अंग 252

अंग
252
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪਉੜੀ ॥
ਰੇ ਮਨ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਜਹ ਰਚਹੁ ਤਹ ਤਹ ਬੰਧਨ ਪਾਹਿ ॥
ਜਿਹ ਬਿਧਿ ਕਤਹੂ ਨ ਛੂਟੀਐ ਸਾਕਤ ਤੇਊ ਕਮਾਹਿ ॥
ਹਉ ਹਉ ਕਰਤੇ ਕਰਮ ਰਤ ਤਾ ਕੋ ਭਾਰੁ ਅਫਾਰ ॥
ਪ੍ਰੀਤਿ ਨਹੀ ਜਉ ਨਾਮ ਸਿਉ ਤਉ ਏਊ ਕਰਮ ਬਿਕਾਰ ॥
ਬਾਧੇ ਜਮ ਕੀ ਜੇਵਰੀ ਮੀਠੀ ਮਾਇਆ ਰੰਗ ॥
ਭ੍ਰਮ ਕੇ ਮੋਹੇ ਨਹ ਬੁਝਹਿ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਦਹੂ ਸੰਗ ॥
ਲੇਖੈ ਗਣਤ ਨ ਛੂਟੀਐ ਕਾਚੀ ਭੀਤਿ ਨ ਸੁਧਿ ॥
ਜਿਸਹਿ ਬੁਝਾਏ ਨਾਨਕਾ ਤਿਹ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਰਮਲ ਬੁਧਿ ॥੯॥
पउड़ी ॥
रे मन बिनु हरि जह रचहु तह तह बंधन पाहि ॥
जिह बिधि कतहू न छूटीऐ साकत तेऊ कमाहि ॥
हउ हउ करते करम रत ता को भारु अफार ॥
प्रीति नही जउ नाम सिउ तउ एऊ करम बिकार ॥
बाधे जम की जेवरी मीठी माइआ रंग ॥
भ्रम के मोहे नह बुझहि सो प्रभु सदहू संग ॥
लेखै गणत न छूटीऐ काची भीति न सुधि ॥
जिसहि बुझाए नानका तिह गुरमुखि निरमल बुधि ॥९॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- हे मेरे मन ! प्रभू के बिना और जहां जहां प्रेम डालेगा। वहां वहां माया के बंधन पड़ेंगे। हरी से विछुड़े लोग वही काम करते हैं कि उस तरीके से कहीं भी इन बंधनों से खलासी ना हो सके। (तीर्थ, दान अदिक) कर्मों के प्रेमी (ये कर्म करके, इनके किए का) गुमान करते फिरते हैं। इस अहंकार का भार भी असहि होता है। अगर प्रभू के नाम से प्यार नहीं बना। तो ये कर्म विकार रूप हो जाते हैं। मीठी माया के चमत्कारों में (फस के जीव) जम की फासी में बंध जाते हैं। भटकनों में फंसे हुओं को ये समझ नही आती कि प्रभू सदा हमारे साथ है। (हम जीव इतने माया-ग्रसे हुए हैं कि हमारे किए कुकर्मों का) लेखा करने से हम बरी नहीं हो सकते। (पानी से धोने पर) गारे की दीवार की सफाई नहीं हो सकती (और और गारा बनता जाएगा)। हे नानक ! (कह,) प्रभू जिस मनुष्य को सूझ बख्शता है। गुरू की शरण पड़ कर उसकी बुद्धि पवित्र हो जाती है। 9।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਟੂਟੇ ਬੰਧਨ ਜਾਸੁ ਕੇ ਹੋਆ ਸਾਧੂ ਸੰਗੁ ॥
ਜੋ ਰਾਤੇ ਰੰਗ ਏਕ ਕੈ ਨਾਨਕ ਗੂੜਾ ਰੰਗੁ ॥੧॥
सलोकु ॥
टूटे बंधन जासु के होआ साधू संगु ॥
जो राते रंग एक कै नानक गूड़ा रंगु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ जिस मनुष्य के माया के बंधन टूटने पर आते हैं। उसे गुरू की संगति प्राप्त होती है। हे नानक ! (गुरू की संगति में रह के) जो एक प्रभू के प्यार रंग में रंगे जाते हैं। वह रंग ऐसा गाढ़ा होता है (कि मजीठ के रंग की तरह कभी उतरता नहीं)। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਰਾਰਾ ਰੰਗਹੁ ਇਆ ਮਨੁ ਅਪਨਾ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਜਪੁ ਰਸਨਾ ॥
ਰੇ ਰੇ ਦਰਗਹ ਕਹੈ ਨ ਕੋਊ ॥
ਆਉ ਬੈਠੁ ਆਦਰੁ ਸੁਭ ਦੇਊ ॥
ਉਆ ਮਹਲੀ ਪਾਵਹਿ ਤੂ ਬਾਸਾ ॥
ਜਨਮ ਮਰਨ ਨਹ ਹੋਇ ਬਿਨਾਸਾ ॥
ਮਸਤਕਿ ਕਰਮੁ ਲਿਖਿਓ ਧੁਰਿ ਜਾ ਕੈ ॥
ਹਰਿ ਸੰਪੈ ਨਾਨਕ ਘਰਿ ਤਾ ਕੈ ॥੧੦॥
पउड़ी ॥
रारा रंगहु इआ मनु अपना ॥
हरि हरि नामु जपहु जपु रसना ॥
रे रे दरगह कहै न कोऊ ॥
आउ बैठु आदरु सुभ देऊ ॥
उआ महली पावहि तू बासा ॥
जनम मरन नह होइ बिनासा ॥
मसतकि करमु लिखिओ धुरि जा कै ॥
हरि संपै नानक घरि ता कै ॥१०॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (इस तरह) अपने इस मन को (प्रभू के नाम रंग में) रंगो ! (हे भाई !) जीभ से सदा हरी के नाम का जाप जपो। प्रभू की हजूरी में तुम्हें कोई अनादरी के बोल नहीं बोलेगा। (बल्कि) बढ़िया आदर-सत्कार मिलेगा। (कहेंगे) -आओ बैठो ! (हे भाई !) अगर तू नाम में मन रंग ले तो तुझे प्रभू की हजूरी में ठिकाना मिल जाएगा। ना जनम मरन का चक्कर रह जाएगा। और ना ही कभी आत्मिक मौत होगी। पर हे नानक ! धुर से ही जिस मनुष्य के माथे पर प्रभू की मेहर का लेख लिखा (उघड़ता) है। उसके ही हृदय-घर में ये नाम-धन इकट्ठा होता है। 10।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਲਾਲਚ ਝੂਠ ਬਿਕਾਰ ਮੋਹ ਬਿਆਪਤ ਮੂੜੇ ਅੰਧ ॥
ਲਾਗਿ ਪਰੇ ਦੁਰਗੰਧ ਸਿਉ ਨਾਨਕ ਮਾਇਆ ਬੰਧ ॥੧॥
सलोकु ॥
लालच झूठ बिकार मोह बिआपत मूड़े अंध ॥
लागि परे दुरगंध सिउ नानक माइआ बंध ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ उन ज्ञान-हीन मूर्खों पर लालच झूठ विकार मोह आदि जोर डाल लेते हैं। और वह बुरे काम में लगे रहते हैं। हे नानक ! जो मनुष्य माया के मोह के बंधनों में फंस जाते हैं।1।
ਪਉੜੀ ॥
ਲਲਾ ਲਪਟਿ ਬਿਖੈ ਰਸ ਰਾਤੇ ॥
ਅਹੰਬੁਧਿ ਮਾਇਆ ਮਦ ਮਾਤੇ ॥
ਇਆ ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਜਨਮਹਿ ਮਰਨਾ ॥
ਜਿਉ ਜਿਉ ਹੁਕਮੁ ਤਿਵੈ ਤਿਉ ਕਰਨਾ ॥
ਕੋਊ ਊਨ ਨ ਕੋਊ ਪੂਰਾ ॥
ਕੋਊ ਸੁਘਰੁ ਨ ਕੋਊ ਮੂਰਾ ॥
ਜਿਤੁ ਜਿਤੁ ਲਾਵਹੁ ਤਿਤੁ ਤਿਤੁ ਲਗਨਾ ॥
ਨਾਨਕ ਠਾਕੁਰ ਸਦਾ ਅਲਿਪਨਾ ॥੧੧॥
पउड़ी ॥
लला लपटि बिखै रस राते ॥
अहंबुधि माइआ मद माते ॥
इआ माइआ महि जनमहि मरना ॥
जिउ जिउ हुकमु तिवै तिउ करना ॥
कोऊ ऊन न कोऊ पूरा ॥
कोऊ सुघरु न कोऊ मूरा ॥
जितु जितु लावहु तितु तितु लगना ॥
नानक ठाकुर सदा अलिपना ॥११॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ पजो मनुष्य माया के नशे में मस्त रहते हैं। जिनकी बुद्धि पर अहंकार का पर्दा पड़ जाता है। वे मनुष्य विषियों के स्वादों से चिपके रहते हैं। और इस माया में फस के जनम मरन (के चक्कर में पड़ जाते हैं)। (पर जीव के भी क्या वश?) जैसे जैसे प्रभू की रजा होती है। वैसे वैसे ही जीव कर्म करते हैं। (अपनी चतुराई से) ना कोई जीव पूर्ण बन सकता है। ना कोई कमजोर रह सकता है। ना कोई (अपने बूते पर) समझदार हो गया है। ना कोई मूर्ख रह गया है। हे प्रभू ! जिस जिस तरफ तू जीवों को प्रेरता है। उधर उधर ही ये लग पड़ते हैं। हे नानक ! (कैसी आश्चर्यजनक खेल है ! सब जीवों में बैठ के पालणहार प्रभू प्रेरना कर रहा है। फिर भी) प्रभू खुद स्वयं माया के प्रभाव से परे है। 11।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਲਾਲ ਗੁਪਾਲ ਗੋਬਿੰਦ ਪ੍ਰਭ ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰ ਅਥਾਹ ॥
ਦੂਸਰ ਨਾਹੀ ਅਵਰ ਕੋ ਨਾਨਕ ਬੇਪਰਵਾਹ ॥੧॥
सलोकु ॥
लाल गुपाल गोबिंद प्रभ गहिर गंभीर अथाह ॥
दूसर नाही अवर को नानक बेपरवाह ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ परमात्मा सब का प्यारा है। सृष्टि कर रक्षक है। सब की जानने वाला है उसका भेद नहीं पाया जा सकता। बड़े जिगरे वाला है। उसे एक ऐसा समुंद्र समझो। जिसकी गहराई व आकार समझ से परे है। कोई चिंता-फिक्र उसके नजदीक नहीं फटकते। हे नानक ! उस जैसा और कोई दूसरा नहीं। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਲਲਾ ਤਾ ਕੈ ਲਵੈ ਨ ਕੋਊ ॥
ਏਕਹਿ ਆਪਿ ਅਵਰ ਨਹ ਹੋਊ ॥
ਹੋਵਨਹਾਰੁ ਹੋਤ ਸਦ ਆਇਆ ॥
ਉਆ ਕਾ ਅੰਤੁ ਨ ਕਾਹੂ ਪਾਇਆ ॥
ਕੀਟ ਹਸਤਿ ਮਹਿ ਪੂਰ ਸਮਾਨੇ ॥
ਪ੍ਰਗਟ ਪੁਰਖ ਸਭ ਠਾਊ ਜਾਨੇ ॥
ਜਾ ਕਉ ਦੀਨੋ ਹਰਿ ਰਸੁ ਅਪਨਾ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਤਿਹ ਜਪਨਾ ॥੧੨॥
पउड़ी ॥
लला ता कै लवै न कोऊ ॥
एकहि आपि अवर नह होऊ ॥
होवनहारु होत सद आइआ ॥
उआ का अंतु न काहू पाइआ ॥
कीट हसति महि पूर समाने ॥
प्रगट पुरख सभ ठाऊ जाने ॥
जा कउ दीनो हरि रसु अपना ॥
नानक गुरमुखि हरि हरि तिह जपना ॥१२॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- उस परमात्मा के बराबर का और कोई नहीं। (अपने जैसा) वह खुद ही है स्वयं ही है (उस जैसा) और कोई नही। सदा से ही वह प्रभू अस्तित्व वाला चला आ रहा है। किसी ने उस (की) हस्ती का आखिरी छोर नहीं पाया। कीड़ी से लेकर हाथी तक सब में पूण तौर पर प्रभू व्यापक है। वह सर्व-व्यापक परमात्मा हर जगह प्रत्यक्ष प्रतीत हो रहा है। हे नानक ! जिस आदमी को प्रभू ने अपने नाम का स्वाद बख्शा है। वह बंदा गुरू की शरण पड़ कर सदा उसे जपता है। 12।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਆਤਮ ਰਸੁ ਜਿਹ ਜਾਨਿਆ ਹਰਿ ਰੰਗ ਸਹਜੇ ਮਾਣੁ ॥
ਨਾਨਕ ਧਨਿ ਧਨਿ ਧੰਨਿ ਜਨ ਆਏ ਤੇ ਪਰਵਾਣੁ ॥੧॥
सलोकु ॥
आतम रसु जिह जानिआ हरि रंग सहजे माणु ॥
नानक धनि धनि धंनि जन आए ते परवाणु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे नानक ! जो लोग अडोल अवस्था में टिक के प्रभू की याद का स्वाद लेते हैं। जिन्होंने इस आत्मिक आनंद के साथ सांझ डाली है। वे भाग्यशाली है। उनका ही जगत में पैदा सफल है। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਆਇਆ ਸਫਲ ਤਾਹੂ ਕੋ ਗਨੀਐ ॥
ਜਾਸੁ ਰਸਨ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਭਨੀਐ ॥
ਆਇ ਬਸਹਿ ਸਾਧੂ ਕੈ ਸੰਗੇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹਿ ਰੰਗੇ ॥
ਆਵਤ ਸੋ ਜਨੁ ਨਾਮਹਿ ਰਾਤਾ ॥
ਜਾ ਕਉ ਦਇਆ ਮਇਆ ਬਿਧਾਤਾ ॥
ਏਕਹਿ ਆਵਨ ਫਿਰਿ ਜੋਨਿ ਨ ਆਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਕੈ ਦਰਸਿ ਸਮਾਇਆ ॥੧੩॥
पउड़ी ॥
आइआ सफल ताहू को गनीऐ ॥
जासु रसन हरि हरि जसु भनीऐ ॥
आइ बसहि साधू कै संगे ॥
अनदिनु नामु धिआवहि रंगे ॥
आवत सो जनु नामहि राता ॥
जा कउ दइआ मइआ बिधाता ॥
एकहि आवन फिरि जोनि न आइआ ॥
नानक हरि कै दरसि समाइआ ॥१३॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (जगत में) उसी मनुष्य का आना सफल हुआ जानो। जिस की जीभ सदा परमात्मा की सिफत सालाह करती है। (जो लोग) गुरू की हजूरी में आ टिकते हैं। वह हर वक्त प्यार से प्रभू का नाम सिमरते हैं। वह सदा परमात्मा के नाम में मस्त रहता है। जिस मनुष्य पर सृजनहार की मेहर की किरपा हुई। (जगत में) उसका जनम एक ही बार होता है। वह मुड़ मुड़ जूनियों में नहीं आता। (जगत में वही) आया समझो। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के दीदार में लीन रहता है। 13।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਯਾਸੁ ਜਪਤ ਮਨਿ ਹੋਇ ਅਨੰਦੁ ਬਿਨਸੈ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ॥ ਦੂਖ ਦਰਦ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬੁਝੈ ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਮਾਉ ॥੧॥
सलोकु ॥
यासु जपत मनि होइ अनंदु बिनसै दूजा भाउ ॥ दूख दरद त्रिसना बुझै नानक नामि समाउ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: शलोक॥ हे नानक ! जिस प्रभू का नाम जपने से मन में आनंद पैदा होता है। (प्रभू से अलग) किसी और का मोह दूर हो सकता है। माया का लालच (और लालच से पैदा हुआ) दुख-कलेश मिट जाता है। उसके नाम में टिके रहो। 1।

संदर्भ: यह अंग 252 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

सीस-गंज साहिब के बाहर Chandni Chowk की भीड़ और अंदर का shrine, दोनों एक साथ।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 59 पंक्तियों का है, 10 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 252” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 253 →, पीछे का: ← अंग 251

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।