अंग
260
राग Gauree
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ਸਲੋਕੁ ॥
ਹਉ ਹਉ ਕਰਤ ਬਿਹਾਨੀਆ ਸਾਕਤ ਮੁਗਧ ਅਜਾਨ ॥
ੜੜਕਿ ਮੁਏ ਜਿਉ ਤ੍ਰਿਖਾਵੰਤ ਨਾਨਕ ਕਿਰਤਿ ਕਮਾਨ ॥੧॥
ਹਉ ਹਉ ਕਰਤ ਬਿਹਾਨੀਆ ਸਾਕਤ ਮੁਗਧ ਅਜਾਨ ॥
ੜੜਕਿ ਮੁਏ ਜਿਉ ਤ੍ਰਿਖਾਵੰਤ ਨਾਨਕ ਕਿਰਤਿ ਕਮਾਨ ॥੧॥
सलोकु ॥
हउ हउ करत बिहानीआ साकत मुगध अजान ॥
ड़ड़कि मुए जिउ त्रिखावंत नानक किरति कमान ॥१॥
हउ हउ करत बिहानीआ साकत मुगध अजान ॥
ड़ड़कि मुए जिउ त्रिखावंत नानक किरति कमान ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ माया-ग्रसित मूर्ख बेसमझ मनुष्यों की उम्र इसी बहाव में बीत जाती है कि मैं बड़ा होऊँ। हे नानक ! अहंकार के आसरे किए गलत कामों (के संस्कारों) के कारण। अहंकार का काँटा चुभ-चुभ के ही उनकी आत्मिक मौत हो जाती है। जैसे कोई प्यासा (पानी के बगैर मरता है। वे आत्मिक सुख के बगैर तड़फते हैं)। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ੜਾੜਾ ੜਾੜਿ ਮਿਟੈ ਸੰਗਿ ਸਾਧੂ ॥
ਕਰਮ ਧਰਮ ਤਤੁ ਨਾਮ ਅਰਾਧੂ ॥
ਰੂੜੋ ਜਿਹ ਬਸਿਓ ਰਿਦ ਮਾਹੀ ॥
ਉਆ ਕੀ ੜਾੜਿ ਮਿਟਤ ਬਿਨਸਾਹੀ ॥
ੜਾੜਿ ਕਰਤ ਸਾਕਤ ਗਾਵਾਰਾ ॥
ਜੇਹ ਹੀਐ ਅਹੰਬੁਧਿ ਬਿਕਾਰਾ ॥
ੜਾੜਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ੜਾੜਿ ਮਿਟਾਈ ॥ ਨਿਮਖ ਮਾਹਿ ਨਾਨਕ ਸਮਝਾਈ ॥੪੭॥
ੜਾੜਾ ੜਾੜਿ ਮਿਟੈ ਸੰਗਿ ਸਾਧੂ ॥
ਕਰਮ ਧਰਮ ਤਤੁ ਨਾਮ ਅਰਾਧੂ ॥
ਰੂੜੋ ਜਿਹ ਬਸਿਓ ਰਿਦ ਮਾਹੀ ॥
ਉਆ ਕੀ ੜਾੜਿ ਮਿਟਤ ਬਿਨਸਾਹੀ ॥
ੜਾੜਿ ਕਰਤ ਸਾਕਤ ਗਾਵਾਰਾ ॥
ਜੇਹ ਹੀਐ ਅਹੰਬੁਧਿ ਬਿਕਾਰਾ ॥
ੜਾੜਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ੜਾੜਿ ਮਿਟਾਈ ॥ ਨਿਮਖ ਮਾਹਿ ਨਾਨਕ ਸਮਝਾਈ ॥੪੭॥
पउड़ी ॥
ड़ाड़ा ड़ाड़ि मिटै संगि साधू ॥
करम धरम ततु नाम अराधू ॥
रूड़ो जिह बसिओ रिद माही ॥
उआ की ड़ाड़ि मिटत बिनसाही ॥
ड़ाड़ि करत साकत गावारा ॥
जेह हीऐ अहंबुधि बिकारा ॥
ड़ाड़ा गुरमुखि ड़ाड़ि मिटाई ॥ निमख माहि नानक समझाई ॥४७॥
ड़ाड़ा ड़ाड़ि मिटै संगि साधू ॥
करम धरम ततु नाम अराधू ॥
रूड़ो जिह बसिओ रिद माही ॥
उआ की ड़ाड़ि मिटत बिनसाही ॥
ड़ाड़ि करत साकत गावारा ॥
जेह हीऐ अहंबुधि बिकारा ॥
ड़ाड़ा गुरमुखि ड़ाड़ि मिटाई ॥ निमख माहि नानक समझाई ॥४७॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (मनुष्य के अंदर अहंकार के काँटे की) चुभन गुरू की संगति में ही मिटती है (क्योंकि संगत में प्रभू का नाम मिलता है और) हरी-नाम का सिमरन सारे धार्मिक कर्मों का निचोड़ है। जिस मनुष्य के हृदय में सुंदर प्रभू आ बसे। उसके अंदर से अहंकार के काँटे की चुभन अवश्य नाश हो जाती है। मिट जाती है। ये अहंकार वाली चुभन (रड़क अपने अंदर) वही मूर्ख माया-ग्रसित लोग अपने अंदर कायम रखते हैं। जिनके हृदय में अहंकार वाली बुद्धि से उपजी बुराई टिकी रहती है। (पर) हे नानक ! जिन्होंने गुरू की शरण पड़ कर अहंकार वाली चुभन दूर कर ली। उन्हें गुरू आँख की एक झपक में ही आत्मिक आनंद की झलक दिखा देता है। 47।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਸਾਧੂ ਕੀ ਮਨ ਓਟ ਗਹੁ ਉਕਤਿ ਸਿਆਨਪ ਤਿਆਗੁ ॥
ਗੁਰ ਦੀਖਿਆ ਜਿਹ ਮਨਿ ਬਸੈ ਨਾਨਕ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ॥੧॥
ਸਾਧੂ ਕੀ ਮਨ ਓਟ ਗਹੁ ਉਕਤਿ ਸਿਆਨਪ ਤਿਆਗੁ ॥
ਗੁਰ ਦੀਖਿਆ ਜਿਹ ਮਨਿ ਬਸੈ ਨਾਨਕ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ॥੧॥
सलोकु ॥
साधू की मन ओट गहु उकति सिआनप तिआगु ॥
गुर दीखिआ जिह मनि बसै नानक मसतकि भागु ॥१॥
साधू की मन ओट गहु उकति सिआनप तिआगु ॥
गुर दीखिआ जिह मनि बसै नानक मसतकि भागु ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे मन ! (अगर अहंकार की चुभन से बचना है। तो) गुरू का आसरा ले। अपनी दलीलबाजियां और समझदारियां छोड़। हे नानक ! जिस मनुष्य के मन में गुरू की शिक्षा बस जाती है। उसके माथे पर अच्छे लेख (उघड़े समझो)। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਸਸਾ ਸਰਨਿ ਪਰੇ ਅਬ ਹਾਰੇ ॥ ਸਾਸਤ੍ਰ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਬੇਦ ਪੂਕਾਰੇ ॥
ਸੋਧਤ ਸੋਧਤ ਸੋਧਿ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਨਹੀ ਛੁਟਕਾਰਾ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਹਮ ਭੂਲਨਹਾਰੇ ॥
ਤੁਮ ਸਮਰਥ ਅਗਨਤ ਅਪਾਰੇ ॥
ਸਰਨਿ ਪਰੇ ਕੀ ਰਾਖੁ ਦਇਆਲਾ ॥
ਨਾਨਕ ਤੁਮਰੇ ਬਾਲ ਗੁਪਾਲਾ ॥੪੮॥
ਸਸਾ ਸਰਨਿ ਪਰੇ ਅਬ ਹਾਰੇ ॥ ਸਾਸਤ੍ਰ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਬੇਦ ਪੂਕਾਰੇ ॥
ਸੋਧਤ ਸੋਧਤ ਸੋਧਿ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਨਹੀ ਛੁਟਕਾਰਾ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਹਮ ਭੂਲਨਹਾਰੇ ॥
ਤੁਮ ਸਮਰਥ ਅਗਨਤ ਅਪਾਰੇ ॥
ਸਰਨਿ ਪਰੇ ਕੀ ਰਾਖੁ ਦਇਆਲਾ ॥
ਨਾਨਕ ਤੁਮਰੇ ਬਾਲ ਗੁਪਾਲਾ ॥੪੮॥
पउड़ी ॥
ससा सरनि परे अब हारे ॥ सासत्र सिम्रिति बेद पूकारे ॥
सोधत सोधत सोधि बीचारा ॥
बिनु हरि भजन नही छुटकारा ॥
सासि सासि हम भूलनहारे ॥
तुम समरथ अगनत अपारे ॥
सरनि परे की राखु दइआला ॥
नानक तुमरे बाल गुपाला ॥४८॥
ससा सरनि परे अब हारे ॥ सासत्र सिम्रिति बेद पूकारे ॥
सोधत सोधत सोधि बीचारा ॥
बिनु हरि भजन नही छुटकारा ॥
सासि सासि हम भूलनहारे ॥
तुम समरथ अगनत अपारे ॥
सरनि परे की राखु दइआला ॥
नानक तुमरे बाल गुपाला ॥४८॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- अब हार के तेरी शरण पड़े हैं। (पंडित लोग) स्मृतियों-शास्त्रों। वेद (आदि धर्म पुस्तकें) ऊँची ऊँची पढ़ते हैं। पर बहुत विचार विचार के इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि हरी नाम के सिमरन के बिना (अहंकार की चुभन से) छुटकारा नहीं हो सकता। हे गोपाल ! हम जीव हर सांस के साथ भूलें करते हैं। तू हमारी भूलों को बख्शने योग्य है। तेरे गुण गिने नहीं जा सकते। तेरे गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। हे दयालु ! शरण पड़े की लाज रख (और हमें अहंकार के काँटे की चुभन से बचाए रख)। हे नानक ! (प्रभू के आगे अरदास कर। और कह,) हे गोपाल ! हम तेरे बच्चे हैं। 48।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਖੁਦੀ ਮਿਟੀ ਤਬ ਸੁਖ ਭਏ ਮਨ ਤਨ ਭਏ ਅਰੋਗ ॥
ਨਾਨਕ ਦ੍ਰਿਸਟੀ ਆਇਆ ਉਸਤਤਿ ਕਰਨੈ ਜੋਗੁ ॥੧॥
ਖੁਦੀ ਮਿਟੀ ਤਬ ਸੁਖ ਭਏ ਮਨ ਤਨ ਭਏ ਅਰੋਗ ॥
ਨਾਨਕ ਦ੍ਰਿਸਟੀ ਆਇਆ ਉਸਤਤਿ ਕਰਨੈ ਜੋਗੁ ॥੧॥
सलोकु ॥
खुदी मिटी तब सुख भए मन तन भए अरोग ॥
नानक द्रिसटी आइआ उसतति करनै जोगु ॥१॥
खुदी मिटी तब सुख भए मन तन भए अरोग ॥
नानक द्रिसटी आइआ उसतति करनै जोगु ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ जब मनुष्य का अहंकार दूर हो जाता है। तब इसे आत्मिक आनंद मिलता है (जिसकी बरकति से) इसके मन और तन पुल्कित (नरोए) हो जाते हैं। हे नानक ! (अहंकार के मिटते ही) मनुष्य को वह परमात्मा हर जगह दिखने लगता है। जो वाकई सिफत-सलाह का हकदार है। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਖਖਾ ਖਰਾ ਸਰਾਹਉ ਤਾਹੂ ॥
ਜੋ ਖਿਨ ਮਹਿ ਊਨੇ ਸੁਭਰ ਭਰਾਹੂ ॥
ਖਰਾ ਨਿਮਾਨਾ ਹੋਤ ਪਰਾਨੀ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਜਾਪੈ ਪ੍ਰਭ ਨਿਰਬਾਨੀ ॥
ਭਾਵੈ ਖਸਮ ਤ ਉਆ ਸੁਖੁ ਦੇਤਾ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਐਸੋ ਆਗਨਤਾ ॥
ਅਸੰਖ ਖਤੇ ਖਿਨ ਬਖਸਨਹਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਸਦਾ ਦਇਆਰਾ ॥੪੯॥
ਖਖਾ ਖਰਾ ਸਰਾਹਉ ਤਾਹੂ ॥
ਜੋ ਖਿਨ ਮਹਿ ਊਨੇ ਸੁਭਰ ਭਰਾਹੂ ॥
ਖਰਾ ਨਿਮਾਨਾ ਹੋਤ ਪਰਾਨੀ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਜਾਪੈ ਪ੍ਰਭ ਨਿਰਬਾਨੀ ॥
ਭਾਵੈ ਖਸਮ ਤ ਉਆ ਸੁਖੁ ਦੇਤਾ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਐਸੋ ਆਗਨਤਾ ॥
ਅਸੰਖ ਖਤੇ ਖਿਨ ਬਖਸਨਹਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਸਦਾ ਦਇਆਰਾ ॥੪੯॥
पउड़ी ॥
खखा खरा सराहउ ताहू ॥
जो खिन महि ऊने सुभर भराहू ॥
खरा निमाना होत परानी ॥
अनदिनु जापै प्रभ निरबानी ॥
भावै खसम त उआ सुखु देता ॥
पारब्रहमु ऐसो आगनता ॥
असंख खते खिन बखसनहारा ॥
नानक साहिब सदा दइआरा ॥४९॥
खखा खरा सराहउ ताहू ॥
जो खिन महि ऊने सुभर भराहू ॥
खरा निमाना होत परानी ॥
अनदिनु जापै प्रभ निरबानी ॥
भावै खसम त उआ सुखु देता ॥
पारब्रहमु ऐसो आगनता ॥
असंख खते खिन बखसनहारा ॥
नानक साहिब सदा दइआरा ॥४९॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- मैं उस प्रभू की सिफत सालाह मन लगा के करता हूँ। जो एक छिन में उन (हृदयों) को (भले गुणों से) लबालब भर देता है। जो पहले (गुणों से) वंचित थे। (खुदी मिटा के जब) आदमी अच्छी तरह निर-अहंकार हो जाता है तो हर वक्त वासना-रहित परमात्मा को सिमरता है। (इस तरह) पति प्रभू को प्यारा लगने लगता है। प्रभू उसे आत्मिक सुख बख्शता है। हे नानक ! पारब्रहम बड़ा बेअंत है (बेपरवाह है)। मालिक प्रभू सदा ही दया करने वाला है। वह जीवों के अनगिनत पाप छण मात्र में बख्श देता है। 49।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਸਤਿ ਕਹਉ ਸੁਨਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਸਰਨਿ ਪਰਹੁ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਉਕਤਿ ਸਿਆਨਪ ਸਗਲ ਤਿਆਗਿ ਨਾਨਕ ਲਏ ਸਮਾਇ ॥੧॥
ਸਤਿ ਕਹਉ ਸੁਨਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਸਰਨਿ ਪਰਹੁ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਉਕਤਿ ਸਿਆਨਪ ਸਗਲ ਤਿਆਗਿ ਨਾਨਕ ਲਏ ਸਮਾਇ ॥੧॥
सलोकु ॥
सति कहउ सुनि मन मेरे सरनि परहु हरि राइ ॥
उकति सिआनप सगल तिआगि नानक लए समाइ ॥१॥
सति कहउ सुनि मन मेरे सरनि परहु हरि राइ ॥
उकति सिआनप सगल तिआगि नानक लए समाइ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे मेरे मन ! मैं तुझे सच्ची बात बताता हूँ। (इसे) सुन। परमात्मा की शरण पड़। हे नानक ! सारी ही दलीलबाजियां व समझदारियां छोड़ दे। (सरल स्वभाव हो के आसरा लेगा तो) प्रभू तुझे अपने चरणों में जोड़ लेगा। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਸਸਾ ਸਿਆਨਪ ਛਾਡੁ ਇਆਨਾ ॥
ਹਿਕਮਤਿ ਹੁਕਮਿ ਨ ਪ੍ਰਭੁ ਪਤੀਆਨਾ ॥
ਸਹਸ ਭਾਤਿ ਕਰਹਿ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਸੰਗਿ ਤੁਹਾਰੈ ਏਕ ਨ ਜਾਈ ॥
ਸੋਊ ਸੋਊ ਜਪਿ ਦਿਨ ਰਾਤੀ ॥
ਰੇ ਜੀਅ ਚਲੈ ਤੁਹਾਰੈ ਸਾਥੀ ॥
ਸਾਧ ਸੇਵਾ ਲਾਵੈ ਜਿਹ ਆਪੈ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕਉ ਦੂਖੁ ਨ ਬਿਆਪੈ ॥੫੦॥
ਸਸਾ ਸਿਆਨਪ ਛਾਡੁ ਇਆਨਾ ॥
ਹਿਕਮਤਿ ਹੁਕਮਿ ਨ ਪ੍ਰਭੁ ਪਤੀਆਨਾ ॥
ਸਹਸ ਭਾਤਿ ਕਰਹਿ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਸੰਗਿ ਤੁਹਾਰੈ ਏਕ ਨ ਜਾਈ ॥
ਸੋਊ ਸੋਊ ਜਪਿ ਦਿਨ ਰਾਤੀ ॥
ਰੇ ਜੀਅ ਚਲੈ ਤੁਹਾਰੈ ਸਾਥੀ ॥
ਸਾਧ ਸੇਵਾ ਲਾਵੈ ਜਿਹ ਆਪੈ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕਉ ਦੂਖੁ ਨ ਬਿਆਪੈ ॥੫੦॥
पउड़ी ॥
ससा सिआनप छाडु इआना ॥
हिकमति हुकमि न प्रभु पतीआना ॥
सहस भाति करहि चतुराई ॥
संगि तुहारै एक न जाई ॥
सोऊ सोऊ जपि दिन राती ॥
रे जीअ चलै तुहारै साथी ॥
साध सेवा लावै जिह आपै ॥
नानक ता कउ दूखु न बिआपै ॥५०॥
ससा सिआनप छाडु इआना ॥
हिकमति हुकमि न प्रभु पतीआना ॥
सहस भाति करहि चतुराई ॥
संगि तुहारै एक न जाई ॥
सोऊ सोऊ जपि दिन राती ॥
रे जीअ चलै तुहारै साथी ॥
साध सेवा लावै जिह आपै ॥
नानक ता कउ दूखु न बिआपै ॥५०॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- हे मेरे अंजान मन ! चालाकियां छोड़। परमात्मा चालाकियों से व हुकम करने से (भाव। अकड़ दिखाने से) खुश नहीं होता। अगर तू हजारों किस्मों की चालाकियां भी करेगा। एक चालाकी भी तेरी मदद नहीं कर सकेगी (प्रभू की हजूरी में तेरे साथ नहीं जाएगी। मानी नहीं जा सकेगी)। हे मेरी जिंदे ! बस ! उस प्रभू को ही दिन-रात याद करती रह। प्रभू की याद ने ही तेरे साथ जाना है। (पर ये सिमरन वही कर सकता है जिसे प्रभू खुद गुरू के दर पर लाए) हे नानक ! जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं गुरू की सेवा में जोड़ता है। उस पर कोई दुख कलेश जोर नहीं डाल सकता। 50।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਮੁਖ ਤੇ ਬੋਲਨਾ ਮਨਿ ਵੂਠੈ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭ ਮਹਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਥਾਨ ਥਨੰਤਰਿ ਸੋਇ ॥੧॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਮੁਖ ਤੇ ਬੋਲਨਾ ਮਨਿ ਵੂਠੈ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭ ਮਹਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਥਾਨ ਥਨੰਤਰਿ ਸੋਇ ॥੧॥
सलोकु ॥
हरि हरि मुख ते बोलना मनि वूठै सुखु होइ ॥
नानक सभ महि रवि रहिआ थान थनंतरि सोइ ॥१॥
हरि हरि मुख ते बोलना मनि वूठै सुखु होइ ॥
नानक सभ महि रवि रहिआ थान थनंतरि सोइ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ उस हरी का जाप मुंह से करने से जब वह मन में आ बसता है। तो आत्मिक आनंद पैदा होता है। हे नानक ! वह प्रभू सब जीवों में व्यापक है। हरेक जगह में मौजूद है। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਹੇਰਉ ਘਟਿ ਘਟਿ ਸਗਲ ਕੈ ਪੂਰਿ ਰਹੇ ਭਗਵਾਨ ॥
ਹੋਵਤ ਆਏ ਸਦ ਸਦੀਵ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਗੁਰ ਗਿਆਨ ॥
ਹਉ ਛੁਟਕੈ ਹੋਇ ਅਨੰਦੁ ਤਿਹ ਹਉ ਨਾਹੀ ਤਹ ਆਪਿ ॥
ਹਤੇ ਦੂਖ ਜਨਮਹ ਮਰਨ ਸੰਤਸੰਗ ਪਰਤਾਪ ॥
ਹਿਤ ਕਰਿ ਨਾਮ ਦ੍ਰਿੜੈ ਦਇਆਲਾ ॥ ਸੰਤਹ ਸੰਗਿ ਹੋਤ ਕਿਰਪਾਲਾ ॥
ਹੇਰਉ ਘਟਿ ਘਟਿ ਸਗਲ ਕੈ ਪੂਰਿ ਰਹੇ ਭਗਵਾਨ ॥
ਹੋਵਤ ਆਏ ਸਦ ਸਦੀਵ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਗੁਰ ਗਿਆਨ ॥
ਹਉ ਛੁਟਕੈ ਹੋਇ ਅਨੰਦੁ ਤਿਹ ਹਉ ਨਾਹੀ ਤਹ ਆਪਿ ॥
ਹਤੇ ਦੂਖ ਜਨਮਹ ਮਰਨ ਸੰਤਸੰਗ ਪਰਤਾਪ ॥
ਹਿਤ ਕਰਿ ਨਾਮ ਦ੍ਰਿੜੈ ਦਇਆਲਾ ॥ ਸੰਤਹ ਸੰਗਿ ਹੋਤ ਕਿਰਪਾਲਾ ॥
पउड़ी ॥
हेरउ घटि घटि सगल कै पूरि रहे भगवान ॥
होवत आए सद सदीव दुख भंजन गुर गिआन ॥
हउ छुटकै होइ अनंदु तिह हउ नाही तह आपि ॥
हते दूख जनमह मरन संतसंग परताप ॥
हित करि नाम द्रिड़ै दइआला ॥ संतह संगि होत किरपाला ॥
हेरउ घटि घटि सगल कै पूरि रहे भगवान ॥
होवत आए सद सदीव दुख भंजन गुर गिआन ॥
हउ छुटकै होइ अनंदु तिह हउ नाही तह आपि ॥
हते दूख जनमह मरन संतसंग परताप ॥
हित करि नाम द्रिड़ै दइआला ॥ संतह संगि होत किरपाला ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- मैं सब जीवों के शरीर में देखता हूँ कि परमात्मा स्वयं ही मौजूद है। परमात्मा का अस्तित्व सदा से ही है। वह जीवों के दुख नाश करने वाला है, ये सूझ गुरू का ज्ञान देता है (गुरू के उपदेश से ये समझ पैदा होती है)। मनुष्य का अहम् समाप्त हो जाता है। मन में आनंद पैदा हो जाता है। मन में से अहंकार का अभाव हो जाता है। वहां प्रभू स्वयं आ बसता है। संतों की संगति की बरकति से मनुष्य के जनम-मरन के दुख नाश हो जाते हैं। प्रेम से दयाल प्रभू का नाम अपने हृदय में टिकाता है और जो मनुष्य संत जनों की संगति में रहता है प्रभू उस पर कृपा करता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 260 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
IGI Airport की 3 बजे की flight का इंतज़ार, सब लोग phones पर, मन कहीं और।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 55 पंक्तियों का है, 10 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 260” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 261 →, पीछे का: ← अंग 259।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।