अंग
197
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਗਲ ਦੂਖ ਕਾ ਹੋਇਆ ਨਾਸੁ ॥੨॥
ਆਸਾ ਮਾਣੁ ਤਾਣੁ ਧਨੁ ਏਕ ॥
ਸਾਚੇ ਸਾਹ ਕੀ ਮਨ ਮਹਿ ਟੇਕ ॥੩॥
ਮਹਾ ਗਰੀਬ ਜਨ ਸਾਧ ਅਨਾਥ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭਿ ਰਾਖੇ ਦੇ ਹਾਥ ॥੪॥੮੫॥੧੫੪॥
ਆਸਾ ਮਾਣੁ ਤਾਣੁ ਧਨੁ ਏਕ ॥
ਸਾਚੇ ਸਾਹ ਕੀ ਮਨ ਮਹਿ ਟੇਕ ॥੩॥
ਮਹਾ ਗਰੀਬ ਜਨ ਸਾਧ ਅਨਾਥ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭਿ ਰਾਖੇ ਦੇ ਹਾਥ ॥੪॥੮੫॥੧੫੪॥
सगल दूख का होइआ नासु ॥२॥
आसा माणु ताणु धनु एक ॥
साचे साह की मन महि टेक ॥३॥
महा गरीब जन साध अनाथ ॥
नानक प्रभि राखे दे हाथ ॥४॥८५॥१५४॥
आसा माणु ताणु धनु एक ॥
साचे साह की मन महि टेक ॥३॥
महा गरीब जन साध अनाथ ॥
नानक प्रभि राखे दे हाथ ॥४॥८५॥१५४॥
हिन्दी अर्थ: उसके सारे दुखों का नाश हो जाता है;2~ एक परमात्मा का नाम ही उस मनुष्य की आस बन जाता है~ प्रभू का नाम ही उस का मान-तान और धन हो जाता है। उस मनुष्य के मन में सदा कायम रहने वाले शाह परमात्मा का ही सहारा होता है। 3। हे नानक ! (कह, हे भाई ! जो) बड़े गरीब और अनाथ लोग (थे~ जब वह) गुरू के सेवक (बन गए~ गुरू की शरण आ पड़े) परमात्मा ने (उन्हें दुखों-कलेशों से) हाथ दे कर बचा लिया। 4। 85। 154।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਮਜਨੁ ਕਰਿ ਸੂਚੇ ॥
ਕੋਟਿ ਗ੍ਰਹਣ ਪੁੰਨ ਫਲ ਮੂਚੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਚਰਣ ਰਿਦੇ ਮਹਿ ਬਸੇ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਵਿਖ ਨਸੇ ॥੧॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਕੀਰਤਨ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ॥
ਜਮ ਕਾ ਮਾਰਗੁ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਨ ਆਇਆ ॥੨॥
ਮਨ ਬਚ ਕ੍ਰਮ ਗੋਵਿੰਦ ਅਧਾਰੁ ॥
ਤਾ ਤੇ ਛੁਟਿਓ ਬਿਖੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਨੋ ਅਪਨਾ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾਪੁ ਜਪੇ ਹਰਿ ਜਪਨਾ ॥੪॥੮੬॥੧੫੫॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਮਜਨੁ ਕਰਿ ਸੂਚੇ ॥
ਕੋਟਿ ਗ੍ਰਹਣ ਪੁੰਨ ਫਲ ਮੂਚੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਚਰਣ ਰਿਦੇ ਮਹਿ ਬਸੇ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਵਿਖ ਨਸੇ ॥੧॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਕੀਰਤਨ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ॥
ਜਮ ਕਾ ਮਾਰਗੁ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਨ ਆਇਆ ॥੨॥
ਮਨ ਬਚ ਕ੍ਰਮ ਗੋਵਿੰਦ ਅਧਾਰੁ ॥
ਤਾ ਤੇ ਛੁਟਿਓ ਬਿਖੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਨੋ ਅਪਨਾ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾਪੁ ਜਪੇ ਹਰਿ ਜਪਨਾ ॥੪॥੮੬॥੧੫੫॥
गउड़ी महला ५ ॥
हरि हरि नामि मजनु करि सूचे ॥
कोटि ग्रहण पुंन फल मूचे ॥१॥ रहाउ ॥
हरि के चरण रिदे महि बसे ॥
जनम जनम के किलविख नसे ॥१॥
साधसंगि कीरतन फलु पाइआ ॥
जम का मारगु द्रिसटि न आइआ ॥२॥
मन बच क्रम गोविंद अधारु ॥
ता ते छुटिओ बिखु संसारु ॥३॥
करि किरपा प्रभि कीनो अपना ॥
नानक जापु जपे हरि जपना ॥४॥८६॥१५५॥
हरि हरि नामि मजनु करि सूचे ॥
कोटि ग्रहण पुंन फल मूचे ॥१॥ रहाउ ॥
हरि के चरण रिदे महि बसे ॥
जनम जनम के किलविख नसे ॥१॥
साधसंगि कीरतन फलु पाइआ ॥
जम का मारगु द्रिसटि न आइआ ॥२॥
मन बच क्रम गोविंद अधारु ॥
ता ते छुटिओ बिखु संसारु ॥३॥
करि किरपा प्रभि कीनो अपना ॥
नानक जापु जपे हरि जपना ॥४॥८६॥१५५॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) परमात्मा के नाम (तीर्थ) में स्नान करके स्वच्छ (जीवन वाले बन जाते हैं)। (नाम तीर्थ में स्नान करने से) करोड़ों ग्रहणों के समय किए (दान-) पुंन्न के फलों से भी ज्यादा फल मिलते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई ! जिस मनुष्य के) हृदय में परमात्मा के चरन बस जाएं~ उसके अनेकों जन्मों के (किए) पाप नाश हो जाते हैं। 1। (हे भाई !जिस मनुष्य ने) साध-संगति में टिक के परमात्मा की सिफत सालाह का फल प्राप्त कर लिया। जमों का रास्ता उसे नजर भी नहीं पड़ता (आत्मिक मौत उसके कहीं नजदीक भी नहीं फटकी)। 2। (हे भाई ! जिस मनुष्य ने) अपने मन का अपने बोलों का अपने कामों का आसरा परमात्मा (के नाम) को बना लिया~ उस से संसार (का मोह) दूर हट गया~ उससे (विकारों का वह) जहर परे रह गया (जो मनुष्य के आत्मिक जीवन को मार देता है)। 3। हे नानक ! मेहर कर के प्रभू ने जिस मनुष्य को अपना बना लिया। वह मनुष्य सदा प्रभू का जाप जपता है प्रभू का भजन करता है। 4। 86। 155।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪਉ ਸਰਣਾਈ ਜਿਨਿ ਹਰਿ ਜਾਤੇ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਚਰਣ ਹਰਿ ਰਾਤੇ ॥੧॥
ਭੈ ਭੰਜਨ ਪ੍ਰਭ ਮਨਿ ਨ ਬਸਾਹੀ ॥
ਡਰਪਤ ਡਰਪਤ ਜਨਮ ਬਹੁਤੁ ਜਾਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਕੈ ਰਿਦੈ ਬਸਿਓ ਹਰਿ ਨਾਮ ॥
ਸਗਲ ਮਨੋਰਥ ਤਾ ਕੇ ਪੂਰਨ ਕਾਮ ॥੨॥
ਜਨਮੁ ਜਰਾ ਮਿਰਤੁ ਜਿਸੁ ਵਾਸਿ ॥
ਸੋ ਸਮਰਥੁ ਸਿਮਰਿ ਸਾਸਿ ਗਿਰਾਸਿ ॥੩॥
ਮੀਤੁ ਸਾਜਨੁ ਸਖਾ ਪ੍ਰਭੁ ਏਕ ॥
ਨਾਮੁ ਸੁਆਮੀ ਕਾ ਨਾਨਕ ਟੇਕ ॥੪॥੮੭॥੧੫੬॥
ਪਉ ਸਰਣਾਈ ਜਿਨਿ ਹਰਿ ਜਾਤੇ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਚਰਣ ਹਰਿ ਰਾਤੇ ॥੧॥
ਭੈ ਭੰਜਨ ਪ੍ਰਭ ਮਨਿ ਨ ਬਸਾਹੀ ॥
ਡਰਪਤ ਡਰਪਤ ਜਨਮ ਬਹੁਤੁ ਜਾਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਕੈ ਰਿਦੈ ਬਸਿਓ ਹਰਿ ਨਾਮ ॥
ਸਗਲ ਮਨੋਰਥ ਤਾ ਕੇ ਪੂਰਨ ਕਾਮ ॥੨॥
ਜਨਮੁ ਜਰਾ ਮਿਰਤੁ ਜਿਸੁ ਵਾਸਿ ॥
ਸੋ ਸਮਰਥੁ ਸਿਮਰਿ ਸਾਸਿ ਗਿਰਾਸਿ ॥੩॥
ਮੀਤੁ ਸਾਜਨੁ ਸਖਾ ਪ੍ਰਭੁ ਏਕ ॥
ਨਾਮੁ ਸੁਆਮੀ ਕਾ ਨਾਨਕ ਟੇਕ ॥੪॥੮੭॥੧੫੬॥
गउड़ी महला ५ ॥
पउ सरणाई जिनि हरि जाते ॥
मनु तनु सीतलु चरण हरि राते ॥१॥
भै भंजन प्रभ मनि न बसाही ॥
डरपत डरपत जनम बहुतु जाही ॥१॥ रहाउ ॥
जा कै रिदै बसिओ हरि नाम ॥
सगल मनोरथ ता के पूरन काम ॥२॥
जनमु जरा मिरतु जिसु वासि ॥
सो समरथु सिमरि सासि गिरासि ॥३॥
मीतु साजनु सखा प्रभु एक ॥
नामु सुआमी का नानक टेक ॥४॥८७॥१५६॥
पउ सरणाई जिनि हरि जाते ॥
मनु तनु सीतलु चरण हरि राते ॥१॥
भै भंजन प्रभ मनि न बसाही ॥
डरपत डरपत जनम बहुतु जाही ॥१॥ रहाउ ॥
जा कै रिदै बसिओ हरि नाम ॥
सगल मनोरथ ता के पूरन काम ॥२॥
जनमु जरा मिरतु जिसु वासि ॥
सो समरथु सिमरि सासि गिरासि ॥३॥
मीतु साजनु सखा प्रभु एक ॥
नामु सुआमी का नानक टेक ॥४॥८७॥१५६॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) जिस मनुष्य ने परमात्मा के साथ जान पहिचान बना ली है उसी की शरण पड़ा रह~ (क्योंकि) प्रभू-चरणों में प्यार डाल के मन शांत हो जाता है~ शरीर (भाव~ हरेक इंद्रिय) शांत हो जाता है। 1। (हे भाई ! जो मनुष्य) सारे डरों का नाश करने वाले प्रभू को अपने मन में नहीं बसाते~ उनके अनेकों जन्म इन डरों से काँपते हुए ही बीत जाते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई !) जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम बस जाता है~ उसके सारे काम सारे मनोरथ सफल हो जाते हैं। 2। (हे भाई !) हमारा जीना~ हमारा बुढ़ापा और हमारी मौत जिस परमात्मा के वश में है~ उस सब ताकतों के मालिक प्रभू को हरेक साँस के साथ और हरेक ग्रास के साथ सिमरता रह। 3। हे नानक ! (कह, हे भाई !) एक परमात्मा ही (हम जीवों का) मित्र है सज्जन है~ साथी है। उस मालिक प्रभू का नाम ही (हमारी जिंदगी का) सहारा है। 4। 87। 156।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬਾਹਰਿ ਰਾਖਿਓ ਰਿਦੈ ਸਮਾਲਿ ॥
ਘਰਿ ਆਏ ਗੋਵਿੰਦੁ ਲੈ ਨਾਲਿ ॥੧॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸੰਤਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਰਾਤਾ ਰਾਮ ਕੈ ਰੰਗਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਾਗਰੁ ਤਰਿਆ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਵਿਖ ਸਭਿ ਹਿਰਿਆ ॥੨॥
ਸੋਭਾ ਸੁਰਤਿ ਨਾਮਿ ਭਗਵੰਤੁ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕਾ ਨਿਰਮਲ ਮੰਤੁ ॥੩॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਹਿਰਦੇ ਮਹਿ ਜਾਪੁ ॥
ਨਾਨਕੁ ਪੇਖਿ ਜੀਵੈ ਪਰਤਾਪੁ ॥੪॥੮੮॥੧੫੭॥
ਬਾਹਰਿ ਰਾਖਿਓ ਰਿਦੈ ਸਮਾਲਿ ॥
ਘਰਿ ਆਏ ਗੋਵਿੰਦੁ ਲੈ ਨਾਲਿ ॥੧॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸੰਤਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਰਾਤਾ ਰਾਮ ਕੈ ਰੰਗਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਾਗਰੁ ਤਰਿਆ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਵਿਖ ਸਭਿ ਹਿਰਿਆ ॥੨॥
ਸੋਭਾ ਸੁਰਤਿ ਨਾਮਿ ਭਗਵੰਤੁ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕਾ ਨਿਰਮਲ ਮੰਤੁ ॥੩॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਹਿਰਦੇ ਮਹਿ ਜਾਪੁ ॥
ਨਾਨਕੁ ਪੇਖਿ ਜੀਵੈ ਪਰਤਾਪੁ ॥੪॥੮੮॥੧੫੭॥
गउड़ी महला ५ ॥
बाहरि राखिओ रिदै समालि ॥
घरि आए गोविंदु लै नालि ॥१॥
हरि हरि नामु संतन कै संगि ॥
मनु तनु राता राम कै रंगि ॥१॥ रहाउ ॥
गुर परसादी सागरु तरिआ ॥
जनम जनम के किलविख सभि हिरिआ ॥२॥
सोभा सुरति नामि भगवंतु ॥
पूरे गुर का निरमल मंतु ॥३॥
चरण कमल हिरदे महि जापु ॥
नानकु पेखि जीवै परतापु ॥४॥८८॥१५७॥
बाहरि राखिओ रिदै समालि ॥
घरि आए गोविंदु लै नालि ॥१॥
हरि हरि नामु संतन कै संगि ॥
मनु तनु राता राम कै रंगि ॥१॥ रहाउ ॥
गुर परसादी सागरु तरिआ ॥
जनम जनम के किलविख सभि हिरिआ ॥२॥
सोभा सुरति नामि भगवंतु ॥
पूरे गुर का निरमल मंतु ॥३॥
चरण कमल हिरदे महि जापु ॥
नानकु पेखि जीवै परतापु ॥४॥८८॥१५७॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) जगत से कार्य-व्यवहार करते हुए संत जनों ने गोबिंद को अपने हृदय में संभाल के रखा होता है। गोबिंद को संत जन अपने हृदय घर में सदा अपने साथ रखते हैं। 1। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सदा संत जनों के हृदय में बसता है। परमात्मा के (प्रेम) रंग में (संत जनों का) मन रंगा रहता है~ तन (भाव~ हरेक ज्ञानेंद्री) रंगी रहती है। 1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू की कृपा से (परमात्मा का नाम हृदय में संभाल के संत जन) संसार समुंद्र से पार लांघ जाते हैं~ और अनेकों जन्मों के (पहले किए हुये) सारे पाप दूर कर लेते हैं। 2। जो मनुष्य गुरू का उपदेश हृदय में बसाता है~ वह) भाग्यशाली हो जाता है~ वह (लोक परलोक में) बड़प्पन कमाता है~ उसकी सुरति प्रभू के नाम में जुड़ती है (हे भाई !तू भी) पूरे गुरू का उपदेश (अपने हृदय में बसा।। 3। (हे भाई !तू भी परमात्मा के) सुंदर चरण (अपने) हृदय में जपता रह। नानक (उस परमात्मा का) प्रताप देख के आत्मिक जीवन हासिल करता है। 4। 88। 157।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਧੰਨੁ ਇਹੁ ਥਾਨੁ ਗੋਵਿੰਦ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥
ਕੁਸਲ ਖੇਮ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਬਸਾਏ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਪਤਿ ਤਹਾ ਜਹਾ ਹਰਿ ਸਿਮਰਨੁ ਨਾਹੀ ॥
ਕੋਟਿ ਅਨੰਦ ਜਹ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਹੀ ॥੧॥
ਹਰਿ ਬਿਸਰਿਐ ਦੁਖ ਰੋਗ ਘਨੇਰੇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਸੇਵਾ ਜਮੁ ਲਗੈ ਨ ਨੇਰੇ ॥੨॥
ਸੋ ਵਡਭਾਗੀ ਨਿਹਚਲ ਥਾਨੁ ॥
ਜਹ ਜਪੀਐ ਪ੍ਰਭ ਕੇਵਲ ਨਾਮੁ ॥੩॥
ਜਹ ਜਾਈਐ ਤਹ ਨਾਲਿ ਮੇਰਾ ਸੁਆਮੀ ॥
ਨਾਨਕ ਕਉ ਮਿਲਿਆ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥੪॥੮੯॥੧੫੮॥
ਧੰਨੁ ਇਹੁ ਥਾਨੁ ਗੋਵਿੰਦ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥
ਕੁਸਲ ਖੇਮ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਬਸਾਏ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਪਤਿ ਤਹਾ ਜਹਾ ਹਰਿ ਸਿਮਰਨੁ ਨਾਹੀ ॥
ਕੋਟਿ ਅਨੰਦ ਜਹ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਹੀ ॥੧॥
ਹਰਿ ਬਿਸਰਿਐ ਦੁਖ ਰੋਗ ਘਨੇਰੇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਸੇਵਾ ਜਮੁ ਲਗੈ ਨ ਨੇਰੇ ॥੨॥
ਸੋ ਵਡਭਾਗੀ ਨਿਹਚਲ ਥਾਨੁ ॥
ਜਹ ਜਪੀਐ ਪ੍ਰਭ ਕੇਵਲ ਨਾਮੁ ॥੩॥
ਜਹ ਜਾਈਐ ਤਹ ਨਾਲਿ ਮੇਰਾ ਸੁਆਮੀ ॥
ਨਾਨਕ ਕਉ ਮਿਲਿਆ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥੪॥੮੯॥੧੫੮॥
गउड़ी महला ५ ॥
धंनु इहु थानु गोविंद गुण गाए ॥
कुसल खेम प्रभि आपि बसाए ॥१॥ रहाउ ॥
बिपति तहा जहा हरि सिमरनु नाही ॥
कोटि अनंद जह हरि गुन गाही ॥१॥
हरि बिसरिऐ दुख रोग घनेरे ॥
प्रभ सेवा जमु लगै न नेरे ॥२॥
सो वडभागी निहचल थानु ॥
जह जपीऐ प्रभ केवल नामु ॥३॥
जह जाईऐ तह नालि मेरा सुआमी ॥
नानक कउ मिलिआ अंतरजामी ॥४॥८९॥१५८॥
धंनु इहु थानु गोविंद गुण गाए ॥
कुसल खेम प्रभि आपि बसाए ॥१॥ रहाउ ॥
बिपति तहा जहा हरि सिमरनु नाही ॥
कोटि अनंद जह हरि गुन गाही ॥१॥
हरि बिसरिऐ दुख रोग घनेरे ॥
प्रभ सेवा जमु लगै न नेरे ॥२॥
सो वडभागी निहचल थानु ॥
जह जपीऐ प्रभ केवल नामु ॥३॥
जह जाईऐ तह नालि मेरा सुआमी ॥
नानक कउ मिलिआ अंतरजामी ॥४॥८९॥१५८॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ अर्थ: (हे भाई !) गोबिंद के गुण गाने से (मनुष्य का) ये हृदय-स्थल भाग्यशाली बन जाता है (क्योंकि~ जिस हृदय में प्रभू की सिफत सलाह आ बसी~ उस में) प्रभू ने खुद सारे सुख~ सारे आनंद ला बसाए। 1। रहाउ। (हे भाई !) बिपता (सदा) उस हृदय में (बीतती रहती) है~ जिस में परमात्मा (के नाम) का सिमरन नहीं। जिस हृदय में परमात्मा के गुण गाए जाते हैं~ वहाँ करोड़ों ही आनंद हैं। 1। (हे भाई !) अगर मनुष्य को परमात्मा (का नाम) बिसर जाए~ तो उसे अनेकों दुख~ अनेकों रोग (आ घेरते हैं)। (पर) परमात्मा की सेवा-भक्ति करने से जम (मौत का भय) नजदीक नहीं फटकता (आत्मिक मौत नहीं आती)। 2। (हे भाई !) वह हृदय-स्थल भाग्यशाली है~ वह हृदय सदा अडोल रहता है~ जिस में परमात्मा का ही नाम जपा जाता है। 3। अब मैं जिधर जाता हूँ~ उधर मेरा मालिक-प्रभू मुझे अपने साथ दिखाई देता है (हे भाई !) सबके दिल की जानने वाला प्रभू (अपनी कृपा से मुझ) नानक को मिल गया है। 4। 89। 158।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜੋ ਪ੍ਰਾਣੀ ਗੋਵਿੰਦੁ ਧਿਆਵੈ ॥
ਪੜਿਆ ਅਣਪੜਿਆ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵੈ ॥੧॥
ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਸਿਮਰਿ ਗੋਪਾਲ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਝੂਠਾ ਧਨੁ ਮਾਲੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋ ਪ੍ਰਾਣੀ ਗੋਵਿੰਦੁ ਧਿਆਵੈ ॥
ਪੜਿਆ ਅਣਪੜਿਆ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵੈ ॥੧॥
ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਸਿਮਰਿ ਗੋਪਾਲ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਝੂਠਾ ਧਨੁ ਮਾਲੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
जो प्राणी गोविंदु धिआवै ॥
पड़िआ अणपड़िआ परम गति पावै ॥१॥
साधू संगि सिमरि गोपाल ॥
बिनु नावै झूठा धनु मालु ॥१॥ रहाउ ॥
जो प्राणी गोविंदु धिआवै ॥
पड़िआ अणपड़िआ परम गति पावै ॥१॥
साधू संगि सिमरि गोपाल ॥
बिनु नावै झूठा धनु मालु ॥१॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ जो मनुष्य गोबिंद प्रभू को अपने हृदय में याद करता रहता है~ वह चाहे विद्वान हो अथवा विद्या हीन~ वह सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है। 1। (हे भाई !) गुरू की संगति में (रह के) सृष्टि के पालणहार प्रभू (के नाम) का सिमरन किया कर। प्रभू के नाम के बिना और कोई धन और कोई चीज पक्का साथ निभाने वाली नहीं। 1। रहाउ।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 197 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
सर्दी के पहले हफ़्ते का पहला rajai का आना, और मन का बदलना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 197” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 198 →, पीछे का: ← अंग 196।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।