निंदा चिंदा करहि पराई झूठी लाइतबारी ॥
वेलि पराई जोहहि जीअड़े करहि चोरी बुरिआरी ॥
हंसु चलिआ तूं पिछै रहीएहि छुटड़ि होईअहि नारी ॥2॥
तूं काइआ रहीअहि सुपनंतरि तुधु किआ करम कमाइआ ॥
करि चोरी मै जा किछु लीआ ता मनि भला भाइआ ॥
हलति न सोभा पलति न ढोई अहिला जनमु गवाइआ ॥3॥
हउ खरी दुहेली होई बाबा नानक मेरी बात न पुछै कोई ॥1॥ रहाउ ॥
ताजी तुरकी सुइना रुपा कपड़ केरे भारा ॥
किस ही नालि न चले नानक झड़ि झड़ि पए गवारा ॥
कूजा मेवा मै सभ किछु चाखिआ इकु अंम्रितु नामु तुमारा ॥4॥
दे दे नीव दिवाल उसारी भसमंदर की ढेरी ॥
संचे संचि न देई किस ही अंधु जाणै सभ मेरी ॥
सोइन लंका सोइन माड़ी संपै किसै न केरी ॥5॥
सुणि मूरख मंन अजाणा ॥
होगु तिसै का भाणा ॥1॥ रहाउ ॥
साहु हमारा ठाकुरु भारा हम तिस के वणजारे ॥
जीउ पिंडु सभ रासि तिसै की मारि आपे जीवाले ॥6॥1॥13॥
अवरि पंच हम एक जना किउ राखउ घर बारु मना ॥
मारहि लूटहि नीत नीत किसु आगै करी पुकार जना ॥1॥
स्री राम नामा उचरु मना ॥
आगै जम दलु बिखमु घना ॥1॥ रहाउ ॥
उसारि मड़ोली राखै दुआरा भीतरि बैठी सा धना ॥
अंम्रित केल करे नित कामणि अवरि लुटेनि सु पंच जना ॥2॥
ढाहि मड़ोली लूटिआ देहुरा सा धन पकड़ी एक जना ॥
जम डंडा गलि संगलु पड़िआ भागि गए से पंच जना ॥3॥
कामणि लोड़ै सुइना रुपा मित्र लुड़ेनि सु खाधाता ॥
नानक पाप करे तिन कारणि जासी जमपुरि बाधाता ॥4॥2॥14॥
मुंद्रा ते घट भीतरि मुंद्रा कांइआ कीजै खिंथाता ॥
पंच चेले वसि कीजहि रावल इहु मनु कीजै डंडाता ॥1॥
जोग जुगति इव पावसिता ॥
एकु सबदु दूजा होरु नासति कंद मूलि मनु लावसिता ॥1॥ रहाउ ॥
मूंडि मुंडाइऐ जे गुरु पाईऐ हम गुरु कीनी गंगाता ॥
त्रिभवण तारणहारु सुआमी एकु न चेतसि अंधाता ॥2॥
करि पटंबु गली मनु लावसि संसा मूलि न जावसिता ॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे शरीर ! मैं आपको समझाता हूँ, मेरी नसीहत सुन।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।