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ऐतरेय उपनिषद्

ऋग्वेद · उपनिषद्
आरम्भ में सिर्फ़ आत्मा अकेली थी, और उसने सोचा, “लोक रचूँ।” वहीं से शरीर में देवताओं के उतरने की कहानी।

कल्पना कीजिए कि अभी कुछ भी नहीं है। न आकाश, न हवा, न आग, न पानी, न धरती, न कोई देखने वाला, न कोई दिखने वाली चीज़। बस एक चेतन सत्ता अकेली विराजमान है, जिसे ऋषि आत्मा (वह मूल चेतना जो सबका अपनापन है) कहते हैं। ऋग्वेद से निकले इस ऐतरेय उपनिषद् का पहला वाक्य यही दृश्य खोलता है, कि आरम्भ में केवल आत्मा ही था और कुछ भी हिलता-डुलता न था। फिर उस अकेली सत्ता के मन में एक संकल्प उठता है, लोक रचने का।

The solitary luminous Atman seated alone in formless pre-creation void, gazing at a translucent cosmos unfolding from its own body like clay becoming many pots, every world glowing as its own reflection.

स्वामी कृष्णानन्द इस आरम्भ को एक अनोखे नाटक की तरह पढ़ते हैं, जिसमें वही एक निर्देशक है, वही सारे पात्र है, और वही अकेला दर्शक भी, क्योंकि उसके सामने और कोई बैठा ही नहीं। वह स्वयं को सारी सृष्टि के रूप में देखता है और कहता है कि यह सब कुछ मैं ही हूँ, जैसे मिट्टी कहे कि ये सारे घड़े मैं ही हूँ। स्वामी जी के अनुसार रचयिता घड़े बनाने वाले कुम्हार की तरह बाहर खड़ा नहीं रहता, वह उस मिट्टी की तरह हर घड़े के भीतर ही रहता है, इसी को वे कारण का कार्य में छिपे रहना कहते हैं।

यही ग्रन्थ ऐतरेय उपनिषद् कहलाता है, और यह तीन छोटे अध्यायों में सृष्टि की पूरी यात्रा कहता है। पहले वह आत्मा से लोकों और देवताओं के प्रकट होने की कथा सुनाता है, जहाँ एक बारीक बात पर स्वामी कृष्णानन्द बार-बार ज़ोर देते हैं, कि यहाँ काम पहले प्रकट होता है और देवता बाद में। पहले मुँह खुला, फिर वाणी निकली, फिर अग्नि देवता आए; आँख बनी, फिर दृष्टि, फिर सूर्य।

फिर देवताओं का मनुष्य-शरीर में प्रवेश होता है, फिर आत्मा के तीन जन्मों की बात आती है, और अन्त में ऋग्वेद का वह महावाक्य गूँजता है, प्रज्ञानं ब्रह्म (चेतना ही ब्रह्म है)। पर इस उपनिषद् के पीछे जो मूल सवाल धड़कता है, वह स्वामी जी इस तरह रखते हैं, कि एक होकर वह अनेक हो गया, फिर उस एक की पहचान अनेक से कट गई, और बस यहीं से हमारे सारे दुख का आरम्भ होता है।

तो प्रश्न यह है, कि उस गिरे हुए परदे के पीछे जाकर हम फिर उसी एक चेतना को कैसे पहचानें जो हमारी अपनी आत्मा है। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार यही पूरे ऐतरेय उपनिषद् का प्रयोजन है, कि बिखरी हुई दृष्टि को समेटकर वापस उस मूल अपनेपन तक ले जाया जाए, जहाँ देखने वाला और दिखने वाला फिर एक हो जाते हैं।

इस उपनिषद् के मुख्य किरदार

आत्मा (परम पुरुष): वह अकेली सत्ता जिससे सृष्टि का संकल्प उठा और जिसने लोक, लोकपाल और मनुष्य रचे।

वामदेव: वह ऋषि जिसने माँ के गर्भ में रहते ही आत्म-ज्ञान पा लिया, तीन जन्मों के रहस्य का उदाहरण।

सृष्टि की कथा

“लोक रचूँ”: अकेली आत्मा का संकल्प

कहानी वहाँ से शुरू होती है जहाँ कोई कहानी नहीं हो सकती। न कोई गवाह, न कोई मंच, न पहले और बाद का अन्तर। ऐतरेय उपनिषद् अपने पहले ही वाक्य में हमें उस घड़ी में ले जाता है जब केवल आत्मा (वह चेतन सत्ता जो सबका मूल है) थी, और उसके सिवा कुछ नहीं। न आकाश, न पवन, न आँख खोलने वाला कोई। यह उपनिषद् बड़ी शान्ति से कहता है कि शुरुआत में बस एक था, अकेला।

The radiant primordial cosmic Person (Purusha) drawn from the waters and heated by tapas, his limbs splitting open as devas burst forth: flame-Agni from his mouth, wind-Vayu from his nostrils, sun-Surya from his eyes.

उसी अकेली आत्मा के भीतर एक संकल्प (मन का वह दृढ़ निश्चय जो किसी चीज़ को होने की ओर मोड़ देता है) उठा, “लोक रचूँ।” आत्मा ने चार लोक रचे: अम्भ (ऊपर के जल का लोक), मरीचि (अन्तरिक्ष की किरणों का लोक), मर (मर्त्य, यानी मरने वाली पृथ्वी), और आप (नीचे के जल)। फिर उसने सोचा कि लोक तो बन गए, पर इनकी देख-रेख कौन करे। तब उसने लोकपाल (इन लोकों के रक्षक देवता) चाहे। इसके लिए उसने जल में से एक पुरुष (आदिम मानव-आकृति, मूल रूप) निकाला और उसे तपाया। उस तपे हुए पुरुष के अंग-अंग से देवता जन्मे: मुख फटा तो उसमें से अग्नि के रूप में वाणी निकली, नासिका से प्राण के रूप में वायु, आँखों से दृष्टि के रूप में सूर्य, कानों से श्रवण के रूप में दिशाएँ। एक ही पुरुष से देवताओं का सारा कुटुम्ब फूट पड़ा।

परम सत्य के विवेचक स्वामी कृष्णानन्द इस पूरी रचना को बाहर कहीं घटी कोई घटना नहीं मानते। उनके अनुसार ऐतरेय हमें यही बताता है कि एक ही आत्मा अकेली थी, उसके बाहर कुछ था ही नहीं। वही आत्मा अनेक बनी, विश्वव्यापी रूप में फैली, और फिर उसी रचना में प्रवेश कर गई। उसने अपने को ही भिन्न-भिन्न देवताओं के रूप में प्रक्षेपित किया, और स्वयं ही जीव (शरीर में बैठी हुई सीमित चेतना) बन गई। यानी रचने वाला, रचा हुआ, और रचना में बसने वाला, तीनों एक ही हैं।

स्वामी कृष्णानन्द इसे एक क्रमिक उतार बताते हैं, जिसे वे कारण का कार्य में ढलना कहते हैं। उनके शब्दों में रचना का अर्थ है आत्मा का अधिकाधिक विशेषता (अलग-अलग टुकड़ों में बँटना), अधिकाधिक बाहरीपन, और अधिकाधिक स्थूलता की ओर उतरना। पहले वह सूक्ष्म था, फिर देवता बना, फिर इन्द्रिय बना, फिर इन्द्रियों के विषय बने। हम जिसे सृष्टि कहते हैं, वह असल में परम चेतना का अपने ही भीतर गहरे-से-गहरा उतर जाना है, जब तक कि वह पदार्थ में लगभग दब न जाए।

और यहीं वे वह बात कहते हैं जो इस खंड का मर्म है। जो अग्नि मुख से निकली, वही वाणी बनकर हमारे मुख में बैठी है। जो वायु नासिका से निकली, वही प्राण बनकर हमारी साँस चला रही है। जो सूर्य आँख से निकला, वही दृष्टि बनकर हमारी पुतली में देख रहा है। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि वही विश्वव्यापी चेतना पदार्थ में पूरी तरह दब गई, फिर एक प्रतिबिम्ब (परछाईं) के रूप में बाहर निकल आई, जीव बन गई, और अब अपने ही शरीर को अपने से अलग कोई बाहरी वस्तु मानकर देख रही है। बाहर के देवता और भीतर की इन्द्रियाँ, दोनों एक ही पुरुष के अंग हैं। हम भूल बैठे हैं कि बाहर का सूर्य और भीतर की आँख एक ही घटना के दो छोर हैं।

इसीलिए, स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार, यह कथा हमारी ही रचना की कथा है। यह उपनिषद् यह नहीं समझाता कि भगवान ने कहीं दूर कोई दुनिया बनाई। यह बताता है कि जिस चेतना से लोक रचे गए, वही चेतना इस समय इन पंक्तियों को पढ़ रही है। बाहर फैला सारा ब्रह्माण्ड और भीतर बैठा यह छोटा-सा ‘मैं’, दोनों उसी एक के संकल्प से निकले हैं, जिसने कभी कहा था, “लोक रचूँ।”

सार: सृष्टि किसी दूर बैठे कारीगर का काम नहीं। एक ही आत्मा ने अकेलेपन में संकल्प किया, अनेक बनी, और उसी अनेक में प्रवेश कर गई। जो अग्नि बाहर जलती है वही भीतर वाणी है, जो सूर्य आकाश में है वही भीतर दृष्टि है। आप जिसे अपने से अलग दुनिया मान रहे हैं, वह आपके ही उस मूल का बिखरा हुआ चेहरा है, जिसने एक दिन कहा था, लोक रचूँ।

देवताओं का शरीर में उतरना, और भूख

हालात कुछ यों हैं। अभी-अभी आत्मा (वह एक चेतन सत्ता जो आरम्भ में अकेली थी) ने अपने ही भीतर से देवताओं को जन्म दिया है। यहाँ देवता का अर्थ आकाश में बैठा कोई रूप नहीं; ये वे दिव्य शक्तियाँ हैं जो आगे चलकर हमारी इन्द्रियों के पीछे काम करेंगी, अग्नि (आग की शक्ति), वायु (हवा की शक्ति), सूर्य (प्रकाश की शक्ति), दिशाएँ, और ऐसी ही कई। जन्म तो हो गया, पर ठिकाना कोई न था। ऐतरेय उपनिषद् कहता है कि ये नवजात देवता एक विशाल समुद्र में, भूख और प्यास के थपेड़ों में, डगमगाने लगे। बिना घर के, बिना देह के, वे टिकें तो कहाँ टिकें।

The devas descending into the newly-formed human body through its openings: Agni entering the mouth, Vayu the nostrils, Surya the eyes, with Atman itself parting the crown's seam to enter and dwell within.

तब आत्मा ने उनके लिए एक ठिकाना गढ़ा। पहले एक गाय का रूप सामने रखा, देवताओं ने कहा यह बहुत छोटा है। फिर घोड़े का, वह भी न जँचा। अन्त में आत्मा ने मनुष्य की देह गढ़ी, और देवता बोल उठे कि हाँ, यही ठीक है, इसी में हम बस सकते हैं। फिर हर देवता अपने-अपने द्वार से उसमें उतर गया। अग्नि वाणी (बोलने की शक्ति) बनकर मुख में जा बैठी, वायु प्राण (साँस की शक्ति) बनकर नासिका में, सूर्य दृष्टि (देखने की शक्ति) बनकर आँखों में, दिशाएँ श्रवण (सुनने की शक्ति) बनकर कानों में, और इसी तरह हर शक्ति अपने झरोखे से भीतर समा गई। देह में जान आ गई, पर एक सवाल बाक़ी रह गया।

आत्मा ने सोचा, इन सब शक्तियों के सहारे यह देह चल तो लेगी, पर मेरे बिना यह टिकेगी कैसे, और यह सब किसका होगा। तब उसने सिर के मार्ग को चीरकर, जिस संधि को परम्परा में सीमन्त (खोपड़ी की वह दरार जहाँ बालों की माँग बैठती है) कहते हैं, उसी राह से वह स्वयं भीतर प्रवेश कर गई और भीतर ही विराज गई। अब देह केवल इन्द्रियों का जोड़ न रही, उसके केन्द्र में वही एक आत्मा बैठी थी, जिससे ये सब देवता पहले निकले थे।

स्वामी कृष्णानन्द इस पूरी घटना को एक ही सूत्र में पकड़ते हैं। उनके अनुसार पहले केवल वह एक आत्मा थी, उससे परे कुछ बाहरी था ही नहीं; वही अनेक बनी, उसी ने अपने को इन देवताओं के रूप में फैलाया, और वही जीव (देह से बँधी हुई चेतना) बन गई। वे कहते हैं कि यह सृष्टि असल में आत्मा का एक क्रमशः नीचे उतरना है, और भी विशेष होते जाना, और भी बाहरी होते जाना, और कारण का अपने कार्य में मोटा होकर ठोस बनते जाना। देवताओं का देह में उतरना उसी उतार की एक सीढ़ी है।

स्वामी कृष्णानन्द आगे एक मार्मिक बात कहते हैं। यह विश्वव्यापी चेतना पदार्थ में इस कदर दब गई कि फिर उसी में से एक प्रतिबिम्ब के रूप में बाहर आई, जीव बन गई, और अपनी ही देह को बाहर पड़ी कोई वस्तु मानकर ताकने लगी। इसी से, उनके मत में, विषयों की भूख जागती है। यह भूख दरअसल आत्मा की अपने ही आपे के लिए भूख है, वह किसी और को नहीं, अपने को ही माँग रही है, पर पकड़ नहीं पाती। और अंग, स्वामी जी के शब्दों में, एक-दूसरे से कटकर इस देह की छोटी-सी कोठरी में बन्द हो गए हैं, जिसमें आत्मा यों बसी है जैसे यह उसकी अपनी निजी सम्पत्ति हो। हर इन्द्रिय के पीछे एक दिव्य शक्ति खड़ी है, पर उन सबके भीतर बैठी वही एक आत्मा है, जो भूल गई है कि घर भी वही है और घर में बसने वाला भी वही।

सार: हमारी हर इन्द्रिय किसी दिव्य शक्ति का झरोखा है, आँख में सूर्य, नाक में वायु, मुख में अग्नि। पर ये सब जिसके लिए जुटे हैं, वह भीतर बैठी आत्मा है। और जिसे हम विषयों की भूख कहते हैं, वह असल में आत्मा की अपने ही आपे के लिए भूख है, बाहर भटकती हुई, उसी घर को ढूँढती जो वह स्वयं है।

आत्मा की पहचान

आत्मा के तीन जन्म: एक चेतना, बार-बार पहना नया चोला

दृश्य कुछ यों है। ऐतरेय उपनिषद् अब सृष्टि की कथा से उतरकर हर आदमी के अपने अनुभव पर आ टिकता है। ऋषि महिदास ऐतरेय (इतरा नाम की माता के पुत्र, वही द्रष्टा जिनके नाम पर यह उपनिषद् टिका है) एक सीधी-सी बात पकड़ते हैं कि जिसे हम अपना जीवन कहते हैं, वह दरअसल एक ही चेतना के लगातार जन्म लेते रहने की कथा है। इसी प्रसंग में आता है वामदेव का नाम, वह ऋषि जिन्होंने गर्भ में पड़े-पड़े ही यह भेद जान लिया था।

उपनिषद् कहता है कि आत्मा (भीतर बैठा चेतन तत्त्व) मनुष्य में तीन बार जन्म लेता है। पहला जन्म तब, जब वह पिता के भीतर बीज (वीर्य, संतान का सूक्ष्म रूप) बनकर पलता है, और फिर माता के गर्भ से शिशु बनकर संसार में आता है। दूसरा जन्म तब, जब वही संतान बड़ी होकर अपनी संतान को जन्म देती है, क्योंकि पिता मानो अपने ही दूसरे रूप में, अपने पुत्र के रूप में, फिर से जी उठता है। परम्परा यही पढ़ती है कि पिता और पुत्र एक ही धारा के दो छोर हैं, दो अलग प्राणी नहीं। और तीसरा जन्म मृत्यु के बाद आता है, जब यह शरीर गिर जाता है और वही चेतना एक नया चोला धारण करने निकल पड़ती है।

स्वामी कृष्णानन्द इस तीसरे जन्म के पीछे की मशीनरी खोलकर दिखाते हैं। वे कहते हैं कि जो शरीर हमें मिला है वह सदा नहीं रह सकता, क्योंकि वह भौतिक टुकड़ों से बना है, इसलिए समय आने पर बिखरना उसकी नियति है। शरीर तब गिरता है जब इच्छा का वही वेग, जिसने पहले इस देह को खड़ा किया था, अपना ज़ोर समेट लेता है। मगर इच्छा का वह वेग (संस्कारों, यानी पुराने कर्म-छापों की गति) यहीं रुकता नहीं। स्वामी जी के अनुसार वह वेग ख़त्म नहीं होता, वह सृष्टि के किसी और कोने में, किसी और दिशा में, फिर तृप्ति ढूँढ़ने निकल पड़ता है। इसी से पुनर्जन्म (दुबारा देह धारण करना) होता है, और सारा खेल फिर शुरू हो जाता है, असंतोष, जन्म, मृत्यु, फिर असंतोष। इसी घूमते पहिए को वे संसार-चक्र (जन्म-मरण का चक्का) कहते हैं।

स्वामी कृष्णानन्द एक बात पर बार-बार ज़ोर देते हैं कि हमारी असली भूख कभी रोटी, दाल, चपाती की भूख नहीं रही। वे कहते हैं कि कितना भी खा लें, कितना भी बटोर लें, मन नहीं भरता, क्योंकि जिसकी हमें ज़रूरत है वह यह सब है ही नहीं। भीतर की असली प्यास उस पूर्ण (समग्र, ब्रह्म) से दुबारा एक हो जाने की है, जिससे हम कटकर अलग पड़ गए हैं। इसी कारण को भूल जाना ही, स्वामी जी कहते हैं, अविद्या (अपनी असलियत का विस्मरण) है। और जब तक यह भूख अधूरी है, हर शरीर थककर गिर जाता है और चेतना अगला शरीर माँगने चल देती है। यही तीनों जन्मों के पीछे का छिपा सूत्र है।

अब आती है इस खंड की चमक, वामदेव। परम्परा कहती है कि ऋषि वामदेव ने माता के गर्भ में पड़े-पड़े ही, जन्म लेने से पहले ही, इन सब जन्मों का रहस्य जान लिया, यानी जान लिया कि यह सब आत्मा का ही खेल है, एक ही चेतना बार-बार पहना हुआ चोला है। यह जानते ही उन्होंने बंधन की दीवारें तोड़ दीं और देह छूटते ही ऊपर उठकर अमर हो गए। स्वामी कृष्णानन्द इस मुक्ति को बहुत राहत भरा संदेश मानते हैं। उनके अनुसार यह कोई इतिहास की घटना नहीं कि भगवान ने कभी हमसे रूठकर हमें स्वर्ग के बग़ीचे से निकाल दिया हो। हुआ बस इतना है कि चेतना में एक ऐंठन आ गई, मन को एक रोग लग गया। और जैसे मानसिक रोगी का इलाज होता है, वैसे ही इस चेतना के रोग का इलाज हो सकता है, तब वह अपनी असली हालत में लौट आती है।

A long rope stretched across the frame tied with a hundred knots, each knot subtly shaped like a small human figure unaware it is the same rope, illustrating one consciousness bound in many name-forms.

स्वामी जी इसे रस्सी की गाँठ के दृष्टान्त से समझाते हैं। वे कहते हैं कि लंबी रस्सी पर भले सौ गाँठें पड़ी हों, हर गाँठ उसी रस्सी की बनी है, गाँठ रस्सी से अलग कोई चीज़ नहीं। पर अगर गाँठ को बस अपनी ही गाँठ-भर का होश रहे और पीछे फैली लंबी रस्सी का होश न रहे, तो वही बंधन है, वही संसार है। हम अपने नाम-रूप (अपने नाम और इस ढाँचे) को ही अपना सब-कुछ मान बैठे हैं, और जो असली सार है उसे भूल बैठे हैं। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि इन्हीं नाम-रूप की गाँठों को धीरे-धीरे खोलना है, और खोलने का रास्ता योग (जोड़ने की साधना) है, यम-नियम (संयम और अनुशासन) से लेकर समाधि (चित्त के पूर्ण ठहराव) तक, जिससे होश की दीवारें चौड़ी होती जाएँ और वही अमरता हाथ आ जाए जो वामदेव को गर्भ में ही मिल गई थी। एक ही धागा, जन्म-दर-जन्म वही चेतना, बस चोले बदलते रहते हैं।

सार: हर जन्म एक नया चोला है, पर पहनने वाली चेतना वही एक है, जो पिता से पुत्र तक और एक देह से दूसरी देह तक धागे की तरह चली आती है। जिस इच्छा के वेग से यह चक्का घूमता है, वह असल में पूर्ण से दुबारा जुड़ने की प्यास है। ऋषि वामदेव की तरह जो गर्भ में ही यह पहचान ले कि गाँठ रस्सी से अलग नहीं, वह बंधन वहीं तोड़ देता है और अमर हो जाता है।

“प्रज्ञानं ब्रह्म”: चेतना ही ब्रह्म

ऐतरेय उपनिषद् अब तक एक लम्बी कथा कह चुका है, कैसे आत्मा अकेली थी, कैसे उसी से यह सारा जगत निकला, कैसे मुख फटा तो वाणी आई और वाणी से अग्नि देवता प्रकट हुए, आँख खुली तो दृष्टि आई और दृष्टि से सूर्य। पर अब ऋषि (मन्त्रद्रष्टा) एक सीधा-सा, बेधने वाला प्रश्न रखते हैं। यह सारी रचना जान लेने के बाद भी असल सवाल बाक़ी है, आख़िर वह आत्मा है क्या, जिसकी हम उपासना करें? जिसे “यह आत्मा है” कहकर हम पहचानें, वह आख़िर किस चीज़ का नाम है?

उपनिषद् का उत्तर बड़ा साहसी है, और बड़ा क़रीबी भी। वह कहता है, अपने भीतर देखिए। जिससे आप देखते हैं, जिससे सुनते हैं, जिससे सूँघते हैं, जिससे बोलते हैं, जिससे मीठा और कड़वा अलग-अलग पहचानते हैं, वह जो भीतर बैठकर हर इन्द्रिय को रोशनी देता है, वही आत्मा है। उसका नाम है प्रज्ञान (शुद्ध चेतना, वह जागरूकता जिससे सब कुछ जाना जाता है)।

और फिर उपनिषद् एक ही साँस में गिनाता है कि यह प्रज्ञान कितने रूप धरकर हमारे भीतर काम करता है। जिसे हम मन कहते हैं, बुद्धि (निर्णय करने वाली समझ) कहते हैं, संज्ञान (बोध), आज्ञान (दिशा देने वाली समझ), विज्ञान (विशेष जानकारी), मेधा (धारण-शक्ति), स्मृति (याद), संकल्प (इरादा), यह सब उसी एक प्रज्ञान के अलग-अलग नाम हैं। मन की एक ही धारा अलग-अलग काम करती हुई अलग-अलग नामों से पुकारी जाती है, पर पीछे चेतना एक ही है। इतना ही नहीं, उपनिषद् कहता है कि देवता हों या मनुष्य, पशु हों या पक्षी, सब इसी प्रज्ञान पर टिके हैं। प्रज्ञान ही जगत की आँख है, प्रज्ञान ही उसका आधार है। और तब वह महावाक्य (वेद का परम घोष-वचन) गूँजता है जो ऋग्वेद की देन है, “प्रज्ञानं ब्रह्म”, चेतना ही ब्रह्म है।

स्वामी कृष्णानन्द इस मोड़ को बड़ी गहराई से खोलते हैं। उनके अनुसार आत्मा कोई दूर बैठा रचयिता नहीं है जो जगत को बाहर से, कुम्हार के घड़ा गढ़ने या बढ़ई के मेज़ बनाने की तरह, गढ़ रहा हो। वह तो उस मिट्टी की तरह है जो हर घड़े के भीतर मौजूद है, उस लकड़ी की तरह जो हर मेज़ में बसी है। कारण अपने कार्य से कटा हुआ नहीं रहता, वह उसके भीतर ही छिपा बैठा रहता है। इसी को स्वामी कृष्णानन्द कारण का कार्य में अन्तर्व्यापी होना (हर वस्तु के भीतर समाया रहना) कहते हैं। और यही बात प्रज्ञान पर भी लागू होती है, चेतना किसी कोने में बैठी कोई एक चीज़ नहीं, वह हर देखने, हर सुनने, हर जानने के भीतर बहती हुई वह रोशनी है जिसके बिना कोई अनुभव सम्भव ही नहीं।

स्वामी कृष्णानन्द एक और बारीक बात की ओर इशारा करते हैं। वे कहते हैं कि जब हमारे भीतर किसी ऊँचे मूल्य की, सत्य की, परम की प्यास उठती है, तो वह असल में कारण ही कार्य के भीतर से अपने को पुकार रहा होता है। जब हम ईश्वर को माँगते हैं, तो वह ईश्वर ही भीतर से बोल रहा होता है। यानी जो प्रज्ञान हमें जगत दिखाता है, वही प्रज्ञान भीतर से अपनी ओर लौटने की पुकार भी है। यही कारण है कि चेतना को केवल “हमारी एक शक्ति” कहकर छोटा करना ठीक नहीं; वह तो वही ब्रह्म है जो हर प्राणी के भीतर अपने को जान रहा है।

परम्परा (शंकर-सम्मत मुख्यधारा) इस वचन को और स्पष्ट कर देती है। प्रज्ञान यहाँ ज्ञान का कोई एक टुकड़ा नहीं, वह तो वह शुद्ध चैतन्य है जो सब ज्ञानों के मूल में रहता है और जिसे किसी दूसरे प्रकाश की ज़रूरत नहीं। सूर्य चमकता है तो किसी और दीये से नहीं, अपने ही प्रकाश से; वैसे ही प्रज्ञान सबको जनाता है पर ख़ुद को जनाने के लिए किसी और का मुहताज नहीं। इसी स्वयं-प्रकाश चेतना को जब हम भीतर अपना आत्मा कहकर पाते हैं, और बाहर सारे जगत का आधार कहकर पहचानते हैं, तो दोनों एक ही ठहरते हैं। यही “प्रज्ञानं ब्रह्म” का पूरा भार है, भीतर का प्रज्ञान और बाहर का ब्रह्म, दो नाम हैं, वस्तु एक।

सार: जिस चेतना से आप यह पंक्ति पढ़ रहे हैं, जिससे आप देखते, सुनते, और याद रखते हैं, वही प्रज्ञान सब प्राणियों के भीतर एक है और सारे जगत का आधार है। मन, बुद्धि, स्मृति, संकल्प उसी के नाम हैं, और स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार जब भीतर से परम की प्यास उठती है तो वह आधार ही अपने को पुकार रहा होता है। इसीलिए उपनिषद् कहता है, “प्रज्ञानं ब्रह्म”, आपके भीतर की चेतना और सबका मूल ब्रह्म, अलग दो चीज़ें नहीं।

और अन्त में, अपनी ओर

ऐतरेय उपनिषद् हमें एक लम्बे सफ़र पर ले गया, और अब घर लौटा लाता है। आरम्भ में अकेली आत्मा (वह एक चेतन सत्ता जिससे सब उपजा) ने लोक रचे, फिर एक देह गढ़ी, और हर इन्द्रिय के द्वार से उसमें उतर आई, अग्नि वाणी बनकर मुख में, वायु प्राण बनकर नाक में, सूर्य दृष्टि बनकर आँख में। पर सारी कथा के बाद उपनिषद् एक सीधा सवाल हमारे सामने रखता है, यह आत्मा आख़िर है क्या? जिसकी हम उपासना करें, वह कौन-सी सत्ता है? और उत्तर में वह तीन शब्दों का महावाक्य देता है, “प्रज्ञानं ब्रह्म” (चेतना ही ब्रह्म)।

स्वामी कृष्णानन्द (दिव्य जीवन संघ के आचार्य, जिनकी व्याख्या पर यह पाठ टिका है) इस बिंदु को बड़ी बारीकी से खोलते हैं। वे कहते हैं कि चेतना (प्रज्ञान) कोई ऐसी चीज़ नहीं जो आँख-कान या किसी वस्तु से पैदा होती हो। आँख तो बस एक खिड़की है, कान बस एक राह; जो सचमुच देखता, सुनता, सूँघता, चखता और जानता है, वह तो उन सबके पीछे बैठी वही एक चेतना है। उनके अनुसार वस्तुएँ और इन्द्रियाँ कुदाल भर हैं, जो भीतर पहले से दबे अनुभव को खोदकर बाहर ले आती हैं; कुदाल अनुभव की जड़ नहीं है। मन, बुद्धि, स्मृति, संकल्प, इरादा, यह सब उसी एक प्रज्ञान के अलग-अलग नाम हैं।

और यहीं स्वामी जी का असली ज़ोर है। वे बताते हैं कि यही चेतना देवताओं में, मनुष्यों में, पशु-पंछियों में, सबमें एक ही है; सारी सृष्टि इसी प्रज्ञान पर टिकी है, मानो यही जगत् की आँख हो। जो प्यास हमें किसी सुख की ओर दौड़ाती है, वह असल में, स्वामी जी के अनुसार, उसी विराट चेतना से दुबारा जुड़ने की भीतरी पुकार है, जिससे हमने ख़ुद को अलग मान रखा है। बँटवारा सचमुच हुआ ही नहीं था; बस बँटे होने का एक एहसास भर था। पहचान लौट आए, तो वही पहचान मुक्ति है।

तो ज़रा रुककर देखिए। इस वक़्त जो रौशनी इन पंक्तियों को पढ़ रही है, समझ रही है, हाँ-या-ना कर रही है, वही जानने वाली चेतना है। वही सूरज की किरण में चमक रही है, पंछी की उड़ान में जाग रही है, आपकी हर साँस की आवाजाही में बह रही है। आप उसे कहीं दूर ढूँढने नहीं जा रहे; जिस से आप ढूँढते, वही तो आप हैं। “प्रज्ञानं ब्रह्म” का पूरा न्योता बस इतना ही है, उस जानने वाली रौशनी को अपने भीतर पहचान लीजिए, और आत्म-खोज का असली कदम वहीं से उठता है।

सार: जिस चेतना से आप यह पढ़ और जान रहे हैं, वही सूरज, पंछी और हर साँस में जाग रही है। उसे बाहर खोजने की ज़रूरत नहीं; उसी जानने वाली रौशनी को अपने भीतर पहचान लेना, यही “प्रज्ञानं ब्रह्म” का न्योता है, और यही अपनी ओर मुड़ने का पहला कदम।

व्याख्या मुख्यतः स्वामी कृष्णानन्द (दिव्य जीवन संघ) की ऐतरेय-उपनिषद्-व्याख्या पर आधारित।