हनुमान चालीसा · Hanuman Chalisa
तैंतालीस लाइनें, दस मिनट का पाठ, और एक पूरी ज़िंदगी की हिम्मत। कहते हैं तुलसीदास ने इसे एक जेल की कोठरी में रचा, और वहीं से यह दुनिया की सबसे ज़्यादा दोहराई जाने वाली प्रार्थनाओं में से एक बन गई। आइए, धागे को सिरे से पकड़ते हैं।
पहले एक बात
एक कहानी है, और शायद सच भी। कहते हैं तुलसीदास को मुग़ल बादशाह अकबर ने किसी विवाद में जेल में डाल दिया था। उसी कोठरी में, उन्होंने हनुमान चालीसा रची। सोचिए, दुनिया की सबसे ज़्यादा दोहराई जाने वाली प्रार्थनाओं में से एक, एक बंद कमरे में, एक बंदी के हाथों।
बनावट एकदम सीधी है: शुरू में दो दोहे, फिर चालीस चौपाइयाँ (इन्हीं चालीस से “चालीसा” नाम बना), और अंत में एक समापन दोहा। भाषा अवधी है, अवध, यानी आज का लखनऊ-इलाक़ा, की लोकभाषा। तुलसीदास संस्कृत के बड़े विद्वान थे, पर उन्होंने यह जान-बूझ कर आम लोगों की ज़बान में लिखा, ताकि किसान, बच्चा, बूढ़ा, हर कोई इसे कंठस्थ कर सके।
और वही इसकी सबसे बड़ी ख़ूबी है। इसे पढ़ने के लिए बस साथ चलिए, पहले से कुछ जानना ज़रूरी नहीं। हर चौपाई में हनुमान जी का कोई न कोई रूप, कोई न कोई कहानी खुलती है, और हम हर लहर के साथ उसका भाव पकड़ते चलेंगे।
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देखिए तुलसीदास कहाँ से शुरू करते हैं। राम की तारीफ़ से नहीं, अपना मन साफ़ करने से। पहले दोहे में वे अपने गुरु के चरण-कमलों की पावन धूल से अपने मन रूपी आईने को पोंछ लेते हैं, और तभी श्रीराम का वह निर्मल यश गाने चलते हैं जो जीवन के चारों फल देता है, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। पहले आईना साफ़ कीजिए, फिर उसमें कुछ दिखेगा। दूसरे दोहे में वे ख़ुद को बुद्धिहीन और अधूरा मानते हुए पवनपुत्र का स्मरण करते हैं, और तीन चीज़ें माँगते हैं, बल, बुद्धि और विद्या, साथ ही यह कि उनके सारे कष्ट और मन के विकार दूर हो जाएँ। ग़ौर कीजिए, एक महाकवि ख़ुद को “बुद्धिहीन” कह रहा है। यही वह सच्चा खुलापन है जिसके बिना कोई सीख भीतर उतरती ही नहीं। और जो तीन वरदान वे यहाँ माँगते हैं, पूरी चालीसा एक तरह से इन्हीं तीन के इर्द-गिर्द घूमती है।
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
अब चालीसा अपना सुर तय करती है, और पहली ही लहर में वह हनुमान जी का परिचय खोलती है। पहली लाइन में “सागर” शब्द है, समुंदर, यानी कोई एक गुण नहीं, गुणों की कोई थाह नहीं। वे ज्ञान और अच्छे गुणों के समुंदर हैं, वानरों के स्वामी, तीनों लोकों में अपने तेज से उजाला फैलाने वाले। फिर तुलसीदास उनकी जड़ें बताते हैं: वे श्रीराम के दूत हैं और उनके बल की किसी से तुलना नहीं हो सकती, माता अंजनी के पुत्र, और पवनदेव के अंश से जन्मे होने के कारण पवनसुत भी। तीसरी चौपाई एक नन्ही सी बात छिपाए है, वे महावीर हैं, पराक्रमी हैं, वज्र जैसे दृढ़ शरीर वाले “बजरंगी”, पर वे सिर्फ़ बल वाले नहीं हैं। वे कुबुद्धि और भ्रम मिटाते हैं और सुबुद्धि वालों के साथी बन जाते हैं, “सुमति के संगी”। बल और समझ, दोनों एक साथ, एक के बिना दूसरा अधूरा।
1
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

2
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥
एक छोटी कहानी: देवी अंजना एक पुराने शाप के कारण धरती पर वानर-रूप में जन्मीं। वे शिव-भक्त थीं, और उनके पति थे वानर-राज केसरी। संतान की चाह में अंजना ने कठिन तपस्या की। एक दिन, पूजा के बीच, पवनदेव ने उनकी झोली में एक दिव्य प्रसाद रख दिया, जिसे उन्होंने श्रद्धा से ग्रहण किया। कुछ महीनों बाद हनुमान जी का जन्म हुआ। इसीलिए वे “पवन-पुत्र” भी हैं और केसरी के “केसरी-नंदन” भी, दोनों नाम साथ-साथ चलते हैं।
3
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥

अगली लहर हनुमान जी का रूप आँखों के सामने खींच देती है, और जान-बूझ कर। उनके शरीर का रंग सोने जैसा सुनहरा है, सुंदर वस्त्र और आभूषण, कानों में झूलते कुंडल, घुंघराले बाल जो मन मोह लेते हैं। भक्ति में तस्वीर लंगर का काम करती है, मन को एक जगह बाँध देती है। फिर तुलसीदास इसी तस्वीर में ताक़त और संयम साथ रख देते हैं: एक हाथ में वज्र यानी गदा, दूसरे में विजय की ध्वजा, और कंधे पर मूँज घास का बना पवित्र जनेऊ, जो उनकी तपस्या और विद्वत्ता का सूचक है। एक हाथ में ताक़त, कंधे पर संयम, असली बात यही जोड़ी है। छठी चौपाई उनकी दो जड़ें खोलती है, वे भगवान शंकर के अंश से उपजे हैं, एक मान्यता उन्हें रुद्र-अवतार कहती है, और साथ ही राजा केसरी के पुत्र भी। एक दैवी जड़, एक धरती की, ऊपर और नीचे दोनों से जुड़े हुए, और उनका तेज इतना विशाल कि सारा संसार प्रणाम करता है।
4
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥

5
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
6
शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥
यहाँ चालीसा का सबसे प्यारा मोड़ आता है। सातवीं चौपाई हनुमान जी की क़ाबिलियत गिनाती है, वे विद्या के भंडार हैं, चारों वेदों के ज्ञाता, व्याकरण और संगीत में पारंगत, बेहद चतुर और बुद्धिमान। और इतना सब होते हुए भी लाइन का अंत आता है, “राम काज करिबे को आतुर”, हमेशा श्रीराम की सेवा के लिए आतुर। सारी क़ाबिलियत, और फिर भी सेवा को तत्पर, यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है और बड़ी ताक़त की असली परीक्षा भी। आठवीं चौपाई बताती है उनकी सबसे प्यारी आदत: वे राम की लीलाओं और कथाओं को सुनने में रस लेते हैं, और उनके हृदय में राम, लक्ष्मण और सीता, तीनों हमेशा बसे रहते हैं।
7
विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
8
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
एक छोटी कहानी: राम के राज्याभिषेक के बाद, ख़ुश हो कर माता सीता ने अपनी मोतियों की माला हनुमान जी को भेंट कर दी। हनुमान जी ने एक-एक मोती दाँतों से तोड़ कर देखा, और बोले, “इनमें तो मेरे राम नहीं हैं।” किसी ने हँसी में पूछा, “तो क्या आपके शरीर में राम हैं?” हनुमान जी ने अपने नख से अपना वक्ष चीर दिया, और सबने देखा, वहाँ राम, लक्ष्मण और सीता विराजमान थे। यह दृश्य सदियों से चित्रकारों और मूर्तिकारों का प्रिय विषय रहा है।

अब चालीसा रामायण के पराक्रम में उतरती है। नवीं चौपाई एक ही पंक्ति में दो उल्टे रूप रखती है, सबसे छोटा और सबसे विकराल, और दोनों इच्छा से। हनुमान जी ने सूक्ष्म रूप धर कर अशोक वाटिका में माँ सीता को दर्शन दिए, ताकि राक्षस पहचान न सकें, और बाद में विकराल रूप धर कर पूरी लंका को अपनी पूँछ की आग से जला डाला। असली ताक़त इसी में है कि कब कौनसा रूप चाहिए, यह तय कर पाना। दसवीं चौपाई में वे विशाल रूप धर कर अनेक राक्षसों का संहार करते हैं और श्रीरामचंद्र के सारे कठिन काम सँवार देते हैं। “सँवारे” शब्द प्यारा है, “किए” नहीं, यानी काम सिर्फ़ निपटाया नहीं, उसे सुंदर बना दिया। फिर ग्यारहवीं चौपाई का वह अमर दृश्य: मेघनाद के शक्ति-बाण से मूर्छित लक्ष्मण के लिए हनुमान जी हिमालय के द्रोणगिरि से संजीवनी ले आए और उनके प्राण बचाए, और राम इतने ख़ुश हुए कि उन्हें हृदय से लगा लिया।
9
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
एक छोटी कहानी: समुद्र पार कर के लंका पहुँचने पर हनुमान जी ने अपना शरीर एक बिल्ली जितना छोटा कर लिया। अशोक वाटिका में दुखी सीता के सामने प्रकट हो कर उन्होंने राम की अँगूठी सौंपी, संदेश सुनाया, और पहचान के लिए चूड़ामणि ली। लौटते समय वाटिका उजाड़ी, राक्षस-सैनिकों को हराया, फिर रावण के दरबार में निडर हो कर अपने स्वामी का संदेश सुनाया। सज़ा में उनकी पूँछ में आग लगाई गई, और उसी जलती पूँछ से उन्होंने लंका के बड़े भवन फूँक डाले।
10
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥

11
लाय सजीवन लखन जियाए। श्रीरघुबीर हरषि उर लाए॥
एक छोटी कहानी: वैद्य सुषेण ने बताया कि द्रोणगिरि से चार ख़ास ओषधियाँ, सूर्योदय से पहले, लानी होंगी। हनुमान जी उड़ कर हिमालय पहुँचे। रास्ते में रावण के भेजे राक्षस कालनेमि को हराया। पर्वत पर सही बूटी पहचान नहीं पाए, तो क्या किया? पूरा पर्वत ही उखाड़ कर कंधे पर उठा लाए। उत्तर भारत के मंदिरों में यह दृश्य, पर्वत उठाए उड़ते हनुमान, सबसे ज़्यादा बनने वाली तस्वीरों में से एक है।
अगली लहर बताती है कि राम ख़ुद हनुमान जी को कैसे देखते हैं। बारहवीं चौपाई में राम उनकी बहुत प्रशंसा करते हैं और कहते हैं, “हनुमान, आप मुझे मेरे प्रिय भाई भरत के समान ही प्यारे हैं।” रामायण में भरत का राम से प्रेम सबसे गहरे रिश्तों में गिना जाता है, और उसी कतार में रखना अपने भीतर जगह दे देना है। तेरहवीं चौपाई में राम कहते हैं कि हज़ार मुखों वाले शेषनाग भी सदा उनका यशगान करते हैं, और ऐसा कह कर लक्ष्मीपति राम उन्हें गले लगा लेते हैं। आशय सीधा है, हनुमान जी का यश गाने के लिए एक जीभ क्या, हज़ार जीभें भी कम पड़ें। कभी-कभी तारीफ़ का सबसे सच्चा रूप यही है, यह मान लेना कि शब्द कम पड़ रहे हैं।
12
रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
13
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥

अब पूरी सृष्टि उनकी स्तुति में जुटती है, और यही इस लहर का ज़ोर है। चौदहवीं चौपाई में सनक आदि चार ब्रह्म-कुमार, ब्रह्मा जैसे देवता और बड़े-बड़े मुनि, देवर्षि नारद, विद्या की देवी शारदा, और शेषनाग, ये सब हनुमान जी का गुणगान करते हैं। जो ख़ुद इतने ऊँचे हैं वे भी झुक रहे हैं, यही असली ऊँचाई की पहचान है। पंद्रहवीं चौपाई और आगे जाती है: यमराज, धन के देवता कुबेर, और आठों दिशाओं के रक्षक दिगपाल भी उनके यश का पूरा वर्णन नहीं कर पाते, फिर साधारण कवि और विद्वान कहाँ तक गा पाएँगे। तुलसीदास ख़ुद को भी इसी कतार में रख रहे हैं, मैं भी एक कवि हूँ, मेरे शब्द भी कम पड़ेंगे, यह कवि की एक प्यारी ईमानदारी है।
14
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥
(इन नामों में हर एक की अपनी कहानी है, नारद की वीणा, शारदा के हंस, शेषनाग के हज़ार फण। उनमें उतरना हो तो नीचे गहरी डुबकी वाला हिस्सा है।)
15
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सकैं कहाँ ते॥
सोलहवीं और सत्रहवीं चौपाई एक जोड़ी की तरह चलती हैं, दोनों यह दिखाती हैं कि सही समय पर एक सही क़दम इतिहास का रुख़ बदल देता है। सोलहवीं में हनुमान जी ने वानर-राज सुग्रीव पर बड़ा उपकार किया, उन्हें श्रीराम से मिलवाया, और इसी का नतीजा था कि सुग्रीव को किष्किंधा का राज-सिंहासन मिला। एक सही परिचय, और आगे की पूरी राम-कथा खड़ी हो गई। सत्रहवीं में हनुमान जी की दी सलाह को विभीषण ने माना, अधर्मी रावण का साथ छोड़ा, राम की शरण में आए, और युद्ध के बाद लंका के राजा बने। सोलहवीं में एक सही परिचय ने इतिहास बदला, सत्रहवीं में एक सही सलाह ने, सही समय पर सही बात कह देने में भी एक ताक़त है।
16
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
एक छोटी कहानी: सुग्रीव को उनके भाई बाली ने राज्य से निकाल दिया था, और वे कुछ साथियों के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर छिपे रहते थे। जब राम और लक्ष्मण सीता को खोजते हुए वहाँ पहुँचे, तो हनुमान जी ने ब्राह्मण का रूप धर कर उनसे परिचय किया, सुग्रीव से मिलवाया, और दोनों के बीच अग्नि-साक्षी मित्रता करवाई। इसी मित्रता से आगे की पूरी कहानी बनी, सुग्रीव की वानर-सेना ही सीता-खोज और लंका-युद्ध में राम की ताक़त बनी। एक सही परिचय, और इतिहास का रुख़ बदल गया।
17
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना॥

अब दो बचपन और यात्रा वाली चौपाइयाँ, दोनों में एक असंभव काम सहज दिखाया गया है। अठारहवीं में वह मशहूर दृश्य है: सूर्य, जो धरती से हज़ारों योजन दूर है, उसे हनुमान जी ने बचपन में एक मीठा फल समझ कर निगल लिया था। उन्नीसवीं में श्रीराम की अँगूठी मुँह में रख कर वे विशाल समुद्र एक ही छलाँग में पार कर गए, और लाइन कहती है यह कोई अचरज नहीं था, यह तो सहज काम था। इतना बड़ा काम, और कहा गया “अचरज नाहीं”, कोई बड़ी बात नहीं।
18

जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
एक छोटी कहानी: बचपन में एक दिन हनुमान जी ने उगते सूरज को एक पका लाल फल समझ लिया और आकाश की ओर उड़ चले। उसी दिन राहु भी सूर्य-ग्रहण लगाने आ रहे थे; उन्होंने हनुमान को एक और राहु समझ लिया। इंद्र ग़ुस्से में आए और अपना वज्र चला दिया। वज्र हनुमान की ठुड्डी, संस्कृत में “हनु”, पर लगा, और वे मूर्छित हो कर गिर पड़े। इसी से उनका नाम पड़ा: “हनु-मान।” फिर पवनदेव ने ग़ुस्से में संसार की हवा रोक दी, सब देवता क्षमा माँगने आए, और हनुमान जी को ढेरों वरदान दे गए।
(इस “हज़ार योजन” में एक गणित की पहेली भी छिपी है, कुछ लोग इसे सूरज की असली दूरी से जोड़ते हैं। यह दिलचस्प है, पर सबके लिए नहीं। उतरना हो तो गहरी डुबकी में चलिए।)
19
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
एक छोटी कहानी: समुद्र लाँघने के लिए हनुमान जी महेन्द्र पर्वत पर चढ़े और छलाँग लगाई। रास्ते में समुद्र-देवता ने उन्हें सुस्ताने के लिए मैनाक पर्वत ऊपर उठाया, पर हनुमान राम-काम में बिना रुके आगे बढ़ गए। फिर नागमाता सुरसा ने परीक्षा ली, और सिंहिका नाम की राक्षसी का सामना हुआ। पूरे रास्ते में उनकी गति, बुद्धि और संयम, तीनों परखे गए। और एक प्यारी बात: इतना बड़ा काम, और लाइन कहती है “अचरज नाहीं”, कोई बड़ी बात नहीं।

यहाँ चालीसा का सुर बदल जाता है, अब वह पाठ करने वाले की ओर मुड़ती है। बीसवीं चौपाई एक सीधा भरोसा देती है: संसार के जितने भी कठिन और लगभग असंभव से लगने वाले काम हैं, हनुमान जी की कृपा मिल जाए तो वे सब आसान हो जाते हैं, “दुर्गम” और “सुगम” के बीच की दूरी उतनी पक्की नहीं जितनी दिखती है। इक्कीसवीं में वे श्रीराम के द्वार के रक्षक हैं, मुख्य द्वारपाल, उनकी अनुमति के बिना कोई वहाँ प्रवेश नहीं कर सकता, यानी जो राम तक पहुँचना चाहे उसे पहले हनुमान जी से होकर जाना है, भक्ति का रास्ता सेवा से होकर जाता है। बाईसवीं में जो उनकी शरण में आ जाता है उसे हर तरह का सुख सहज मिल जाता है, और जब रक्षक वे ख़ुद हों तो किसी का डर नहीं रहता, “काहू को डर ना”। चालीसा बार-बार इसी एक भाव पर लौटती है, डर का घटना, और शायद यही इसकी सबसे बड़ी देन है।
20
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
21
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
22
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना॥

अब नाम की महिमा वाली लहर आती है, और यह सबसे ज़्यादा पाठ की जाने वाली पंक्तियों में है। तेईसवीं चौपाई एक बारीक बात कहती है: हनुमान जी का तेज इतना है कि उसे सँभालने वाले केवल वे ख़ुद हैं, कोई और उसे धारण नहीं कर सकता, और उनकी एक ललकार से तीनों लोक काँप उठते हैं। ताक़त होना एक बात है, उसे सँभाल पाना दूसरी और बड़ी बात। चौबीसवीं में जब कोई “महावीर हनुमान” का नाम लेता है, तो भूत-प्रेत जैसी नकारात्मक शक्तियाँ पास नहीं फटकतीं, एक नाम, और मन का अँधेरा कोना थोड़ा रोशन। पच्चीसवीं में जो लगातार वीर हनुमान का नाम जपता है उसके रोग नष्ट होते हैं और शरीर-मन की पीड़ाएँ दूर होती हैं, और यहाँ “निरंतर” शब्द चाबी है, एक बार का जप नहीं, लगातार। छब्बीसवीं एक सुंदर शर्त रखती है: जो मन से, काम से और बोली से, तीनों तरह से ध्यान लगाता है, उसे हनुमान जी हर संकट से छुड़ा देते हैं। जो सोचते हैं, जो करते हैं, जो बोलते हैं, तीनों एक सुर में हों, असली भक्ति यही एका है।
23

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक ते काँपै॥
24
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥
(इस “भूत-पिशाच” के एक गहरे, मनोवैज्ञानिक अर्थ में जाना हो, तो गहरी डुबकी में बात है।)
25
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
26
संकट ते हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
अगली लहर राम और हनुमान जी के रिश्ते को और फल की बात को जोड़ती है। सत्ताईसवीं में तपस्वी राजा श्रीराम सबसे ऊपर हैं, सबके स्वामी, और उन्हीं के सारे काम हनुमान जी ने सँवारे और पूरे किए, “तपस्वी राजा”, राजा यानी ताक़त और तपस्वी यानी संयम, राम दोनों एक साथ हैं। अट्ठाईसवीं में जो कोई अपनी मनोकामना ले कर उनके सामने आता है उसे जीवन में अपार फल मिलता है, सच्चे मन से की गई कोई प्रार्थना ख़ाली नहीं जाती। उनतीसवीं में सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग, चारों युगों में उनका प्रताप मौजूद है, वे प्रसिद्ध हैं और सारे संसार में उजाला फैलाने वाले, परम्परा उन्हें अजर-अमर मानती है, कलियुग में भी सशरीर मौजूद, और समय के पार होने का यह भाव अपने आप में एक सुकून देता है। तीसवीं में वे साधु-संतों के रक्षक हैं, असुरों यानी अधर्मी प्रवृत्तियों के नाशक, और श्रीराम के सबसे “दुलारे” भक्त। इस “दुलारे” पर ज़रा रुकिए, यह “महान भक्त” नहीं कहता, घर का सबसे प्यारा कहता है, इस पूरी वीरता-गाथा के बीच एक नन्हा सा कोमल शब्द।
27
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
28
और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै॥
29
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
30
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
अब चालीसा भक्ति के सबसे गहरे भाव की ओर बढ़ती है। इकतीसवीं में वे आठ सिद्धियों और नौ निधियों के दाता हैं, और ऐसा वरदान उन्हें ख़ुद माँ जानकी ने अशोक वाटिका में दिया था, यानी जो उन्हें मिला, वह उन्होंने आगे बाँटने के लिए ही लिया। बत्तीसवीं में एक प्यारी बात है: राम-भक्ति रूपी अमृत यानी रसायन उन्हीं के पास है, और फिर भी जो वे चुनते हैं वह है हमेशा श्रीराम का दास बने रहना। सब कुछ पास है, सिद्धियाँ, निधियाँ, अमृत, और चुनाव “दास” होने का, भक्ति का सबसे ऊँचा भाव यहीं है। तैंतीसवीं में उनका भजन करने से भक्त ख़ुद श्रीराम को पा लेता है और जन्म-जन्मांतर के दुख भूल जाता है, सेवक का दरवाज़ा, स्वामी का घर। चौंतीसवीं एक कोमल भरोसा देती है: उपासक को अंत समय में राम के धाम की प्राप्ति होती है, और अगर वह फिर जन्म ले भी, तो “हरि-भक्त” के रूप में ही, भक्ति की डोर अगले जन्म में भी बनी रहती है।
31
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥
एक छोटी कहानी: अशोक वाटिका में जब हनुमान जी ने सीता को राम का संदेश और अँगूठी सौंपी, और उनकी पीड़ा में सच्चे मन से शामिल हुए, तब सीता ने ख़ुश हो कर वरदान दिया, कि वे भक्तों को आठ सिद्धियाँ और नौ निधियाँ देने में समर्थ होंगे। यानी जो उन्हें मिला, वह उन्होंने आगे बाँटने के लिए ही लिया।
(आठ सिद्धियाँ कौनसी, नौ निधियाँ क्या, हर एक की अपनी पहचान है। पूरी सूची और उनका अर्थ गहरी डुबकी में है। नहीं उतरना, तो आगे बढ़िए, कहानी ऐसे भी पूरी है।)

32
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥
33
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥
34
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥
अब अनन्यता का भाव आता है, एक जगह पूरा मन लगा देना। पैंतीसवीं में भक्त को किसी और देवता को मन में बसाने की ज़रूरत नहीं रहती, केवल हनुमान जी की सेवा-भक्ति से ही सब तरह के सुख मिल जाते हैं, और इसमें कोई संकीर्णता नहीं, क्योंकि हनुमान जी ख़ुद राम के परम भक्त हैं, उनकी सेवा में सब देवताओं की कृपा अपने आप समाई है। छत्तीसवीं वही बात दोहराती है जो चालीसा पहले कह चुकी है: जो बलवान वीर हनुमान का सच्चे मन से स्मरण करता है उसके सारे संकट कट जाते हैं और सब पीड़ाएँ मिट जाती हैं। यह दोहराव यूँ है जैसे एक भरोसेमंद दोस्त एक ज़रूरी बात दोबारा कह दे, ताकि वह दिल में बैठ जाए।
35
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्व सुख करई॥

36
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
आख़िरी चार चौपाइयाँ चालीसा को इसके समापन की ओर ले जाती हैं, और तुलसीदास की अपनी पुकार सामने आती है। सैंतीसवीं में वे हनुमान जी को तीन बार जय कहते हैं, तन से, मन से, आत्मा से, और प्रार्थना करते हैं कि जैसे एक गुरु अपने शिष्य पर कृपा करता है वैसे ही उन पर कृपा बरसे, “गोसाईं” शब्द का अर्थ ही है इन्द्रियों का स्वामी, जिसने ख़ुद को साध लिया वही दूसरे को राह दिखा सकता है। अड़तीसवीं में जो इस चालीसा का सौ बार पाठ करता है वह हर तरह के बंधनों से छूट जाता है और उसे गहरा सुख मिलता है, और याद रखिए तुलसीदास ने यह ख़ुद एक जेल में लिखी थी, “छूटहि बंदि” उनके लिए सिर्फ़ रूपक नहीं, अपना जिया हुआ सच था। उनतालीसवीं में जो इसे नियम से पढ़ता है उसे सिद्धि मिलती है, और इसके साक्षी ख़ुद गौरीपति भगवान शिव हैं, यह वादा हल्के में नहीं किया गया। और चालीसवीं, आख़िरी चौपाई में, तुलसीदास ख़ुद को सदा श्रीहरि का दास कहते हैं और बस एक चीज़ माँगते हैं, “हे नाथ, कृपा कर के मेरे हृदय में स्थायी डेरा डाल दीजिए।” चालीस चौपाइयाँ महिमा गाती रहीं, और अंत में सब कुछ छोड़ कर बस यही एक इच्छा, मेरे हृदय में रह जाइए।
37
जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
38
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥
39
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
(इस एक लाइन में अद्वैत वेदान्त का एक गहरा सूत्र भी छिपा है, वादा करने वाला, पूरा करने वाला, और गवाह, तीनों एक ही। इसमें उतरना हो तो गहरी डुबकी में चलिए।)
40
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
चालीसा एक प्रार्थना से शुरू हुई थी, मन का आईना साफ़ करने की, और एक प्रार्थना पर ख़त्म होती है, उस साफ़ हुए हृदय में सबको बसा लेने की। समापन दोहे में तुलसीदास पवनपुत्र को सब संकटों का हरन करने वाला और ख़ुद मंगल की साक्षात मूरत कहते हैं, और देवताओं के स्वामी से बस इतनी विनती करते हैं कि वे राम, लक्ष्मण और सीता के साथ सदा उनके हृदय में बसें। शुरू और अंत, एक ही धागे से बँधे।
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
॥ बोलो बजरंग बली की जय ॥
और गहराई में जाना है? चाहें तो।
ऊपर पूरी हनुमान चालीसा है, और इतना अपने आप में पूरा है। पर अगर आप उन पाठकों में से हैं जिन्हें परतें खोलना अच्छा लगता है, आठ सिद्धियाँ असल में क्या हैं, “पवनपुत्र” में “पवन” का गहरा अर्थ क्या है, “हज़ार योजन” वाली गणित की पहेली, और कुछ शब्दों के योग-दर्शन वाले अर्थ, तो उसके लिए एक अलग पन्ना है।
वह जान-बूझ कर अलग रखा गया है, ताकि यह मुख्य पाठ हल्का और बहता हुआ रहे। उतरना हो तो उतरिए, न उतरना हो तो कोई बात नहीं।
→ हनुमान चालीसा · गहरी डुबकी (गूढ़ शब्द, पवनपुत्र का रहस्य, और बहुत कुछ)
तुलसीदास की एक झलक
गोस्वामी तुलसीदास का जन्म, प्रचलित मान्यता के अनुसार, सन् 1532 में उत्तर प्रदेश के राजापुर में हुआ, और देहांत 1623 में वाराणसी के अस्सी घाट पर। यानी लगभग 91 साल का लंबा जीवन।
वे संस्कृत के गहरे विद्वान थे। पर उनकी असली पहचान इस एक हिम्मत वाले फ़ैसले से बनी, उन्होंने अपनी बड़ी रचनाएँ अवधी और ब्रजभाषा में लिखीं, गाँव-देहात की लोकभाषाओं में। उस ज़माने में शास्त्र सिर्फ़ संस्कृत में रचे जाते थे, और लोकभाषा को उस गरिमा के लायक़ नहीं समझा जाता था। तुलसीदास ने यह दीवार तोड़ी, और इसके लिए काशी के कुछ पंडितों का कड़ा विरोध भी झेला। उनका सीधा सा तर्क था: अगर आम स्त्री-पुरुष भगवान की कथा सुन ही न सकें, तो उस कथा का फ़ायदा क्या।
उनकी सबसे बड़ी कृति है श्रीरामचरितमानस, दस हज़ार से ज़्यादा लाइनों का ग्रंथ, जो हिन्दी का सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला ग्रंथ माना जाता है। और हनुमान चालीसा? वह उसकी ठीक उल्टी है, सिर्फ़ तैंतालीस लाइनें, ताकि किसान, व्यापारी, बच्चा, स्त्री, हर कोई इसे आसानी से याद कर सके। यही छोटा रूप ही इसकी सबसे बड़ी कामयाबी की वजह बना।
पढ़ कर आगे क्या
अगर “गहरी डुबकी” वाली परतें खोलने का मन है, वह पन्ना यहाँ है।
इसी site पर: भगवद् गीता भी ठीक उसी एक बात पर लौटती है जिस पर चालीसा बार-बार लौटती है, डर का घटना, और काम में अनासक्ति। चौपाई 7 (“सारी क़ाबिलियत, फिर भी सेवा के लिए आतुर”) और गीता का 2.47 आपस में बात करते हैं।
और एक सवाल जेब में रखिए: चालीसा कहती है हनुमान जी “सुमति के संगी” हैं, सही सोच के दोस्त। आज एक मौक़ा देखिए जहाँ थोड़ी ज़्यादा हिम्मत और थोड़ी ज़्यादा साफ़ सोच, दोनों एक साथ काम आ सकती थीं।
साथ में पढ़ें · Companion Texts
- विष्णु सहस्रनाम devotional-stuti का formal counterpart।
- नारद भक्ति सूत्र भक्ति का formal definition।
- रामायण की उद्धव-गीता राम-कथा का narrative cousin।

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देवदत्त पट्टनायक की पुस्तक ‘My Hanuman Chalisa’ का pdf। हनुमान-कथा का सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक पाठ।