Lulla Family

श्वेताश्वतर उपनिषद्

कल्पना कीजिए ऋषियों की एक सभा, जहाँ धुएँ, समिधा और गहरे मौन के बीच कुछ ब्रह्मवादी (ब्रह्म की टोह में लगे मनीषी) एक ही सवाल को बार-बार उलट-पलट रहे हैं। सवाल छोटा नहीं है। वे पूछते हैं कि इस सारे फैलाव का मूल कारण आख़िर क्या है, हम कहाँ से उपजे, किसके बल पर साँस लेते हैं, सुख और दुख किसके इशारे पर हम तक आते हैं, और अन्त में हम किसमें जा टिकते हैं। इसी सभा से श्वेताश्वतर उपनिषद् खुलता है, और पहली ही साँस में वह हमें उस दहलीज़ पर ला खड़ा करता है जहाँ से आगे केवल खोज है।

इस उपनिषद् का मिज़ाज

यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से आता है और 6 अध्यायों में बहता है। बाक़ी कई उपनिषद् उस परम तत्त्व को निराकार और नाम-रूप से परे रखकर इशारा भर करते हैं। पर यह उपनिषद् कुछ और करता है। यह उस एक सत्ता को एक मुख, एक हृदय और एक नाम देकर हमारे सामने ले आता है, रुद्र, ईश्वर, हर, महेश्वर। यहीं पहली बार किसी उपनिषद् में वह शब्द खिलता है जिसके सहारे आगे सारी भक्ति-परम्परा साँस लेगी, और वह शब्द है भक्ति। कहते हैं कि यह विद्या सन्त श्वेताश्वतर ने अपने तप के बल और ईश्वर की कृपा से पाई और शिष्यों को सौंपी, और उन्हीं के नाम पर इस उपनिषद् का नाम पड़ा।

सबसे पहला सवाल, कारण कौन?

आरम्भ ही एक ठहरे हुए प्रश्न से होता है, जिसे सुनकर मन एक पल को रुक जाता है।

किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठाः।

अर्थात्, वह मूल कारण क्या है, हम किससे जन्मे, किसके सहारे जीते हैं, और किसमें ठहरे हुए हैं। यह उपनिषद् यहाँ जल्दबाज़ी में कोई उत्तर नहीं थमाता। वह एक-एक करके उन सब उत्तरों को सामने रखता है जो उस युग में चलते थे, कि शायद काल (समय) ही सब कुछ रचता है, या स्वभाव (चीज़ों की अपनी प्रकृति), या नियति (बँधा हुआ भाग्य), या यदृच्छा (केवल संयोग), या पंचभूत (धरती, जल आदि तत्त्व) ही मूल हैं। और एक-एक करके यह उपनिषद् दिखाता है कि इनमें से अकेला कोई भी इस चेतन जगत का पूरा कारण नहीं ठहरता, क्योंकि इन सबके पीछे भी तो कोई चाहिए जो इन्हें जोड़े और चलाए। तब वे साधक, जो ध्यान की गहराई में उतरे थे, एक झलक पाते हैं।

ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्।

ध्यानयोग के सहारे उन्होंने उस देवात्मशक्ति को देखा, ईश्वर की वह अपनी शक्ति जो उसके अपने गुणों के परदे में छिपी बैठी है। यही इस उपनिषद् का पहला बड़ा इशारा है, कि जगत का कारण न कोरा समय है, न कोरा संयोग, बल्कि एक चेतन सत्ता की अपनी शक्ति, जिसे बाहर के तर्क से नहीं, भीतर के ध्यान से पकड़ा जाता है।

एक ही पेड़ पर दो पंछी

अब यह उपनिषद् एक ऐसा चित्र खींचता है जो सुनते ही मन में बैठ जाता है।

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।

दो पंछी, गहरे मित्र, सदा साथ रहने वाले, एक ही पेड़ पर बैठे हैं। एक पंछी उस पेड़ के फल चख रहा है, कभी मीठे, कभी खट्टे, और उन्हीं के स्वाद में डूबता-उतराता रहता है। दूसरा पंछी कुछ नहीं खाता, बस शान्त भाव से देखता रहता है। यह पेड़ हमारा यही जीवन है, फल हैं सुख-दुख के अनुभव, फल चखने वाला पंछी है जीव (देह में बँधी हुई आत्मा), और चुपचाप देखने वाला पंछी है वही परम ईश्वर, जो हमारे ही भीतर साक्षी बनकर बैठा है। यह उपनिषद् कहता है कि जब तक जीव केवल फल के स्वाद में उलझा है, तब तक वह अपने को असहाय मानकर शोक करता रहता है। पर जिस घड़ी उसकी दृष्टि उस दूसरे पंछी पर, उस ईश्वर की महिमा पर पड़ती है, उसी घड़ी उसका सारा शोक झड़ जाता है।

माया, प्रकृति और वह मायावी

फिर यह उपनिषद् एक ऐसी बात कहता है जो आगे पूरे वेदान्त की नींव बन गई।

मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।

अर्थात्, इस प्रकृति (सारी सृष्टि के मूल पदार्थ) को माया समझिए, और इस माया को रचने-चलाने वाले मायावी को महेश्वर। जैसे कोई कुशल जादूगर अपने ही खेल से बँधता नहीं, वैसे ही महेश्वर इस सारे फैलाव को अपनी शक्ति से रचता है, पर स्वयं उसमें फँसता नहीं। और यह उपनिषद् जोड़ता है कि यह सारा दिखने वाला जगत उसी के अंश-रूप से भरा हुआ है, कोई कोना उससे ख़ाली नहीं। प्रकृति और पुरुष (चेतन तत्त्व) का यह भेद, और दोनों के ऊपर बैठा वह एक ईश्वर, यही इस उपनिषद् का ढाँचा है।

वही एक, जो सबमें छिपा है

यह उपनिषद् उस एक सत्ता को रुद्र कहकर पुकारता है, और दो-टूक कहता है कि वह अकेला है, उसके समान कोई दूसरा ठहरता ही नहीं, एको हि रुद्रो न द्वितीयाय। वही सब प्राणियों के भीतर छिपा बैठा है।

एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।

एक ही देव, सब भूतों में गुप्त, सब जगह फैला हुआ, हर प्राणी की भीतरी आत्मा, सारे कर्मों का साक्षी, केवल चेतन, और सब गुणों से परे। वह इतना सूक्ष्म है कि आँख उसे पकड़ नहीं पाती, और इतना विराट कि उसके बाहर कुछ बचता ही नहीं। और इसी उपनिषद् की सबसे गूँजती हुई पंक्ति यहीं आती है, कि इस परम पुरुष को जान लेने के सिवा मृत्यु के पार जाने का दूसरा कोई रास्ता है ही नहीं।

तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।

उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु को लाँघ जाता है; मुक्ति की ओर जाने का इसके सिवा कोई और मार्ग नहीं।

बैठने की विधि, भीतर मुड़ने की

पर वह छिपी हुई सत्ता पकड़ में कैसे आए? यह उपनिषद् केवल ऊँची बात कहकर नहीं छोड़ता, वह बैठने की विधि भी बताता है। कहता है कि शरीर के तीन ऊपरी हिस्से, छाती, गरदन और सिर, सीधे और सम रखिए, बाक़ी देह को स्थिर कर लीजिए, और मन के सहारे इन्द्रियों को हृदय की ओर मोड़ लीजिए। बैठने की जगह ऐसी चुनिए जो साफ़ हो, समतल हो, कंकड़ और शोर से दूर हो, आँख को भाती हो और हवा के तेज़ झोंकों से बची हो। जैसे-जैसे ध्यान गहराता है, कहते हैं, भीतर कुछ झलकियाँ उठती हैं, कभी कुहासे-सी, कभी धुएँ-सी, कभी सूरज, अगन, जुगनू, बिजली, स्फटिक या चाँद जैसी कोई कौंध। ये सब उस भीतरी यात्रा के आरम्भिक पड़ाव भर हैं, मंज़िल नहीं। मंज़िल तो वही एक है, जिसे जानकर सारा शोक और सारा बन्धन ढह जाता है।

और अन्त में, भक्ति

और यहीं, इस उपनिषद् के आख़िरी अध्याय में, वह घड़ी आती है जिसके लिए यह सदा याद रखा जाता है। सारी खोज, सारा तर्क, सारा ध्यान एक कोमल मोड़ लेता है, और सामने आ खड़ी होती है भक्ति।

यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥

जिस महात्मा के हृदय में ईश्वर के लिए परम भक्ति हो, और जैसी भक्ति ईश्वर के लिए, वैसी ही अपने गुरु के लिए, उसी के भीतर ये सारे गूढ़ अर्थ अपने-आप खुलकर चमक उठते हैं। ध्यान दीजिए, यह उपनिषद् यह नहीं कहता कि इन रहस्यों को केवल पढ़-पढ़कर पकड़ लीजिए। वह कहता है कि जब हृदय प्रेम से भर जाता है, तब ज्ञान अपने-आप उजाला बनकर उतरता है। इसी भाव में यह उपनिषद् एक जगह हाथ जोड़कर कहता है कि जो ईश्वर सृष्टि के आरम्भ में रचयिता को गढ़ता है और उसे वेद सौंपता है, उसी की शरण में, मुक्ति की चाह लिए, हम स्वयं को सौंप देते हैं।

तो श्वेताश्वतर उपनिषद् हमें केवल यह नहीं बताता कि कारण कौन है। वह हमारा हाथ पकड़कर उस कारण के हृदय तक ले जाता है, और वहाँ पहुँचकर तर्क चुप हो जाता है, बस प्रेम और समर्पण बचता है। जिस दिन आपके भीतर वह देखने वाला दूसरा पंछी दिख जाए, और उसके प्रति यही परम भक्ति जाग उठे, उसी दिन मृत्यु का भय पीछे छूट जाता है, और वह अमर, जो सदा से आपके ही भीतर बैठा था, अपने पूरे उजाले में खुल जाता है।

आधार: श्वेताश्वतर उपनिषद्।