बावन अखर जोरे आनि ॥ सकिआ न अखरु एकु पछानि ॥ सत का सबदु कबीरा कहै ॥ पंडित होइ सु अनभै रहै ॥ पंडित लोगह कउ बिउहार ॥ गिआनवंत कउ ततु बीचार ॥ जा कै जीअ जैसी बुधि होई ॥ कहि कबीर जानैगा सोई ॥45॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: (जगत ने) बावन अक्षरों का प्रयोग करके पुस्तकें लिख दी हैं। पर (ये जगत इन पुस्तकों के द्वारा) उस एक प्रभू को नहीं पहचान सका। जो नाश-रहित है। हे कबीर ! जो मनुष्य (इन अक्षरों की मदद से) प्रभू की सिफॅतसालाह करता है। वही है पंडित। और। वह ज्ञानावस्था में टिका रहता है। पर पंडित लोगों को तो ये विचार मिला हुआ है (कि अक्षर जोड़ के औरों को सुना देते हैं)। ज्ञानवान लोगों के लिए (ये अक्षर) तत्व के विचार का वसीला हैं। कबीर कहता है, जिस जीव के अंदर जैसी बुद्धि होती है। वह (इन अक्षरों के द्वारा भी) वही कुछ समझेगा (भाव। पुस्तकें लिख-पढ़ के आत्मिक जीवन को जानने वाला हो जाना जरूरी नहीं है)। 45।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु गउड़ी थितंी कबीर जी कंी ॥ सलोकु ॥ पंद्रह थितंी सात वार ॥ कहि कबीर उरवार न पार ॥ साधिक सिध लखै जउ भेउ ॥ आपे करता आपे देउ ॥1॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु गउड़ी थित्तिं कबीर जी की ॥ श्लोक ॥ (भरमी या भ्रमित लोग तो वर्त आदि रख के) पंद्रह तिथियां और सात वार (मनाते हैं)। पर कबीर (इन तिथयों-वारों द्वारा हर रोज) उस परमात्मा की सिफत सालाह करता है जो बेअंत है। सिफत सालाह की साधना करने वाला जो भी मनुष्य उस प्रभू का भेत पा लेता है (भाव। गहरा अपनत्व उसके साथ बना लेता है) उसको प्रकाश-स्वरूप करतार ही करतार हर जगह दिखाई देता है। 1।
थितंी॥ अंमावस महि आस निवारहु ॥ अंतरजामी रामु समारहु ॥ जीवत पावहु मोख दुआर ॥ अनभउ सबदु ततु निजु सार ॥1॥ चरन कमल गोबिंद रंगु लागा ॥ संत प्रसादि भए मन निरमल हरि कीरतन महि अनदिनु जागा ॥1॥ रहाउ ॥ परिवा प्रीतम करहु बीचार ॥ घट महि खेलै अघट अपार ॥ काल कलपना कदे न खाइ ॥ आदि पुरख महि रहै समाइ ॥2॥ दुतीआ दुह करि जानै अंग ॥ माइआ ब्रहम रमै सभ संग ॥ ना ओहु बढै न घटता जाइ ॥ अकुल निरंजन एकै भाइ ॥3॥ त्रितीआ तीने सम करि लिआवै ॥ आनद मूल परम पदु पावै ॥ साधसंगति उपजै बिस्वास ॥ बाहरि भीतरि सदा प्रगास ॥4॥ चउथहि चंचल मन कउ गहहु ॥ काम क्रोध संगि कबहु न बहहु ॥ जल थल माहे आपहि आप ॥ आपै जपहु आपना जाप ॥5॥ पांचै पंच तत बिसथार ॥ कनिक कामिनी जुग बिउहार ॥ प्रेम सुधा रसु पीवै कोइ ॥ जरा मरण दुखु फेरि न होइ ॥6॥ छठि खटु चक्र छहूं दिस धाइ ॥ बिनु परचै नही थिरा रहाइ ॥ दुबिधा मेटि खिमा गहि रहहु ॥ करम धरम की सूल न सहहु ॥7॥ सातैं सति करि बाचा जाणि ॥ आतम रामु लेहु परवाणि ॥ छूटै संसा मिटि जाहि दुख ॥ सुंन सरोवरि पावहु सुख ॥8॥ असटमी असट धातु की काइआ ॥ ता महि अकुल महा निधि राइआ ॥ गुर गम गिआन बतावै भेद ॥ उलटा रहै अभंग अछेद ॥9॥ नउमी नवै दुआर कउ साधि ॥ बहती मनसा राखहु बांधि ॥ लोभ मोह सभ बीसरि जाहु ॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: तिथि ॥ अमावस वाले दिन (व्रत। तीर्थ-स्नान आदि और कर्म-काण्ड) की आशाएं दूर करो। घट-घट के जानने वाले सर्व-व्यापक परमात्मा को हृदय में बसाओ। (आप इन तिथियों से जुड़े हुए कर्म-काण्ड करके मरने के बाद मुक्ति की आस रखते हैं। पर अगर परमात्मा का सिमरन करेंगे तो) इसी जनम में (विकारों। दुखों और वहिम-भरमों से) मुक्ति हासिल कर लेंगे। (इस सिमरन की बरकति से) आपका निरोल असल जगमगा उठेगा (अपना स्वतंत्र अस्तित्व निखर आएगा)। सतिगुरू का शबद अनुभवी रूप में प्रगट हो जाएगा। 1। जिस मनुष्य का प्यार गोबिंद के सुंदर चरणों के साथ बन जाता है। गुरू की कृपा से उसका मन पवित्र हो जाता है। परमात्मा की सिफत सालाह में जुड़ के वह मनुष्य विकारों से हर समय सुचेत रहता है। (हे भाई !) उस प्रीतम (के गुणों) का विचार करो (उस प्रीतम की सिफत सालाह करो। जो परमात्मा शरीरों की कैद में नहीं आता। बेअंत है। और (फिर भी) हरेक शरीर में खेल रहा है जो मनुष्य प्रभू-प्रीतम की सिफत सालाह करता है) उसे कभी मौत का डर नहीं सताता (क्योंकि) वह सदा सब के सिरजने वाले अकाल पुरख में जुड़ा रहता है। 2। (वह मनुष्य ये समझ लेता है कि जगत निरा प्रकृति नहीं। वह इस संसार के) दो अंग समझता है,माया और ब्रहम। ब्रहम (इस माया में) हरेक के साथ बस रहा है। वह कभी घटता-बढ़ता नहीं। सदा एक जैसा ही रहता है। उसका कोई खास कुल नहीं। वह निरंजन है (भाव। ये माया उस पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती)। 3। (प्रभू की सिफत सालाह करने वाले मनुष्य) माया के तीन गुणों को सहज अवस्था में समान रखता है (भाव। वह इन गुणों में कभी नहीं डोलता)। वह मनुष्य सबसे उच्च आत्मिक अवस्था को हासिल कर लेता है जो आनंद का श्रोत है; सत्संग में रहके उस मनुष्य के अंदर ये यकीन पैदा हो जाता है कि अंदर-बाहर हर जगह सदा प्रभू का ही प्रकाश है। 4। चौथी तिथि को (किसी कर्म-धर्म की जगह) इस चंचल मन को पकड़ के रखो। कभी काम-क्रोध की संगति में ना बैठो। जो परमात्मा जल में धरती पर (हर जगह) स्वयं ही स्वयं व्यापक है। उसकी ज्योति में जुड़ के वह नाम जपो जो आपके काम आने वाला है। 5। ये जगत पाँच तत्वों से (एक खेल सा) बना है (जो चार दिन में खत्म हो जाता है। पर ये बात भूल के ये जीव) धन और स्त्री दोनों की व्यस्तता में मस्त हो रहा है। यहाँ कोई दुर्लभ ही मनुष्य है जो परमात्मा के प्रेम अमृत का घूट पीता है। (जो पीता है) उसे फिर बुढ़ापे और मौत का सहम दुबारा कभी नहीं व्यापता। 6। मनुष्य की पाँचों ज्ञानेंद्रियां और छेवां मन- ये सारा साथ संसार (के पदार्थों की लालसा) में भटकता फिरता है। जब तक मनुष्य प्रभू की याद में नहीं जुड़ता। तब तक ये सारा साथ (इस भटकना में से हट के) टिकता नहीं। हे भाई ! भटकना मिटा के धीरज धारण करो और छोड़ो कर्मों-धर्मों का ये लम्बा टंटा (जिससे कुछ भी हाथ आने वाला नहीं है)। 7। हे भाई ! सतिगुरू की बाणी में श्रद्धा धारो। (इस बाणी के माध्यम से) परमात्मा (के नाम) को (अपने हृदय में) परो लो। (इस तरह) सहम दूर हो जाएगा। दुख-कलेश मिट जाएंगे। उस सरोवर में चुभ्भी लगा सकोगे। जहाँ सहम आदि कोई फुरने नहीं उठते और सुख भोगो। ये शरीर (लहू आदि) आठ धातों का बना हुआ है। इसमें वह परमात्मा बस रहा है जिसकी कोई खास कुल नहीं। जो सब गुणों का खजाना है। जिस मनुष्य को पहुँच वाले गुरू का ज्ञान ये भेद (कि शरीर में ही है प्रभू) बताता है। वह शारीरिक मोह से विरक्त हो के अविनाशी प्रभू में जुड़ा रहता है। 9। (हे भाई !) सारी शारीरिक इंद्रियों को काबू में रखो। इनसे उठते फुरनों को रोको। लोभ-मोह आदि सारे विकारों को भुला दो।
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(जगत ने) बावन अक्षरों का प्रयोग करके पुस्तकें लिख दी हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।