अंग 315

अंग
315
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਰਹਦੇ ਖੁਹਦੇ ਨਿੰਦਕ ਮਾਰਿਅਨੁ ਕਰਿ ਆਪੇ ਆਹਰੁ ॥
ਸੰਤ ਸਹਾਈ ਨਾਨਕਾ ਵਰਤੈ ਸਭ ਜਾਹਰੁ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
रहदे खुहदे निंदक मारिअनु करि आपे आहरु ॥
संत सहाई नानका वरतै सभ जाहरु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ (जन्म जन्मांतरों से पाप करके निंदक मनुष्य बहुत कुछ तो आगे ही नाम की ओर से मर चुके होते हैं) बाकी थोड़े बहुत (जो भले संस्कार रह जाते हैं) उनको प्रभू खुद उद्यम करके (भाव। निंदकों को निंदा में लगा के खत्म करा देता है) और। हे नानक ! संत जनों का राखा हरी सब जगह प्रगट खेल कर रहा है। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਮੁੰਢਹੁ ਭੁਲੇ ਮੁੰਢ ਤੇ ਕਿਥੈ ਪਾਇਨਿ ਹਥੁ ॥
ਤਿੰਨੈ ਮਾਰੇ ਨਾਨਕਾ ਜਿ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਮਰਥੁ ॥੨॥
मः ५ ॥
मुंढहु भुले मुंढ ते किथै पाइनि हथु ॥
तिंनै मारे नानका जि करण कारण समरथु ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ जो मनुष्य पहले से ही प्रभू से टूटे हुए हैं। वे और कौन सा आसरा लें? (क्योंकि) हे नानक ! ये उस प्रभू ने खुद मारे हुए हैं। जो सारी सृष्टि को रचने में स्मर्थ है। 2।
ਪਉੜੀ ੫ ॥
ਲੈ ਫਾਹੇ ਰਾਤੀ ਤੁਰਹਿ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਣੈ ਪ੍ਰਾਣੀ ॥
ਤਕਹਿ ਨਾਰਿ ਪਰਾਈਆ ਲੁਕਿ ਅੰਦਰਿ ਠਾਣੀ ॥
ਸੰਨੑੀ ਦੇਨਿੑ ਵਿਖੰਮ ਥਾਇ ਮਿਠਾ ਮਦੁ ਮਾਣੀ ॥
ਕਰਮੀ ਆਪੋ ਆਪਣੀ ਆਪੇ ਪਛੁਤਾਣੀ ॥
ਅਜਰਾਈਲੁ ਫਰੇਸਤਾ ਤਿਲ ਪੀੜੇ ਘਾਣੀ ॥੨੭॥
पउड़ी ५ ॥
लै फाहे राती तुरहि प्रभु जाणै प्राणी ॥
तकहि नारि पराईआ लुकि अंदरि ठाणी ॥
संन॑ी देनि॑ विखंम थाइ मिठा मदु माणी ॥
करमी आपो आपणी आपे पछुताणी ॥
अजराईलु फरेसता तिल पीड़े घाणी ॥२७॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ५ ॥ मनुष्य रात के रस्से ले के (पराए घरों को लूटने के लिए) चलते हैं (पर) प्रभू उनको जानता है। अंदर छुप के पराई सि्त्रयों को ताकते हैं। मुश्किल जगह पर सेंध लगाते हैं और शराब को मीठा समझ के पीते हैं। (आखिर में) अपने अपने किए कर्मों के अनुसार खुद ही पछताते हैं। (क्योंकि) मौत का फरिश्ता बुरे काम करने वालों को ऐसे पीढ़ता है जैसे घाणी में तिल। 27।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਸੇਵਕ ਸਚੇ ਸਾਹ ਕੇ ਸੇਈ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਦੂਜਾ ਸੇਵਨਿ ਨਾਨਕਾ ਸੇ ਪਚਿ ਪਚਿ ਮੁਏ ਅਜਾਣ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
सेवक सचे साह के सेई परवाणु ॥
दूजा सेवनि नानका से पचि पचि मुए अजाण ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५ ॥ जो मनुष्य सच्चे शाह (प्रभू) के सेवक हैं वही (प्रभू की हजूरी में) कबूल होते हैं। हे नानक ! जो (उस सच्चे शाह को छोड़ के) दूसरे की सेवा करते हैं। वे मूर्ख खप-खप के मरते हैं। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਜੋ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਲੇਖੁ ਪ੍ਰਭ ਮੇਟਣਾ ਨ ਜਾਇ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਧਨੁ ਵਖਰੋ ਨਾਨਕ ਸਦਾ ਧਿਆਇ ॥੨॥
मः ५ ॥
जो धुरि लिखिआ लेखु प्रभ मेटणा न जाइ ॥
राम नामु धनु वखरो नानक सदा धिआइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५ ॥ हे प्रभू ! आरम्भ से (किए कर्मों के मुताबिक) जो (संस्कार-रूपी) लेख (हृदय में) उकरा गया है। वह मिटाया नहीं जा सकता। (पर हाँ) हे नानक ! प्रभू का नाम-धन और सौदा (एकत्र करो)। नाम सदा सिमरो (इस तरह पिछला लेख मिट सकता है)। 2।
ਪਉੜੀ ੫ ॥
ਨਾਰਾਇਣਿ ਲਇਆ ਨਾਠੂੰਗੜਾ ਪੈਰ ਕਿਥੈ ਰਖੈ ॥
ਕਰਦਾ ਪਾਪ ਅਮਿਤਿਆ ਨਿਤ ਵਿਸੋ ਚਖੈ ॥
ਨਿੰਦਾ ਕਰਦਾ ਪਚਿ ਮੁਆ ਵਿਚਿ ਦੇਹੀ ਭਖੈ ॥
ਸਚੈ ਸਾਹਿਬ ਮਾਰਿਆ ਕਉਣੁ ਤਿਸ ਨੋ ਰਖੈ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਸਰਣਾਗਤੀ ਜੋ ਪੁਰਖੁ ਅਲਖੈ ॥੨੮॥
पउड़ी ५ ॥
नाराइणि लइआ नाठूंगड़ा पैर किथै रखै ॥
करदा पाप अमितिआ नित विसो चखै ॥
निंदा करदा पचि मुआ विचि देही भखै ॥
सचै साहिब मारिआ कउणु तिस नो रखै ॥
नानक तिसु सरणागती जो पुरखु अलखै ॥२८॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ५ ॥ जिस मनुष्य को ईश्वर से ही ठेडा बजे। वह (जिंदगी की सही राह पर) टिक नहीं सकता। वह बेअंत पाप करता रहता है। सदा (विकारों का) विष ही चखता रहता है (भाव। उसे विकारों का चस्का पड़ा रहता है)। दूसरों के ऐब ढूँढ-ढूँढ के ख्वार होता है और अपने आप में जलता है। वह (समझो) सच्चे परमात्मा द्वारा मारा हुआ है। कोई उसकी सहायता नहीं कर सकता। हे नानक ! (इस विष से बचने के लिए) उस अकाल पुरख की शरण पड़ो जो अलख। (अदृश्य) है। 28।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਨਰਕ ਘੋਰ ਬਹੁ ਦੁਖ ਘਣੇ ਅਕਿਰਤਘਣਾ ਕਾ ਥਾਨੁ ॥
ਤਿਨਿ ਪ੍ਰਭਿ ਮਾਰੇ ਨਾਨਕਾ ਹੋਇ ਹੋਇ ਮੁਏ ਹਰਾਮੁ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
नरक घोर बहु दुख घणे अकिरतघणा का थानु ॥
तिनि प्रभि मारे नानका होइ होइ मुए हरामु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ बहुत भारे दुख-रूप घोर नर्क अकृतज्ञ मनुष्य का ठिकाना है। हे नानक ! अकृतज्ञ मनुष्य उस प्रभू द्वारा मारे हुए होते हैं। (इन दुखों में) वे ख्वार हो हो के मरते हैं। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਅਵਖਧ ਸਭੇ ਕੀਤਿਅਨੁ ਨਿੰਦਕ ਕਾ ਦਾਰੂ ਨਾਹਿ ॥
ਆਪਿ ਭੁਲਾਏ ਨਾਨਕਾ ਪਚਿ ਪਚਿ ਜੋਨੀ ਪਾਹਿ ॥੨॥
मः ५ ॥
अवखध सभे कीतिअनु निंदक का दारू नाहि ॥
आपि भुलाए नानका पचि पचि जोनी पाहि ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ सारे रोगों की दवा उस प्रभू ने बनाई है (भाव। हो सकती हैं)। पर निंदकों (के निंदा-रोग का) कोई इलाज नहीं। हे नानक ! प्रभू ने खुद वह भुलेखे डाले हुए हैं (इस अपने किए के अनुसार) निंदक खप-खप के जूनियों में पड़ते हैं। 2।
ਪਉੜੀ ੫ ॥
ਤੁਸਿ ਦਿਤਾ ਪੂਰੈ ਸਤਿਗੁਰੂ ਹਰਿ ਧਨੁ ਸਚੁ ਅਖੁਟੁ ॥
ਸਭਿ ਅੰਦੇਸੇ ਮਿਟਿ ਗਏ ਜਮ ਕਾ ਭਉ ਛੁਟੁ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਬੁਰਿਆਈਆਂ ਸੰਗਿ ਸਾਧੂ ਤੁਟੁ ॥
ਵਿਣੁ ਸਚੇ ਦੂਜਾ ਸੇਵਦੇ ਹੁਇ ਮਰਸਨਿ ਬੁਟੁ ॥
ਨਾਨਕ ਕਉ ਗੁਰਿ ਬਖਸਿਆ ਨਾਮੈ ਸੰਗਿ ਜੁਟੁ ॥੨੯॥
पउड़ी ५ ॥
तुसि दिता पूरै सतिगुरू हरि धनु सचु अखुटु ॥
सभि अंदेसे मिटि गए जम का भउ छुटु ॥
काम क्रोध बुरिआईआं संगि साधू तुटु ॥
विणु सचे दूजा सेवदे हुइ मरसनि बुटु ॥
नानक कउ गुरि बखसिआ नामै संगि जुटु ॥२९॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ५॥ (जिन मनुष्यों को) पूरे सतिगुरू ने प्रभू का सच्चा और ना-खत्म होने वाला धन प्रसन्न हो के दिया है। उनके सारे फिक्र मिट जाते हैं और मौत का डर दूर हो जाता है (और उनके) काम-क्रोध आदि पाप संतों की संगति में समाप्त हो जाते हैं; काम, क्रोध एवं बुराइयां संतों की संगति करने से मिट जाते हैं। पर जो मनुष्य सच्चे हरी के अलावा किसी और की सेवा करते हैं। वह बोट हो के (भाव। निआसरे हो के) मरते हैं। हे नानक ! जिस मनुष्य पर सतिगुरू के द्वारा प्रभू ने बख्शिश की है वह निरोल नाम में जुटा हुआ है। 29।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਤਪਾ ਨ ਹੋਵੈ ਅੰਦ੍ਰਹੁ ਲੋਭੀ ਨਿਤ ਮਾਇਆ ਨੋ ਫਿਰੈ ਜਜਮਾਲਿਆ ॥
ਅਗੋ ਦੇ ਸਦਿਆ ਸਤੈ ਦੀ ਭਿਖਿਆ ਲਏ ਨਾਹੀ ਪਿਛੋ ਦੇ ਪਛੁਤਾਇ ਕੈ ਆਣਿ ਤਪੈ ਪੁਤੁ ਵਿਚਿ ਬਹਾਲਿਆ ॥
ਪੰਚ ਲੋਗ ਸਭਿ ਹਸਣ ਲਗੇ ਤਪਾ ਲੋਭਿ ਲਹਰਿ ਹੈ ਗਾਲਿਆ ॥
ਜਿਥੈ ਥੋੜਾ ਧਨੁ ਵੇਖੈ ਤਿਥੈ ਤਪਾ ਭਿਟੈ ਨਾਹੀ ਧਨਿ ਬਹੁਤੈ ਡਿਠੈ ਤਪੈ ਧਰਮੁ ਹਾਰਿਆ ॥
ਭਾਈ ਏਹੁ ਤਪਾ ਨ ਹੋਵੀ ਬਗੁਲਾ ਹੈ ਬਹਿ ਸਾਧ ਜਨਾ ਵੀਚਾਰਿਆ ॥
ਸਤ ਪੁਰਖ ਕੀ ਤਪਾ ਨਿੰਦਾ ਕਰੈ ਸੰਸਾਰੈ ਕੀ ਉਸਤਤੀ ਵਿਚਿ ਹੋਵੈ ਏਤੁ ਦੋਖੈ ਤਪਾ ਦਯਿ ਮਾਰਿਆ ॥
ਮਹਾ ਪੁਰਖਾਂ ਕੀ ਨਿੰਦਾ ਕਾ ਵੇਖੁ ਜਿ ਤਪੇ ਨੋ ਫਲੁ ਲਗਾ ਸਭੁ ਗਇਆ ਤਪੇ ਕਾ ਘਾਲਿਆ ॥
ਬਾਹਰਿ ਬਹੈ ਪੰਚਾ ਵਿਚਿ ਤਪਾ ਸਦਾਏ ॥
ਅੰਦਰਿ ਬਹੈ ਤਪਾ ਪਾਪ ਕਮਾਏ ॥
सलोक मः ४ ॥
तपा न होवै अंद्रहु लोभी नित माइआ नो फिरै जजमालिआ ॥
अगो दे सदिआ सतै दी भिखिआ लए नाही पिछो दे पछुताइ कै आणि तपै पुतु विचि बहालिआ ॥
पंच लोग सभि हसण लगे तपा लोभि लहरि है गालिआ ॥
जिथै थोड़ा धनु वेखै तिथै तपा भिटै नाही धनि बहुतै डिठै तपै धरमु हारिआ ॥
भाई एहु तपा न होवी बगुला है बहि साध जना वीचारिआ ॥
सत पुरख की तपा निंदा करै संसारै की उसतती विचि होवै एतु दोखै तपा दयि मारिआ ॥
महा पुरखां की निंदा का वेखु जि तपे नो फलु लगा सभु गइआ तपे का घालिआ ॥
बाहरि बहै पंचा विचि तपा सदाए ॥
अंदरि बहै तपा पाप कमाए ॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ जो मनुष्य अंदर से लोभी हो और जो कोढ़ी सदा माया के लिए भटकता फिरे। वह (सच्चा) तपस्वी नहीं हो सकता। ये तपस्वी पहले (अपने आप) बुलाने पर आदर की भिक्षा नहीं लेता था। और बाद में पछता कर इसने पुत्र को ला के (पंगति) में बैठा दिया। (नगर के) मुखी लोग सारे हसने लग पड़े (और कहने लगे कि) ये तपस्वी लोभ की लहर में गला पड़ा है। जहाँ थोड़ा धन देखता है। वहाँ नजदीक छूता भी नहीं। और ज्यादा धन देख के तपस्वी ने अपना धर्म हार दिया है। भले मनुष्यों ने इकट्ठे हो के विचार की है (और फैसला किया है) कि हे भाई ! यह (सच्चा) तपस्वी नहीं है बगुला है (भाव। पाखण्डी है)। भले मनुष्यों की यह तपा निंदा करता है और संसार की उस्तति में है (भाव। संसारी जीवों की उस्तति से खुश होता है) इस दूषण के कारण इस तपे को पति प्रभू ने (आत्मिक जीवन की तरफ से) मुर्दा कर दिया है। देखो ! महापुरुषों की निंदा करने का इस तपे को ये फल मिला है कि इस की (अब तक की की हुई) सारी मेहनत निश्फल गई है। बाहर नगर के मुखी लोगों में बैठ के अपने आप को तपस्वी कहलवाता है। और अंदर बैठ के तपस्वी बुरे कर्म करता है।

संदर्भ: यह अंग 315 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Pragati Maidan के पीछे यमुना के किनारे शाम का सूरज।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 10 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 315” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 316 →, पीछे का: ← अंग 314

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।