Lulla Family

अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता · शुद्ध अद्वैत का सबसे निर्भीक वचन
अष्टावक्र संहिता · अष्टावक्र और राजा जनक का संवाद
बीस प्रकरण, दो सौ अट्ठानवे श्लोक। एक नौजवान, जिसका देह आठ जगह से टेढ़ा था, राजा जनक के दरबार में पहुँचा। वहाँ बैठे पंडित हँस पड़े। उसने पलट कर एक बात कही, और जनक का सारा भीतर एक ही श्लोक में पलट गया।
॥ बन्धमोक्षौ कथं स्याताम् ॥
“बन्धन और मोक्ष, ये दोनों होते कैसे हैं?” यही जनक का पहला प्रश्न था। अष्टावक्र का उत्तर ही पूरी गीता है।
Hero illustration for ag/ag-hero-landing.jpg

परिचय

The royal court of Mithila before the sage arrives. Crowned King Janaka seated serene and majestic on an ornate golden throne under a richly patterned canopy. All around him, learned brahmin scholars and commentators in white and saffron robes are seated on patterned rugs, absorbed in lively scriptural debate, palm-leaf manuscripts open in their hands, hands raised in discussion. Carved stone pillars, hanging brass lamps, an atmosphere of dignified intellectual discourse. Classical-Indian miniature-painting style, warm color palette of gold, vermilion, ivory and indigo. Coherent figures, no text or watermark.

मिथिला का दरबार। राजा जनक आसन पर विराजमान थे। चारों ओर पंडित, शास्त्रज्ञ, टीकाकार। नित्य की भाँति चर्चा चल रही थी, श्लोकों पर, मीमांसा पर, धर्म पर।

A thin, dark-skinned young man steps through the great doorway into the bright court. His body is visibly bent and crooked at eight places, at the knees, the elbows, the neck and the spine, yet he walks in with calm dignity, leaning on a plain wooden staff, wearing simple coarse ochre cloth. Seated pandits glance at his twisted form and a few smile or smirk in mockery; the youth's own face holds a faint serene, knowing smile. King Janaka watches from his throne in the background. Painterly classical-Indian color style, warm light from doorway, sandstone hall, anatomy of the eightfold bend rendered with respect and accuracy, no caricature, no text or watermark.

तभी एक नौजवान भीतर आया। दुबला, साँवला, और उसका देह आठ जगह से टेढ़ा, घुटनों पर, कोहनियों पर, गर्दन पर। उसके जन्म से पहले की बात है। पिता कहोड़ माँ के गर्भ के पास वेद का पाठ करते थे, और एक स्थान पर चूक गए। गर्भ में पल रहे शिशु ने टोक दिया। पिता ने रोष में शाप दे डाला, “आठ स्थानों से टेढ़ा हो जा।” और वह वैसा ही जन्मा। नाम पड़ा अष्टावक्र।

वही अष्टावक्र, बड़ा होकर, आज जनक के दरबार में खड़ा था। पंडितों ने उसका टेढ़ा देह देखा और हँस पड़े, यह टेढ़ा सा बालक यहाँ क्या करने आया है।

अष्टावक्र भी हँसा। पर उसकी हँसी में और ही भाव था।

The bent young sage Ashtavakra speaks boldly in the court, one hand lifted in a teaching gesture, his expression composed and luminous. He addresses King Janaka and the assembled brahmins, telling them they see only skin and surface. The pandits around him fall silent, lowering their gaze, some abashed, their manuscripts forgotten in their laps; the king leans forward, arrested by the words. Focus on the young sage's quiet command despite his eightfold-bent frame in plain ochre cloth. Classical-Indian painterly color, deep maroon and gold court interior, lamplight, coherent dignified figures, no text or watermark.

“राजन्,” उसने जनक से कहा, “मैं समझता था कि आपके दरबार में ज्ञानी बैठते हैं। अब देखता हूँ, यहाँ सब चर्मकार हैं। ये केवल चमड़ी पर दृष्टि रखते हैं। आत्मा को इनकी आँख छू ही नहीं पाती।”

King Janaka, descended from formality into reverence, has seated the bent young sage Ashtavakra on a fine cushion directly facing him as an honored teacher. The king sits humbly, palms joined or hands open in earnest inquiry, asking his three questions about knowledge, liberation and dispassion. The pandits have withdrawn into respectful silence in the background. Intimate guru-and-disciple composition, the crowned king leaning toward the plainly dressed crooked-bodied sage. Warm, devotional classical-Indian color palette, gold, ivory, soft red; lamplit hall, carved pillars, coherent figures, no text or watermark.

पंडित मौन हो गए। जनक ने अष्टावक्र को सम्मुख बिठाया, और तीन प्रश्न रखे, “ज्ञान कैसे प्राप्त हो? मुक्ति कैसे मिले? वैराग्य कैसे जागे?”

अष्टावक्र का उत्तर, और उसके पश्चात जनक की दशा, यही अष्टावक्र गीता है। दो सौ अट्ठानवे श्लोकों में फैली हुई, फिर भी सारी बात पहले अध्याय के दूसरे श्लोक में ही उतर आती है।

अष्टावक्र गीता अद्वैत का सबसे सीधा और सबसे निर्भीक वचन है। यहाँ “पहले यह करो, फिर वह, फिर ध्यान, फिर समाधि” वाली सीढ़ियाँ नहीं हैं। यहाँ केवल एक पहचान है, आप पहले से ही मुक्त हैं। बँधन केवल इतना है कि आपको अपने बँधे होने का विश्वास हो आया है। इस विश्वास के अतिरिक्त और कोई बँधन है ही नहीं।

यह सुनने में सरल है, हृदय में उतरने में नहीं। अष्टावक्र के दो सौ अट्ठानवे श्लोक यही एक बात को हृदय तक पहुँचाते हैं, बारम्बार, अनेक ओर से, अनेक उपमाओं से। कहीं श्रोता ज्ञानी के स्वर में सुनता है, कहीं जनक के स्वर में।

और बीच में, अध्याय दो के पहले श्लोक में, जनक एक वाक्य कहते हैं। वही वाक्य इस संवाद का हृदय है। उस क्षण के पश्चात जनक वही नहीं रहे।

पढ़ने का क्रम

प्रथम परिचय के लिए अध्याय एक, दो, तीन और अठारह पर्याप्त हैं। अध्याय एक और दो आधार रखते हैं, अध्याय तीन उसे और गहरा करता है, और अध्याय अठारह (सौ श्लोक) सारे संवाद का सार है। शेष अध्याय इन्हीं भावों को नई-नई दिशाओं से दोहराते हैं।

जिसने भगवद् गीता पढ़ी हो, उसके सामने यहाँ एक अन्तर खुलता है। गीता क्रम से चढ़ने वाला मार्ग देती है, कर्मयोग, भक्ति-योग, ज्ञान-योग, मानो तीन सीढ़ियाँ। अष्टावक्र केवल एक पहचान माँगती है, बिना किसी सीढ़ी के। यह माँग कठोर है, और इसका मार्ग छोटा भी, पर वह केवल उनके लिए छोटा है जो तैयार हैं।

पढ़ते-पढ़ते यदि मन कहे कि “यह बात इतनी असम्भव सी है कि सत्य हो ही नहीं सकती,” तो वह स्वाभाविक है। इसी प्रतिरोध को शान्त करने के लिए यह संवाद रचा गया है। आगे बढ़ते रहिए। कुछ ही श्लोकों में वह प्रतिरोध अपने आप शान्त होने लगता है।

कुछ प्रश्न, कुछ उत्तर

अष्टावक्र गीता और भगवद् गीता में क्या अन्तर है?

भगवद् गीता युद्ध-भूमि पर कही गई, अष्टावक्र गीता राज-दरबार में। गीता के श्रोता अर्जुन हैं, जो शोक और मोह से टूटे हुए हैं। अष्टावक्र के श्रोता जनक हैं, जो स्वयं ज्ञानी हैं और जिन्हें केवल अन्तिम पुष्टि चाहिए। गीता तीन मार्ग देती है, कर्म, भक्ति, ज्ञान। अष्टावक्र केवल ज्ञान देती है, और कहती है यही एक मार्ग है। गीता क्रम से ले चलती है, अष्टावक्र एक ही क्षण में सब रख देती है।

अष्टावक्र गीता को सबसे निर्भीक अद्वैत क्यों कहा जाता है?

क्योंकि यह साधना तक को व्यर्थ कह देती है। हर साधना का लक्ष्य है “मुक्ति पाना।” अष्टावक्र कहती है कि मुक्ति को पाने योग्य वस्तु मानना ही भ्रम है, क्योंकि आप पहले से ही मुक्त हैं। अध्याय आठ में सीधे कहा गया है कि बन्धन और मोक्ष, दोनों कल्पना मात्र हैं। यह वचन योगी को विचलित करता है, क्योंकि उसकी सारी साधना इसी मान्यता पर खड़ी है कि कुछ “पाना” है।

अध्याय दो के पहले श्लोक में ऐसा क्या है जो हिला देता है?

The moment of King Janaka's awakening. The crowned king sits transfigured, eyes half-closed or gazing inward, a look of luminous wonder and stillness on his face, as he realizes he is the pure, spotless, peaceful witness-consciousness beyond all nature. Render the Self-as-witness symbolically: a soft radiant inner light or subtle luminous aura emanating from the seated king, the throne and court dimming into hushed glow around him, his body present yet his awareness clearly elsewhere, free and untouched. The bent young sage Ashtavakra sits serenely facing him. Painterly classical-Indian color, contemplative palette of gold, deep blue and warm light, halo-like radiance, no garish effects, dignified and serene, no text or watermark.

अध्याय एक में अष्टावक्र ने बीस श्लोकों में आत्मा का स्वरूप दिखाया। अध्याय दो के पहले श्लोक में जनक का उत्तर आता है, “अहो निरञ्जनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः। एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडम्बितः॥” अर्थ है, “आश्चर्य! मैं तो निर्मल, शान्त, स्वयं बोधस्वरूप हूँ, प्रकृति से परे। इतने काल तक मैं केवल मोह से ठगा जाता रहा।” एक श्लोक का उपदेश, एक श्लोक की पहचान। बीस बरस के शिष्यत्व का फल दो श्लोकों में उतर आता है। यही संक्षेप इस संवाद की विरल बात है।

क्या अष्टावक्र गीता गृहस्थ के लिए सार्थक है?

जनक राजा थे। पत्नी, सन्तान, मंत्री, युद्ध, राज्य का कोष, सब उनके भार पर था। अष्टावक्र गीता के पश्चात भी वे राज करते रहे। इसलिए व्यवहार में यह संवाद गृहस्थ के लिए ही उतरा है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि यह सरल है। यह कहती है, आपके सब दायित्व यथावत चलते रहें, पर आपकी पहचान उन दायित्वों में न बँधे। यही दूरी बनाए रखना ही असली अभ्यास है।

रमण महर्षि का इस संवाद से क्या सम्बन्ध था?

रमण महर्षि अष्टावक्र गीता को अपने सबसे प्रिय ग्रन्थों में गिनते थे। उन्होंने तमिल में इसके चुने हुए श्लोकों का अनुवाद किया। आज भी अरुणाचल के आश्रम में यह प्रतिदिन पढ़ी जाती है। रमण की आत्म-विचार पद्धति की नींव अष्टावक्र के अध्याय एक और दो में बैठी है। अन्तर बस इतना है कि रमण ने उसे एक सीधे अभ्यास में ढाल दिया, “मैं कौन हूँ?”

अध्याय अठारह में सौ श्लोक हैं। क्या ये सब पढ़ना आवश्यक है?

अध्याय अठारह सारे संवाद का सार है। अष्टावक्र वहाँ अनेक दिशाओं से एक ही बात कहते हैं, ज्ञानी कैसा दिखता है, उसके भीतर क्या बहता है, उसके बाहर क्या घटता है। यह दोहराव बिना प्रयोजन का नहीं। अद्वैत की पहचान एक बार समझ कर ठहर जाने वाली वस्तु नहीं। इसे बार-बार सुनना पड़ता है, अनेक दृष्टान्तों से। ये सौ श्लोक मानो एक दीर्घ ध्यान की भाँति काम करते हैं।

क्या यह संवाद भक्ति-मार्ग वालों के लिए भी सार्थक है?

हाँ, पर अपने समय पर। भक्ति में आरम्भ में भक्त और भगवान का सम्बन्ध दृढ़ होता है, “मैं भक्त, आप भगवान।” अष्टावक्र इसी सम्बन्ध को विलीन कर देती है। जो भक्ति-मार्ग में पर्याप्त आगे आ चुके हैं, उनके लिए यह वह अन्तिम द्वार है जहाँ “मैं” और “आप” एक ही चेतना के दो रूप दिखाई देने लगते हैं। नए भक्त को यह उलझा सकती है। इसलिए पहले नारद भक्ति सूत्र, फिर अष्टावक्र, यह क्रम अधिक उचित है।

अष्टावक्र का देह आठ जगह से टेढ़ा क्यों था, और इसका इस संवाद से क्या सम्बन्ध?

कथा है कि उनके पिता कहोड़ माँ के गर्भ के पास पाठ करते हुए एक स्थान पर चूक गए। गर्भ में अष्टावक्र ने टोक दिया। पिता ने रोष में शाप दिया, “आठ स्थानों से टेढ़ा हो जा।” यह कथा अपने में एक रूपक भी है। जो देह देखकर निर्णय कर लेते हैं, वे ज्ञान को नहीं देख पाते। दरबार में अष्टावक्र का पहला ही वचन यही दिखा गया। देह तो आवरण मात्र है। उसमें टेढ़ापन हो या सीधापन, वह आत्मा का रूप नहीं। सारा संवाद इसी एक बिन्दु पर खड़ा है, आदि से अन्त तक।

20 प्रकरण

हर पट्टिका एक स्वतंत्र अध्याय तक ले जाती है। पढ़ने का क्रम मूल जैसा ही है। पहले एक, दो, तीन और अठारह पढ़ें तो शीघ्र समझ आती है।

अध्याय 01
सर्वव्यापी साक्षी का दर्शन
जनक के तीन प्रश्न। अष्टावक्र का पहला उपदेश। बीस श्लोकों में आत्मा का पूरा स्वरूप।
अध्याय 02
जनक का विस्मय
“अहो निरञ्जनः शान्तः!” पच्चीस श्लोकों में एक राजा का भीतर ही पलट जाना। पूरे संवाद का सबसे गहरा क्षण।
अध्याय 03
अद्वय आत्मा
चौदह श्लोकों में अष्टावक्र फिर बोलते हैं। ज्ञान आ गया, पर अहंकार बच सकता है। उसे भी जाना है।
अध्याय 04
सर्वत्र आत्मा
छह श्लोकों में जनक का दूसरा उत्तर। अब वे ज्ञानी के भीतर से बोल रहे हैं।
अध्याय 05
विलय
चार श्लोक, चार लय। न जन्म, न मृत्यु। न बँधन, न मोक्ष। सब एक ही कल्पना के रूप।
अध्याय 06
प्रकृति से परे
चार श्लोकों में जनक की घोषणा। “आकाश की भाँति मैं हूँ। जगत् मेरे भीतर नहीं।”
अध्याय 07
शान्त, अनन्त, निर्मल
पाँच श्लोक। समुद्र और तरंग का प्रसिद्ध रूपक। मैं समुद्र हूँ, तरंगें मेरी अपनी हैं, पर मैं तरंग नहीं।
अध्याय 08
बन्धन और मोक्ष
चार श्लोक, पर सबसे निर्भीक। दोनों कल्पना हैं। यह वचन योग और साँख्य, सब को विचलित करता है।
अध्याय 09
वैराग्य की पराकाष्ठा
आठ श्लोक। साधारण वैराग्य कहता है “मुझे यह नहीं चाहिए।” अष्टावक्र का वैराग्य पूछता है, “चाहने वाला है कौन?”
अध्याय 10
उपशम
आठ श्लोक। इच्छाओं को मारने की आवश्यकता भी नहीं। उनकी उपेक्षा करते-करते वे अपने आप शान्त होकर गिर जाती हैं।
अध्याय 11
चिन्मात्र स्वरूप
आठ श्लोक। आत्मा का सार क्या है? केवल चित्, शुद्ध चेतना, बिना किसी गुण के, बिना किसी धर्म के। और कुछ इसमें जुड़ता ही नहीं।
अध्याय 12
सहज स्थिति
आठ श्लोक। ज्ञानी कुछ “करता” नहीं। उसका हर कर्म प्रयास-रहित है। जैसे श्वास का चलना।
अध्याय 13
स्वभाव से सुखी
सात श्लोक। सुख आपका अपना स्वभाव है। बाहर की वस्तुओं से इसका सम्बन्ध बहुत थोड़ा है।
अध्याय 14
ईश्वर और जगत्
चार श्लोक। ईश्वर है, जगत् है, पर दोनों एक ही चेतना के दो रूप। जैसे सोना और गहना।
अध्याय 15
तत्त्वज्ञान
बीस श्लोक। अष्टावक्र का सबसे प्रखर उपदेश। “आप हैं। बस इतना। आपको कुछ पाना नहीं।”
अध्याय 16
विशेष उपदेश
ग्यारह श्लोक। साधक जो सामान्य भूलें करते हैं, उन्हें खोल कर रख देते हैं। ध्यान भी एक भ्रम बन सकता है।
अध्याय 17
कैवल्य
बीस श्लोक। ज्ञानी अकेला है, पर वह अकेलापन उसके लिए पीड़ा नहीं, पूर्णता है।
अध्याय 18
जीवन्मुक्ति का सार
सौ श्लोक। सारे संवाद की पराकाष्ठा। ज्ञानी की भीतरी और बाहरी दशा का पूरा चित्र।
अध्याय 19
आत्मा की स्वमहिमा
आठ श्लोक। जनक की अन्तिम घोषणा। “मेरे लिए कुछ है ही नहीं। न शिष्य, न गुरु, न संसार, न मोक्ष।”
अध्याय 20
अन्तिम उपदेश
चौदह श्लोक। दरबार का संवाद विराम पाता है। जनक अब भीतर से सिद्ध हैं, बाहर से वही राजा। बात पूरी।

साथ में पढ़ें