अंग 220

अंग
220
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬੇਦ ਪੁਰਾਨ ਸਾਧ ਮਗ ਸੁਨਿ ਕਰਿ ਨਿਮਖ ਨ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੁਰਲਭ ਦੇਹ ਪਾਇ ਮਾਨਸ ਕੀ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਸਿਰਾਵੈ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਮਹਾ ਸੰਕਟ ਬਨ ਤਾ ਸਿਉ ਰੁਚ ਉਪਜਾਵੈ ॥੧॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਸਦਾ ਸੰਗਿ ਪ੍ਰਭੁ ਤਾ ਸਿਉ ਨੇਹੁ ਨ ਲਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਮੁਕਤਿ ਤਾਹਿ ਤੁਮ ਮਾਨਹੁ ਜਿਹ ਘਟਿ ਰਾਮੁ ਸਮਾਵੈ ॥੨॥੬॥
बेद पुरान साध मग सुनि करि निमख न हरि गुन गावै ॥१॥ रहाउ ॥
दुरलभ देह पाइ मानस की बिरथा जनमु सिरावै ॥
माइआ मोह महा संकट बन ता सिउ रुच उपजावै ॥१॥
अंतरि बाहरि सदा संगि प्रभु ता सिउ नेहु न लावै ॥
नानक मुकति ताहि तुम मानहु जिह घटि रामु समावै ॥२॥६॥

हिन्दी अर्थ: (ये भूला हुआ मन) वेद-पुराण (आदि धर्म-पुस्तकों और) संत जनों के उपदेश सुन के (भी) रत्ती भर समय के लिए भी परमात्मा के गुण नहीं गाता। 1। रहाउ। (हे मेरी माँ ! ये मन ऐसा कुमार्ग पर पड़ा हुआ है कि) बड़ी मुश्किल से मिल सकने वाले मानस शरीर प्राप्त करके भी इस जन्म को व्यर्थ गुजार रहा है। (हे माँ ! ये संसार) जंगल माया के मोह से नाको नाक भरा पड़ा है (और मेरा मन) इस (जंगल से ही) प्रेम बना रहा है। 1। (हे मेरी माँ ! जो) परमात्मा (हरेक जीव के) अंदर व बाहर हर समय बसता है उससे (ये मेरा मन) प्यार नहीं डालता। हे नानक ! (कह, माया के मोह से भरपूर संसार जंगल में से) खलासी तुम उसी मनुष्य को (मिली) समझो जिसके हृदय में परमात्मा बस रहा है। 2। 6।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਸਾਧੋ ਰਾਮ ਸਰਨਿ ਬਿਸਰਾਮਾ ॥
ਬੇਦ ਪੁਰਾਨ ਪੜੇ ਕੋ ਇਹ ਗੁਨ ਸਿਮਰੇ ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਮਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਲੋਭ ਮੋਹ ਮਾਇਆ ਮਮਤਾ ਫੁਨਿ ਅਉ ਬਿਖਿਅਨ ਕੀ ਸੇਵਾ ॥ ਹਰਖ ਸੋਗ ਪਰਸੈ ਜਿਹ ਨਾਹਨਿ ਸੋ ਮੂਰਤਿ ਹੈ ਦੇਵਾ ॥੧॥
ਸੁਰਗ ਨਰਕ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਿਖੁ ਏ ਸਭ ਤਿਉ ਕੰਚਨ ਅਰੁ ਪੈਸਾ ॥
ਉਸਤਤਿ ਨਿੰਦਾ ਏ ਸਮ ਜਾ ਕੈ ਲੋਭੁ ਮੋਹੁ ਫੁਨਿ ਤੈਸਾ ॥੨॥
ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਏ ਬਾਧੇ ਜਿਹ ਨਾਹਨਿ ਤਿਹ ਤੁਮ ਜਾਨਉ ਗਿਆਨੀ ॥
ਨਾਨਕ ਮੁਕਤਿ ਤਾਹਿ ਤੁਮ ਮਾਨਉ ਇਹ ਬਿਧਿ ਕੋ ਜੋ ਪ੍ਰਾਨੀ ॥੩॥੭॥
गउड़ी महला ९ ॥
साधो राम सरनि बिसरामा ॥
बेद पुरान पड़े को इह गुन सिमरे हरि को नामा ॥१॥ रहाउ ॥
लोभ मोह माइआ ममता फुनि अउ बिखिअन की सेवा ॥ हरख सोग परसै जिह नाहनि सो मूरति है देवा ॥१॥
सुरग नरक अंम्रित बिखु ए सभ तिउ कंचन अरु पैसा ॥
उसतति निंदा ए सम जा कै लोभु मोहु फुनि तैसा ॥२॥
दुखु सुखु ए बाधे जिह नाहनि तिह तुम जानउ गिआनी ॥
नानक मुकति ताहि तुम मानउ इह बिधि को जो प्रानी ॥३॥७॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ९ ॥ हे संत जनो ! परमात्मा की शरण पड़ने से ही (विकारों की भटकना से) शांति प्राप्त होती है। वेद पुराण (आदि धार्मिक पुस्तकों) पढ़ने का यही लाभ (होना चाहिए) कि मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता रहे। 1। रहाउ। (हे संत जनो !) लोभ~ माया का मोह~ अपनत्व और विषियों का सेवन~ खुशी~ गमी- (इनमें से कोई भी) जिस मनुष्य को छू नहीं सकता (जिस मनुष्य पर अपना जोर नहीं डाल सकता) वह मनुष्य परमात्मा का रूप है। 1। (हे संत जनो ! वह मनुष्य परमात्मा का रूप है जिसे) स्वर्ग एवं नर्क~ अमृत और जहर एक जैसे प्रतीत होते हैं। जिसे सोना व तांबा एक समान लगता है। जिसके हृदय में उस्तति और निंदा भी एक जैसे हैं (कोई उसकी उपमा करे~ या कोई उसकी निंदा करे- उसके लिए एक समान हैं)। जिसके हृदय में लोभ भी प्रभाव नहीं डाल सकता~ मोह भी असर नहीं कर सकता। 2। (हे संत जनो !) तुम उस मनुष्य को परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल के रखने वाला समझो~ जिसे ना कोई दुख ना ही कोई सुख (अपने प्रभाव में) बाँध सकता है। हे नानक ! (कह, हे संत जनो ! लोभ~ मोह~ दुख सुख आदि से) खलासी उस मनुष्य को (मिली) मानो~ जो मनुष्य इस किस्म की जीवन-युक्ति वाला है। 3। 7।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਮਨ ਰੇ ਕਹਾ ਭਇਓ ਤੈ ਬਉਰਾ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਅਉਧ ਘਟੈ ਨਹੀ ਜਾਨੈ ਭਇਓ ਲੋਭ ਸੰਗਿ ਹਉਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋ ਤਨੁ ਤੈ ਅਪਨੋ ਕਰਿ ਮਾਨਿਓ ਅਰੁ ਸੁੰਦਰ ਗ੍ਰਿਹ ਨਾਰੀ ॥
ਇਨ ਮੈਂ ਕਛੁ ਤੇਰੋ ਰੇ ਨਾਹਨਿ ਦੇਖੋ ਸੋਚ ਬਿਚਾਰੀ ॥੧॥
ਰਤਨ ਜਨਮੁ ਅਪਨੋ ਤੈ ਹਾਰਿਓ ਗੋਬਿੰਦ ਗਤਿ ਨਹੀ ਜਾਨੀ ॥
ਨਿਮਖ ਨ ਲੀਨ ਭਇਓ ਚਰਨਨ ਸਿਂਉ ਬਿਰਥਾ ਅਉਧ ਸਿਰਾਨੀ ॥੨॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੋਈ ਨਰੁ ਸੁਖੀਆ ਰਾਮ ਨਾਮ ਗੁਨ ਗਾਵੈ ॥
ਅਉਰ ਸਗਲ ਜਗੁ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿਆ ਨਿਰਭੈ ਪਦੁ ਨਹੀ ਪਾਵੈ ॥੩॥੮॥
गउड़ी महला ९ ॥
मन रे कहा भइओ तै बउरा ॥
अहिनिसि अउध घटै नही जानै भइओ लोभ संगि हउरा ॥१॥ रहाउ ॥
जो तनु तै अपनो करि मानिओ अरु सुंदर ग्रिह नारी ॥
इन मैं कछु तेरो रे नाहनि देखो सोच बिचारी ॥१॥
रतन जनमु अपनो तै हारिओ गोबिंद गति नही जानी ॥
निमख न लीन भइओ चरनन सिंउ बिरथा अउध सिरानी ॥२॥
कहु नानक सोई नरु सुखीआ राम नाम गुन गावै ॥
अउर सगल जगु माइआ मोहिआ निरभै पदु नही पावै ॥३॥८॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ९ ॥ हे (मेरे) मन ! तू कहां (लोभ आदि में फंस के) पागल हो रहा है? (हे भाई !) दिन रात उम्र घटती रहती है~ पर मनुष्य ये बात समझता नहीं और लोभ में फंस के कमजोर आत्मिक जीवन वाला बनता जाता है। 1। रहाउ। हे (मेरे) मन ! जो (ये) शरीर~ जिसे तू अपना करके समझ रहा है~ और घर की सुंदर स्त्री को तू अपनी मान रहा है~ इनमें से कोई भी तेरा (सदा निभने वाला साथी) नहीं है~ सोच के देख ले~ विचार के देख ले। 1। हे (मेरे) मन ! जैसे जुआरी जूए में बाजी हारता है~ (वैसे ही) तू अपना कीमती मानस जनम हार रहा है। क्योंकि तूने परमात्मा के साथ मिलाप की अवस्था की कद्र नहीं पाई। तू रक्ती भर समय के लिए भी गोबिंद प्रभू के चरनों में नहीं जुड़ता~ तू व्यर्थ उम्र गुजार रहा है। 2। हे नानक ! कह, वही मनुष्य सुखी जीवन वाला है जो परमात्मा का नाम (जपता है~ जो) परमात्मा के गुण गाता है। बाकी का सारा जहान (जो) माया के मोह में फंसा रहता है (वह सहमा रहता है~ वह) उस आत्मिक अवस्था पर नहीं पहुँचता~ जहां कोई डर छू नहीं सकता। 3। 8।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਨਰ ਅਚੇਤ ਪਾਪ ਤੇ ਡਰੁ ਰੇ ॥
ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਸਗਲ ਭੈ ਭੰਜਨ ਸਰਨਿ ਤਾਹਿ ਤੁਮ ਪਰੁ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬੇਦ ਪੁਰਾਨ ਜਾਸ ਗੁਨ ਗਾਵਤ ਤਾ ਕੋ ਨਾਮੁ ਹੀਐ ਮੋ ਧਰੁ ਰੇ ॥
ਪਾਵਨ ਨਾਮੁ ਜਗਤਿ ਮੈ ਹਰਿ ਕੋ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਕਸਮਲ ਸਭ ਹਰੁ ਰੇ ॥੧॥
ਮਾਨਸ ਦੇਹ ਬਹੁਰਿ ਨਹ ਪਾਵੈ ਕਛੂ ਉਪਾਉ ਮੁਕਤਿ ਕਾ ਕਰੁ ਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਹਤ ਗਾਇ ਕਰੁਨਾ ਮੈ ਭਵ ਸਾਗਰ ਕੈ ਪਾਰਿ ਉਤਰੁ ਰੇ ॥੨॥੯॥੨੫੧॥
गउड़ी महला ९ ॥
नर अचेत पाप ते डरु रे ॥
दीन दइआल सगल भै भंजन सरनि ताहि तुम परु रे ॥१॥ रहाउ ॥
बेद पुरान जास गुन गावत ता को नामु हीऐ मो धरु रे ॥
पावन नामु जगति मै हरि को सिमरि सिमरि कसमल सभ हरु रे ॥१॥
मानस देह बहुरि नह पावै कछू उपाउ मुकति का करु रे ॥
नानक कहत गाइ करुना मै भव सागर कै पारि उतरु रे ॥२॥९॥२५१॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ९ ॥ हे गाफिल मनुष्य ! पापों से बचा रह। (और इन पापों से बचने के वास्ते उस) परमात्मा की शरण पड़ा रह~ जो गरीबों पर दया करने वाला है~ और सारे डर दूर करने वाला है। 1। रहाउ। (हे गाफिल मनुष्य !) उस परमात्मा का नाम अपने हृदय में परोए रख~ जिसके गुण वेद पुराण (आदि धर्म पुस्तकें) गा रहे हैं। (हे गाफिल मनुष्य ! पापों से बचा के) पवित्र करने वाला जगत में परमात्मा का नाम (ही) है~ तू उस परमात्मा को सिमर सिमर के (अपने अंदर से) सारे पाप दूर कर ले। 1। (हे गाफिल मनुष्य !) तू ये मानस शरीर फिर कभी नहीं पा सकेगा (इसे क्यूँ पापों में लगा के गवा रहा है? यही समय है~ इन पापों से) मुक्ति प्राप्त करने का। कोई इलाज कर ले। तुझे नानक कहता है, तरस-रूप परमात्मा के गुण गा के संसार समुंद्र पार हो जा। 2। 9। 251।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਅਸਟਪਦੀਆ ਮਹਲਾ ੧ ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ
ੴ ਸਤਿਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਨਿਧਿ ਸਿਧਿ ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਪੂਰਨ ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਬਿਖੁ ਮਾਰਿ ॥
ਤ੍ਰਿਕੁਟੀ ਛੂਟੀ ਬਿਮਲ ਮਝਾਰਿ ॥
रागु गउड़ी असटपदीआ महला १ गउड़ी गुआरेरी
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
निधि सिधि निरमल नामु बीचारु ॥
पूरन पूरि रहिआ बिखु मारि ॥
त्रिकुटी छूटी बिमल मझारि ॥

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी असटपदीआ महला १ गउड़ी गुआरेरी ੴ सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥ परमात्मा का निर्मल नाम मेरे वास्ते (आत्मिक) खजाना है। परमातमा के गुणों की विचार ही मेरे वास्ते रिद्धियां (-सिद्धियां) हैं। अब मुझे परमात्मा हर जगह व्यापक दिखाई दे रहा है ~ मैंने माया के जहर को (अपने अंदर से) मार लिया है। (उस मति की बरकति से) पवित्र हरी नाम में लीन रहने से मेरी अंदर की खिझ समाप्त हो गई है

संदर्भ: यह अंग 220 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji।

Faridabad-Delhi border के पास सर्दियों की धुंध में सुबह का सूरज।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 34 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 220” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 221 →, पीछे का: ← अंग 219

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।