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उपनिषद्प्रश्न के भीतर का मौन

ऐतरेय उपनिषद्: सृष्टि, प्रवेश और प्रज्ञानं ब्रह्म

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ऋग्वेद · ऐतरेय उपनिषद् · तीन अध्याय
वह कथा जिसमें आत्मा अकेला लोक रचता है, देवता पुरुष में अपने अपने द्वार से उतरते हैं, और अन्त में प्रज्ञान ही ब्रह्म ठहरता है।

एक महासागर है और उसमें कुछ देवता गिरे पड़े हैं। अग्नि है, वायु है, सूरज है, दिशाएँ हैं, चाँद है, और वे सब बेघर हैं। अभी अभी वे बने हैं, किसी के मुख से, किसी की नाक से, किसी की आँख से निकलकर, और निकलते ही उनके पास रहने को कोई जगह नहीं बची। उन्हें अन्न चाहिए और उसे खाने के लिए कोई जगह नहीं है। वे उसी की ओर मुड़कर, जिसने उन्हें रचा है, एक बहुत सीधी बात कहते हैं, हमें कोई घर बताइए, कोई ठिकाना, जिसमें टिककर हम अन्न खा सकें। उनके सामने पहले एक गाय लाई जाती है, फिर एक घोड़ा, और वे दोनों बार सिर हिला देते हैं। और तब एक आदमी लाया जाता है, और सारे देवता एक साथ बोल उठते हैं, वाह, यह तो बना बनाया है। ऐतरेय उपनिषद् की सबसे बड़ी बात इसी वाक्य में है, कि यह देह जिसे हम रोज़ मामूली समझकर घसीटते फिरते हैं, वह देवताओं की चुनी हुई जगह है।

ऋग्वेद से आया यह उपनिषद् तीन अध्यायों में पूरा होता है और इसकी चाल किसी और उपनिषद् जैसी नहीं है। यहाँ शुरू में कोई शिष्य प्रश्न लेकर नहीं आता, कोई सभा नहीं जुड़ती, कोई राजा दक्षिणा नहीं देता। यहाँ पहले एक सृष्टि रची जाती है, फिर उस सृष्टि को सँभालने वाले देवता एक देह में उतारे जाते हैं, फिर अन्न बनाया जाता है और वह पकड़ में नहीं आता, और तब जाकर वह प्रश्न उठता है जिसके लिए यह सारा तमाशा खड़ा किया गया था, कि इन सब कामों के बीच मैं कौन हूँ। तीसरा अध्याय उसी प्रश्न को दोहराता है और चार शब्दों में उसका उत्तर देकर बैठ जाता है।

इस उपनिषद् के मुख्य किरदार

आत्मा: वह जो आरम्भ में अकेला था, जिसने देखा और लोक रचे, और जो अन्त में सिर का रास्ता चीरकर अपनी ही रचना में उतरा।

पुरुष: जल से खींचकर निकाला गया वह आकार, जिसके अङ्ग तपस् से एक एक करके फूटे, और जो बाद में देवताओं का घर बना।

देवता: अग्नि, वायु, आदित्य, दिशाएँ, ओषधि और वनस्पति, चन्द्रमा, मृत्यु और जल, जो बेघर होकर ठिकाना माँगते हैं।

अशनाया और पिपासा: भूख और प्यास, जिन्हें अपना कोई अलग घर नहीं मिला, और बदले में हर हवि में हिस्सा मिला।

अन्न: वह जो बनते ही भागने लगा, और जिसे सात नाकाम कोशिशों के बाद केवल अपान पकड़ सका।

वामदेव: वह ऋषि जिसने गर्भ में पड़े पड़े देवताओं के सारे जन्म जान लिए और बाज़ की तरह निकल भागा।

पहले केवल आत्मा था, और कुछ भी नहीं

पहला वाक्य ही ऐसा है कि उसके बाद कुछ देर चुप रहने का मन करता है। “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्”, आरम्भ में यह सब एक आत्मा ही था, और दूसरा कुछ भी नहीं था। इस वाक्य में जो शब्द सबसे ज़्यादा काम कर रहा है वह है इदम्, यह। यानी जो आज हमें चारों ओर फैला दिखता है, यही सब, वही तब अकेला आत्मा था। कोई और सामग्री कहीं से नहीं आई, कोई कच्चा माल पहले से पड़ा नहीं था। जो बनाने वाला है और जो बना है, दोनों के बीच कोई तीसरी चीज़ नहीं है।

और फिर आता है इस उपनिषद् का सबसे चुपचाप काम करने वाला शब्द, ईक्षत, उसने देखा। बनाने से पहले हाथ नहीं उठा, कोई औज़ार नहीं आया, कोई शब्द नहीं बोला गया। बस देखा। जैसे किसी को अचानक कुछ सूझ जाए और वह चीज़ उसी सूझने के साथ आकार लेने लगे। उसने देखा कि अब लोक रचूँ। इस एक क्रिया से पूरी सृष्टि का स्वभाव तय हो जाता है, कि यह किसी मिट्टी के लोंदे को गूँधकर बनाई गई चीज़ नहीं है, यह एक दृष्टि का फैलाव है।

फिर वह चार लोक रचता है, और उनके नाम कुछ अनजाने से हैं। अम्भस्, मरीचि, मर, और आपः। उपनिषद् खुद ही आगे बता देता है कि कौन कहाँ है। वह जो अम्भस् है, वह द्युलोक के भी परे है, और द्युलोक उसका आधार है। मरीचियाँ वह हैं जो अन्तरिक्ष में हैं। मर वह है जिसे हम पृथिवी कहते हैं, और नाम ही बताता है कि यह मरने वाली जगह है। और जो सबसे नीचे है, वह आपः है, जल। ऊपर से नीचे तक चार मंज़िलों का यह ढाँचा किसी नक्शे की तरह एक ही साँस में खड़ा कर दिया गया है।

ग़ौर कीजिए कि नाम कितने सादे हैं। पानी, किरण, मरने वाली ज़मीन। यह उपनिषद् किसी भी जगह ऐसी शब्दावली नहीं गढ़ता जो सुनने वाले को डरा दे। जो कुछ रचा जा रहा है, वह उसी भाषा में रचा जा रहा है जिसमें लोग रोज़ बात करते हैं, और शायद इसीलिए यह कथा तीन हज़ार साल बाद भी अपनी सादगी से पकड़ लेती है।

सार: उपनिषद् आरम्भ में आत्मा को अकेला रखता है और कहता है कि आज जो कुछ दिख रहा है, वही तब वह अकेलापन था। रचना किसी हाथ से नहीं, एक देखने से शुरू होती है। चार लोकों के नाम इतने सादे हैं कि वे किसी शास्त्र की तरह नहीं, किसी घर के नक्शे की तरह लगते हैं।

जल से निकाला हुआ पुरुष, और अण्डे की तरह फूटता मुख

लोक बन गए तो उसने फिर देखा, कि ये लोक तो हो गए, अब इनके रखवाले रचूँ। और तब वह पंक्ति आती है जिसमें एक अद्भुत क्रिया छिपी है। “सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत्”, उसने जल में से ही पुरुष को खींचकर निकाला और उसे जमाया, गाढ़ा किया, आकार दिया। समुद्धृत्य में उठाकर निकालने का भाव है, जैसे कोई घड़े से कुछ निकाल ले। और जिस जल से वह निकाला गया, वह वही सबसे नीचे वाला लोक है जो अभी अभी रचा गया था। रचयिता अपनी ही रचना में से अगली रचना निकालता है।

पर वह पुरुष अभी बस एक आकार है, उसमें कोई खिड़की नहीं है। तब वह उसे तपाता है। तपस् इस उपनिषद् में बार बार लौटता है और हर बार उसका काम एक ही है, किसी चीज़ पर इतनी देर टिके रहना कि वह अपने आप खुलने लगे। तपाए जाने पर उस पुरुष का मुख फूटता है, अण्डे के फूटने की तरह, और मुख से वाक् निकलती है, और वाक् से अग्नि। रचना की यह सीढ़ी बहुत ख़ास है, पहले देह में एक छेद, फिर उस छेद से एक शक्ति, और फिर उस शक्ति से एक देवता।

यही क्रम आगे सात बार और चलता है, हर बार उसी तरतीब से। नासिकाएँ फूटती हैं, उनसे प्राण, प्राण से वायु। आँखें फूटती हैं, उनसे चक्षु, चक्षु से आदित्य। कान फूटते हैं, उनसे श्रोत्र, श्रोत्र से दिशाएँ। त्वचा फूटती है, उससे रोएँ, रोओं से ओषधियाँ और वनस्पतियाँ। हृदय फूटता है, उससे मन, मन से चन्द्रमा। नाभि फूटती है, उससे अपान, अपान से मृत्यु। और शिश्न फूटता है, उससे रेतस्, रेतस् से जल।

इस सूची को धीरे धीरे पढ़िए तो एक बात खुलती है। यहाँ देह पहले है और जगत् बाद में। आँख पहले खुली, फिर सूरज बना। कान पहले फूटे, फिर दिशाएँ बनीं। हम आम तौर पर उलटा सोचते हैं, कि पहले सूरज था और उसे देखने के लिए बाद में आँख बनी। उपनिषद् जान बूझकर क्रम पलट देता है, क्योंकि उसे यह दिखाना है कि देखने वाली शक्ति और दिखने वाली दुनिया, दोनों एक ही जगह से निकली हैं और आपस में जुड़वाँ हैं। इसीलिए आँख सूरज को देख पाती है, कान आवाज़ को पकड़ पाता है, नाक हवा को सूँघ पाती है।

और यह जुड़ाव आगे बहुत काम आने वाला है। जब ये देवता बेघर होकर लौटेंगे, तो वे किसी अजनबी जगह में नहीं घुसेंगे। हर एक वहीं जाएगा जहाँ से वह निकला था। अग्नि मुख में, वायु नासिका में, आदित्य आँख में। रचना का यह पहला चक्कर दरअसल उसी वापसी की तैयारी है।

सार: रखवाले रचने के लिए आत्मा जल से एक पुरुष निकालता है और उसे तपाता है। तपने पर उसके अङ्ग एक एक करके फूटते हैं, और हर अङ्ग से पहले एक शक्ति निकलती है और फिर एक देवता। यहाँ आँख सूरज से पहले बनी है, क्योंकि उपनिषद् को देखने वाले और दिखने वाले का जुड़वाँपन दिखाना है।

देवता जो महासागर में गिर पड़े, और भूख जो साथ लगा दी गई

अब कथा अचानक बहुत मानवीय हो जाती है। रचे जाने के बाद वे सारे देवता इस महासागर में गिर पड़ते हैं। जो अभी अभी सूरज बना था, जो अभी अभी अग्नि बनी थी, वे सब एक बड़े फैलाव में बिखरे पड़े हैं, बिना किसी छत के। और उसी घड़ी वह उस पुरुष को भूख और प्यास के साथ जोड़ देता है। यह कोई सज़ा नहीं है, यह बनावट का हिस्सा है, क्योंकि जिसे भूख नहीं लगती वह अन्न नहीं खोजेगा, और जो अन्न नहीं खोजेगा वह हिलेगा भी नहीं।

तब वे देवता उसके पास आकर कहते हैं। “ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि”, उन्होंने उससे कहा कि हमारे लिए कोई आयतन खोजिए, कोई ठिकाना, जिसमें जमकर बैठकर हम अन्न खा सकें। आयतन शब्द बहुत अच्छा है। यह केवल जगह नहीं है, यह वह जगह है जहाँ फैलकर बैठा जा सके, जहाँ टिका जा सके। शक्तियाँ बिखरी पड़ी रहें तो उनसे कुछ नहीं होता। उन्हें एक ढाँचा चाहिए जिसमें वे जम जाएँ और काम करने लगें।

उनके सामने पहले एक गाय लाई जाती है। गाय कोई मामूली पेशकश नहीं है, वैदिक दुनिया में उससे बड़ी सम्पत्ति कुछ नहीं। पर देवता देखकर कहते हैं, “न वै नोऽयमलम्”, यह हमारे लिए काफ़ी नहीं है। फिर घोड़ा लाया जाता है, जो उस समय की सबसे तेज़ और सबसे शानदार चीज़ थी, और वही उत्तर फिर आता है, यह भी हमारे लिए काफ़ी नहीं है। दोनों बार अलम् शब्द आया है, पर्याप्त, समर्थ। यानी बात सुन्दरता या क़ीमत की नहीं है, बात समर्थता की है।

और तब उनके सामने पुरुष लाया जाता है। देवताओं की प्रतिक्रिया में जो ख़ुशी है, वह इस पूरे उपनिषद् में और कहीं नहीं दिखती। वे कहते हैं, सुकृत है, वाह, यह तो अच्छा गढ़ा हुआ है। “पुरुषो वाव सुकृतम्”, पुरुष ही सचमुच सुकृत है। सुकृत का अर्थ है सु और कृत, अच्छी तरह किया हुआ, ठीक से बना हुआ, और उसी शब्द में पुण्य का भाव भी बैठा है। जिस देह को लोग अक्सर बोझ की तरह ढोते हैं, उसी के सामने खड़े होकर देवता बोले कि हाँ, यही ठीक है।

यह क्यों ठीक है, उपनिषद् यहाँ खोलकर नहीं बताता, पर आगे की कथा से साफ़ हो जाता है। गाय में भी आँख है, घोड़े में भी कान हैं, दोनों देखते और सुनते हैं। पर आगे तीसरे खण्ड में जो प्रश्न उठेगा, अथ कोऽहम्, वह प्रश्न केवल यहीं उठ सकता है। जिस ढाँचे में अपने से अपने बारे में पूछा जा सकता है, देवताओं को वही ढाँचा चाहिए था, क्योंकि केवल वहीं वे अपने काम को जानते हुए कर सकते हैं।

सार: नए बने देवता महासागर में बिखरे पड़े हैं और ठिकाना माँगते हैं, क्योंकि बिना ढाँचे के कोई शक्ति काम नहीं कर सकती। गाय और घोड़े को वे दोनों बार लौटा देते हैं। पुरुष को देखते ही वे ख़ुश होकर उसे सुकृत कहते हैं, ठीक से बना हुआ।

अपने अपने द्वार से भीतर, और भूख को भी हिस्सा

तब उसने उनसे कहा, “यथायतनं प्रविशत”, जिसका जो ठिकाना है, उसमें प्रवेश कीजिए। इस आदेश में कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं है। हर देवता को उसी दरवाज़े पर लौटना है जहाँ से वह निकला था, और वह दरवाज़ा उसके लिए पहले से खुला पड़ा है। जो वहाँ से निकली थी वही शक्ति वहीं वापस बैठ जाएगी, बस अब वह अकेली नहीं बैठेगी, वह एक देह के भीतर, बाक़ी सबके साथ मिलकर बैठेगी।

और फिर वह प्रवेश होता है, एक एक करके। “अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत्”, अग्नि वाक् बनकर मुख में घुस गई। वायु प्राण बनकर नासिकाओं में, आदित्य चक्षु बनकर आँखों में, दिशाएँ श्रोत्र बनकर कानों में, ओषधियाँ और वनस्पतियाँ रोएँ बनकर त्वचा में, चन्द्रमा मन बनकर हृदय में, मृत्यु अपान बनकर नाभि में, और जल रेतस् बनकर शिश्न में। इस पूरी सूची में सबसे चौंकाने वाली पंक्ति वह है जिसमें मृत्यु भी भीतर आ जाती है, और वह भी किसी दुश्मन की तरह नहीं, एक रहने वाले की तरह, अपने ही हिस्से में।

अब इस दृश्य को एक बार पूरा देखिए। यह देह अब कोई माँस का ढेर नहीं रह गई। इसके मुख में अग्नि बैठी है, नाक में वह हवा बैठी है जो सारे आकाश में चलती है, आँखों में सूरज बैठा है, कानों में दिशाएँ, और हृदय में चाँद। जो कुछ बाहर बहुत बड़ा है, वही भीतर बहुत छोटा होकर काम कर रहा है, और यही इस उपनिषद् का सबसे बड़ा दान है। बाहर और भीतर की दूरी इस एक दृश्य से मिट जाती है।

पर कथा यहीं ख़त्म नहीं होती, क्योंकि दो और खड़े हैं जिन्हें कोई घर नहीं मिला। भूख और प्यास आकर कहती हैं कि हम दोनों के लिए भी कुछ सोचिए। उत्तर बहुत ग़ौर से पढ़ने लायक़ है। वह कहता है कि आपको अलग घर नहीं दूँगा, इन्हीं देवताओं में आपका हिस्सा बना देता हूँ, इन्हीं में आप दोनों भागिन हो जाइए। इसीलिए, उपनिषद् जोड़ता है, जिस किसी देवता के लिए हवि ली जाती है, उसमें भूख और प्यास दोनों का हिस्सा रहता है।

यह बात रोज़ के अनुभव से मिलाकर देखिए तो चौंका देती है। आँख को रूप की भूख है, कान को आवाज़ की, त्वचा को छुअन की। कोई भी इन्द्रिय ऐसी नहीं जो भरी हुई हो। जिस शक्ति के भीतर भूख न हो, वह हिलेगी ही नहीं, इसलिए भूख को अलग कमरा देने की ज़रूरत नहीं थी, वह हर कमरे में पहले से बैठी है। यही कारण है कि जो सबसे ज़्यादा पा लेता है, वह भी शाम को कुछ न कुछ और माँगता है।

सार: हर देवता उसी द्वार से भीतर उतरता है जहाँ से वह निकला था, और देह एक बसे हुए घर में बदल जाती है जिसमें अग्नि, वायु, सूरज, दिशाएँ, चाँद और मृत्यु तक अपने अपने कमरे में रहते हैं। भूख और प्यास को अलग घर नहीं मिलता, उन्हें हर देवता में हिस्सा मिल जाता है।

अन्न जो पकड़ में नहीं आता

तीसरा खण्ड फिर उसी क्रिया से शुरू होता है। उसने देखा कि लोक भी हो गए और लोकपाल भी, अब इनके लिए अन्न रचूँ। और वह फिर जल पर ही तपता है, और तपे हुए जल से एक मूर्ति जन्म लेती है, एक आकार, और वही अन्न है। ध्यान दीजिए कि अन्न भी वहीं से आया जहाँ से पुरुष आया था। खाने वाला और खाया जाने वाला, दोनों एक ही जल से निकले हैं, और इसी कारण आगे उनके बीच की भिड़न्त इतनी दिलचस्प हो जाती है।

क्योंकि बनते ही अन्न भागने लगता है। यह कथा का सबसे विनोदी हिस्सा है और सबसे गहरा भी। अन्न मुँह मोड़कर निकल जाना चाहता है, और वह उसे पकड़ने की कोशिश करता है। पहले वाक् से पकड़ना चाहा, नहीं पकड़ा गया। उपनिषद् साथ ही यह भी बता देता है कि अगर वाक् से पकड़ लिया गया होता तो आदमी अन्न की बात करके ही तृप्त हो जाता। यह पंक्ति हर कोशिश के साथ लौटती है और हर बार एक तीखा सच खोलती है।

फिर प्राण से पकड़ना चाहा, नहीं पकड़ा गया, वरना सूँघ भर लेने से पेट भर जाता। आँख से चाहा, नहीं पकड़ा गया, वरना देख लेने से तृप्ति हो जाती। कान से चाहा, वरना सुन लेने से। त्वचा से चाहा, वरना छू लेने से। मन से चाहा, वरना सोच लेने से। शिश्न से चाहा, वरना छोड़ देने भर से। सात बार कोशिश होती है और सातों बार अन्न हाथ से निकल जाता है। कोई भी इन्द्रिय अन्न को सचमुच भीतर नहीं ले जा सकती।

यह देखिए कि यह सूची हमारे अपने दिन का कितना सटीक नक्शा है। किसी पकवान की चर्चा से किसी का पेट नहीं भरता। किसी सुन्दर चीज़ को देख लेने से भूख नहीं मरती, वह और भड़कती है। हम दिन भर इन्हीं दरवाज़ों से दुनिया भीतर लेने की कोशिश करते हैं और शाम तक ख़ाली रह जाते हैं। उपनिषद् इस अनुभव को किसी उपदेश की तरह नहीं, एक नाकाम कोशिश की कथा की तरह रखता है, और वह कहीं ज़्यादा असर करता है।

अन्त में अपान से कोशिश होती है, और अन्न पकड़ में आ जाता है। उपनिषद् कहता है कि अन्न को पकड़ने वाला यही है, यही वायु है, और यही वह है जो अन्न से जीता है। बाहर की सारी इन्द्रियाँ अन्न को छू सकती हैं, चख सकती हैं, सूँघ सकती हैं, पर उसे सचमुच भीतर उतारकर देह में मिला देने वाली वह नीचे की ओर चलने वाली हवा है, जिसका कोई चेहरा नहीं है और जिसकी कोई शोहरत नहीं है। जो दिखता नहीं, वही असल काम कर रहा है, और यह इस उपनिषद् का बार बार लौटने वाला सुर है।

सार: अन्न भी उसी जल से बना जिससे पुरुष बना था, और बनते ही भागने लगा। वाक्, प्राण, आँख, कान, त्वचा, मन और शिश्न, सातों कोशिशें ख़ाली गईं, और हर बार उपनिषद् बता देता है कि पकड़ लिया जाता तो केवल बोलने या देख लेने से पेट भर जाता। अन्त में उसे अपान पकड़ता है, वह हवा जिसका कोई चेहरा नहीं।

फिर मैं कौन हूँ, और सिर के रास्ते भीतर

अब वह घड़ी आती है जिसके लिए यह सारा ढाँचा खड़ा किया गया था। सब कुछ बन चुका है। लोक हैं, लोकपाल हैं, देह है, अन्न है, और देह के भीतर हर देवता अपने कमरे में बैठकर अपना काम कर रहा है। और तब वह ठहरकर सोचता है, यह सब मेरे बिना कैसे चलेगा। और फिर, किस रास्ते से मैं इसमें उतरूँ।

और इसके बाद वह पूरी सूची दोहराई जाती है, पर इस बार एक बिलकुल दूसरे सुर में। अगर बोलना वाक् से हो रहा है, साँस लेना प्राण से, देखना आँख से, सुनना कान से, छूना त्वचा से, सोचना मन से, नीचे की हवा अपान से, और छोड़ना शिश्न से, “अथ कोऽहम्”, तो फिर मैं कौन हूँ। यह प्रश्न इस उपनिषद् का दिल है। हर काम का एक करने वाला गिना दिया गया, सारी सूची पूरी हो गई, और उसके बाद भी एक जगह ख़ाली रह गई। जो बचा रह गया, जिसका कोई काम सूची में नहीं है, वही आत्मा है।

इस बात को अपने ऊपर घटाकर देखिए। दिन भर में जो कुछ होता है, उसके करने वाले गिने जा सकते हैं। आँख ने देखा, कान ने सुना, मन ने सोचा, हाथ ने उठाया। पर जिसने इन सबको अपना कहा, वह इस सूची में कहीं नहीं है। हम अपने को इन्हीं कामों के जोड़ से पहचानते रहते हैं, और यह प्रश्न आते ही वह जोड़ हाथ से फिसल जाता है।

और फिर वह दृश्य आता है जो इस उपनिषद् को याद रखने लायक़ बनाता है। “स एतमेव सीमानं विदर्यैतया द्वारा प्रापद्यत”, उसने इसी सीमा को चीरकर उसी द्वार से प्रवेश किया। सीमन् वह जगह है जहाँ सिर के बाल दो ओर बँटते हैं, माथे के ऊपर की वह पतली लकीर। बाक़ी सब देवता नीचे के दरवाज़ों से आए थे, मुँह से, नाक से, आँख से, कान से। उनके लिए दरवाज़े पहले से खुले पड़े थे। पर उसका अपना कोई दरवाज़ा नहीं था, इसलिए उसे बनाना पड़ा, सबसे ऊपर, और उसी रास्ते वह उतरा।

उस द्वार का नाम उपनिषद् ख़ुद देता है, विदृति, चीरकर बनाई गई दरार। और वह जगह जहाँ वह उतरा, वह नान्दन है, आनन्द की जगह। फिर एक पंक्ति आती है जिसे उपनिषद् बिना खोले छोड़ देता है, कि उसके तीन आवसथ हैं, तीन स्वप्न हैं, यह आवसथ, यह आवसथ, यह आवसथ। तीन बार यही कहकर बात रुक जाती है, जैसे उँगली से तीन जगहें दिखाई जा रही हों।

जन्म लेकर उसने चारों ओर भूतों को देखा और सोचा कि यहाँ किसी दूसरे की बात कोई क्यों करे। और उसने उसी पुरुष को ब्रह्म के रूप में देखा, चारों ओर फैला हुआ, और कहा, यह मैंने देख लिया। इसी देखने से उसका नाम पड़ा, इदन्द्र, यह देखने वाला। पर लोग उसे इदन्द्र नहीं कहते, इन्द्र कहते हैं, नाम को थोड़ा घुमाकर। और उपनिषद् इसका कारण भी दे देता है, और इतना पसन्द करता है कि दो बार कहता है, “परोक्षप्रिया इव हि देवाः”, देवताओं को परोक्ष प्रिय है, सीधी बात नहीं, थोड़ी ढकी हुई बात।

सार: हर काम का करने वाला गिना दिए जाने के बाद जो जगह ख़ाली बचती है, वहीं से यह प्रश्न उठता है कि फिर मैं कौन हूँ। बाक़ी सब देवता नीचे के खुले दरवाज़ों से भीतर आए थे, आत्मा को अपना दरवाज़ा सिर के ऊपर चीरकर बनाना पड़ा, और उस दरार का नाम विदृति है। जो देखने से उसका नाम इदन्द्र पड़ा, उसी को लोग घुमाकर इन्द्र कहते हैं।

तीन जन्म, और गर्भ में जागा हुआ वामदेव

दूसरा अध्याय बहुत छोटा है और वह कथा से हटकर सीधे एक हिसाब पर आ जाता है। पुरुष में जो पहला गर्भ बनता है, वह रेतस् है, और वह सारे अङ्गों से इकट्ठा हुआ तेज है। वह अपने भीतर अपने को ही सँभाले रहता है। जब वह उसे स्त्री में रखता है, तब वह उसे जन्म देता है, और यह उसका पहला जन्म है। ध्यान दीजिए कि उपनिषद् ने पहला जन्म उसे कहा जो माँ की गोद में आने से भी पहले हो चुका होता है।

फिर वह स्त्री के अपने आत्मा जैसा हो जाता है, उसके अपने किसी अङ्ग की तरह, इसीलिए वह उसे कोई चोट नहीं पहुँचाता। और वह उस आए हुए आत्मा को पोसती है। जो पोसने वाली है, वह ख़ुद पोसने लायक़ हो जाती है, यह वाक्य इस पूरे अध्याय में सबसे कोमल है। गर्भवती स्त्री की देखभाल यहाँ किसी रिवाज की तरह नहीं आई, उसे कथा के तर्क से निकाला गया है, कि जो किसी और को पाल रही है, उसे पालना अब सबका काम है।

वह स्त्री उस गर्भ को धारण करती है, और पिता उस बालक को जन्म से पहले ही पोसने लगता है। और उपनिषद् जोड़ता है कि इस तरह जब वह उस बालक को पोसता है तो दरअसल अपने ही आत्मा को पोसता है, इन लोकों की निरन्तरता के लिए, क्योंकि इसी तरह ये लोक चलते चले जाते हैं। यह उसका दूसरा जन्म है। जिसे हम आम तौर पर जन्म कहते हैं, उसे यह उपनिषद् दूसरे नम्बर पर रखता है।

और तीसरा जन्म मृत्यु के बाद का है। उसका यह आत्मा पुण्य कर्मों के लिए उसकी जगह रख दिया जाता है, और उसका दूसरा आत्मा, अपना किया हुआ पूरा करके और उम्र पूरी करके, चला जाता है। यहाँ से जाता हुआ वह फिर जन्म लेता है, और यही उसका तीसरा जन्म है। तीनों जन्मों को एक साथ रखकर देखिए तो एक धागा दिखता है जो पिता से पुत्र में, और पुत्र से आगे, बिना टूटे चलता रहता है।

इसके बाद वह ऋचा आती है जो इस अध्याय को अचानक ऊँचा उठा देती है। “गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा”, गर्भ में रहते हुए ही मैंने इन देवताओं के सारे जन्म जान लिए। और फिर, सौ लोहे के क़िलों ने मुझे घेरकर रखा था, पर मैं बाज़ की तरह वेग से निकल भागा। उपनिषद् बताता है कि यह वामदेव ने गर्भ में पड़े पड़े कहा था।

सौ लोहे के क़िले वाला रूपक बहुत सटीक है। देह ही वह क़िला है, और वह किसी दुश्मन ने नहीं बनाया, वह अपने ही किए से बना है। और उसे तोड़ने के लिए कोई हथियार नहीं चाहिए, जानना ही काफ़ी है, इसीलिए उड़ान की उपमा आई और सेंध की नहीं। अध्याय इसी पर पूरा होता है कि जो ऐसा जानता है, वह इस देह के छूटने पर ऊपर उठकर सारी कामनाएँ पाकर अमर हो गया, अमर हो गया। यह दोहराव मूल में है, और वह वहाँ आता है जहाँ बात ख़त्म हो चुकी होती है।

सार: दूसरा अध्याय एक आदमी के तीन जन्म गिनाता है, पिता में गर्भ का बनना, फिर देह का जन्म, और फिर मृत्यु के बाद का जन्म। जो पोसती है वह ख़ुद पोसने लायक़ हो जाती है, यह वाक्य पूरे अध्याय का सबसे कोमल हिस्सा है। अन्त में वामदेव गर्भ में से ही बोलते हैं कि सौ लोहे के क़िले थे और वे बाज़ की तरह निकल गए।

कौन है वह जिसकी हम उपासना करते हैं

तीसरा अध्याय एक सीधे प्रश्न से खुलता है, जैसे कोई सभा में खड़ा होकर पूछ रहा हो। यह आत्मा कौन है जिसकी हम उपासना करते हैं, और उन दोनों में से वह कौन सा है। फिर वह प्रश्न को और साफ़ करता है, क्या वह जिससे कोई देखता है, या जिससे सुनता है, या जिससे गन्ध सूँघता है, या जिससे वाणी बोलता है, या जिससे स्वादु और अस्वादु को पहचानता है। पहले अध्याय का वही प्रश्न यहाँ लौट आया है, बस अब वह किसी रचयिता के मुँह में नहीं, हमारे मुँह में है।

उत्तर बहुत सादे ढंग से शुरू होता है, यह जो हृदय है और यह जो मन है। और फिर उपनिषद् ऐसा काम करता है जो और कहीं कम मिलता है। वह जानने की सोलह अलग अलग शक्लों के नाम गिना देता है। सञ्ज्ञान, आज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, दृष्टि, धृति, मति, मनीषा, जूति, स्मृति, सङ्कल्प, क्रतु, असु, काम और वश। किसी चीज़ को ठीक से जानना, आदेश समझना, अलग अलग पहचानना, याद रखना, ठान लेना, चाहना, वश में करना, ये सब अलग अलग काम लगते हैं।

और फिर एक पंक्ति में सबको बाँध दिया जाता है, ये सब प्रज्ञान के ही नाम हैं। यानी यह कोई सोलह अलग शक्तियों की फ़ेहरिस्त नहीं है, यह एक ही चेतना के सोलह चेहरे हैं। जब वह याद करती है तो स्मृति कहलाती है, जब वह ठान लेती है तो सङ्कल्प, जब वह चाहती है तो काम। भीतर कोई भीड़ नहीं बसती, एक ही रोशनी है जो अलग अलग कामों में अलग नाम पा लेती है।

इसके बाद अध्याय अपना घेरा बड़ा करता जाता है और पढ़ते पढ़ते साँस भरने लगती है। यही ब्रह्मा है, यही इन्द्र, यही प्रजापति, ये सारे देवता, और ये पाँच महाभूत, पृथिवी, वायु, आकाश, जल और ज्योतियाँ। और फिर वे बीज जो अलग अलग तरह से उपजते हैं, अण्डे से जन्मे, जरायु से जन्मे, पसीने से जन्मे, और ज़मीन फोड़कर उगने वाले। और घोड़े, गायें, मनुष्य, हाथी। और जो कुछ भी साँस लेता है, चलता है, उड़ता है, और जो कुछ भी अपनी जगह खड़ा रहता है।

इस लम्बी फ़ेहरिस्त के बाद वाक्य आता है कि यह सब प्रज्ञान की आँख वाला है, प्रज्ञान में टिका हुआ है। यह लोक प्रज्ञान की आँख से चलता है, प्रज्ञा ही आधार है। और फिर तीन शब्द, “प्रज्ञानं ब्रह्म”, प्रज्ञान ही ब्रह्म है। ग़ौर कीजिए कि यह वाक्य लम्बी सूची के बाद आया है, पहले नहीं। पहले घास से लेकर हाथी तक सब गिनाया गया, फिर कहा गया कि इन सबकी आँख एक ही है। इस तरतीब में ही इस वाक्य की ताक़त है।

और यहीं यह उपनिषद् पूरा होता है, उसी पंक्ति से जो दूसरे अध्याय के अन्त में भी थी। इसी प्राज्ञ आत्मा के साथ वह इस लोक से ऊपर उठकर उस स्वर्ग लोक में सारी कामनाएँ पाकर अमर हो गया, अमर हो गया। जिस प्रश्न से तीसरा अध्याय शुरू हुआ था, वह प्रश्न अब गिर चुका है, क्योंकि जिसे खोजा जा रहा था वह खोजने वाले से अलग निकला ही नहीं।

सार: तीसरा अध्याय पूछता है कि जिसकी हम उपासना करते हैं वह आत्मा कौन है, और उत्तर में जानने के सोलह नाम गिनाकर कहता है कि ये सब प्रज्ञान के ही नाम हैं। फिर देवताओं से लेकर घास और हाथी तक सब गिनाकर वह कहता है कि यह सारा लोक प्रज्ञान की आँख से चलता है। और तभी, सूची के बाद, वह तीन शब्द आते हैं, प्रज्ञान ही ब्रह्म है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस उपनिषद् से जो बात सबसे पहले अपने साथ ले जाने लायक़ है, वह देवताओं का वह वाक्य है, कि गाय काफ़ी नहीं, घोड़ा काफ़ी नहीं, यह आदमी ठीक है। हम अपनी देह के साथ ज़्यादातर एक शिकायत का रिश्ता रखते हैं, कि यह थकती है, दुखती है, बूढ़ी होती है, और मनमाना करती है। यह कथा उसी देह के सामने देवताओं को खड़ा कर देती है, ख़ुश होते हुए। आज सुबह आँख खुली और रोशनी भीतर आ गई, कान ने किसी की आवाज़ पकड़ ली, नाक ने चाय की गन्ध पहचान ली। हर बार कोई अपने कमरे में बैठकर अपना काम कर रहा था।

दूसरी बात अन्न वाली कथा से निकलती है। हम दिन भर देखकर, सुनकर, सोचकर और कहकर भरने की कोशिश करते हैं, और शाम को वही ख़ालीपन बचा रहता है। उपनिषद् ने यह बात उपदेश की तरह नहीं कही, उसने सात नाकाम कोशिशें दिखा दीं और छोड़ दिया। जिस दिन यह दिख जाता है कि किसी भी दरवाज़े से भर लेने की कोशिश उसी नाकामी पर पहुँचती है, उस दिन दौड़ थोड़ी धीमी पड़ती है, और यही इस कथा का असली फल है।

और आख़िर में वह प्रश्न, जो इस उपनिषद् ने हमें दिया है और जिसे किसी शास्त्र की ज़रूरत नहीं। दिन में एक बार, किसी काम के ठीक बीच में, ठहरकर वही सूची गिन लीजिए। यह हाथ कर रहा है, यह आँख देख रही है, यह मन हिसाब लगा रहा है, यह साँस चल रही है। सब गिन लेने के बाद जो जगह ख़ाली बच जाती है, वहाँ रुक जाइए। उपनिषद् ने उस ख़ाली जगह का एक ही नाम दिया है और वह नाम वही है जो इसके अन्तिम अध्याय में लिखा है। बाक़ी सब उसी की आँख से चल रहा है, यह देह भी, और इसे पढ़ने वाला यह पल भी।

आधार: ऐतरेय उपनिषद्, अध्याय 1 से 3, खण्ड 1.1 से 3.4; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।