अंग
285
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਿਸ ਕੀ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਸੁ ਕਰਣੈਹਾਰੁ ॥
ਅਵਰ ਨ ਬੂਝਿ ਕਰਤ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਕਰਤੇ ਕੀ ਮਿਤਿ ਨ ਜਾਨੈ ਕੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋ ਵਰਤੀਆ ॥੭॥
ਅਵਰ ਨ ਬੂਝਿ ਕਰਤ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਕਰਤੇ ਕੀ ਮਿਤਿ ਨ ਜਾਨੈ ਕੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋ ਵਰਤੀਆ ॥੭॥
जिस की स्रिसटि सु करणैहारु ॥
अवर न बूझि करत बीचारु ॥
करते की मिति न जानै कीआ ॥
नानक जो तिसु भावै सो वरतीआ ॥७॥
अवर न बूझि करत बीचारु ॥
करते की मिति न जानै कीआ ॥
नानक जो तिसु भावै सो वरतीआ ॥७॥
हिन्दी अर्थ: जिस प्रभू का ये जगत है वह खुद इसे बनाने वाला है। किसी और को इस जगत का ख्याल रखने वाला (भी) ना समझो। करतार (की बुजुर्गी) का अंदाजा उसका पैदा किया हुआ आदमी नहीं लगा सकता। हे नानक ! वही कुछ होता है जो उस प्रभू को भाता है। 7।
ਬਿਸਮਨ ਬਿਸਮ ਭਏ ਬਿਸਮਾਦ ॥
ਜਿਨਿ ਬੂਝਿਆ ਤਿਸੁ ਆਇਆ ਸ੍ਵਾਦ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਰੰਗਿ ਰਾਚਿ ਜਨ ਰਹੇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਪਦਾਰਥ ਲਹੇ ॥
ਓਇ ਦਾਤੇ ਦੁਖ ਕਾਟਨਹਾਰ ॥
ਜਾ ਕੈ ਸੰਗਿ ਤਰੈ ਸੰਸਾਰ ॥
ਜਨ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਸੋ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਜਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
ਗੁਨ ਗੋਬਿਦ ਕੀਰਤਨੁ ਜਨੁ ਗਾਵੈ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਫਲੁ ਪਾਵੈ ॥੮॥੧੬॥
ਜਿਨਿ ਬੂਝਿਆ ਤਿਸੁ ਆਇਆ ਸ੍ਵਾਦ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਰੰਗਿ ਰਾਚਿ ਜਨ ਰਹੇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਪਦਾਰਥ ਲਹੇ ॥
ਓਇ ਦਾਤੇ ਦੁਖ ਕਾਟਨਹਾਰ ॥
ਜਾ ਕੈ ਸੰਗਿ ਤਰੈ ਸੰਸਾਰ ॥
ਜਨ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਸੋ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਜਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
ਗੁਨ ਗੋਬਿਦ ਕੀਰਤਨੁ ਜਨੁ ਗਾਵੈ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਫਲੁ ਪਾਵੈ ॥੮॥੧੬॥
बिसमन बिसम भए बिसमाद ॥
जिनि बूझिआ तिसु आइआ स्वाद ॥
प्रभ कै रंगि राचि जन रहे ॥
गुर कै बचनि पदारथ लहे ॥
ओइ दाते दुख काटनहार ॥
जा कै संगि तरै संसार ॥
जन का सेवकु सो वडभागी ॥
जन कै संगि एक लिव लागी ॥
गुन गोबिद कीरतनु जनु गावै ॥
गुर प्रसादि नानक फलु पावै ॥८॥१६॥
जिनि बूझिआ तिसु आइआ स्वाद ॥
प्रभ कै रंगि राचि जन रहे ॥
गुर कै बचनि पदारथ लहे ॥
ओइ दाते दुख काटनहार ॥
जा कै संगि तरै संसार ॥
जन का सेवकु सो वडभागी ॥
जन कै संगि एक लिव लागी ॥
गुन गोबिद कीरतनु जनु गावै ॥
गुर प्रसादि नानक फलु पावै ॥८॥१६॥
हिन्दी अर्थ: (महिमा देख के) वे बड़े हैरान और आश्चर्यमयी होते हैं। जिस जिस मनुष्य ने (प्रभू की बुजुर्गियत को) समझा है। उस उस को आनंद आया है। प्रभू के दास प्रभू के प्यार में मस्त रहते हैं। और सत्गुरू के उपदेश की बरकति से (नाम) पदार्थ हासिल कर लेते हैं। वह (सेवक खुद) नाम की दाति बाँटते हैं। और (जीवों के) दुख काटते हें। उनकी संगति से जगत के जीव (संसार समुंद्र से) तैर जाते हैं। ऐसे सेवकों का जो सेवक बनता है वह बड़ा भाग्यशाली होता है। उनकी संगति में जुड़ने से अकाल-पुरख के साथ सुरति जुड़ती है। (प्रभू का) सेवक प्रभू के गुण गाता है। और सिफत सालाह करता है। हे नानक ! सतिगुरू की कृपा से वह (प्रभू का नाम रूपी) फल पा लेता है। 8। 16।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਆਦਿ ਸਚੁ ਜੁਗਾਦਿ ਸਚੁ ॥
ਹੈ ਭਿ ਸਚੁ ਨਾਨਕ ਹੋਸੀ ਭਿ ਸਚੁ ॥੧॥
ਆਦਿ ਸਚੁ ਜੁਗਾਦਿ ਸਚੁ ॥
ਹੈ ਭਿ ਸਚੁ ਨਾਨਕ ਹੋਸੀ ਭਿ ਸਚੁ ॥੧॥
सलोकु ॥
आदि सचु जुगादि सचु ॥
है भि सचु नानक होसी भि सचु ॥१॥
आदि सचु जुगादि सचु ॥
है भि सचु नानक होसी भि सचु ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक II प्रभू आरम्भ से ही अस्तित्व में है। युगों के शुरू से मौजूद है। इस वक्त भी मौजूद है। हे नानक ! आगे को भी सदा कायम रहेगा। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਚਰਨ ਸਤਿ ਸਤਿ ਪਰਸਨਹਾਰ ॥
ਪੂਜਾ ਸਤਿ ਸਤਿ ਸੇਵਦਾਰ ॥
ਦਰਸਨੁ ਸਤਿ ਸਤਿ ਪੇਖਨਹਾਰ ॥
ਨਾਮੁ ਸਤਿ ਸਤਿ ਧਿਆਵਨਹਾਰ ॥
ਆਪਿ ਸਤਿ ਸਤਿ ਸਭ ਧਾਰੀ ॥
ਆਪੇ ਗੁਣ ਆਪੇ ਗੁਣਕਾਰੀ ॥
ਸਬਦੁ ਸਤਿ ਸਤਿ ਪ੍ਰਭੁ ਬਕਤਾ ॥
ਸੁਰਤਿ ਸਤਿ ਸਤਿ ਜਸੁ ਸੁਨਤਾ ॥
ਬੁਝਨਹਾਰ ਕਉ ਸਤਿ ਸਭ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਤਿ ਸਤਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥੧॥
ਚਰਨ ਸਤਿ ਸਤਿ ਪਰਸਨਹਾਰ ॥
ਪੂਜਾ ਸਤਿ ਸਤਿ ਸੇਵਦਾਰ ॥
ਦਰਸਨੁ ਸਤਿ ਸਤਿ ਪੇਖਨਹਾਰ ॥
ਨਾਮੁ ਸਤਿ ਸਤਿ ਧਿਆਵਨਹਾਰ ॥
ਆਪਿ ਸਤਿ ਸਤਿ ਸਭ ਧਾਰੀ ॥
ਆਪੇ ਗੁਣ ਆਪੇ ਗੁਣਕਾਰੀ ॥
ਸਬਦੁ ਸਤਿ ਸਤਿ ਪ੍ਰਭੁ ਬਕਤਾ ॥
ਸੁਰਤਿ ਸਤਿ ਸਤਿ ਜਸੁ ਸੁਨਤਾ ॥
ਬੁਝਨਹਾਰ ਕਉ ਸਤਿ ਸਭ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਤਿ ਸਤਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥੧॥
असटपदी ॥
चरन सति सति परसनहार ॥
पूजा सति सति सेवदार ॥
दरसनु सति सति पेखनहार ॥
नामु सति सति धिआवनहार ॥
आपि सति सति सभ धारी ॥
आपे गुण आपे गुणकारी ॥
सबदु सति सति प्रभु बकता ॥
सुरति सति सति जसु सुनता ॥
बुझनहार कउ सति सभ होइ ॥
नानक सति सति प्रभु सोइ ॥१॥
चरन सति सति परसनहार ॥
पूजा सति सति सेवदार ॥
दरसनु सति सति पेखनहार ॥
नामु सति सति धिआवनहार ॥
आपि सति सति सभ धारी ॥
आपे गुण आपे गुणकारी ॥
सबदु सति सति प्रभु बकता ॥
सुरति सति सति जसु सुनता ॥
बुझनहार कउ सति सभ होइ ॥
नानक सति सति प्रभु सोइ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी॥ प्रभू के चरन सदा स्थिर हैं चरनों को छूने वाले सेवक भी सदा अटॅल हो जाते हैं; प्रभू की पूजा एक सदा निभने वाला काम है। (सो) पूजा करने वाले सदा के लिए अटॅल हो जाते हैं। प्रभू का दीदार सति- (कर्म) है दीदार करने वाले भी जनम मरन से रहित हो जाते हैं; प्रभू का नाम अटॅल है सिमरने वाले भी स्थिर हैं। प्रभू खुद सदा अस्तित्व वाला है उसकी टिकाई हुई रचना भी अस्तित्व वाली है। प्रभू खुद गुण- (रूप) है, स्वयं ही गुण पैदा करने वाला है। (प्रभू की सिफत सालाह का) शबद सदा कायम है। शबद को उच्चारने वाला भी स्थिर हो जाता है। प्रभू में सुरति जोड़नी सति (-कर्म है)। प्रभू यश सुनने वाला भी सति है। (प्रभू का अस्तित्व) समझने वाले को उसका रचा हुआ जगत भी हसती वाला दिखता है (भाव- मिथ्या नहीं प्रतीत होता); हे नानक ! प्रभू स्वयं सदा स्थिर रहने वाला है। 1।
ਸਤਿ ਸਰੂਪੁ ਰਿਦੈ ਜਿਨਿ ਮਾਨਿਆ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਤਿਨਿ ਮੂਲੁ ਪਛਾਨਿਆ ॥
ਜਾ ਕੈ ਰਿਦੈ ਬਿਸ੍ਵਾਸੁ ਪ੍ਰਭ ਆਇਆ ॥
ਤਤੁ ਗਿਆਨੁ ਤਿਸੁ ਮਨਿ ਪ੍ਰਗਟਾਇਆ ॥
ਭੈ ਤੇ ਨਿਰਭਉ ਹੋਇ ਬਸਾਨਾ ॥
ਜਿਸ ਤੇ ਉਪਜਿਆ ਤਿਸੁ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨਾ ॥
ਬਸਤੁ ਮਾਹਿ ਲੇ ਬਸਤੁ ਗਡਾਈ ॥
ਤਾ ਕਉ ਭਿੰਨ ਨ ਕਹਨਾ ਜਾਈ ॥
ਬੂਝੈ ਬੂਝਨਹਾਰੁ ਬਿਬੇਕ ॥
ਨਾਰਾਇਨ ਮਿਲੇ ਨਾਨਕ ਏਕ ॥੨॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਤਿਨਿ ਮੂਲੁ ਪਛਾਨਿਆ ॥
ਜਾ ਕੈ ਰਿਦੈ ਬਿਸ੍ਵਾਸੁ ਪ੍ਰਭ ਆਇਆ ॥
ਤਤੁ ਗਿਆਨੁ ਤਿਸੁ ਮਨਿ ਪ੍ਰਗਟਾਇਆ ॥
ਭੈ ਤੇ ਨਿਰਭਉ ਹੋਇ ਬਸਾਨਾ ॥
ਜਿਸ ਤੇ ਉਪਜਿਆ ਤਿਸੁ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨਾ ॥
ਬਸਤੁ ਮਾਹਿ ਲੇ ਬਸਤੁ ਗਡਾਈ ॥
ਤਾ ਕਉ ਭਿੰਨ ਨ ਕਹਨਾ ਜਾਈ ॥
ਬੂਝੈ ਬੂਝਨਹਾਰੁ ਬਿਬੇਕ ॥
ਨਾਰਾਇਨ ਮਿਲੇ ਨਾਨਕ ਏਕ ॥੨॥
सति सरूपु रिदै जिनि मानिआ ॥
करन करावन तिनि मूलु पछानिआ ॥
जा कै रिदै बिस्वासु प्रभ आइआ ॥
ततु गिआनु तिसु मनि प्रगटाइआ ॥
भै ते निरभउ होइ बसाना ॥
जिस ते उपजिआ तिसु माहि समाना ॥
बसतु माहि ले बसतु गडाई ॥
ता कउ भिंन न कहना जाई ॥
बूझै बूझनहारु बिबेक ॥
नाराइन मिले नानक एक ॥२॥
करन करावन तिनि मूलु पछानिआ ॥
जा कै रिदै बिस्वासु प्रभ आइआ ॥
ततु गिआनु तिसु मनि प्रगटाइआ ॥
भै ते निरभउ होइ बसाना ॥
जिस ते उपजिआ तिसु माहि समाना ॥
बसतु माहि ले बसतु गडाई ॥
ता कउ भिंन न कहना जाई ॥
बूझै बूझनहारु बिबेक ॥
नाराइन मिले नानक एक ॥२॥
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य ने अटॅल प्रभू की मूरति को सदा मन में टिकाया हुआ है। उसने सब कुछ करने वाले और (जीवों से) कराने वाले (जगत के) मूल को पहिचान लिया है। जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू (की हस्ती) का यकीन बंध गया है। उसके मन में सच्चा ज्ञान प्रगट हो गया है। (वह मनुष्य) (जगत के हरेक) डर से (रहित हो के) निडर हो के बसता है। (क्योंकि) वह सदा उस प्रभू में लीन रहता है जिस से वह पैदा हुआ है। (जैसे) एक चीज ले के (उसी तरह की) चीज में मिला दी जाए (तो दोनों में कोई फर्क नहीं रह जाता। वैसे ही जो मनुष्य प्रभू चरणों में लीन है) उसे प्रभू से अलग नहीं कहा जा सकता। (पर) इस विचार को विचारने वाला (कोई विरला) समझता है। हे नानक ! जो जीव प्रभू को मिल गए हैं वे उसके साथ एक-रूप हो गए हैं। 2।
ਠਾਕੁਰ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਆਗਿਆਕਾਰੀ ॥
ਠਾਕੁਰ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਸਦਾ ਪੂਜਾਰੀ ॥
ਠਾਕੁਰ ਕੇ ਸੇਵਕ ਕੈ ਮਨਿ ਪਰਤੀਤਿ ॥
ਠਾਕੁਰ ਕੇ ਸੇਵਕ ਕੀ ਨਿਰਮਲ ਰੀਤਿ ॥
ਠਾਕੁਰ ਕਉ ਸੇਵਕੁ ਜਾਨੈ ਸੰਗਿ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਨਾਮ ਕੈ ਰੰਗਿ ॥
ਸੇਵਕ ਕਉ ਪ੍ਰਭ ਪਾਲਨਹਾਰਾ ॥
ਸੇਵਕ ਕੀ ਰਾਖੈ ਨਿਰੰਕਾਰਾ ॥
ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਜਿਸੁ ਦਇਆ ਪ੍ਰਭੁ ਧਾਰੈ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਮਾਰੈ ॥੩॥
ਠਾਕੁਰ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਸਦਾ ਪੂਜਾਰੀ ॥
ਠਾਕੁਰ ਕੇ ਸੇਵਕ ਕੈ ਮਨਿ ਪਰਤੀਤਿ ॥
ਠਾਕੁਰ ਕੇ ਸੇਵਕ ਕੀ ਨਿਰਮਲ ਰੀਤਿ ॥
ਠਾਕੁਰ ਕਉ ਸੇਵਕੁ ਜਾਨੈ ਸੰਗਿ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਨਾਮ ਕੈ ਰੰਗਿ ॥
ਸੇਵਕ ਕਉ ਪ੍ਰਭ ਪਾਲਨਹਾਰਾ ॥
ਸੇਵਕ ਕੀ ਰਾਖੈ ਨਿਰੰਕਾਰਾ ॥
ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਜਿਸੁ ਦਇਆ ਪ੍ਰਭੁ ਧਾਰੈ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਮਾਰੈ ॥੩॥
ठाकुर का सेवकु आगिआकारी ॥
ठाकुर का सेवकु सदा पूजारी ॥
ठाकुर के सेवक कै मनि परतीति ॥
ठाकुर के सेवक की निरमल रीति ॥
ठाकुर कउ सेवकु जानै संगि ॥
प्रभ का सेवकु नाम कै रंगि ॥
सेवक कउ प्रभ पालनहारा ॥
सेवक की राखै निरंकारा ॥
सो सेवकु जिसु दइआ प्रभु धारै ॥
नानक सो सेवकु सासि सासि समारै ॥३॥
ठाकुर का सेवकु सदा पूजारी ॥
ठाकुर के सेवक कै मनि परतीति ॥
ठाकुर के सेवक की निरमल रीति ॥
ठाकुर कउ सेवकु जानै संगि ॥
प्रभ का सेवकु नाम कै रंगि ॥
सेवक कउ प्रभ पालनहारा ॥
सेवक की राखै निरंकारा ॥
सो सेवकु जिसु दइआ प्रभु धारै ॥
नानक सो सेवकु सासि सासि समारै ॥३॥
हिन्दी अर्थ: प्रभू का सेवक प्रभू की आज्ञा में चलता है और सदा उसकी पूजा करता है। अकाल-पुरख के सेवक के मन में (उसकी हसती का) विश्वास रहता है। (तभी तो) उसकी जिंदगी की स्वच्छ मर्यादा होती है। सेवक अपने मालिक प्रभू को (हर वक्त अपने) साथ जानता है और उसके नाम की मौज में रहता है। प्रभू अपने सेवक को सदा पालने के समर्थ है। और अपने सेवक की (सदा) लाज रखता है। (पर) सेवक वही मनुष्य (बन सकता) है जिस पर प्रभू खुद मेहर करता है; हे नानक ! ऐसा सेवक प्रभू को दम-ब-दम याद रखता है। 3।
ਅਪੁਨੇ ਜਨ ਕਾ ਪਰਦਾ ਢਾਕੈ ॥
ਅਪਨੇ ਸੇਵਕ ਕੀ ਸਰਪਰ ਰਾਖੈ ॥
ਅਪਨੇ ਦਾਸ ਕਉ ਦੇਇ ਵਡਾਈ ॥
ਅਪਨੇ ਸੇਵਕ ਕਉ ਨਾਮੁ ਜਪਾਈ ॥
ਅਪਨੇ ਸੇਵਕ ਕੀ ਆਪਿ ਪਤਿ ਰਾਖੈ ॥
ਤਾ ਕੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਕੋਇ ਨ ਲਾਖੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਸੇਵਕ ਕਉ ਕੋ ਨ ਪਹੂਚੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਸੇਵਕ ਊਚ ਤੇ ਊਚੇ ॥
ਜੋ ਪ੍ਰਭਿ ਅਪਨੀ ਸੇਵਾ ਲਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਦਹ ਦਿਸਿ ਪ੍ਰਗਟਾਇਆ ॥੪॥
ਅਪਨੇ ਸੇਵਕ ਕੀ ਸਰਪਰ ਰਾਖੈ ॥
ਅਪਨੇ ਦਾਸ ਕਉ ਦੇਇ ਵਡਾਈ ॥
ਅਪਨੇ ਸੇਵਕ ਕਉ ਨਾਮੁ ਜਪਾਈ ॥
ਅਪਨੇ ਸੇਵਕ ਕੀ ਆਪਿ ਪਤਿ ਰਾਖੈ ॥
ਤਾ ਕੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਕੋਇ ਨ ਲਾਖੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਸੇਵਕ ਕਉ ਕੋ ਨ ਪਹੂਚੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਸੇਵਕ ਊਚ ਤੇ ਊਚੇ ॥
ਜੋ ਪ੍ਰਭਿ ਅਪਨੀ ਸੇਵਾ ਲਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਦਹ ਦਿਸਿ ਪ੍ਰਗਟਾਇਆ ॥੪॥
अपुने जन का परदा ढाकै ॥
अपने सेवक की सरपर राखै ॥
अपने दास कउ देइ वडाई ॥
अपने सेवक कउ नामु जपाई ॥
अपने सेवक की आपि पति राखै ॥
ता की गति मिति कोइ न लाखै ॥
प्रभ के सेवक कउ को न पहूचै ॥
प्रभ के सेवक ऊच ते ऊचे ॥
जो प्रभि अपनी सेवा लाइआ ॥
नानक सो सेवकु दह दिसि प्रगटाइआ ॥४॥
अपने सेवक की सरपर राखै ॥
अपने दास कउ देइ वडाई ॥
अपने सेवक कउ नामु जपाई ॥
अपने सेवक की आपि पति राखै ॥
ता की गति मिति कोइ न लाखै ॥
प्रभ के सेवक कउ को न पहूचै ॥
प्रभ के सेवक ऊच ते ऊचे ॥
जो प्रभि अपनी सेवा लाइआ ॥
नानक सो सेवकु दह दिसि प्रगटाइआ ॥४॥
हिन्दी अर्थ: प्रभू अपने सेवक का पर्दा ढकता है। और उसकी लाज अवश्य रखता है। प्रभू अपने सेवक को सम्मान बख्शता है और उसे अपना नाम जपाता है। प्रभू अपने सेवक की इज्जत स्वयं रखता है। उसकी उच्च अवस्था और उसके बड़ेपन का अंदाजा कोई नहीं लगा सकता। कोई मनुष्य प्रभू के सेवक की बराबरी नहीं कर सकता। (क्योंकि) प्रभू के सेवक ऊँचों से भी ऊँचे होते हैं। जिसे प्रभू ने खुद अपनी सेवा में लगाया है। (पर) हे नानक ! वह सेवक सारे जगत में प्रगट हुआ है। 4।
ਨੀਕੀ ਕੀਰੀ ਮਹਿ ਕਲ ਰਾਖੈ ॥
ਭਸਮ ਕਰੈ ਲਸਕਰ ਕੋਟਿ ਲਾਖੈ ॥
ਜਿਸ ਕਾ ਸਾਸੁ ਨ ਕਾਢਤ ਆਪਿ ॥
ਭਸਮ ਕਰੈ ਲਸਕਰ ਕੋਟਿ ਲਾਖੈ ॥
ਜਿਸ ਕਾ ਸਾਸੁ ਨ ਕਾਢਤ ਆਪਿ ॥
नीकी कीरी महि कल राखै ॥
भसम करै लसकर कोटि लाखै ॥
जिस का सासु न काढत आपि ॥
भसम करै लसकर कोटि लाखै ॥
जिस का सासु न काढत आपि ॥
हिन्दी अर्थ: (जिस) छोटी सी कीड़ी में (प्रभू) ताकत भरता है। (वह कीड़ी) लाखों करोड़ों लश्करों को राख कर देती है। जिस जीव के श्वास प्रभू खुद नहीं निकालता।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 285 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Karwa Chauth की रात, चाँद का इंतज़ार, और बीच में हाथों की मेहंदी।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 61 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 285” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 286 →, पीछे का: ← अंग 284।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।