
परिचय

मिथिला का दरबार। राजा जनक आसन पर विराजमान थे। चारों ओर पंडित, शास्त्रज्ञ, टीकाकार। नित्य की भाँति चर्चा चल रही थी, श्लोकों पर, मीमांसा पर, धर्म पर।

तभी एक नौजवान भीतर आया। दुबला, साँवला, और उसका देह आठ जगह से टेढ़ा, घुटनों पर, कोहनियों पर, गर्दन पर। उसके जन्म से पहले की बात है। पिता कहोड़ माँ के गर्भ के पास वेद का पाठ करते थे, और एक स्थान पर चूक गए। गर्भ में पल रहे शिशु ने टोक दिया। पिता ने रोष में शाप दे डाला, “आठ स्थानों से टेढ़ा हो जा।” और वह वैसा ही जन्मा। नाम पड़ा अष्टावक्र।
वही अष्टावक्र, बड़ा होकर, आज जनक के दरबार में खड़ा था। पंडितों ने उसका टेढ़ा देह देखा और हँस पड़े, यह टेढ़ा सा बालक यहाँ क्या करने आया है।
अष्टावक्र भी हँसा। पर उसकी हँसी में और ही भाव था।

“राजन्,” उसने जनक से कहा, “मैं समझता था कि आपके दरबार में ज्ञानी बैठते हैं। अब देखता हूँ, यहाँ सब चर्मकार हैं। ये केवल चमड़ी पर दृष्टि रखते हैं। आत्मा को इनकी आँख छू ही नहीं पाती।”

पंडित मौन हो गए। जनक ने अष्टावक्र को सम्मुख बिठाया, और तीन प्रश्न रखे, “ज्ञान कैसे प्राप्त हो? मुक्ति कैसे मिले? वैराग्य कैसे जागे?”
अष्टावक्र का उत्तर, और उसके पश्चात जनक की दशा, यही अष्टावक्र गीता है। दो सौ अट्ठानवे श्लोकों में फैली हुई, फिर भी सारी बात पहले अध्याय के दूसरे श्लोक में ही उतर आती है।
यह सुनने में सरल है, हृदय में उतरने में नहीं। अष्टावक्र के दो सौ अट्ठानवे श्लोक यही एक बात को हृदय तक पहुँचाते हैं, बारम्बार, अनेक ओर से, अनेक उपमाओं से। कहीं श्रोता ज्ञानी के स्वर में सुनता है, कहीं जनक के स्वर में।
और बीच में, अध्याय दो के पहले श्लोक में, जनक एक वाक्य कहते हैं। वही वाक्य इस संवाद का हृदय है। उस क्षण के पश्चात जनक वही नहीं रहे।
पढ़ने का क्रम
प्रथम परिचय के लिए अध्याय एक, दो, तीन और अठारह पर्याप्त हैं। अध्याय एक और दो आधार रखते हैं, अध्याय तीन उसे और गहरा करता है, और अध्याय अठारह (सौ श्लोक) सारे संवाद का सार है। शेष अध्याय इन्हीं भावों को नई-नई दिशाओं से दोहराते हैं।
जिसने भगवद् गीता पढ़ी हो, उसके सामने यहाँ एक अन्तर खुलता है। गीता क्रम से चढ़ने वाला मार्ग देती है, कर्म–योग, भक्ति-योग, ज्ञान-योग, मानो तीन सीढ़ियाँ। अष्टावक्र केवल एक पहचान माँगती है, बिना किसी सीढ़ी के। यह माँग कठोर है, और इसका मार्ग छोटा भी, पर वह केवल उनके लिए छोटा है जो तैयार हैं।
पढ़ते-पढ़ते यदि मन कहे कि “यह बात इतनी असम्भव सी है कि सत्य हो ही नहीं सकती,” तो वह स्वाभाविक है। इसी प्रतिरोध को शान्त करने के लिए यह संवाद रचा गया है। आगे बढ़ते रहिए। कुछ ही श्लोकों में वह प्रतिरोध अपने आप शान्त होने लगता है।
कुछ प्रश्न, कुछ उत्तर
अष्टावक्र गीता और भगवद् गीता में क्या अन्तर है?
भगवद् गीता युद्ध-भूमि पर कही गई, अष्टावक्र गीता राज-दरबार में। गीता के श्रोता अर्जुन हैं, जो शोक और मोह से टूटे हुए हैं। अष्टावक्र के श्रोता जनक हैं, जो स्वयं ज्ञानी हैं और जिन्हें केवल अन्तिम पुष्टि चाहिए। गीता तीन मार्ग देती है, कर्म, भक्ति, ज्ञान। अष्टावक्र केवल ज्ञान देती है, और कहती है यही एक मार्ग है। गीता क्रम से ले चलती है, अष्टावक्र एक ही क्षण में सब रख देती है।
अष्टावक्र गीता को सबसे निर्भीक अद्वैत क्यों कहा जाता है?
क्योंकि यह साधना तक को व्यर्थ कह देती है। हर साधना का लक्ष्य है “मुक्ति पाना।” अष्टावक्र कहती है कि मुक्ति को पाने योग्य वस्तु मानना ही भ्रम है, क्योंकि आप पहले से ही मुक्त हैं। अध्याय आठ में सीधे कहा गया है कि बन्धन और मोक्ष, दोनों कल्पना मात्र हैं। यह वचन योगी को विचलित करता है, क्योंकि उसकी सारी साधना इसी मान्यता पर खड़ी है कि कुछ “पाना” है।
अध्याय दो के पहले श्लोक में ऐसा क्या है जो हिला देता है?

अध्याय एक में अष्टावक्र ने बीस श्लोकों में आत्मा का स्वरूप दिखाया। अध्याय दो के पहले श्लोक में जनक का उत्तर आता है, “अहो निरञ्जनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः। एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडम्बितः॥” अर्थ है, “आश्चर्य! मैं तो निर्मल, शान्त, स्वयं बोधस्वरूप हूँ, प्रकृति से परे। इतने काल तक मैं केवल मोह से ठगा जाता रहा।” एक श्लोक का उपदेश, एक श्लोक की पहचान। बीस बरस के शिष्यत्व का फल दो श्लोकों में उतर आता है। यही संक्षेप इस संवाद की विरल बात है।
क्या अष्टावक्र गीता गृहस्थ के लिए सार्थक है?
जनक राजा थे। पत्नी, सन्तान, मंत्री, युद्ध, राज्य का कोष, सब उनके भार पर था। अष्टावक्र गीता के पश्चात भी वे राज करते रहे। इसलिए व्यवहार में यह संवाद गृहस्थ के लिए ही उतरा है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि यह सरल है। यह कहती है, आपके सब दायित्व यथावत चलते रहें, पर आपकी पहचान उन दायित्वों में न बँधे। यही दूरी बनाए रखना ही असली अभ्यास है।
रमण महर्षि का इस संवाद से क्या सम्बन्ध था?
रमण महर्षि अष्टावक्र गीता को अपने सबसे प्रिय ग्रन्थों में गिनते थे। उन्होंने तमिल में इसके चुने हुए श्लोकों का अनुवाद किया। आज भी अरुणाचल के आश्रम में यह प्रतिदिन पढ़ी जाती है। रमण की आत्म-विचार पद्धति की नींव अष्टावक्र के अध्याय एक और दो में बैठी है। अन्तर बस इतना है कि रमण ने उसे एक सीधे अभ्यास में ढाल दिया, “मैं कौन हूँ?”
अध्याय अठारह में सौ श्लोक हैं। क्या ये सब पढ़ना आवश्यक है?
अध्याय अठारह सारे संवाद का सार है। अष्टावक्र वहाँ अनेक दिशाओं से एक ही बात कहते हैं, ज्ञानी कैसा दिखता है, उसके भीतर क्या बहता है, उसके बाहर क्या घटता है। यह दोहराव बिना प्रयोजन का नहीं। अद्वैत की पहचान एक बार समझ कर ठहर जाने वाली वस्तु नहीं। इसे बार-बार सुनना पड़ता है, अनेक दृष्टान्तों से। ये सौ श्लोक मानो एक दीर्घ ध्यान की भाँति काम करते हैं।
क्या यह संवाद भक्ति-मार्ग वालों के लिए भी सार्थक है?
हाँ, पर अपने समय पर। भक्ति में आरम्भ में भक्त और भगवान का सम्बन्ध दृढ़ होता है, “मैं भक्त, आप भगवान।” अष्टावक्र इसी सम्बन्ध को विलीन कर देती है। जो भक्ति-मार्ग में पर्याप्त आगे आ चुके हैं, उनके लिए यह वह अन्तिम द्वार है जहाँ “मैं” और “आप” एक ही चेतना के दो रूप दिखाई देने लगते हैं। नए भक्त को यह उलझा सकती है। इसलिए पहले नारद भक्ति सूत्र, फिर अष्टावक्र, यह क्रम अधिक उचित है।
अष्टावक्र का देह आठ जगह से टेढ़ा क्यों था, और इसका इस संवाद से क्या सम्बन्ध?
कथा है कि उनके पिता कहोड़ माँ के गर्भ के पास पाठ करते हुए एक स्थान पर चूक गए। गर्भ में अष्टावक्र ने टोक दिया। पिता ने रोष में शाप दिया, “आठ स्थानों से टेढ़ा हो जा।” यह कथा अपने में एक रूपक भी है। जो देह देखकर निर्णय कर लेते हैं, वे ज्ञान को नहीं देख पाते। दरबार में अष्टावक्र का पहला ही वचन यही दिखा गया। देह तो आवरण मात्र है। उसमें टेढ़ापन हो या सीधापन, वह आत्मा का रूप नहीं। सारा संवाद इसी एक बिन्दु पर खड़ा है, आदि से अन्त तक।
20 प्रकरण
हर पट्टिका एक स्वतंत्र अध्याय तक ले जाती है। पढ़ने का क्रम मूल जैसा ही है। पहले एक, दो, तीन और अठारह पढ़ें तो शीघ्र समझ आती है।
साथ में पढ़ें
- भगवद् गीता अध्याय 2 सांख्य योग, जहाँ आत्म-तत्त्व की नींव रखी जाती है।
- योग सूत्र पाद 1 समाधि क्या है, अष्टावक्र की मुक्ति-दृष्टि से जुड़ा।
- केनोपनिषद् “मन को कौन चलाता है”, अष्टावक्र के प्रश्न का आरम्भिक रूप।
यही कथा वहाँ भी
- राजा जनक का जागरण
योग वासिष्ठ: राजा जनक का अकस्मात् जागरण - बृहदारण्यक उपनिषद्
बृहदारण्यक उपनिषद्: जनक की सभा में याज्ञवल्क्य - अध्याय 2: सांख्य योग
भगवद्गीता अध्याय 2: स्थितप्रज्ञ के लक्षण - भाग 14 · जीवन्मुक्त की पहचान
विवेकचूडामणि: जीवन्मुक्त की पहचान