अंग
271
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਹੋਇ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ॥
ਪ੍ਰਭੂ ਦਇਆ ਤੇ ਕਮਲ ਬਿਗਾਸੁ ॥
ਪ੍ਰਭ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਬਸੈ ਮਨਿ ਸੋਇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਦਇਆ ਤੇ ਮਤਿ ਊਤਮ ਹੋਇ ॥
ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੀ ਮਇਆ ॥
ਆਪਹੁ ਕਛੂ ਨ ਕਿਨਹੂ ਲਇਆ ॥
ਜਿਤੁ ਜਿਤੁ ਲਾਵਹੁ ਤਿਤੁ ਲਗਹਿ ਹਰਿ ਨਾਥ ॥
ਨਾਨਕ ਇਨ ਕੈ ਕਛੂ ਨ ਹਾਥ ॥੮॥੬॥
ਪ੍ਰਭੂ ਦਇਆ ਤੇ ਕਮਲ ਬਿਗਾਸੁ ॥
ਪ੍ਰਭ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਬਸੈ ਮਨਿ ਸੋਇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਦਇਆ ਤੇ ਮਤਿ ਊਤਮ ਹੋਇ ॥
ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੀ ਮਇਆ ॥
ਆਪਹੁ ਕਛੂ ਨ ਕਿਨਹੂ ਲਇਆ ॥
ਜਿਤੁ ਜਿਤੁ ਲਾਵਹੁ ਤਿਤੁ ਲਗਹਿ ਹਰਿ ਨਾਥ ॥
ਨਾਨਕ ਇਨ ਕੈ ਕਛੂ ਨ ਹਾਥ ॥੮॥੬॥
प्रभ किरपा ते होइ प्रगासु ॥
प्रभू दइआ ते कमल बिगासु ॥
प्रभ सुप्रसंन बसै मनि सोइ ॥
प्रभ दइआ ते मति ऊतम होइ ॥
सरब निधान प्रभ तेरी मइआ ॥
आपहु कछू न किनहू लइआ ॥
जितु जितु लावहु तितु लगहि हरि नाथ ॥
नानक इन कै कछू न हाथ ॥८॥६॥
प्रभू दइआ ते कमल बिगासु ॥
प्रभ सुप्रसंन बसै मनि सोइ ॥
प्रभ दइआ ते मति ऊतम होइ ॥
सरब निधान प्रभ तेरी मइआ ॥
आपहु कछू न किनहू लइआ ॥
जितु जितु लावहु तितु लगहि हरि नाथ ॥
नानक इन कै कछू न हाथ ॥८॥६॥
हिन्दी अर्थ: प्रभू की मेहर से (मन में ज्ञान का) प्रकाश होता है; उसकी दया से हृदय रूपी कमल फूल खिलता है। वह प्रभू (उस मनुष्य के) मन में बसता है जिस पे वह प्रसन्न होता है। प्रभू की मेहर से (मनुष्य की) बुद्धि अच्छी होती है। हे प्रभू ! तेरी मेहर की नजर में सारे खजाने हैं। अपने यत्न से किसी ने भी कुछ नहीं पाया (भाव। जीव की उद्यम तभी सफल होता है जब तू सीधी नजर करता है)। हे हरी ! हे नाथ ! जिधर तू लगाता है उधर ये जीव लगते हैं। हे नानक ! इन जीवों के वश में कुछ नहीं।8।6।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਅਗਮ ਅਗਾਧਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਸੋਇ ॥
ਜੋ ਜੋ ਕਹੈ ਸੁ ਮੁਕਤਾ ਹੋਇ ॥
ਸੁਨਿ ਮੀਤਾ ਨਾਨਕੁ ਬਿਨਵੰਤਾ ॥ ਸਾਧ ਜਨਾ ਕੀ ਅਚਰਜ ਕਥਾ ॥੧॥
ਅਗਮ ਅਗਾਧਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਸੋਇ ॥
ਜੋ ਜੋ ਕਹੈ ਸੁ ਮੁਕਤਾ ਹੋਇ ॥
ਸੁਨਿ ਮੀਤਾ ਨਾਨਕੁ ਬਿਨਵੰਤਾ ॥ ਸਾਧ ਜਨਾ ਕੀ ਅਚਰਜ ਕਥਾ ॥੧॥
सलोकु ॥
अगम अगाधि पारब्रहमु सोइ ॥
जो जो कहै सु मुकता होइ ॥
सुनि मीता नानकु बिनवंता ॥ साध जना की अचरज कथा ॥१॥
अगम अगाधि पारब्रहमु सोइ ॥
जो जो कहै सु मुकता होइ ॥
सुनि मीता नानकु बिनवंता ॥ साध जना की अचरज कथा ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ वह बेअंत प्रभू (जीव की) पहुँच से परे है और अथाह है। जो जो (मनुष्य उसको) सिमरते हैं वे (विकारों के जाल से) निजात पा लेते हैं। हे मित्र ! सुन नानक विनती कर्ता है – (सिमरन करने वाले) गुरमुखों (के गुणों) का जिक्र हैरान करने वाला है (भाव। सिमरन की बरकति से भक्त जनों में इतने गुण पैदा हो जाते हैं कि उन गुणों की बात छेड़ के आश्चर्यचकित हो जाते हैं)।1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮੁਖ ਊਜਲ ਹੋਤ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਲੁ ਸਗਲੀ ਖੋਤ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਿਟੈ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਪ੍ਰਗਟੈ ਸੁਗਿਆਨੁ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਬੁਝੈ ਪ੍ਰਭੁ ਨੇਰਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਸਭੁ ਹੋਤ ਨਿਬੇਰਾ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਪਾਏ ਨਾਮ ਰਤਨੁ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਏਕ ਊਪਰਿ ਜਤਨੁ ॥
ਸਾਧ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਬਰਨੈ ਕਉਨੁ ਪ੍ਰਾਨੀ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਧ ਕੀ ਸੋਭਾ ਪ੍ਰਭ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨੀ ॥੧॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮੁਖ ਊਜਲ ਹੋਤ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਲੁ ਸਗਲੀ ਖੋਤ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਿਟੈ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਪ੍ਰਗਟੈ ਸੁਗਿਆਨੁ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਬੁਝੈ ਪ੍ਰਭੁ ਨੇਰਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਸਭੁ ਹੋਤ ਨਿਬੇਰਾ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਪਾਏ ਨਾਮ ਰਤਨੁ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਏਕ ਊਪਰਿ ਜਤਨੁ ॥
ਸਾਧ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਬਰਨੈ ਕਉਨੁ ਪ੍ਰਾਨੀ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਧ ਕੀ ਸੋਭਾ ਪ੍ਰਭ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨੀ ॥੧॥
असटपदी ॥
साध कै संगि मुख ऊजल होत ॥
साधसंगि मलु सगली खोत ॥
साध कै संगि मिटै अभिमानु ॥
साध कै संगि प्रगटै सुगिआनु ॥
साध कै संगि बुझै प्रभु नेरा ॥
साधसंगि सभु होत निबेरा ॥
साध कै संगि पाए नाम रतनु ॥
साध कै संगि एक ऊपरि जतनु ॥
साध की महिमा बरनै कउनु प्रानी ॥
नानक साध की सोभा प्रभ माहि समानी ॥१॥
साध कै संगि मुख ऊजल होत ॥
साधसंगि मलु सगली खोत ॥
साध कै संगि मिटै अभिमानु ॥
साध कै संगि प्रगटै सुगिआनु ॥
साध कै संगि बुझै प्रभु नेरा ॥
साधसंगि सभु होत निबेरा ॥
साध कै संगि पाए नाम रतनु ॥
साध कै संगि एक ऊपरि जतनु ॥
साध की महिमा बरनै कउनु प्रानी ॥
नानक साध की सोभा प्रभ माहि समानी ॥१॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी। गुरमुखों की संगति में रहने से मुंह उजले होते हैं (भाव इज्जत बनती है) (क्योंकि) साधु जनों के पास रहने से (विकारों की) सारी मैल मिट जाती है। साधुओं की संगति में अहंकार दूर होता है। और श्रेष्ठ ज्ञान प्रगट होता है (अर्थात अच्छी बुद्धि आती है)। संतों की संगति में प्रभू अंग-संग बसता प्रतीत होता है। (इस वास्ते बुरे संस्कारों या वासना का) सारा फैसला हो जाता है (भाव। बुरी तरफ जीव पड़ता ही नहीं)। गुरमुखों की संगति में मनुष्य नाम-रूपी रत्न ढूँढ लेता है। और एक प्रभू को मिलने का यत्न करता है। साधुओं की महिमा कौन सा मनुष्य बयान कर सकता है? (क्योंकि) हे नानक ! साध जनों की शोभा प्रभू की शोभा के बराबर हो जाती है।1।
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਅਗੋਚਰੁ ਮਿਲੈ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸਦਾ ਪਰਫੁਲੈ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਆਵਹਿ ਬਸਿ ਪੰਚਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਭੁੰਚਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹੋਇ ਸਭ ਕੀ ਰੇਨ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਨੋਹਰ ਬੈਨ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨ ਕਤਹੂੰ ਧਾਵੈ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਅਸਥਿਤਿ ਮਨੁ ਪਾਵੈ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਾਇਆ ਤੇ ਭਿੰਨ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ॥੨॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸਦਾ ਪਰਫੁਲੈ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਆਵਹਿ ਬਸਿ ਪੰਚਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਭੁੰਚਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹੋਇ ਸਭ ਕੀ ਰੇਨ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਨੋਹਰ ਬੈਨ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨ ਕਤਹੂੰ ਧਾਵੈ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਅਸਥਿਤਿ ਮਨੁ ਪਾਵੈ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਾਇਆ ਤੇ ਭਿੰਨ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ॥੨॥
साध कै संगि अगोचरु मिलै ॥
साध कै संगि सदा परफुलै ॥
साध कै संगि आवहि बसि पंचा ॥
साधसंगि अंम्रित रसु भुंचा ॥
साधसंगि होइ सभ की रेन ॥
साध कै संगि मनोहर बैन ॥
साध कै संगि न कतहूं धावै ॥
साधसंगि असथिति मनु पावै ॥
साध कै संगि माइआ ते भिंन ॥
साधसंगि नानक प्रभ सुप्रसंन ॥२॥
साध कै संगि सदा परफुलै ॥
साध कै संगि आवहि बसि पंचा ॥
साधसंगि अंम्रित रसु भुंचा ॥
साधसंगि होइ सभ की रेन ॥
साध कै संगि मनोहर बैन ॥
साध कै संगि न कतहूं धावै ॥
साधसंगि असथिति मनु पावै ॥
साध कै संगि माइआ ते भिंन ॥
साधसंगि नानक प्रभ सुप्रसंन ॥२॥
हिन्दी अर्थ: गुरमुखों की संगति में (मनुष्य को) वह प्रभू मिल जाता है जो शारीरिक इन्द्रियों की पहुँच से परे है; और मनुष्य सदा खिले माथे रहता है। साध जनों की संगति में रहने से कामादिक पाँच विकार काबू में आ जाते हैं। (क्योंकि मनुष्य) नाम रूपी अमृत का रस चख लेता है। साध जनों की संगति करने से (मनुष्य) सब (प्राणियों) के चरणों की धूड़ बन जाता है और (सबसे) मीठे वचन बोलता है। संत जनों के संग रहने से (मनुष्य का) मन किसी तरफ नहीं दौड़ता है। और (प्रभू के चरणों में) टिकाव हासिल कर लेता है। हे नानक ! गुरमुखों की संगति में टिकने से (मनुष्य) माया के (असर) से बेदाग रहता है और अकाल-पुरख इस पर दयावान होता है।2।
ਸਾਧਸੰਗਿ ਦੁਸਮਨ ਸਭਿ ਮੀਤ ॥
ਸਾਧੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਹਾ ਪੁਨੀਤ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਕਿਸ ਸਿਉ ਨਹੀ ਬੈਰੁ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨ ਬੀਗਾ ਪੈਰੁ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨਾਹੀ ਕੋ ਮੰਦਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਜਾਨੇ ਪਰਮਾਨੰਦਾ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨਾਹੀ ਹਉ ਤਾਪੁ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਤਜੈ ਸਭੁ ਆਪੁ ॥
ਆਪੇ ਜਾਨੈ ਸਾਧ ਬਡਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਧ ਪ੍ਰਭੂ ਬਨਿ ਆਈ ॥੩॥
ਸਾਧੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਹਾ ਪੁਨੀਤ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਕਿਸ ਸਿਉ ਨਹੀ ਬੈਰੁ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨ ਬੀਗਾ ਪੈਰੁ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨਾਹੀ ਕੋ ਮੰਦਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਜਾਨੇ ਪਰਮਾਨੰਦਾ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨਾਹੀ ਹਉ ਤਾਪੁ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਤਜੈ ਸਭੁ ਆਪੁ ॥
ਆਪੇ ਜਾਨੈ ਸਾਧ ਬਡਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਧ ਪ੍ਰਭੂ ਬਨਿ ਆਈ ॥੩॥
साधसंगि दुसमन सभि मीत ॥
साधू कै संगि महा पुनीत ॥
साधसंगि किस सिउ नही बैरु ॥
साध कै संगि न बीगा पैरु ॥
साध कै संगि नाही को मंदा ॥
साधसंगि जाने परमानंदा ॥
साध कै संगि नाही हउ तापु ॥
साध कै संगि तजै सभु आपु ॥
आपे जानै साध बडाई ॥
नानक साध प्रभू बनि आई ॥३॥
साधू कै संगि महा पुनीत ॥
साधसंगि किस सिउ नही बैरु ॥
साध कै संगि न बीगा पैरु ॥
साध कै संगि नाही को मंदा ॥
साधसंगि जाने परमानंदा ॥
साध कै संगि नाही हउ तापु ॥
साध कै संगि तजै सभु आपु ॥
आपे जानै साध बडाई ॥
नानक साध प्रभू बनि आई ॥३॥
हिन्दी अर्थ: गुरमुखों की संगति में रहने से सारे वैरी (भी) मित्र (दिखाई देने लग जाते हैं)। (क्योंकि) साध जनों की संगति में (मनुष्य का अपना हृदय) बहुत साफ हो जाता है। संतों की संगति में बैठने से किसी के साथ वैर नहीं रह जाता और किसी बुरी तरफ पैर नहीं चलता। भलों की संगति में कोई मनुष्य बुरा नहीं दिखता। (क्योंकि हर जगह मनुष्य) उच्च सुख के मालिक प्रभू को ही जानता है। गुरमुख की संगति करने से अहंकार रूपी ताप नहीं रह जाता। (क्योंकि) साधु की संगति में मनुष्य सारे अपनत्व त्याग देता है। साधू का बड़ापन (वडिआई) प्रभू खुद ही जानता है। (क्योंकि) हे नानक ! साधू का और प्रभू का पक्का प्यार पड़ जाता है।
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨ ਕਬਹੂ ਧਾਵੈ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਬਸਤੁ ਅਗੋਚਰ ਲਹੈ ॥
ਸਾਧੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ਅਜਰੁ ਸਹੈ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਬਸੈ ਥਾਨਿ ਊਚੈ ॥
ਸਾਧੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਹਲਿ ਪਹੂਚੈ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਦ੍ਰਿੜੈ ਸਭਿ ਧਰਮ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਕੇਵਲ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਪਾਏ ਨਾਮ ਨਿਧਾਨ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਧੂ ਕੈ ਕੁਰਬਾਨ ॥੪॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਬਸਤੁ ਅਗੋਚਰ ਲਹੈ ॥
ਸਾਧੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ਅਜਰੁ ਸਹੈ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਬਸੈ ਥਾਨਿ ਊਚੈ ॥
ਸਾਧੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਹਲਿ ਪਹੂਚੈ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਦ੍ਰਿੜੈ ਸਭਿ ਧਰਮ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਕੇਵਲ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਪਾਏ ਨਾਮ ਨਿਧਾਨ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਧੂ ਕੈ ਕੁਰਬਾਨ ॥੪॥
साध कै संगि न कबहू धावै ॥
साध कै संगि सदा सुखु पावै ॥
साधसंगि बसतु अगोचर लहै ॥
साधू कै संगि अजरु सहै ॥
साध कै संगि बसै थानि ऊचै ॥
साधू कै संगि महलि पहूचै ॥
साध कै संगि द्रिड़ै सभि धरम ॥
साध कै संगि केवल पारब्रहम ॥
साध कै संगि पाए नाम निधान ॥
नानक साधू कै कुरबान ॥४॥
साध कै संगि सदा सुखु पावै ॥
साधसंगि बसतु अगोचर लहै ॥
साधू कै संगि अजरु सहै ॥
साध कै संगि बसै थानि ऊचै ॥
साधू कै संगि महलि पहूचै ॥
साध कै संगि द्रिड़ै सभि धरम ॥
साध कै संगि केवल पारब्रहम ॥
साध कै संगि पाए नाम निधान ॥
नानक साधू कै कुरबान ॥४॥
हिन्दी अर्थ: गुरमुखों की संगति में रहने से मनुष्य का मन कभी भटकता नहीं। (क्योंकि) साध जनों की संगति में (मनुष्य) सदा सुख पाता है। संत जनों की संगति में (प्रभू के) नाम रूपी अगोचर वस्तु प्राप्त हो जाती है। (और मनुष्य) ये ना संभाल पाने वाली मंजिल (मरतबा। अनूठी वस्तु) को संभाल लेता है (के काबिल हो जाता है)। गुरमुखों की संगति में रह के मनुष्य ऊँचे (आत्मिक) ठिकाने पर बसता है और अकाल-पुरख के चरणों में जुड़ा रहता है। संतों की संगति में रह के (मनुष्य) सारे धर्मों (फर्जों) को ठीक तरह समझ लेता है और सिर्फ अकाल-पुरख को (हर जगह देखता है)। साधू जनों की संगति में (मनुष्य) नाम खजाना ढूँढ लेता है; (इस वास्ते) हे नानक ! (कह,) मैं साध जनों से सदके हूँ।4।
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸਭ ਕੁਲ ਉਧਾਰੈ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਸਾਜਨ ਮੀਤ ਕੁਟੰਬ ਨਿਸਤਾਰੈ ॥
ਸਾਧੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸੋ ਧਨੁ ਪਾਵੈ ॥
ਜਿਸੁ ਧਨ ਤੇ ਸਭੁ ਕੋ ਵਰਸਾਵੈ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਧਰਮ ਰਾਇ ਕਰੇ ਸੇਵਾ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸੋਭਾ ਸੁਰਦੇਵਾ ॥
ਸਾਧੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ਪਾਪ ਪਲਾਇਨ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਗੁਨ ਗਾਇਨ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸ੍ਰਬ ਥਾਨ ਗੰਮਿ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਸਾਜਨ ਮੀਤ ਕੁਟੰਬ ਨਿਸਤਾਰੈ ॥
ਸਾਧੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸੋ ਧਨੁ ਪਾਵੈ ॥
ਜਿਸੁ ਧਨ ਤੇ ਸਭੁ ਕੋ ਵਰਸਾਵੈ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਧਰਮ ਰਾਇ ਕਰੇ ਸੇਵਾ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸੋਭਾ ਸੁਰਦੇਵਾ ॥
ਸਾਧੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ਪਾਪ ਪਲਾਇਨ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਗੁਨ ਗਾਇਨ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸ੍ਰਬ ਥਾਨ ਗੰਮਿ ॥
साध कै संगि सभ कुल उधारै ॥
साधसंगि साजन मीत कुटंब निसतारै ॥
साधू कै संगि सो धनु पावै ॥
जिसु धन ते सभु को वरसावै ॥
साधसंगि धरम राइ करे सेवा ॥
साध कै संगि सोभा सुरदेवा ॥
साधू कै संगि पाप पलाइन ॥
साधसंगि अंम्रित गुन गाइन ॥
साध कै संगि स्रब थान गंमि ॥
साधसंगि साजन मीत कुटंब निसतारै ॥
साधू कै संगि सो धनु पावै ॥
जिसु धन ते सभु को वरसावै ॥
साधसंगि धरम राइ करे सेवा ॥
साध कै संगि सोभा सुरदेवा ॥
साधू कै संगि पाप पलाइन ॥
साधसंगि अंम्रित गुन गाइन ॥
साध कै संगि स्रब थान गंमि ॥
हिन्दी अर्थ: गुरमुखों की संगति में रह के (मनुष्य अपनी) सारी कुलें (विकारों से) बचा लेता है और (अपने) सज्जन-मित्रों व परिवार को तार लेता है। संतों की संगति में मनुष्य वह धन पा लेता है। जिस धन के मिलने से हरेक मनुष्य मशहूर हो जाता है। साधु जनों की संगति में रहने से धर्मराज (भी) सेवा करता है और देवते भी शोभा करते हैं। गुरमुखों की संगति में पाप दूर हो जाते हैं। (क्योंकि वहाँ) प्रभू के अमर करने वाले गुण (मनुष्य) गाते हैं। संतों की संगति में रह के सब जगह पहुँच हो जाती है (भाव। ऊँची आत्मिक अवस्था आ जाती है);
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 271 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Dwarka के नए-बसे sector में पहली बार आए परिवार का घर देखना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 62 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 271” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 272 →, पीछे का: ← अंग 270।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।