डर कोई कमज़ोरी नहीं, एक संकेत है। वह बताता है कि सामने कुछ बड़ा है, और हमारे पास उससे मिलने का पूरा नक़्शा अभी नहीं। इस रास्ते की कथाएँ डर को झुठलाती नहीं, वे उसके आर-पार जाने का ढंग दिखाती हैं, क़दम-दर-क़दम।
यहाँ हम एक हाथी को देखेंगे जो मौत के जबड़े में फँसकर पुकारता है, एक बालक को जो आग और तलवार के बीच अडिग रहता है, और एक वानर को जो अकेले समुद्र लाँघ जाता है। हर कथा में डर पहले आता है और साहस बाद में, ठीक जैसे हमारे साथ होता है, और यही देखकर मन को थोड़ी राहत मिलती है।
क्रम को हमने बाहरी भय से भीतरी भय की ओर रखा है। अन्त में आप देखेंगे कि सबसे बड़ा डर अक्सर हमारे अपने मन का गढ़ा हुआ होता है, और वहीं उसका इलाज भी छिपा है। जिसे हम देख लेते हैं, उसका ज़ोर आधा रह जाता है।
- गजेन्द्र मोक्ष
जब सारी शक्ति चुक जाती है और बचने का कोई उपाय नहीं दिखता, गजेन्द्र की पुकार हमें सिखाती है कि हार मानना और समर्पण करना दो अलग बातें हैं, और सच्ची पुकार कभी अनसुनी नहीं जाती। - प्रह्लाद का विद्रोह
प्रह्लाद के सामने पूरी सत्ता खड़ी है, फिर भी वे नहीं झुकते, क्योंकि जिसका सहारा भीतर हो उसे बाहर का भय हिला नहीं पाता, और यही निर्भयता की जड़ है। - देवी माहात्म्य · महिषासुर वध
जब असुर अजेय लगने लगे, देवी का रूप याद दिलाता है कि भय के सामने खड़े होने की शक्ति हमारे भीतर भी सोई पड़ी है, बस उसे जगाना है। - रामायण · समुद्र-लंघन
हनुमान का समुद्र लाँघना एक ही छलाँग नहीं, रास्ते में आने वाले हर संदेह और बाधा को पार करना है, और यही असली उड़ान है, जहाँ अपनी शक्ति की याद ही सबसे बड़ा पंख बनती है। - भगवद्गीता · अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग
अर्जुन विराट रूप देखकर काँप उठते हैं, और यह अध्याय बताता है कि किसी विशाल सत्य के आगे थरथराना भी भक्ति का ही एक रूप है, और वही कँपकँपी आगे जाकर श्रद्धा में ठहर जाती है। - राजा लवण की एक रात
राजा लवण एक पल में पूरा जीवन भर का भय जी लेते हैं, और जागने पर समझते हैं कि अधिकांश डर मन के बुने हुए स्वप्न हैं, जो आँख खुलते ही बिखर जाते हैं। - कंस का भय और कृष्ण का जन्म
कंस का डर उसे भीतर से खा जाता है, जबकि उसी रात भय के बीच एक नन्ही आशा जन्म लेती है, और यही दोनों रास्ते हमारे सामने भी खुले रहते हैं, कि डर हमें खाए या हम उसमें से कुछ नया जनें।
डर को मिटाने की जल्दी मत रखिए। इन पन्नों के साथ बैठिए, और देखिए कि साहस डर के जाने के बाद नहीं, उसके साथ-साथ ही उगता है। डरते हुए भी चल पड़ना, यही तो हिम्मत है।