अंग
214
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹੈ ਨਾਨਕ ਨੇਰ ਨੇਰੀ ॥੩॥੩॥੧੫੬॥
है नानक नेर नेरी ॥३॥३॥१५६॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! प्रभू (हरेक जीव के) अत्यंत नजदीक बसता है। 3। 3। 156।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਾਤੋ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਮਾਤੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਓੁਹੀ ਪੀਓ ਓੁਹੀ ਖੀਓ ਗੁਰਹਿ ਦੀਓ ਦਾਨੁ ਕੀਓ ॥
ਉਆਹੂ ਸਿਉ ਮਨੁ ਰਾਤੋ ॥੧॥
ਓੁਹੀ ਭਾਠੀ ਓੁਹੀ ਪੋਚਾ ਉਹੀ ਪਿਆਰੋ ਉਹੀ ਰੂਚਾ ॥
ਮਨਿ ਓਹੋ ਸੁਖੁ ਜਾਤੋ ॥੨॥
ਸਹਜ ਕੇਲ ਅਨਦ ਖੇਲ ਰਹੇ ਫੇਰ ਭਏ ਮੇਲ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਪਰਾਤੋ ॥੩॥੪॥੧੫੭॥
ਮਾਤੋ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਮਾਤੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਓੁਹੀ ਪੀਓ ਓੁਹੀ ਖੀਓ ਗੁਰਹਿ ਦੀਓ ਦਾਨੁ ਕੀਓ ॥
ਉਆਹੂ ਸਿਉ ਮਨੁ ਰਾਤੋ ॥੧॥
ਓੁਹੀ ਭਾਠੀ ਓੁਹੀ ਪੋਚਾ ਉਹੀ ਪਿਆਰੋ ਉਹੀ ਰੂਚਾ ॥
ਮਨਿ ਓਹੋ ਸੁਖੁ ਜਾਤੋ ॥੨॥
ਸਹਜ ਕੇਲ ਅਨਦ ਖੇਲ ਰਹੇ ਫੇਰ ਭਏ ਮੇਲ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਪਰਾਤੋ ॥੩॥੪॥੧੫੭॥
गउड़ी महला ५ ॥
मातो हरि रंगि मातो ॥१॥ रहाउ ॥
ओुही पीओ ओुही खीओ गुरहि दीओ दानु कीओ ॥
उआहू सिउ मनु रातो ॥१॥
ओुही भाठी ओुही पोचा उही पिआरो उही रूचा ॥
मनि ओहो सुखु जातो ॥२॥
सहज केल अनद खेल रहे फेर भए मेल ॥
नानक गुर सबदि परातो ॥३॥४॥१५७॥
मातो हरि रंगि मातो ॥१॥ रहाउ ॥
ओुही पीओ ओुही खीओ गुरहि दीओ दानु कीओ ॥
उआहू सिउ मनु रातो ॥१॥
ओुही भाठी ओुही पोचा उही पिआरो उही रूचा ॥
मनि ओहो सुखु जातो ॥२॥
सहज केल अनद खेल रहे फेर भए मेल ॥
नानक गुर सबदि परातो ॥३॥४॥१५७॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे जोगी ! मैं भी) मतवाला हूँ (पर मैं तो) परमात्मा के प्रेम-शराब का मतवाला हो रहा हूँ। 1। रहाउ। (हे जोगी !) मैंने वह नाम-मद ही पीया है~ वह नाम का नशा पी के ही मैं मस्त हो रहा हूँ। गुरू ने मुझे ये नाम मद दिया है~ मुझे ये दाति दी है। अब उसी नाम-मद से ही मेरा मन रंगा हुआ है। 1। (हे जोगी !) परमात्मा का नाम ही (शराब निकालने वाली) भट्ठी है~ वह नाम ही (शराब निकलने वाली नालिका पर ठण्डक पहुँचाने वाला) पोचा है~ प्रभू का नाम ही (मेरे वास्ते) प्याला है~ और नाम-मद ही मेरी लगन है। (हे जोगी !) मैं अपने मन में उसी (नाम-मदिरा का) आनंद ले रहा हूँ। 2। वह आत्मिक अडोलता के चोज आनंद पाता है~ उसका (प्रभू-चरणों से) मिलाप हो जाता है~ और उसके जनम मरण के चक्कर खत्म हो जाते हैं। हे नानक ! (कह, हे जोगी ! जिस मनुष्य का मन) गुरू के शबद में परोया जाता है।3। 4। 147।
ਰਾਗੁ ਗੌੜੀ ਮਾਲਵਾ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਲੇਹੁ ਮੀਤਾ ਲੇਹੁ ਆਗੈ ਬਿਖਮ ਪੰਥੁ ਭੈਆਨ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੇਵਤ ਸੇਵਤ ਸਦਾ ਸੇਵਿ ਤੇਰੈ ਸੰਗਿ ਬਸਤੁ ਹੈ ਕਾਲੁ ॥
ਕਰਿ ਸੇਵਾ ਤੂੰ ਸਾਧ ਕੀ ਹੋ ਕਾਟੀਐ ਜਮ ਜਾਲੁ ॥੧॥
ਹੋਮ ਜਗ ਤੀਰਥ ਕੀਏ ਬਿਚਿ ਹਉਮੈ ਬਧੇ ਬਿਕਾਰ ॥
ਨਰਕੁ ਸੁਰਗੁ ਦੁਇ ਭੁੰਚਨਾ ਹੋਇ ਬਹੁਰਿ ਬਹੁਰਿ ਅਵਤਾਰ ॥੨॥
ਸਿਵ ਪੁਰੀ ਬ੍ਰਹਮ ਇੰਦ੍ਰ ਪੁਰੀ ਨਿਹਚਲੁ ਕੋ ਥਾਉ ਨਾਹਿ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਸੇਵਾ ਸੁਖੁ ਨਹੀ ਹੋ ਸਾਕਤ ਆਵਹਿ ਜਾਹਿ ॥੩॥
ਜੈਸੋ ਗੁਰਿ ਉਪਦੇਸਿਆ ਮੈ ਤੈਸੋ ਕਹਿਆ ਪੁਕਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕੁ ਕਹੈ ਸੁਨਿ ਰੇ ਮਨਾ ਕਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਹੋਇ ਉਧਾਰੁ ॥੪॥੧॥੧੫੮॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਲੇਹੁ ਮੀਤਾ ਲੇਹੁ ਆਗੈ ਬਿਖਮ ਪੰਥੁ ਭੈਆਨ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੇਵਤ ਸੇਵਤ ਸਦਾ ਸੇਵਿ ਤੇਰੈ ਸੰਗਿ ਬਸਤੁ ਹੈ ਕਾਲੁ ॥
ਕਰਿ ਸੇਵਾ ਤੂੰ ਸਾਧ ਕੀ ਹੋ ਕਾਟੀਐ ਜਮ ਜਾਲੁ ॥੧॥
ਹੋਮ ਜਗ ਤੀਰਥ ਕੀਏ ਬਿਚਿ ਹਉਮੈ ਬਧੇ ਬਿਕਾਰ ॥
ਨਰਕੁ ਸੁਰਗੁ ਦੁਇ ਭੁੰਚਨਾ ਹੋਇ ਬਹੁਰਿ ਬਹੁਰਿ ਅਵਤਾਰ ॥੨॥
ਸਿਵ ਪੁਰੀ ਬ੍ਰਹਮ ਇੰਦ੍ਰ ਪੁਰੀ ਨਿਹਚਲੁ ਕੋ ਥਾਉ ਨਾਹਿ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਸੇਵਾ ਸੁਖੁ ਨਹੀ ਹੋ ਸਾਕਤ ਆਵਹਿ ਜਾਹਿ ॥੩॥
ਜੈਸੋ ਗੁਰਿ ਉਪਦੇਸਿਆ ਮੈ ਤੈਸੋ ਕਹਿਆ ਪੁਕਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕੁ ਕਹੈ ਸੁਨਿ ਰੇ ਮਨਾ ਕਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਹੋਇ ਉਧਾਰੁ ॥੪॥੧॥੧੫੮॥
रागु गौड़ी मालवा महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि नामु लेहु मीता लेहु आगै बिखम पंथु भैआन ॥१॥ रहाउ ॥
सेवत सेवत सदा सेवि तेरै संगि बसतु है कालु ॥
करि सेवा तूं साध की हो काटीऐ जम जालु ॥१॥
होम जग तीरथ कीए बिचि हउमै बधे बिकार ॥
नरकु सुरगु दुइ भुंचना होइ बहुरि बहुरि अवतार ॥२॥
सिव पुरी ब्रहम इंद्र पुरी निहचलु को थाउ नाहि ॥
बिनु हरि सेवा सुखु नही हो साकत आवहि जाहि ॥३॥
जैसो गुरि उपदेसिआ मै तैसो कहिआ पुकारि ॥
नानकु कहै सुनि रे मना करि कीरतनु होइ उधारु ॥४॥१॥१५८॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि नामु लेहु मीता लेहु आगै बिखम पंथु भैआन ॥१॥ रहाउ ॥
सेवत सेवत सदा सेवि तेरै संगि बसतु है कालु ॥
करि सेवा तूं साध की हो काटीऐ जम जालु ॥१॥
होम जग तीरथ कीए बिचि हउमै बधे बिकार ॥
नरकु सुरगु दुइ भुंचना होइ बहुरि बहुरि अवतार ॥२॥
सिव पुरी ब्रहम इंद्र पुरी निहचलु को थाउ नाहि ॥
बिनु हरि सेवा सुखु नही हो साकत आवहि जाहि ॥३॥
जैसो गुरि उपदेसिआ मै तैसो कहिआ पुकारि ॥
नानकु कहै सुनि रे मना करि कीरतनु होइ उधारु ॥४॥१॥१५८॥
हिन्दी अर्थ: रागु गौड़ी मालवा महला ५ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे मित्र ! परमात्मा का नाम सिमर~ नाम सिमर। जिस जीवन पंथ पर तू चल रहा है वह रास्ता (विकारों के हमलों के कारण) मुश्किल है और डरावना है। 1। (हे मित्र !) परमात्मा का नाम सिमरते-सिमरते सदा सिमरते रहो~ मौत हर वक्त तेरे साथ बसती है। हे भाई ! गुरू की सेवा कर (गुरू की शरण पड़। गुरू की शरण पड़ने से) वह (मोह-) जाल काटा जाता है जो आत्मिक मौत में फंसा देता है। 1। (हे मित्र ! परमात्मा के नाम का सिमरन छोड़ के जिन मनुष्यों ने निरे) हवन किए~ यज्ञ किए~ तीर्थ स्नान किए~ वह (इन किए कर्मों के) अहम् में फंसते चले गए उनके अंदर विकार बढ़ते गए। इस तरह नर्क और स्वर्ग दोनों भोगने पड़ते हैं~ और मुड़ मुड़ जन्मों का चक्कर चलता रहता है। 2। (हे मित्र ! हवन~ यज्ञ~ तीर्थ आदि कर्म करके लोग शिव पुरी~ ब्रहम्पुरी~ इन्द्रपुरी आदि की प्राप्ति की आशा बनाते हैं~ पर) शिव पुरी~ ब्रहम्पुरी~ इन्द्रपुरी- इनमें से कोई भी जगह सदा टिके रहने वाली नहीं। परमात्मा के सिमरन के बिना कहीं आत्मिक आनंद भी नहीं मिलता। हे भाई ! परमात्मा से विछुड़े मनुष्य जनम मरन के चक्कर में पड़े रहते हैं (पैदा होते हैं मरते हैं~ पैदा होते हैं मरते हैं)। 3। (हे भाई !) जिस प्रकार गुरू ने (मुझे) उपदेश दिया है~ मैंने उसी तरह ऊँचा बोल के बता दिया है। नानक कहता है, हे (मेरे) मन ! सुन। परमात्मा का कीर्तन करता रह (कीर्तन की बरकति से विकारों से जनम मरण के चक्कर से) बचाव हो जाता है। 4। 1। 158।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਮਾਲਾ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਪਾਇਓ ਬਾਲ ਬੁਧਿ ਸੁਖੁ ਰੇ ॥
ਹਰਖ ਸੋਗ ਹਾਨਿ ਮਿਰਤੁ ਦੂਖ ਸੁਖ ਚਿਤਿ ਸਮਸਰਿ ਗੁਰ ਮਿਲੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਉ ਲਉ ਹਉ ਕਿਛੁ ਸੋਚਉ ਚਿਤਵਉ ਤਉ ਲਉ ਦੁਖਨੁ ਭਰੇ ॥
ਜਉ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਭੇਟਿਆ ਤਉ ਆਨਦ ਸਹਜੇ ॥੧॥
ਜੇਤੀ ਸਿਆਨਪ ਕਰਮ ਹਉ ਕੀਏ ਤੇਤੇ ਬੰਧ ਪਰੇ ॥
ਜਉ ਸਾਧੂ ਕਰੁ ਮਸਤਕਿ ਧਰਿਓ ਤਬ ਹਮ ਮੁਕਤ ਭਏ ॥੨॥
ਜਉ ਲਉ ਮੇਰੋ ਮੇਰੋ ਕਰਤੋ ਤਉ ਲਉ ਬਿਖੁ ਘੇਰੇ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਬੁਧਿ ਅਰਪੀ ਠਾਕੁਰ ਕਉ ਤਬ ਹਮ ਸਹਜਿ ਸੋਏ ॥੩॥
ਜਉ ਲਉ ਪੋਟ ਉਠਾਈ ਚਲਿਅਉ ਤਉ ਲਉ ਡਾਨ ਭਰੇ ॥
ਪੋਟ ਡਾਰਿ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਮਿਲਿਆ ਤਉ ਨਾਨਕ ਨਿਰਭਏ ॥੪॥੧॥੧੫੯॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਪਾਇਓ ਬਾਲ ਬੁਧਿ ਸੁਖੁ ਰੇ ॥
ਹਰਖ ਸੋਗ ਹਾਨਿ ਮਿਰਤੁ ਦੂਖ ਸੁਖ ਚਿਤਿ ਸਮਸਰਿ ਗੁਰ ਮਿਲੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਉ ਲਉ ਹਉ ਕਿਛੁ ਸੋਚਉ ਚਿਤਵਉ ਤਉ ਲਉ ਦੁਖਨੁ ਭਰੇ ॥
ਜਉ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਭੇਟਿਆ ਤਉ ਆਨਦ ਸਹਜੇ ॥੧॥
ਜੇਤੀ ਸਿਆਨਪ ਕਰਮ ਹਉ ਕੀਏ ਤੇਤੇ ਬੰਧ ਪਰੇ ॥
ਜਉ ਸਾਧੂ ਕਰੁ ਮਸਤਕਿ ਧਰਿਓ ਤਬ ਹਮ ਮੁਕਤ ਭਏ ॥੨॥
ਜਉ ਲਉ ਮੇਰੋ ਮੇਰੋ ਕਰਤੋ ਤਉ ਲਉ ਬਿਖੁ ਘੇਰੇ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਬੁਧਿ ਅਰਪੀ ਠਾਕੁਰ ਕਉ ਤਬ ਹਮ ਸਹਜਿ ਸੋਏ ॥੩॥
ਜਉ ਲਉ ਪੋਟ ਉਠਾਈ ਚਲਿਅਉ ਤਉ ਲਉ ਡਾਨ ਭਰੇ ॥
ਪੋਟ ਡਾਰਿ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਮਿਲਿਆ ਤਉ ਨਾਨਕ ਨਿਰਭਏ ॥੪॥੧॥੧੫੯॥
रागु गउड़ी माला महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पाइओ बाल बुधि सुखु रे ॥
हरख सोग हानि मिरतु दूख सुख चिति समसरि गुर मिले ॥१॥ रहाउ ॥
जउ लउ हउ किछु सोचउ चितवउ तउ लउ दुखनु भरे ॥
जउ क्रिपालु गुरु पूरा भेटिआ तउ आनद सहजे ॥१॥
जेती सिआनप करम हउ कीए तेते बंध परे ॥
जउ साधू करु मसतकि धरिओ तब हम मुकत भए ॥२॥
जउ लउ मेरो मेरो करतो तउ लउ बिखु घेरे ॥
मनु तनु बुधि अरपी ठाकुर कउ तब हम सहजि सोए ॥३॥
जउ लउ पोट उठाई चलिअउ तउ लउ डान भरे ॥
पोट डारि गुरु पूरा मिलिआ तउ नानक निरभए ॥४॥१॥१५९॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पाइओ बाल बुधि सुखु रे ॥
हरख सोग हानि मिरतु दूख सुख चिति समसरि गुर मिले ॥१॥ रहाउ ॥
जउ लउ हउ किछु सोचउ चितवउ तउ लउ दुखनु भरे ॥
जउ क्रिपालु गुरु पूरा भेटिआ तउ आनद सहजे ॥१॥
जेती सिआनप करम हउ कीए तेते बंध परे ॥
जउ साधू करु मसतकि धरिओ तब हम मुकत भए ॥२॥
जउ लउ मेरो मेरो करतो तउ लउ बिखु घेरे ॥
मनु तनु बुधि अरपी ठाकुर कउ तब हम सहजि सोए ॥३॥
जउ लउ पोट उठाई चलिअउ तउ लउ डान भरे ॥
पोट डारि गुरु पूरा मिलिआ तउ नानक निरभए ॥४॥१॥१५९॥
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी माला महला ५ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! (जिस ने भी सुख आनंद पाया) बालकों वाली बुद्धि से सुख-आनंद पाया। गुरू को मिलने से (बाल-बुद्धि प्राप्त हो जाती है~ और) खुशी~ गमी~ घाटा~ मौत~ दुख-सुख (ये सारे) चित्त में एक जैसे ही (प्रतीत होने लगते हैं)। 1। रहाउ। (हे भाई !) जब तक मैं (अपनी चतुराई की) कुछ (सोचें) सोचता रहा हूँ~ चितवता रहा हूँ~ तब तक मैं दुखों से भरा रहा। जब (अब मुझे) पूरा गुरू मिल पड़ा है~ तब से मैं आत्मिक अडोलतमा में आनंद ले रहा हूँ। 1। (हे भाई !) मैं जितने भी चतुराई के काम करता रहा~ उतने ही मुझे (माया के मोह के) बंधन पड़ते गए। जब (अब) गुरू ने (मेरे) माथे पर (अपना) राथ रखा है~ तब मैं (माया के मोह के बंधनों से) आजाद हो गया हूँ। 2। (हे भाई !) जब तक मैं ये करता रहा कि (ये घर) मेरा है~ (ये धन) मेरा है~ (ये पुत्र) मेरे हैं~ तब तक मुझे (माया के मोह के) जहर ने घेरे रखा (और उसने मेरे आत्मिक जीवन को मार दिया)। (अब गुरू की कृपा से) मैंने अपनी चतुराई~ अपना मन~ अपना शरीर (हरेक ज्ञानेंद्रियों को) परमात्मा के हवाले कर दिया है~ तब से मैं आत्मिक अडोलता में मस्त रहता हूँ। 3। हे नानक ! (कह, हे भाई !) जब तक मैं (माया के मोह की) पोटली (सिर पर) उठाए घूमता रहा~ तब तक मैं (दुनिया के डरों-सहमों का) दण्ड भरता रहा। अब मुझे पूरा गुरू मिल गया है~ (उसकी किरपा से माया के मोह की) पोटली फेंक के मैं निडर हो गया हूँ। 4। 1। 159।
ਗਉੜੀ ਮਾਲਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਭਾਵਨੁ ਤਿਆਗਿਓ ਰੀ ਤਿਆਗਿਓ ॥
ਤਿਆਗਿਓ ਮੈ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਤਿਆਗਿਓ ॥
ਸਰਬ ਸੁਖ ਆਨੰਦ ਮੰਗਲ ਰਸ ਮਾਨਿ ਗੋਬਿੰਦੈ ਆਗਿਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭਾਵਨੁ ਤਿਆਗਿਓ ਰੀ ਤਿਆਗਿਓ ॥
ਤਿਆਗਿਓ ਮੈ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਤਿਆਗਿਓ ॥
ਸਰਬ ਸੁਖ ਆਨੰਦ ਮੰਗਲ ਰਸ ਮਾਨਿ ਗੋਬਿੰਦੈ ਆਗਿਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गउड़ी माला महला ५ ॥
भावनु तिआगिओ री तिआगिओ ॥
तिआगिओ मै गुर मिलि तिआगिओ ॥
सरब सुख आनंद मंगल रस मानि गोबिंदै आगिओ ॥१॥ रहाउ ॥
भावनु तिआगिओ री तिआगिओ ॥
तिआगिओ मै गुर मिलि तिआगिओ ॥
सरब सुख आनंद मंगल रस मानि गोबिंदै आगिओ ॥१॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी माला महला ५ ॥ सदा के लिए त्याग दिया है। हे बहिन ! गुरू को मिल के मैंने (सुखों के ग्रहण करने व दुखों से डरने का) संकल्प छोड़ दिया है~ (अब गुरू की कृपा से) परमात्मा की रजा (मीठी) मान के मुझे सारे सुख-आनंद ही हैं~ खुशियां मंगल ही हैं। 1। रहाउ।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 214 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Janpath की सड़क-side चाय और बीच में एक quiet moment।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 36 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 214” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 215 →, पीछे का: ← अंग 213।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।