अंग
242
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਰੰਗ ਸੰਗਿ ਬਿਖਿਆ ਕੇ ਭੋਗਾ ਇਨ ਸੰਗਿ ਅੰਧ ਨ ਜਾਨੀ ॥੧॥
ਹਉ ਸੰਚਉ ਹਉ ਖਾਟਤਾ ਸਗਲੀ ਅਵਧ ਬਿਹਾਨੀ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਉ ਸੂਰਾ ਪਰਧਾਨੁ ਹਉ ਕੋ ਨਾਹੀ ਮੁਝਹਿ ਸਮਾਨੀ ॥੨॥
ਜੋਬਨਵੰਤ ਅਚਾਰ ਕੁਲੀਨਾ ਮਨ ਮਹਿ ਹੋਇ ਗੁਮਾਨੀ ॥੩॥
ਜਿਉ ਉਲਝਾਇਓ ਬਾਧ ਬੁਧਿ ਕਾ ਮਰਤਿਆ ਨਹੀ ਬਿਸਰਾਨੀ ॥੪॥
ਭਾਈ ਮੀਤ ਬੰਧਪ ਸਖੇ ਪਾਛੇ ਤਿਨਹੂ ਕਉ ਸੰਪਾਨੀ ॥੫॥
ਜਿਤੁ ਲਾਗੋ ਮਨੁ ਬਾਸਨਾ ਅੰਤਿ ਸਾਈ ਪ੍ਰਗਟਾਨੀ ॥੬॥
ਅਹੰਬੁਧਿ ਸੁਚਿ ਕਰਮ ਕਰਿ ਇਹ ਬੰਧਨ ਬੰਧਾਨੀ ॥੭॥
ਦਇਆਲ ਪੁਰਖ ਕਿਰਪਾ ਕਰਹੁ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਦਸਾਨੀ ॥੮॥੩॥੧੫॥੪੪॥ ਜੁਮਲਾ
ਰੰਗ ਸੰਗਿ ਬਿਖਿਆ ਕੇ ਭੋਗਾ ਇਨ ਸੰਗਿ ਅੰਧ ਨ ਜਾਨੀ ॥੧॥
ਹਉ ਸੰਚਉ ਹਉ ਖਾਟਤਾ ਸਗਲੀ ਅਵਧ ਬਿਹਾਨੀ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਉ ਸੂਰਾ ਪਰਧਾਨੁ ਹਉ ਕੋ ਨਾਹੀ ਮੁਝਹਿ ਸਮਾਨੀ ॥੨॥
ਜੋਬਨਵੰਤ ਅਚਾਰ ਕੁਲੀਨਾ ਮਨ ਮਹਿ ਹੋਇ ਗੁਮਾਨੀ ॥੩॥
ਜਿਉ ਉਲਝਾਇਓ ਬਾਧ ਬੁਧਿ ਕਾ ਮਰਤਿਆ ਨਹੀ ਬਿਸਰਾਨੀ ॥੪॥
ਭਾਈ ਮੀਤ ਬੰਧਪ ਸਖੇ ਪਾਛੇ ਤਿਨਹੂ ਕਉ ਸੰਪਾਨੀ ॥੫॥
ਜਿਤੁ ਲਾਗੋ ਮਨੁ ਬਾਸਨਾ ਅੰਤਿ ਸਾਈ ਪ੍ਰਗਟਾਨੀ ॥੬॥
ਅਹੰਬੁਧਿ ਸੁਚਿ ਕਰਮ ਕਰਿ ਇਹ ਬੰਧਨ ਬੰਧਾਨੀ ॥੭॥
ਦਇਆਲ ਪੁਰਖ ਕਿਰਪਾ ਕਰਹੁ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਦਸਾਨੀ ॥੮॥੩॥੧੫॥੪੪॥ ਜੁਮਲਾ
गउड़ी महला ५ ॥
रंग संगि बिखिआ के भोगा इन संगि अंध न जानी ॥१॥
हउ संचउ हउ खाटता सगली अवध बिहानी ॥ रहाउ ॥
हउ सूरा परधानु हउ को नाही मुझहि समानी ॥२॥
जोबनवंत अचार कुलीना मन महि होइ गुमानी ॥३॥
जिउ उलझाइओ बाध बुधि का मरतिआ नही बिसरानी ॥४॥
भाई मीत बंधप सखे पाछे तिनहू कउ संपानी ॥५॥
जितु लागो मनु बासना अंति साई प्रगटानी ॥६॥
अहंबुधि सुचि करम करि इह बंधन बंधानी ॥७॥
दइआल पुरख किरपा करहु नानक दास दसानी ॥८॥३॥१५॥४४॥ जुमला
रंग संगि बिखिआ के भोगा इन संगि अंध न जानी ॥१॥
हउ संचउ हउ खाटता सगली अवध बिहानी ॥ रहाउ ॥
हउ सूरा परधानु हउ को नाही मुझहि समानी ॥२॥
जोबनवंत अचार कुलीना मन महि होइ गुमानी ॥३॥
जिउ उलझाइओ बाध बुधि का मरतिआ नही बिसरानी ॥४॥
भाई मीत बंधप सखे पाछे तिनहू कउ संपानी ॥५॥
जितु लागो मनु बासना अंति साई प्रगटानी ॥६॥
अहंबुधि सुचि करम करि इह बंधन बंधानी ॥७॥
दइआल पुरख किरपा करहु नानक दास दसानी ॥८॥३॥१५॥४४॥ जुमला
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ मौजों से माया के भोग (मनुष्य भोगता रहता है)। (माया के मोह में) अंधा हुआ मनुष्य इन भोगों में खचित हुआ समझता नहीं (कि उम्र व्यर्थ गुजर रही है)। 1। मैं माया जोड़ रहा हूँ। मैं माया कमाता हूँ- (इन ही ख्यालों में अंधे हुए मनुष्य की) सारी ही उम्र गुजर जाती है। 1। रहाउ। मैं शूरवीर हूँ। मैं चौधरी हूँ। कोई मेरे बराबर का नहीं।2। मैं सुंदर हूँ। मैं ऊँचे आचरण वाला हूँ। मैं ऊँचे कुल वाला हूँ – (माया के मोह में अंधा हुआ मनुष्य अपने) मन में इस प्रकार अहंकारी होता है। 3। (माया के मोह में) मारी हुई मति वाला मनुष्य जैसे (जवानी के समय माया के मोह में) फंसा रहता है। मरने के वक्त भी उसे यह माया नहीं भूलती 4। भाई, मित्र, रिश्तेदार, साथी- मरने के पीछे आखिर इनको ही (अपनी सारी उम्र की इकट्ठी की हुई माया) सौंप जाता है। 5। जिस वासना में मनुष्य का मन (सारी उम्र) लगा रहता है। आखिर मौत के समय वही वासना जोर डालती है। 6। अहंकार के आसरे (शारीरिक पवित्रता के तीर्थ-स्नान आदि मिहित धार्मिक) कर्म कर कर के इनके बंधनों में बंधा रहता है। 7। हे नानक ! (प्रार्थना कर और कह,) हे दया के घर सर्व-व्यापक प्रभू ! मेरे पर कृपा कर। मुझे अपने दासों का दास (बनाए रख। और मुझे इन अहंकार के बंधनों से बचाए रख)। 8। 3। 15। 44। जुमला,
ੴ ਸਤਿਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਗੁਰਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਪੂਰਬੀ ਛੰਤ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਮੁੰਧ ਰੈਣਿ ਦੁਹੇਲੜੀਆ ਜੀਉ ਨੀਦ ਨ ਆਵੈ ॥
ਸਾ ਧਨ ਦੁਬਲੀਆ ਜੀਉ ਪਿਰ ਕੈ ਹਾਵੈ ॥
ਧਨ ਥੀਈ ਦੁਬਲਿ ਕੰਤ ਹਾਵੈ ਕੇਵ ਨੈਣੀ ਦੇਖਏ ॥
ਸੀਗਾਰ ਮਿਠ ਰਸ ਭੋਗ ਭੋਜਨ ਸਭੁ ਝੂਠੁ ਕਿਤੈ ਨ ਲੇਖਏ ॥
ਮੈ ਮਤ ਜੋਬਨਿ ਗਰਬਿ ਗਾਲੀ ਦੁਧਾ ਥਣੀ ਨ ਆਵਏ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾ ਧਨ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਈ ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਨੀਦ ਨ ਆਵਏ ॥੧॥
ਮੁੰਧ ਨਿਮਾਨੜੀਆ ਜੀਉ ਬਿਨੁ ਧਨੀ ਪਿਆਰੇ ॥
ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈਗੀ ਬਿਨੁ ਉਰ ਧਾਰੇ ॥
ਨਾਹ ਬਿਨੁ ਘਰ ਵਾਸੁ ਨਾਹੀ ਪੁਛਹੁ ਸਖੀ ਸਹੇਲੀਆ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਮ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਆਰੁ ਨਾਹੀ ਵਸਹਿ ਸਾਚਿ ਸੁਹੇਲੀਆ ॥ ਸਚੁ ਮਨਿ ਸਜਨ ਸੰਤੋਖਿ ਮੇਲਾ ਗੁਰਮਤੀ ਸਹੁ ਜਾਣਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਛੋਡੈ ਸਾ ਧਨ ਨਾਮਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਣੀਆ ॥੨॥
ਮਿਲੁ ਸਖੀ ਸਹੇਲੜੀਹੋ ਹਮ ਪਿਰੁ ਰਾਵੇਹਾ ॥
ਗੁਰ ਪੁਛਿ ਲਿਖਉਗੀ ਜੀਉ ਸਬਦਿ ਸਨੇਹਾ ॥
ਸਬਦੁ ਸਾਚਾ ਗੁਰਿ ਦਿਖਾਇਆ ਮਨਮੁਖੀ ਪਛੁਤਾਣੀਆ ॥
ਨਿਕਸਿ ਜਾਤਉ ਰਹੈ ਅਸਥਿਰੁ ਜਾਮਿ ਸਚੁ ਪਛਾਣਿਆ ॥
ਸਾਚ ਕੀ ਮਤਿ ਸਦਾ ਨਉਤਨ ਸਬਦਿ ਨੇਹੁ ਨਵੇਲਓ ॥
ਨਾਨਕ ਨਦਰੀ ਸਹਜਿ ਸਾਚਾ ਮਿਲਹੁ ਸਖੀ ਸਹੇਲੀਹੋ ॥੩॥
ਮੇਰੀ ਇਛ ਪੁਨੀ ਜੀਉ ਹਮ ਘਰਿ ਸਾਜਨੁ ਆਇਆ ॥
ਮਿਲਿ ਵਰੁ ਨਾਰੀ ਮੰਗਲੁ ਗਾਇਆ ॥
ਗੁਣ ਗਾਇ ਮੰਗਲੁ ਪ੍ਰੇਮਿ ਰਹਸੀ ਮੁੰਧ ਮਨਿ ਓਮਾਹਓ ॥
ਸਾਜਨ ਰਹੰਸੇ ਦੁਸਟ ਵਿਆਪੇ ਸਾਚੁ ਜਪਿ ਸਚੁ ਲਾਹਓ ॥
ਕਰ ਜੋੜਿ ਸਾ ਧਨ ਕਰੈ ਬਿਨਤੀ ਰੈਣਿ ਦਿਨੁ ਰਸਿ ਭਿੰਨੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਪਿਰੁ ਧਨ ਕਰਹਿ ਰਲੀਆ ਇਛ ਮੇਰੀ ਪੁੰਨੀਆ ॥੪॥੧॥
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਪੂਰਬੀ ਛੰਤ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਮੁੰਧ ਰੈਣਿ ਦੁਹੇਲੜੀਆ ਜੀਉ ਨੀਦ ਨ ਆਵੈ ॥
ਸਾ ਧਨ ਦੁਬਲੀਆ ਜੀਉ ਪਿਰ ਕੈ ਹਾਵੈ ॥
ਧਨ ਥੀਈ ਦੁਬਲਿ ਕੰਤ ਹਾਵੈ ਕੇਵ ਨੈਣੀ ਦੇਖਏ ॥
ਸੀਗਾਰ ਮਿਠ ਰਸ ਭੋਗ ਭੋਜਨ ਸਭੁ ਝੂਠੁ ਕਿਤੈ ਨ ਲੇਖਏ ॥
ਮੈ ਮਤ ਜੋਬਨਿ ਗਰਬਿ ਗਾਲੀ ਦੁਧਾ ਥਣੀ ਨ ਆਵਏ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾ ਧਨ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਈ ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਨੀਦ ਨ ਆਵਏ ॥੧॥
ਮੁੰਧ ਨਿਮਾਨੜੀਆ ਜੀਉ ਬਿਨੁ ਧਨੀ ਪਿਆਰੇ ॥
ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈਗੀ ਬਿਨੁ ਉਰ ਧਾਰੇ ॥
ਨਾਹ ਬਿਨੁ ਘਰ ਵਾਸੁ ਨਾਹੀ ਪੁਛਹੁ ਸਖੀ ਸਹੇਲੀਆ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਮ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਆਰੁ ਨਾਹੀ ਵਸਹਿ ਸਾਚਿ ਸੁਹੇਲੀਆ ॥ ਸਚੁ ਮਨਿ ਸਜਨ ਸੰਤੋਖਿ ਮੇਲਾ ਗੁਰਮਤੀ ਸਹੁ ਜਾਣਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਛੋਡੈ ਸਾ ਧਨ ਨਾਮਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਣੀਆ ॥੨॥
ਮਿਲੁ ਸਖੀ ਸਹੇਲੜੀਹੋ ਹਮ ਪਿਰੁ ਰਾਵੇਹਾ ॥
ਗੁਰ ਪੁਛਿ ਲਿਖਉਗੀ ਜੀਉ ਸਬਦਿ ਸਨੇਹਾ ॥
ਸਬਦੁ ਸਾਚਾ ਗੁਰਿ ਦਿਖਾਇਆ ਮਨਮੁਖੀ ਪਛੁਤਾਣੀਆ ॥
ਨਿਕਸਿ ਜਾਤਉ ਰਹੈ ਅਸਥਿਰੁ ਜਾਮਿ ਸਚੁ ਪਛਾਣਿਆ ॥
ਸਾਚ ਕੀ ਮਤਿ ਸਦਾ ਨਉਤਨ ਸਬਦਿ ਨੇਹੁ ਨਵੇਲਓ ॥
ਨਾਨਕ ਨਦਰੀ ਸਹਜਿ ਸਾਚਾ ਮਿਲਹੁ ਸਖੀ ਸਹੇਲੀਹੋ ॥੩॥
ਮੇਰੀ ਇਛ ਪੁਨੀ ਜੀਉ ਹਮ ਘਰਿ ਸਾਜਨੁ ਆਇਆ ॥
ਮਿਲਿ ਵਰੁ ਨਾਰੀ ਮੰਗਲੁ ਗਾਇਆ ॥
ਗੁਣ ਗਾਇ ਮੰਗਲੁ ਪ੍ਰੇਮਿ ਰਹਸੀ ਮੁੰਧ ਮਨਿ ਓਮਾਹਓ ॥
ਸਾਜਨ ਰਹੰਸੇ ਦੁਸਟ ਵਿਆਪੇ ਸਾਚੁ ਜਪਿ ਸਚੁ ਲਾਹਓ ॥
ਕਰ ਜੋੜਿ ਸਾ ਧਨ ਕਰੈ ਬਿਨਤੀ ਰੈਣਿ ਦਿਨੁ ਰਸਿ ਭਿੰਨੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਪਿਰੁ ਧਨ ਕਰਹਿ ਰਲੀਆ ਇਛ ਮੇਰੀ ਪੁੰਨੀਆ ॥੪॥੧॥
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥
रागु गउड़ी पूरबी छंत महला १ ॥
मुंध रैणि दुहेलड़ीआ जीउ नीद न आवै ॥
सा धन दुबलीआ जीउ पिर कै हावै ॥
धन थीई दुबलि कंत हावै केव नैणी देखए ॥
सीगार मिठ रस भोग भोजन सभु झूठु कितै न लेखए ॥
मै मत जोबनि गरबि गाली दुधा थणी न आवए ॥
नानक सा धन मिलै मिलाई बिनु पिर नीद न आवए ॥१॥
मुंध निमानड़ीआ जीउ बिनु धनी पिआरे ॥
किउ सुखु पावैगी बिनु उर धारे ॥
नाह बिनु घर वासु नाही पुछहु सखी सहेलीआ ॥
बिनु नाम प्रीति पिआरु नाही वसहि साचि सुहेलीआ ॥ सचु मनि सजन संतोखि मेला गुरमती सहु जाणिआ ॥
नानक नामु न छोडै सा धन नामि सहजि समाणीआ ॥२॥
मिलु सखी सहेलड़ीहो हम पिरु रावेहा ॥
गुर पुछि लिखउगी जीउ सबदि सनेहा ॥
सबदु साचा गुरि दिखाइआ मनमुखी पछुताणीआ ॥
निकसि जातउ रहै असथिरु जामि सचु पछाणिआ ॥
साच की मति सदा नउतन सबदि नेहु नवेलओ ॥
नानक नदरी सहजि साचा मिलहु सखी सहेलीहो ॥३॥
मेरी इछ पुनी जीउ हम घरि साजनु आइआ ॥
मिलि वरु नारी मंगलु गाइआ ॥
गुण गाइ मंगलु प्रेमि रहसी मुंध मनि ओमाहओ ॥
साजन रहंसे दुसट विआपे साचु जपि सचु लाहओ ॥
कर जोड़ि सा धन करै बिनती रैणि दिनु रसि भिंनीआ ॥
नानक पिरु धन करहि रलीआ इछ मेरी पुंनीआ ॥४॥१॥
रागु गउड़ी पूरबी छंत महला १ ॥
मुंध रैणि दुहेलड़ीआ जीउ नीद न आवै ॥
सा धन दुबलीआ जीउ पिर कै हावै ॥
धन थीई दुबलि कंत हावै केव नैणी देखए ॥
सीगार मिठ रस भोग भोजन सभु झूठु कितै न लेखए ॥
मै मत जोबनि गरबि गाली दुधा थणी न आवए ॥
नानक सा धन मिलै मिलाई बिनु पिर नीद न आवए ॥१॥
मुंध निमानड़ीआ जीउ बिनु धनी पिआरे ॥
किउ सुखु पावैगी बिनु उर धारे ॥
नाह बिनु घर वासु नाही पुछहु सखी सहेलीआ ॥
बिनु नाम प्रीति पिआरु नाही वसहि साचि सुहेलीआ ॥ सचु मनि सजन संतोखि मेला गुरमती सहु जाणिआ ॥
नानक नामु न छोडै सा धन नामि सहजि समाणीआ ॥२॥
मिलु सखी सहेलड़ीहो हम पिरु रावेहा ॥
गुर पुछि लिखउगी जीउ सबदि सनेहा ॥
सबदु साचा गुरि दिखाइआ मनमुखी पछुताणीआ ॥
निकसि जातउ रहै असथिरु जामि सचु पछाणिआ ॥
साच की मति सदा नउतन सबदि नेहु नवेलओ ॥
नानक नदरी सहजि साचा मिलहु सखी सहेलीहो ॥३॥
मेरी इछ पुनी जीउ हम घरि साजनु आइआ ॥
मिलि वरु नारी मंगलु गाइआ ॥
गुण गाइ मंगलु प्रेमि रहसी मुंध मनि ओमाहओ ॥
साजन रहंसे दुसट विआपे साचु जपि सचु लाहओ ॥
कर जोड़ि सा धन करै बिनती रैणि दिनु रसि भिंनीआ ॥
नानक पिरु धन करहि रलीआ इछ मेरी पुंनीआ ॥४॥१॥
हिन्दी अर्थ: ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥ रागु गउड़ी पूरबी छंत महला १ ॥ पति के विछोड़े के हहुके में जवान सुंदर स्त्री की रात दुख में (बीतती है)।, उसे नींद नहीं आती। और सिसकते हुए (हहुकों में) वह कमजोर होती जाती है। स्त्री पति के (विछोड़े के) हहुके में (दिनों दिन) कमजोर होती जाती है (वह हर वक्त चाहत रखती है कि) वह किसी तरह (अपने) पति को आँखों से देखे। उसे (शारीरिक) श्रंृगार व मीठे रसों का भोग – ये सब कुछ फीका लगता है। उसे ये सब कुछ बेअर्थ दिखता है। जिस स्त्री को जवानी में अहंकार ने गला दिया हो जो जवानी के नशे में ऐसे मस्त हो। जैसे शराब में मस्त हो। (उसे अपने पति का मिलाप नसीब नहीं होता और) उसे सुहाग-भाग वाली अवस्था नसीब नहीं होती। हे नानक ! (यही हाल होता है उस जीव-स्त्री का। जो दुनिया के झूठे गुमान में मस्त रहती है। उसे) सारी जिंदगी-रूपी रात में आत्मिक शांति प्राप्त नहीं होती। वह तभी प्रभू पति से मिल सकती है। जब (गुरू विचौला। माध्यम बन के उसे प्रभू-चरणों में) मिला दे। 1। प्यारे पति के मिलाप के बिना युवती पस्त-हौसलों में ही रहती है। अगर पति उसे अपनी छाती से ना लगाए। तो उसे सुख महिसूस नहीं हो सकता। पति के बिना घर नहीं बस सकता। (अगर) और सखियों-सहेलयों को पूछोगे (तो वो भी यही उत्तर देंगी)। (प्यारे पति-प्रभू के मिलाप के बिना जीव-स्त्री मुरझाई ही रहती है। जब तक वह पति प्रभू को अपने हृदय में नहीं बसाती। उसे आत्मिक आनंद नहीं मिल सकता । पति-प्रभू के मिलाप के बिना हृदय में आत्मिक गुणों का वास नहीं हो सकता। सत्संगी सहेलियों को पूछ कर देखो। वे यही उत्तर देंगी कि) प्रभू का नाम जपे बिना उसकी प्रीति उसका प्यार प्राप्त नहीं हो सकता। वही जीव-दुल्हनें सुखी बस सकती हैं। जो सदा स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ती हैं। गुरू की मति लेकर जिस जीव-स्त्री के मन में सदा स्थिर प्रभू का नाम बसता है। जो संतोष में (जीती है)। उसे सज्जन प्रभू का मिलाप प्राप्त हो जाता है। वह पति प्रभू को (अंग-संग) जान लेती है। हे नानक ! वह जीव-स्त्री प्रभू का नाम (जपना) नहीं छोड़ती। प्रभू के नाम में जुड़ के वह आत्मिक अडोलता में टिकी रहती है। 2। हे (सत्संगी) सहेलियो ! आओ मिल बैठें और हम (मिल के) पति प्रभू का भजन करें। (सत्संगति में बैठ के) गुरू की शिक्षा ले के हे सहेलियो ! मैं गुरू के शबद के द्वारा पति-प्रभू को संदेश भेजूँगी (कि आ के मिल)। (जिस जीव-स्त्री को) गुरू ने अपना शबद बख्शा। उसे उसने सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा (अंग-संग) दिखा दिया। पर अपने मन के पीछे चलने वाली पूछती ही रहती हैं। (जिसे गुरू ने शबद की दाति दी। शबद की बरकति से) जब उस ने सदा स्थिर प्रभू को (अंग-संग) पहिचान लिया। तब उसका बाहर (माया के पीछे) दौड़ता मन टिक जाता है। जिस जीव-स्त्री के अंदर सदा स्थिर प्रभू टिक जाता है। उसकी मति सदा नई-नरोई रहती है (कभी विकारों से मैली नहीं होती)। शबद की बरकति से उसके अंदर प्रभू के वास्ते नित्य नया प्यार बना रहता है। हे नानक ! सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू अपनी मेहर की निगाह से उस जीव-स्त्री को आत्मिक अडोलता में टिकाए रखता है। हे सत्संगी सहेलियो ! आओ मिल के बैठें और प्रभू की सिफत सालाह करें। 3। हे सहेलियो ! मेरी मनो कामना पूरी हो गई है। मेरे हृदय घर में सज्जन परमात्मा आ बसा है। जिस जीव-स्त्री को पति-प्रभू मिल जाता है उसकी ज्ञानेंद्रियां (विकारों की तरफ दौड़ने की बजाए मिल के जैसे) खुशी के गीत गाती हैं। प्रभू की सिफत सालाह के गीत गा के जीव-स्त्री प्रभू-प्यार के (उत्साह) में खिल पड़ती है। उसके मन में उत्साह की उमंग पैदा हो जाती है। उसके अंदर अच्छे गुण प्रफुल्लित होते हैं। दुष्टता भरे विकार दब जाते हैं। सदा स्थिर नाम जप-जप के उसे अटल आत्मिक जीवन का लाभ मिल जाता है। वह जीव-स्त्री दिन-रात प्रभू के प्यार रस में भीगी हुई हाथ जोड़ के प्रभू-पति के दर पर अरदासें करती रहती है। हे नानक ! प्रभू पति और वह जीव-स्त्री (जीव-स्त्री की हृदय सेज पर) मिल के आत्मिक आनंद लेते हैं। हे सहेलियो ! मेरी मनो-कामना पूरी हो गई है (मेरे हृदय घर में सज्जन प्रभू आ बसा है)। 4। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 242 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
startup की 14-घंटे की रात, founder अकेले laptop पर।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 242” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 243 →, पीछे का: ← अंग 241।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।