नारद भक्ति सूत्र

नारद भक्ति सूत्र · प्रेम का सूत्र-कोश
देवर्षि नारद रचित · 84 सूत्र, 5 प्रकरण
परमेश्वर के प्रति प्रेम क्या है, और उसका मार्ग कौन-सा है। इसी एक प्रश्न का उत्तर देवर्षि नारद ने चौरासी छोटे-छोटे सूत्रों में दिया। यह भक्ति-मार्ग का बीज-कोश है, जहाँ प्रेम ही परम तत्त्व ठहरता है।
॥ सा त्वस्मिन् परम-प्रेम-रूपा ॥
“वह भक्ति उस परमेश्वर में परम प्रेम-रूप है।” सूत्र 2, जिस पर समस्त ग्रन्थ टिका है।
Hero illustration for nbs/nbs-hero-landing.jpg
Hero illustration for nbs/nbs-hero-landing.jpg

परिचय

नारद ऋषि दिव्य लोकों के मेघों में वीणा बजाते हुए आनंदमग्न होकर नारायण नाम गाते चल रहे हैं
नारद ऋषि दिव्य लोकों के मेघों में वीणा बजाते हुए आनंदमग्न होकर नारायण नाम गाते चल रहे हैं

नारद वे ऋषि हैं जो हर पुराण में, हर ग्रन्थ में दिखाई देते हैं। हाथ में वीणा, मुख में “नारायण नारायण”, और भगवान् के लोकों में निरन्तर आना-जाना। पर नारद हैं कौन वस्तुतः। वे भक्ति की मूर्तिमान देह हैं। अपना सारा जीवन उन्होंने भगवान् के नाम पर बिताया, केवल इसलिए कि उसी में रस था।

वन आश्रम में चार सनकादि ऋषि नारद से भक्ति पर प्रश्न पूछते, नारद वीणा सहित उत्तर देते
वन आश्रम में चार सनकादि ऋषि नारद से भक्ति पर प्रश्न पूछते, नारद वीणा सहित उत्तर देते

कहते हैं, एक दिन सनकादि ऋषियों ने नारद से पूछा, “देवर्षि, यह जो भक्ति है, वस्तुतः क्या है, और इसकी प्राप्ति किस भाँति होती है।” नारद ने उत्तर दिया, पर लम्बा व्याख्यान नहीं। चौरासी सूत्र। हर सूत्र दो-तीन शब्दों का, जैसे एक-एक टंकार पर मर्म पर चोट पड़ती हो।

“भक्ति-सूत्र” यह नाम ध्यान देने योग्य है। सूत्र का अर्थ है, कम-से-कम शब्दों में अधिक-से-अधिक अर्थ। सूत्र कभी सारी बात खोल कर नहीं कहता, केवल संकेत करता है, शेष पाठक को अपने अनुभव से भरना होता है। ब्रह्म-सूत्र और योग-सूत्र, इन्हीं की परम्परा में यह भी है, पर इसका विषय भक्ति है।

पहले ही सूत्र में नारद का संकल्प स्पष्ट है, “अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः”, अर्थात् “अब हम भक्ति की व्याख्या करते हैं”। इस “अब” में यह निहित है कि कुछ बातें पहले से मान ली गई हैं। ज्ञान-मार्ग का कुछ परिचय जिज्ञासु के पास पहले से अपेक्षित है, और अब दृष्टि भक्ति पर केन्द्रित होती है।

सबसे गहरा वचन सूत्र 4 में है, “यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति”, अर्थात् “जिसे पा कर मनुष्य सिद्ध हो जाता है, अमर हो जाता है, तृप्त हो जाता है”। भक्ति पूर्ण हो जाए, तो फिर पाने को, करने को कुछ नहीं बचता। वेदान्त जिसे परम स्थिति कहता है, वही यहाँ है, केवल मार्ग प्रेम का है।

यह ग्रन्थ केवल भक्त के लिए नहीं, जिज्ञासु के लिए भी है। नारद की भक्ति-व्याख्या भावुकता-मात्र नहीं, उससे कहीं आगे की वस्तु है। यहाँ भक्ति “मीठे प्रेम” की बात से बढ़ कर परम तत्त्व बन जाती है, जहाँ प्रेम और तत्त्व एक ही हो रहते हैं।

ग्रन्थ पाँच प्रकरणों में बँटा है। पहला प्रकरण (सूत्र 1-24), भक्ति क्या है। दूसरा (25-33), कर्म, ज्ञान और योग से भक्ति की श्रेष्ठता। तीसरा (34-50), साधन। चौथा (51-66), प्रेम का स्वरूप। पाँचवाँ (67-84), भक्तों का संग और उपसंहार।

पाँच प्रकरण

चौरासी सूत्र, पाँच प्रकरणों में।

प्रकरण 1
भक्ति का स्वरूप
सूत्र 1-24। भक्ति क्या है। परम-प्रेम-रूप, अमृत-रूप।
प्रकरण 2
भक्ति की महिमा
सूत्र 25-33। भक्ति की कर्म, ज्ञान तथा योग से श्रेष्ठता।
प्रकरण 3
साधन
सूत्र 34-50। भक्ति किस भाँति आती है। विषय-त्याग, संग-त्याग, श्रवण-कीर्तन।
प्रकरण 4
प्रेम के रूप
सूत्र 51-66। प्रेम के अनेक रूप। गोपी-भक्ति का परम भाव।
प्रकरण 5
भक्त-संग, उपसंहार
सूत्र 67-84। सन्त-संगति, और नारद का अन्तिम उपदेश।

कुछ जिज्ञासाएँ

यह ग्रन्थ कब रचा गया।

इसका निश्चित काल अज्ञात है। कुछ विद्वान् इसे छठी से आठवीं शताब्दी का मानते हैं, कुछ बारहवीं का। रचयिता के रूप में देवर्षि नारद का नाम लिया जाता है, पर वे ऐतिहासिक रूप से कौन और कब थे, यह भी निश्चित नहीं। ग्रन्थ की भाषा और भाव भक्ति-आन्दोलन (आठवीं से बारहवीं शताब्दी) के वातावरण की झलक देते हैं।

क्या यह भागवत के नारद-प्रसंग से भिन्न है।

हाँ। श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध में नारद-व्यास-संवाद है, जहाँ नारद व्यास को कथा-कीर्तन का मार्ग बताते हैं। यह उससे भिन्न है। यह चौरासी सूत्रों का स्वतन्त्र ग्रन्थ है, और मुख्यतः सनकादि ऋषियों को सम्बोधित है। कुछ अनुयायी इसे वेद-व्यास का मानते हैं, पर ग्रन्थ में रचयिता का नाम स्पष्ट नहीं है।

“भक्ति” और “प्रेम”, दोनों में क्या भेद है।

यमुना तट पर चांदनी में गोपियां प्रभु की याद में लीन, हाथ से घड़ा और माला छूट रहे
यमुना तट पर चांदनी में गोपियां प्रभु की याद में लीन, हाथ से घड़ा और माला छूट रहे

नारद के लिए भक्ति का परम रूप ही प्रेम है, पर हर भक्ति प्रेम नहीं। दैनिक पूजा भक्ति है, पर अभी प्रेम की सीमा तक नहीं पहुँची। प्रेम तब है, जब “मैं” मिट कर केवल “उसका” शेष रह जाए। नारद का यही स्पष्ट मत है।

क्या भक्ति में ज्ञान आवश्यक है।

नारद का उत्तर सूक्ष्म है। वे यहाँ मतों को रखते हैं, सूत्र 28 में, कुछ कहते हैं ज्ञान ही भक्ति का साधन है। सूत्र 29 में, अन्य कहते हैं दोनों एक-दूसरे पर आश्रित हैं। और सूत्र 30 में, भक्ति स्वयं ही अपना फल है। सच्चे भक्त को सब कुछ अपने आप ज्ञात हो आता है, पर वह ज्ञान का अभिलाषी नहीं होता।

क्या नारद भक्ति के लिए कोई साधन बताते हैं।

हाँ। सूत्र 35-37 में बताया गया है, विषय-त्याग, संग-त्याग, और निरन्तर भगवान् का स्मरण। और सबसे आवश्यक, महत्संग अर्थात् सत्संग, जिसकी बात सूत्र 39-40 में है।

क्या यह केवल हिन्दुओं के लिए है।

नहीं। भक्ति सार्वभौम है। इसका विषय परम-प्रेम है। जिस किसी का हृदय प्रेम में पिघलता हो, उसके लिए यह ग्रन्थ काम आता है।

साथ में पढ़ें

English