अंग
249
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਭਗਤਿ ਵਛਲ ਪੁਰਖ ਪੂਰਨ ਮਨਹਿ ਚਿੰਦਿਆ ਪਾਈਐ ॥
ਤਮ ਅੰਧ ਕੂਪ ਤੇ ਉਧਾਰੈ ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਈਐ ॥
ਸੁਰ ਸਿਧ ਗਣ ਗੰਧਰਬ ਮੁਨਿ ਜਨ ਗੁਣ ਅਨਿਕ ਭਗਤੀ ਗਾਇਆ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਕਰਹੁ ਕਿਰਪਾ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥੨॥
ਚੇਤਿ ਮਨਾ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਸਰਬ ਕਲਾ ਜਿਨਿ ਧਾਰੀ ॥
ਕਰੁਣਾ ਮੈ ਸਮਰਥੁ ਸੁਆਮੀ ਘਟ ਘਟ ਪ੍ਰਾਣ ਅਧਾਰੀ ॥
ਪ੍ਰਾਣ ਮਨ ਤਨ ਜੀਅ ਦਾਤਾ ਬੇਅੰਤ ਅਗਮ ਅਪਾਰੋ ॥
ਸਰਣਿ ਜੋਗੁ ਸਮਰਥੁ ਮੋਹਨੁ ਸਰਬ ਦੋਖ ਬਿਦਾਰੋ ॥
ਰੋਗ ਸੋਗ ਸਭਿ ਦੋਖ ਬਿਨਸਹਿ ਜਪਤ ਨਾਮੁ ਮੁਰਾਰੀ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਕਰਹੁ ਕਿਰਪਾ ਸਮਰਥ ਸਭ ਕਲ ਧਾਰੀ ॥੩॥
ਗੁਣ ਗਾਉ ਮਨਾ ਅਚੁਤ ਅਬਿਨਾਸੀ ਸਭ ਤੇ ਊਚ ਦਇਆਲਾ ॥
ਬਿਸੰਭਰੁ ਦੇਵਨ ਕਉ ਏਕੈ ਸਰਬ ਕਰੈ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਾ ॥
ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ਮਹਾ ਦਇਆਲ ਦਾਨਾ ਦਇਆ ਧਾਰੇ ਸਭ ਕਿਸੈ ॥
ਕਾਲੁ ਕੰਟਕੁ ਲੋਭੁ ਮੋਹੁ ਨਾਸੈ ਜੀਅ ਜਾ ਕੈ ਪ੍ਰਭੁ ਬਸੈ ॥
ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਦੇਵਾ ਸਫਲ ਸੇਵਾ ਭਈ ਪੂਰਨ ਘਾਲਾ ॥
ਬਿਨਵੰਤ ਨਾਨਕ ਇਛ ਪੁਨੀ ਜਪਤ ਦੀਨ ਦੈਆਲਾ ॥੪॥੩॥
ਤਮ ਅੰਧ ਕੂਪ ਤੇ ਉਧਾਰੈ ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਈਐ ॥
ਸੁਰ ਸਿਧ ਗਣ ਗੰਧਰਬ ਮੁਨਿ ਜਨ ਗੁਣ ਅਨਿਕ ਭਗਤੀ ਗਾਇਆ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਕਰਹੁ ਕਿਰਪਾ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥੨॥
ਚੇਤਿ ਮਨਾ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਸਰਬ ਕਲਾ ਜਿਨਿ ਧਾਰੀ ॥
ਕਰੁਣਾ ਮੈ ਸਮਰਥੁ ਸੁਆਮੀ ਘਟ ਘਟ ਪ੍ਰਾਣ ਅਧਾਰੀ ॥
ਪ੍ਰਾਣ ਮਨ ਤਨ ਜੀਅ ਦਾਤਾ ਬੇਅੰਤ ਅਗਮ ਅਪਾਰੋ ॥
ਸਰਣਿ ਜੋਗੁ ਸਮਰਥੁ ਮੋਹਨੁ ਸਰਬ ਦੋਖ ਬਿਦਾਰੋ ॥
ਰੋਗ ਸੋਗ ਸਭਿ ਦੋਖ ਬਿਨਸਹਿ ਜਪਤ ਨਾਮੁ ਮੁਰਾਰੀ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਕਰਹੁ ਕਿਰਪਾ ਸਮਰਥ ਸਭ ਕਲ ਧਾਰੀ ॥੩॥
ਗੁਣ ਗਾਉ ਮਨਾ ਅਚੁਤ ਅਬਿਨਾਸੀ ਸਭ ਤੇ ਊਚ ਦਇਆਲਾ ॥
ਬਿਸੰਭਰੁ ਦੇਵਨ ਕਉ ਏਕੈ ਸਰਬ ਕਰੈ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਾ ॥
ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ਮਹਾ ਦਇਆਲ ਦਾਨਾ ਦਇਆ ਧਾਰੇ ਸਭ ਕਿਸੈ ॥
ਕਾਲੁ ਕੰਟਕੁ ਲੋਭੁ ਮੋਹੁ ਨਾਸੈ ਜੀਅ ਜਾ ਕੈ ਪ੍ਰਭੁ ਬਸੈ ॥
ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਦੇਵਾ ਸਫਲ ਸੇਵਾ ਭਈ ਪੂਰਨ ਘਾਲਾ ॥
ਬਿਨਵੰਤ ਨਾਨਕ ਇਛ ਪੁਨੀ ਜਪਤ ਦੀਨ ਦੈਆਲਾ ॥੪॥੩॥
भगति वछल पुरख पूरन मनहि चिंदिआ पाईऐ ॥
तम अंध कूप ते उधारै नामु मंनि वसाईऐ ॥
सुर सिध गण गंधरब मुनि जन गुण अनिक भगती गाइआ ॥
बिनवंति नानक करहु किरपा पारब्रहम हरि राइआ ॥२॥
चेति मना पारब्रहमु परमेसरु सरब कला जिनि धारी ॥
करुणा मै समरथु सुआमी घट घट प्राण अधारी ॥
प्राण मन तन जीअ दाता बेअंत अगम अपारो ॥
सरणि जोगु समरथु मोहनु सरब दोख बिदारो ॥
रोग सोग सभि दोख बिनसहि जपत नामु मुरारी ॥
बिनवंति नानक करहु किरपा समरथ सभ कल धारी ॥३॥
गुण गाउ मना अचुत अबिनासी सभ ते ऊच दइआला ॥
बिसंभरु देवन कउ एकै सरब करै प्रतिपाला ॥
प्रतिपाल महा दइआल दाना दइआ धारे सभ किसै ॥
कालु कंटकु लोभु मोहु नासै जीअ जा कै प्रभु बसै ॥
सुप्रसंन देवा सफल सेवा भई पूरन घाला ॥
बिनवंत नानक इछ पुनी जपत दीन दैआला ॥४॥३॥
तम अंध कूप ते उधारै नामु मंनि वसाईऐ ॥
सुर सिध गण गंधरब मुनि जन गुण अनिक भगती गाइआ ॥
बिनवंति नानक करहु किरपा पारब्रहम हरि राइआ ॥२॥
चेति मना पारब्रहमु परमेसरु सरब कला जिनि धारी ॥
करुणा मै समरथु सुआमी घट घट प्राण अधारी ॥
प्राण मन तन जीअ दाता बेअंत अगम अपारो ॥
सरणि जोगु समरथु मोहनु सरब दोख बिदारो ॥
रोग सोग सभि दोख बिनसहि जपत नामु मुरारी ॥
बिनवंति नानक करहु किरपा समरथ सभ कल धारी ॥३॥
गुण गाउ मना अचुत अबिनासी सभ ते ऊच दइआला ॥
बिसंभरु देवन कउ एकै सरब करै प्रतिपाला ॥
प्रतिपाल महा दइआल दाना दइआ धारे सभ किसै ॥
कालु कंटकु लोभु मोहु नासै जीअ जा कै प्रभु बसै ॥
सुप्रसंन देवा सफल सेवा भई पूरन घाला ॥
बिनवंत नानक इछ पुनी जपत दीन दैआला ॥४॥३॥
हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) अगर भक्ति से प्यार करने वाले पूर्ण पुरख का नाम मन में बसा लें। तो मन में चितवा हुआ हरेक मनोरथ पा लिया जाता है। वह हरी नाम माया के मोह के अंधे कूएँ के अंधकार में से निकाल लेता है। (हे मेरे मन !) देवते। करामाती जोगी। शिव जी के दास-देवते। देवतों के गवईए। ऋषि लोग और अनेकों ही भक्त जन उसी परमात्मा के गुण गाते आ रहे हैं। नानक विनती करता है, हे प्रभू पातशाह ! मेहर कर (कि मैं भी तेरा नाम सदा सिमरता रहूँ)। 2। हे (मेरे) मन ! पारब्रहम् परमेश्वर को याद रख। जिसने सब में अपनी सक्ता टिकाई हुई है। जो करुणामय है। सब ताकतों वाला है। सब का मालिक है। और जो हरेक शरीर का सबकी जिंद का आसरा है। जो प्राण मन तन और जिंद देने वाला है। बेअंत है। अपहुँच है। और अपार है। जो शरण पड़ने वाले की सहायता करने के काबिल है। जो सब ताकतों का मालिक है सुंदर है और सारे विकारों का नाश करने वाला है। हे मन ! मुरारी प्रभू का नाम जपते ही सारे रोग। सारे फिक्र। सारे ऐब नाश हो जाते हैं। नानक विनती करता है, हे सब ताकतों के मालिक ! हे सबमें अपनी सक्ता टिकाने वाले प्रभू ! (मुझ पर) मेहर कर (मैं भी तेरा नाम सदा सिमरता रहूँ)। 3। हे (मेरे) मन ! तू उस पारब्रहम् के गुण गा। जो सदा अटल रहने वाला है। जो कभी नाश नहीं होता। जो सबसे ऊूंचा है और दया का घर है। जो सारे जगत को पालने वाला है। जो स्वयं ही सब कुछ देने के काबिल है। जो सब की पालना करता है। (हे मेरे मन !) वह परमात्मा हरेक जीव पर दया करता है। हरेक के दिल की जानने वाला है। बड़ा ही दयालु और पालना करने वाला है। जिस मनुष्य के हृदय में वह प्रभू आ बसता है। उसके अंदर से लोभ मोह और दुखदाई (काँटे के समान चुभता रहने वाला) मौत का सहम दूर हो जाता है। (हे मन !) जिस मनुष्य पर प्रभू-देव जी अच्छी तरह प्रसन्न हो जाएं। उसकी की हुई सेवा को फल लग जाता है। उसकी की मेहनत सफल हो जाती है। नानक विनती करता है, गरीबों पर दया करने वाले परमात्मा का नाम जपने से इच्छा पूरी हो जाती है। 4। 3।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੁਣਿ ਸਖੀਏ ਮਿਲਿ ਉਦਮੁ ਕਰੇਹਾ ਮਨਾਇ ਲੈਹਿ ਹਰਿ ਕੰਤੈ ॥
ਮਾਨੁ ਤਿਆਗਿ ਕਰਿ ਭਗਤਿ ਠਗਉਰੀ ਮੋਹਹ ਸਾਧੂ ਮੰਤੈ ॥
ਸਖੀ ਵਸਿ ਆਇਆ ਫਿਰਿ ਛੋਡਿ ਨ ਜਾਈ ਇਹ ਰੀਤਿ ਭਲੀ ਭਗਵੰਤੈ ॥
ਨਾਨਕ ਜਰਾ ਮਰਣ ਭੈ ਨਰਕ ਨਿਵਾਰੈ ਪੁਨੀਤ ਕਰੈ ਤਿਸੁ ਜੰਤੈ ॥੧॥
ਸੁਣਿ ਸਖੀਏ ਇਹ ਭਲੀ ਬਿਨੰਤੀ ਏਹੁ ਮਤਾਂਤੁ ਪਕਾਈਐ ॥
ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ਉਪਾਧਿ ਰਹਤ ਹੋਇ ਗੀਤ ਗੋਵਿੰਦਹਿ ਗਾਈਐ ॥
ਕਲਿ ਕਲੇਸ ਮਿਟਹਿ ਭ੍ਰਮ ਨਾਸਹਿ ਮਨਿ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਈਐ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪੂਰਨ ਪਰਮੇਸਰ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ॥੨॥
ਸਖੀ ਇਛ ਕਰੀ ਨਿਤ ਸੁਖ ਮਨਾਈ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੀ ਆਸ ਪੁਜਾਏ ॥
ਚਰਨ ਪਿਆਸੀ ਦਰਸ ਬੈਰਾਗਨਿ ਪੇਖਉ ਥਾਨ ਸਬਾਏ ॥
ਖੋਜਿ ਲਹਉ ਹਰਿ ਸੰਤ ਜਨਾ ਸੰਗੁ ਸੰਮ੍ਰਿਥ ਪੁਰਖ ਮਿਲਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਮਿਲਿਆ ਸੁਰਿਜਨੁ ਸੁਖਦਾਤਾ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਮਾਏ ॥੩॥
ਸਖੀ ਨਾਲਿ ਵਸਾ ਅਪੁਨੇ ਨਾਹ ਪਿਆਰੇ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਤਨੁ ਹਰਿ ਸੰਗਿ ਹਿਲਿਆ ॥
ਸੁਣਿ ਸਖੀਏ ਮੇਰੀ ਨੀਦ ਭਲੀ ਮੈ ਆਪਨੜਾ ਪਿਰੁ ਮਿਲਿਆ ॥
ਭ੍ਰਮੁ ਖੋਇਓ ਸਾਂਤਿ ਸਹਜਿ ਸੁਆਮੀ ਪਰਗਾਸੁ ਭਇਆ ਕਉਲੁ ਖਿਲਿਆ ॥
ਵਰੁ ਪਾਇਆ ਪ੍ਰਭੁ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਨਾਨਕ ਸੋਹਾਗੁ ਨ ਟਲਿਆ ॥੪॥੪॥੨॥੫॥੧੧॥
ਸੁਣਿ ਸਖੀਏ ਮਿਲਿ ਉਦਮੁ ਕਰੇਹਾ ਮਨਾਇ ਲੈਹਿ ਹਰਿ ਕੰਤੈ ॥
ਮਾਨੁ ਤਿਆਗਿ ਕਰਿ ਭਗਤਿ ਠਗਉਰੀ ਮੋਹਹ ਸਾਧੂ ਮੰਤੈ ॥
ਸਖੀ ਵਸਿ ਆਇਆ ਫਿਰਿ ਛੋਡਿ ਨ ਜਾਈ ਇਹ ਰੀਤਿ ਭਲੀ ਭਗਵੰਤੈ ॥
ਨਾਨਕ ਜਰਾ ਮਰਣ ਭੈ ਨਰਕ ਨਿਵਾਰੈ ਪੁਨੀਤ ਕਰੈ ਤਿਸੁ ਜੰਤੈ ॥੧॥
ਸੁਣਿ ਸਖੀਏ ਇਹ ਭਲੀ ਬਿਨੰਤੀ ਏਹੁ ਮਤਾਂਤੁ ਪਕਾਈਐ ॥
ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ਉਪਾਧਿ ਰਹਤ ਹੋਇ ਗੀਤ ਗੋਵਿੰਦਹਿ ਗਾਈਐ ॥
ਕਲਿ ਕਲੇਸ ਮਿਟਹਿ ਭ੍ਰਮ ਨਾਸਹਿ ਮਨਿ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਈਐ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪੂਰਨ ਪਰਮੇਸਰ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ॥੨॥
ਸਖੀ ਇਛ ਕਰੀ ਨਿਤ ਸੁਖ ਮਨਾਈ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੀ ਆਸ ਪੁਜਾਏ ॥
ਚਰਨ ਪਿਆਸੀ ਦਰਸ ਬੈਰਾਗਨਿ ਪੇਖਉ ਥਾਨ ਸਬਾਏ ॥
ਖੋਜਿ ਲਹਉ ਹਰਿ ਸੰਤ ਜਨਾ ਸੰਗੁ ਸੰਮ੍ਰਿਥ ਪੁਰਖ ਮਿਲਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਮਿਲਿਆ ਸੁਰਿਜਨੁ ਸੁਖਦਾਤਾ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਮਾਏ ॥੩॥
ਸਖੀ ਨਾਲਿ ਵਸਾ ਅਪੁਨੇ ਨਾਹ ਪਿਆਰੇ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਤਨੁ ਹਰਿ ਸੰਗਿ ਹਿਲਿਆ ॥
ਸੁਣਿ ਸਖੀਏ ਮੇਰੀ ਨੀਦ ਭਲੀ ਮੈ ਆਪਨੜਾ ਪਿਰੁ ਮਿਲਿਆ ॥
ਭ੍ਰਮੁ ਖੋਇਓ ਸਾਂਤਿ ਸਹਜਿ ਸੁਆਮੀ ਪਰਗਾਸੁ ਭਇਆ ਕਉਲੁ ਖਿਲਿਆ ॥
ਵਰੁ ਪਾਇਆ ਪ੍ਰਭੁ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਨਾਨਕ ਸੋਹਾਗੁ ਨ ਟਲਿਆ ॥੪॥੪॥੨॥੫॥੧੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
सुणि सखीए मिलि उदमु करेहा मनाइ लैहि हरि कंतै ॥
मानु तिआगि करि भगति ठगउरी मोहह साधू मंतै ॥
सखी वसि आइआ फिरि छोडि न जाई इह रीति भली भगवंतै ॥
नानक जरा मरण भै नरक निवारै पुनीत करै तिसु जंतै ॥१॥
सुणि सखीए इह भली बिनंती एहु मतांतु पकाईऐ ॥
सहजि सुभाइ उपाधि रहत होइ गीत गोविंदहि गाईऐ ॥
कलि कलेस मिटहि भ्रम नासहि मनि चिंदिआ फलु पाईऐ ॥
पारब्रहम पूरन परमेसर नानक नामु धिआईऐ ॥२॥
सखी इछ करी नित सुख मनाई प्रभ मेरी आस पुजाए ॥
चरन पिआसी दरस बैरागनि पेखउ थान सबाए ॥
खोजि लहउ हरि संत जना संगु संम्रिथ पुरख मिलाए ॥
नानक तिन मिलिआ सुरिजनु सुखदाता से वडभागी माए ॥३॥
सखी नालि वसा अपुने नाह पिआरे मेरा मनु तनु हरि संगि हिलिआ ॥
सुणि सखीए मेरी नीद भली मै आपनड़ा पिरु मिलिआ ॥
भ्रमु खोइओ सांति सहजि सुआमी परगासु भइआ कउलु खिलिआ ॥
वरु पाइआ प्रभु अंतरजामी नानक सोहागु न टलिआ ॥४॥४॥२॥५॥११॥
सुणि सखीए मिलि उदमु करेहा मनाइ लैहि हरि कंतै ॥
मानु तिआगि करि भगति ठगउरी मोहह साधू मंतै ॥
सखी वसि आइआ फिरि छोडि न जाई इह रीति भली भगवंतै ॥
नानक जरा मरण भै नरक निवारै पुनीत करै तिसु जंतै ॥१॥
सुणि सखीए इह भली बिनंती एहु मतांतु पकाईऐ ॥
सहजि सुभाइ उपाधि रहत होइ गीत गोविंदहि गाईऐ ॥
कलि कलेस मिटहि भ्रम नासहि मनि चिंदिआ फलु पाईऐ ॥
पारब्रहम पूरन परमेसर नानक नामु धिआईऐ ॥२॥
सखी इछ करी नित सुख मनाई प्रभ मेरी आस पुजाए ॥
चरन पिआसी दरस बैरागनि पेखउ थान सबाए ॥
खोजि लहउ हरि संत जना संगु संम्रिथ पुरख मिलाए ॥
नानक तिन मिलिआ सुरिजनु सुखदाता से वडभागी माए ॥३॥
सखी नालि वसा अपुने नाह पिआरे मेरा मनु तनु हरि संगि हिलिआ ॥
सुणि सखीए मेरी नीद भली मै आपनड़ा पिरु मिलिआ ॥
भ्रमु खोइओ सांति सहजि सुआमी परगासु भइआ कउलु खिलिआ ॥
वरु पाइआ प्रभु अंतरजामी नानक सोहागु न टलिआ ॥४॥४॥२॥५॥११॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे सहेलिए ! (हे सत्संगी सज्जन ! मेरी विनती) सुन (आ। ) मिल के भजन करें (और) कंत-प्रभू को (अपने ऊपर) खुश कर लें। अहंकार दूर करके (और कंत-प्रभू की) भक्ती को ठॅग-बूटी बना के (इस बूटी के साथ उस प्रभू-पति को) गुरू के उपदेश द्वारा (गुरू के उपदेश पर चल के) मोह लें। हे सहेली ! उस भगवान की ये सुंदर मर्यादा है कि यदि वह एक बार प्रेम वश हो जाए तो फिर कभी छोड़ के नहीं जाता। हे नानक ! (जो जीव कंत-प्रभू की शरण आता है) उस जीव को वह पवित्र (जीवन वाला) बना देता है (उसके पवित्र आत्मिक जीवन को वह प्रभू) बुढ़ापा नहीं आने देता। मौत नहीं आने देता। उसके सारे सारे डर व नर्क (बड़े से बड़े दुख) दूर कर देता है। 1। हे सहेलिए ! (हे सत्संगी सज्जन ! मेरी) ये भली विनती (सुन। आ) ये सलाह पक्की करें (कि) आत्मिक अडोलता में प्रभू-प्रेम में टिक के (अपने अंदर से) छल-फरेब दूर करके गोबिंद (की सिफत सालाह) के गीत गाएं। आत्मिक अडोलता में टिक के प्रेम से गोविंद के गुण गाने से छल फरेब विकार आदि मिट जाते है (गोबिंद की सिफत सालाह करने से। अंदर से विकारों की) खह खह झगड़े और अन्य सारे कलेष मिट जाते हैं (माया के पीछे मन की) दौड़-भाग समाप्त हो जाती हैं। मन में चतवा हुआ फल प्राप्त हो जाता है। हे नानक ! (कह, हे सत्संगी सज्जन !) पारब्रहम् पूर्ण परमेश्वर का नाम (सदा) सिमरना चाहिए। 2। (हे सहेलिए !) मैं सदा चाहत करती रहती हूँ और सुखना सुखती रहती हूँ (कि) हे प्रभू ! मेरी आस पूरी कर। मैं तेरे दर्शनों के लिए उतावली हुई तुझे हर जगह तलाशती फिरती हूँ। (हे सहेलीये ! प्रभू की) खोज कर कर के मैं संत-जनों का साथ (जा) ढूँढती हूँ (साध-संगति ही उस प्रभू का) मेल कराती है जो सारी ताकतों का मालिक है और जो सब में व्यापक है। हे नानक ! (कह,) हे माँ ! (जो मनुष्य साध-संगति में मिलते हैं) उन्हें ही देव-लोक का मालिक और सारे सुख देने वाला प्रभू मिलता है वही मनुष्य बहुत भाग्यशाली हैं। 3। हे सहेलिए ! (साध-संगति की बरकति से अब) मैं (सदा) अपने प्रभू पति के साथ आ बसती हूँ। मेरा मन उस हरी के साथ हिल-मिल गया है। मेरा तन (हृदय) उस हरी के साथ एक-मेक हो गया है। हे सहेलिए ! सुन। (अब) मुझे नींद भी प्यारी लगती है। (क्योंकि। सपने में भी) मुझे अपना प्यारा पति मिलता है। उस मालिक प्रभू ने मेरी भटकना दूर कर दी है। मेरे अंदर अब शान्ति बनी रहती है। मैं आत्मिक अडोलता में टिकी रहती हूँ। (मेरे अंदर उसकी ज्योति की) रोशनी हो गई है (जैसे सूर्य की किरणों से) कमल-फूल खिल जाता है (वैसे ही उसकी ज्योति के प्रकाश से मेरा हृदय खिला। प्रसन्न-चिक्त रहता है)। हे नानक ! (कह, हे सहेलिए ! साध-संगति की बरकति से) मैंने अंतरजामी प्रभू-पति ढूँढ लिया है। और (मेरे सिर का) ये सुहाग कभी दूर होने वाला नहीं। 4। 4। 2। 5। 11।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 249 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Vasant-Panchami की सुबह, सरस्वती-pooja, बच्चों का पीला कुर्ता।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 33 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 249” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 250 →, पीछे का: ← अंग 248।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।