अंग
239
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਿਤੁ ਕੋ ਲਾਇਆ ਤਿਤ ਹੀ ਲਾਗਾ ॥
ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਭਾਗਾ ॥੮॥੬॥
ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਭਾਗਾ ॥੮॥੬॥
जितु को लाइआ तित ही लागा ॥
सो सेवकु नानक जिसु भागा ॥८॥६॥
सो सेवकु नानक जिसु भागा ॥८॥६॥
हिन्दी अर्थ: हरेक जीव उसी तरफ ही लगा हुआ है जिस तरफ परमात्मा ने उसे लगाया हुआ है। (परमात्मा की मेहर से) जिसकी किस्मत जाग जाती है। वही उसका सेवक बनता है। 8। 6।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਜੈਸੇ ਸਰਪ ਆਰਜਾਰੀ ॥
ਤਿਉ ਜੀਵਹਿ ਸਾਕਤ ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰੀ ॥੧॥
ਏਕ ਨਿਮਖ ਜੋ ਸਿਮਰਨ ਮਹਿ ਜੀਆ ॥
ਕੋਟਿ ਦਿਨਸ ਲਾਖ ਸਦਾ ਥਿਰੁ ਥੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਧ੍ਰਿਗੁ ਕਰਮ ਕਰਾਸ ॥
ਕਾਗ ਬਤਨ ਬਿਸਟਾ ਮਹਿ ਵਾਸ ॥੨॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਭਏ ਕੂਕਰ ਕਾਮ ॥
ਸਾਕਤ ਬੇਸੁਆ ਪੂਤ ਨਿਨਾਮ ॥੩॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਜੈਸੇ ਸੀਙ ਛਤਾਰਾ ॥
ਬੋਲਹਿ ਕੂਰੁ ਸਾਕਤ ਮੁਖੁ ਕਾਰਾ ॥੪॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਗਰਧਭ ਕੀ ਨਿਆਈ ॥
ਸਾਕਤ ਥਾਨ ਭਰਿਸਟ ਫਿਰਾਹੀ ॥੫॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਕੂਕਰ ਹਰਕਾਇਆ ॥
ਸਾਕਤ ਲੋਭੀ ਬੰਧੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥੬॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਹੈ ਆਤਮ ਘਾਤੀ ॥
ਸਾਕਤ ਨੀਚ ਤਿਸੁ ਕੁਲੁ ਨਹੀ ਜਾਤੀ ॥੭॥
ਜਿਸੁ ਭਇਆ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ਤਿਸੁ ਸਤਸੰਗਿ ਮਿਲਾਇਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਜਗਤੁ ਤਰਾਇਆ ॥੮॥੭॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਜੈਸੇ ਸਰਪ ਆਰਜਾਰੀ ॥
ਤਿਉ ਜੀਵਹਿ ਸਾਕਤ ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰੀ ॥੧॥
ਏਕ ਨਿਮਖ ਜੋ ਸਿਮਰਨ ਮਹਿ ਜੀਆ ॥
ਕੋਟਿ ਦਿਨਸ ਲਾਖ ਸਦਾ ਥਿਰੁ ਥੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਧ੍ਰਿਗੁ ਕਰਮ ਕਰਾਸ ॥
ਕਾਗ ਬਤਨ ਬਿਸਟਾ ਮਹਿ ਵਾਸ ॥੨॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਭਏ ਕੂਕਰ ਕਾਮ ॥
ਸਾਕਤ ਬੇਸੁਆ ਪੂਤ ਨਿਨਾਮ ॥੩॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਜੈਸੇ ਸੀਙ ਛਤਾਰਾ ॥
ਬੋਲਹਿ ਕੂਰੁ ਸਾਕਤ ਮੁਖੁ ਕਾਰਾ ॥੪॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਗਰਧਭ ਕੀ ਨਿਆਈ ॥
ਸਾਕਤ ਥਾਨ ਭਰਿਸਟ ਫਿਰਾਹੀ ॥੫॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਕੂਕਰ ਹਰਕਾਇਆ ॥
ਸਾਕਤ ਲੋਭੀ ਬੰਧੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥੬॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਹੈ ਆਤਮ ਘਾਤੀ ॥
ਸਾਕਤ ਨੀਚ ਤਿਸੁ ਕੁਲੁ ਨਹੀ ਜਾਤੀ ॥੭॥
ਜਿਸੁ ਭਇਆ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ਤਿਸੁ ਸਤਸੰਗਿ ਮਿਲਾਇਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਜਗਤੁ ਤਰਾਇਆ ॥੮॥੭॥
गउड़ी महला ५ ॥
बिनु सिमरन जैसे सरप आरजारी ॥
तिउ जीवहि साकत नामु बिसारी ॥१॥
एक निमख जो सिमरन महि जीआ ॥
कोटि दिनस लाख सदा थिरु थीआ ॥१॥ रहाउ ॥
बिनु सिमरन ध्रिगु करम करास ॥
काग बतन बिसटा महि वास ॥२॥
बिनु सिमरन भए कूकर काम ॥
साकत बेसुआ पूत निनाम ॥३॥
बिनु सिमरन जैसे सीङ छतारा ॥
बोलहि कूरु साकत मुखु कारा ॥४॥
बिनु सिमरन गरधभ की निआई ॥
साकत थान भरिसट फिराही ॥५॥
बिनु सिमरन कूकर हरकाइआ ॥
साकत लोभी बंधु न पाइआ ॥६॥
बिनु सिमरन है आतम घाती ॥
साकत नीच तिसु कुलु नही जाती ॥७॥
जिसु भइआ क्रिपालु तिसु सतसंगि मिलाइआ ॥
कहु नानक गुरि जगतु तराइआ ॥८॥७॥
बिनु सिमरन जैसे सरप आरजारी ॥
तिउ जीवहि साकत नामु बिसारी ॥१॥
एक निमख जो सिमरन महि जीआ ॥
कोटि दिनस लाख सदा थिरु थीआ ॥१॥ रहाउ ॥
बिनु सिमरन ध्रिगु करम करास ॥
काग बतन बिसटा महि वास ॥२॥
बिनु सिमरन भए कूकर काम ॥
साकत बेसुआ पूत निनाम ॥३॥
बिनु सिमरन जैसे सीङ छतारा ॥
बोलहि कूरु साकत मुखु कारा ॥४॥
बिनु सिमरन गरधभ की निआई ॥
साकत थान भरिसट फिराही ॥५॥
बिनु सिमरन कूकर हरकाइआ ॥
साकत लोभी बंधु न पाइआ ॥६॥
बिनु सिमरन है आतम घाती ॥
साकत नीच तिसु कुलु नही जाती ॥७॥
जिसु भइआ क्रिपालु तिसु सतसंगि मिलाइआ ॥
कहु नानक गुरि जगतु तराइआ ॥८॥७॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) जैसे साँप की उम्र है (उम्र तो लंबी है, पर साँप हमेशा दूसरों को डंक ही मारता रहता है) सिमरन के बिना सर्प की तरह का जीवन – परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य परमात्मा का नाम भुला के जीते हैं (मौका मिलने पर दूसरों को डंक ही मारते हैं)। 1। (हे भाई !) जो एक पलक झपकने मात्र समय भी परमात्मा के सिमरन में गुजारा जाए, वह मानो लाखों करोड़ों दिन (जी लिया क्योंकि सिमरन की बरकति से मनुष्य का आत्मिक जीवन) सदा के लिए अडोल हो जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) प्रभू-सिमरन से विछुड़ के अन्य काम करने धिक्कारयोग्य ही हैं। जैसे कौए की चोंच गंदगी में ही रहती है। वैसे ही सिमरन-हीन मनुष्यों के मुंह (निंदा आदि की) गंदगी में ही रहते हैं। 2। प्रभू की याद से टूट के मनुष्य (लोभ व कामादिक में फंस के) कुत्तों जैसे कामों में प्रवृति रहते हैं। (हे भाई !) परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य वैश्याओं के पुत्रों की तरह (निर्लज) हो जाते हैं। जिनके पिता का नाम नहीं बताया जा सकता।3। परमात्मा की याद से टूट के वह (धरती पर भार ही हैं जैसे) भेड़ों के सिर पर सींग। (हे भाई !) परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य (सदा) झूठ बोलते हैं, हर जगह मुंह की कालिख ही कमाते हैं। 4। सिमरन से टूट के वे गधे जैसी (मलीन जीवन गुजारते हैं। जैसे गधा हमेशा राख-मिट्टी में लेट के खुश होता है)। (हे भाई !) परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य (कुकर्मों वाली) गंदी जगहों पर ही फिरते रहते हैं।5। सिमरन से टूट के वो, जैसे, पागल कुत्ते बन जाते हैं (जिसका संग करते हैं, उसी को लोभ का पागलपन चिपका देते हैं)। (हे भाई !) ईश्वर से टूटे हुए मनुष्य लोभ में ग्रसे रहते हैं (उनके राह में लाखों रुपए कमा के भी) रोक नहीं पड़ सकती।6। (हे भाई !) ईश्वर से टूटा हुआ मनुष्य सिमरन से वंचित रह कर आत्मिक मौत ले लेता है। वह सदा नीच कर्मों में रुची रखता है। उसकी ना ऊँची कुल रह जाती है ना ही ऊँची जाति। 7। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य पर परमात्मा दयावान हो जाता है। उसे साध-संगति में ला के शामिल कर लेता है। और इस तरह जगत को गुरू के द्वारा (संसार समुंद्र के विकारों से) पार लंघाता है। 8। 7।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਮੋਹਿ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਈ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਮੇਰੀ ਪੈਜ ਰਖਾਈ ॥੧॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਧਿਆਇਓ ਮੋਹਿ ਨਾਉ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਮੋਹਿ ਮਿਲਿਆ ਥਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਸੁਣਿ ਰਸਨ ਵਖਾਣੀ ॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਮੇਰੀ ਬਾਣੀ ॥੨॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਮਿਟਿਆ ਮੇਰਾ ਆਪੁ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਦਇਆ ਤੇ ਮੇਰਾ ਵਡ ਪਰਤਾਪੁ ॥੩॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਮਿਟਿਆ ਮੇਰਾ ਭਰਮੁ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਪੇਖਿਓ ਸਭੁ ਬ੍ਰਹਮੁ ॥੪॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਕੀਨੋ ਰਾਜੁ ਜੋਗੁ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸੰਗਿ ਤਰਿਆ ਸਭੁ ਲੋਗੁ ॥੫॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਮੇਰੇ ਕਾਰਜ ਸਿਧਿ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਪਾਇਆ ਨਾਉ ਨਿਧਿ ॥੬॥
ਜਿਨਿ ਜਿਨਿ ਕੀਨੀ ਮੇਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਆਸਾ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਕਟੀਐ ਜਮ ਕੀ ਫਾਸਾ ॥੭॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਜਾਗਿਆ ਮੇਰਾ ਕਰਮੁ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰੁ ਭੇਟਿਆ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ॥੮॥੮॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਮੋਹਿ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਈ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਮੇਰੀ ਪੈਜ ਰਖਾਈ ॥੧॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਧਿਆਇਓ ਮੋਹਿ ਨਾਉ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਮੋਹਿ ਮਿਲਿਆ ਥਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਸੁਣਿ ਰਸਨ ਵਖਾਣੀ ॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਮੇਰੀ ਬਾਣੀ ॥੨॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਮਿਟਿਆ ਮੇਰਾ ਆਪੁ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਦਇਆ ਤੇ ਮੇਰਾ ਵਡ ਪਰਤਾਪੁ ॥੩॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਮਿਟਿਆ ਮੇਰਾ ਭਰਮੁ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਪੇਖਿਓ ਸਭੁ ਬ੍ਰਹਮੁ ॥੪॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਕੀਨੋ ਰਾਜੁ ਜੋਗੁ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸੰਗਿ ਤਰਿਆ ਸਭੁ ਲੋਗੁ ॥੫॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਮੇਰੇ ਕਾਰਜ ਸਿਧਿ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਪਾਇਆ ਨਾਉ ਨਿਧਿ ॥੬॥
ਜਿਨਿ ਜਿਨਿ ਕੀਨੀ ਮੇਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਆਸਾ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਕਟੀਐ ਜਮ ਕੀ ਫਾਸਾ ॥੭॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਜਾਗਿਆ ਮੇਰਾ ਕਰਮੁ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰੁ ਭੇਟਿਆ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ॥੮॥੮॥
गउड़ी महला ५ ॥
गुर कै बचनि मोहि परम गति पाई ॥
गुरि पूरै मेरी पैज रखाई ॥१॥
गुर कै बचनि धिआइओ मोहि नाउ ॥
गुर परसादि मोहि मिलिआ थाउ ॥१॥ रहाउ ॥
गुर कै बचनि सुणि रसन वखाणी ॥
गुर किरपा ते अंम्रित मेरी बाणी ॥२॥
गुर कै बचनि मिटिआ मेरा आपु ॥
गुर की दइआ ते मेरा वड परतापु ॥३॥
गुर कै बचनि मिटिआ मेरा भरमु ॥
गुर कै बचनि पेखिओ सभु ब्रहमु ॥४॥
गुर कै बचनि कीनो राजु जोगु ॥
गुर कै संगि तरिआ सभु लोगु ॥५॥
गुर कै बचनि मेरे कारज सिधि ॥
गुर कै बचनि पाइआ नाउ निधि ॥६॥
जिनि जिनि कीनी मेरे गुर की आसा ॥
तिस की कटीऐ जम की फासा ॥७॥
गुर कै बचनि जागिआ मेरा करमु ॥
नानक गुरु भेटिआ पारब्रहमु ॥८॥८॥
गुर कै बचनि मोहि परम गति पाई ॥
गुरि पूरै मेरी पैज रखाई ॥१॥
गुर कै बचनि धिआइओ मोहि नाउ ॥
गुर परसादि मोहि मिलिआ थाउ ॥१॥ रहाउ ॥
गुर कै बचनि सुणि रसन वखाणी ॥
गुर किरपा ते अंम्रित मेरी बाणी ॥२॥
गुर कै बचनि मिटिआ मेरा आपु ॥
गुर की दइआ ते मेरा वड परतापु ॥३॥
गुर कै बचनि मिटिआ मेरा भरमु ॥
गुर कै बचनि पेखिओ सभु ब्रहमु ॥४॥
गुर कै बचनि कीनो राजु जोगु ॥
गुर कै संगि तरिआ सभु लोगु ॥५॥
गुर कै बचनि मेरे कारज सिधि ॥
गुर कै बचनि पाइआ नाउ निधि ॥६॥
जिनि जिनि कीनी मेरे गुर की आसा ॥
तिस की कटीऐ जम की फासा ॥७॥
गुर कै बचनि जागिआ मेरा करमु ॥
नानक गुरु भेटिआ पारब्रहमु ॥८॥८॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ गुरू के उपदेश पर चल के मैंने सब से ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर ली है। (दुनिया के विकारों के मुकाबले से) पूरे गुरू ने मेरी इज्जत रख ली है। 1। (हे भाई !) गुरू के उपदेश की बरकति से मैंने परमात्मा का नाम सिमरा है। और गुरू की कृपा से मुझे (परमात्मा के चरणों में) जगह मिल गई है (मेरा मन प्रभू चरणों में टिका रहता है)। 1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू के उपदेश द्वारा (परमात्मा की सिफत सालाह) सुन के मैं अपनी जीभ से भी सिफत सालाह उचारता रहता हूँ। गुरू की कृपा से आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह की बाणी मेरी (राशि पूँजी बन गई है)। 2। गुरू के उपदेश की बरकति से (मेरे अंदर से) मेरा स्वैभाव मिट गया है। गुरू की दया से मेरा बड़ा तेज-प्रताप बन गया है (कि कोई विकार अब मेरे नजदीक नहीं फटकता)। 3। गुरू के उपदेश पर चल के मेरे मन की भटकना दूर हो गई है। और अब मैंने सर्व-व्यापी परमात्मा देख लिया है। 4। गुरू के उपदेश की बरकति से गृहस्थ में रह के ही मैं प्रभू-चरणों का मिलाप सुख पा रहा हूँ। (हे भाई !) गुरू की संगति में (रह के) सारा जगत ही (संसार समुंद्र से) पार हो जाता है। 5। (हे भाई !) गुरू के उपदेश पर चल के मेरे सारे कामों में सफलता हो रही है। गुरू के उपदेश से मैंने परमात्मा का नाम हासिल कर लिया है (जो मेरे लिए सब कामयाबियों का) खजाना है। 6। (हे भाई !) जिस जिस मनुष्य ने मेरे गुरू की आस (अपने मन में) धारण कर ली है। उसकी जम की फांसी कट गई हैं। 7। हे नानक ! (कह,) गुरू के उपदेश की बरकति से मेरी किस्मत जाग गई है। मुझे गुरू मिल गया है (और गुरू की मेहर से) मुझे परमात्मा मिल गया है। 8। 8।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਕਉ ਸਿਮਰਉ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ॥
ਗੁਰੁ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਾਣ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਰੀ ਰਾਸਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਦੇਖਿ ਜੀਵਾ ॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਣ ਧੋਇ ਧੋਇ ਪੀਵਾ ॥੧॥
ਗੁਰ ਕੀ ਰੇਣੁ ਨਿਤ ਮਜਨੁ ਕਰਉ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੀ ਹਉਮੈ ਮਲੁ ਹਰਉ ॥੨॥
ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਕਉ ਝੂਲਾਵਉ ਪਾਖਾ ॥
ਮਹਾ ਅਗਨਿ ਤੇ ਹਾਥੁ ਦੇ ਰਾਖਾ ॥੩॥
ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਕੈ ਗ੍ਰਿਹਿ ਢੋਵਉ ਪਾਣੀ ॥
ਜਿਸੁ ਗੁਰ ਤੇ ਅਕਲ ਗਤਿ ਜਾਣੀ ॥੪॥
ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਕੈ ਗ੍ਰਿਹਿ ਪੀਸਉ ਨੀਤ ॥
ਜਿਸੁ ਪਰਸਾਦਿ ਵੈਰੀ ਸਭ ਮੀਤ ॥੫॥
ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਕਉ ਸਿਮਰਉ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ॥
ਗੁਰੁ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਾਣ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਰੀ ਰਾਸਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਦੇਖਿ ਜੀਵਾ ॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਣ ਧੋਇ ਧੋਇ ਪੀਵਾ ॥੧॥
ਗੁਰ ਕੀ ਰੇਣੁ ਨਿਤ ਮਜਨੁ ਕਰਉ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੀ ਹਉਮੈ ਮਲੁ ਹਰਉ ॥੨॥
ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਕਉ ਝੂਲਾਵਉ ਪਾਖਾ ॥
ਮਹਾ ਅਗਨਿ ਤੇ ਹਾਥੁ ਦੇ ਰਾਖਾ ॥੩॥
ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਕੈ ਗ੍ਰਿਹਿ ਢੋਵਉ ਪਾਣੀ ॥
ਜਿਸੁ ਗੁਰ ਤੇ ਅਕਲ ਗਤਿ ਜਾਣੀ ॥੪॥
ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਕੈ ਗ੍ਰਿਹਿ ਪੀਸਉ ਨੀਤ ॥
ਜਿਸੁ ਪਰਸਾਦਿ ਵੈਰੀ ਸਭ ਮੀਤ ॥੫॥
गउड़ी महला ५ ॥
तिसु गुर कउ सिमरउ सासि सासि ॥
गुरु मेरे प्राण सतिगुरु मेरी रासि ॥१॥ रहाउ ॥
गुर का दरसनु देखि देखि जीवा ॥
गुर के चरण धोइ धोइ पीवा ॥१॥
गुर की रेणु नित मजनु करउ ॥
जनम जनम की हउमै मलु हरउ ॥२॥
तिसु गुर कउ झूलावउ पाखा ॥
महा अगनि ते हाथु दे राखा ॥३॥
तिसु गुर कै ग्रिहि ढोवउ पाणी ॥
जिसु गुर ते अकल गति जाणी ॥४॥
तिसु गुर कै ग्रिहि पीसउ नीत ॥
जिसु परसादि वैरी सभ मीत ॥५॥
तिसु गुर कउ सिमरउ सासि सासि ॥
गुरु मेरे प्राण सतिगुरु मेरी रासि ॥१॥ रहाउ ॥
गुर का दरसनु देखि देखि जीवा ॥
गुर के चरण धोइ धोइ पीवा ॥१॥
गुर की रेणु नित मजनु करउ ॥
जनम जनम की हउमै मलु हरउ ॥२॥
तिसु गुर कउ झूलावउ पाखा ॥
महा अगनि ते हाथु दे राखा ॥३॥
तिसु गुर कै ग्रिहि ढोवउ पाणी ॥
जिसु गुर ते अकल गति जाणी ॥४॥
तिसु गुर कै ग्रिहि पीसउ नीत ॥
जिसु परसादि वैरी सभ मीत ॥५॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) उस गुरू को मैं (अपने) हरेक श्वास के साथ-साथ याद करता रहता हूँ। जो गुरू मेरी जिंद का आसरा है मेरी (आत्मिक जीवन की) राशि पूंजी (का रक्षक) है।1। रहाउ। (हे भाई !) जैसे जैसे मैं गुरू के दर्शन करता हूँ। मुझे आत्मिक जीवन मिलता है। जैसे जैसे मैं गुरू के चरण धोता हूँ, मुझे (आत्मिक जीवन देने वाला) नाम जल (पीने को, जपने को) मिलता है। 1। गुरू के चरणों की धूड़ (मेरे वास्ते तीर्थ का जल है उस) में मैं सदा स्नान करता हूँ। और अनेकों जन्मों की (एकत्र की हुई) अहंकार की मैल (अपने मन में से) दूर करता हूँ। 2। उस गुरू को मैं पंखा झलता हूँ। (हे भाई !) जिस गुरू ने मुझे (विकारों की) बड़ी आग में से (अपना) हाथ दे कर बचाया हुआ है।3। मैं उस गुरू के घर में (हमेशा) पानी ढोता हूँ। (हे भाई !) जिस गुरू से मैंने उस परमात्मा की सूझ-बूझ हासिल की है जो कभी घटता-बढ़ता नहीं।4। उस गुरू के घर में मैं हमेशा चक्की पीसता हूँ। (हे भाई !) जिस गुरू की कृपा से (पहले) वैरी (दिखाई दे रहे लोग अब) सारे मित्र प्रतीत हो रहे हैं। 5।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 239 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
CBSE board-exam का दिन सुबह, बच्चा pencil-box check कर रहा, माँ चुप।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 53 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 239” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 240 →, पीछे का: ← अंग 238।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।