ब्रह्म सूत्र
बादरायण की 555-सूत्र-योजना · वेदान्त-दर्शन का formal foundation · 4 अध्याय, 16 पाद
पहली पंक्ति
बादरायण ने पूरे ग्रंथ की शुरुआत एक छोटी-सी वाक्यांश से की, जो आज भी वेदान्त-शास्त्र की सबसे प्रसिद्ध opening line मानी जाती है।
“अब, इसके बाद, ब्रह्म की जिज्ञासा।”
तीन शब्द, परन्तु हर एक का एक specific वज़न है।
“अथ,” अर्थात् “अब।” परन्तु कौनसा “अब”? यह एक pre-condition assume करता है। अब, यानी जब आप वेद-कर्मकाण्ड का अध्ययन कर चुके हों, साधनाएँ कर चुके हों, धन-जन-यौवन-संग्रह कर के देख चुके हों, और एक deeper प्रश्न आपके भीतर उठ रहा हैं, “इस सबका मूल क्या है?” तब “अब।”
“अतः,” अर्थात् “इसलिए।” इस “इसलिए” में बहुत-कुछ निहित है। पहले के तीन पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम) पर मनुष्य की यात्रा होती है, फिर एक pivot आता है, चौथे पुरुषार्थ (मोक्ष) की ओर। बादरायण का ग्रंथ ठीक उसी pivot का बिन्दु से प्रारम्भ होता है।
“ब्रह्म-जिज्ञासा।” ब्रह्म को “जानने” की नहीं, “जिज्ञासा” करने की। यह बहुत specific शब्द-चयन है। जिज्ञासा अर्थात् पूछना, खोजना, inquire करना। ब्रह्म कोई object नहीं जिसे “जान” लिया जाए और रख दिया जाए। ब्रह्म एक sustained inquiry है।
आज की रोज़मर्रा की भाषा में कहें तो: “अब बहुत हुआ career-relationship-shopping के विषय। अब एक और प्रश्न पर बैठते हैं, यह सब देखने वाला कौन है?” बादरायण का पूरा ग्रंथ इसी एक प्रश्न के विभिन्न angles हैं।
यह ग्रंथ क्या है
ब्रह्म सूत्र, जिसे वेदान्त सूत्र भी कहा जाता है, बादरायण-व्यास का रचा हुआ है। लगभग 500 ईसा-पूर्व से 200 ईस्वी के बीच कभी composed हुआ। 4 अध्याय, हर अध्याय 4 पादों में, कुल 16 पाद, और लगभग 555 सूत्र।
सूत्र-शैली का अर्थ है कि हर sentence बहुत compressed है। एक specific उदाहरण लीजिए: सूत्र 1.1.3 में मात्र चार शब्द हैं, “शास्त्र-योनित्वात्।” अर्थात् “क्योंकि शास्त्र ही इसका source है।” परन्तु इन चार शब्दों में एक पूरा philosophical position निहित है। इसी compressed-style के कारण ब्रह्म सूत्र को बिना commentary के पढ़ना लगभग असम्भव है।
तीन प्रमुख commentators ने इस पर अपना भाष्य लिखा है: आदि शंकराचार्य (8वीं सदी, अद्वैत), रामानुजाचार्य (12वीं सदी, विशिष्टाद्वैत), और मध्वाचार्य (13वीं सदी, द्वैत)। तीनों ने एक ही ग्रंथ पढ़ कर तीन भिन्न philosophical positions निकाले। यह बादरायण की sutra-शैली का स्वाभाविक परिणाम है, हर सूत्र इतना compressed है कि उस पर एक से अधिक interpretation सम्भव है।
lulla.net पर हमारी टीका shankara-aligned है, अद्वैत-स्थापन। परन्तु जहाँ रामानुज अथवा मध्व का reading विशेष interesting होंगे, वहाँ हम उल्लेख अवश्य करेंगे।
प्रस्थान-त्रयी
वेदान्त-दर्शन तीन base-ग्रंथों पर खड़ा है, जिन्हें “प्रस्थान-त्रयी” कहते हैं:
- श्रुति-प्रस्थान: उपनिषद्जो वेदों के अंतिम भाग हैं। यह “सुनी हुई” अर्थात् revealed wisdom है।
- स्मृति-प्रस्थान: भगवद् गीताजो “स्मृति में रखी हुई,” narrated wisdom है।
- न्याय-प्रस्थान: ब्रह्म-सूत्र, जो formal-logical reasoning, बादरायण का systematic argument है।
तीनों एक ही point की ओर इशारा करते हैं, परन्तु तीन भिन्न methods से। उपनिषद् मुख्यतः poetic और narrative। गीता बातचीत के रूप में। और ब्रह्म सूत्र formal-logical।
4 अध्याय, हर अध्याय में 4 पाद
समन्वय
“सब उपनिषद् ब्रह्म पर ही convergent हैं।” लगभग 134 सूत्र, 4 पादों में। सांख्य, बौद्ध, जैन की भिन्न readings का refutation। मुख्य claim: ब्रह्म ही जगत् का कारण है, और समस्त उपनिषद्-passages उसी पर point करते हैं।
अध्याय 1 पढ़ें →अविरोध
“वेदान्त-position में कोई आंतरिक विरोध नहीं।” लगभग 157 सूत्र। सांख्य, वैशेषिक, बौद्ध, जैन की objections का formal refutation। पूरे ग्रंथ का defensive section।
अध्याय 2 पढ़ें →साधन
“ब्रह्म-realization का साधन।” लगभग 186 सूत्र। चार-step साधना (विवेक, वैराग्य, षट्-संपत्ति, मुमुक्षुत्व), विद्याओं का discussion, ध्यान की भूमिका।
अध्याय 3 पढ़ें →फल
“फल, अर्थात् मुक्ति।” लगभग 78 सूत्र। ब्रह्म-realization के पश्चात् क्या होता है, मरने के बाद की gati (देवयान बनाम पितृयान), जीवन्मुक्ति, विदेहमुक्ति।
अध्याय 4 पढ़ें →“अधिकरण” क्या है
ब्रह्म सूत्र को सूत्र-by-सूत्र पढ़ना बेकाम है। हर एक-दो शब्द में पूरा argument समझ नहीं आता। इसी कारण परंपरा ने “अधिकरण” का concept use किया, अर्थात् एक specific विषय पर 2 से 8 सूत्रों का cluster, जो एक complete argument carry करता है।
हर अधिकरण के पाँच हिस्से होते हैं (परंपरा के अनुसार):
- विषय: कौनसा topic discuss हो रहा है
- संशय: कौनसी उलझन है
- पूर्व-पक्ष: विरोधी पक्ष का argument
- उत्तर-पक्ष: सही position
- संगति: यह अधिकरण पिछले से कैसे जुड़ा हुआ है
हम हर अधिकरण को इसी पाँच-part format में explain करते हैं, परन्तु formal headings के बिना, बातचीत-शैली में।
कैसे पढ़ें
एक approach: केवल पहला सूत्र पढ़िए, “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा।” उस पर एक सप्ताह बैठिए। फिर अगला अधिकरण। यह slowest approach है, परन्तु genuine।
दूसरा approach: पहले अध्याय 1 के चारों पाद एक-एक करके पढ़िए। हर पाद 30 से 45 मिनट का है। पूरा अध्याय 1 लगभग 2 घंटे में।
तीसरा approach: सिर्फ़ “famous सूत्र” पढ़िए, 1.1.1 (अथातो ब्रह्मजिज्ञासा), 1.1.2 (जन्माद्यस्य यतः), 1.1.4 (तत्तु समन्वयात्), और बीच के कुछ landmark ones। यह 10 मिनट का overview है।
एक sitting में आदि से अंत तक पढ़ने का प्रयास न करें। यह ग्रंथ उस तरह से designed नहीं किया गया।
साथ में पढ़ें
- उपनिषद् संग्रहश्रुति-प्रस्थान (हमारी commentary में हर अधिकरण उपनिषद्-passage cite करता है)
- भगवद् गीतास्मृति-प्रस्थान
- अष्टावक्र गीताअद्वैत-कथन का सबसे direct रूप
- श्री राम गीताvedanta का सार compressed
- भज गोविन्दम्शंकर का devotional-counterpart