अंग 316

अंग
316
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਰਿ ਅੰਦਰਲਾ ਪਾਪੁ ਪੰਚਾ ਨੋ ਉਘਾ ਕਰਿ ਵੇਖਾਲਿਆ ॥
ਧਰਮ ਰਾਇ ਜਮਕੰਕਰਾ ਨੋ ਆਖਿ ਛਡਿਆ ਏਸੁ ਤਪੇ ਨੋ ਤਿਥੈ ਖੜਿ ਪਾਇਹੁ ਜਿਥੈ ਮਹਾ ਮਹਾਂ ਹਤਿਆਰਿਆ ॥
ਫਿਰਿ ਏਸੁ ਤਪੇ ਦੈ ਮੁਹਿ ਕੋਈ ਲਗਹੁ ਨਾਹੀ ਏਹੁ ਸਤਿਗੁਰਿ ਹੈ ਫਿਟਕਾਰਿਆ ॥
ਹਰਿ ਕੈ ਦਰਿ ਵਰਤਿਆ ਸੁ ਨਾਨਕਿ ਆਖਿ ਸੁਣਾਇਆ ॥
ਸੋ ਬੂਝੈ ਜੁ ਦਯਿ ਸਵਾਰਿਆ ॥੧॥
हरि अंदरला पापु पंचा नो उघा करि वेखालिआ ॥
धरम राइ जमकंकरा नो आखि छडिआ एसु तपे नो तिथै खड़ि पाइहु जिथै महा महां हतिआरिआ ॥
फिरि एसु तपे दै मुहि कोई लगहु नाही एहु सतिगुरि है फिटकारिआ ॥
हरि कै दरि वरतिआ सु नानकि आखि सुणाइआ ॥
सो बूझै जु दयि सवारिआ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू ने तपस्वी का अंदर का (छुपा हुआ) पाप पंचों को प्रगट करके दिखा दिया। धर्मराज ने अपने जमदूतों को कह दिया है कि इस तपस्वी को ले जा के उस जगह पर डालना जहाँ बड़े से बड़े पापी (डाले जाते हैं)। फिर (वहाँ भी) इस तपस्वी के मुँह कोई ना लगना। (क्योंकि) ये तपस्वी सतिगुरू द्वारा धिक्कारा हुआ है (गुरू से विछुड़ा हुआ है)। हे नानक ! जो ये कुछ प्रभू की दरगाह में घटित हुआ है वह कह के सुना दिया है। इस बात को वह मनुष्य समझता है जिसे प्रभू पति ने सवारा हुआ है। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਹਰਿ ਭਗਤਾਂ ਹਰਿ ਆਰਾਧਿਆ ਹਰਿ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਭਗਤ ਨਿਤ ਗਾਂਵਦੇ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸੁਖਦਾਈ ॥
ਹਰਿ ਭਗਤਾਂ ਨੋ ਨਿਤ ਨਾਵੈ ਦੀ ਵਡਿਆਈ ਬਖਸੀਅਨੁ ਨਿਤ ਚੜੈ ਸਵਾਈ ॥
ਹਰਿ ਭਗਤਾਂ ਨੋ ਥਿਰੁ ਘਰੀ ਬਹਾਲਿਅਨੁ ਅਪਣੀ ਪੈਜ ਰਖਾਈ ॥
ਨਿੰਦਕਾਂ ਪਾਸਹੁ ਹਰਿ ਲੇਖਾ ਮੰਗਸੀ ਬਹੁ ਦੇਇ ਸਜਾਈ ॥
ਜੇਹਾ ਨਿੰਦਕ ਅਪਣੈ ਜੀਇ ਕਮਾਵਦੇ ਤੇਹੋ ਫਲੁ ਪਾਈ ॥
ਅੰਦਰਿ ਕਮਾਣਾ ਸਰਪਰ ਉਘੜੈ ਭਾਵੈ ਕੋਈ ਬਹਿ ਧਰਤੀ ਵਿਚਿ ਕਮਾਈ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕੁ ਦੇਖਿ ਵਿਗਸਿਆ ਹਰਿ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥੨॥
मः ४ ॥
हरि भगतां हरि आराधिआ हरि की वडिआई ॥
हरि कीरतनु भगत नित गांवदे हरि नामु सुखदाई ॥
हरि भगतां नो नित नावै दी वडिआई बखसीअनु नित चड़ै सवाई ॥
हरि भगतां नो थिरु घरी बहालिअनु अपणी पैज रखाई ॥
निंदकां पासहु हरि लेखा मंगसी बहु देइ सजाई ॥
जेहा निंदक अपणै जीइ कमावदे तेहो फलु पाई ॥
अंदरि कमाणा सरपर उघड़ै भावै कोई बहि धरती विचि कमाई ॥
जन नानकु देखि विगसिआ हरि की वडिआई ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ४॥ हरी के भगत हरी को सिमरते हैं और हरी की सिफत सालाह करते हैं। भगत सदा हरी का कीर्तन गाते हैं और हरी का सुखदाई नाम (जपते हैं)। प्रभू ने भक्तों को सदा के लिए नाम (जपने) का गुण बख्शा है जो दिनो दिन सवाया बढ़ता है। प्रभू ने अपने बिरद की लाज रखी है और अपने भक्तों को हृदय में अडोल कर दिया है (भाव। माया के पीछे नहीं डोलने देता)। निंदकों से प्रभू लेखा मांगता है और बहुत सजा देता है। निंदक जैसा अपने मन में कमाते हैं। वैसा उन्हें फल मिलता है (क्योंकि) अंदर बैठ के भी किया हुआ काम जरूर प्रगट हो जाता है। चाहे कोई धरती में (छुप के) करे। (प्रभू का) दास नानक प्रभू की महिमा देख के प्रसन्न हो रहा है। 2।
ਪਉੜੀ ਮਃ ੫ ॥
ਭਗਤ ਜਨਾਂ ਕਾ ਰਾਖਾ ਹਰਿ ਆਪਿ ਹੈ ਕਿਆ ਪਾਪੀ ਕਰੀਐ ॥
ਗੁਮਾਨੁ ਕਰਹਿ ਮੂੜ ਗੁਮਾਨੀਆ ਵਿਸੁ ਖਾਧੀ ਮਰੀਐ ॥
ਆਇ ਲਗੇ ਨੀ ਦਿਹ ਥੋੜੜੇ ਜਿਉ ਪਕਾ ਖੇਤੁ ਲੁਣੀਐ ॥
ਜੇਹੇ ਕਰਮ ਕਮਾਵਦੇ ਤੇਵੇਹੋ ਭਣੀਐ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਾ ਖਸਮੁ ਵਡਾ ਹੈ ਸਭਨਾ ਦਾ ਧਣੀਐ ॥੩੦॥
पउड़ी मः ५ ॥
भगत जनां का राखा हरि आपि है किआ पापी करीऐ ॥
गुमानु करहि मूड़ गुमानीआ विसु खाधी मरीऐ ॥
आइ लगे नी दिह थोड़ड़े जिउ पका खेतु लुणीऐ ॥
जेहे करम कमावदे तेवेहो भणीऐ ॥
जन नानक का खसमु वडा है सभना दा धणीऐ ॥३०॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी महला ५॥ प्रभू (अपने) भक्तों का आप रखवाला है। पाप चितवने वाला (उनका) क्या बिगाड़ सकता है? (भाव। कुछ बिगाड़ नहीं सकता)। मूर्ख अहंकारी मनुष्य अहंकार करते हैं और (अहंकार-रूपी) जहर खा के मरते हैं (क्योंकि जिस जिंदगी पर मान करते हैं उसकी गिनती के) थोड़े दिन आखिर खत्म हो जाते हैं। जैसे पक्की फसल काटी जाती है और वह जैसे (अहंकार के) काम करते हैं। (दरगाह में भी) वही कहलवाते हैं (भाव। वैसे ही फल पाते हैं)। (पर) जो प्रभू सब का मालिक है। और बड़ा है वह (अपने) दास नानक का रखवाला है। 30।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਮਨਮੁਖ ਮੂਲਹੁ ਭੁਲਿਆ ਵਿਚਿ ਲਬੁ ਲੋਭੁ ਅਹੰਕਾਰੁ ॥
ਝਗੜਾ ਕਰਦਿਆ ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਦਰੈ ਸਬਦਿ ਨ ਕਰਹਿ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਸੁਧਿ ਮਤਿ ਕਰਤੈ ਸਭ ਹਿਰਿ ਲਈ ਬੋਲਨਿ ਸਭੁ ਵਿਕਾਰੁ ॥
ਦਿਤੈ ਕਿਤੈ ਨ ਸੰਤੋਖੀਅਹਿ ਅੰਤਰਿ ਤਿਸਨਾ ਬਹੁ ਅਗਿਆਨੁ ਅੰਧੵਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਮਨਮੁਖਾ ਨਾਲੋ ਤੁਟੀ ਭਲੀ ਜਿਨ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਪਿਆਰੁ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
मनमुख मूलहु भुलिआ विचि लबु लोभु अहंकारु ॥
झगड़ा करदिआ अनदिनु गुदरै सबदि न करहि वीचारु ॥
सुधि मति करतै सभ हिरि लई बोलनि सभु विकारु ॥
दितै कितै न संतोखीअहि अंतरि तिसना बहु अगिआनु अंधॵारु ॥
नानक मनमुखा नालो तुटी भली जिन माइआ मोह पिआरु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ सतिगुरू से भूले हुए मनुष्य मूल से ही भूले हुए हैं। क्योंकि उनके अंदर लब-लोभ और अहंकार है। उनका हरेक दिन (भाव। सारी उम्र) लालच-लोभ-अहंकार (संबंधी) झगड़े करते गुजरती है। वह सतिगुरू के शबद में विचार नहीं करते। करतार ने (मनमुखों) की होश और अक्ल (सुध-बुध) छीन ली है। निरे विकार ही बोलते हैं (भाव। निरे विकार भरे बचन ही करते हैं); वे किसी भी दात (के मिलने) पर संतुष्ट नहीं होते। क्योंकि उनके मन में बड़ी तृष्णा। अज्ञान व अंधेरा है। हे नानक ! (ऐसे) मनमुखों से संबंध टूटे हुए ही बेहतर हैं। क्योंकि उनका तो मोह-प्यार ही माया के साथ है। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਜਿਨਾ ਅੰਦਰਿ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਹੈ ਤਿਨੑਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਹੋਇ ॥
ਓਹੁ ਆਵੈ ਜਾਇ ਭਵਾਈਐ ਸੁਪਨੈ ਸੁਖੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਕੂੜੁ ਕਮਾਵੈ ਕੂੜੁ ਉਚਰੈ ਕੂੜਿ ਲਗਿਆ ਕੂੜੁ ਹੋਇ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਹੈ ਦੁਖਿ ਬਿਨਸੈ ਦੁਖੁ ਰੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਧਾਤੁ ਲਿਵੈ ਜੋੜੁ ਨ ਆਵਈ ਜੇ ਲੋਚੈ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
ਜਿਨ ਕਉ ਪੋਤੈ ਪੁੰਨੁ ਪਇਆ ਤਿਨਾ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੨॥
मः ४ ॥
जिना अंदरि दूजा भाउ है तिन॑ा गुरमुखि प्रीति न होइ ॥
ओहु आवै जाइ भवाईऐ सुपनै सुखु न कोइ ॥
कूड़ु कमावै कूड़ु उचरै कूड़ि लगिआ कूड़ु होइ ॥
माइआ मोहु सभु दुखु है दुखि बिनसै दुखु रोइ ॥
नानक धातु लिवै जोड़ु न आवई जे लोचै सभु कोइ ॥
जिन कउ पोतै पुंनु पइआ तिना गुर सबदी सुखु होइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ४॥ जिन मनुष्यों के हृदय में माया का प्यार है उनके (हृदय में) सतिगुरू के सन्मुख रहने वाला स्नेह नहीं होता। उसे सपने में भी सुख नहीं मिलता और वह पैदा होने मरने के चक्र-व्यूह में भटकता फिरता है। जो मनुष्य (माया मोह-रूप) झूठा काम करता है। और (जीभ से भी) झूठ बोलता है और झूठ में लग के झूठ (का ही रूप) हो जाता है। (क्योंकि) माया का मोह (-रूप झूठ) निरोल दुख (का कारण) है (इस लिए वह) दुख में ही समाप्त हो जाता है और दुख (का रोना ही) रोता रहता है। चाहे हरेक मनुष्य चाहता रहे (पर) हे नानक ! माया और लिव का मेल नहीं फॅब सकता। (पिछले किए हुए भले कर्मों के अनुसार) जिन्होंने (मन-रूपी) पलड़े में (भले संस्कारों का एकत्र-रूप) पुन्य (उकरा) हुआ है। उन्हें सतिगुरू के शबद के द्वारा सुख मिलता है। 2।
ਪਉੜੀ ਮਃ ੫ ॥
ਨਾਨਕ ਵੀਚਾਰਹਿ ਸੰਤ ਮੁਨਿ ਜਨਾਂ ਚਾਰਿ ਵੇਦ ਕਹੰਦੇ ॥
ਭਗਤ ਮੁਖੈ ਤੇ ਬੋਲਦੇ ਸੇ ਵਚਨ ਹੋਵੰਦੇ ॥
ਪਰਗਟ ਪਾਹਾਰੈ ਜਾਪਦੇ ਸਭਿ ਲੋਕ ਸੁਣੰਦੇ ॥
ਸੁਖੁ ਨ ਪਾਇਨਿ ਮੁਗਧ ਨਰ ਸੰਤ ਨਾਲਿ ਖਹੰਦੇ ॥
ਓਇ ਲੋਚਨਿ ਓਨਾ ਗੁਣਾ ਨੋ ਓਇ ਅਹੰਕਾਰਿ ਸੜੰਦੇ ॥
ਓਇ ਵੇਚਾਰੇ ਕਿਆ ਕਰਹਿ ਜਾਂ ਭਾਗ ਧੁਰਿ ਮੰਦੇ ॥
पउड़ी मः ५ ॥
नानक वीचारहि संत मुनि जनां चारि वेद कहंदे ॥
भगत मुखै ते बोलदे से वचन होवंदे ॥
परगट पाहारै जापदे सभि लोक सुणंदे ॥
सुखु न पाइनि मुगध नर संत नालि खहंदे ॥
ओइ लोचनि ओना गुणा नो ओइ अहंकारि सड़ंदे ॥
ओइ वेचारे किआ करहि जां भाग धुरि मंदे ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी महला ५ ॥ हे नानक ! संत और मुनि जन (अपने) विचार देते हैं और चारों वेद (भाव। पुरातन धर्म पुस्तकें) भी (यही बात) कहते हैं। (कि) भगत जन जो बचन मुँह से बोलते हैं वह (सही) होते हैं। (भगत) सारे संसार में प्रसिद्ध होते हैं और (उनकी शोभा) सारे लोक सुनते हैं। जो मूर्ख मनुष्य (ऐसे) संतों से वैर करते हैं। वह सुख नहीं पाते। (वह दोखी) जलते तो अहंकार में हैं। (पर) भगत जनों के गुणों को तरसते हैं। इन दोखी मनुष्यों के वश में भी क्या है? क्योंकि शुरू से ही (बुरे कर्म करने के कारण) बुरे (संस्कार ही) उनका हिस्सा हैं।

संदर्भ: यह अंग 316 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।

Karol Bagh की shopping street की भीड़, और घर लौटते वक़्त की थकान।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 40 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 316” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 317 →, पीछे का: ← अंग 315

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।