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जंगल के किनारे एक सभा जुटी है। समिधा की गंध है, धुएँ की एक पतली लकीर है, और बीच में कुछ ब्रह्मवादी बैठे हैं, वे लोग जिनका सारा दिन एक ही सवाल के इर्द गिर्द बीतता है। कोई यहाँ तर्क जीतने नहीं आया, कोई किसी को हराने नहीं आया। बात यह उठी है कि यह जो सब कुछ चल रहा है, इसका कारण आख़िर है क्या। हम किससे जन्मे, किसके बल पर यह देह साँस लेती है, सुख और दुख किसके इशारे पर आते जाते हैं, और अन्त में हम टिकते किसमें हैं। श्वेताश्वतर उपनिषद् यहीं से खुलता है, और खुलते ही वह कोई उत्तर हाथ में नहीं थमाता। वह पहले सवाल को और चौड़ा कर देता है।
कृष्ण यजुर्वेद का यह उपनिषद् छह अध्यायों में चलता है और उपनिषदों के बीच अपनी एक अलग चाल रखता है। यहाँ सांख्य की पूरी शब्दावली मौजूद है, प्रधान, गुण, क्षर और अक्षर, क्षेत्रज्ञ, और ठीक उसी साँस में वह एक ईश्वर भी मौजूद है जिसे यह उपनिषद् रुद्र, हर, ईशान और महेश्वर कहकर पुकारता है। ये दोनों यहाँ एक दूसरे को काटते नहीं, एक ही ढाँचे के दो हिस्से बनकर खड़े रहते हैं। और छठे अध्याय के आख़िरी श्लोक में यह उपनिषद् वह शब्द बोल देता है जो उपनिषदों में इससे पहले इतनी साफ़ आवाज़ में कहीं नहीं आया था। वह शब्द है भक्ति।
इस उपनिषद् के मुख्य किरदार
ब्रह्मवादी: वे मनीषी जिनकी सभा से यह उपनिषद् शुरू होता है, जो कारण का सवाल उठाते हैं और किसी सस्ते उत्तर पर नहीं ठहरते।
श्वेताश्वतर: वह ऋषि जिसने तप के बल और देव की कृपा से यह विद्या पाई और आगे सौंपी, और जिसके नाम से यह उपनिषद् जाना जाता है।
रुद्र: वह एक सत्ता जिसे यह उपनिषद् नाम देकर पुकारता है, जो सबको समेट भी लेता है और शरण भी देता है।
देवात्मशक्ति: ईश्वर की अपनी वह शक्ति जो उसके ही गुणों के परदे में छिपी रहती है, और जिसे ध्यान में उतरे हुए लोगों ने देखा।
अजा: तीन रंगों वाली वह अजन्मा, जिससे अपने ही रूप की अनगिनत प्रजा जन्मती है, और जिसे सांख्य की परिपाटी प्रकृति कहकर पढ़ती है।
जीव: बाल के अगले सिरे के सौवें हिस्से का फिर सौवाँ भाग, इतना सूक्ष्म, और फिर भी अनन्तता के योग्य।
हंस: वह पंछी जो ब्रह्मचक्र पर घूमता रहता है, और प्रेरक को अपने से अलग पहचान लेने पर अमृत पा जाता है।
सभा का पहला सवाल: कारण कौन है
पहला श्लोक बिना किसी भूमिका के सीधे सभा की बात उठा लेता है। ब्रह्मवादी कहते हैं, और फिर सवाल आता है, “किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठा”, कारण कौन सा ब्रह्म है, हम कहाँ से उपजे, किसके सहारे जीते हैं, और किसमें जाकर ठहरते हैं। साथ ही एक और पूछ है, किसके अधीन होकर हम सुख और उससे इतर, यानी दुख, दोनों की इस व्यवस्था में बरतते हैं। ध्यान देने की बात यह है कि सवाल पूछने वाले अनजान लोग नहीं हैं। वे ब्रह्म को जानने वाले हैं, और फिर भी पूछ रहे हैं। यह उपनिषद् इसी बिन्दु से शुरू होता है, जहाँ जानकारी ख़त्म होती है और जिज्ञासा शुरू।
दूसरा श्लोक उन सब उत्तरों को एक पंक्ति में गिना देता है जो उस समय हवा में तैर रहे थे। “कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुषः”, काल, स्वभाव, नियति, यदृच्छा, भूत, योनि, पुरुष, इन सबको कारण मानकर सोचा जाता है। काल यानी समय ही सब कुछ पकाता है। स्वभाव यानी हर चीज़ अपनी अपनी प्रकृति से चलती है। नियति यानी सब पहले से बँधा है। यदृच्छा यानी कुछ भी बँधा नहीं, सब संयोग है। भूत यानी पंचतत्त्व ही मूल हैं। योनि यानी जन्म की परम्परा ही आगे बढ़ती रहती है। और पुरुष यानी चेतन आत्मा ही सब कुछ है।
फिर वही श्लोक एक वाक्य में इन सबको तौल देता है। इनका कोई संयोग भी कारण नहीं बनता, क्योंकि आत्मभाव इनसे बनता नहीं, और आत्मा भी सुख दुख के हेतु पर अपना अधिकार नहीं रखती, वह भी अनीश है। यह एक बहुत कड़ी बात है। उपनिषद् काल को भी नहीं छोड़ता, संयोग को भी नहीं, और उस अकेली आत्मा को भी नहीं जो अपने सुख दुख की मालिक नहीं है। सब उत्तर एक एक कर हटा दिए जाते हैं, और मैदान ख़ाली छोड़ दिया जाता है। यही ख़ाली मैदान इस उपनिषद् की असली शुरुआत है।
उत्तर तर्क से नहीं आता। तीसरा श्लोक कहता है, “ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्”, ध्यानयोग के पीछे पीछे चलते हुए उन्होंने उस देवात्मशक्ति को देखा जो अपने ही गुणों में छिपी हुई थी। और आगे उसी श्लोक में वह पहचान खुलती है, वही एक है जो काल और आत्मा समेत उन सारे कारणों के ऊपर बैठकर उन्हें चलाता है। यानी काल झूठा नहीं है, स्वभाव झूठा नहीं है, पर वे किसी के अधीन हैं। जो सबसे ऊपर बैठा है, वह गिनती में एक है, और वह चेतन है।
सार: यह उपनिषद् कारण का सवाल पूछकर उस युग के सारे तैयार उत्तर सामने रखता है और एक एक कर उन्हें अधूरा ठहरा देता है। जो बचता है वह कोई सिद्धान्त नहीं, एक दर्शन है, जो ध्यान में उतरे लोगों को हुआ। पहली ही चोट में यह उपनिषद् बता देता है कि यहाँ बहस से नहीं, बैठने से काम चलेगा।
ब्रह्मचक्र, और उस पर घूमता हुआ हंस
अब एक पहिया सामने आता है, और उसके साथ गिनतियों की ऐसी बौछार जो पहली बार में चकरा देती है। एक नेमि यानी एक ही घेरा, तीन परतें, सोलह सिरे, पचास आरे, बीस प्रत्यर, छह अष्टक, एक पाश जिसका रूप सारा विश्व है, तीन मार्गों का भेद, और दो निमित्तों से उठा हुआ एक मोह। फिर एक नदी का चित्र, जिसमें पाँच स्रोत हैं, पाँच योनियों वाला उग्र मुख है, पाँच प्राणों की लहरें हैं, पाँच बुद्धियों की जड़ है, पाँच भँवर हैं, पाँच दुखों का वेग है, पचास भेद हैं और पाँच पर्व हैं।
यह उपनिषद् इन संख्याओं को यहीं छोड़ देता है, खोलता नहीं। परम्परा ने इन्हें कई तरह से पढ़ा है, और शांकरभाष्य में इनका एक ब्योरेवार मिलान मिलता है, जहाँ सोलह सिरे तत्त्वों की गिनती से, पचास आरे बुद्धि की अवस्थाओं से और छह अष्टक शरीर तथा प्रकृति के समूहों से जोड़े गए हैं। पर मूल पाठ स्वयं यह जोड़ नहीं देता। जो वह निश्चित रूप से देता है, वह यह अनुभव है कि जीवन का ढाँचा एक घूमते हुए पहिये जैसा है, बहुत सारे टुकड़ों से बना, हर टुकड़ा अपनी जगह ठीक बैठा हुआ, और पूरा का पूरा चलता हुआ।
छठे श्लोक में वह पहिया चौड़ा हो जाता है। उस विशाल ब्रह्मचक्र में, जिसमें सब जीते हैं और जिसमें सब टिके हुए हैं, हंस घूमता रहता है। हंस यहाँ वह जीव है जो एक जन्म से दूसरे जन्म में, एक हाल से दूसरे हाल में लुढ़कता रहता है। और उसी श्लोक में बाहर निकलने का रास्ता भी है। जब वह अपने को और प्रेरक को अलग अलग जान लेता है, तब उसे उसी से अमृत मिल जाता है। घूमना रुकता नहीं, पहचान बदल जाती है।
आगे के श्लोक दो जोड़े बार बार सामने रखते हैं। क्षर और अक्षर, व्यक्त और अव्यक्त। ईश इन दोनों को जोड़कर सारे विश्व का भरण करता है, और जो आत्मा अनीश है वह भोक्ता होने के भाव से बँध जाती है। बन्धन कहीं बाहर से नहीं आता, वह भोगने वाला बन जाने से आता है। और जिस घड़ी वह देव को जान लेती है, सारे पाश एक साथ खुल जाते हैं। नवें श्लोक में यही तीन एक पंक्ति में आ जाते हैं, ज्ञ और अज्ञ, दोनों अजन्मा, एक ईश और एक अनीश, और तीसरी वह अजा जो भोग्य है।
दसवाँ श्लोक सांख्य की भाषा को खुलकर बोल देता है। क्षर प्रधान है, अमृत और अक्षर हर है, और इन दोनों पर, क्षर पर भी और आत्मा पर भी, एक ही देव शासन करता है। प्रधान वही शब्द है जिसे सांख्य मूल प्रकृति कहता है, और हर वही नाम है जिससे आगे शैव परम्परा शिव को पुकारेगी। दोनों एक ही श्लोक में बैठे हैं और आपस में लड़ते नहीं। ग्यारहवें श्लोक में उस देव को जान लेने का फल आता है, सारे पाश गिर जाते हैं, क्लेश क्षीण होने पर जन्म और मृत्यु का सिलसिला टूट जाता है, और देह छूटने पर वह तीसरी स्थिति मिलती है जो केवल है और जिसमें कोई कामना बची नहीं रहती।
सार: पहला अध्याय संसार को एक विशाल घूमते पहिये की तरह दिखाता है, जिसकी हर तीली गिनी हुई है। उस पहिये पर घूमने वाला हंस तब तक घूमता है जब तक वह अपने को घुमाने वाले से अलग नहीं पहचानता। यहीं सांख्य के प्रधान और शैव के हर, दोनों नाम एक ही पंक्ति में आकर बैठ जाते हैं।
अरणि, प्रणव और तिलों में छिपा तेल
पहले अध्याय के आख़िरी चार श्लोक अचानक बहुत घरेलू हो जाते हैं। पहले आग का उदाहरण आता है। लकड़ी के भीतर आग का रूप दिखाई नहीं देता, पर वह मिट भी नहीं गई होती। उसका चिह्न बना रहता है, और लकड़ी को फिर से मथने पर वह फिर पकड़ में आ जाती है। यज्ञ की अरणि, वे दो लकड़ियाँ जिन्हें रगड़कर अग्नि निकाली जाती थी, हर सुनने वाले की जानी हुई चीज़ थी। यह उपनिषद् उसी जानी हुई चीज़ को उठाकर भीतर की ओर मोड़ देता है।
चौदहवाँ श्लोक विधि की तरह बोलता है। “स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्”, अपनी देह को नीचे वाली अरणि बना लीजिए और प्रणव को ऊपर वाली अरणि। फिर ध्यान के निर्मथन का अभ्यास कीजिए, और उस देव को देखिए जो छिपे हुए की तरह भीतर है। यह पूरा चित्र एक ही साँस में तीन काम करता है। वह बताता है कि सामग्री बाहर से नहीं लानी, देह और प्रणव दोनों पहले से पास हैं। वह बताता है कि घर्षण चाहिए, यानी अभ्यास। और वह बताता है कि आग पैदा नहीं की जाती, वह पहले से भीतर पड़ी है।
अगला श्लोक चार और उदाहरण एक साथ रख देता है, “तिलेषु तैलं दधिनीव सर्पिरापः स्रोतःस्वरणीषु चाग्निः”, तिलों में तेल, दही में घी, बहती धाराओं में जल, अरणियों में अग्नि। इन चारों में एक ही बात सामान्य है। चीज़ मौजूद है, पर अपने आप हाथ में नहीं आती। तेल के लिए कोल्हू चाहिए, घी के लिए मथानी, अग्नि के लिए रगड़। इसी तरह आत्मा आत्मा में ही पकड़ी जाती है, उस आदमी के हाथ, जो सत्य और तप के सहारे उसे लगातार देखता रहता है।
अध्याय का अन्तिम श्लोक उसी को सब जगह फैला हुआ कहता है, दूध में घी की तरह अर्पित। और फिर एक पंक्ति में पूरी बात बाँध देता है, कि उसकी जड़ आत्मविद्या और तप है, और वही परम ब्रह्मोपनिषद् है। पहली बार यहाँ शब्द उपनिषद् अपने ही भीतर आता है, और अपने को किसी पोथी का नाम नहीं, एक जड़ बताता है। पढ़ने की चीज़ नहीं, खोदने की चीज़।
सार: देह नीचे की अरणि है, प्रणव ऊपर की, और ध्यान वह रगड़ है जिससे छिपी हुई आग निकलती है। तिलों में तेल, दही में घी, अरणि में अग्नि, चारों उदाहरण एक ही बात कहते हैं, कि जो चाहिए वह पहले से मौजूद है और फिर भी मेहनत के बिना नहीं मिलता।
सविता की प्रार्थना, और बैठने की विधि
दूसरा अध्याय आवाज़ बदल देता है। पहले सात श्लोक वैदिक ऋचाओं की तरह बोलते हैं, और उनका देवता सविता है, वह सूर्य जो चलाता है, उभारता है, आगे भेजता है। मन को पहले जोड़ा जाता है, फिर धियों को, यानी बुद्धि की वृत्तियों को। सविता की प्रेरणा से जुड़े हुए मन के साथ स्वर्ग की ओर बल भर चलने की बात है। यह भाषा ध्यान की भाषा से पुरानी है, और यह उपनिषद् जानबूझकर उसी पुरानी भाषा से अपनी योगविधि शुरू करता है, जैसे कोई नई इमारत पुरानी नींव पर उठाई जा रही हो।
पाँचवें श्लोक में एक पुकार आती है जो सदियों से दोहराई जाती रही है, कि सब सुनें, अमृत के पुत्र, वे भी जो दिव्य धामों में ठहरे हुए हैं। यह सम्बोधन पूरी परम्परा में गूँजता रहा। छठे श्लोक में वह जगह बताई जाती है जहाँ मन जन्म लेता है, वहाँ जहाँ अग्नि मथी जाती है, जहाँ वायु रोकी जाती है, जहाँ सोम छलकता है। यज्ञशाला का यह चित्र देह के भीतर भी उतरता है, जहाँ प्राण मथे जाते हैं और मन एक जगह आकर जमता है।
आठवें श्लोक से विधि साफ़ हो जाती है। “त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा सन्निवेश्य”, शरीर को सम रखिए, तीन जगह से उठा हुआ, यानी छाती, गरदन और सिर सीधे, और मन के सहारे इन्द्रियों को हृदय में बिठा लीजिए। फिर उसी श्लोक में एक नाव आती है। विद्वान ब्रह्म की नाव से उन सब धाराओं को पार कर जाए जो डरावनी हैं। नदी वही संसार है जिसके पाँच स्रोत पहले अध्याय में गिनाए गए थे, और नाव वह प्रणव है जिसे अभी अरणि कहा गया था।
नवाँ श्लोक प्राण की बात करता है। प्राणों को यहाँ साध लेने के बाद, जब वे शान्त हो जाएँ, नासिका से धीरे साँस लीजिए, और मन को ऐसे थामे रखिए जैसे कोई सधा हुआ रथी दुष्ट घोड़ों से जुते रथ को थामता है, बिना एक पल की असावधानी के। दसवाँ श्लोक जगह चुनने की बात करता है। भूमि सम हो, साफ़ हो, कंकड़, आग और रेत से बची हो, शोर और पानी के पास न हो, मन को भाती हो, आँख को चुभती न हो, और हवा के तेज़ झोंकों से ओट में हो, किसी गुहा जैसी।
ग्यारहवाँ श्लोक भीतर की झलकियाँ गिनाता है। कुहासा, धुआँ, सूर्य, वायु, अग्नि, जुगनू, बिजली, स्फटिक और चन्द्रमा, इनके जैसे रूप योग में ब्रह्म के प्रकट होने से पहले आगे आगे चलते हैं। यह बड़ी ईमानदार बात है। यह उपनिषद् इन झलकियों से इनकार नहीं करता, और उन्हें मंज़िल भी नहीं कहता। वे आगे आगे चलने वाली हैं, आने की सूचना हैं।
फिर दो श्लोक ऐसे आते हैं जो देह को ही गवाह बना देते हैं। जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश, इन पाँचों से बना योगगुण उठ खड़ा होता है, तब उस देह में रोग नहीं रहता, बुढ़ापा नहीं आता, मृत्यु का दबाव नहीं रहता, क्योंकि शरीर योग की आग से बना होता है। और पहली प्रवृत्ति के चिह्न गिनाए जाते हैं, हल्कापन, आरोग्य, लोलुपता का जाना, रंग का खुल जाना, स्वर का सुन्दर हो जाना, गन्ध का शुभ होना, और मल मूत्र का कम रह जाना। चौदहवें श्लोक में मिट्टी से लिपा हुआ दर्पण साफ़ होकर चमकता है, और वैसे ही देही आत्मतत्त्व को देखकर एक बार में कृतार्थ और शोकरहित हो जाता है।
सार: दूसरा अध्याय सविता की पुरानी ऋचाओं से शुरू होकर बैठने, साँस लेने और जगह चुनने की ठोस विधि तक उतर आता है। कुहासा, जुगनू और बिजली जैसी झलकियाँ रास्ते के चिह्न हैं, और देह में उतरने वाला हल्कापन पहली पक्की ख़बर है कि योग चल पड़ा।
एक ही रुद्र, और अँगूठे भर का पुरुष
तीसरा अध्याय उस एक को नाम दे देता है। पहला श्लोक कहता है कि वह एक है जिसके हाथ में जाल है और जो अपनी ईशन शक्तियों से सब लोकों पर शासन करता है, और जो उद्भव और सम्भव, दोनों में वही एक है। दूसरे श्लोक में नाम खुलता है, “एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः”, एक ही रुद्र है, वह दूसरे के लिए खड़ा नहीं हुआ, यानी उसके बराबर कोई दूसरा है ही नहीं। वही अन्तकाल में सब भुवनों को रचकर समेट लेता है, और वही गोप है, रखवाला।
तीसरा श्लोक उस विराट का चेहरा खींचता है, सब ओर आँख, सब ओर मुख, सब ओर बाहु, सब ओर पैर। वह अपनी बाहुओं से और पंखों से आकाश और पृथ्वी को गढ़ता हुआ एक ही देव है। चौथा श्लोक कहता है कि देवताओं का उद्भव जिससे हुआ, वह विश्वाधिप रुद्र महर्षि है, जिसने पहले हिरण्यगर्भ को जन्म दिया। और उसी श्लोक के अन्त में एक प्रार्थना है, कि वह हमें शुभ बुद्धि से जोड़ दे। ध्यान दीजिए, यहाँ विवरण और प्रार्थना एक ही श्लोक में साथ चल रहे हैं। यही इस उपनिषद् का मिज़ाज है।
पाँचवें और छठे श्लोक में आवाज़ पूरी तरह प्रार्थना की हो जाती है, और वह आवाज़ यजुर्वेद के रुद्राध्याय से आई हुई है। कहा जाता है कि हे रुद्र, आपका जो शिव रूप है, अघोर, पाप न दिखाने वाला, उसी अत्यन्त शान्त तनु से हमें देखिए। और फिर, हे गिरिश, जो बाण आप हाथ में धारण करते हैं उसे शिव कर दीजिए, पुरुष और जगत को चोट मत पहुँचाइए। यह डर नहीं है, यह पहचान है। जिस शक्ति के हाथ में सब कुछ है, उसी से कोमलता की याचना की जा रही है।
आठवाँ श्लोक इस उपनिषद् की सबसे दोहराई जाने वाली पंक्ति है। कहा जाता है कि हमने उस महान पुरुष को जान लिया है, जो आदित्य के वर्ण का है और अन्धकार से परे है। उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु को लाँघ जाता है, और जाने के लिए कोई दूसरा मार्ग है ही नहीं। यह पंक्ति इसी उपनिषद् में दो बार आती है, यहाँ और छठे अध्याय में, और दोनों बार वह किसी सिद्धान्त की तरह नहीं, एक गवाही की तरह बोली जाती है। जानने वाला कह रहा है कि मैंने जान लिया।
आगे के श्लोक उस एक को नाप देने की कोशिश करते हैं और हर बार नाप टूट जाती है। उससे परे कुछ नहीं, उससे सूक्ष्म कुछ नहीं, उससे बड़ा कुछ नहीं। वह आकाश में वृक्ष की तरह अडिग खड़ा है और उसी एक पुरुष से यह सब भरा हुआ है। वह सब मुखों, सिरों और गरदनों वाला है और सब प्राणियों की गुहा में सोया हुआ है, सर्वव्यापी, भगवान, और इसीलिए सब जगह पहुँचा हुआ शिव। तेरहवें श्लोक में वह अचानक छोटा हो जाता है, “अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः”, अँगूठे भर का पुरुष, अन्तरात्मा, सदा लोगों के हृदय में बैठा हुआ।
यह जोड़ इस उपनिषद् की अपनी कारीगरी है। एक तरफ़ सहस्र सिर, सहस्र आँख, सहस्र पैर वाला पुरुष है जो पृथ्वी को सब ओर से ढँककर दस अंगुल और आगे निकल जाता है। दूसरी तरफ़ अँगूठे भर का वह, जो हृदय में बैठा है और हृदय, मनीषा और मन से ही पकड़ा जाता है। अठारहवें श्लोक में देही नौ द्वारों वाले नगर में हंस बनकर बाहर की ओर लहराता है, और उन्नीसवें में वह बिना हाथ पैर के पकड़ लेता है और दौड़ता है, बिना आँख के देखता है, बिना कान के सुनता है। वह वेद्य को जानता है, और उसे जानने वाला कोई नहीं।
सार: तीसरा अध्याय उस एक को रुद्र कहकर पुकारता है और उसी साँस में उससे कोमलता माँगता है। वह सहस्रों सिर वाला भी है और अँगूठे भर का भी, विराट भी और हृदय में बैठा हुआ भी। यहीं वह पंक्ति आती है कि उसे जान लेने के सिवा मृत्यु के पार जाने का कोई दूसरा रास्ता नहीं।
दो पंछी, अजा, और माया का मायावी
चौथा अध्याय एक ऐसे देव से शुरू होता है जिसका अपना कोई वर्ण नहीं है, और जो अपनी शक्ति के योग से अनेक वर्ण धारण कर लेता है, किसी निहित प्रयोजन से। आरम्भ में वह विश्व को फैलाता है और अन्त में समेट लेता है। दूसरा श्लोक उसे हर चीज़ में गिन देता है, वही अग्नि है, वही आदित्य, वही वायु, वही चन्द्रमा, वही शुक्र, वही ब्रह्म, वही जल, वही प्रजापति। यह सूची किसी को छोड़ती नहीं।
तीसरा श्लोक सबसे कोमल है। वहाँ उस देव को सम्बोधित करके कहा जाता है कि आप ही स्त्री हैं, आप ही पुरुष, आप ही कुमार और कुमारी, आप ही वह बूढ़ा जो लाठी के सहारे डगमगाता चलता है, और आप ही जन्म लेकर सब ओर मुख किए खड़े होते हैं। अगला श्लोक उसे नीला पतंगा, हरा, लाल आँखों वाला, बिजली को गर्भ में रखने वाला, ऋतुएँ और समुद्र कह देता है। भक्ति की भाषा यहाँ पहली बार सीधी सम्बोधन की भाषा बन जाती है, और यह उपनिषद् उस एक को आप कहकर बुलाने लगता है।
पाँचवाँ श्लोक सांख्य का सबसे सघन चित्र है। एक अजा है, अजन्मा, लाल, सफ़ेद और काली, और वह अपने ही जैसी बहुत सी प्रजा जनती रहती है। एक अज उसके साथ प्रीति से लगा हुआ पड़ा रहता है, और दूसरा अज उसे, जिसका भोग भोग लिया गया, छोड़कर चल देता है। तीन रंग वही तीन गुण हैं जिन्हें सांख्य सत्त्व, रजस और तमस कहता है, और अजा वही मूल प्रकृति है। एक पुरुष उससे बँधा है और दूसरा उससे छूट चुका है। यह उपनिषद् इस चित्र को समझाता नहीं, बस रख देता है।
छठा श्लोक वह है जिसे सुनकर कोई भूलता नहीं, “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते”, दो सुन्दर पंखों वाले पंछी, साथ जुड़े हुए, मित्र, एक ही पेड़ से लिपटे हुए हैं। उनमें से एक पीपल का मीठा फल खाता है, दूसरा कुछ नहीं खाता, बस देखता रहता है। सातवाँ श्लोक इसी को खोल देता है। उसी पेड़ पर पुरुष डूबा हुआ, अपने को असमर्थ मानकर, मोह में पड़ा शोक करता है। और जब वह उस दूसरे को देख लेता है, जो ईश है और जिसकी यह सारी महिमा है, तब उसका शोक उतर जाता है।
नवाँ और दसवाँ श्लोक इस उपनिषद् की सबसे दूर तक जाने वाली बात कहते हैं। छन्द, यज्ञ, क्रतु, व्रत, जो हो चुका, जो होगा, और जो कुछ वेद कहते हैं, यह सब उसी से निकलता है, और उसी में दूसरा माया से बँधा हुआ रोका गया है। फिर वह पंक्ति आती है जिससे आगे का सारा वेदान्त शब्द उधार लेता रहा, “मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं च महेश्वरम्”, माया को प्रकृति जानिए और मायावी को महेश्वर। और उसी के अवयवभूतों से यह सारा जगत व्याप्त है। यहाँ माया कोई छलावा नहीं कही गई, वह प्रकृति कही गई है, वह सामग्री जिससे सब बना है। मायावी उससे बँधता नहीं, वही उसे चलाता है।
अध्याय के आख़िरी श्लोक फिर प्रार्थना पर लौट आते हैं। उन्नीसवाँ श्लोक कहता है कि उसे न ऊपर पकड़ा जा सकता है, न आड़े, न बीच में, और जिसका नाम महद्यश है उसकी कोई प्रतिमा नहीं। इक्कीसवें में एक डरा हुआ आदमी बोलता है, कि वह अजात है, ऐसा मानकर कोई भयभीत शरण लेता है, और फिर सीधी पुकार, हे रुद्र, आपका जो दक्षिण मुख है, उससे मुझे नित्य बचाइए। बाईसवें में वह प्रसिद्ध याचना है कि हमारी सन्तान को, हमारी आयु को, हमारी गायों और घोड़ों को हानि न पहुँचाइए, हमारे वीरों को क्रोध में मत मारिए, हम हविष्मान होकर सदा आपको ही बुलाते हैं।
सार: चौथे अध्याय में वही एक स्त्री भी है, पुरुष भी, बच्चा भी और लाठी टेकता बूढ़ा भी। यहाँ तीन रंगों वाली अजा है, एक पेड़ पर बैठे दो पंछी हैं, और वह पंक्ति है जो माया को प्रकृति और मायावी को महेश्वर कह देती है। दर्शन और याचना यहाँ एक ही साँस में चलते हैं।
विद्या, अविद्या और बाल के अग्र का सौवाँ भाग
पाँचवाँ अध्याय दो अक्षरों से शुरू होता है जो ब्रह्म में छिपे पड़े हैं, अनन्त, और उनमें विद्या और अविद्या दोनों गूढ़ रखी हैं। अविद्या क्षर है, विद्या अमृत है, और जो इन दोनों पर शासन करता है वह इनसे अलग तीसरा है। यह बँटवारा साफ़ है और महत्त्वपूर्ण है। इस उपनिषद् में ज्ञान और अज्ञान, दोनों किसी के अधीन हैं। ऊपर बैठने वाला न ज्ञान है न अज्ञान, वह दोनों का ईश है।
दूसरे श्लोक में एक नाम आता है जिस पर सदियों से बहस चली है। वही एक है जो हर योनि पर शासन करता है, जो सब रूपों और सब योनियों को धारण करता है, और जो आरम्भ में उस प्रसूत ऋषि कपिल को ज्ञान से भरता है और उसे जन्म लेते हुए देखता है। शांकरभाष्य इस कपिल को सांख्य के आचार्य कपिल नहीं, हिरण्यगर्भ मानता है, क्योंकि कपिल शब्द का अर्थ रंग भी है। दूसरी परिपाटी इसे सांख्य के प्रवर्तक का ही नाम पढ़ती है। मूल पाठ इतना ही कहता है कि वह ऋषि भी उसी एक के ज्ञान से भरा गया।
तीसरे और चौथे श्लोक में वही एक जाल को अनेक रूपों में फैलाता है और इसी क्षेत्र में समेट लेता है, फिर से रचता है, और महात्मा होकर सारा आधिपत्य चलाता है। सूर्य की तरह वह सब दिशाओं को, ऊपर, नीचे और आड़े, प्रकाशित करता हुआ चमकता है। पाँचवाँ श्लोक कहता है कि वही विश्वयोनि हर चीज़ के स्वभाव को पकाता है, पकने वाली सब चीज़ों को परिणाम तक पहुँचाता है, और सारे गुणों को उनके काम पर लगाता है। छठे में यह विद्या वेदों के गुह्य उपनिषदों में छिपी कही जाती है, जिसे पहले के देवता और ऋषि जान गए और उसी में मिलकर अमृत हो गए।
सातवें श्लोक से जीव की कथा शुरू होती है। जो गुणों से जुड़ा है, जो फल के लिए कर्म करता है, वही किए हुए का भोक्ता भी होता है। वह विश्वरूप है, त्रिगुण है, तीन मार्गों वाला है, प्राणों का अधिपति है, और अपने ही कर्मों से घूमता चलता है। आठवाँ श्लोक उसे फिर अँगूठे भर का और सूर्य जैसा कहता है, संकल्प और अहंकार से युक्त। और फिर बुद्धि के गुण तथा आत्मा के गुण के कारण वही दूसरा, सुई की नोक जितना, देखा जाता है।
नवाँ श्लोक एक ऐसी नाप देता है जो चकरा देती है। बाल के अगले सिरे का सौवाँ हिस्सा, और उसका फिर सौ बार बाँटा हुआ भाग, उतना जीव जानना चाहिए, और वही अनन्तता के योग्य है। इतना सूक्ष्म, और फिर भी अनन्त होने लायक़। दसवाँ श्लोक कहता है कि वह न स्त्री है, न पुरुष, न नपुंसक। जो जो शरीर वह लेता है, उसी उसी से जुड़ जाता है। ग्यारहवें में संकल्प, स्पर्श, दृष्टि और मोह से, तथा अन्न और जल से देही बढ़ता है और अपने कर्मों के पीछे पीछे अलग अलग स्थानों में रूप पाता जाता है।
चौदहवाँ श्लोक अध्याय को एक कोमल जगह पर बन्द करता है। वह जो भाव से ही ग्रहण में आता है, जिसका कोई नीड़ नहीं, यानी जिसका कोई घोंसला या ठिकाना नहीं, जो भाव और अभाव दोनों को करने वाला है, वही शिव है। जो उस कला को रचने वाले देव को जान लेते हैं, वे इस तनु को छोड़ देते हैं। यहाँ शिव शब्द विशेषण भी है और नाम भी, और यह उपनिषद् दोनों को एक साथ चलने देता है।
सार: पाँचवाँ अध्याय विद्या और अविद्या दोनों को उसी एक के अधीन रखता है, और जीव को बाल के सिरे के सौवें भाग जितना सूक्ष्म कहकर भी अनन्तता के योग्य ठहराता है। यही अध्याय कपिल का नाम लेता है, जिस पर व्याख्याएँ आज तक बँटी हुई हैं।
न वहाँ सूर्य चमकता है, और भक्ति का पहला स्वर
छठा अध्याय वहीं से उठाता है जहाँ पहला अध्याय शुरू हुआ था। कुछ कवि स्वभाव को कारण कहते हैं, कुछ काल को, और यह उपनिषद् एक पंक्ति में जोड़ देता है कि ये सब मोह में पड़े हुए हैं, क्योंकि लोक में यह देव की महिमा है, जिससे यह ब्रह्मचक्र घुमाया जाता है। छह अध्याय की यात्रा के बाद वही सवाल लौटा है, और अब उसका उत्तर बहस नहीं, एक नाम है। दूसरा श्लोक उसे ज्ञ कहता है, कालकार कहता है, गुणी कहता है, सर्वविद् कहता है, और कहता है कि उसी के शासन में कर्म फैलता है।
बीच के श्लोक उस एक को हर तरफ़ से घेरने की कोशिश करते हैं। वह संयोग का निमित्त हेतु है, तीनों कालों से परे है, और कलाओं से रहित होकर भी देखा जाता है। सातवें श्लोक में एक ऐसी पदावली आती है जो आगे शैव और वैष्णव दोनों परम्पराओं में गूँजती रही, कि वह ईश्वरों का परम महेश्वर है, देवताओं का परम देवता, पतियों का पति, सबसे परे। आठवाँ श्लोक कहता है कि उसका न कोई कार्य है न करण, उसके बराबर या उससे ऊपर कोई दिखता नहीं, और उसकी परा शक्ति अनेक तरह की सुनी जाती है, स्वाभाविक, ज्ञान और बल और क्रिया वाली।
दसवें श्लोक में एक मकड़ी आती है। जैसे मकड़ी अपने ही तन्तुओं से अपने को ढक लेती है, वैसे ही वह एक देव प्रधान से उपजे तन्तुओं से स्वभावतः अपने को ढँक लेता है। ग्यारहवाँ श्लोक इस उपनिषद् का सबसे सधा हुआ वाक्य है, “एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा”, एक ही देव, सब भूतों में छिपा, सब जगह फैला, सब भूतों की भीतरी आत्मा। और उसी पंक्ति में आगे, कर्मों का अध्यक्ष, सब भूतों का निवास, साक्षी, चेता, केवल और निर्गुण। निर्गुण शब्द और देव शब्द एक ही पंक्ति में बैठे हैं, और यह उपनिषद् इसमें कोई अड़चन नहीं देखता।
तेरहवाँ श्लोक वह जगह है जहाँ सांख्य और योग का नाम खुलकर आता है। वह नित्यों में नित्य है, चेतनों में चेतन है, एक होकर बहुतों की कामनाएँ पूरी करता है। और वह कारण सांख्य तथा योग से पहुँचा जाने वाला है, उसे जानकर मनुष्य सब पाशों से छूट जाता है। यहाँ यह उपनिषद् अपनी पूरी दुकान खोल देता है। सांख्य की गिनती, योग का अभ्यास, और अन्त में एक देव। तीनों एक ही वाक्य में हैं।
चौदहवाँ श्लोक वह प्रसिद्ध चित्र है जिसमें सारी रोशनियाँ फीकी पड़ जाती हैं। वहाँ सूर्य नहीं चमकता, न चन्द्रमा और तारे, न ये बिजलियाँ चमकती हैं, फिर इस आग की तो बात ही क्या। उसी के चमकने के पीछे सब चमकते हैं, उसी की आभा से यह सब दिखाई देता है। पन्द्रहवें में वही पंक्ति फिर आती है जो तीसरे अध्याय में आई थी, कि उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु को लाँघ जाता है, और दूसरा कोई मार्ग है ही नहीं। बीसवें श्लोक में एक कड़ी बात है, कि जिस दिन लोग आकाश को चमड़े की तरह लपेट लेंगे, उस दिन देव को जाने बिना दुख का अन्त होगा।
अठारहवें श्लोक में वह मोड़ आता है जिसके बाद उपनिषद् की भाषा ही बदल जाती है। जो आरम्भ में ब्रह्मा को रचता है और उसे वेद सौंपता है, उसी देव की, जो आत्मबुद्धि का प्रकाश है, शरण मैं मुमुक्षु होकर जाता हूँ। यह पहली बार नहीं है कि किसी उपनिषद् में प्रार्थना आई हो। पर यहाँ प्रार्थना करने वाला अपने को मुमुक्षु कहकर पहचान रहा है और शरण शब्द बोल रहा है, और यही आगे की सारी भक्तिधारा का शब्द है।
इक्कीसवें श्लोक में ऋषि का नाम आता है। तप के प्रभाव से और देव की कृपा से विद्वान श्वेताश्वतर ने उस परम पवित्र ब्रह्म को, जिसे ऋषियों का संघ सेवता है, अत्याश्रमियों से भली भाँति कहा। बाईसवाँ श्लोक एक पहरा बिठा देता है, कि वेदान्त में यह परम गुह्य पुराकल्प में कहा गया था, और इसे अशान्त को नहीं देना चाहिए, न उसे जो पुत्र या शिष्य नहीं है। यह कंजूसी नहीं है। यह वही सावधानी है जो कोई भी गहरी चीज़ सौंपते समय बरती जाती है, कि पात्र पहले तैयार हो।
और फिर आख़िरी श्लोक आता है, जिसके लिए यह उपनिषद् सबसे ज़्यादा याद किया जाता है। “यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ”, जिसके भीतर देव के लिए परा भक्ति है, और जैसी देव के लिए वैसी ही गुरु के लिए, उस महात्मा के सामने ये सब कहे हुए अर्थ खुलकर प्रकाशित हो जाते हैं। और वाक्य इतना ज़रूरी है कि पाठ उसे दोहराकर बन्द होता है। छह अध्याय तक जो कारण की खोज चली थी, वह यहाँ आकर एक हृदय की बात बन जाती है। अर्थ पढ़ने से नहीं खुलते, भक्ति से खुलते हैं, और गुरु को उसी दर्जे पर रखा गया है जिस दर्जे पर देव।
सार: छठा अध्याय पहले अध्याय के सवाल पर लौटता है और उसे एक नाम देकर बन्द करता है। सूर्य, चन्द्रमा और बिजली, सब उसी की आभा से चमकते हैं। और अन्तिम श्लोक में यह उपनिषद् वह कहता है जो इससे पहले कहीं इतनी साफ़ आवाज़ में नहीं कहा गया था, कि अर्थ उसी के सामने खुलते हैं जिसके भीतर देव और गुरु, दोनों के लिए परा भक्ति हो।
और अन्त में, अपनी ओर
इस उपनिषद् की सबसे काम की चीज़ शायद उसका पहला क़दम है, न कि आख़िरी। वह सभा में बैठे लोगों से शुरू होता है जो पहले से जानकार हैं और फिर भी पूछ रहे हैं। हमारे पास भी अपने अपने तैयार जवाब रहते हैं। कोई कहता है वक़्त की बात है, कोई कहता है क़िस्मत है, कोई कहता है बस ऐसे ही हो गया, कोई कहता है सब मेरे अपने स्वभाव का खेल है। ये सब आधे सच हैं, और आधा सच सबसे ज़्यादा टिकता है क्योंकि वह ग़लत नहीं होता। यह उपनिषद् इन्हें झूठा नहीं कहता, बस पूछता है कि इनको चलाता कौन है।
दूसरी काम की चीज़ अरणि वाला चित्र है। देह नीचे की लकड़ी, प्रणव ऊपर की, और ध्यान वह रगड़ जिससे आग निकलती है। इसमें कुछ भी बाहर से नहीं मँगाना पड़ता। और इसमें रगड़ से छूट भी नहीं मिलती। जो लोग साधना को या तो पूरी तरह कृपा पर छोड़ देते हैं या पूरी तरह मेहनत पर, उनके लिए यह चित्र बीच का रास्ता खोल देता है। तेल तिल में पहले से है, और कोल्हू फिर भी चलाना पड़ेगा। दिन में बीस मिनट की वह रगड़ किसी बड़े संकल्प से ज़्यादा दूर ले जाती है।
और तीसरी बात उस पेड़ की है जिस पर दो पंछी बैठे हैं। दिन भर में कई बार वह घड़ी आती है जब कोई फल खट्टा निकलता है और मन बैठ जाता है। उसी घड़ी एक छोटा सा काम किया जा सकता है, यह देखना कि जो स्वाद ले रहा है उसके पीछे कोई है जो देख रहा है, और वह देखने वाला स्वाद से हिलता नहीं। इतना भर याद आ जाए तो शोक पूरा नहीं मिटता, पर उसका बोझ आधा रह जाता है। और छठे अध्याय की आख़िरी पंक्ति यह जोड़ देती है कि यह देखना अकेले पढ़ने से नहीं आता। जिसके भीतर देव और गुरु, दोनों के लिए वह गहरी भक्ति जाग गई, अर्थ उसी के सामने अपने आप खुलते चले जाते हैं।
आधार: श्वेताश्वतर उपनिषद्, अध्याय 1 से 6; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।