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योग और वेदान्तमन, जागरण और अद्वैत

ब्रह्म सूत्र

वेदान्त का तीसरा प्रस्थान

ब्रह्म सूत्र

बादरायण की 555-सूत्र-योजना · शंकराचार्य के शारीरक-भाष्य द्वारा अद्वैत-निरूपण · 4 अध्याय, 16 पाद

पाठ-काल: एक पाद 15 मिनट से 1 घंटे तक

पहली पंक्ति

बादरायण ने सारे ग्रन्थ का आरम्भ एक नन्हे-से वाक्यांश से किया, जो आज भी वेदान्त-शास्त्र की सबसे विख्यात पंक्ति मानी जाती है।

सुनहरे जाले के केन्द्र में एक विशाल मकड़ी, जाला फैलकर ब्रह्माण्ड बन जाता है; उसकी बुनावट में पर्वत, नदियाँ, मन्दिर, गाँव और आकाशगंगाएँ, सब मकड़ी से ही बुने हुए
ऊर्णनाभि-तन्तु-न्याय · मकड़ी अपने ही भीतर से जाला रचती है। मुण्डक उपनिषद् (1.1.7) का यह दृष्टान्त, जिसे शंकराचार्य अपने भाष्य में कई बार उठाते हैं।
अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ 1.1.1 ॥

“अब, इसके अनन्तर, ब्रह्म की जिज्ञासा।”

तीन ही शब्द हैं, किन्तु प्रत्येक का अपना भार है।

“अथ,” अर्थात् “अब।” किन्तु कौन-सा अब? शंकराचार्य अपने भाष्य में यहीं रुक कर पूछते हैं, और इस “अब” में एक पूर्व-शर्त पढ़ते हैं। यह कर्मकाण्ड के विचार के बाद वाला अब नहीं है, शंकराचार्य स्पष्ट कहते हैं कि ब्रह्म-जिज्ञासा धर्म-जिज्ञासा से पहले भी हो सकती है और बाद में भी। यह वह अब है जब मनुष्य साधन-चतुष्टय में परिपक्व हुआ हो, धन-जन-यौवन का संग्रह कर के उसका क्षणभंगुरत्व देख चुका हो, और भीतर एक गहरी पुकार उठ रही हो, “इस सबका मूल क्या है?” तब “अब।”

“अतः,” अर्थात् “इसी कारण।” शंकराचार्य इसका कारण वेद में ही दिखाते हैं, कर्म से जो कुछ अर्जित होता है वह नष्ट हो जाता है (छान्दोग्य 8.1.6), और ब्रह्म-ज्ञान का फल परम कल्याण है। पहले तीन पुरुषार्थों, धर्म, अर्थ और काम, पर मनुष्य की यात्रा चलती रहती है, फिर एक मोड़ आता है, चौथे पुरुषार्थ मोक्ष की ओर। बादरायण का ग्रन्थ उसी मोड़ के बिन्दु से आरम्भ होता है।

“ब्रह्म-जिज्ञासा।” ब्रह्म को जानने की इच्छा, जो जान लेने पर ही पूरी होती है। यह बड़े विचार से चुना हुआ शब्द है। जिज्ञासा अर्थात् पूछना, खोजना, अन्तःकरण को उसी एक प्रश्न पर जोतना। ब्रह्म कोई वस्तु नहीं जिसे एक बार जान कर रख दिया जाए। ब्रह्म की ओर यात्रा एक अटूट अन्वेषण है, जो जानने वाले को ही बदल डालती है।

सारे ग्रन्थ की यही एक धुरी है। जो सबको देख रहा है, वह द्रष्टा कौन है। बादरायण के पाँच सौ पचपन सूत्र इसी एक प्रश्न को भिन्न-भिन्न दिशाओं से उठाते हैं।

यह ग्रन्थ क्या है

ब्रह्म सूत्र, जिसे वेदान्त सूत्र भी कहते हैं, बादरायण-व्यास की रचना है। लगभग पाँच सौ ईसा-पूर्व से दो सौ ईस्वी के बीच किसी काल में इसका संग्रथन हुआ। चार अध्याय, प्रत्येक अध्याय चार पादों में, कुल सोलह पाद, और पाँच सौ पचपन सूत्र।

सूत्र-रचना का स्वभाव ही ऐसा है कि प्रत्येक वाक्य अत्यन्त संक्षिप्त, मानो सूत में पिरोया हुआ। एक उदाहरण लीजिए, सूत्र 1.1.3 में केवल एक पद है, “शास्त्र-योनित्वात्।” अर्थात् “क्योंकि शास्त्र ही इसका प्रमाण-मूल है।” किन्तु इस एक पद में एक पूरा सिद्धान्त समाया हुआ है। इसी संक्षिप्तता के कारण ब्रह्म सूत्र को भाष्य के बिना पढ़ पाना प्रायः असम्भव है।

तीन प्रमुख आचार्यों ने इस पर भाष्य रचा, आदि शंकराचार्य (आठवीं शताब्दी, अद्वैत), रामानुजाचार्य (ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी, विशिष्टाद्वैत), और मध्वाचार्य (तेरहवीं शताब्दी, द्वैत)। तीनों ने एक ही ग्रन्थ पढ़ कर तीन भिन्न सिद्धान्त निकाले। यह बादरायण की सूत्र-शैली का स्वाभाविक परिणाम है, हर सूत्र इतना सघन है कि उस पर एक से अधिक अर्थ ठहर सकते हैं।

हमारी यह टीका शंकराचार्य के शारीरक-भाष्य का अनुसरण करती है, अर्थात् अद्वैत-स्थापन। जहाँ रामानुज अथवा मध्व का पाठ विशेष मननीय है, वहाँ हम उसका उल्लेख अवश्य करेंगे।

प्रस्थान-त्रयी

वेदान्त-दर्शन तीन मूल ग्रन्थों पर खड़ा है, जिन्हें “प्रस्थान-त्रयी” कहते हैं:

  • श्रुति-प्रस्थान: उपनिषद्, जो वेदों का अन्तिम भाग हैं। यह “सुनी हुई,” ऋषियों द्वारा साक्षात्कृत वाणी है।
  • स्मृति-प्रस्थान: भगवद् गीता, जो “स्मरण में धारण की हुई,” कथित ज्ञान है।
  • न्याय-प्रस्थान: ब्रह्म-सूत्र, जो युक्ति और तर्क की कसौटी पर रखा हुआ बादरायण का सुव्यवस्थित निरूपण है।

तीनों एक ही तत्त्व की ओर संकेत करते हैं, किन्तु तीन भिन्न रीतियों से। उपनिषद् प्रायः छन्दोबद्ध और आख्यान-रूप में बोलते हैं। गीता संवाद के रूप में। और ब्रह्म सूत्र युक्ति-तर्क की कसौटी पर।

चार अध्याय, हर अध्याय में चार पाद

अध्याय 1

समन्वय

“समस्त उपनिषद् ब्रह्म पर ही आ कर मिलते हैं।” एक सौ चौंतीस सूत्र, चार पादों में। उपनिषद्-वाक्यों के सांख्य-परक अर्थ का, अर्थात् प्रधान-कारणवाद का, खण्डन। मूल स्थापना, ब्रह्म ही जगत् का कारण है, और सारे उपनिषद्-वचन उसी ओर संकेत करते हैं।

  1. पाद 1 · ब्रह्म के स्वरूप का निर्धारणसूत्र 1.1.1 से 1.1.31 · लगभग 30 मिनट
  2. पाद 2 · अन्य तत्त्वों की कल्पना का खण्डनसूत्र 1.2.1 से 1.2.32 · लगभग 20 मिनट
  3. पाद 3 · आगे के प्रमाण और देवता के अधिकार का विचारसूत्र 1.3.1 से 1.3.43 · लगभग 35 मिनट
  4. पाद 4 · सांख्य का खण्डन और ब्रह्म दोनों कारणसूत्र 1.4.1 से 1.4.28 · लगभग 30 मिनट
अध्याय 2

अविरोध

“वेदान्त के सिद्धान्त में कोई आन्तरिक विरोध नहीं।” एक सौ सत्तावन सूत्र। सांख्य, वैशेषिक, बौद्ध और जैन की आपत्तियों का युक्ति से समाधान। यहीं ग्रन्थ अपने सिद्धान्त की रक्षा करता है।

  1. पाद 1 · अद्वैत सिद्धान्त की निर्विरोधतासूत्र 2.1.1 से 2.1.37 · लगभग 50 मिनट
  2. पाद 2 · प्रतिपक्षी दर्शनों का खण्डनसूत्र 2.2.1 से 2.2.45 · लगभग 40 मिनट
  3. पाद 3 · पंचभूत और जीव की उत्पत्तिसूत्र 2.3.1 से 2.3.53 · लगभग 50 मिनट
  4. पाद 4 · इन्द्रियाँ और प्राणसूत्र 2.4.1 से 2.4.22 · लगभग 25 मिनट
अध्याय 3

साधन

“ब्रह्म-साक्षात्कार का साधन।” एक सौ छियासी सूत्र। वैराग्य के लिए जीव के आवागमन का विचार, स्वप्न-सुषुप्ति में जीव और ब्रह्म का स्वरूप, भिन्न-भिन्न विद्याओं का विवेचन, और ज्ञान, कर्म तथा आश्रमों की भूमिका।

  1. पाद 1 · मृत्यु के समय जीव की गतिसूत्र 3.1.1 से 3.1.27 · लगभग 20 मिनट
  2. पाद 2 · ब्रह्म का सगुण-निर्गुण रूप और चेतना की अवस्थाएँसूत्र 3.2.1 से 3.2.41 · लगभग 30 मिनट
  3. पाद 3 · उपनिषद्-विद्याओं की एकतासूत्र 3.3.1 से 3.3.66 · लगभग 1 घंटा
  4. पाद 4 · विद्या पुरुषार्थ-रूप और संन्यास-विचारसूत्र 3.4.1 से 3.4.52 · लगभग 35 मिनट
अध्याय 4

फल

“फल, अर्थात् मुक्ति।” अठहत्तर सूत्र। ब्रह्म-साक्षात्कार के अनन्तर क्या होता है, देहत्याग के पश्चात् की गति (देवयान और पितृयान), जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति।

  1. पाद 1 · उपासना और कर्म-क्षपणसूत्र 4.1.1 से 4.1.19 · लगभग 30 मिनट
  2. पाद 2 · देहत्याग के समय जीव की भीतरी यात्रासूत्र 4.2.1 से 4.2.21 · लगभग 20 मिनट
  3. पाद 3 · देवयान-मार्ग और क्रम-मुक्तिसूत्र 4.3.1 से 4.3.16 · लगभग 20 मिनट
  4. पाद 4 · मुक्ति-अनुभव और अंतिम वचनसूत्र 4.4.1 से 4.4.22 · लगभग 15 मिनट

“अधिकरण” क्या है

ब्रह्म सूत्र को एक-एक सूत्र अलग-अलग पढ़ना निष्फल है। एक-दो पदों में पूरा तर्क प्रकट नहीं होता। इसी कारण परम्परा ने “अधिकरण” का आश्रय लिया, अर्थात् किसी एक विषय पर एक से लेकर सत्रह सूत्रों तक का समूह, जो मिल कर एक पूर्ण विचार को वहन करता है।

हर अधिकरण के पाँच अंग होते हैं, परम्परा के अनुसार:

  1. विषय: किस विषय पर विचार चल रहा है
  2. संशय: कौन-सा सन्देह उठता है
  3. पूर्व-पक्ष: विरोधी का मत
  4. उत्तर-पक्ष: सिद्धान्त-पक्ष
  5. संगति: यह अधिकरण पिछले से किस प्रकार जुड़ा है

हम हर अधिकरण को इन्हीं पाँच अंगों के क्रम में खोलते हैं, किन्तु शीर्षकों के बोझ के बिना, सहज संवाद-शैली में।

कैसे पढ़ें

एक रीति, केवल पहला सूत्र लीजिए, “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा।” उस पर एक सप्ताह बैठिए। फिर अगला अधिकरण। यह सबसे मन्थर गति है, किन्तु सबसे सच्ची।

दूसरी रीति, पहले अध्याय एक के चारों पाद एक-एक कर के पढ़िए, एक बैठक में एक पाद। अध्याय एक का हर पाद बीस से पैंतीस मिनट का है। समूचा अध्याय एक लगभग दो घण्टे में।

तीसरी रीति, केवल विख्यात सूत्र लीजिए, 1.1.1 (अथातो ब्रह्मजिज्ञासा), 1.1.2 (जन्माद्यस्य यतः), 1.1.4 (तत्तु समन्वयात्), और बीच के कुछ प्रमुख सूत्र। यह दस मिनट का विहंगम दर्शन है।

एक ही बैठक में आदि से अन्त तक पढ़ने का प्रयास न कीजिए। यह ग्रन्थ उस रीति के लिए रचा ही नहीं गया।

साथ में पढ़ें

स्रोत: देवनागरी सूत्र-पाठ, उसकी क्रम-संख्या और अधिकरण-विभाग शंकर-भाष्य वाले हैं (555 सूत्र, 191 अधिकरण), sanskritdocuments.org की ब्रह्मसूत्राधिकरण-अनुक्रमणिका से, जो स्वामी गम्भीरानन्द के अनुवाद और बेलवलकर के ब्रह्मसूत्रपाठ से तैयार हुई है।

परम्परा: ब्रह्म सूत्र, बादरायण-व्यास। प्रस्थान-त्रयी का तीसरा प्रस्थान। शंकराचार्य (आठवीं शताब्दी) ने पहला सुव्यवस्थित भाष्य रचा, रामानुज (ग्यारहवीं-बारहवीं) और मध्व (तेरहवीं) ने भिन्न-भिन्न पाठ दिए।

अनुज्ञप्ति: मूल संस्कृत पाठ सार्वजनिक-सम्पदा। हिन्दी टीका lulla.net, CC BY-NC 4.0।