अंग 224

अंग
224
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਰ ਨਿਹਕੇਵਲ ਨਿਰਭਉ ਨਾਉ ॥
ਅਨਾਥਹ ਨਾਥ ਕਰੇ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
ਪੁਨਰਪਿ ਜਨਮੁ ਨਾਹੀ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥੫॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਏਕੋ ਜਾਣੈ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਸਾਚੈ ਸਬਦਿ ਦਰਿ ਨੀਸਾਣੈ ॥੬॥
ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਤਿਸੁ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ॥
ਆਵੈ ਨ ਜਾਵੈ ਚੂਕੈ ਆਸਾ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਕਮਲੁ ਪਰਗਾਸਾ ॥੭॥
ਜੋ ਦੀਸੈ ਸੋ ਆਸ ਨਿਰਾਸਾ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਬਿਖੁ ਭੂਖ ਪਿਆਸਾ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਰਲੇ ਮਿਲਹਿ ਉਦਾਸਾ ॥੮॥੭॥
नर निहकेवल निरभउ नाउ ॥
अनाथह नाथ करे बलि जाउ ॥
पुनरपि जनमु नाही गुण गाउ ॥५॥
अंतरि बाहरि एको जाणै ॥
गुर कै सबदे आपु पछाणै ॥
साचै सबदि दरि नीसाणै ॥६॥
सबदि मरै तिसु निज घरि वासा ॥
आवै न जावै चूकै आसा ॥
गुर कै सबदि कमलु परगासा ॥७॥
जो दीसै सो आस निरासा ॥
काम क्रोध बिखु भूख पिआसा ॥
नानक बिरले मिलहि उदासा ॥८॥७॥

हिन्दी अर्थ: मनुष्य निर्भय परमात्मा का नाम जप के (माया के हमलों से निर्भय हो के) वासना-रहित (शुद्ध) हो जाता है। वह पति-विहीनों को पति वाला बना देता है (वह है असल जोगी~ और ऐसे जोगी से) मैं कुर्बान हूँ। उसे मुड़ मुड़ जनम नहीं लेना पड़ता~ वह सदा प्रभू की सिफत सालाह करता है। 5। वह जोगी अपने अंदर व बाहर सारे जगत में एक परमात्मा को ही व्यापक जानता है। गुरू के शबद में जुड़ के वह अपने असले को पहिचानता है। गुरू के सच्चे शबद की बरकति से वह जोगी परमात्मा के दर पर (सिफत सालाह की) राहदारी ले कर जाता है। 6। जो मनुष्य गुरू के शबद द्वारा (विकारों की ओर से) मर जाता है (वह है असल जोगी~ और) उसका निवास सदैव अपने अंतरात्में में रहता है। उसकी आशा (तृष्णा) खत्म हो जाती है~ वह भटकना में नहीं पड़ता। गुरू के शबद में जुड़ने से उसका कमल रूपी हृदय सदैव खिला रहता है। 7। जगत में जो भी दिखाई देता है~ वही गिरी हुई आशाओं वाला (निराशा में डूबा हुआ) ही दिखता है (किसी की सारी आशाएं कभी पूरी नहीं हुई)। हरेक को काम का जहर~ क्रोध का विष (मारता जा रहा है~ हरेक को माया की) भूख (माया की) प्यास (लगी हुई है)। हे नानक ! जगत में गिने चुने (विरले) लोग ही ऐसे मिलते हैं~ जो आशा-तृष्णा के अधीन नहीं हैं (और~ वही असल जोगी हैं)। 8। 7।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਐਸੋ ਦਾਸੁ ਮਿਲੈ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਦੁਖੁ ਵਿਸਰੈ ਪਾਵੈ ਸਚੁ ਸੋਈ ॥੧॥
ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਭਈ ਮਤਿ ਪੂਰੀ ॥
ਅਠਸਠਿ ਮਜਨੁ ਚਰਨਹ ਧੂਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨੇਤ੍ਰ ਸੰਤੋਖੇ ਏਕ ਲਿਵ ਤਾਰਾ ॥
ਜਿਹਵਾ ਸੂਚੀ ਹਰਿ ਰਸ ਸਾਰਾ ॥੨॥
ਸਚੁ ਕਰਣੀ ਅਭ ਅੰਤਰਿ ਸੇਵਾ ॥
ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸਿਆ ਅਲਖ ਅਭੇਵਾ ॥੩॥
ਜਹ ਜਹ ਦੇਖਉ ਤਹ ਤਹ ਸਾਚਾ ॥
ਬਿਨੁ ਬੂਝੇ ਝਗਰਤ ਜਗੁ ਕਾਚਾ ॥੪॥
ਗੁਰੁ ਸਮਝਾਵੈ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥੫॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਰਾਖਹੁ ਰਖਵਾਲੇ ॥
ਬਿਨੁ ਬੂਝੇ ਪਸੂ ਭਏ ਬੇਤਾਲੇ ॥੬॥
ਗੁਰਿ ਕਹਿਆ ਅਵਰੁ ਨਹੀ ਦੂਜਾ ॥
ਕਿਸੁ ਕਹੁ ਦੇਖਿ ਕਰਉ ਅਨ ਪੂਜਾ ॥੭॥
ਸੰਤ ਹੇਤਿ ਪ੍ਰਭਿ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਧਾਰੇ ॥
ਆਤਮੁ ਚੀਨੈ ਸੁ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੇ ॥੮॥
ਸਾਚੁ ਰਿਦੈ ਸਚੁ ਪ੍ਰੇਮ ਨਿਵਾਸ ॥
ਪ੍ਰਣਵਤਿ ਨਾਨਕ ਹਮ ਤਾ ਕੇ ਦਾਸ ॥੯॥੮॥
गउड़ी महला १ ॥
ऐसो दासु मिलै सुखु होई ॥
दुखु विसरै पावै सचु सोई ॥१॥
दरसनु देखि भई मति पूरी ॥
अठसठि मजनु चरनह धूरी ॥१॥ रहाउ ॥
नेत्र संतोखे एक लिव तारा ॥
जिहवा सूची हरि रस सारा ॥२॥
सचु करणी अभ अंतरि सेवा ॥
मनु त्रिपतासिआ अलख अभेवा ॥३॥
जह जह देखउ तह तह साचा ॥
बिनु बूझे झगरत जगु काचा ॥४॥
गुरु समझावै सोझी होई ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥५॥
करि किरपा राखहु रखवाले ॥
बिनु बूझे पसू भए बेताले ॥६॥
गुरि कहिआ अवरु नही दूजा ॥
किसु कहु देखि करउ अन पूजा ॥७॥
संत हेति प्रभि त्रिभवण धारे ॥
आतमु चीनै सु ततु बीचारे ॥८॥
साचु रिदै सचु प्रेम निवास ॥
प्रणवति नानक हम ता के दास ॥९॥८॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला १ ॥ (परमात्मा का) ऐसा दास (मनुष्य को) मिल जाता है~ (उसके अंदर) आत्मिक आनंद पैदा होता है। वह मनुष्य सदा स्थिर प्रभू की प्राप्ति कर लेता है~ दुख उसके नजदीक नहीं फटकता। 1। (हरी के दास~ गुरू का) दर्शन करके मनुष्य की अक्ल पूरी (सूझ वाली) हो जाती है। (गुरू के) चरणों की धूड़ (ही) अढ़सठ तीर्थों का स्नान है। 1। रहाउ। उसकी आँखें (पराया रूप देखने की ओर से) तृप्त रहती हैं~ उसकी सुरति की तार एक परमात्मा में रहती है। परमात्मा के नाम का श्रेष्ठ रस चख के उसकी जीभ पवित्र हो जाती है। 2। (परमात्मा का ऐसा दास~ गुरू जिस मनुष्य को मिलता है) प्रभू का सिमरन उसकी (नित्य की) करनी बन जाता है। अलख और अभेव परमात्मा की अपने अंदर सेवा-भक्ति करके उसका मन (माया की ओर से) तृप्त हो जाता है। 3। (उस गुरू के दीदार की बरकति से ही) मैं जिधर देखता हूँ उधर उधर मुझे सदा स्थिर प्रभू दिखता है। पर माया के मुकाबले कमजोर मन वाला जगत इस ज्ञान से वंचित होने के कारण खहि खहि कर रहा है। 4। ये समझ कि परमात्मा हर जगह मौजूद है उसी को होती है जिसे गुरू ये समझ दे। कोई विरला मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के ये समझ प्राप्त करता है। 5। हे राखनहार प्रभू ! मेहर कर~ और जीवों को (खहि खहि से) तू खुद बचा। गुरू से ज्ञान प्राप्त किए बिना जीव पशू (-स्वभाव) बन रहे हैं। भूतने हो रहे हैं। 6। मुझे सतिगुरू ने समझा दिया है कि प्रभू के बिना उस जैसा कोई नहीं। बताओ~ (हे भाई !) मैं किसे (उस जैसा) देख के किसी और की पूजा कर सकता हूँ? । 7। परमात्मा ने (मनुष्यों को) संत बनाने के लिए ये सृष्टि रची है। जो मनुष्य (गुरू की शरण पड़ कर) अपने आप को पहिचानता है~ वह इस अस्लियत को समझ लेता है। 8। (गुरू का दीदार करके ही) सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा मनुष्य के हृदय में निवास करता है~ परमात्मा का प्यार हृदय में टिकता है। नानक विनती करता है, मैं भी उस गुरू का दास हूँ। 9। 8।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਬ੍ਰਹਮੈ ਗਰਬੁ ਕੀਆ ਨਹੀ ਜਾਨਿਆ ॥
ਬੇਦ ਕੀ ਬਿਪਤਿ ਪੜੀ ਪਛੁਤਾਨਿਆ ॥
ਜਹ ਪ੍ਰਭ ਸਿਮਰੇ ਤਹੀ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥੧॥
ਐਸਾ ਗਰਬੁ ਬੁਰਾ ਸੰਸਾਰੈ ॥
ਜਿਸੁ ਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤਿਸੁ ਗਰਬੁ ਨਿਵਾਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਲਿ ਰਾਜਾ ਮਾਇਆ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥
ਜਗਨ ਕਰੈ ਬਹੁ ਭਾਰ ਅਫਾਰੀ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪੂਛੇ ਜਾਇ ਪਇਆਰੀ ॥੨॥
ਹਰੀਚੰਦੁ ਦਾਨੁ ਕਰੈ ਜਸੁ ਲੇਵੈ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਇ ਅਭੇਵੈ ॥
ਆਪਿ ਭੁਲਾਇ ਆਪੇ ਮਤਿ ਦੇਵੈ ॥੩॥
ਦੁਰਮਤਿ ਹਰਣਾਖਸੁ ਦੁਰਾਚਾਰੀ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਨਾਰਾਇਣੁ ਗਰਬ ਪ੍ਰਹਾਰੀ ॥
ਪ੍ਰਹਲਾਦ ਉਧਾਰੇ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥੪॥
ਭੂਲੋ ਰਾਵਣੁ ਮੁਗਧੁ ਅਚੇਤਿ ॥
ਲੂਟੀ ਲੰਕਾ ਸੀਸ ਸਮੇਤਿ ॥
ਗਰਬਿ ਗਇਆ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਹੇਤਿ ॥੫॥
ਸਹਸਬਾਹੁ ਮਧੁ ਕੀਟ ਮਹਿਖਾਸਾ ॥
ਹਰਣਾਖਸੁ ਲੇ ਨਖਹੁ ਬਿਧਾਸਾ ॥
ਦੈਤ ਸੰਘਾਰੇ ਬਿਨੁ ਭਗਤਿ ਅਭਿਆਸਾ ॥੬॥
ਜਰਾਸੰਧਿ ਕਾਲਜਮੁਨ ਸੰਘਾਰੇ ॥
ਰਕਤਬੀਜੁ ਕਾਲੁਨੇਮੁ ਬਿਦਾਰੇ ॥
ਦੈਤ ਸੰਘਾਰਿ ਸੰਤ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥੭॥
ਆਪੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰੇ ॥
गउड़ी महला १ ॥
ब्रहमै गरबु कीआ नही जानिआ ॥
बेद की बिपति पड़ी पछुतानिआ ॥
जह प्रभ सिमरे तही मनु मानिआ ॥१॥
ऐसा गरबु बुरा संसारै ॥
जिसु गुरु मिलै तिसु गरबु निवारै ॥१॥ रहाउ ॥
बलि राजा माइआ अहंकारी ॥
जगन करै बहु भार अफारी ॥
बिनु गुर पूछे जाइ पइआरी ॥२॥
हरीचंदु दानु करै जसु लेवै ॥
बिनु गुर अंतु न पाइ अभेवै ॥
आपि भुलाइ आपे मति देवै ॥३॥
दुरमति हरणाखसु दुराचारी ॥
प्रभु नाराइणु गरब प्रहारी ॥
प्रहलाद उधारे किरपा धारी ॥४॥
भूलो रावणु मुगधु अचेति ॥
लूटी लंका सीस समेति ॥
गरबि गइआ बिनु सतिगुर हेति ॥५॥
सहसबाहु मधु कीट महिखासा ॥
हरणाखसु ले नखहु बिधासा ॥
दैत संघारे बिनु भगति अभिआसा ॥६॥
जरासंधि कालजमुन संघारे ॥
रकतबीजु कालुनेमु बिदारे ॥
दैत संघारि संत निसतारे ॥७॥
आपे सतिगुरु सबदु बीचारे ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला १ ॥ ब्रहमा ने अहंकार किया (कि मैं इतना बड़ा हूँ~ मैं कमल की नाभि में से कैसे पैदा हो सकता हूँ?) उसने परमात्मा की बेअंतता को नहीं समझा। (जब उसका घमण्ड तोड़ने के लिए उसके) वेद चुराए जाने की बिपदा उस पर आ पड़ी तब वह पछताया (कि मैंने अपने आप को व्यर्थ ही इतना बड़ा समझा)। जब (उस विपदा के वक्त) उसने परमात्मा को सिमरा (तो परमात्मा ने उसकी सहायता की) तब उसे यकीन आया (कि परमात्मा ही सबसे बड़ा है)। 1। जगत में अहंकार एक ऐसा विकार है~ जो बहुत बुरा है। (बड़े-बड़े कहलवाने वाले भी जब जब अहंकार में आए तो बहुत खुआर हुए)। जिस (भाग्यशाली मनुष्य) को गुरू मिल जाता है (गुरू) उसका अहंकार दूर कर देता है। 1। रहाउ। राजे बलि को माया का गुमान हो गया। उसने बड़े यज्ञ किए। अहंकार प्रचण्ड हो गया। पर (माया के मान में) अपने गुरू की सालाह लिए बिना (उसने ब्राहमण-रूप धारी विष्णु को दान देना मान लिया और) पाताल में चला गया। 2। (राजा) हरिश्चंद्र (भी) बहुत दानी था~ (दान की शोभा में ही मस्त रहा)। गुरू के बगैर वह भी ये ना समझ सका कि परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता~ उसका भेद नहीं पाया जा सकता (उसकी दृष्टि में बेअंत दानी हैं)~ (पर जीव के भी क्या वश?) परमात्मा खुद ही अक्ल देता है। 3। बुरी मति के कारण हर्णाकश्यप दुराचारी हो गया (अत्याचार करने लग पड़ा)। पर~ नारायण प्रभू स्वयं ही (अहंकारियों का) अहंकार दूर करने वाला है। उसने मेहर की और प्रहलाद की रक्षा की (हर्णाक्षस का गुमान तोड़ा)। 4। मूर्ख रावण बेसमझी में गलत रास्ते पर पड़ गया। (नतीजा ये निकला कि) उसकी लंका लूटी गई~ और उसका सिर भी काट दिया गया। अहंकार के कारण~ गुरू की शरण पड़े बिना अहंकार के मद में ही रावण तबाह हुआ। 5। सहसबाहु (को परशुराम ने मारा)~ मधु और कैटभ (को विष्णु ने मार दिया)~ महिसासुर (दुर्गा के हाथों मरा)~ हरणाखश को (नर सिंह ने) नाखूनों से मार दिया। ये सारे दैत्य प्रभू भक्ति के अभ्यास से वंचित रहने के कारण (अपनी मूर्खता की सजा भुगतते हुए) मारे गए। 6। जरासंधि व कालजमुन (कृष्ण के हाथों) मारे गए। रक्तबीज (दुर्गा के हाथों) मरा। कालनेम (विष्णु के त्रिशूल से) चीरा गया (इन अहंकारियों को इनके अहंकार ने ही ले लिया)। परमात्मा ने दैत्य मार के संतों की रक्षा की। 7। (इस सारी खेल का मालिक परमात्मा) खुद ही गुरू रूप हो के अपनी सिफत सालाह की बाणी को विचारता है~

संदर्भ: यह अंग 224 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

दिल्ली-यूनिवर्सिटी के North Campus में exam-season की tension।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 58 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 224” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 225 →, पीछे का: ← अंग 223

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।