परिचय

उपनिषद् वेदों का ज्ञान-काण्ड हैं, उनका दार्शनिक शिखर। कर्म-काण्ड के यज्ञ और अनुष्ठान से ऊपर उठ कर, यहाँ ऋषि सीधा प्रश्न उठाते हैं, ब्रह्म क्या है, आत्मा क्या है, मृत्यु के पार क्या रह जाता है। यही प्रश्न आगे चल कर वेदान्त की समूची इमारत बने।
परंपरा में एक सौ आठ उपनिषद् गिनाई जाती हैं, मगर इनमें दस प्रधान मानी जाती हैं, जिन पर शंकराचार्य ने भाष्य रचे, ईशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक। इन्हीं में वे चार महावाक्य निहित हैं जो समस्त अद्वैत के आधार हैं, छान्दोग्य का “तत्त्वमसि”, बृहदारण्यक का “अहं ब्रह्मास्मि”, ऐतरेय का “प्रज्ञानं ब्रह्म”, और माण्डूक्य का “अयमात्मा ब्रह्म”।
lulla.net पर हम इनमें से आठ उपनिषदें मन्त्र-दर-मन्त्र पढ़ते हैं, और साथ में भगवद् गीता, जो उपनिषदों का दुहा हुआ सार मानी जाती है। हर पृष्ठ पर मूल संस्कृत, उसका देवनागरी उच्चारण, और हिन्दी टीका साथ रहती है। आरम्भ के लिए ईशावास्य उत्तम है, सबसे संक्षिप्त, केवल अठारह मन्त्रों में पूरी; अथवा केन, जिसका प्रश्न ही सबसे सीधा है।
उपनिषद् और भगवद् गीता
आठ उपनिषदें, और भगवद् गीता। प्रत्येक पर मन्त्र-दर-मन्त्र टीका।
साथ में पढ़ें
- भगवद् गीता वही उपनिषद्-तत्त्व, यहाँ कृष्ण और अर्जुन के निरन्तर संवाद में खुलता हुआ।
- योग वासिष्ठ की कथाएँ उपनिषदों का वही ज्ञान, यहाँ कथाओं के रूप में।
- अष्टावक्र गीता उपनिषदों का निचोड़ा हुआ शुद्ध अद्वैत।