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अंग 155

अंग
155
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हउ तुधु आखा मेरी काइआ तूं सुणि सिख हमारी ॥
निंदा चिंदा करहि पराई झूठी लाइतबारी ॥
वेलि पराई जोहहि जीअड़े करहि चोरी बुरिआरी ॥
हंसु चलिआ तूं पिछै रहीएहि छुटड़ि होईअहि नारी ॥2॥
तूं काइआ रहीअहि सुपनंतरि तुधु किआ करम कमाइआ ॥
करि चोरी मै जा किछु लीआ ता मनि भला भाइआ ॥
हलति न सोभा पलति न ढोई अहिला जनमु गवाइआ ॥3॥
हउ खरी दुहेली होई बाबा नानक मेरी बात न पुछै कोई ॥1॥ रहाउ ॥
ताजी तुरकी सुइना रुपा कपड़ केरे भारा ॥
किस ही नालि न चले नानक झड़ि झड़ि पए गवारा ॥
कूजा मेवा मै सभ किछु चाखिआ इकु अंम्रितु नामु तुमारा ॥4॥
दे दे नीव दिवाल उसारी भसमंदर की ढेरी ॥
संचे संचि न देई किस ही अंधु जाणै सभ मेरी ॥
सोइन लंका सोइन माड़ी संपै किसै न केरी ॥5॥
सुणि मूरख मंन अजाणा ॥
होगु तिसै का भाणा ॥1॥ रहाउ ॥
साहु हमारा ठाकुरु भारा हम तिस के वणजारे ॥
जीउ पिंडु सभ रासि तिसै की मारि आपे जीवाले ॥6॥1॥13॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: हे मेरे शरीर ! मैं आपको समझाता हूँ, मेरी नसीहत सुन। तु पराई निंदा का ध्यान रखता है, आप (औरों की) झूठी निंदा करता रहता है। हे जीव ! आप पराई स्त्री को (बुरी निगाह से) देखता है, आप चोरियां करता है, और बुराईआं करता है। हे मेरी काया ! जब जीवात्मा चली जाएगी, आप यहां ही रह जाएगा, आप तब छुटॅड़ स्त्री की तरह हैं जाएगा। हे मेरे शरीर ! आप (माया की) नींद में ही सोया रहा (आपको समझ ही नहीं आई कि) आप क्या करतूतें करता रहा। चोरी आदि करके जो धन माल मैं लाता रहा, आपको वह मन में पसंद आता रहा। (इस तरह) ना इस लोक में शोभा कमायी, ना परलोक में आसरा (मिलने का प्रबंध) मिला। कीमती मानस जनम व्यर्थ गवा डाला। 3। हे भाई ! (जीवात्मा के चले जाने पर अब) मैं काया बहुत दुखी हुई हूँ। हे नानक ! मेरी अब कोई बात नहीं पूछता। 1। रहाउ। हे नानक ! (कह) हे मूर्ख ! बढ़िया घोड़े, सोने-चांदी, कपड़ों के ढेर- कोई भी चीज (मौत के समय) किसी के साथ नहीं जाती। सब यहीं ही रह जाता है। मिश्री, मेवे आदि भी मैंने सब कुछ चख के देख लिया है। (इनमें भी इतना स्वाद नहीं जितना हे प्रभू !) आपका नाम मीठा है। 4। नींव रख-रख के मकानों की दीवारें खड़ी कीं, पर (मौत आने पर) ये राख की ढेरी की तरह हो गए। इकट्ठे किए हुए (माया के) खजाने किसी को हाथ से नहीं देता, मूर्ख समझता है कि ये सब कुछ मेरा है (पर ये नहीं जानता कि) सोने की लंका सोने का महल (रावण के भी ना रहे, आप क्या बेचारा है) ये धन किसी का नहीं बना रहता। 5। हे मूर्ख अन्जान मन ! सुन। उस परमात्मा की रजा ही चलेगी (लब-लोभ आदि को त्याग के उसकी रजा में चलना सीख)। 1। रहाउ। हमारा मालिक प्रभू बड़ा शाहूकार है। हम सारे जीव उसके भेजे हुए वणजारे व्यापारी है (यहां नाम का व्यापार करने आए हुए हैं)। ये जीवात्मा ये शरीर उसी शाह की दी हुई राशि-पूँजी है। वह स्वयं ही मारता और स्वयं ही जीवन देता है। 6। 1। 13।
गउड़ी चेती महला 1 ॥
अवरि पंच हम एक जना किउ राखउ घर बारु मना ॥
मारहि लूटहि नीत नीत किसु आगै करी पुकार जना ॥1॥
स्री राम नामा उचरु मना ॥
आगै जम दलु बिखमु घना ॥1॥ रहाउ ॥
उसारि मड़ोली राखै दुआरा भीतरि बैठी सा धना ॥
अंम्रित केल करे नित कामणि अवरि लुटेनि सु पंच जना ॥2॥
ढाहि मड़ोली लूटिआ देहुरा सा धन पकड़ी एक जना ॥
जम डंडा गलि संगलु पड़िआ भागि गए से पंच जना ॥3॥
कामणि लोड़ै सुइना रुपा मित्र लुड़ेनि सु खाधाता ॥
नानक पाप करे तिन कारणि जासी जमपुरि बाधाता ॥4॥2॥14॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी चेती महला 1 ॥ हे मेरे मन ! मेरे वैरी (कामादिक) पाँच हैं। मैं अकेला हूँ। मैं (इनसे) सारा घर कैसे बचाऊँ? हे भाई ! ये पाँचों मुझे नित्य मारते लूटते रहते हैं, मैं किस के पास शिकायत करूँ?। 1। हे मन ! परमात्मा का नाम सिमर, सामने यमराज की तगड़ी फौज दिख रही है (भाव, मौत आने वाली है)। 1। रहाउ। परमात्मा ने ये शरीर बना के (इसके नाक-कान आदि) दस दरवाजे बना दिए। (उसके हुकम अनुसार) इस शरीर में जीव स्त्री आ टिकी। पर ये जीव स्त्री अपने आप को अमर जान के सदा (दुनिया वाले) रंग तमाशे करती रहती है, और वह वैरी कामादिक पाँचो जने (अंदर से भले गुण) लुटते जा रहे हैं। 2। (यम की फौज ने आखिर) शरीर मठ गिरा के मंदिर लूट लिया, जीव स्त्री अकेली ही पकड़ी गई। जम का डण्डा सिर पर बजा, जम का संगल गले में पड़ा, वह (लूटने वाले) पाँचों जने भाग लिए (साथ छोड़ गए)। 3। (सारी उम्र जब तक जीव जीवित रहा) पत्नी सोना-चाँदी (के गहने) मांगती रहती है। संबंधी मित्र, खान-पीने के पदार्थ मांगते रहते हैं। हे नानक ! इनकी ही खातिर जीव पाप करता रहता है, आखिर (पापों के कारण) बंधा हुआ यम की नगरी में धकेला जाता है। 4। 2। 14।
गउड़ी चेती महला 1 ॥
मुंद्रा ते घट भीतरि मुंद्रा कांइआ कीजै खिंथाता ॥
पंच चेले वसि कीजहि रावल इहु मनु कीजै डंडाता ॥1॥
जोग जुगति इव पावसिता ॥
एकु सबदु दूजा होरु नासति कंद मूलि मनु लावसिता ॥1॥ रहाउ ॥
मूंडि मुंडाइऐ जे गुरु पाईऐ हम गुरु कीनी गंगाता ॥
त्रिभवण तारणहारु सुआमी एकु न चेतसि अंधाता ॥2॥
करि पटंबु गली मनु लावसि संसा मूलि न जावसिता ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी चेती महला 1 ॥ हे रावल !अपने शरीर के अंदर ही बुरी भावनाओं को रोक – ये है असल मुंद्रां। शरीर को नाशवंत समझ-इस यकीन को गुदड़ी बना। हे रावल ! (आप औरों को चेले बनाते फिरते हो) अपने पाँचों, ज्ञानेंद्रियों को वश में करो- चेले बनाओ। अपने मन को डण्डा बनाओ (और हाथ में पकड़ो। भाव, काबू करो)। 1। तो आप इस तरह जोग (प्रभू चरणों में जुड़ने) का तरीका ढूँढ लेगा। (हे रावल !) आप गाजर मूली आदि खाने में मन जोड़ता फिरता है। पर, अगर आप उस गुरू शबद में मन जोड़े (जिस के बिना) कोई और (जीवन राह दिखाने में स्मर्थ) नहीं।1। रहाउ। अगर (गंगा के किनारे) सिर मुण्डन से गुरू मिलता है (भाव, आप तो गंगा के तट पर सिर मुंडवा के गुरू धारण करते हो) तो हमने तो गुरू को ही गंगा बना लिया है, (हमारे लिए गुरू ही महा पवित्र तीर्थ है)। अंधा (रावल) उस एक मालिक को नहीं सिमरता जो तीनों भवनों (के जीवों) को उबारने के स्मर्थ है। 2। हे जोगी ! आप (योग का) दिखावा करके निरी बातों से ही लोगों का मनोरंजन करता है, पर आपकी अपनी संशय रक्ती मात्र भी दूर नहीं होता।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे शरीर ! मैं आपको समझाता हूँ, मेरी नसीहत सुन।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।