अंग 205

अंग
205
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਅੰਤਰਿ ਅਲਖੁ ਨ ਜਾਈ ਲਖਿਆ ਵਿਚਿ ਪੜਦਾ ਹਉਮੈ ਪਾਈ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਸਭੋ ਜਗੁ ਸੋਇਆ ਇਹੁ ਭਰਮੁ ਕਹਹੁ ਕਿਉ ਜਾਈ ॥੧॥
ਏਕਾ ਸੰਗਤਿ ਇਕਤੁ ਗ੍ਰਿਹਿ ਬਸਤੇ ਮਿਲਿ ਬਾਤ ਨ ਕਰਤੇ ਭਾਈ ॥
ਏਕ ਬਸਤੁ ਬਿਨੁ ਪੰਚ ਦੁਹੇਲੇ ਓਹ ਬਸਤੁ ਅਗੋਚਰ ਠਾਈ ॥੨॥
ਜਿਸ ਕਾ ਗ੍ਰਿਹੁ ਤਿਨਿ ਦੀਆ ਤਾਲਾ ਕੁੰਜੀ ਗੁਰ ਸਉਪਾਈ ॥
ਅਨਿਕ ਉਪਾਵ ਕਰੇ ਨਹੀ ਪਾਵੈ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ॥੩॥
ਜਿਨ ਕੇ ਬੰਧਨ ਕਾਟੇ ਸਤਿਗੁਰ ਤਿਨ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਪੰਚ ਜਨਾ ਮਿਲਿ ਮੰਗਲੁ ਗਾਇਆ ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਭੇਦੁ ਨ ਭਾਈ ॥੪॥
ਮੇਰੇ ਰਾਮ ਰਾਇ ਇਨ ਬਿਧਿ ਮਿਲੈ ਗੁਸਾਈ ॥
ਸਹਜੁ ਭਇਆ ਭ੍ਰਮੁ ਖਿਨ ਮਹਿ ਨਾਠਾ ਮਿਲਿ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਸਮਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੧॥੧੨੨॥
अंतरि अलखु न जाई लखिआ विचि पड़दा हउमै पाई ॥
माइआ मोहि सभो जगु सोइआ इहु भरमु कहहु किउ जाई ॥१॥
एका संगति इकतु ग्रिहि बसते मिलि बात न करते भाई ॥
एक बसतु बिनु पंच दुहेले ओह बसतु अगोचर ठाई ॥२॥
जिस का ग्रिहु तिनि दीआ ताला कुंजी गुर सउपाई ॥
अनिक उपाव करे नही पावै बिनु सतिगुर सरणाई ॥३॥
जिन के बंधन काटे सतिगुर तिन साधसंगति लिव लाई ॥
पंच जना मिलि मंगलु गाइआ हरि नानक भेदु न भाई ॥४॥
मेरे राम राइ इन बिधि मिलै गुसाई ॥
सहजु भइआ भ्रमु खिन महि नाठा मिलि जोती जोति समाई ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१॥१२२॥

हिन्दी अर्थ: (हरेक जीव के) अंदर अदृश्य प्रभू बसता है। पर (जीव को) ये समझ नहीं आ सकती~ क्योंकि (जीव के अंदर) अहंकार का पर्दा पड़ा हुआ है। सारा जगत ही माया के मोह में सोया पड़ा है। (हे भाई !) बता~ (जीव की) ये भटकना कैसे दूर हो?। 1। (हे भाई ! आत्मा और परमात्मा की) एक ही संगति है~ दोनों एक ही (हृदय-) घर में बसते हैं~ पर (आपस में) मिल के (कभी) बात नहीं करते। एक (नाम) पदार्थ के बिना (जीव के) पाँचों ज्ञानेंद्रियां दुखी रहती हैं। वह (नाम) पदार्थ ऐसी जगह में है~ जहाँ ज्ञानेंद्रियों की पहुँच नहीं। 2। (हे भाई !) जिस हरी का ये बनाया हुआ (शरीर) घर है~ उसने ही (मोह का) ताला मारा हुआ है~ और चाबी गुरू को सौंप दी है। गुरू की शरण पड़े बिना जीव और-और अनेकों उपाय करता है~ (पर उन कोशिशों से परमात्मा को) नहीं ढूँढ सकता। 3। हे सतिगुरू ! जिन के (माया के) बंधन तूने काट दिए~ उन्होंने साध-संगति में टिक के (प्रभू से) प्रीति बनाई। हे नानक ! (कह,) उनके पाँचों ज्ञानेंद्रियों ने मिल के सिफत सालाह का गीत गाया। हे भाई ! उनमें और हरी में कोई फर्क ना रहा। 4। हे मेरे पातशाह ! इन तरीकों से धरती का पति परमात्मा मिलता है। जिस मनुष्य को आत्मिक अडोलता प्राप्त हो गई है~ उसकी (माया की खातिर) भटकना एक पल में दूर हो गई। उसकी ज्योति प्रभू में मिल के प्रभू में ही लीन हो गई। 1। रहाउ दूसरा। 1। 122।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਐਸੋ ਪਰਚਉ ਪਾਇਓ ॥
ਕਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਦਇਆਲ ਬੀਠੁਲੈ ਸਤਿਗੁਰ ਮੁਝਹਿ ਬਤਾਇਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਤ ਕਤ ਦੇਖਉ ਤਤ ਤਤ ਤੁਮ ਹੀ ਮੋਹਿ ਇਹੁ ਬਿਸੁਆਸੁ ਹੋਇ ਆਇਓ ॥
ਕੈ ਪਹਿ ਕਰਉ ਅਰਦਾਸਿ ਬੇਨਤੀ ਜਉ ਸੁਨਤੋ ਹੈ ਰਘੁਰਾਇਓ ॥੧॥
ਲਹਿਓ ਸਹਸਾ ਬੰਧਨ ਗੁਰਿ ਤੋਰੇ ਤਾਂ ਸਦਾ ਸਹਜ ਸੁਖੁ ਪਾਇਓ ॥
ਹੋਣਾ ਸਾ ਸੋਈ ਫੁਨਿ ਹੋਸੀ ਸੁਖੁ ਦੁਖੁ ਕਹਾ ਦਿਖਾਇਓ ॥੨॥
ਖੰਡ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਕਾ ਏਕੋ ਠਾਣਾ ਗੁਰਿ ਪਰਦਾ ਖੋਲਿ ਦਿਖਾਇਓ ॥
ਨਉ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਇਕ ਠਾਈ ਤਉ ਬਾਹਰਿ ਕੈਠੈ ਜਾਇਓ ॥੩॥
ਏਕੈ ਕਨਿਕ ਅਨਿਕ ਭਾਤਿ ਸਾਜੀ ਬਹੁ ਪਰਕਾਰ ਰਚਾਇਓ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਭਰਮੁ ਗੁਰਿ ਖੋਈ ਹੈ ਇਵ ਤਤੈ ਤਤੁ ਮਿਲਾਇਓ ॥੪॥੨॥੧੨੩॥
गउड़ी महला ५ ॥
ऐसो परचउ पाइओ ॥
करी क्रिपा दइआल बीठुलै सतिगुर मुझहि बताइओ ॥१॥ रहाउ ॥
जत कत देखउ तत तत तुम ही मोहि इहु बिसुआसु होइ आइओ ॥
कै पहि करउ अरदासि बेनती जउ सुनतो है रघुराइओ ॥१॥
लहिओ सहसा बंधन गुरि तोरे तां सदा सहज सुखु पाइओ ॥
होणा सा सोई फुनि होसी सुखु दुखु कहा दिखाइओ ॥२॥
खंड ब्रहमंड का एको ठाणा गुरि परदा खोलि दिखाइओ ॥
नउ निधि नामु निधानु इक ठाई तउ बाहरि कैठै जाइओ ॥३॥
एकै कनिक अनिक भाति साजी बहु परकार रचाइओ ॥
कहु नानक भरमु गुरि खोई है इव ततै ततु मिलाइओ ॥४॥२॥१२३॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (परमात्मा के साथ मेरी) ऐसी सांझ बन गई कि उस माया के प्रभाव से परे टिके हुए दयाल प्रभू ने मेरे ऊपर कृपा की और मुझे गुरू का पता बता दिया। 1। रहाउ। (गुरू की सहायता से अब) मुझे ये विश्वास हो गया है कि मैं जिधर भी देखता हूँ~ हे प्रभू ! मुझे तू ही तू दिखाई देता है। (हे भाई ! मुझे यकीन हो गया है कि) जब परमात्मा स्वयं (जीवों की अरदास विनती) सुनता है तो मैं (उसके बिना और) किस के पास आरजू करूँ~ विनती करूँ?। 1। (हे भाई !) गुरू ने (जिस मनुष्य के माया के) बंधन तोड़ दिए~ उसका सारा सहम-फिक्र दूर हो गया~ तब उसने सदा के लिए आत्मिक अडोलता का आनंद प्राप्त कर लिया। (उसे यकीन बन गया कि प्रभू की रजा के अनुसार) जो कुछ होना था~ वही होगा (उसके हुकम के बिना) कोई सुख या कोई दुख कहीं भी दिखाई नहीं दे सकता। 2। (हे भाई !) गुरू ने (जिस मनुष्य के अंदर से अहंकार के) पर्दे खोल के परमात्मा के दर्शन करा दिए~ उसे परमात्मा के सारे खण्डों-ब्रहमण्डों का एक ही ठिकाना दिखाई देता है। जिस मनुष्य के हृदय में ही (गुरू की कृपा से) जगत के नौ ही खजानों का रूप प्रभू-नाम-खजाना आ बसे~ उसे बाहर भटकने की जरूरत नहीं रहती। 3। (हे भाई !जैसे) एक सोने से सुनियारे ने गहनों की अनेकों किस्मों के बनतर (रूप) बना दिए~ वैसे ही परमात्मा ने कई किस्म की ये जगत रचना रच दी है। हे नानक ! कह,गुरू ने जिस मनुष्य का भरम-भुलेखा दूर कर दिया~ उसको उसी तरह का हरेक तत्व (मूल-) तत्व (प्रभू) में मिलता दिखता है (जैसे अनेकों रूपों के गहने फिर सोने में ही मिल जाते हैं)। 4। 2। 123।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਉਧ ਘਟੈ ਦਿਨਸੁ ਰੈਨਾਰੇ ॥
ਮਨ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਕਾਜ ਸਵਾਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰਉ ਬੇਨੰਤੀ ਸੁਨਹੁ ਮੇਰੇ ਮੀਤਾ ਸੰਤ ਟਹਲ ਕੀ ਬੇਲਾ ॥
ਈਹਾ ਖਾਟਿ ਚਲਹੁ ਹਰਿ ਲਾਹਾ ਆਗੈ ਬਸਨੁ ਸੁਹੇਲਾ ॥੧॥
ਇਹੁ ਸੰਸਾਰੁ ਬਿਕਾਰੁ ਸਹਸੇ ਮਹਿ ਤਰਿਓ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ॥
ਜਿਸਹਿ ਜਗਾਇ ਪੀਆਏ ਹਰਿ ਰਸੁ ਅਕਥ ਕਥਾ ਤਿਨਿ ਜਾਨੀ ॥੨॥
ਜਾ ਕਉ ਆਏ ਸੋਈ ਵਿਹਾਝਹੁ ਹਰਿ ਗੁਰ ਤੇ ਮਨਹਿ ਬਸੇਰਾ ॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਮਹਲੁ ਪਾਵਹੁ ਸੁਖ ਸਹਜੇ ਬਹੁਰਿ ਨ ਹੋਇਗੋ ਫੇਰਾ ॥੩॥
ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਪੁਰਖ ਬਿਧਾਤੇ ਸਰਧਾ ਮਨ ਕੀ ਪੂਰੇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਦਾਸੁ ਇਹੀ ਸੁਖੁ ਮਾਗੈ ਮੋ ਕਉ ਕਰਿ ਸੰਤਨ ਕੀ ਧੂਰੇ ॥੪॥੩॥੧੨੪॥
गउड़ी महला ५ ॥
अउध घटै दिनसु रैनारे ॥
मन गुर मिलि काज सवारे ॥१॥ रहाउ ॥
करउ बेनंती सुनहु मेरे मीता संत टहल की बेला ॥
ईहा खाटि चलहु हरि लाहा आगै बसनु सुहेला ॥१॥
इहु संसारु बिकारु सहसे महि तरिओ ब्रहम गिआनी ॥
जिसहि जगाइ पीआए हरि रसु अकथ कथा तिनि जानी ॥२॥
जा कउ आए सोई विहाझहु हरि गुर ते मनहि बसेरा ॥
निज घरि महलु पावहु सुख सहजे बहुरि न होइगो फेरा ॥३॥
अंतरजामी पुरख बिधाते सरधा मन की पूरे ॥
नानकु दासु इही सुखु मागै मो कउ करि संतन की धूरे ॥४॥३॥१२४॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे भाई ! (तेरी) उम्र (एक एक) दिन (एक एक) रात करके घटती जा रही है। हे मन ! (जिस काम के लिए तू जगत में आया है~ अपने उस) काम को गुरू को मिल के पूरा कर। 1। रहाउ। हे मेरे मित्र ! सुन~ मैं (तेरे आगे) विनती करता हूँ (ये मानस जन्म) संतों की टहल करने का समय है। यहाँ से हरी नाम का लाभ कमा के चल~ परलोक में सुखदायी बसेरा प्राप्त होगा। 1। (हे भाई !) ये जगत विकार-रूप बना हुआ है (विकारों से भरपूर है~ विकारों में फंस के जीव) चिंता-फिक्रों में (डूबे रहते हैं)। जिस मनुष्य ने परमात्मा के साथ गहरी सांझ बना ली है~ वह (इस संसार समुंद्र में से) पार लांघ जाते हैं। जिस मनुष्य को (परमात्मा विकारों की नींद में से) सुचेत करता है~ उसे अपना हरी-नाम-रस पिलाता है। उस मनुष्य ने फिर उस परमात्मा की सिफत सालाह के साथ गहरी सांझ डाल ली है जिसका मुकम्मल स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। 2। हे भाई ! जिस (नाम पदार्थ के खरीदने) के लिए (जगत में) आए हो~ वह सौदा खरीदो। गुरू की कृपा से ही परमात्मा का वास मन में हो सकता है। हे भाई ! (गुरू की शरण पड़ कर) आत्मिक अडोकलता के आनंद में टिक के अपने हृदय घर में परमात्मा का ठिकाना ढूँढो। इस तरह दुबारा जन्म-मरण के चक्कर में नहीं पड़ेगा। 3। हे अंतरजामी सर्व-व्यापक करतार ! मेरे मन की श्रद्धा पूरी कर। तेरा दास नानक तुझसे यही सुख मांगता है, मुझे संत जनों के चरणों की धूड़ बना दे। 4। 3। 124।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਰਾਖੁ ਪਿਤਾ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ॥
ਮੋਹਿ ਨਿਰਗੁਨੁ ਸਭ ਗੁਨ ਤੇਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪੰਚ ਬਿਖਾਦੀ ਏਕੁ ਗਰੀਬਾ ਰਾਖਹੁ ਰਾਖਨਹਾਰੇ ॥
ਖੇਦੁ ਕਰਹਿ ਅਰੁ ਬਹੁਤੁ ਸੰਤਾਵਹਿ ਆਇਓ ਸਰਨਿ ਤੁਹਾਰੇ ॥੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
राखु पिता प्रभ मेरे ॥
मोहि निरगुनु सभ गुन तेरे ॥१॥ रहाउ ॥
पंच बिखादी एकु गरीबा राखहु राखनहारे ॥
खेदु करहि अरु बहुतु संतावहि आइओ सरनि तुहारे ॥१॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे मेरे पिता प्रभू ! मुझ गुण-हीन को बचा ले। सारे गुण तेरे (वश में हैं~ जिस पे मेहर करे~ उसी को मिलते हैं। मुझे भी अपने गुण बख्श और अवगुणों से बचा ले)। 1। रहाउ। हे सहायता करने के स्मर्थ प्रभू ! मैं गरीब अकेला हूँ और मेरे वैरी कामादिक पाँच हैं। मेरी सहायता कर~ मैं तेरी शरण आया हूँ। ये पाँचों मुझे दुख देते हैं और बहुत सताते हैं। 1।

संदर्भ: यह अंग 205 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

AIIMS के बाहर रात 2 बजे का इंतज़ार, परिवार वाले उम्मीद और थकान के बीच।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 205” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 206 →, पीछे का: ← अंग 204

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।