿਆਣ ਨਿਧਿ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਸਾਰੁ ॥
ਨਰਕ ਨਿਵਾਰੈ ਦੁਖ ਹਰੈ ਤੂਟਹਿ ਅਨਿਕ ਕਲੇਸ ॥
ਮੀਚੁ ਹੁਟੈ ਜਮ ਤੇ ਛੁਟੈ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨ ਪਰਵੇਸ ॥
ਭਉ ਬਿਨਸੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਰਸੈ ਰੰਗਿ ਰਤੇ ਨਿਰੰਕਾਰ ॥
ਦੁਖ ਦਾਰਿਦ ਅਪਵਿਤ੍ਰਤਾ ਨਾਸਹਿ ਨਾਮ ਅਧਾਰ ॥
ਸੁਰਿ ਨਰ ਮੁਨਿ ਜਨ ਖੋਜਤੇ ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਗੋਪਾਲ ॥
ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਮੁਖੁ ਊਜਲਾ ਹੋਇ ਨਾਨਕ ਸਾਧ ਰਵਾਲ ॥੪॥
पउड़ी ॥
चतुरथि चारे बेद सुणि सोधिओ ततु बीचारु ॥
सरब खेम कलिआण निधि राम नामु जपि सारु ॥
नरक निवारै दुख हरै तूटहि अनिक कलेस ॥
मीचु हुटै जम ते छुटै हरि कीरतन परवेस ॥
भउ बिनसै अंम्रितु रसै रंगि रते निरंकार ॥
दुख दारिद अपवित्रता नासहि नाम अधार ॥
सुरि नर मुनि जन खोजते सुख सागर गोपाल ॥
मनु निरमलु मुखु ऊजला होइ नानक साध रवाल ॥४॥
चतुरथि चारे बेद सुणि सोधिओ ततु बीचारु ॥
सरब खेम कलिआण निधि राम नामु जपि सारु ॥
नरक निवारै दुख हरै तूटहि अनिक कलेस ॥
मीचु हुटै जम ते छुटै हरि कीरतन परवेस ॥
भउ बिनसै अंम्रितु रसै रंगि रते निरंकार ॥
दुख दारिद अपवित्रता नासहि नाम अधार ॥
सुरि नर मुनि जन खोजते सुख सागर गोपाल ॥
मनु निरमलु मुखु ऊजला होइ नानक साध रवाल ॥४॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- चारों ही वेद सुन के (हमने तो यह) निर्णय किया है, (यही) असल विचार (की बात मिली) है कि परमातमा का श्रेष्ठ नाम जप जप के सारे सुख मिल जाते हैं, सुखों का खजाना प्राप्त हो जाता है। (परमातमा का नाम) नरकों से बचा लेता है। सारे दुख दूर कर देता है। (नाम की बरकति से) अनेकों ही कलेश मिट जाते हैं। (जिस मनुष्य के हृदय में) परमातमा की सिफत सालाह का प्रवेश रहता है। उसकी आत्मिक मौत मिट जाती है। वह जमों से निजात प्राप्त कर लेता है। अगर निरंकार प्रभू के प्रेम रंग में रंगे जाएं तो (मन में से हरेक किस्म का) डर नाश हो जाता है और आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (हृदय में) रच-मिच जाता है। परमात्मा के नाम के आसरे दुख। गरीबी और विकारों से पैदा हुई मलीनता- ये सब नाश हो जाते हैं। हे नानक ! दैवी गुणों वाले मनुष्य और ऋषि लोग जिस सुखों-के-समुंद्र सृष्टि-के-पालनहार प्रभू की तलाश करते हैं। वह गुरू की चरण-धूड़ प्राप्त करने से मिल जाता है (और जिस मनुष्य को मिल जाता है उसका) मन पवित्र हो जाता है (लोक-परलोक में उसका) मुंह रौशन होता है। 4।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਪੰਚ ਬਿਕਾਰ ਮਨ ਮਹਿ ਬਸੇ ਰਾਚੇ ਮਾਇਆ ਸੰਗਿ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹੋਇ ਨਿਰਮਲਾ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਰੰਗਿ ॥੫॥
ਪੰਚ ਬਿਕਾਰ ਮਨ ਮਹਿ ਬਸੇ ਰਾਚੇ ਮਾਇਆ ਸੰਗਿ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹੋਇ ਨਿਰਮਲਾ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਰੰਗਿ ॥੫॥
सलोकु ॥
पंच बिकार मन महि बसे राचे माइआ संगि ॥
साधसंगि होइ निरमला नानक प्रभ कै रंगि ॥५॥
पंच बिकार मन महि बसे राचे माइआ संगि ॥
साधसंगि होइ निरमला नानक प्रभ कै रंगि ॥५॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु- हे नानक ! जो मनुष्य माया (के मोह) में मस्त रहते हैं। उनके मन में काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार (पाँचों विकार) टिके रहते हैं। पर जो मनुष्य गुरू की संगति में (रह के) परमात्मा के प्रेम रंग में रंगा रहता है। वह पवित्र जीवन वाला हो जाता है। 5।
ਪਉੜੀ ॥
ਪੰਚਮਿ ਪੰਚ ਪ੍ਰਧਾਨ ਤੇ ਜਿਹ ਜਾਨਿਓ ਪਰਪੰਚੁ ॥
ਕੁਸਮ ਬਾਸ ਬਹੁ ਰੰਗੁ ਘਣੋ ਸਭ ਮਿਥਿਆ ਬਲਬੰਚੁ ॥
ਨਹ ਜਾਪੈ ਨਹ ਬੂਝੀਐ ਨਹ ਕਛੁ ਕਰਤ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਸੁਆਦ ਮੋਹ ਰਸ ਬੇਧਿਓ ਅਗਿਆਨਿ ਰਚਿਓ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਬਹੁ ਜੋਨਿ ਭ੍ਰਮਣ ਕੀਨੇ ਕਰਮ ਅਨੇਕ ॥
ਰਚਨਹਾਰੁ ਨਹ ਸਿਮਰਿਓ ਮਨਿ ਨ ਬੀਚਾਰਿ ਬਿਬੇਕ ॥
ਭਾਉ ਭਗਤਿ ਭਗਵਾਨ ਸੰਗਿ ਮਾਇਆ ਲਿਪਤ ਨ ਰੰਚ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਰਲੇ ਪਾਈਅਹਿ ਜੋ ਨ ਰਚਹਿ ਪਰਪੰਚ ॥੫॥
ਪੰਚਮਿ ਪੰਚ ਪ੍ਰਧਾਨ ਤੇ ਜਿਹ ਜਾਨਿਓ ਪਰਪੰਚੁ ॥
ਕੁਸਮ ਬਾਸ ਬਹੁ ਰੰਗੁ ਘਣੋ ਸਭ ਮਿਥਿਆ ਬਲਬੰਚੁ ॥
ਨਹ ਜਾਪੈ ਨਹ ਬੂਝੀਐ ਨਹ ਕਛੁ ਕਰਤ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਸੁਆਦ ਮੋਹ ਰਸ ਬੇਧਿਓ ਅਗਿਆਨਿ ਰਚਿਓ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਬਹੁ ਜੋਨਿ ਭ੍ਰਮਣ ਕੀਨੇ ਕਰਮ ਅਨੇਕ ॥
ਰਚਨਹਾਰੁ ਨਹ ਸਿਮਰਿਓ ਮਨਿ ਨ ਬੀਚਾਰਿ ਬਿਬੇਕ ॥
ਭਾਉ ਭਗਤਿ ਭਗਵਾਨ ਸੰਗਿ ਮਾਇਆ ਲਿਪਤ ਨ ਰੰਚ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਰਲੇ ਪਾਈਅਹਿ ਜੋ ਨ ਰਚਹਿ ਪਰਪੰਚ ॥੫॥
पउड़ी ॥
पंचमि पंच प्रधान ते जिह जानिओ परपंचु ॥
कुसम बास बहु रंगु घणो सभ मिथिआ बलबंचु ॥
नह जापै नह बूझीऐ नह कछु करत बीचारु ॥
सुआद मोह रस बेधिओ अगिआनि रचिओ संसारु ॥
जनम मरण बहु जोनि भ्रमण कीने करम अनेक ॥
रचनहारु नह सिमरिओ मनि न बीचारि बिबेक ॥
भाउ भगति भगवान संगि माइआ लिपत न रंच ॥
नानक बिरले पाईअहि जो न रचहि परपंच ॥५॥
पंचमि पंच प्रधान ते जिह जानिओ परपंचु ॥
कुसम बास बहु रंगु घणो सभ मिथिआ बलबंचु ॥
नह जापै नह बूझीऐ नह कछु करत बीचारु ॥
सुआद मोह रस बेधिओ अगिआनि रचिओ संसारु ॥
जनम मरण बहु जोनि भ्रमण कीने करम अनेक ॥
रचनहारु नह सिमरिओ मनि न बीचारि बिबेक ॥
भाउ भगति भगवान संगि माइआ लिपत न रंच ॥
नानक बिरले पाईअहि जो न रचहि परपंच ॥५॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (जगत में) वह संत जन श्रेष्ठ माने जाते हैं जिन्होंने इस जगत पसारे को (ऐसे) समझ लिया है (कि ये) फूलों की सुगंधि (जैसा है और भले ही) अनेकों रंगों वाला है (फिर भी) है सारा नाशवंत और ठॅगी ही। जगत को (सही जीवन-जुगति) सूझती नहीं। ये समझता नहीं। और (सही जीवन-जुगति के बारे में) कोई विचार नहीं करता। जगत (आम तौर पर) अज्ञान में मस्त रहता है। स्वादों में मोह लेने वाले रसों में बेधित रहता है। मनुष्य अनेकों ही कर्म करता रहा। वह जनम मरन के चक्कर में पड़ा रहा। वह अनेको जोनियों में भटकता रहा। मनुष्य ने सृजनहार करतार का सिमरन नहीं किया। अपने मन में विचार के (भले-बुरे काम की) परख नहीं पैदा की। जिन पर माया अपना रक्ती भर भी प्रभाव नहीं डाल सकती। और जो भगवान से प्रेम करते हैं भगवान की भगती करते हैं। हे नानक ! (जगत में ऐसे लोग) दुर्लभ ही मिलते हैं जो इस जगत-पसारे (के मोह) में नहीं फंसते। 5।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਖਟ ਸਾਸਤ੍ਰ ਊਚੌ ਕਹਹਿ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰ ॥
ਭਗਤ ਸੋਹਹਿ ਗੁਣ ਗਾਵਤੇ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਦੁਆਰ ॥੬॥
ਖਟ ਸਾਸਤ੍ਰ ਊਚੌ ਕਹਹਿ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰ ॥
ਭਗਤ ਸੋਹਹਿ ਗੁਣ ਗਾਵਤੇ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਦੁਆਰ ॥੬॥
सलोकु ॥
खट सासत्र ऊचौ कहहि अंतु न पारावार ॥
भगत सोहहि गुण गावते नानक प्रभ कै दुआर ॥६॥
खट सासत्र ऊचौ कहहि अंतु न पारावार ॥
भगत सोहहि गुण गावते नानक प्रभ कै दुआर ॥६॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु- छे शास्त्र ऊँचा (पुकार के) कहते हैं कि परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। परमात्मा की हस्ती का इस पार का और उस पार का छोर नहीं मिल सकता। हे नानक ! परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदे परमात्मा के दर पर उस के गुण गाते सुंदर लगते हैं। 6।
ਪਉੜੀ ॥
ਖਸਟਮਿ ਖਟ ਸਾਸਤ੍ਰ ਕਹਹਿ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਕਥਹਿ ਅਨੇਕ ॥
ਖਸਟਮਿ ਖਟ ਸਾਸਤ੍ਰ ਕਹਹਿ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਕਥਹਿ ਅਨੇਕ ॥
पउड़ी ॥
खसटमि खट सासत्र कहहि सिंम्रिति कथहि अनेक ॥
खसटमि खट सासत्र कहहि सिंम्रिति कथहि अनेक ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- छे शास्त्र (परमात्मा का स्वरूप) बयान करते हैं। अनेको स्मृतियां (भी) बयान करती हैं (पर कोई उसके गुणों का अंत नहीं पा सकता)।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 297 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
सर्दी के पहले हफ़्ते का पहला rajai का आना, और मन का बदलना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 9 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 297” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 298 →, पीछे का: ← अंग 296।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।