पुरुष सूक्त
एक देह जो संसार में नहीं समाती, और वह यज्ञ जो संसार बन जाता है
बैठिए, साहब। एक देह की कल्पना कीजिए जो इतनी बड़ी है कि पूरी धरती को ढक ले और फिर भी उससे आगे फैली रहे। यही पुरुष है। और जो कथा आगे आती है उसमें यही देह एक यज्ञ बन कर पूरा संसार रच देती है।
इसका मूल ऋग्वेद 10.90 है, सोलह ऋचाओं का। यही सूक्त वाजसनेयी संहिता 31, अथर्ववेद 19.6, सामवेद, और तैत्तिरीय आरण्यक 3.12-13 में भी लौटता है। बाद का अनुष्ठानिक पाठ उत्तरनारायण की ऋचाएँ जोड़ देता है, जो पुरुष को नारायण से जोड़ती हैं और इसे वैष्णव रंग दे देती हैं।
एक देह, जो संसार से बड़ी है
सूक्त की शुरुआत एक विराट देह से होती है। इस पुरुष के हज़ार सिर हैं, हज़ार आँखें, हज़ार पैर। वह धरती को हर ओर से ढक लेता है, और उससे दस अंगुल (daśāṅgulam) आगे भी फैला हुआ है। वह वही है जो हो चुका और जो होगा। सारे प्राणी उसका एक चौथाई हैं, और तीन चौथाई स्वर्ग में अमर है, पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि (pādo’sya viśvā bhūtāni tripādasyāmṛtaṃ divi)।
यज्ञ, जो संसार बन जाता है
फिर देव उस पुरुष को एक आदिम यज्ञ की आहुति बनाते हैं, और ऋतुएँ उस यज्ञ की सामग्री बनती हैं। उसी कटी हुई देह से व्यवस्थित संसार उभरता है, ऋचाएँ और साम और छंद, पशु, और लोक के हिस्से। सृष्टि यहाँ एक यज्ञ है, और यज्ञ वह क्रिया है जो संसार को रचती और थामे रखती है।
अंगों का मिलान
मिलान देखिए। उसके मन से चंद्र, आँख से सूर्य, मुख से इंद्र और अग्नि, प्राण से वायु, सिर से आकाश, और पैरों से पृथ्वी। और समाज के वर्ण भी, मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य, और पैरों से शूद्र (ऋग्वेद 10.90.12)। इस ऋचा को सीधे कहना ज़रूरी है, क्योंकि यही वर्ण-व्यवस्था की पाठ-जड़ है। इसी से जुड़ी बहस हिन्दू धर्म वाले पन्ने के जाति वाले हिस्से में रखी है।
इसका अर्थ-भार
इसका भार कई ओर जाता है। सृष्टि को यज्ञ के रूप में रखना यज्ञ को ही वह तंत्र बना देता है जो संसार को बनाता और चलाता है। बहुलता के नीचे एक ही सत्ता, यह उपनिषद के ब्रह्म और आत्मा की ओर एक क़दम है। देह, ब्रह्मांड और समाज के बीच का यह मिलान विद्वानों का एक बड़ा विषय है (ब्रायन के. स्मिथ)। और इसकी सोलह ऋचाएँ पूजा के सोलह उपचारों से मिलाई जाती हैं।
तिथि, और एक चौड़ी नज़र
दसवाँ मंडल ऋग्वेद की पिछली परत है, और 10.90 एक बाद की ऋचा है (जेमिसन व ब्रेरटन)। एक आदिम देह से रचा गया ब्रह्मांड, यह रूपक इंडो-यूरोपीय और प्राचीन संसार में बार-बार लौटता है, यमिर, तिआमत, पांगु (ब्रूस लिंकन)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पुरुष सूक्त कहाँ से है?
मूल ऋग्वेद 10.90 है, सोलह ऋचाओं का। यह कुछ और संहिताओं और आरण्यक में भी लौटता है, और बाद के पाठ में उत्तरनारायण की ऋचाएँ जुड़ती हैं।
दस अंगुल आगे का क्या मतलब है?
पुरुष धरती को ढक कर भी उससे आगे फैला है। यह कहने का ढंग है कि वह सृष्टि में है और सृष्टि से परे भी।
वर्ण वाली ऋचा को यहाँ क्यों रखा है?
क्योंकि 10.90.12 ही वर्ण-व्यवस्था की पाठ-जड़ है, और इसे साफ़ कहना ज़रूरी है। इससे जुड़ी आलोचना और बहस हिन्दू धर्म वाले पन्ने में रखी है।
इसका पूजा से क्या रिश्ता है?
इसकी सोलह ऋचाएँ पूजा के सोलह उपचारों से मिलाई जाती हैं, इसलिए यह औपचारिक पूजा में बार-बार पढ़ा जाता है।
पढ़ने के लिए
- स्टेफ़नी जेमिसन व जोएल ब्रेरटन, The Rigveda
- वेंडी डॉनिगर, The Rig Veda
- ब्रायन के. स्मिथ, Reflections on Resemblance, Ritual, and Religion
- ब्रूस लिंकन, Myth, Cosmos, and Society
जो तंत्र में सोचता है, उसके लिए यह सूक्त एक मानचित्र है, जिसमें देह, ब्रह्मांड और समाज एक ही नक़्शे पर रखे हैं। एक ही सत्ता को अंगों में बाँट कर संसार बना देना, यही इसका विचार है। और इसी नक़्शे में वह ऋचा भी है जो वर्ण को देह से जोड़ती है, जिसे जानना और जिसकी आलोचना को साथ रखना, दोनों ज़रूरी हैं।