अंग 206

अंग
206
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਰਿ ਕਰਿ ਹਾਰਿਓ ਅਨਿਕ ਬਹੁ ਭਾਤੀ ਛੋਡਹਿ ਕਤਹੂੰ ਨਾਹੀ ॥
ਏਕ ਬਾਤ ਸੁਨਿ ਤਾਕੀ ਓਟਾ ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਟਿ ਜਾਹੀ ॥੨॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਸੰਤ ਮਿਲੇ ਮੋਹਿ ਤਿਨ ਤੇ ਧੀਰਜੁ ਪਾਇਆ ॥
ਸੰਤੀ ਮੰਤੁ ਦੀਓ ਮੋਹਿ ਨਿਰਭਉ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਕਮਾਇਆ ॥੩॥
ਜੀਤਿ ਲਏ ਓਇ ਮਹਾ ਬਿਖਾਦੀ ਸਹਜ ਸੁਹੇਲੀ ਬਾਣੀ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਭਇਆ ਪਰਗਾਸਾ ਪਾਇਆ ਪਦੁ ਨਿਰਬਾਣੀ ॥੪॥੪॥੧੨੫॥
करि करि हारिओ अनिक बहु भाती छोडहि कतहूं नाही ॥
एक बात सुनि ताकी ओटा साधसंगि मिटि जाही ॥२॥
करि किरपा संत मिले मोहि तिन ते धीरजु पाइआ ॥
संती मंतु दीओ मोहि निरभउ गुर का सबदु कमाइआ ॥३॥
जीति लए ओइ महा बिखादी सहज सुहेली बाणी ॥
कहु नानक मनि भइआ परगासा पाइआ पदु निरबाणी ॥४॥४॥१२५॥

हिन्दी अर्थ: (हे पिता प्रभू ! इन पाँचों बिखादियों से बचने के लिए) मैं अनेकों और कई किस्मों के यतन कर कर के थक गया हूँ। ये किसी तरह भी मेरा छुटकारा नहीं करते। एक ये बात सुन के कि साध-संगति में रहने से ये खत्म हो जाते हैं~ मैंने तेरी साध-संगति का आसरा लिया है। 2। (साध-संगति में) कृपा करके मुझे तेरे संत जन मिल गए~ उनसे मुझे हौसला मिला है। संतों ने मुझे (इन पाँच बिखादियों से) निडर करने वाला उपदेश दिया है और मैंने गुरू का शबद अपने जीवन में धारण किया है। 3। गुरू की आत्मिक अडोलता देने वाली~ और सुख देने वाली बाणी की बरकति से मैंने उन पाँचों बड़े झगड़ालुओं पर जीत हासिल कर ली है। हे नानक ! (अब) कह, मेरे मन में आत्मिक प्रकाश हो गया है~ मैंने वह आत्मिक दर्जा प्राप्त कर लिया है~ जहाँ कोई वासना छू नहीं सकती। 4। 4। 125।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਓਹੁ ਅਬਿਨਾਸੀ ਰਾਇਆ ॥
ਨਿਰਭਉ ਸੰਗਿ ਤੁਮਾਰੈ ਬਸਤੇ ਇਹੁ ਡਰਨੁ ਕਹਾ ਤੇ ਆਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਏਕ ਮਹਲਿ ਤੂੰ ਹੋਹਿ ਅਫਾਰੋ ਏਕ ਮਹਲਿ ਨਿਮਾਨੋ ॥
ਏਕ ਮਹਲਿ ਤੂੰ ਆਪੇ ਆਪੇ ਏਕ ਮਹਲਿ ਗਰੀਬਾਨੋ ॥੧॥
ਏਕ ਮਹਲਿ ਤੂੰ ਪੰਡਿਤੁ ਬਕਤਾ ਏਕ ਮਹਲਿ ਖਲੁ ਹੋਤਾ ॥
ਏਕ ਮਹਲਿ ਤੂੰ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਗ੍ਰਾਹਜੁ ਏਕ ਮਹਲਿ ਕਛੂ ਨ ਲੇਤਾ ॥੨॥
ਕਾਠ ਕੀ ਪੁਤਰੀ ਕਹਾ ਕਰੈ ਬਪੁਰੀ ਖਿਲਾਵਨਹਾਰੋ ਜਾਨੈ ॥
ਜੈਸਾ ਭੇਖੁ ਕਰਾਵੈ ਬਾਜੀਗਰੁ ਓਹੁ ਤੈਸੋ ਹੀ ਸਾਜੁ ਆਨੈ ॥੩॥
ਅਨਿਕ ਕੋਠਰੀ ਬਹੁਤੁ ਭਾਤਿ ਕਰੀਆ ਆਪਿ ਹੋਆ ਰਖਵਾਰਾ ॥
ਜੈਸੇ ਮਹਲਿ ਰਾਖੈ ਤੈਸੈ ਰਹਨਾ ਕਿਆ ਇਹੁ ਕਰੈ ਬਿਚਾਰਾ ॥੪॥
ਜਿਨਿ ਕਿਛੁ ਕੀਆ ਸੋਈ ਜਾਨੈ ਜਿਨਿ ਇਹ ਸਭ ਬਿਧਿ ਸਾਜੀ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਅਪਰੰਪਰ ਸੁਆਮੀ ਕੀਮਤਿ ਅਪੁਨੇ ਕਾਜੀ ॥੫॥੫॥੧੨੬॥
गउड़ी महला ५ ॥
ओहु अबिनासी राइआ ॥
निरभउ संगि तुमारै बसते इहु डरनु कहा ते आइआ ॥१॥ रहाउ ॥
एक महलि तूं होहि अफारो एक महलि निमानो ॥
एक महलि तूं आपे आपे एक महलि गरीबानो ॥१॥
एक महलि तूं पंडितु बकता एक महलि खलु होता ॥
एक महलि तूं सभु किछु ग्राहजु एक महलि कछू न लेता ॥२॥
काठ की पुतरी कहा करै बपुरी खिलावनहारो जानै ॥
जैसा भेखु करावै बाजीगरु ओहु तैसो ही साजु आनै ॥३॥
अनिक कोठरी बहुतु भाति करीआ आपि होआ रखवारा ॥
जैसे महलि राखै तैसै रहना किआ इहु करै बिचारा ॥४॥
जिनि किछु कीआ सोई जानै जिनि इह सभ बिधि साजी ॥
कहु नानक अपरंपर सुआमी कीमति अपुने काजी ॥५॥५॥१२६॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे प्रभू ! तू एक ) वह राजा है जो कभी नाश होने वाला नहीं। जो जीव तेरे चरणों में टिके रहते हैं~ वे निडर हो जाते हैं~ उन्हें किसी भी तरह का कहीं से भी कोई डर-खौफ नहीं रहता। रहाउ। (हे प्रभू ! तेरे चरणों में टिके रहने वालों को यकीन है कि) एक (मनुष्य के) शरीर में तू (खुद ही) अहंकारी बना है और एक (दूसरे) शरीर में तू विनम्र स्वभाव का है। एक शरीर में तू स्वयं ही सब इख्तियार वाला है और एक (दूसरे) शरीर में तू गरीब कंगाल है। 1। (हे प्रभू !) एक (मनुष्य के) शरीर में तू बढ़िया वक्ता विद्वान है और एक शरीर में तू मूर्ख बना हुआ है। एक शरीर में (बैठ के तू गरीबों~ कमजोरों से) सब कुछ (छीन के अपने पास) इकट्ठा करने वाला है~ और एक शरीर में तू (विरक्त बन के) कोई चीज भी अंगीकार नहीं करता। 2। (पर हे भाई !) ये जीव बिचारा काठ की पुतली है~ इसे खिलाने वाला प्रभू ही जानता है कि इसे कैसे नचा रहा है। (बाजी खिलाने वाला प्रभू) बाजीगर जैसा स्वांग रचाता है~ वह जीव वैसा ही स्वांग रचता है। 3। प्रभू ने (जगत में बेअंत जूनियों के जीवों की) अनेक (शरीर-) कोठड़ियां कई किस्म की बना दी हैं और प्रभू स्वयं ही (सब का) रक्षक बना हुआ है। ये बिचारा जीव (अपने आप) कुछ भी करने के लायक नहीं। जैसे शरीर में परमात्मा इसे रखता है~ वैसे शरीर में इसको रहना पड़ता है। 4। हे नानक ! कह, जिस परमात्मा ने ये जगत रचा है~ जिस परमात्मा ने ये सारी खेल बनाई है~ वही (इसके भेद को) जानता है। वह परमात्मा परे से परे है~ (सारी रचना का) मालिक है~ और वह अपने कामों की कद्र खुद ही जानता है। 5। 5। 126।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਛੋਡਿ ਛੋਡਿ ਰੇ ਬਿਖਿਆ ਕੇ ਰਸੂਆ ॥
ਉਰਝਿ ਰਹਿਓ ਰੇ ਬਾਵਰ ਗਾਵਰ ਜਿਉ ਕਿਰਖੈ ਹਰਿਆਇਓ ਪਸੂਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋ ਜਾਨਹਿ ਤੂੰ ਅਪੁਨੇ ਕਾਜੈ ਸੋ ਸੰਗਿ ਨ ਚਾਲੈ ਤੇਰੈ ਤਸੂਆ ॥
ਨਾਗੋ ਆਇਓ ਨਾਗ ਸਿਧਾਸੀ ਫੇਰਿ ਫਿਰਿਓ ਅਰੁ ਕਾਲਿ ਗਰਸੂਆ ॥੧॥
ਪੇਖਿ ਪੇਖਿ ਰੇ ਕਸੁੰਭ ਕੀ ਲੀਲਾ ਰਾਚਿ ਮਾਚਿ ਤਿਨਹੂੰ ਲਉ ਹਸੂਆ ॥
ਛੀਜਤ ਡੋਰਿ ਦਿਨਸੁ ਅਰੁ ਰੈਨੀ ਜੀਅ ਕੋ ਕਾਜੁ ਨ ਕੀਨੋ ਕਛੂਆ ॥੨॥
ਕਰਤ ਕਰਤ ਇਵ ਹੀ ਬਿਰਧਾਨੋ ਹਾਰਿਓ ਉਕਤੇ ਤਨੁ ਖੀਨਸੂਆ ॥
ਜਿਉ ਮੋਹਿਓ ਉਨਿ ਮੋਹਨੀ ਬਾਲਾ ਉਸ ਤੇ ਘਟੈ ਨਾਹੀ ਰੁਚ ਚਸੂਆ ॥੩॥
ਜਗੁ ਐਸਾ ਮੋਹਿ ਗੁਰਹਿ ਦਿਖਾਇਓ ਤਉ ਸਰਣਿ ਪਰਿਓ ਤਜਿ ਗਰਬਸੂਆ ॥
ਮਾਰਗੁ ਪ੍ਰਭ ਕੋ ਸੰਤਿ ਬਤਾਇਓ ਦ੍ਰਿੜੀ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਭਗਤਿ ਹਰਿ ਜਸੂਆ ॥੪॥੬॥੧੨੭॥
गउड़ी महला ५ ॥
छोडि छोडि रे बिखिआ के रसूआ ॥
उरझि रहिओ रे बावर गावर जिउ किरखै हरिआइओ पसूआ ॥१॥ रहाउ ॥
जो जानहि तूं अपुने काजै सो संगि न चालै तेरै तसूआ ॥
नागो आइओ नाग सिधासी फेरि फिरिओ अरु कालि गरसूआ ॥१॥
पेखि पेखि रे कसुंभ की लीला राचि माचि तिनहूं लउ हसूआ ॥
छीजत डोरि दिनसु अरु रैनी जीअ को काजु न कीनो कछूआ ॥२॥
करत करत इव ही बिरधानो हारिओ उकते तनु खीनसूआ ॥
जिउ मोहिओ उनि मोहनी बाला उस ते घटै नाही रुच चसूआ ॥३॥
जगु ऐसा मोहि गुरहि दिखाइओ तउ सरणि परिओ तजि गरबसूआ ॥
मारगु प्रभ को संति बताइओ द्रिड़ी नानक दास भगति हरि जसूआ ॥४॥६॥१२७॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे भाई ! माया के चस्के छोड़ दे~ छोड़ दे। हे पागल गवार ! तू (इन चस्कों में ऐसे) मस्त हुआ पड़ा है~ जैसे कोई पशु हरे-भरे खेत में मस्त (होता है)। 1। रहाउ। (हे पागल !) जिस चीज को तू अपने काम आने वाली समझता है~ वह रक्ती भर भी (अंत समय) तेरे साथ नहीं जाती। तू (जगत में) नंगा आया था (यहां से) नंगा ही चला जाएगा। तू (व्यर्थ ही योनियों के) चक्कर में फिर रहा है और तुझे आत्मिक मौत ने ग्रसा हुआ है। 1। (हे पागल !) (ये माया की खेल) कसुंभ पुष्प की खेल (है~ इसे) देख-देख के तू इसमें मस्त हो रहा है~ और इन पदार्थों से खुश हो रहा है। दिन रात तेरी उर्म की डोरी कमजोर होती जा रही है। तूने अपनी जीवात्मा के काम आने वाला कोई भी काम नहीं किया। 2। (माया के धंधे) कर-कर के ऐसे ही मनुष्य बुड्ढा हो जाता है~ अक्ल काम करने से रह जाती है~ और शरीर क्षीण हो जाता है। जैसे (जवानी में) उस मोहनी माया ने इसे अपने मोह में फंसाया था~ उसमें से इस की प्रीति रक्ती मात्र भी नहीं कम होती। 3। हे दास नानक ! कह, मुझे गुरू ने दिखा दिया है कि जगत (का मोह) ऐसा है। तब मैं (जगत का) मान त्याग के (गुरू की) शरण पड़ा हूँ। गुरू-संत ने मुझे परमात्मा के मिलने का राह बता दिया है और मैंने परमात्मा की भक्ति परमात्मा की सिफत सालाह अपने हृदय में पक्की कर ली है। 4। 6। 127।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਕਵਨੁ ਹਮਾਰਾ ॥
ਮੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅੰਤਰ ਕੀ ਬਿਧਿ ਤੁਮ ਹੀ ਜਾਨੀ ਤੁਮ ਹੀ ਸਜਨ ਸੁਹੇਲੇ ॥
ਸਰਬ ਸੁਖਾ ਮੈ ਤੁਝ ਤੇ ਪਾਏ ਮੇਰੇ ਠਾਕੁਰ ਅਗਹ ਅਤੋਲੇ ॥੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
तुझ बिनु कवनु हमारा ॥
मेरे प्रीतम प्रान अधारा ॥१॥ रहाउ ॥
अंतर की बिधि तुम ही जानी तुम ही सजन सुहेले ॥
सरब सुखा मै तुझ ते पाए मेरे ठाकुर अगह अतोले ॥१॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ तेरे बिना हमारा और कौन (सहारा) है? हे मेरे प्रीतम प्रभू ! हे मेरे प्राणों के आसरे प्रभू ! ।1। रहाउ। मेरे दिल की हालत तू ही जानता है~ तू ही मेरा सज्जन है; तू ही मुझे सुख देने वाला है। सारे सुख मैंने तुझसे ही पाए हैं, हे मेरे अथाह और अडोल ठाकुर !। 1।

संदर्भ: यह अंग 206 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Lodhi Gardens में सुबह की walk, घूमते-घूमते एक पुरानी पंक्ति।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 206” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 207 →, पीछे का: ← अंग 205

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।