अंग
191
राग Gauree
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ਕਲਿ ਕਲੇਸ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਆਵਣ ਜਾਣ ਰਹੇ ਸੁਖ ਸਾਰੇ ॥੧॥
ਭੈ ਬਿਨਸੇ ਨਿਰਭਉ ਹਰਿ ਧਿਆਇਆ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਰਨ ਕਵਲ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਧਾਰੇ ॥
ਅਗਨਿ ਸਾਗਰ ਗੁਰਿ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੇ ॥੨॥
ਬੂਡਤ ਜਾਤ ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਕਾਢੇ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਟੂਟੇ ਗਾਢੇ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥
ਜਿਸੁ ਭੇਟਤ ਗਤਿ ਭਈ ਹਮਾਰੀ ॥੪॥੫੬॥੧੨੫॥
ਆਵਣ ਜਾਣ ਰਹੇ ਸੁਖ ਸਾਰੇ ॥੧॥
ਭੈ ਬਿਨਸੇ ਨਿਰਭਉ ਹਰਿ ਧਿਆਇਆ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਰਨ ਕਵਲ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਧਾਰੇ ॥
ਅਗਨਿ ਸਾਗਰ ਗੁਰਿ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੇ ॥੨॥
ਬੂਡਤ ਜਾਤ ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਕਾਢੇ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਟੂਟੇ ਗਾਢੇ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥
ਜਿਸੁ ਭੇਟਤ ਗਤਿ ਭਈ ਹਮਾਰੀ ॥੪॥੫੬॥੧੨੫॥
कलि कलेस गुर सबदि निवारे ॥
आवण जाण रहे सुख सारे ॥१॥
भै बिनसे निरभउ हरि धिआइआ ॥
साधसंगि हरि के गुण गाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
चरन कवल रिद अंतरि धारे ॥
अगनि सागर गुरि पारि उतारे ॥२॥
बूडत जात पूरै गुरि काढे ॥
जनम जनम के टूटे गाढे ॥३॥
कहु नानक तिसु गुर बलिहारी ॥
जिसु भेटत गति भई हमारी ॥४॥५६॥१२५॥
आवण जाण रहे सुख सारे ॥१॥
भै बिनसे निरभउ हरि धिआइआ ॥
साधसंगि हरि के गुण गाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
चरन कवल रिद अंतरि धारे ॥
अगनि सागर गुरि पारि उतारे ॥२॥
बूडत जात पूरै गुरि काढे ॥
जनम जनम के टूटे गाढे ॥३॥
कहु नानक तिसु गुर बलिहारी ॥
जिसु भेटत गति भई हमारी ॥४॥५६॥१२५॥
हिन्दी अर्थ: (साध-संगति में पहुँचे हुए जिन मनुष्यों के) मानसिक झगड़े और कलेश गुरू के शबद ने दूर कर दिए~ उनके जनम मरण के चक्कर खत्म हो गए~ उन्हें सारे सुख प्राप्त हो गए। 1। हे भाई ! उनके (दुनिया के सारे) डर दूर हो गए हैं जिन्होंने निर्भय हरी का ध्यान (अपने हृदय में) धारण किया है और साध-संगति में (जा के) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाए हैं। 1। रहाउ। (साध-संगति की बरकति से जिन मनुष्यों ने) परमात्मा के सुंदर चरण अपने दिल में बसा लिए~ गुरू ने उन्हें तृष्णा की आग के समुंद्र में से पार लंघा दिया। 2। (विकारों के समुंद्र में) डूब रहे मनुष्य को पूरे गुरू ने (बाँह से पकड़ के बाहर) निकाल लिया (और जब वे साध-संगति में पहुँच गए)~ उनको (परमात्मा से) अनेकों जन्मों से बिछुड़ों हुओं को (गुरू ने दुबारा परमात्मा के साथ) मिला दिया। 3। हे नानक ! कह, मैं उस गुरू से सदके जाता हूँ~ जिसको मिल के हमारी (जीवों की) उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है। 4। 56। 125।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਤਾ ਕੀ ਸਰਨੀ ਪਰਹੁ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਪਨਾ ਆਗੈ ਧਰਹੁ ॥੧॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਪੀਵਹੁ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਭ ਤਪਤਿ ਬੁਝਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਜਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ਜਨਮ ਮਰਣੁ ਨਿਵਾਰਹੁ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਦਾਸ ਕੇ ਚਰਣ ਨਮਸਕਾਰਹੁ ॥੨॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਪ੍ਰਭੁ ਮਨਹਿ ਸਮਾਲੇ ॥
ਸੋ ਧਨੁ ਸੰਚਹੁ ਜੋ ਚਾਲੈ ਨਾਲੇ ॥੩॥
ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਜਿਸੁ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੀ ਚਰਣੀ ਲਾਗੁ ॥੪॥੫੭॥੧੨੬॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਤਾ ਕੀ ਸਰਨੀ ਪਰਹੁ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਪਨਾ ਆਗੈ ਧਰਹੁ ॥੧॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਪੀਵਹੁ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਭ ਤਪਤਿ ਬੁਝਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਜਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ਜਨਮ ਮਰਣੁ ਨਿਵਾਰਹੁ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਦਾਸ ਕੇ ਚਰਣ ਨਮਸਕਾਰਹੁ ॥੨॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਪ੍ਰਭੁ ਮਨਹਿ ਸਮਾਲੇ ॥
ਸੋ ਧਨੁ ਸੰਚਹੁ ਜੋ ਚਾਲੈ ਨਾਲੇ ॥੩॥
ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਜਿਸੁ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੀ ਚਰਣੀ ਲਾਗੁ ॥੪॥੫੭॥੧੨੬॥
गउड़ी महला ५ ॥
साधसंगि ता की सरनी परहु ॥
मनु तनु अपना आगै धरहु ॥१॥
अंम्रित नामु पीवहु मेरे भाई ॥
सिमरि सिमरि सभ तपति बुझाई ॥१॥ रहाउ ॥
तजि अभिमानु जनम मरणु निवारहु ॥
हरि के दास के चरण नमसकारहु ॥२॥
सासि सासि प्रभु मनहि समाले ॥
सो धनु संचहु जो चालै नाले ॥३॥
तिसहि परापति जिसु मसतकि भागु ॥
कहु नानक ता की चरणी लागु ॥४॥५७॥१२६॥
साधसंगि ता की सरनी परहु ॥
मनु तनु अपना आगै धरहु ॥१॥
अंम्रित नामु पीवहु मेरे भाई ॥
सिमरि सिमरि सभ तपति बुझाई ॥१॥ रहाउ ॥
तजि अभिमानु जनम मरणु निवारहु ॥
हरि के दास के चरण नमसकारहु ॥२॥
सासि सासि प्रभु मनहि समाले ॥
सो धनु संचहु जो चालै नाले ॥३॥
तिसहि परापति जिसु मसतकि भागु ॥
कहु नानक ता की चरणी लागु ॥४॥५७॥१२६॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे मेरे भाई !) साध-संगति में जा के उस परमात्मा का आसरा ले। अपना मन अपना तन (अर्थात अपने हरेक ज्ञानेंद्रियों को) उस परमात्मा के हवाले कर दे। 1। हे मेरे वीर ! परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी (श्वास-श्वास परमात्मा का नाम सिमर। जिसने नाम सिमरा है) उसने सिमर सिमर के (अपने अंदर से विकारों की) सारी सड़न बुझा ली है। 1। रहाउ। (हे मेरे वीर !)अहंकार दूर करके जनम मरण के चक्कर समाप्त कर दे परमात्मा के सेवक के चरणों पे अपना सिर रख दे । 2। (हे मेरे भाई !) हरेक श्वास के साथ परमात्मा को अपने मन में संभाल के रख। वह (नाम-) धन इकट्ठा कर~ जो तेरे साथ निभे। 3। (पर ये नाम-धन इकट्ठा करना जीवों के वश की बात नहीं। ये नाम-धन) उस मनुष्य को ही मिलता है~ जिसके माथे पे भाग्य जागे। हे नानक ! कह, (हे मेरे भाई !) तू उस मनुष्य के चरणों में लग (जिसे नाम धन मिला हुआ है)। 4। 57। 126।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੂਕੇ ਹਰੇ ਕੀਏ ਖਿਨ ਮਾਹੇ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਸੰਚਿ ਜੀਵਾਏ ॥੧॥
ਕਾਟੇ ਕਸਟ ਪੂਰੇ ਗੁਰਦੇਵ ॥
ਸੇਵਕ ਕਉ ਦੀਨੀ ਅਪੁਨੀ ਸੇਵ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਿਟਿ ਗਈ ਚਿੰਤ ਪੁਨੀ ਮਨ ਆਸਾ ॥
ਕਰੀ ਦਇਆ ਸਤਿਗੁਰਿ ਗੁਣਤਾਸਾ ॥੨॥
ਦੁਖ ਨਾਠੇ ਸੁਖ ਆਇ ਸਮਾਏ ॥
ਢੀਲ ਨ ਪਰੀ ਜਾ ਗੁਰਿ ਫੁਰਮਾਏ ॥੩॥
ਇਛ ਪੁਨੀ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਮਿਲੇ ॥
ਨਾਨਕ ਤੇ ਜਨ ਸੁਫਲ ਫਲੇ ॥੪॥੫੮॥੧੨੭॥
ਸੂਕੇ ਹਰੇ ਕੀਏ ਖਿਨ ਮਾਹੇ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਸੰਚਿ ਜੀਵਾਏ ॥੧॥
ਕਾਟੇ ਕਸਟ ਪੂਰੇ ਗੁਰਦੇਵ ॥
ਸੇਵਕ ਕਉ ਦੀਨੀ ਅਪੁਨੀ ਸੇਵ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਿਟਿ ਗਈ ਚਿੰਤ ਪੁਨੀ ਮਨ ਆਸਾ ॥
ਕਰੀ ਦਇਆ ਸਤਿਗੁਰਿ ਗੁਣਤਾਸਾ ॥੨॥
ਦੁਖ ਨਾਠੇ ਸੁਖ ਆਇ ਸਮਾਏ ॥
ਢੀਲ ਨ ਪਰੀ ਜਾ ਗੁਰਿ ਫੁਰਮਾਏ ॥੩॥
ਇਛ ਪੁਨੀ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਮਿਲੇ ॥
ਨਾਨਕ ਤੇ ਜਨ ਸੁਫਲ ਫਲੇ ॥੪॥੫੮॥੧੨੭॥
गउड़ी महला ५ ॥
सूके हरे कीए खिन माहे ॥
अंम्रित द्रिसटि संचि जीवाए ॥१॥
काटे कसट पूरे गुरदेव ॥
सेवक कउ दीनी अपुनी सेव ॥१॥ रहाउ ॥
मिटि गई चिंत पुनी मन आसा ॥
करी दइआ सतिगुरि गुणतासा ॥२॥
दुख नाठे सुख आइ समाए ॥
ढील न परी जा गुरि फुरमाए ॥३॥
इछ पुनी पूरे गुर मिले ॥
नानक ते जन सुफल फले ॥४॥५८॥१२७॥
सूके हरे कीए खिन माहे ॥
अंम्रित द्रिसटि संचि जीवाए ॥१॥
काटे कसट पूरे गुरदेव ॥
सेवक कउ दीनी अपुनी सेव ॥१॥ रहाउ ॥
मिटि गई चिंत पुनी मन आसा ॥
करी दइआ सतिगुरि गुणतासा ॥२॥
दुख नाठे सुख आइ समाए ॥
ढील न परी जा गुरि फुरमाए ॥३॥
इछ पुनी पूरे गुर मिले ॥
नानक ते जन सुफल फले ॥४॥५८॥१२७॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ आत्मिक जीवन देने वाली निगाह करके गुरू नाम-जल से सींच के जिन्हें आत्मिक जीवन देता है~ उन आत्मिक जीवन के रस से वंचित हो चुके मनुष्यों को गुरू एक छिन में हरे (भाव~ आत्मिक जीवन वाले) बना देता है। 1। पूरे गुरू ने उसके सारे कष्ट काट दिए जिस सेवक को (परमात्मा ने) अपनी सेवा-भक्ति (की दाति) दी।। 1। रहाउ। उसकी (हरेक किस्म की) चिंता मिट गई~ उसके मन की (हरेक) आस पूरी हो गई गुणों के खजाने सतिगुरू ने जिस मनुष्य पर मेहर की। 2। उसके सारे दुख दूर हो गए~ उसके अंदर (सारे) सुख आ के टिक गए जब गुरू ने जिस मनुष्य पर बख्शिश होने का हुकम किया~ थोड़ी सी भी ढील ना हुई ।3 । हे नानक ! जो मनुष्य पूरे गुरू से मिल गए~ उनकी (हरेक किस्म की) इच्छा पूरी हो गई~ उन्हें उच्च आत्मिक गुणों के सुंदर फल लग गए। 4। 58। 127।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤਾਪ ਗਏ ਪਾਈ ਪ੍ਰਭਿ ਸਾਂਤਿ ॥
ਸੀਤਲ ਭਏ ਕੀਨੀ ਪ੍ਰਭ ਦਾਤਿ ॥੧॥
ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਭਏ ਸੁਹੇਲੇ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਬਿਛੁਰੇ ਮੇਲੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਿਮਰਤ ਸਿਮਰਤ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਨਾਉ ॥
ਸਗਲ ਰੋਗ ਕਾ ਬਿਨਸਿਆ ਥਾਉ ॥੨॥
ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ਬੋਲੈ ਹਰਿ ਬਾਣੀ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਪ੍ਰਭ ਸਿਮਰਹੁ ਪ੍ਰਾਣੀ ॥੩॥
ਦੂਖੁ ਦਰਦੁ ਜਮੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੋ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਵੈ ॥੪॥੫੯॥੧੨੮॥
ਤਾਪ ਗਏ ਪਾਈ ਪ੍ਰਭਿ ਸਾਂਤਿ ॥
ਸੀਤਲ ਭਏ ਕੀਨੀ ਪ੍ਰਭ ਦਾਤਿ ॥੧॥
ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਭਏ ਸੁਹੇਲੇ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਬਿਛੁਰੇ ਮੇਲੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਿਮਰਤ ਸਿਮਰਤ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਨਾਉ ॥
ਸਗਲ ਰੋਗ ਕਾ ਬਿਨਸਿਆ ਥਾਉ ॥੨॥
ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ਬੋਲੈ ਹਰਿ ਬਾਣੀ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਪ੍ਰਭ ਸਿਮਰਹੁ ਪ੍ਰਾਣੀ ॥੩॥
ਦੂਖੁ ਦਰਦੁ ਜਮੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੋ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਵੈ ॥੪॥੫੯॥੧੨੮॥
गउड़ी महला ५ ॥
ताप गए पाई प्रभि सांति ॥
सीतल भए कीनी प्रभ दाति ॥१॥
प्रभ किरपा ते भए सुहेले ॥
जनम जनम के बिछुरे मेले ॥१॥ रहाउ ॥
सिमरत सिमरत प्रभ का नाउ ॥
सगल रोग का बिनसिआ थाउ ॥२॥
सहजि सुभाइ बोलै हरि बाणी ॥
आठ पहर प्रभ सिमरहु प्राणी ॥३॥
दूखु दरदु जमु नेड़ि न आवै ॥
कहु नानक जो हरि गुन गावै ॥४॥५९॥१२८॥
ताप गए पाई प्रभि सांति ॥
सीतल भए कीनी प्रभ दाति ॥१॥
प्रभ किरपा ते भए सुहेले ॥
जनम जनम के बिछुरे मेले ॥१॥ रहाउ ॥
सिमरत सिमरत प्रभ का नाउ ॥
सगल रोग का बिनसिआ थाउ ॥२॥
सहजि सुभाइ बोलै हरि बाणी ॥
आठ पहर प्रभ सिमरहु प्राणी ॥३॥
दूखु दरदु जमु नेड़ि न आवै ॥
कहु नानक जो हरि गुन गावै ॥४॥५९॥१२८॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ परमात्मा ने उनके अंदर ऐसी ठण्ड समा दी होती है कि उनके सारे ताप-कलेश दूर हो जाते हैं जिन्हें परमात्मा अपने नाम की दाति देता है वे ठंडे जिगरे वाले बन जाते हैं।। 1। (जिन मनुष्यों को परमात्मा अपने नाम की दाति देता है वह मनुष्य) परमात्मा की कृपा से आसान (जीवन वाले) हो जाते हैं~ उनको अनेक जन्मों के विछुड़ों को परमात्मा (अपने साथ) मिला लेता है। 1। रहाउ। (जिन्हें परमात्मा अपने नाम की दाति देता है) परमात्मा का नाम सिमर सिमर के (उनके अंदर से) सारे रोगों के निशान ही मिट जाते हैं। 2। (जिस मनुष्य को परमात्मा नाम की दाति देता है वह) आत्मिक अडोलता में टिक के प्रेम-प्यार में लीन हो के परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी उचारता रहता है। हे प्राणी ! (तू भी उसके दर से नाम की दाति माँग~ और) आठों पहर प्रभू का नाम सिमरता रह। 3। कोई दुख दर्द उसके नजदीक नहीं आता~ उसे मौत का डर नहीं छूता (आत्मिक मौत का उसे खतरा नहीं रह जाता हे नानक ! कह, (परमात्मा की मेहर से) जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता रहता है। )। 4। 59। 128।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਭਲੇ ਦਿਨਸ ਭਲੇ ਸੰਜੋਗ ॥
ਜਿਤੁ ਭੇਟੇ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਨਿਰਜੋਗ ॥੧॥
ਓਹ ਬੇਲਾ ਕਉ ਹਉ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
ਜਿਤੁ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਜਪੈ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਫਲ ਮੂਰਤੁ ਸਫਲ ਓਹ ਘਰੀ ॥
ਜਿਤੁ ਰਸਨਾ ਉਚਰੈ ਹਰਿ ਹਰੀ ॥੨॥
ਸਫਲੁ ਓਹੁ ਮਾਥਾ ਸੰਤ ਨਮਸਕਾਰਸਿ ॥
ਚਰਣ ਪੁਨੀਤ ਚਲਹਿ ਹਰਿ ਮਾਰਗਿ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਭਲਾ ਮੇਰਾ ਕਰਮ ॥
ਜਿਤੁ ਭੇਟੇ ਸਾਧੂ ਕੇ ਚਰਨ ॥੪॥੬੦॥੧੨੯॥
ਭਲੇ ਦਿਨਸ ਭਲੇ ਸੰਜੋਗ ॥
ਜਿਤੁ ਭੇਟੇ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਨਿਰਜੋਗ ॥੧॥
ਓਹ ਬੇਲਾ ਕਉ ਹਉ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
ਜਿਤੁ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਜਪੈ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਫਲ ਮੂਰਤੁ ਸਫਲ ਓਹ ਘਰੀ ॥
ਜਿਤੁ ਰਸਨਾ ਉਚਰੈ ਹਰਿ ਹਰੀ ॥੨॥
ਸਫਲੁ ਓਹੁ ਮਾਥਾ ਸੰਤ ਨਮਸਕਾਰਸਿ ॥
ਚਰਣ ਪੁਨੀਤ ਚਲਹਿ ਹਰਿ ਮਾਰਗਿ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਭਲਾ ਮੇਰਾ ਕਰਮ ॥
ਜਿਤੁ ਭੇਟੇ ਸਾਧੂ ਕੇ ਚਰਨ ॥੪॥੬੦॥੧੨੯॥
गउड़ी महला ५ ॥
भले दिनस भले संजोग ॥
जितु भेटे पारब्रहम निरजोग ॥१॥
ओह बेला कउ हउ बलि जाउ ॥
जितु मेरा मनु जपै हरि नाउ ॥१॥ रहाउ ॥
सफल मूरतु सफल ओह घरी ॥
जितु रसना उचरै हरि हरी ॥२॥
सफलु ओहु माथा संत नमसकारसि ॥
चरण पुनीत चलहि हरि मारगि ॥३॥
कहु नानक भला मेरा करम ॥
जितु भेटे साधू के चरन ॥४॥६०॥१२९॥
भले दिनस भले संजोग ॥
जितु भेटे पारब्रहम निरजोग ॥१॥
ओह बेला कउ हउ बलि जाउ ॥
जितु मेरा मनु जपै हरि नाउ ॥१॥ रहाउ ॥
सफल मूरतु सफल ओह घरी ॥
जितु रसना उचरै हरि हरी ॥२॥
सफलु ओहु माथा संत नमसकारसि ॥
चरण पुनीत चलहि हरि मारगि ॥३॥
कहु नानक भला मेरा करम ॥
जितु भेटे साधू के चरन ॥४॥६०॥१२९॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) वे दिन सुहावने होते हैं~ वे मिलाप के अवसर सुखदायक होते हैं जब (माया से) निर्लिप प्रभू जी मिल जाते हैं। 1। अर्थ: (हे भाई !) मैं उस समय से कुर्बान जाता हूँ जिस समय मेरा मन परमात्मा का नाम जपता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) मनुष्य के लिए वह महूरत भाग्यशाली होता है~ वह घड़ी अनमोल होती है जब उसकी जीभ परमात्मा का नाम उचारती है। 2। (हे भाई !) वह माथा भी भाग्यशाली है~ जो गुरू-संत के चरणों में झुकता है। वह पैर पवित्र हो जाते हैं जो परमात्मा (के मिलाप) के रास्ते पर चलते हैं। 3। हे नानक ! कह,मेरे बड़े भाग्य (जाग पड़ते हैं) जब मैं गुरू के चरण परसता हूँ। 4। 60। 128।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 191 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Civil Services के interview के बाद का wait, घर का माहौल।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 191” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 192 →, पीछे का: ← अंग 190।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।