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उपनिषद् संग्रह

उपनिषद् संग्रह
वेदान्त का दार्शनिक मूल
वेदों का अन्तिम भाग, और उनका सबसे गहरा। ऋषियों के संवाद, और शिष्यों के प्रश्न, जहाँ पहली बार “मैं कौन हूँ” का सीधा उत्तर मिला।

समूची उपनिषद्-परंपरा का बीज-वाक्य

“सत्यं ज्ञानम् अनन्तं ब्रह्म।”, ब्रह्म ही सत्य है, ज्ञान है, और अनन्त है।

तैत्तिरीय का यह वचन उन सब उपनिषदों का सार अपने में समेटे है, जो एक ही प्रश्न के गिर्द घूमती हैं, उस सत्य का स्वरूप क्या है जो जान लेने पर सब कुछ जाना जाता है।

तैत्तिरीय 2.1.1

परिचय

An old sage seated under a banyan tree on a small earth-mound, teaching a young student who sits a little distance away; a small sacrificial fire smolders between them, a deer at the edge
उपनिषद्। शब्द का अर्थ ही है, गुरु के समीप बैठना। बरगद के नीचे, अग्नि के सामने, एक प्रश्न से आरम्भ।

उपनिषद् वेदों का ज्ञान-काण्ड हैं, उनका दार्शनिक शिखर। कर्म-काण्ड के यज्ञ और अनुष्ठान से ऊपर उठ कर, यहाँ ऋषि सीधा प्रश्न उठाते हैं, ब्रह्म क्या है, आत्मा क्या है, मृत्यु के पार क्या रह जाता है। यही प्रश्न आगे चल कर वेदान्त की समूची इमारत बने।

परंपरा में एक सौ आठ उपनिषद् गिनाई जाती हैं, मगर इनमें दस प्रधान मानी जाती हैं, जिन पर शंकराचार्य ने भाष्य रचे, ईशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक। इन्हीं में वे चार महावाक्य निहित हैं जो समस्त अद्वैत के आधार हैं, छान्दोग्य का “तत्त्वमसि”, बृहदारण्यक का “अहं ब्रह्मास्मि”, ऐतरेय का “प्रज्ञानं ब्रह्म”, और माण्डूक्य का “अयमात्मा ब्रह्म”।

lulla.net पर हम इनमें से आठ उपनिषदें मन्त्र-दर-मन्त्र पढ़ते हैं, और साथ में भगवद् गीता, जो उपनिषदों का दुहा हुआ सार मानी जाती है। हर पृष्ठ पर मूल संस्कृत, उसका देवनागरी उच्चारण, और हिन्दी टीका साथ रहती है। आरम्भ के लिए ईशावास्य उत्तम है, सबसे संक्षिप्त, केवल अठारह मन्त्रों में पूरी; अथवा केन, जिसका प्रश्न ही सबसे सीधा है।

उपनिषद् और भगवद् गीता

आठ उपनिषदें, और भगवद् गीता। प्रत्येक पर मन्त्र-दर-मन्त्र टीका।

01
ईशावास्य उपनिषद्
अठारह मन्त्र। ईश्वर इस समस्त जगत् में व्याप्त है, यही मूल शिक्षा।
02
केनोपनिषद्
“किसकी प्रेरणा से मन विषयों की ओर जाता है?”
03
कठोपनिषद्
नचिकेता और यमराज का संवाद। मृत्यु के पार क्या है?
04
प्रश्नोपनिषद्
छह शिष्य, छह प्रश्न, पिप्पलाद ऋषि के उत्तर।
05
मुण्डक उपनिषद्
परा और अपरा विद्या का भेद।
06
माण्डूक्य उपनिषद्
बारह मन्त्र। ओंकार, और चेतना की चार अवस्थाएँ।
07
तैत्तिरीय उपनिषद्
पंचकोश विवेक: अन्नमय से आनन्दमय तक।
08
ऐतरेय उपनिषद्
सृष्टि, जन्म, और “प्रज्ञानं ब्रह्म” महावाक्य।
09
छान्दोग्य उपनिषद्
साम वेद का विशाल उपनिषद्। सत्यकाम, श्वेतकेतु, और महावाक्य तत्त्वमसि, वह तत्त्व आप ही हैं।
10
बृहदारण्यक उपनिषद्
याज्ञवल्क्य, मैत्रेयी और गार्गी के संवाद। अहं ब्रह्मास्मि और नेति नेति का उद्गम।
12
श्वेताश्वतर उपनिषद्
एक कारण की खोज, और भक्ति का पहला स्वर। रुद्र-ईश्वर की उपासना।
13
कैवल्य उपनिषद्
कैवल्य, अकेलेपन की मुक्ति। महेश्वर के ध्यान का मार्ग।
11
भगवद् गीता
अठारह अध्याय, सात सौ श्लोक। कर्म, ज्ञान, और भक्ति का समन्वय।

साथ में पढ़ें

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