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कैवल्य उपनिषद्

एक शिष्य, जिसका नाम आश्वलायन है, सृष्टि के पितामह ब्रह्मा (सबसे पहले रचयिता, जिन्हें परमेष्ठी भी कहते हैं) के पास पहुँचता है, विनम्र, हाथ जोड़े, और एक ही याचना करता है। वह कहता है, हे भगवन्, मुझे वह ब्रह्मविद्या सिखाइए जो सबसे श्रेष्ठ है, जिसे सदा सज्जन सेवते आए हैं, जो सबसे गहरी और सबसे गुप्त है, और जिसे पाकर ज्ञानी शीघ्र ही सारे पाप धोकर उस परम पुरुष तक पहुँच जाता है। इसी नम्र प्रश्न से कैवल्य उपनिषद् खुलता है।

इस उपनिषद् का मिज़ाज

कैवल्य का अर्थ है अकेलापन, पर यह अकेलापन उदासी वाला नहीं। यह वह अवस्था है जहाँ पहुँचकर आत्मा किसी और के सहारे की मोहताज नहीं रहती, जहाँ दूसरा कुछ बचता ही नहीं, केवल वही एक रह जाता है, इसीलिए कैवल्य को मुक्ति का ही दूसरा नाम कहा गया है। यह छोटा-सा उपनिषद् उसी अकेली, पूर्ण अवस्था तक ले जाने का नक़्शा है, और उसका पूरा भरोसा ध्यान पर टिका है, उस महेश्वर के ध्यान पर जिन्हें यह उमासहाय, यानी उमा के साथ विराजने वाले शिव, कहकर पुकारता है।

ब्रह्मा का उत्तर, चार सीढ़ियाँ

ब्रह्मा शिष्य को दुत्कारते नहीं। वे कोमलता से रास्ता खोलते हैं और कहते हैं कि उस परम को श्रद्धा, भक्ति, ध्यान और योग के सहारे जानिए। फिर वे एक ऐसी बात कहते हैं जो सुनने में कठोर लगती है पर है सीधी-सच्ची।

न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।

अर्थात्, न ढेर सारे कर्मों से, न सन्तान से, न धन के अम्बार से कोई अमर हुआ है; अमरता तो कुछ विरलों ने केवल त्याग के बल पर पाई। यह त्याग बाहर की चीज़ें फेंक देना भर नहीं है, यह भीतर की उस पकड़ को ढीला करना है जिससे हम हर चीज़ को अपना मानकर जकड़े रहते हैं। ब्रह्मा बताते हैं कि यह परम तत्त्व स्वर्ग से भी परे, हृदय की गुहा (भीतर की गहरी कन्दरा) में छिपकर चमकता है, और वही संयमी साधक इसमें प्रवेश पाते हैं जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को साध लिया है।

हृदय-कमल में उमासहाय का ध्यान

अब यह उपनिषद् ठीक-ठीक बताता है कि बैठकर करना क्या है। कहता है, किसी एकान्त जगह में सुख से बैठिए, शरीर, गरदन और सिर को सीधा रखिए, मन को शान्त कीजिए, सारी इन्द्रियों को समेटिए, और भक्ति से अपने गुरु को प्रणाम करके भीतर मुड़िए। फिर अपने हृदय-कमल के बीच, जो निर्मल और शोक-रहित है, उस एक का ध्यान कीजिए जो अचिन्त्य है, अव्यक्त है, जिसके रूप अनन्त हैं, जो शिव है, परम शान्त है, अमर है।

उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम्।

आदि, मध्य और अन्त से रहित, सब जगह व्यापे हुए, चित् और आनन्द के रूप, उमा के साथ विराजने वाले उस परमेश्वर का, तीन नेत्रों वाले, नीलकण्ठ, परम शान्त प्रभु का जो साधक ध्यान करता है, वह सब भूतों के मूल तक, सबके साक्षी तक, अन्धकार के पार बैठी उस सत्ता तक पहुँच जाता है।

वही एक, सबका रूप

फिर यह उपनिषद् एक साँस में सारे नामों को एक कर देता है। कहता है, वही ब्रह्मा है, वही शिव, वही इन्द्र, वही अविनाशी परम, अपने ही तेज से चमकता हुआ। वही विष्णु है, वही प्राण, वही काल, वही अग्नि, वही चन्द्रमा। जो बीत चुका और जो आगे आएगा, वह सब वही एक सनातन सत्ता है। और इसी मोड़ पर वह पंक्ति आती है जो श्वेताश्वतर की पुकार से जा मिलती है।

ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति नान्यः पन्था विमुक्तये।

उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु को लाँघ जाता है; मुक्ति के लिए इसके सिवा दूसरा कोई रास्ता है ही नहीं।

तीन नगरों का खेल

पर हम उस एक को भूलकर अनेक में क्यों भटकते हैं? यह उपनिषद् इसका उत्तर हमारी अपनी रोज़ की तीन दशाओं से देता है। जागते हुए हम बाहर के जगत में सुख-दुख भोगते हैं। सपने में वही जीव अपनी ही माया से रचे हुए एक भीतरी संसार में घूमता है, वहाँ भी हँसता और रोता है। और गहरी नींद में, जब सब कुछ शान्त होकर समा जाता है, वह एक आनन्द-सी दशा में लौट जाता है। इन्हीं तीन नगरों में, यानी जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति में, वह जीव खेलता रहता है, और इन्हीं तीनों के फेर से यह सारा रंग-बिरंगा जगत उठता दिखता है। यह उपनिषद् कहता है कि जो इन तीनों दशाओं का साक्षी है, जो इन तीनों में रहकर भी इनसे अछूता है, वही हमारा असली रूप है।

मय्येव सकलं जातम्, मैं ही सब हूँ

और अब यह उपनिषद् अपने सबसे ऊँचे स्वर पर पहुँचता है। यहाँ साधक की वाणी बदल जाती है, वह अब बाहर किसी दूर बैठे ईश्वर की बात नहीं करता, वह भीतर से बोल उठता है।

मय्येव सकलं जातं मयि सर्वं प्रतिष्ठितम्। मयि सर्वं लयं याति तद्ब्रह्माद्वयमस्म्यहम्॥

अर्थात्, यह सब कुछ मुझमें ही जन्मा, सब कुछ मुझमें ही टिका है, और सब कुछ अन्त में मुझमें ही लीन हो जाता है; वही अद्वय (जिसके समान दूसरा नहीं) ब्रह्म मैं ही हूँ। साधक आगे कहता है कि मैं ही अणु से भी सूक्ष्म हूँ और सबसे विराट भी, मैं ही यह सारा विचित्र विश्व हूँ, मैं ही वह पुरातन पुरुष हूँ, मैं ही ईश हूँ, और शिव का रूप भी मैं ही हूँ।

यह उपनिषद् इस अनुभव को और खोलता है। साधक कहता है कि मेरे न हाथ हैं न पैर, फिर भी मेरी शक्ति की कोई थाह नहीं; मैं बिना आँख के देखता हूँ और बिना कान के सुनता हूँ, क्योंकि मैं ही वह चेतना हूँ जिसके सहारे आँख देखती और कान सुनते हैं। और वह जोड़ता है कि सारे अनेक वेद जिसे जानने का यत्न करते हैं, वह भी मैं ही हूँ। यह अहंकार का फूलना नहीं है, यह ठीक उलटा है। यह तो वह क्षण है जब वह छोटा-सा मैं, जो अब तक अपने को देह और मन तक सीमित मान बैठा था, गिर जाता है, और बूँद यह पहचान लेती है कि वह सागर से अलग कभी थी ही नहीं।

और अन्त में, कैवल्य

तो कैवल्य उपनिषद् हमें एक पूरी यात्रा पर ले जाता है। आरम्भ में एक शिष्य हाथ जोड़े ब्रह्मविद्या माँगता है। बीच में उसे बैठना सिखाया जाता है, हृदय-कमल में उमासहाय शिव का ध्यान करना सिखाया जाता है। और अन्त में वह इस पहचान पर आ ठहरता है कि जिसे वह बाहर ढूँढ रहा था, वह उसके अपने ही भीतर, उसके अपने ही रूप में सदा से बैठा था। यही कैवल्य है, वह अकेली पूर्णता जहाँ पहुँचकर दूसरा कुछ पाने को बचता ही नहीं। यह उपनिषद् कहता है कि जो इस विद्या को श्रद्धा से पढ़ता और गुनता है, उसके भीतर के बड़े-से-बड़े मैल भी धुल जाते हैं, और वह उसी कैवल्य-पद को पा जाता है। जिस दिन आपके भीतर यह भाव ठहर जाए कि जो सबका साक्षी है वही मैं हूँ, उसी दिन सारी भागदौड़ थम जाती है, और जो शान्ति बचती है, वही मुक्ति है।

आधार: कैवल्य उपनिषद्।