अंग 202

अंग
202
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ॥੨॥
ਜਨ ਕੀ ਕੀਨੀ ਆਪਿ ਸਹਾਇ ॥
ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਲਗਿ ਦਾਸਹ ਪਾਇ ॥
ਆਪੁ ਗਇਆ ਤਾ ਆਪਹਿ ਭਏ ॥
ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਿਧਾਨ ਕੀ ਸਰਨੀ ਪਏ ॥੩॥
ਜੋ ਚਾਹਤ ਸੋਈ ਜਬ ਪਾਇਆ ॥
ਤਬ ਢੂੰਢਨ ਕਹਾ ਕੋ ਜਾਇਆ ॥
ਅਸਥਿਰ ਭਏ ਬਸੇ ਸੁਖ ਆਸਨ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਸੁਖ ਬਾਸਨ ॥੪॥੧੧੦॥
संत प्रसादि परम पदु पाइआ ॥२॥
जन की कीनी आपि सहाइ ॥
सुखु पाइआ लगि दासह पाइ ॥
आपु गइआ ता आपहि भए ॥
क्रिपा निधान की सरनी पए ॥३॥
जो चाहत सोई जब पाइआ ॥
तब ढूंढन कहा को जाइआ ॥
असथिर भए बसे सुख आसन ॥
गुर प्रसादि नानक सुख बासन ॥४॥११०॥

हिन्दी अर्थ: गुरू संत की कृपा से सबसे ऊंची आत्मिक अवस्था मिल जाती है। 2। (हे भाई !) परमात्मा ने खुद जिस मनुष्य की सहायता की~ उसने परमात्मा के भक्तों के चरणों में लग के आत्मिक आनंद पाया। जो मनुष्य दया के खजाने परमात्मा की शरण आ पड़े~ उनके अंदर (जब) स्वैभाव दूर हो गया तब वे परमात्मा का रूप हो गए। 3। (हे भाई !) जब किसी मनुष्य को (गुरू की कृपा से) वह परमात्मा ही मिल पड़ता है जिसे वह मिलना चाहता है~ तब वह (बाहर जंगल पहाड़ों आदि में उसे) ढूँढने नहीं जाता। हे नानक ! (परमात्मा को अपने ही अंदर ढूँढ लेने वाले मनुष्य) अडोल-चित्त हो जाते हैं~ वे सदा आनंद अवस्था में टिके रहते हैं~ गुरू की कृपा से वे सदा सुख में बसने वाले हो जाते हैं। 4। 110।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕੋਟਿ ਮਜਨ ਕੀਨੋ ਇਸਨਾਨ ॥
ਲਾਖ ਅਰਬ ਖਰਬ ਦੀਨੋ ਦਾਨੁ ॥
ਜਾ ਮਨਿ ਵਸਿਓ ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਮੁ ॥੧॥
ਸਗਲ ਪਵਿਤ ਗੁਨ ਗਾਇ ਗੁਪਾਲ ॥
ਪਾਪ ਮਿਟਹਿ ਸਾਧੂ ਸਰਨਿ ਦਇਆਲ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਹੁਤੁ ਉਰਧ ਤਪ ਸਾਧਨ ਸਾਧੇ ॥
ਅਨਿਕ ਲਾਭ ਮਨੋਰਥ ਲਾਧੇ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮ ਰਸਨ ਆਰਾਧੇ ॥੨॥
ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ ਬੇਦ ਬਖਾਨੇ ॥
ਜੋਗ ਗਿਆਨ ਸਿਧ ਸੁਖ ਜਾਨੇ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਪ੍ਰਭ ਸਿਉ ਮਨ ਮਾਨੇ ॥੩॥
ਅਗਾਧਿ ਬੋਧਿ ਹਰਿ ਅਗਮ ਅਪਾਰੇ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਨਾਮੁ ਰਿਦੇ ਬੀਚਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਉ ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੇ ॥੪॥੧੧੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
कोटि मजन कीनो इसनान ॥
लाख अरब खरब दीनो दानु ॥
जा मनि वसिओ हरि को नामु ॥१॥
सगल पवित गुन गाइ गुपाल ॥
पाप मिटहि साधू सरनि दइआल ॥ रहाउ ॥
बहुतु उरध तप साधन साधे ॥
अनिक लाभ मनोरथ लाधे ॥
हरि हरि नाम रसन आराधे ॥२॥
सिंम्रिति सासत बेद बखाने ॥
जोग गिआन सिध सुख जाने ॥
नामु जपत प्रभ सिउ मन माने ॥३॥
अगाधि बोधि हरि अगम अपारे ॥
नामु जपत नामु रिदे बीचारे ॥
नानक कउ प्रभ किरपा धारे ॥४॥१११॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ उसने मानों करोड़ों तीर्थों के स्नान कर लिए~ उसने मानों करोड़ों तीर्थों में डुबकियां लगा ली हों~ उसने (मानो) लाखों रुपए अरबों रुपए खरबों रुपए दान कर दिए (हे भाई !) जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम आ बसता है। 1। (हे भाई !) सृष्टि के पालनहार प्रभू के गुण गा के सारे मनुष्य पवित्र हो सकते हैं। दया के श्रोत गुरू की शरण पड़ने से (सारे) पाप मिट जाते हैं। रहाउ। उसने (मानो) उल्टा लटक के अनेकों तपों की साधनाएं साध लीं। उसने (मानो~ रिद्धियों-सिद्धियों के) अनकों लाभ प्राप्त कर लिए (हे भाई !) जो मनुष्य अपनी जीभ से परमात्मा का नाम जपता है। 2। उसने (मानो) स्मृतियों-शास्त्रों-वेदों के उच्चारण कर लिए। उसने (जैसे) योग (की पेचीदिकियों) की सूझ हासिल कर ली है। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरते सिमरते जिस मनुष्य का मन परमात्मा में लीन हो जाता है उसने (मानो) सिद्धों को मिले सुखों से सांझ पा ली। 3। (हे भाई !जिस मनुष्य पर प्रभू कृपा करता है~ वह मनुष्य) उस अथाह हस्ती वाले अपहुँच और बेअंत परमात्मा का नाम जपता है~ उसका नाम अपने हृदय में टिकाता है। (हे नानक ! तू भी अरदास कर और कह,) हे प्रभू ! मुझ नानक पर कृपा कर (ता कि मैं तेरा नाम जप सकूँ)। 4। 111।
ਗਉੜੀ ਮਃ ੫ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਗੁਰ ਰਿਦੈ ਬਸਾਇਆ ॥੧॥
ਗੁਰ ਗੋਬਿੰਦੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪੂਰਾ ॥
ਤਿਸਹਿ ਅਰਾਧਿ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਧੀਰਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਜਪਉ ਗੁਰੂ ਗੁਰ ਨਾਮ ॥
ਤਾ ਤੇ ਸਿਧਿ ਭਏ ਸਗਲ ਕਾਂਮ ॥੨॥
ਦਰਸਨ ਦੇਖਿ ਸੀਤਲ ਮਨ ਭਏ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਬਿਖ ਗਏ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਕਹਾ ਭੈ ਭਾਈ ॥
ਅਪਨੇ ਸੇਵਕ ਕੀ ਆਪਿ ਪੈਜ ਰਖਾਈ ॥੪॥੧੧੨॥
गउड़ी मः ५ ॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइआ ॥
चरन कमल गुर रिदै बसाइआ ॥१॥
गुर गोबिंदु पारब्रहमु पूरा ॥
तिसहि अराधि मेरा मनु धीरा ॥ रहाउ ॥
अनदिनु जपउ गुरू गुर नाम ॥
ता ते सिधि भए सगल कांम ॥२॥
दरसन देखि सीतल मन भए ॥
जनम जनम के किलबिख गए ॥३॥
कहु नानक कहा भै भाई ॥
अपने सेवक की आपि पैज रखाई ॥४॥११२॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ उसने गोबिंद का नाम सिमर सिमर के आत्मिक आनंद पाया है। जिस मनुष्य ने) गुरू के सुंदर चरण अपने हृदय में बसाए हैं~ (पर~ हे भाई ! गोबिंद की आराधना गुरू के द्वारा ही मिलती है।1। (हे भाई !) गोबिंद पारब्रहम् (सब हस्तियों से) बड़ा है। सारे गुणों का मालिक है (उसमें कोई किसी किस्म की कमी नहीं है)। उस गोबिंद को आराध के मेरा मन हौसले वाला बन जाता है (और अनेकों किलविखों का मुकाबला करने के काबिल हो जाता है)। रहाउ। (हे भाई !) मैं हर समय गुरू का नाम याद रखता हूँ (गुरू की मेहर से ही गोबिंद का सिमरन प्राप्त होता है और) उस सिमरन की बरकति से सारे कामों में सफलता हासिल होती है। 2। (हे भाई ! गुरू के द्वारा हर जगह परमात्मा का) दर्शन करके (दर्शन करने वाले) ठण्डे-ठार मन वाले हो जाते हैं~ और उनके अनेकों (पहले) जन्मों के किए हुए पाप नाश हो जाते हैं। 3। हे नानक !कह, हे भाई ! (गुरू की शरण पड़ के गोबिंद का नाम सिमरने से संसार के) सारे डर-खतरे मन से उतर जाते हैं (क्योंकि) (सिमरन की बरकति से ये यकीन बन जाता है कि गोबिंद) अपने सेवक की स्वयं लाज रखता है। 4। 112।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਪਨੇ ਸੇਵਕ ਕਉ ਆਪਿ ਸਹਾਈ ॥
ਨਿਤ ਪ੍ਰਤਿਪਾਰੈ ਬਾਪ ਜੈਸੇ ਮਾਈ ॥੧॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਸਰਨਿ ਉਬਰੈ ਸਭ ਕੋਇ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਪੂਰਨ ਸਚੁ ਸੋਇ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਬ ਮਨਿ ਬਸਿਆ ਕਰਨੈਹਾਰਾ ॥
ਭੈ ਬਿਨਸੇ ਆਤਮ ਸੁਖ ਸਾਰਾ ॥੨॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅਪਨੇ ਜਨ ਰਾਖੇ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਬਿਖ ਲਾਥੇ ॥੩॥
ਕਹਨੁ ਨ ਜਾਇ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਸਦਾ ਸਰਨਾਈ ॥੪॥੧੧੩॥
गउड़ी महला ५ ॥
अपने सेवक कउ आपि सहाई ॥
नित प्रतिपारै बाप जैसे माई ॥१॥
प्रभ की सरनि उबरै सभ कोइ ॥
करन करावन पूरन सचु सोइ ॥ रहाउ ॥
अब मनि बसिआ करनैहारा ॥
भै बिनसे आतम सुख सारा ॥२॥
करि किरपा अपने जन राखे ॥
जनम जनम के किलबिख लाथे ॥३॥
कहनु न जाइ प्रभ की वडिआई ॥
नानक दास सदा सरनाई ॥४॥११३॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) परमात्मा अपने सेवक के लिए (सदा) मददगार बना रहता है~ सदा (अपने सेवक की) संभाल करता है जैसे माता और पिता (अपने बच्चे की संभाल करते हैं)। 1। (हे भाई !) हरेक मनुष्य (जो) परमात्मा की शरण में (आता है~ सारे विकारों~ डरों~ सहिमों से) बच जाता है। उसे निश्चय बन जाता है कि वह सर्व व्यापक सदा कायम रहने वाला परमात्मा सब कुछ करने की स्मर्था रखता है और जीवों से सब कुछ करवाने वाला है। रहाउ। (हे भाई !) सब कुछ करने की स्मर्था रखने वाला परमात्मा (मेरे) मन में आ बसा है~ अब मेरे सारे डर खतरे नाश हो गए हैं और मैं आत्मिक आनंद पा रहा हूँ। 2। (हे भाई !) परमात्मा कृपा करके अपने सेवकों की स्वयं रक्षा करता है~ उनके (पहले के) अनेकों जन्मों के (किए) पापों के संस्कार (उनके मन से) उतर जाते हैं। 3। परमात्मा कितनी बड़ी स्मर्था वाला है, ये बात बयान नहीं की जा सकती। हे नानक ! परमात्मा के सेवक सदा परमात्मा की शरण पड़े रहते हैं। 4। 113।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਚੇਤੀ ਮਹਲਾ ੫ ਦੁਪਦੇ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਰਾਮ ਕੋ ਬਲੁ ਪੂਰਨ ਭਾਈ ॥
ਤਾ ਤੇ ਬ੍ਰਿਥਾ ਨ ਬਿਆਪੈ ਕਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋ ਜੋ ਚਿਤਵੈ ਦਾਸੁ ਹਰਿ ਮਾਈ ॥
ਸੋ ਸੋ ਕਰਤਾ ਆਪਿ ਕਰਾਈ ॥੧॥
ਨਿੰਦਕ ਕੀ ਪ੍ਰਭਿ ਪਤਿ ਗਵਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਣ ਨਿਰਭਉ ਗਾਈ ॥੨॥੧੧੪॥
रागु गउड़ी चेती महला ५ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राम को बलु पूरन भाई ॥
ता ते ब्रिथा न बिआपै काई ॥१॥ रहाउ ॥
जो जो चितवै दासु हरि माई ॥
सो सो करता आपि कराई ॥१॥
निंदक की प्रभि पति गवाई ॥
नानक हरि गुण निरभउ गाई ॥२॥११४॥

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी चेती महला ५ दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! परमात्मा की ताकत हर जगह (अपना प्रभाव डाल रही है) (इस वास्ते जिस सेवक के सिर पर परमात्मा अपना मेहर का हाथ रखता है) उस ताकत की बरकति से (उस सेवक पे) कोई दुख कलेश अपना जोर नहीं डाल सकते। 1। रहाउ। हे (मेरी) माँ ! परमात्मा का सेवक जो जो मांग अपने मन में चितवता है~ करतार स्वयं उसकी वह मांग पूरी कर देता है। 1। (पर सेवक के) दोखी-निंदक की इज्जत प्रभू ने लोक-परलोक में खुद गवा दी होती है। हे नानक ! (परमात्मा का सेवक) परमात्मा के गुण गाता रहता है (और दुनिया के डरों से) निडर हो जाता है। 2। 114।

संदर्भ: यह अंग 202 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

सीस-गंज साहिब के बाहर Chandni Chowk की भीड़ और अंदर का shrine, दोनों एक साथ।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 202” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 203 →, पीछे का: ← अंग 201

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।