अंग
245
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰ ਆਗੈ ਕਰਉ ਬਿਨੰਤੀ ਜੇ ਗੁਰ ਭਾਵੈ ਜਿਉ ਮਿਲੈ ਤਿਵੈ ਮਿਲਾਈਐ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਲਏ ਸੁਖਦਾਤਾ ਆਪਿ ਮਿਲਿਆ ਘਰਿ ਆਏ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਸਦਾ ਸੁਹਾਗਣਿ ਨਾ ਪਿਰੁ ਮਰੈ ਨ ਜਾਏ ॥੪॥੨॥
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਲਏ ਸੁਖਦਾਤਾ ਆਪਿ ਮਿਲਿਆ ਘਰਿ ਆਏ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਸਦਾ ਸੁਹਾਗਣਿ ਨਾ ਪਿਰੁ ਮਰੈ ਨ ਜਾਏ ॥੪॥੨॥
गुर आगै करउ बिनंती जे गुर भावै जिउ मिलै तिवै मिलाईऐ ॥
आपे मेलि लए सुखदाता आपि मिलिआ घरि आए ॥
नानक कामणि सदा सुहागणि ना पिरु मरै न जाए ॥४॥२॥
आपे मेलि लए सुखदाता आपि मिलिआ घरि आए ॥
नानक कामणि सदा सुहागणि ना पिरु मरै न जाए ॥४॥२॥
हिन्दी अर्थ: (हे माँ !) मैं गुरू के आगे विनती करती हूँ – हे गुरू ! अगर तुझे मेरी विनती ठीक लगे। तो जैसे भी हो सके मुझे (प्रीतम-प्रभू) मिला। (हे माँ !) सारे सुखों का देने वाला प्रीतम प्रभू (जिसको मिलाता है) स्वयं ही मिला लेता है। उसके हृदय घर में खुद ही आ के मिल लेता है। हे नानक ! वह जीव-स्त्री सदा के लिए भाग्यशाली हो जाती है क्योंकि उसका (ये प्रभू-) पति ना कभी मरता है ना ही उससे विछुड़ता है। 4। 2।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਕਾਮਣਿ ਹਰਿ ਰਸਿ ਬੇਧੀ ਜੀਉ ਹਰਿ ਕੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥
ਮਨੁ ਮੋਹਨਿ ਮੋਹਿ ਲੀਆ ਜੀਉ ਦੁਬਿਧਾ ਸਹਜਿ ਸਮਾਏ ॥
ਦੁਬਿਧਾ ਸਹਜਿ ਸਮਾਏ ਕਾਮਣਿ ਵਰੁ ਪਾਏ ਗੁਰਮਤੀ ਰੰਗੁ ਲਾਏ ॥
ਇਹੁ ਸਰੀਰੁ ਕੂੜਿ ਕੁਸਤਿ ਭਰਿਆ ਗਲ ਤਾਈ ਪਾਪ ਕਮਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਜਿਤੁ ਸਹਜ ਧੁਨਿ ਉਪਜੈ ਬਿਨੁ ਭਗਤੀ ਮੈਲੁ ਨ ਜਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਪਿਰਹਿ ਪਿਆਰੀ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥੧॥
ਕਾਮਣਿ ਪਿਰੁ ਪਾਇਆ ਜੀਉ ਗੁਰ ਕੈ ਭਾਇ ਪਿਆਰੇ ॥
ਰੈਣਿ ਸੁਖਿ ਸੁਤੀ ਜੀਉ ਅੰਤਰਿ ਉਰਿ ਧਾਰੇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਉਰਿ ਧਾਰੇ ਮਿਲੀਐ ਪਿਆਰੇ ਅਨਦਿਨੁ ਦੁਖੁ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਮਹਲੁ ਪਿਰੁ ਰਾਵੇ ਕਾਮਣਿ ਗੁਰਮਤੀ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮੁ ਪੀਆ ਦਿਨ ਰਾਤੀ ਦੁਬਿਧਾ ਮਾਰਿ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚਿ ਮਿਲੀ ਸੋਹਾਗਣਿ ਗੁਰ ਕੈ ਹੇਤਿ ਅਪਾਰੇ ॥੨॥
ਆਵਹੁ ਦਇਆ ਕਰੇ ਜੀਉ ਪ੍ਰੀਤਮ ਅਤਿ ਪਿਆਰੇ ॥
ਕਾਮਣਿ ਬਿਨਉ ਕਰੇ ਜੀਉ ਸਚਿ ਸਬਦਿ ਸੀਗਾਰੇ ॥
ਸਚਿ ਸਬਦਿ ਸੀਗਾਰੇ ਹਉਮੈ ਮਾਰੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਾਰਜ ਸਵਾਰੇ ॥
ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਏਕੋ ਸਚਾ ਸੋਈ ਬੂਝੈ ਗੁਰ ਬੀਚਾਰੇ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਕਾਮਿ ਵਿਆਪੀ ਮੋਹਿ ਸੰਤਾਪੀ ਕਿਸੁ ਆਗੈ ਜਾਇ ਪੁਕਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਮਨਮੁਖਿ ਥਾਉ ਨ ਪਾਏ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਅਤਿ ਪਿਆਰੇ ॥੩॥
ਮੁੰਧ ਇਆਣੀ ਭੋਲੀ ਨਿਗੁਣੀਆ ਜੀਉ ਪਿਰੁ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲੀਐ ਜੀਉ ਆਪੇ ਬਖਸਣਹਾਰਾ ॥
ਅਵਗਣ ਬਖਸਣਹਾਰਾ ਕਾਮਣਿ ਕੰਤੁ ਪਿਆਰਾ ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਪ੍ਰੀਤਿ ਭਾਇ ਭਗਤੀ ਪਾਈਐ ਸਤਿਗੁਰਿ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ॥
ਸਦਾ ਅਨੰਦਿ ਰਹੈ ਦਿਨ ਰਾਤੀ ਅਨਦਿਨੁ ਰਹੈ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਹਜੇ ਹਰਿ ਵਰੁ ਪਾਇਆ ਸਾ ਧਨ ਨਉ ਨਿਧਿ ਪਾਈ ॥੪॥੩॥
ਕਾਮਣਿ ਹਰਿ ਰਸਿ ਬੇਧੀ ਜੀਉ ਹਰਿ ਕੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥
ਮਨੁ ਮੋਹਨਿ ਮੋਹਿ ਲੀਆ ਜੀਉ ਦੁਬਿਧਾ ਸਹਜਿ ਸਮਾਏ ॥
ਦੁਬਿਧਾ ਸਹਜਿ ਸਮਾਏ ਕਾਮਣਿ ਵਰੁ ਪਾਏ ਗੁਰਮਤੀ ਰੰਗੁ ਲਾਏ ॥
ਇਹੁ ਸਰੀਰੁ ਕੂੜਿ ਕੁਸਤਿ ਭਰਿਆ ਗਲ ਤਾਈ ਪਾਪ ਕਮਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਜਿਤੁ ਸਹਜ ਧੁਨਿ ਉਪਜੈ ਬਿਨੁ ਭਗਤੀ ਮੈਲੁ ਨ ਜਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਪਿਰਹਿ ਪਿਆਰੀ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥੧॥
ਕਾਮਣਿ ਪਿਰੁ ਪਾਇਆ ਜੀਉ ਗੁਰ ਕੈ ਭਾਇ ਪਿਆਰੇ ॥
ਰੈਣਿ ਸੁਖਿ ਸੁਤੀ ਜੀਉ ਅੰਤਰਿ ਉਰਿ ਧਾਰੇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਉਰਿ ਧਾਰੇ ਮਿਲੀਐ ਪਿਆਰੇ ਅਨਦਿਨੁ ਦੁਖੁ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਮਹਲੁ ਪਿਰੁ ਰਾਵੇ ਕਾਮਣਿ ਗੁਰਮਤੀ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮੁ ਪੀਆ ਦਿਨ ਰਾਤੀ ਦੁਬਿਧਾ ਮਾਰਿ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚਿ ਮਿਲੀ ਸੋਹਾਗਣਿ ਗੁਰ ਕੈ ਹੇਤਿ ਅਪਾਰੇ ॥੨॥
ਆਵਹੁ ਦਇਆ ਕਰੇ ਜੀਉ ਪ੍ਰੀਤਮ ਅਤਿ ਪਿਆਰੇ ॥
ਕਾਮਣਿ ਬਿਨਉ ਕਰੇ ਜੀਉ ਸਚਿ ਸਬਦਿ ਸੀਗਾਰੇ ॥
ਸਚਿ ਸਬਦਿ ਸੀਗਾਰੇ ਹਉਮੈ ਮਾਰੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਾਰਜ ਸਵਾਰੇ ॥
ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਏਕੋ ਸਚਾ ਸੋਈ ਬੂਝੈ ਗੁਰ ਬੀਚਾਰੇ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਕਾਮਿ ਵਿਆਪੀ ਮੋਹਿ ਸੰਤਾਪੀ ਕਿਸੁ ਆਗੈ ਜਾਇ ਪੁਕਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਮਨਮੁਖਿ ਥਾਉ ਨ ਪਾਏ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਅਤਿ ਪਿਆਰੇ ॥੩॥
ਮੁੰਧ ਇਆਣੀ ਭੋਲੀ ਨਿਗੁਣੀਆ ਜੀਉ ਪਿਰੁ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲੀਐ ਜੀਉ ਆਪੇ ਬਖਸਣਹਾਰਾ ॥
ਅਵਗਣ ਬਖਸਣਹਾਰਾ ਕਾਮਣਿ ਕੰਤੁ ਪਿਆਰਾ ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਪ੍ਰੀਤਿ ਭਾਇ ਭਗਤੀ ਪਾਈਐ ਸਤਿਗੁਰਿ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ॥
ਸਦਾ ਅਨੰਦਿ ਰਹੈ ਦਿਨ ਰਾਤੀ ਅਨਦਿਨੁ ਰਹੈ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਹਜੇ ਹਰਿ ਵਰੁ ਪਾਇਆ ਸਾ ਧਨ ਨਉ ਨਿਧਿ ਪਾਈ ॥੪॥੩॥
गउड़ी महला ३ ॥
कामणि हरि रसि बेधी जीउ हरि कै सहजि सुभाए ॥
मनु मोहनि मोहि लीआ जीउ दुबिधा सहजि समाए ॥
दुबिधा सहजि समाए कामणि वरु पाए गुरमती रंगु लाए ॥
इहु सरीरु कूड़ि कुसति भरिआ गल ताई पाप कमाए ॥
गुरमुखि भगति जितु सहज धुनि उपजै बिनु भगती मैलु न जाए ॥
नानक कामणि पिरहि पिआरी विचहु आपु गवाए ॥१॥
कामणि पिरु पाइआ जीउ गुर कै भाइ पिआरे ॥
रैणि सुखि सुती जीउ अंतरि उरि धारे ॥
अंतरि उरि धारे मिलीऐ पिआरे अनदिनु दुखु निवारे ॥
अंतरि महलु पिरु रावे कामणि गुरमती वीचारे ॥
अंम्रितु नामु पीआ दिन राती दुबिधा मारि निवारे ॥
नानक सचि मिली सोहागणि गुर कै हेति अपारे ॥२॥
आवहु दइआ करे जीउ प्रीतम अति पिआरे ॥
कामणि बिनउ करे जीउ सचि सबदि सीगारे ॥
सचि सबदि सीगारे हउमै मारे गुरमुखि कारज सवारे ॥
जुगि जुगि एको सचा सोई बूझै गुर बीचारे ॥
मनमुखि कामि विआपी मोहि संतापी किसु आगै जाइ पुकारे ॥
नानक मनमुखि थाउ न पाए बिनु गुर अति पिआरे ॥३॥
मुंध इआणी भोली निगुणीआ जीउ पिरु अगम अपारा ॥
आपे मेलि मिलीऐ जीउ आपे बखसणहारा ॥
अवगण बखसणहारा कामणि कंतु पिआरा घटि घटि रहिआ समाई ॥
प्रेम प्रीति भाइ भगती पाईऐ सतिगुरि बूझ बुझाई ॥
सदा अनंदि रहै दिन राती अनदिनु रहै लिव लाई ॥
नानक सहजे हरि वरु पाइआ सा धन नउ निधि पाई ॥४॥३॥
कामणि हरि रसि बेधी जीउ हरि कै सहजि सुभाए ॥
मनु मोहनि मोहि लीआ जीउ दुबिधा सहजि समाए ॥
दुबिधा सहजि समाए कामणि वरु पाए गुरमती रंगु लाए ॥
इहु सरीरु कूड़ि कुसति भरिआ गल ताई पाप कमाए ॥
गुरमुखि भगति जितु सहज धुनि उपजै बिनु भगती मैलु न जाए ॥
नानक कामणि पिरहि पिआरी विचहु आपु गवाए ॥१॥
कामणि पिरु पाइआ जीउ गुर कै भाइ पिआरे ॥
रैणि सुखि सुती जीउ अंतरि उरि धारे ॥
अंतरि उरि धारे मिलीऐ पिआरे अनदिनु दुखु निवारे ॥
अंतरि महलु पिरु रावे कामणि गुरमती वीचारे ॥
अंम्रितु नामु पीआ दिन राती दुबिधा मारि निवारे ॥
नानक सचि मिली सोहागणि गुर कै हेति अपारे ॥२॥
आवहु दइआ करे जीउ प्रीतम अति पिआरे ॥
कामणि बिनउ करे जीउ सचि सबदि सीगारे ॥
सचि सबदि सीगारे हउमै मारे गुरमुखि कारज सवारे ॥
जुगि जुगि एको सचा सोई बूझै गुर बीचारे ॥
मनमुखि कामि विआपी मोहि संतापी किसु आगै जाइ पुकारे ॥
नानक मनमुखि थाउ न पाए बिनु गुर अति पिआरे ॥३॥
मुंध इआणी भोली निगुणीआ जीउ पिरु अगम अपारा ॥
आपे मेलि मिलीऐ जीउ आपे बखसणहारा ॥
अवगण बखसणहारा कामणि कंतु पिआरा घटि घटि रहिआ समाई ॥
प्रेम प्रीति भाइ भगती पाईऐ सतिगुरि बूझ बुझाई ॥
सदा अनंदि रहै दिन राती अनदिनु रहै लिव लाई ॥
नानक सहजे हरि वरु पाइआ सा धन नउ निधि पाई ॥४॥३॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ३ ॥ (भाग्यशाली है वह) जीव-स्त्री (जिसका मन) परमात्मा के नाम में बेधा रहता है। जो परमात्मा के प्यार में अडोलता में टिकी रहती है। और जिसके मन को सुंदर प्रभू ने मोह रखा है। (उस जीव-स्त्री की) मेरे तेर आत्मिक अडोलता में खतम हो जाती है। वह जीव-स्त्री प्रभू पति को मिल जाती है। गुरू की मति ले के वह आत्मिक रंग भोगती है। (माया के मोह में फस के मनुष्य का) ये शरीर झूठ ठॅगी फरेब से नाको नाक भरा रहता है और जीव पाप कमाता रहता है। पर गुरू शरण पड़ने से जीव प्रभू की भगती करता है। जिसकी बरकति से इसके अंदर आत्मिक अडोलता की रौंअ पैदा हो जाती है (और सारे किए पाप विकार दूर हो जाते हैं) प्रभू भगती के बगैर (विकारों की) मैल दूर नहीं होती। हे नानक ! (वह) जीव-स्त्री प्रभू पति की प्यारी बन जाती है। जो अपने अंदर से स्वैभाव दूर कर लेती है। 1। जो जीव स्त्री गुरू के प्रेम-प्यार में टिकी रहती है। वह प्रभू पति को मिल जाती है। वह अपने अंदर अपने हृदय में (प्रभू-पति को) बसाती है और सारी जिंदगी-रूपी रात सुख में गुजारती है। जो जीव-स्त्री अपने अंदर प्रभू का निवास-स्थान ढूँढ लेती है। गुरू की मति ले के (प्रभू के गुणों को) विचारती है। वह प्रभू-पति के मिलाप का आत्मिक आनंद पाती है। जिस जीव-स्त्री ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस दिन रात पीया है। वह अपने अंदर से मेर-तेर को खत्म कर देती है। हे नानक ! गुरू के अथाह प्यार की बरकति से वह जीव-स्त्री सदा स्थिर प्रभू-पति में विलीन रहती है और भाग्यशाली बन जाती है। 2। हे अति प्यारे प्रीतम जी ! मेहर करके (मेरे हृदय में) आ बसो। (भाग्यशाली है वह) जीव-स्त्री जो सदा स्थिर प्रभू के नाम से व गुरू के शबद से अपने आत्मिक जीवन को सुंदर बना के (प्रभू दर पे) विनती करती है जो जीव-स्त्री सदा स्थिर प्रभू के नाम से गुरू के शबद से अपने जीवन को खूबसूरत बना लेती है। वह अपने अंदर से अहंकार दूर कर लेती है। गुरू की शरण पड़ कर वह अपने सारे कारज सवार लेती है। वह जीव-स्त्री गुरू की दी हुई विचार (के उपदेश) की बरकति से उस परमात्मा के साथ सांझ पा लेती है जो हरेक युग में ही सदा कायम रहने वाला है। (पर) अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री काम वासना में दबी रहती है। मोह में फंस के दुखी होती है। वह किस के आगे जा के (अपने दुखों की) पुकार करे? (कोई उसका ये दुख दूर नहीं कर सकता)। हे नानक ! अति प्यारे गुरू के बिना अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री (प्रभू-चरणों में) स्थान हासिल नहीं कर सकती। 3। (एक तरफ जीव-स्त्री) मूर्ख है अंजान है भोली है (कि विकारों की लपटों से बचना नहीं जानती) और गुण-हीन है। (दूसरी तरफ) प्रभू-पति अपहुँच है और बेअंत है (ऐसी अवस्था में। ऐसी जीव-स्त्री का प्रभू-पति से मिलाप कैसे हो?)। यदि प्रभू स्वयं ही (जीव-स्त्री को) मिलाए तो मिलाप हो सकता है। वह खुद ही (जीव-सि्त्रयों की भूलें गलतियां) बख्शने वाला है। प्यारा प्रभू-कंत जीव-स्त्री के अवगुण माफ करने के समर्थ है। और वह हरेक शरीर में बस रहा है (इस तरह सब के गुण-अवगुण जानता है)। सतिगुरू ने ये शिक्षा दी है कि वह कंत-प्रभू। प्रेम-प्रीति से प्राप्त होता है भगती भाव से मिलता है। हे नानक ! (जो जीव-स्त्री गुरू की इस शिक्षा पर चलती है) वह हर वक्त दिन रात आनंद में रहती है। वह हर समय (प्रभू-चरणों में) सुरति जोड़े रखती है, आत्मिक अडोलता में टिक के वह प्रभू-पति से मिल जाती है। उस जीव-स्त्री ने, जैसे दुनिया के नौ के नौ खजाने हासिल कर लिए हों। 4। 3।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਮਾਇਆ ਸਰੁ ਸਬਲੁ ਵਰਤੈ ਜੀਉ ਕਿਉ ਕਰਿ ਦੁਤਰੁ ਤਰਿਆ ਜਾਇ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਕਰਿ ਬੋਹਿਥਾ ਜੀਉ ਸਬਦੁ ਖੇਵਟੁ ਵਿਚਿ ਪਾਇ ॥
ਸਬਦੁ ਖੇਵਟੁ ਵਿਚਿ ਪਾਏ ਹਰਿ ਆਪਿ ਲਘਾਏ ਇਨ ਬਿਧਿ ਦੁਤਰੁ ਤਰੀਐ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਵੈ ਜੀਵਤਿਆ ਇਉ ਮਰੀਐ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਕਿਲਵਿਖ ਕਾਟੇ ਭਏ ਪਵਿਤੁ ਸਰੀਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਨਿਸਤਾਰਾ ਕੰਚਨ ਭਏ ਮਨੂਰਾ ॥੧॥
ਮਾਇਆ ਸਰੁ ਸਬਲੁ ਵਰਤੈ ਜੀਉ ਕਿਉ ਕਰਿ ਦੁਤਰੁ ਤਰਿਆ ਜਾਇ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਕਰਿ ਬੋਹਿਥਾ ਜੀਉ ਸਬਦੁ ਖੇਵਟੁ ਵਿਚਿ ਪਾਇ ॥
ਸਬਦੁ ਖੇਵਟੁ ਵਿਚਿ ਪਾਏ ਹਰਿ ਆਪਿ ਲਘਾਏ ਇਨ ਬਿਧਿ ਦੁਤਰੁ ਤਰੀਐ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਵੈ ਜੀਵਤਿਆ ਇਉ ਮਰੀਐ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਕਿਲਵਿਖ ਕਾਟੇ ਭਏ ਪਵਿਤੁ ਸਰੀਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਨਿਸਤਾਰਾ ਕੰਚਨ ਭਏ ਮਨੂਰਾ ॥੧॥
गउड़ी महला ३ ॥
माइआ सरु सबलु वरतै जीउ किउ करि दुतरु तरिआ जाइ ॥
राम नामु करि बोहिथा जीउ सबदु खेवटु विचि पाइ ॥
सबदु खेवटु विचि पाए हरि आपि लघाए इन बिधि दुतरु तरीऐ ॥
गुरमुखि भगति परापति होवै जीवतिआ इउ मरीऐ ॥
खिन महि राम नामि किलविख काटे भए पवितु सरीरा ॥
नानक राम नामि निसतारा कंचन भए मनूरा ॥१॥
माइआ सरु सबलु वरतै जीउ किउ करि दुतरु तरिआ जाइ ॥
राम नामु करि बोहिथा जीउ सबदु खेवटु विचि पाइ ॥
सबदु खेवटु विचि पाए हरि आपि लघाए इन बिधि दुतरु तरीऐ ॥
गुरमुखि भगति परापति होवै जीवतिआ इउ मरीऐ ॥
खिन महि राम नामि किलविख काटे भए पवितु सरीरा ॥
नानक राम नामि निसतारा कंचन भए मनूरा ॥१॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ३ ॥ माया (के मोह) का लबालब भरा समुंद्र अपना जोर डाल रहा है। इसमें से तैरना बहुत ही मुश्किल है, (हे भाई !) कैसे इसमें से पार लंघा जाए? हे भाई ! परमात्मा के नाम को जहाज बना। गुरू के शबद को मल्लाह बना के (उस जहाज) में बैठा। यदि मनुष्य परमात्मा के नाम-जहाज में गुरू के शबद-मल्लाह को बैठा दे। तो परमात्मा स्वयं ही (माया के सरोवर से) पार लंघा देता है। (हे भाई !) इस दुश्वार माया-सरोवर में यूँ ही पार लांघ सकते हैं। गुरू की शरण पड़ने से परमात्मा की भगती प्राप्त हो जाती है। इस तरह दुनिया के कार्य-व्यवहार करते हुए माया की ओर से अछोह हो जाते हैं। हे नानक ! परमात्मा के नाम की बरकति से (सारे) पाप एक छिन में कट जाते हैं। (जिसके काटे जाते हैं। उसका) शरीर पवित्र हो जाता है। परमात्मा के नाम से ही (माया-सरोवर से) पार लांघ सकते हैं औार लोहे की मैल (जंग लगा लोहे) (जैसा नकारा हुआ मन) सोना बन जाता है। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 245 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Sunday सुबह 7 बजे parents से 30-मिनट की video-call, बीच में silence।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 245” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 246 →, पीछे का: ← अंग 244।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।