अंग
281
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਿਸ ਨੋ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੈ ਤਿਸੁ ਆਪਨ ਨਾਮੁ ਦੇਇ ॥
ਬਡਭਾਗੀ ਨਾਨਕ ਜਨ ਸੇਇ ॥੮॥੧੩॥
ਬਡਭਾਗੀ ਨਾਨਕ ਜਨ ਸੇਇ ॥੮॥੧੩॥
जिस नो क्रिपा करै तिसु आपन नामु देइ ॥
बडभागी नानक जन सेइ ॥८॥१३॥
बडभागी नानक जन सेइ ॥८॥१३॥
हिन्दी अर्थ: जिस जिस जीव पर मेहर करता है उस उस को अपना नाम बख्शता है; और हे नानक ! वह मनुष्य बड़े भाग्यशाली हो जाते हैं। 8। 13।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਤਜਹੁ ਸਿਆਨਪ ਸੁਰਿ ਜਨਹੁ ਸਿਮਰਹੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਏਕ ਆਸ ਹਰਿ ਮਨਿ ਰਖਹੁ ਨਾਨਕ ਦੂਖੁ ਭਰਮੁ ਭਉ ਜਾਇ ॥੧॥
ਤਜਹੁ ਸਿਆਨਪ ਸੁਰਿ ਜਨਹੁ ਸਿਮਰਹੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਏਕ ਆਸ ਹਰਿ ਮਨਿ ਰਖਹੁ ਨਾਨਕ ਦੂਖੁ ਭਰਮੁ ਭਉ ਜਾਇ ॥੧॥
सलोकु ॥
तजहु सिआनप सुरि जनहु सिमरहु हरि हरि राइ ॥
एक आस हरि मनि रखहु नानक दूखु भरमु भउ जाइ ॥१॥
तजहु सिआनप सुरि जनहु सिमरहु हरि हरि राइ ॥
एक आस हरि मनि रखहु नानक दूखु भरमु भउ जाइ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे भले मनुष्यो ! चतुराई त्यागो और अकाल-पुरख को सिमरो। केवल एक प्रभू की आशा मन में रखो। हे नानक ! (इस तरह) दुख वहिम और डर दूर हो जाता है। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਮਾਨੁਖ ਕੀ ਟੇਕ ਬ੍ਰਿਥੀ ਸਭ ਜਾਨੁ ॥
ਦੇਵਨ ਕਉ ਏਕੈ ਭਗਵਾਨੁ ॥
ਜਿਸ ਕੈ ਦੀਐ ਰਹੈ ਅਘਾਇ ॥
ਬਹੁਰਿ ਨ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਲਾਗੈ ਆਇ ॥
ਮਾਰੈ ਰਾਖੈ ਏਕੋ ਆਪਿ ॥
ਮਾਨੁਖ ਕੈ ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ਹਾਥਿ ॥
ਤਿਸ ਕਾ ਹੁਕਮੁ ਬੂਝਿ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਤਿਸ ਕਾ ਨਾਮੁ ਰਖੁ ਕੰਠਿ ਪਰੋਇ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਘਨੁ ਨ ਲਾਗੈ ਕੋਇ ॥੧॥
ਮਾਨੁਖ ਕੀ ਟੇਕ ਬ੍ਰਿਥੀ ਸਭ ਜਾਨੁ ॥
ਦੇਵਨ ਕਉ ਏਕੈ ਭਗਵਾਨੁ ॥
ਜਿਸ ਕੈ ਦੀਐ ਰਹੈ ਅਘਾਇ ॥
ਬਹੁਰਿ ਨ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਲਾਗੈ ਆਇ ॥
ਮਾਰੈ ਰਾਖੈ ਏਕੋ ਆਪਿ ॥
ਮਾਨੁਖ ਕੈ ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ਹਾਥਿ ॥
ਤਿਸ ਕਾ ਹੁਕਮੁ ਬੂਝਿ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਤਿਸ ਕਾ ਨਾਮੁ ਰਖੁ ਕੰਠਿ ਪਰੋਇ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਘਨੁ ਨ ਲਾਗੈ ਕੋਇ ॥੧॥
असटपदी ॥
मानुख की टेक ब्रिथी सभ जानु ॥
देवन कउ एकै भगवानु ॥
जिस कै दीऐ रहै अघाइ ॥
बहुरि न त्रिसना लागै आइ ॥
मारै राखै एको आपि ॥
मानुख कै किछु नाही हाथि ॥
तिस का हुकमु बूझि सुखु होइ ॥
तिस का नामु रखु कंठि परोइ ॥
सिमरि सिमरि सिमरि प्रभु सोइ ॥
नानक बिघनु न लागै कोइ ॥१॥
मानुख की टेक ब्रिथी सभ जानु ॥
देवन कउ एकै भगवानु ॥
जिस कै दीऐ रहै अघाइ ॥
बहुरि न त्रिसना लागै आइ ॥
मारै राखै एको आपि ॥
मानुख कै किछु नाही हाथि ॥
तिस का हुकमु बूझि सुखु होइ ॥
तिस का नामु रखु कंठि परोइ ॥
सिमरि सिमरि सिमरि प्रभु सोइ ॥
नानक बिघनु न लागै कोइ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ (हे मन !) (किसी) मनुष्य का आसरा बिल्कुल ही व्यर्थ समझ। एक अकाल-पुरख ही (सब जीवों को) देने वाला है (स्मर्थ है)। जिसके देने से (मनुष्य) तृप्त रहता है और दुबारा उसे लालच आ के नहीं दबाती। प्रभू खुद ही (जीवों को) मारता है (अथवा) पालता है। मनुष्य के वश में कुछ भी नहीं। (इसलिए) उस मालिक का हुकम समझ के सुख होता है। (हे मन !) उसका नाम हर वक्त याद कर। उस प्रभू को सदा सिमर। हे नानक ! (सिमरन की बरकति से) (जिंदगी के सफर में) कोई रुकावट नहीं पड़ती। 1।
ਉਸਤਤਿ ਮਨ ਮਹਿ ਕਰਿ ਨਿਰੰਕਾਰ ॥
ਕਰਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਸਤਿ ਬਿਉਹਾਰ ॥
ਨਿਰਮਲ ਰਸਨਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਉ ॥
ਸਦਾ ਸੁਹੇਲਾ ਕਰਿ ਲੇਹਿ ਜੀਉ ॥
ਨੈਨਹੁ ਪੇਖੁ ਠਾਕੁਰ ਕਾ ਰੰਗੁ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਬਿਨਸੈ ਸਭ ਸੰਗੁ ॥
ਚਰਨ ਚਲਉ ਮਾਰਗਿ ਗੋਬਿੰਦ ॥
ਮਿਟਹਿ ਪਾਪ ਜਪੀਐ ਹਰਿ ਬਿੰਦ ॥
ਕਰ ਹਰਿ ਕਰਮ ਸ੍ਰਵਨਿ ਹਰਿ ਕਥਾ ॥
ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਨਾਨਕ ਊਜਲ ਮਥਾ ॥੨॥
ਕਰਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਸਤਿ ਬਿਉਹਾਰ ॥
ਨਿਰਮਲ ਰਸਨਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਉ ॥
ਸਦਾ ਸੁਹੇਲਾ ਕਰਿ ਲੇਹਿ ਜੀਉ ॥
ਨੈਨਹੁ ਪੇਖੁ ਠਾਕੁਰ ਕਾ ਰੰਗੁ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਬਿਨਸੈ ਸਭ ਸੰਗੁ ॥
ਚਰਨ ਚਲਉ ਮਾਰਗਿ ਗੋਬਿੰਦ ॥
ਮਿਟਹਿ ਪਾਪ ਜਪੀਐ ਹਰਿ ਬਿੰਦ ॥
ਕਰ ਹਰਿ ਕਰਮ ਸ੍ਰਵਨਿ ਹਰਿ ਕਥਾ ॥
ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਨਾਨਕ ਊਜਲ ਮਥਾ ॥੨॥
उसतति मन महि करि निरंकार ॥
करि मन मेरे सति बिउहार ॥
निरमल रसना अंम्रितु पीउ ॥
सदा सुहेला करि लेहि जीउ ॥
नैनहु पेखु ठाकुर का रंगु ॥
साधसंगि बिनसै सभ संगु ॥
चरन चलउ मारगि गोबिंद ॥
मिटहि पाप जपीऐ हरि बिंद ॥
कर हरि करम स्रवनि हरि कथा ॥
हरि दरगह नानक ऊजल मथा ॥२॥
करि मन मेरे सति बिउहार ॥
निरमल रसना अंम्रितु पीउ ॥
सदा सुहेला करि लेहि जीउ ॥
नैनहु पेखु ठाकुर का रंगु ॥
साधसंगि बिनसै सभ संगु ॥
चरन चलउ मारगि गोबिंद ॥
मिटहि पाप जपीऐ हरि बिंद ॥
कर हरि करम स्रवनि हरि कथा ॥
हरि दरगह नानक ऊजल मथा ॥२॥
हिन्दी अर्थ: अपने अंदर अकाल-पुरख की सिफत सलाह कर। हे मेरे मन ! ये सच्चा व्यवहार कर। जीभ से मीठा (नाम-) अमृत पी। (इस तरह) अपनी जान को सदा सुखी कर ले। आँखों से अकाल-पुरख का (जगत-) तमाशा देख। भलों की संगति में (टिकने से) और (कुटंब आदि का) मोह मिट जाता है। पैरों से ईश्वर के रास्ते पर चल। प्रभू को रक्ती भर भी जपें तो पाप दूर हो जाते हैं। हाथों से प्रभू (के राह) के काम कर और कानों से उसकी उपमा (सुन); (इस तरह) हे नानक ! प्रभू की दरगाह में सुर्ख-रू हो जाते हैं। 2।
ਬਡਭਾਗੀ ਤੇ ਜਨ ਜਗ ਮਾਹਿ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਹਿ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਜੋ ਕਰਹਿ ਬੀਚਾਰ ॥
ਸੇ ਧਨਵੰਤ ਗਨੀ ਸੰਸਾਰ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਮੁਖਿ ਬੋਲਹਿ ਹਰਿ ਮੁਖੀ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਜਾਨਹੁ ਤੇ ਸੁਖੀ ॥
ਏਕੋ ਏਕੁ ਏਕੁ ਪਛਾਨੈ ॥
ਇਤ ਉਤ ਕੀ ਓਹੁ ਸੋਝੀ ਜਾਨੈ ॥
ਨਾਮ ਸੰਗਿ ਜਿਸ ਕਾ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਨਹਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਜਾਨਿਆ ॥੩॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਹਿ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਜੋ ਕਰਹਿ ਬੀਚਾਰ ॥
ਸੇ ਧਨਵੰਤ ਗਨੀ ਸੰਸਾਰ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਮੁਖਿ ਬੋਲਹਿ ਹਰਿ ਮੁਖੀ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਜਾਨਹੁ ਤੇ ਸੁਖੀ ॥
ਏਕੋ ਏਕੁ ਏਕੁ ਪਛਾਨੈ ॥
ਇਤ ਉਤ ਕੀ ਓਹੁ ਸੋਝੀ ਜਾਨੈ ॥
ਨਾਮ ਸੰਗਿ ਜਿਸ ਕਾ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਨਹਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਜਾਨਿਆ ॥੩॥
बडभागी ते जन जग माहि ॥
सदा सदा हरि के गुन गाहि ॥
राम नाम जो करहि बीचार ॥
से धनवंत गनी संसार ॥
मनि तनि मुखि बोलहि हरि मुखी ॥
सदा सदा जानहु ते सुखी ॥
एको एकु एकु पछानै ॥
इत उत की ओहु सोझी जानै ॥
नाम संगि जिस का मनु मानिआ ॥
नानक तिनहि निरंजनु जानिआ ॥३॥
सदा सदा हरि के गुन गाहि ॥
राम नाम जो करहि बीचार ॥
से धनवंत गनी संसार ॥
मनि तनि मुखि बोलहि हरि मुखी ॥
सदा सदा जानहु ते सुखी ॥
एको एकु एकु पछानै ॥
इत उत की ओहु सोझी जानै ॥
नाम संगि जिस का मनु मानिआ ॥
नानक तिनहि निरंजनु जानिआ ॥३॥
हिन्दी अर्थ: वह मनुष्य जगत में बड़े भाग्यशाली हैं। (जो मनुष्य) सदा ही प्रभू के गुण गाते हैं। जो अकाल-पुरख के नाम का ध्यान धरते हैं। वह मनुष्य जगत में धनवान हैं जो संतुष्ट हैं जो भले लोग मन तन और मुख से प्रभू का नाम उचारते हैं। उन्हें सदा सुखी जानो। जो मनुष्य केवल एक प्रभू को (हर जगह) पहिचानता है। उसे लोक परलोक की (भाव। जीवन के सारे सफर की) समझ पड़ जाती है। जिस मनुष्य का मन प्रभू के नाम से रच-मिच जाता है। हे नानक ! उसने प्रभू को पहिचान लिया है। 3।
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਆਪਨ ਆਪੁ ਸੁਝੈ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਜਾਨਹੁ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬੁਝੈ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਹਤ ॥
ਸਰਬ ਰੋਗ ਤੇ ਓਹੁ ਹਰਿ ਜਨੁ ਰਹਤ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਕੀਰਤਨੁ ਕੇਵਲ ਬਖੵਾਨੁ ॥
ਗ੍ਰਿਹਸਤ ਮਹਿ ਸੋਈ ਨਿਰਬਾਨੁ ॥
ਏਕ ਊਪਰਿ ਜਿਸੁ ਜਨ ਕੀ ਆਸਾ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਕਟੀਐ ਜਮ ਕੀ ਫਾਸਾ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੀ ਜਿਸੁ ਮਨਿ ਭੂਖ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸਹਿ ਨ ਲਾਗਹਿ ਦੂਖ ॥੪॥
ਤਿਸ ਕੀ ਜਾਨਹੁ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬੁਝੈ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਹਤ ॥
ਸਰਬ ਰੋਗ ਤੇ ਓਹੁ ਹਰਿ ਜਨੁ ਰਹਤ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਕੀਰਤਨੁ ਕੇਵਲ ਬਖੵਾਨੁ ॥
ਗ੍ਰਿਹਸਤ ਮਹਿ ਸੋਈ ਨਿਰਬਾਨੁ ॥
ਏਕ ਊਪਰਿ ਜਿਸੁ ਜਨ ਕੀ ਆਸਾ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਕਟੀਐ ਜਮ ਕੀ ਫਾਸਾ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੀ ਜਿਸੁ ਮਨਿ ਭੂਖ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸਹਿ ਨ ਲਾਗਹਿ ਦੂਖ ॥੪॥
गुर प्रसादि आपन आपु सुझै ॥
तिस की जानहु त्रिसना बुझै ॥
साधसंगि हरि हरि जसु कहत ॥
सरब रोग ते ओहु हरि जनु रहत ॥
अनदिनु कीरतनु केवल बखॵानु ॥
ग्रिहसत महि सोई निरबानु ॥
एक ऊपरि जिसु जन की आसा ॥
तिस की कटीऐ जम की फासा ॥
पारब्रहम की जिसु मनि भूख ॥
नानक तिसहि न लागहि दूख ॥४॥
तिस की जानहु त्रिसना बुझै ॥
साधसंगि हरि हरि जसु कहत ॥
सरब रोग ते ओहु हरि जनु रहत ॥
अनदिनु कीरतनु केवल बखॵानु ॥
ग्रिहसत महि सोई निरबानु ॥
एक ऊपरि जिसु जन की आसा ॥
तिस की कटीऐ जम की फासा ॥
पारब्रहम की जिसु मनि भूख ॥
नानक तिसहि न लागहि दूख ॥४॥
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य को गुरू की कृपा से अपने आप की समझ आ जाती है। ये जान लो कि उसकी तृष्णा मिट जाती है। जो रॅब का प्यारा सत्संग में अकाल-पुरख की सिफत सालाह करता है। वह सारे रोगों से बच जाता है। जो मनुष्य हर रोज प्रभू का कीर्तन ही उचारता है। वह मनुष्य गृहस्त में (रहता हुआ भी) निर्लिप है। जिस मनुष्य की आस एक अकाल-पुरख पर है। उसके जमों की फासी काटी जाती है। जिस मनुष्य के मन में प्रभू (के मिलने) की तमन्ना है। हे नानक ! उस मनुष्य को कोई दुख नहीं छूता।
ਜਿਸ ਕਉ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਮਨਿ ਚਿਤਿ ਆਵੈ ॥
ਸੋ ਸੰਤੁ ਸੁਹੇਲਾ ਨਹੀ ਡੁਲਾਵੈ ॥
ਜਿਸੁ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪੁਨਾ ਕਿਰਪਾ ਕਰੈ ॥
ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਕਹੁ ਕਿਸ ਤੇ ਡਰੈ ॥
ਜੈਸਾ ਸਾ ਤੈਸਾ ਦ੍ਰਿਸਟਾਇਆ ॥
ਅਪੁਨੇ ਕਾਰਜ ਮਹਿ ਆਪਿ ਸਮਾਇਆ ॥
ਸੋਧਤ ਸੋਧਤ ਸੋਧਤ ਸੀਝਿਆ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤਤੁ ਸਭੁ ਬੂਝਿਆ ॥
ਜਬ ਦੇਖਉ ਤਬ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਮੂਲੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋ ਸੂਖਮੁ ਸੋਈ ਅਸਥੂਲੁ ॥੫॥
ਸੋ ਸੰਤੁ ਸੁਹੇਲਾ ਨਹੀ ਡੁਲਾਵੈ ॥
ਜਿਸੁ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪੁਨਾ ਕਿਰਪਾ ਕਰੈ ॥
ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਕਹੁ ਕਿਸ ਤੇ ਡਰੈ ॥
ਜੈਸਾ ਸਾ ਤੈਸਾ ਦ੍ਰਿਸਟਾਇਆ ॥
ਅਪੁਨੇ ਕਾਰਜ ਮਹਿ ਆਪਿ ਸਮਾਇਆ ॥
ਸੋਧਤ ਸੋਧਤ ਸੋਧਤ ਸੀਝਿਆ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤਤੁ ਸਭੁ ਬੂਝਿਆ ॥
ਜਬ ਦੇਖਉ ਤਬ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਮੂਲੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋ ਸੂਖਮੁ ਸੋਈ ਅਸਥੂਲੁ ॥੫॥
जिस कउ हरि प्रभु मनि चिति आवै ॥
सो संतु सुहेला नही डुलावै ॥
जिसु प्रभु अपुना किरपा करै ॥
सो सेवकु कहु किस ते डरै ॥
जैसा सा तैसा द्रिसटाइआ ॥
अपुने कारज महि आपि समाइआ ॥
सोधत सोधत सोधत सीझिआ ॥
गुर प्रसादि ततु सभु बूझिआ ॥
जब देखउ तब सभु किछु मूलु ॥
नानक सो सूखमु सोई असथूलु ॥५॥
सो संतु सुहेला नही डुलावै ॥
जिसु प्रभु अपुना किरपा करै ॥
सो सेवकु कहु किस ते डरै ॥
जैसा सा तैसा द्रिसटाइआ ॥
अपुने कारज महि आपि समाइआ ॥
सोधत सोधत सोधत सीझिआ ॥
गुर प्रसादि ततु सभु बूझिआ ॥
जब देखउ तब सभु किछु मूलु ॥
नानक सो सूखमु सोई असथूलु ॥५॥
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य को हरी प्रभू मन में सदा याद रहता है। वह संत है सुखी है (वह कभी) घबराता नहीं। जिस मनुष्य पर प्रभू अपनी मेहर करता है। बताओ (प्रभू का) वह सेवक (और) किस से डर सकता है? (क्योंकि) उसे प्रभू वैसा ही दिखाई देता है जैसा वह (असल में) है। (ये दिख पड़ता है कि) अपने रचे हुए जगत में स्वयं व्यापक है। नित्य विचार करते हुए (उस सेवक को विचार में) सफलता मिल जाती है। गुरू की कृपा से (उसे) सारी अस्लियत की समझ आ जाती है। अब) मैं जग देखता हूँ तो हरेक चीज उस सब के आरम्भ (-प्रभू का रूप दिखती है)। हे नानक ! (मेरे ऊपर भी गुरू की मेहर हुई है। ये दिखता संसार भी वह स्वयं है और सब में व्यापक ज्योति भी खुद ही है। 5।
ਨਹ ਕਿਛੁ ਜਨਮੈ ਨਹ ਕਿਛੁ ਮਰੈ ॥
ਆਪਨ ਚਲਿਤੁ ਆਪ ਹੀ ਕਰੈ ॥
ਆਵਨੁ ਜਾਵਨੁ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਅਨਦ੍ਰਿਸਟਿ ॥
ਆਗਿਆਕਾਰੀ ਧਾਰੀ ਸਭ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ॥
ਆਪਨ ਚਲਿਤੁ ਆਪ ਹੀ ਕਰੈ ॥
ਆਵਨੁ ਜਾਵਨੁ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਅਨਦ੍ਰਿਸਟਿ ॥
ਆਗਿਆਕਾਰੀ ਧਾਰੀ ਸਭ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ॥
नह किछु जनमै नह किछु मरै ॥
आपन चलितु आप ही करै ॥
आवनु जावनु द्रिसटि अनद्रिसटि ॥
आगिआकारी धारी सभ स्रिसटि ॥
आपन चलितु आप ही करै ॥
आवनु जावनु द्रिसटि अनद्रिसटि ॥
आगिआकारी धारी सभ स्रिसटि ॥
हिन्दी अर्थ: ना कुछ पैदा होता है ना कुछ मरता है; (ये जनम मरन का तो) प्रभू स्वयं ही खेल कर रहा है। पैदा होना, मरना, दिखाई देता और ना दिखाई देता- ये सारा संसार प्रभू ने अपने हुकम में चलने वाला बना दिया है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 281 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Jor Bagh metro station से Khan Market की 10-मिनट की walk में मन का थमना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 60 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 281” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 282 →, पीछे का: ← अंग 280।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।