अंग 304

अंग
304
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜੋ ਗੁਰੁ ਗੋਪੇ ਆਪਣਾ ਸੁ ਭਲਾ ਨਾਹੀ ਪੰਚਹੁ ਓਨਿ ਲਾਹਾ ਮੂਲੁ ਸਭੁ ਗਵਾਇਆ ॥
ਪਹਿਲਾ ਆਗਮੁ ਨਿਗਮੁ ਨਾਨਕੁ ਆਖਿ ਸੁਣਾਏ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਉਪਰਿ ਆਇਆ ॥
ਗੁਰਸਿਖਾ ਵਡਿਆਈ ਭਾਵੈ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਮਨਮੁਖਾ ਓਹ ਵੇਲਾ ਹਥਿ ਨ ਆਇਆ ॥੨॥
जो गुरु गोपे आपणा सु भला नाही पंचहु ओनि लाहा मूलु सभु गवाइआ ॥
पहिला आगमु निगमु नानकु आखि सुणाए पूरे गुर का बचनु उपरि आइआ ॥
गुरसिखा वडिआई भावै गुर पूरे की मनमुखा ओह वेला हथि न आइआ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: हे संत जनों ! (सिरे की बात ये है कि) जो मनुष्य अपने सतिगुरू की निंदा करता है। वह ठीक नहीं। (मानस जनम में) जो कमाना था वह भी गवा लेता है और (मनुष्य-जन्म-रूप) भी गवा लेता है। नानक कह के सुनाता है (भाव। इस बात पर जोर दे के कहता है कि) (गुरसिख के लिए यह) पहला आगम-निगम है (यही है वेद-शास्त्रों का उक्तम सिद्धांत कि) पूरे सतिगुरू का वचन (सबसे ज्यादा) प्रामाणिक है। (इस वास्ते) गुरसिखों को पूरे सतिगुरू की वडिआई अच्छी लगती है (पर) मनमुखों को गुरू की वडिआई समझने का वह समय हाथ नहीं आता। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਸਚੁ ਸਚਾ ਸਭ ਦੂ ਵਡਾ ਹੈ ਸੋ ਲਏ ਜਿਸੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਟਿਕੇ ॥
ਸੋ ਸਤਿਗੁਰੁ ਜਿ ਸਚੁ ਧਿਆਇਦਾ ਸਚੁ ਸਚਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਇਕੇ ॥
ਸੋਈ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਹੈ ਜਿਨਿ ਪੰਜੇ ਦੂਤ ਕੀਤੇ ਵਸਿ ਛਿਕੇ ॥
ਜਿ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਆਪੁ ਗਣਾਇਦੇ ਤਿਨ ਅੰਦਰਿ ਕੂੜੁ ਫਿਟੁ ਫਿਟੁ ਮੁਹ ਫਿਕੇ ॥
ਓਇ ਬੋਲੇ ਕਿਸੈ ਨ ਭਾਵਨੀ ਮੁਹ ਕਾਲੇ ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਚੁਕੇ ॥੮॥
पउड़ी ॥
सचु सचा सभ दू वडा है सो लए जिसु सतिगुरु टिके ॥
सो सतिगुरु जि सचु धिआइदा सचु सचा सतिगुरु इके ॥
सोई सतिगुरु पुरखु है जिनि पंजे दूत कीते वसि छिके ॥
जि बिनु सतिगुर सेवे आपु गणाइदे तिन अंदरि कूड़ु फिटु फिटु मुह फिके ॥
ओइ बोले किसै न भावनी मुह काले सतिगुर ते चुके ॥८॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ सदा स्थिर रहने वाला जो सच्चा प्रभू सबसे बड़ा है। उस मनुष्य को मिलता है जिसको सतिगुरू तिलक दे (भाव। आशीश दे)। सतिगुरू भी वही हैजो सदा सच्चे प्रभू को याद रखता है (और इस तरह) सच्चा प्रभू और सतिगुरू एक-रूप (हो गए हैं। ) जिस ने (कामादिक) पाँचों वैरी खींच के वश कर लिए हैं। जो मनुष्य सतिगुरू की सेवा से वंचित रहते हैं और अपने आप को बड़ा कहलवाते हैं। उनके हृदय में झूठ होता है (इस करके उनका) मुंह फीका (रहता है। भाव। उनके मुँह पर नाम की लाली नहीं होती और) उन्हें सदा धिक्कार मिलती है। किसी को उनके वचन अच्छे नहीं लगते (अंदर झूठ होने के कारण) उनके मुँह भी भ्रष्टे हुए होते हैं (क्योंकि) वह सतिगुरू को भूले हुए हैं। 8।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਸਭੁ ਖੇਤੁ ਹੈ ਹਰਿ ਆਪਿ ਕਿਰਸਾਣੀ ਲਾਇਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬਖਸਿ ਜਮਾਈਅਨੁ ਮਨਮੁਖੀ ਮੂਲੁ ਗਵਾਇਆ ॥
ਸਭੁ ਕੋ ਬੀਜੇ ਆਪਣੇ ਭਲੇ ਨੋ ਹਰਿ ਭਾਵੈ ਸੋ ਖੇਤੁ ਜਮਾਇਆ ॥
ਗੁਰਸਿਖੀ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਬੀਜਿਆ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਫਲੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪਾਇਆ ॥
ਜਮੁ ਚੂਹਾ ਕਿਰਸ ਨਿਤ ਕੁਰਕਦਾ ਹਰਿ ਕਰਤੈ ਮਾਰਿ ਕਢਾਇਆ ॥
ਕਿਰਸਾਣੀ ਜੰਮੀ ਭਾਉ ਕਰਿ ਹਰਿ ਬੋਹਲ ਬਖਸ ਜਮਾਇਆ ॥
ਤਿਨ ਕਾ ਕਾੜਾ ਅੰਦੇਸਾ ਸਭੁ ਲਾਹਿਓਨੁ ਜਿਨੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਅਰਾਧਿਆ ਆਪਿ ਤਰਿਆ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਤਰਾਇਆ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
हरि प्रभ का सभु खेतु है हरि आपि किरसाणी लाइआ ॥
गुरमुखि बखसि जमाईअनु मनमुखी मूलु गवाइआ ॥
सभु को बीजे आपणे भले नो हरि भावै सो खेतु जमाइआ ॥
गुरसिखी हरि अंम्रितु बीजिआ हरि अंम्रित नामु फलु अंम्रितु पाइआ ॥
जमु चूहा किरस नित कुरकदा हरि करतै मारि कढाइआ ॥
किरसाणी जंमी भाउ करि हरि बोहल बखस जमाइआ ॥
तिन का काड़ा अंदेसा सभु लाहिओनु जिनी सतिगुरु पुरखु धिआइआ ॥
जन नानक नामु अराधिआ आपि तरिआ सभु जगतु तराइआ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ सारा संसार प्रभू का (जैसे) खेत है (जिस में) प्रभू ने (जीवों को) खेती के काम में लगाया हुआ है (भाव। नाम जपने के लिए भेजा हुआ है)। जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख रहते हैं। उनकी (खेती) प्रभू ने मेहर करके उगा दी है। (पर) पर जो मनुष्य मन के पीछे भूले रहे। वे मूल भी गवा बैठे (भाव। मनुष्य जनम हाथों से छीन लिया)। (अपनी ओर से) हर कोई अपने भले के लिए बीजता है (पर) वही खेत अच्छा उगता है (भाव। वही कमाई सफल होती है) जो प्रभू को अच्छा लगता है। (इस करके हरी की प्रसन्नता के लिए) सतिगुरू के सिख अमर करने वाले प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम बीजते हैं और उन्हें हरि-नाम-रूपी अमृत फल की प्राप्ति हो जाती है। (मनमुखों की) फसल को जो जम (रूपी) चूहा सदा कुतरता जाता है गुरसिखों का वह कुछ बिगाड़ नहीं सकता। (क्योंकि) सृजनहार प्रभू ने मार के उसे निकाल बाहर कर दिया है (भाव। गुरसिखों के हृदय में माया वाला प्रभाव ही नहीं रहने दिया।) (इस वास्ते उनकी) फसल प्रेम से (भाव बढ़िया फॅब के लहरा के) उगती है और प्रभू की मेहर-रूपी बोहल का ढेर लग जाता है। जो मनुष्य सतिगुरू पुरखु का ध्यान धरते हैं। प्रभू ने उनकी सारी चिंताएं उतार दी हैं। हे दास नानक ! जो मनुष्य प्रभू के नाम का सिमरन करता है। वह खुद (इस काड़े-अंदेसे भरे समुंद्र में से) तैर जाता है और सारे संसार को पार कर लेता है। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਸਾਰਾ ਦਿਨੁ ਲਾਲਚਿ ਅਟਿਆ ਮਨਮੁਖਿ ਹੋਰੇ ਗਲਾ ॥
ਰਾਤੀ ਊਘੈ ਦਬਿਆ ਨਵੇ ਸੋਤ ਸਭਿ ਢਿਲਾ ॥
ਮਨਮੁਖਾ ਦੈ ਸਿਰਿ ਜੋਰਾ ਅਮਰੁ ਹੈ ਨਿਤ ਦੇਵਹਿ ਭਲਾ ॥
ਜੋਰਾ ਦਾ ਆਖਿਆ ਪੁਰਖ ਕਮਾਵਦੇ ਸੇ ਅਪਵਿਤ ਅਮੇਧ ਖਲਾ ॥
ਕਾਮਿ ਵਿਆਪੇ ਕੁਸੁਧ ਨਰ ਸੇ ਜੋਰਾ ਪੁਛਿ ਚਲਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਆਖਿਐ ਜੋ ਚਲੈ ਸੋ ਸਤਿ ਪੁਰਖੁ ਭਲ ਭਲਾ ॥
ਜੋਰਾ ਪੁਰਖ ਸਭਿ ਆਪਿ ਉਪਾਇਅਨੁ ਹਰਿ ਖੇਲ ਸਭਿ ਖਿਲਾ ॥
ਸਭ ਤੇਰੀ ਬਣਤ ਬਣਾਵਣੀ ਨਾਨਕ ਭਲ ਭਲਾ ॥੨॥
मः ४ ॥
सारा दिनु लालचि अटिआ मनमुखि होरे गला ॥
राती ऊघै दबिआ नवे सोत सभि ढिला ॥
मनमुखा दै सिरि जोरा अमरु है नित देवहि भला ॥
जोरा दा आखिआ पुरख कमावदे से अपवित अमेध खला ॥
कामि विआपे कुसुध नर से जोरा पुछि चला ॥
सतिगुर कै आखिऐ जो चलै सो सति पुरखु भल भला ॥
जोरा पुरख सभि आपि उपाइअनु हरि खेल सभि खिला ॥
सभ तेरी बणत बणावणी नानक भल भला ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ४॥ मन के अधीन हुआ मनुष्य सारा दिन लालच में लिबड़ा हुआ (नाम के अलावा) और-और बातें करता फिरता है। (दिन का कार्य-व्यवहार करके थका हुआ) रात को नींद में घुटा जाता है। उसकी सारी नौ इंद्रियां ही ढीली पड़ जाती हैं। (ऐसे) मनमुखों के सिर पर सि्त्रयों का हुकम चलता है। और वह उनको (ही) सदा बढ़िया-बढ़िया पदार्थ ला के देते हैं। जो मनुष्य सि्त्रयों के कहे में चलते हैं (भाव। अपना वजीर जान के सलाह नहीं लेते। बल्कि पूरी तरह जो सि्त्रयां कहें वही करते हैं)। वह (आम तौर पर) मलीन-मति बुद्धिहीन और मूर्ख होते हैं। (क्योंकि) जो विषौ के मारे हुए गंदे आचरण वाले होते हैं। वही सि्त्रयों के कहे में चलते हैं। सच्चा और अच्छे से अच्छा मनुष्य वह है। जो सतिगुरू के हुकम में चलता है। (पर। स्त्री या मनमुख मनुष्य के क्या इख्तियार?) सभ सि्त्रयां और मनुष्य प्रभू ने खुद पैदा किए हैं। हे नानक ! (कह कि) हे प्रभू ! (संसार की) यह सारी बनतर तेरी बनाई हुई है। जो कुछ तूने किया है सब भला है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਤੂ ਵੇਪਰਵਾਹੁ ਅਥਾਹੁ ਹੈ ਅਤੁਲੁ ਕਿਉ ਤੁਲੀਐ ॥
ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਜਿ ਤੁਧੁ ਧਿਆਇਦੇ ਜਿਨ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੀਐ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ਸਤਿ ਸਰੂਪੁ ਹੈ ਗੁਰਬਾਣੀ ਬਣੀਐ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਰੀਸੈ ਹੋਰਿ ਕਚੁ ਪਿਚੁ ਬੋਲਦੇ ਸੇ ਕੂੜਿਆਰ ਕੂੜੇ ਝੜਿ ਪੜੀਐ ॥
ਓਨੑਾ ਅੰਦਰਿ ਹੋਰੁ ਮੁਖਿ ਹੋਰੁ ਹੈ ਬਿਖੁ ਮਾਇਆ ਨੋ ਝਖਿ ਮਰਦੇ ਕੜੀਐ ॥੯॥
पउड़ी ॥
तू वेपरवाहु अथाहु है अतुलु किउ तुलीऐ ॥
से वडभागी जि तुधु धिआइदे जिन सतिगुरु मिलीऐ ॥
सतिगुर की बाणी सति सरूपु है गुरबाणी बणीऐ ॥
सतिगुर की रीसै होरि कचु पिचु बोलदे से कूड़िआर कूड़े झड़ि पड़ीऐ ॥
ओन॑ा अंदरि होरु मुखि होरु है बिखु माइआ नो झखि मरदे कड़ीऐ ॥९॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे प्रभू ! तुझे कैसे तोलें? तू बेपरवाह। अथाह व अतोल है। जिन्हें सतिगुरू मिलता है और जो तेरा सिमरन करते हैं। वह बहुत भाग्यशाली हैं। सतिगुरू की बाणी द्वारा (सत्य-स्वरूप) बन जाते हैं (भाव। जो नाम जपता है वह नाम में समा जाता है)। कई और झूठ के व्यापारी सतिगुरू की रीस करके कच्ची बाणी उचारते हैं। पर वह (हृदय में) झूठ होने के कारण झड़ जाते हैं (भाव। सतिगुरू की बराबरी नहीं कर सकते। और उनका पर्दा फाश हो जाता है)। उनके दिल में कुछ और होता है और मुँह में और। वे विषौली-माया को एकत्र करने के लिए झुरते हैं और खप-खप के मरते हैं। 9।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਨਿਰਮਲੀ ਨਿਰਮਲ ਜਨੁ ਹੋਇ ਸੁ ਸੇਵਾ ਘਾਲੇ ॥
ਜਿਨ ਅੰਦਰਿ ਕਪਟੁ ਵਿਕਾਰੁ ਝੂਠੁ ਓਇ ਆਪੇ ਸਚੈ ਵਖਿ ਕਢੇ ਜਜਮਾਲੇ ॥
सलोक मः ४ ॥
सतिगुर की सेवा निरमली निरमल जनु होइ सु सेवा घाले ॥
जिन अंदरि कपटु विकारु झूठु ओइ आपे सचै वखि कढे जजमाले ॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ सतिगुरू की (बताई) सेवा (एक) पवित्र (कर्म) है। जो मनुष्य निर्मल हो (भाव। जिस मनुष्य का हृदय मलीन ना हो) वही ये मुश्किल कार कर सकता है। जिनके हृदय में धोखा-विकार और झूठ है। सच्चे प्रभू ने खुद ही उन कड़वों को (गुरू से) अलग कर दिया है।

संदर्भ: यह अंग 304 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।

Saket के Mall में Sunday-shopping के बीच कोई हल्की-सी पंक्ति याद आ जाए, क्या होगा।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 36 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 304” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 305 →, पीछे का: ← अंग 303

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।