रे मन बिनु हरि जह रचहु तह तह बंधन पाहि ॥
जिह बिधि कतहू न छूटीऐ साकत तेऊ कमाहि ॥
हउ हउ करते करम रत ता को भारु अफार ॥
प्रीति नही जउ नाम सिउ तउ एऊ करम बिकार ॥
बाधे जम की जेवरी मीठी माइआ रंग ॥
भ्रम के मोहे नह बुझहि सो प्रभु सदहू संग ॥
लेखै गणत न छूटीऐ काची भीति न सुधि ॥
जिसहि बुझाए नानका तिह गुरमुखि निरमल बुधि ॥9॥
टूटे बंधन जासु के होआ साधू संगु ॥
जो राते रंग एक कै नानक गूड़ा रंगु ॥1॥
रारा रंगहु इआ मनु अपना ॥
हरि हरि नामु जपहु जपु रसना ॥
रे रे दरगह कहै न कोऊ ॥
आउ बैठु आदरु सुभ देऊ ॥
उआ महली पावहि तू बासा ॥
जनम मरन नह होइ बिनासा ॥
मसतकि करमु लिखिओ धुरि जा कै ॥
हरि संपै नानक घरि ता कै ॥10॥
लालच झूठ बिकार मोह बिआपत मूड़े अंध ॥
लागि परे दुरगंध सिउ नानक माइआ बंध ॥1॥
लला लपटि बिखै रस राते ॥
अहंबुधि माइआ मद माते ॥
इआ माइआ महि जनमहि मरना ॥
जिउ जिउ हुकमु तिवै तिउ करना ॥
कोऊ ऊन न कोऊ पूरा ॥
कोऊ सुघरु न कोऊ मूरा ॥
जितु जितु लावहु तितु तितु लगना ॥
नानक ठाकुर सदा अलिपना ॥11॥
लाल गुपाल गोबिंद प्रभ गहिर गंभीर अथाह ॥
दूसर नाही अवर को नानक बेपरवाह ॥1॥
लला ता कै लवै न कोऊ ॥
एकहि आपि अवर नह होऊ ॥
होवनहारु होत सद आइआ ॥
उआ का अंतु न काहू पाइआ ॥
कीट हसति महि पूर समाने ॥
प्रगट पुरख सभ ठाऊ जाने ॥
जा कउ दीनो हरि रसु अपना ॥
नानक गुरमुखि हरि हरि तिह जपना ॥12॥
आतम रसु जिह जानिआ हरि रंग सहजे माणु ॥
नानक धनि धनि धंनि जन आए ते परवाणु ॥1॥
आइआ सफल ताहू को गनीऐ ॥
जासु रसन हरि हरि जसु भनीऐ ॥
आइ बसहि साधू कै संगे ॥
अनदिनु नामु धिआवहि रंगे ॥
आवत सो जनु नामहि राता ॥
जा कउ दइआ मइआ बिधाता ॥
एकहि आवन फिरि जोनि न आइआ ॥
नानक हरि कै दरसि समाइआ ॥13॥
यासु जपत मनि होइ अनंदु बिनसै दूजा भाउ ॥ दूख दरद त्रिसना बुझै नानक नामि समाउ ॥1॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पउड़ी- हे मेरे मन ! प्रभू के बिना और जहां जहां प्रेम डालेगा।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।