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एक आदमी चलकर आता है और सीधे सबसे बड़े के सामने जा खड़ा होता है। नाम है आश्वलायन, और जिनके पास वह आया है वे परमेष्ठी पितामह हैं, सृष्टि के आरम्भ में बैठे हुए। वह कोई वरदान नहीं माँगता, कोई संकट लेकर नहीं आया, किसी बहस में हारकर नहीं आया। वह हाथ जोड़कर बस इतना कहता है कि मुझे वह ब्रह्मविद्या पढ़ाइए जो सबसे श्रेष्ठ है, जिसे सज्जन सदा सेवते आए हैं, जो छिपी हुई है, और जिससे जानने वाला जल्दी ही सारा पाप हटाकर उस पुरुष तक पहुँच जाता है जो परम से भी परे है। कैवल्य उपनिषद् यहीं से शुरू होता है, एक माँग से, जिसमें कोई शर्त नहीं है।
यह उपनिषद् छोटा है, दो खण्डों में कुल छब्बीस मन्त्र, और इसका ढाँचा एकदम साफ़ है। एक सवाल, एक उत्तर, और उस उत्तर को बरतने की विधि। जो बात इसे याद रखने लायक़ बनाती है वह यह है कि यह ज्ञान की बात करते हुए भी ज्ञान को अकेला नहीं छोड़ता। पितामह पहले श्रद्धा कहते हैं, फिर भक्ति, और तब ध्यान। और जब ध्यान की विधि खुलती है, तो वह बहुत ठोस है, कहाँ बैठिए, कैसे बैठिए, क्या करने से पहले क्या कीजिए, और भीतर किस रूप पर मन को टिकाइए। अन्त में वह रूप और आप, दोनों एक ही निकलते हैं।
इस उपनिषद् के मुख्य किरदार
आश्वलायन: वह जिज्ञासु जो सीधा पितामह के पास जाता है और सबसे ऊँची, सबसे छिपी हुई विद्या माँग लेता है।
परमेष्ठी पितामह: वे जो उत्तर में लम्बी भूमिका नहीं बाँधते, तीन शब्द देते हैं और उन्हीं तीन पर पूरी विधि खड़ी कर देते हैं।
स्वगुरु: अपना गुरु, जिसे भक्ति से प्रणाम किए बिना इस उपनिषद् में आसन ही पूरा नहीं होता।
हृत्पुण्डरीक: हृदय का वह कमल जिसके बीच में ध्यान को ले जाकर बिठाया जाता है।
उमासहाय परमेश्वर: तीन आँखों वाला, नीलकण्ठ, प्रशान्त, जिसका ध्यान इस पूरी विधि का केन्द्र है।
जीव: वही एक, जो माया से मोहित होकर शरीर पकड़ लेता है और तीन पुरियों में खेलता फिरता है।
आश्वलायन की माँग, और पितामह के तीन शब्द
पहला मन्त्र पूरी भूमिका एक वाक्य में निपटा देता है। आश्वलायन भगवान परमेष्ठी के पास जाकर उपस्थित हुआ और बोला, “अधीहि भगवन्ब्रह्मविद्यां वरिष्ठां सदा सद्भिः सेव्यमानां निगूढाम्”, मुझे वह ब्रह्मविद्या पढ़ाइए जो सबसे श्रेष्ठ है, जिसे सदा सत्पुरुष सेवते रहे हैं, और जो गूढ़ है। और फिर वह माँग का कारण भी बता देता है, कि जिससे विद्वान शीघ्र ही सारा पाप हटाकर परात्पर पुरुष तक चला जाता है।
इस एक वाक्य में तीन बातें छिपी हैं। पहली, वह विद्या माँग रहा है, कोई सिद्धि नहीं। दूसरी, वह जानता है कि यह विद्या नई नहीं है, उसका कहना है कि इसे सदा सज्जन सेवते आए हैं, यानी वह किसी परम्परा में दाख़िल होना चाह रहा है। और तीसरी, वह उसे निगूढ़ कहता है, छिपी हुई, ऐसी नहीं जो सुनते ही हाथ आ जाए। माँग में यह विनम्रता पहले से मौजूद है, और शायद इसीलिए उत्तर इतनी जल्दी मिल जाता है।
दूसरा मन्त्र उत्तर है, और वह इतना छोटा है कि पहली बार में निकल जाता है। पितामह ने उससे कहा, “श्रद्धाभक्तिध्यानयोगादवैहि”, श्रद्धा, भक्ति और ध्यान के योग से इसे जानिए। बस इतना। कोई सूची नहीं, कोई क्रम गिनाकर नहीं। पर यह तीन शब्दों का क्रम अपने आप में एक सीढ़ी है। पहले श्रद्धा, यानी यह भरोसा कि जिस चीज़ की तलाश है वह है। फिर भक्ति, यानी उस चीज़ की ओर हृदय का झुक जाना। और तब ध्यान, यानी मन का उसी एक जगह ठहर जाना। तीनों में से कोई एक निकाल दीजिए तो बाक़ी दो भी लड़खड़ा जाते हैं।
एक और बात इस उत्तर में छिपी है। मूल में तीनों अलग अलग नहीं गिनाए गए, वे एक ही समास में बँधे हैं और उनके आगे एक शब्द है, योग। यानी ये तीन सीढ़ियाँ नहीं हैं जिन्हें एक एक कर चढ़कर पीछे छोड़ दिया जाए। ये एक ही जुए में जुते तीन बैल हैं, जो साथ चलते हैं। श्रद्धा के बिना भक्ति भावुकता रह जाती है, भक्ति के बिना ध्यान एक कसरत, और ध्यान के बिना श्रद्धा केवल एक राय। पितामह इन्हें साथ चलाने को कहते हैं, और आगे का सारा पाठ इसी जुड़ाव को खोलकर दिखाता है।
तीसरा मन्त्र तराज़ू का दूसरा पलड़ा रखता है, “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः”, न कर्म से, न सन्तान से, न धन से, कुछ लोगों ने त्याग से अमृतत्व पाया। और वह जो स्वर्ग से भी परे, गुहा में रखा हुआ चमकता है, उसी में यति प्रवेश करते हैं। यह पंक्ति सीधी है और कड़ी भी। यज्ञ, वंश और सम्पत्ति, तीनों उस समाज के सबसे ऊँचे लक्ष्य थे। यह उपनिषद् उन्हें बुरा नहीं कहता, बस उस दरवाज़े की चाबी नहीं मानता।
चौथा मन्त्र उन लोगों का चित्र देता है जो वहाँ पहुँचते हैं। वेदान्त के विज्ञान से जिनका अर्थ भली भाँति निश्चित हो चुका है, जो संन्यास के योग से यति हैं, जिनका सत्त्व शुद्ध है, वे सब अन्त समय में परम अमृत होकर पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं। यहाँ शुद्धसत्त्व शब्द ध्यान खींचता है। समझ का साफ़ होना और मन का साफ़ होना, इस उपनिषद् में ये दो अलग चीज़ें नहीं हैं।
सार: आश्वलायन सबसे ऊँची और सबसे छिपी हुई विद्या माँगता है, और पितामह तीन शब्दों में उत्तर दे देते हैं, श्रद्धा, भक्ति, ध्यान। साथ ही यह भी साफ़ कर दिया जाता है कि यह चीज़ कर्म, सन्तान या धन के रास्ते हाथ नहीं आती।
बैठने की विधि: जगह, देह, और गुरु को प्रणाम
पाँचवाँ मन्त्र वह जगह है जहाँ यह उपनिषद् सिद्धान्त छोड़कर हाथ पकड़ लेता है। “विविक्तदेशे च सुखासनस्थः शुचिः समग्रीवशिरः शरीरः”, एकान्त जगह में, सुख से बैठने की मुद्रा में, शुचि होकर, गरदन, सिर और शरीर एक सीध में सम रखते हुए। हर शब्द एक निर्देश है। विविक्त देश का अर्थ है ऐसी जगह जहाँ लोगों की आवाजाही न हो, जहाँ कोई हर पाँच मिनट में दरवाज़ा न खटखटाए। सुखासन का अर्थ है वह आसन जिसमें देर तक बैठा जा सके बिना पैर सुन्न हुए, यानी मुद्रा की कठिनाई यहाँ लक्ष्य नहीं है।
शुचि का अर्थ है नहाकर, साफ़ कपड़े में, उस हाल में जिसमें शरीर अपनी ओर ध्यान न खींचे। और समग्रीवशिर शरीर का अर्थ है गरदन और सिर को ऐसे रखना कि रीढ़ की सीध टूटे नहीं, ठुड्डी न तो छाती में धँसे, न ऊपर उठी रहे। यह छोटी सी बात बड़ा फ़र्क़ करती है। झुकी हुई गरदन के साथ मन नींद की ओर सरकता है और अकड़ी हुई गरदन के साथ वह बेचैनी की ओर।
उसी मन्त्र का दूसरा हिस्सा दो और काम बताता है, “सकलेन्द्रियाणि निरुध्य भक्त्या स्वगुरुं प्रणम्य”, सारी इन्द्रियों को रोककर, और भक्ति से अपने गुरु को प्रणाम करके। इन्द्रियों को रोकना यहाँ किसी हिंसा की तरह नहीं कहा गया। आँख बन्द हो जाए, कान जो आ रहा है उसे आने दे पर पीछे न भागे, जीभ चुप हो, हाथ पैर हिलना छोड़ दें। और उसके ठीक बाद गुरु को प्रणाम, वह भी भक्ति से। ध्यान से पहले यह प्रणाम रस्म नहीं है। वही वह क्षण है जहाँ अकड़ उतरती है, और अकड़ उतरे बिना भीतर कुछ खुलता नहीं। मन्त्र में एक और शब्द है, अत्याश्रमस्थ, यानी आश्रमों से आगे की उस स्थिति में टिका हुआ, जिसे परम्परा संन्यास के भी ऊपर की भूमि पढ़ती है।
मन्त्र के भीतर क्रम पर भी ध्यान जाना चाहिए। पहले जगह, फिर आसन, फिर शुचिता, फिर देह की सीध, फिर इन्द्रियों का सिमटना, और सबसे अन्त में गुरु को प्रणाम। यानी प्रणाम तब होता है जब आदमी बैठ चुका है, थम चुका है, और बाहर की सारी हलचल पीछे छोड़ चुका है। उस हाल में किया गया प्रणाम किसी और से ज़्यादा अपने आप से कहा जाता है, कि जो मिलने वाला है वह मेरी अपनी कमाई नहीं होगी। इस उपनिषद् में ध्यान की विधि यहीं से खुलती है, और इससे पहले एक भी बात भीतर की नहीं कही गई।
सार: एकान्त जगह, सुख से बैठा जा सकने वाला आसन, शुचि देह, और गरदन सिर तथा शरीर एक सीध में। फिर इन्द्रियों को भीतर समेट लेना, और भक्ति से अपने गुरु को प्रणाम। विधि यहीं से शुरू होती है, और शुरू ही झुककर होती है।
हृदय के कमल के बीच में, किस रूप का चिन्तन
अब छठा मन्त्र बताता है कि बैठकर करना क्या है। “हृत्पुण्डरीकं विरजं विशुद्धं विचिन्त्य मध्ये विशदं विशोकम्”, हृदय के उस कमल का चिन्तन कीजिए जो रज से रहित है और विशुद्ध है, और उसके ठीक बीच में उसका, जो निर्मल है और शोक से परे। ध्यान दीजिए कि पहले जगह बनती है, फिर उसमें रूप रखा जाता है। पहले हृदय का कमल, धूल से रहित, साफ़। और तब उस कमल के मध्य में वह जिसका चिन्तन करना है।
फिर विशेषणों की एक लड़ी आती है, और हर विशेषण मन को एक जगह से हटाकर दूसरी जगह ले जाता है। वह अचिन्त्य है, यानी सोचकर पकड़ में नहीं आता। अव्यक्त है, यानी इन्द्रियों के सामने प्रकट नहीं होता। अनन्तरूप है, यानी उसका कोई एक रूप गिनाया नहीं जा सकता। शिव है, प्रशान्त है, अमृत है, और ब्रह्मयोनि है, यानी वह जहाँ से ब्रह्म तक उपजता है। सातवें मन्त्र में लड़ी आगे बढ़ती है, आदि, मध्य और अन्त से रहित, एक, विभु, चिदानन्द, अरूप, अद्भुत।
और तब, ठीक इसी जगह, यह उपनिषद् एक ऐसा मोड़ लेता है जो इसे अपनी पहचान देता है। “उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम्”, उमा जिसकी सहचरी हैं, वह परमेश्वर, प्रभु, तीन नेत्रों वाला, नीलकण्ठ, प्रशान्त। अब तक जो विशेषण किसी रूप को हटाते जा रहे थे, वे अचानक एक रूप पर आकर बैठ जाते हैं। यह उपनिषद् इसमें कोई विरोध नहीं देखता। जिसका कोई रूप नहीं, ध्यान उसी का तब तक नहीं टिकता जब तक हृदय को कुछ थामने को न मिले, और यहाँ वह थामने की चीज़ शिव का शान्त रूप है।
उसी मन्त्र का अन्त बताता है कि इस ध्यान से होता क्या है। ऐसा ध्यान करके मुनि भूतयोनि तक पहुँच जाता है, उस तक जो सबका साक्षी है और अन्धकार से परे है। यानी रूप पर टिका ध्यान रूप पर ख़त्म नहीं होता। वह वहीं से आगे ले जाता है। यह बहुत काम की बात है उन लोगों के लिए जो सोचते हैं कि आकार वाला ध्यान निचली चीज़ है। यहाँ वही आकार दरवाज़ा बनकर खुलता है।
आठवाँ मन्त्र उस एक को हर नाम से मिला देता है, “स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट्”, वही ब्रह्मा है, वही शिव, वही इन्द्र सहित, वही अक्षर, परम, स्वयं प्रकाशित। और आगे, वही विष्णु है, वही प्राण, वही काल और अग्नि, वही चन्द्रमा। नवें मन्त्र में वही सब कुछ है जो हो चुका और जो होगा, सनातन, और उसे जानकर मनुष्य मृत्यु को लाँघ जाता है, मुक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग है ही नहीं।
दसवाँ मन्त्र ध्यान को एक और चाल देता है। अपने को सब भूतों में और सब भूतों को अपने में एक साथ देखते हुए, मनुष्य परम ब्रह्म तक जाता है, किसी और हेतु से नहीं। यह देखना दो तरफ़ चलता है, भीतर से बाहर और बाहर से भीतर, और दोनों एक ही बैठक में सधते हैं। ग्यारहवाँ मन्त्र वही अरणि वाला चित्र सामने रखता है जो श्वेताश्वतर में भी आता है, “आत्मानमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्”, आत्मा को नीचे की अरणि बनाइए और प्रणव को ऊपर की। फिर ज्ञान के निर्मथन के अभ्यास से पण्डित पाप को जला देता है।
सार: हृदय का कमल पहले साफ़ किया जाता है, फिर उसके बीच में वह रूप बिठाया जाता है जो अचिन्त्य भी है और उमासहाय नीलकण्ठ भी। ध्यान रूप पर टिकता है और रूप से आगे ले जाता है। और अन्त में आत्मा नीचे की अरणि, प्रणव ऊपर की, और अभ्यास वह रगड़ जिससे आग निकलती है।
तीन पुरियों में खेलता हुआ वही एक
बारहवें मन्त्र से उपनिषद् का सुर बदल जाता है। अब वह उस एक का पीछा करता है जो हमारी अपनी चौबीस घण्टे की आवाजाही में छिपा है। वही, माया से मोहित होकर, शरीर का सहारा लेकर सब कुछ करता है। जागते हुए वह स्त्री, अन्न, पान और ऐसे ही अनेक भोगों से तृप्ति पाता है। ध्यान दीजिए कि यह उपनिषद् जागरण को झूठा नहीं कहता, वह उसे उसी एक का एक हाल कहता है।
तेरहवाँ मन्त्र दो और हाल गिनाता है। स्वप्न में वही जीव सुख और दुख भोगता है, उस जीवलोक में जो उसकी अपनी माया से रचा गया है। और सुषुप्ति के समय, जब सब कुछ विलीन हो जाता है, वह तमस से ढँका हुआ सुख के रूप में रह जाता है। यह वही तीन अवस्थाओं का नक्शा है जिसे और उपनिषद् भी खींचते हैं, पर यहाँ उसका काम अलग है। यहाँ वह बताने के लिए है कि तीनों में जो बदलता है वह दृश्य है, और जो नहीं बदलता वही खोजना है।
चौदहवाँ मन्त्र सबसे सघन है। फिर से, दूसरे जन्मों के कर्मों के योग से, वही जीव सोता है और जागता है। जो जीव तीन पुरियों में खेलता है, उसी से यह सारा विचित्र फैलाव जन्मा। और वह आधार है, आनन्द है, अखण्ड बोध है, जिसमें ये तीनों पुरियाँ लय हो जाती हैं। तीन पुरियाँ वही तीन अवस्थाएँ हैं, जागरण, स्वप्न और सुषुप्ति, और खेलना शब्द इस उपनिषद् का अपना है। खिलाड़ी तीनों में जाता है और किसी में फँसता नहीं।
पन्द्रहवाँ मन्त्र उसी से सृष्टि निकाल देता है। इसी से प्राण जन्मता है, मन, सारी इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, ज्योति, जल, और सबको धारण करने वाली पृथ्वी। सोलहवाँ मन्त्र इस उपनिषद् का धुरी वाक्य है। जो परम ब्रह्म है, सबकी आत्मा है, विश्व का महान आयतन है, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है, नित्य है, “तत्त्वमेव त्वमेव तत्”, वही आप हैं, और आप ही वह हैं। दोनों तरफ़ से कहा गया है, इसलिए बचने की कोई जगह नहीं छोड़ी गई।
पन्द्रहवें मन्त्र की गिनती का क्रम भी बोलता है। पहले प्राण, फिर मन, फिर सारी इन्द्रियाँ, और तब जाकर आकाश, वायु, ज्योति, जल और पृथ्वी। भीतर वाला पहले, बाहर वाला बाद में, और सबसे ठोस चीज़ सबसे आख़िर में। जिस पृथ्वी को हम सबसे पहले सच मानते हैं, वह इस सूची में सबसे नीचे की सीढ़ी है। यह क्रम पढ़ने वाले की आदत को उलट देता है, और उसी उलटाव पर अगला मन्त्र अपनी सबसे बड़ी बात रख देता है।
सार: जागना, सपना और गहरी नींद, तीनों पुरियों में वही एक खेलता है, और तीनों उसी में लय हो जाती हैं। प्राण, मन, इन्द्रियाँ और पाँचों भूत उसी से निकलते हैं। और फिर वह वाक्य आता है जो दोनों तरफ़ से बाँध देता है, वही आप हैं, और आप ही वह हैं।
मैं ही सदाशिव हूँ: पहचान की घोषणा
सत्रहवें मन्त्र से आवाज़ बदल जाती है। अब तक कहा जा रहा था कि वह ऐसा है और वह वैसा है। अब बोलने वाला अपने ही मुँह से कहने लगता है। जो जागरण, स्वप्न और सुषुप्ति वाले इस सारे प्रपंच को प्रकाशित करता है, वही ब्रह्म मैं हूँ, ऐसा जानकर मनुष्य सब बन्धनों से छूट जाता है। यह वाक्य किसी दावे की तरह नहीं, एक पहचान की तरह रखा गया है, जैसे कोई अँधेरे में देर से टटोलकर आख़िर अपना ही हाथ पहचान ले।
अठारहवाँ मन्त्र उस पहचान को तीखा कर देता है। तीनों धामों में जो भोग्य है, जो भोक्ता है और जो भोग है, उन सबसे विलक्षण, साक्षी, “चिन्मात्रोऽहं सदाशिवः”, मैं केवल चित्मात्र हूँ, सदाशिव हूँ। यही वह जगह है जहाँ यह उपनिषद् अपना नाम कमाता है। कैवल्य का अर्थ है केवल हो जाना, अकेला बच जाना, इस मायने में कि जो जुड़ा हुआ था वह सब अलग हो गया और जो रह गया वह अपने आप में पूरा है। और यहाँ वह केवल बचा हुआ शिव कहकर पहचाना गया है।
उन्नीसवाँ मन्त्र इसी को फैलाता है। मुझमें ही सब जन्मा, मुझमें ही सब टिका हुआ है, मुझमें ही सब लय को जाता है, और वही अद्वय ब्रह्म मैं हूँ। बीसवाँ मन्त्र नापों से खेलता है। मैं अणु से भी सूक्ष्म हूँ और वैसे ही महान भी, मैं यह विश्व हूँ, मैं यह सारा विचित्र फैलाव हूँ। मैं पुरातन हूँ, मैं पुरुष हूँ, मैं ईश हूँ, मैं हिरण्मय हूँ, मैं शिवरूप हूँ। यह गिनती बढ़ती जाती है और हर क़दम पर एक और सीमा गिरती जाती है।
इक्कीसवाँ मन्त्र बहुत पुराना स्वर लौटाता है। मैं बिना हाथ पैर के हूँ, मेरी शक्ति अचिन्त्य है, बिना आँख के देखता हूँ, बिना कान के सुनता हूँ। मैं जानता हूँ, मेरा रूप सबसे अलग है, और मुझे जानने वाला कोई नहीं, क्योंकि मैं सदा चित् हूँ। बाईसवाँ मन्त्र कहता है कि अनेक वेदों से जो जानने योग्य है वह मैं ही हूँ, वेदान्त का कर्ता भी मैं और वेद को जानने वाला भी मैं।
तेईसवाँ मन्त्र सब कुछ हटा देता है। मेरे लिए पुण्य और पाप नहीं हैं, मेरा नाश नहीं, जन्म नहीं, देह, इन्द्रिय और बुद्धि नहीं। न मेरी पृथ्वी है, न जल, न अग्नि, न वायु, न आकाश। और चौबीसवाँ मन्त्र पहले खण्ड को बन्द करता है। इस तरह उस परमात्मरूप को जानकर, जो गुहा में सोया है, निष्कल है, अद्वितीय है, सबका साक्षी है, और सत् तथा असत् दोनों से परे है, मनुष्य उसी शुद्ध परमात्मरूप को प्राप्त हो जाता है।
सार: यहाँ उपनिषद् तीसरे पुरुष से पहले पुरुष में उतर आता है। भोक्ता, भोग और भोग्य, तीनों से अलग वह साक्षी अपने को चित्मात्र और सदाशिव कहकर पहचानता है। पुण्य, पाप, जन्म, देह और पाँचों भूत, सब एक एक कर हटा दिए जाते हैं, और जो बचता है वही कैवल्य है।
शतरुद्रिय, अविमुक्त, और कैवल्य पद
दूसरा खण्ड केवल दो मन्त्रों का है और वह पहले खण्ड से बिलकुल अलग ढंग से बोलता है। यहाँ छन्द नहीं है, गद्य है, और विषय है शतरुद्रिय का पाठ। जो शतरुद्रिय पढ़ता है, वह अग्नि से पवित्र होता है, वायु से पवित्र होता है, आत्मा से पवित्र होता है। फिर गिनती उन चीज़ों की आती है जिन्हें उस समाज ने सबसे भारी माना था, और कहा जाता है कि वह उन सबसे भी शुद्ध हो जाता है।
यह अंश कड़ा लगता है और इसे ठीक से पढ़ना ज़रूरी है। यहाँ किसी को अपराध करने की छूट नहीं दी जा रही। यह वेद की उस पुरानी शैली में कहा गया है जिसमें किसी पाठ की सामर्थ्य बताने के लिए सबसे भारी बोझ का नाम लिया जाता है, यह दिखाने को कि वह बोझ भी हल्का हो सकता है। और शतरुद्रिय कोई मामूली पाठ नहीं है, वह यजुर्वेद का वह अध्याय है जिसमें रुद्र को सैकड़ों नामों से पुकारा जाता है, हर दिशा में, हर पेशे में, हर चीज़ में।
उसी मन्त्र का अन्त कहता है कि इसलिए वह अविमुक्त का आश्रय लिए हुए हो जाता है, और आश्रमी को सदा, या कम से कम एक बार, इसका जप करना चाहिए। अविमुक्त शब्द दो तरह से पढ़ा जाता रहा है। एक परिपाटी उसे काशी का वह नाम मानती है जिसे शिव ने कभी नहीं छोड़ा। दूसरी उसे देह के भीतर भौंहों के बीच का वह स्थान पढ़ती है जिसे साधक कभी नहीं छोड़ता। दोनों पाठ एक ही बात कहते हैं, कि कोई एक जगह है जहाँ से हटना नहीं है।
यह भी ध्यान देने लायक़ है कि पूरा पहला खण्ड ध्यान और पहचान की बात करता है, और दूसरा खण्ड अचानक जप की बात करने लगता है। इसमें कोई उलटफेर नहीं है। बैठकर ध्यान करना हर घड़ी सम्भव नहीं होता, और यह उपनिषद् उस आदमी को ख़ाली हाथ नहीं छोड़ता जिसके पास वह घड़ी नहीं है। उसके लिए एक पाठ है, जिसे सदा किया जा सकता है, और न हो सके तो एक बार। बड़ी विधि और छोटी विधि, दोनों एक ही पाठ में रख दी गई हैं।
छब्बीसवाँ मन्त्र सब समेट देता है। इससे वह ज्ञान मिलता है जो संसार के समुद्र को ही सुखा देता है। इसलिए इसे इस तरह जानकर मनुष्य कैवल्य पद को पा जाता है। और उपनिषद् अपनी आख़िरी बात दोहराकर बन्द होता है, “कैवल्यं पदमश्नुते”, वह कैवल्य पद को पा लेता है। यह दोहराव संयोग नहीं है। उपनिषदों में अन्त का दोहराया जाना यह बताता है कि पाठ यहीं पूरा होता है, आगे कुछ जोड़ना नहीं है।
सार: दूसरा खण्ड शतरुद्रिय के पाठ की सामर्थ्य बताता है और साधक को अविमुक्त में टिका हुआ कहता है, चाहे उसे काशी पढ़िए या भौंहों के बीच का स्थान। अन्त में वही शब्द दोहराया जाता है जिस पर पूरे पाठ का नाम खड़ा है, कैवल्य पद।
और अन्त में, अपनी ओर
इस उपनिषद् की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे आज शाम आज़माया जा सकता है। एक कमरा जहाँ आधे घण्टे कोई न आए। एक आसन जिस पर बैठकर पैर सुन्न न हों। नहाकर, साफ़ कपड़े में। गरदन, सिर और रीढ़ एक सीध में, ठुड्डी न धँसी हुई, न उठी हुई। आँखें बन्द, हाथ स्थिर, कान जो सुन रहे हैं उसके पीछे न भागें। और बैठते ही, कुछ भी शुरू करने से पहले, अपने गुरु को मन में प्रणाम। यह क्रम इस उपनिषद् का दिया हुआ है और इसमें एक भी क़दम सजावट के लिए नहीं है।
फिर भीतर की ओर। पहले हृदय के कमल को देखिए, धूल से साफ़, निर्मल। कोई चित्र गढ़ने की ज़रूरत नहीं, बस छाती के बीच उस जगह पर मन को बिठा दीजिए जहाँ साँस की हलचल महसूस होती है। और उस कमल के बीच में उसे रखिए जो शान्त है, जिसका कण्ठ नीला है, जिसकी तीन आँखें हैं, जिसके साथ उमा हैं। जब मन भटके तो वापस उसी बीच में। यह उपनिषद् यह वादा नहीं करता कि पहली बार में कुछ चमक उठेगा। वह केवल यह कहता है कि जो मुनि इस तरह ध्यान करता है, वह उस तक पहुँच जाता है जो सबका साक्षी है।
और तीसरी बात उस वाक्य की है जो इस पूरे पाठ की जड़ है। दिन में कई बार हम अपने को किसी हाल से जोड़ लेते हैं, यह मूड, यह थकान, यह अपमान, यह ख़ुशी। कैवल्य उपनिषद् एक छोटी सी आदत सिखाता है, उस हाल के बीच में रुककर यह देख लेना कि जो भोग रहा है और जो भोगा जा रहा है, दोनों बदल रहे हैं, और जो इन दोनों को देख रहा है वह वहीं का वहीं है। बार बार यही देखने से एक दिन वह वाक्य पढ़ा हुआ नहीं, पहचाना हुआ हो जाता है, कि वही आप हैं, और आप ही वह हैं।
आधार: कैवल्य उपनिषद्, मन्त्र 1 से 26, खण्ड 1 और 2; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया। इस उपनिषद् पर शंकराचार्य का कोई भाष्य नहीं है, इसलिए यहाँ कोई भाष्य-संकेत नहीं दिया गया। वेद-सम्बन्ध पर संस्करण एकमत नहीं हैं: मुक्तिका-सूची इसे कृष्ण यजुर्वेद के साथ रखती है और जो शान्तिपाठ यह अपने साथ लाता है वही कृष्ण यजुर्वेद वाला “सह नाववतु” है, पर इसी पाठ की पुष्पिका इसे “इत्यथर्ववेदीया कैवल्योपनिषत्” कहकर अथर्ववेद से जोड़ती है।