अंग
300
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਸਾਂਤਿ ਸਹਜ ਲਾਗਾ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਸੇਵ ॥
ਟੂਟੇ ਬੰਧਨ ਬਹੁ ਬਿਕਾਰ ਸਫਲ ਪੂਰਨ ਤਾ ਕੇ ਕਾਮ ॥ ਦੁਰਮਤਿ ਮਿਟੀ ਹਉਮੈ ਛੁਟੀ ਸਿਮਰਤ ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਮ ॥
ਸਰਨਿ ਗਹੀ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੀ ਮਿਟਿਆ ਆਵਾ ਗਵਨ ॥
ਆਪਿ ਤਰਿਆ ਕੁਟੰਬ ਸਿਉ ਗੁਣ ਗੁਬਿੰਦ ਪ੍ਰਭ ਰਵਨ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਟਹਲ ਕਮਾਵਣੀ ਜਪੀਐ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਨਾਮੁ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਇਆ ਨਾਨਕ ਸੁਖ ਬਿਸ੍ਰਾਮੁ ॥੧੫॥
ਟੂਟੇ ਬੰਧਨ ਬਹੁ ਬਿਕਾਰ ਸਫਲ ਪੂਰਨ ਤਾ ਕੇ ਕਾਮ ॥ ਦੁਰਮਤਿ ਮਿਟੀ ਹਉਮੈ ਛੁਟੀ ਸਿਮਰਤ ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਮ ॥
ਸਰਨਿ ਗਹੀ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੀ ਮਿਟਿਆ ਆਵਾ ਗਵਨ ॥
ਆਪਿ ਤਰਿਆ ਕੁਟੰਬ ਸਿਉ ਗੁਣ ਗੁਬਿੰਦ ਪ੍ਰਭ ਰਵਨ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਟਹਲ ਕਮਾਵਣੀ ਜਪੀਐ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਨਾਮੁ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਇਆ ਨਾਨਕ ਸੁਖ ਬਿਸ੍ਰਾਮੁ ॥੧੫॥
मनु तनु सीतलु सांति सहज लागा प्रभ की सेव ॥
टूटे बंधन बहु बिकार सफल पूरन ता के काम ॥ दुरमति मिटी हउमै छुटी सिमरत हरि को नाम ॥
सरनि गही पारब्रहम की मिटिआ आवा गवन ॥
आपि तरिआ कुटंब सिउ गुण गुबिंद प्रभ रवन ॥
हरि की टहल कमावणी जपीऐ प्रभ का नामु ॥
गुर पूरे ते पाइआ नानक सुख बिस्रामु ॥१५॥
टूटे बंधन बहु बिकार सफल पूरन ता के काम ॥ दुरमति मिटी हउमै छुटी सिमरत हरि को नाम ॥
सरनि गही पारब्रहम की मिटिआ आवा गवन ॥
आपि तरिआ कुटंब सिउ गुण गुबिंद प्रभ रवन ॥
हरि की टहल कमावणी जपीऐ प्रभ का नामु ॥
गुर पूरे ते पाइआ नानक सुख बिस्रामु ॥१५॥
हिन्दी अर्थ: (गुरू की कृपा से) वह परमात्मा की सेवा-भगती में लगा (जिस करके) उसका मन उसका हृदय ठंडा-ठार हो गया। उसके अंदर शांति और आत्मिक अडोलता पैदा हो गई। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरने से अनेकों विकारों (के संस्कारों के) बंधन टूट जाते हैं (जो मनुष्य सिमरन करता है) उसके सारे कारज रास आ जाते हैं। उसकी खोटी मति खत्म हो जाती है और उसे अहंकार से मुकती मिल जाती है। ( हे भाई !) जिस मनुष्य ने पारब्रहम परमेश्वर का आसरा लिया। उसका जनम-मरण (का चक्र) समाप्त हो जाता है। गोबिंद प्रभू के गुण गाने की बरकति से वह मनुष्य अपने परिवार समेत (संसार-समुंद्र से) पार लांध जाता है। (हे भाई !) परमात्मा की सेवा भगती करनी चाहिए। परमात्मा का नाम जपना चाहिए। हे नानक ! सारे सुखों का मूल वह प्रभू पूरे गुरू की कृपा से मिल जाता है। 15।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਪੂਰਨੁ ਕਬਹੁ ਨ ਡੋਲਤਾ ਪੂਰਾ ਕੀਆ ਪ੍ਰਭ ਆਪਿ ॥
ਦਿਨੁ ਦਿਨੁ ਚੜੈ ਸਵਾਇਆ ਨਾਨਕ ਹੋਤ ਨ ਘਾਟਿ ॥੧੬॥
ਪੂਰਨੁ ਕਬਹੁ ਨ ਡੋਲਤਾ ਪੂਰਾ ਕੀਆ ਪ੍ਰਭ ਆਪਿ ॥
ਦਿਨੁ ਦਿਨੁ ਚੜੈ ਸਵਾਇਆ ਨਾਨਕ ਹੋਤ ਨ ਘਾਟਿ ॥੧੬॥
सलोकु ॥
पूरनु कबहु न डोलता पूरा कीआ प्रभ आपि ॥
दिनु दिनु चड़ै सवाइआ नानक होत न घाटि ॥१६॥
पूरनु कबहु न डोलता पूरा कीआ प्रभ आपि ॥
दिनु दिनु चड़ै सवाइआ नानक होत न घाटि ॥१६॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु हे नानक ! जिस मनुष्य को परमात्मा ने खुद पूर्ण जीवन वाला बना दिया वह पूरन मनुष्य कभी (माया के आसरे तले आ के) नहीं डोलता। उसका आत्मिक जीवन दिनो-दिन ज्यादा चमकता है। उसके आत्मिक जीवन में कभी कमी नहीं आती। 16।
ਪਉੜੀ ॥
ਪੂਰਨਮਾ ਪੂਰਨ ਪ੍ਰਭ ਏਕੁ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਮਰਥੁ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਦਇਆਲ ਪੁਰਖੁ ਸਭ ਊਪਰਿ ਜਾ ਕਾ ਹਥੁ ॥
ਗੁਣ ਨਿਧਾਨ ਗੋਬਿੰਦ ਗੁਰ ਕੀਆ ਜਾ ਕਾ ਹੋਇ ॥
ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਪ੍ਰਭੁ ਸੁਜਾਨੁ ਅਲਖ ਨਿਰੰਜਨ ਸੋਇ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਰਮੇਸਰੋ ਸਭ ਬਿਧਿ ਜਾਨਣਹਾਰ ॥
ਸੰਤ ਸਹਾਈ ਸਰਨਿ ਜੋਗੁ ਆਠ ਪਹਰ ਨਮਸਕਾਰ ॥
ਅਕਥ ਕਥਾ ਨਹ ਬੂਝੀਐ ਸਿਮਰਹੁ ਹਰਿ ਕੇ ਚਰਨ ॥
ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਨ ਅਨਾਥ ਨਾਥ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਸਰਨ ॥੧੬॥
ਪੂਰਨਮਾ ਪੂਰਨ ਪ੍ਰਭ ਏਕੁ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਮਰਥੁ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਦਇਆਲ ਪੁਰਖੁ ਸਭ ਊਪਰਿ ਜਾ ਕਾ ਹਥੁ ॥
ਗੁਣ ਨਿਧਾਨ ਗੋਬਿੰਦ ਗੁਰ ਕੀਆ ਜਾ ਕਾ ਹੋਇ ॥
ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਪ੍ਰਭੁ ਸੁਜਾਨੁ ਅਲਖ ਨਿਰੰਜਨ ਸੋਇ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਰਮੇਸਰੋ ਸਭ ਬਿਧਿ ਜਾਨਣਹਾਰ ॥
ਸੰਤ ਸਹਾਈ ਸਰਨਿ ਜੋਗੁ ਆਠ ਪਹਰ ਨਮਸਕਾਰ ॥
ਅਕਥ ਕਥਾ ਨਹ ਬੂਝੀਐ ਸਿਮਰਹੁ ਹਰਿ ਕੇ ਚਰਨ ॥
ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਨ ਅਨਾਥ ਨਾਥ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਸਰਨ ॥੧੬॥
पउड़ी ॥
पूरनमा पूरन प्रभ एकु करण कारण समरथु ॥
जीअ जंत दइआल पुरखु सभ ऊपरि जा का हथु ॥
गुण निधान गोबिंद गुर कीआ जा का होइ ॥
अंतरजामी प्रभु सुजानु अलख निरंजन सोइ ॥
पारब्रहमु परमेसरो सभ बिधि जानणहार ॥
संत सहाई सरनि जोगु आठ पहर नमसकार ॥
अकथ कथा नह बूझीऐ सिमरहु हरि के चरन ॥
पतित उधारन अनाथ नाथ नानक प्रभ की सरन ॥१६॥
पूरनमा पूरन प्रभ एकु करण कारण समरथु ॥
जीअ जंत दइआल पुरखु सभ ऊपरि जा का हथु ॥
गुण निधान गोबिंद गुर कीआ जा का होइ ॥
अंतरजामी प्रभु सुजानु अलख निरंजन सोइ ॥
पारब्रहमु परमेसरो सभ बिधि जानणहार ॥
संत सहाई सरनि जोगु आठ पहर नमसकार ॥
अकथ कथा नह बूझीऐ सिमरहु हरि के चरन ॥
पतित उधारन अनाथ नाथ नानक प्रभ की सरन ॥१६॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- सिर्फ परमात्मा ही सारे गुणों से भरपूर है। सारे जगत का मूल है और सारी ताकतों का मालिक है। वह सर्व-व्यापक प्रभू सब जीवों पर दयावान रहता है। सब जीवों पर उस (की सहायता) का हाथ है। वह परमात्मा सारे गुणों का खजाना है। सारी सृष्टि का पालक है। सबसे बड़ा है। सब कुछ उसी का किया घटित होता है। प्रभू सबके दिल की जानने वाला है। समझदार है। उसका संपूर्ण स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। वह माया के प्रभाव से परे है। (हे भाई !) वह पारब्रहम सबसे बड़ा मालिक है (जीवों के भले का) हरेक ढंग जानने वाला है। संतों का रक्षक है। शरण आए की सहायता करने के लायक है – उस परमात्मा को आठों पहर नमस्कार कर। हे नानक ! परमात्मा के सारे गुण बयान नहीं किए जा सकते। उसका सही स्वरूप समझा नहीं जा सकता। उस परमात्मा के चरणों का ध्यान धर। वह परमात्मा (विकारों में) गिरे लोगों को (विकारों से) बचाने वाला है। वह निखसमों का खसम है (अनाथों का नाथ है)। उसका आसरा ले। 16।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਦੁਖ ਬਿਨਸੇ ਸਹਸਾ ਗਇਓ ਸਰਨਿ ਗਹੀ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਮਨਿ ਚਿੰਦੇ ਫਲ ਪਾਇਆ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਇ ॥੧੭॥
ਦੁਖ ਬਿਨਸੇ ਸਹਸਾ ਗਇਓ ਸਰਨਿ ਗਹੀ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਮਨਿ ਚਿੰਦੇ ਫਲ ਪਾਇਆ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਇ ॥੧੭॥
सलोकु ॥
दुख बिनसे सहसा गइओ सरनि गही हरि राइ ॥
मनि चिंदे फल पाइआ नानक हरि गुन गाइ ॥१७॥
दुख बिनसे सहसा गइओ सरनि गही हरि राइ ॥
मनि चिंदे फल पाइआ नानक हरि गुन गाइ ॥१७॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे नानक ! (जिस मनुष्य ने) प्रभू पातशाह का आसरा लिया। (उसके) सारे दुख नाश हो गए। (उसके अंदर से हरेक किस्म का) सहम दूर हो गया। परमातमा के गुण गा के (उसने अपने) मन में चितवे हुए सारे ही फल हासिल कर लिए। 17।
ਪਉੜੀ ॥
ਕੋਈ ਗਾਵੈ ਕੋ ਸੁਣੈ ਕੋਈ ਕਰੈ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਕੋ ਉਪਦੇਸੈ ਕੋ ਦ੍ਰਿੜੈ ਤਿਸ ਕਾ ਹੋਇ ਉਧਾਰੁ ॥
ਕਿਲਬਿਖ ਕਾਟੈ ਹੋਇ ਨਿਰਮਲਾ ਜਨਮ ਜਨਮ ਮਲੁ ਜਾਇ ॥
ਹਲਤਿ ਪਲਤਿ ਮੁਖੁ ਊਜਲਾ ਨਹ ਪੋਹੈ ਤਿਸੁ ਮਾਇ ॥
ਸੋ ਸੁਰਤਾ ਸੋ ਬੈਸਨੋ ਸੋ ਗਿਆਨੀ ਧਨਵੰਤੁ ॥
ਸੋ ਸੂਰਾ ਕੁਲਵੰਤੁ ਸੋਇ ਜਿਨਿ ਭਜਿਆ ਭਗਵੰਤੁ ॥
ਖਤ੍ਰੀ ਬ੍ਰਾਹਮਣੁ ਸੂਦੁ ਬੈਸੁ ਉਧਰੈ ਸਿਮਰਿ ਚੰਡਾਲ ॥
ਜਿਨਿ ਜਾਨਿਓ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਨਾ ਨਾਨਕ ਤਿਸਹਿ ਰਵਾਲ ॥੧੭॥
ਕੋਈ ਗਾਵੈ ਕੋ ਸੁਣੈ ਕੋਈ ਕਰੈ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਕੋ ਉਪਦੇਸੈ ਕੋ ਦ੍ਰਿੜੈ ਤਿਸ ਕਾ ਹੋਇ ਉਧਾਰੁ ॥
ਕਿਲਬਿਖ ਕਾਟੈ ਹੋਇ ਨਿਰਮਲਾ ਜਨਮ ਜਨਮ ਮਲੁ ਜਾਇ ॥
ਹਲਤਿ ਪਲਤਿ ਮੁਖੁ ਊਜਲਾ ਨਹ ਪੋਹੈ ਤਿਸੁ ਮਾਇ ॥
ਸੋ ਸੁਰਤਾ ਸੋ ਬੈਸਨੋ ਸੋ ਗਿਆਨੀ ਧਨਵੰਤੁ ॥
ਸੋ ਸੂਰਾ ਕੁਲਵੰਤੁ ਸੋਇ ਜਿਨਿ ਭਜਿਆ ਭਗਵੰਤੁ ॥
ਖਤ੍ਰੀ ਬ੍ਰਾਹਮਣੁ ਸੂਦੁ ਬੈਸੁ ਉਧਰੈ ਸਿਮਰਿ ਚੰਡਾਲ ॥
ਜਿਨਿ ਜਾਨਿਓ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਨਾ ਨਾਨਕ ਤਿਸਹਿ ਰਵਾਲ ॥੧੭॥
पउड़ी ॥
कोई गावै को सुणै कोई करै बीचारु ॥
को उपदेसै को द्रिड़ै तिस का होइ उधारु ॥
किलबिख काटै होइ निरमला जनम जनम मलु जाइ ॥
हलति पलति मुखु ऊजला नह पोहै तिसु माइ ॥
सो सुरता सो बैसनो सो गिआनी धनवंतु ॥
सो सूरा कुलवंतु सोइ जिनि भजिआ भगवंतु ॥
खत्री ब्राहमणु सूदु बैसु उधरै सिमरि चंडाल ॥
जिनि जानिओ प्रभु आपना नानक तिसहि रवाल ॥१७॥
कोई गावै को सुणै कोई करै बीचारु ॥
को उपदेसै को द्रिड़ै तिस का होइ उधारु ॥
किलबिख काटै होइ निरमला जनम जनम मलु जाइ ॥
हलति पलति मुखु ऊजला नह पोहै तिसु माइ ॥
सो सुरता सो बैसनो सो गिआनी धनवंतु ॥
सो सूरा कुलवंतु सोइ जिनि भजिआ भगवंतु ॥
खत्री ब्राहमणु सूदु बैसु उधरै सिमरि चंडाल ॥
जिनि जानिओ प्रभु आपना नानक तिसहि रवाल ॥१७॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो कोई मनुष्य (परमात्मा के गुण) गाता है। जो कोई मनुष्य (परमात्मा की सिफत सलाह) सुनता है। जो कोई मनुष्य (परमात्मा के गुणों को अपने) मन में बसाता है। जो कोई मनुष्य (परमात्मा की सिफत सालाह करने का औरों को) उपदेश देता है (और खुद भी उस सिफत सालाह को अपने मन में) पक्की तरह टिकाता है। उस मनुष्य का विकारों से बचाव हो जाता है। वह मनुष्य (अपने अंदर से) विकार काट लेता है। उसका जीवन पवित्र हो जाता है। अनेको जन्मों (के किए हुए विकारों) की मैल (उसके अंदर से) दूर हो जाती है। इस लोक में (भी उसका) मुंह रौशन रहता है (क्योंकि) माया उसपे अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। वह परमात्मा के साथ गहरी सांझ वाला है; वह ऊँचे आचरन वाला है; वह (असल) धनवान है; वह प्रभू-चरणों में सुरति जोड़े रखने वाला है। वह (विकारों का टाकरा करने वाला असल) शूरवीर है वही उच्च कुल वाला है। (हे भाई !) जिस (मनुष्य) ने भगवान का भजन किया है (हे भाई ! कोई) क्षत्रिय (हो। कोई) ब्राहमण (हो। कोई) शूद्र (हो। कोई) वैश (हो। कोई) चण्डाल (हो। किसी भी वर्ण का हो। परमात्मा का नाम) सिमर के (वह विकारों से) बच जाता है। जिस (भी मनुष्य) ने अपने परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाली है। नानक उसके चरणों की धूड़ (मांगता है)। 17।
ਗਉੜੀ ਕੀ ਵਾਰ ਮਹਲਾ ੪ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਦਇਆਲੁ ਹੈ ਜਿਸ ਨੋ ਸਮਤੁ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
ਏਕ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਕਰਿ ਦੇਖਦਾ ਮਨ ਭਾਵਨੀ ਤੇ ਸਿਧਿ ਹੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਵਿਚਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹੈ ਹਰਿ ਉਤਮੁ ਹਰਿ ਪਦੁ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਵੈ ਕੋਇ ॥੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਦਇਆਲੁ ਹੈ ਜਿਸ ਨੋ ਸਮਤੁ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
ਏਕ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਕਰਿ ਦੇਖਦਾ ਮਨ ਭਾਵਨੀ ਤੇ ਸਿਧਿ ਹੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਵਿਚਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹੈ ਹਰਿ ਉਤਮੁ ਹਰਿ ਪਦੁ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਵੈ ਕੋਇ ॥੧॥
गउड़ी की वार महला ४ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः ४ ॥
सतिगुरु पुरखु दइआलु है जिस नो समतु सभु कोइ ॥
एक द्रिसटि करि देखदा मन भावनी ते सिधि होइ ॥
सतिगुर विचि अंम्रितु है हरि उतमु हरि पदु सोइ ॥
नानक किरपा ते हरि धिआईऐ गुरमुखि पावै कोइ ॥१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः ४ ॥
सतिगुरु पुरखु दइआलु है जिस नो समतु सभु कोइ ॥
एक द्रिसटि करि देखदा मन भावनी ते सिधि होइ ॥
सतिगुर विचि अंम्रितु है हरि उतमु हरि पदु सोइ ॥
नानक किरपा ते हरि धिआईऐ गुरमुखि पावै कोइ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी की वार महला ४ ॥ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्लोक महला ४॥ सतिगुरू सब जीवों पर मेहर करने वाला है। उसके लिए हरेक जीव एक समान है। वह सब की ओर एक निगाह से देखता है। पर (जीव को अपने उद्यम की) सफलता अपने मन की भावना के कारण होती है (भाव। जैसी मन की भावना तैसी मुराद मिलती है)। सतिगुरू के पास हरी के श्रेष्ठ नाम का अमृत है। (पर) हे नानक ! यही हरी-नाम। जीव (प्रभू की) कृपा से सिमरता है। सतिगुरू से सन्मुख हो के कोई (भाग्यशाली) ही हासिल कर सकता है। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਇਆ ਸਭ ਬਿਖੁ ਹੈ ਨਿਤ ਜਗਿ ਤੋਟਾ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਲਾਹਾ ਹਰਿ ਧਨੁ ਖਟਿਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਬਿਖੁ ਉਤਰੈ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹਰਿ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਇਆ ਸਭ ਬਿਖੁ ਹੈ ਨਿਤ ਜਗਿ ਤੋਟਾ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਲਾਹਾ ਹਰਿ ਧਨੁ ਖਟਿਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਬਿਖੁ ਉਤਰੈ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹਰਿ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
मः ४ ॥
हउमै माइआ सभ बिखु है नित जगि तोटा संसारि ॥
लाहा हरि धनु खटिआ गुरमुखि सबदु वीचारि ॥
हउमै मैलु बिखु उतरै हरि अंम्रितु हरि उर धारि ॥
हउमै माइआ सभ बिखु है नित जगि तोटा संसारि ॥
लाहा हरि धनु खटिआ गुरमुखि सबदु वीचारि ॥
हउमै मैलु बिखु उतरै हरि अंम्रितु हरि उर धारि ॥
हिन्दी अर्थ: महला ४॥ माया से उपजा हुआ अहंकार निरोल जहर (का काम करता) है। इसके पीछे लगने से सदा जगत में घाटा है। प्रभू के नाम धन का लाभ सतिगुरू के सन्मुख रहके शबद के विचार के द्वारा कमाया (जा सकता है)। और अहंकार की मैल (रूपी) जहर। प्रभू का अमृत नाम हृदय में धारन करने से उतर जाती है। (ये नाम की दाति प्रभू के हाथ में है)।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 300 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली के सुबह 5 बजे के gurdwara में जब रागी पहली पंक्ति गाता है, हवा में एक specific quietness आती है।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 300” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 301 →, पीछे का: ← अंग 299।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।