Background
ऐतरेय उपनिषद् ऋग्वेद की एक आरण्यक से ली गई है। आरण्यक वो ग्रंथ हैं जो जंगल में, वानप्रस्थ अवस्था में पढ़े जाते थे, ब्राह्मण-ग्रंथ और उपनिषद् के बीच का pul।
नाम ‘ऐतरेय’ इतर ऋषि के नाम से। कथा यह है कि महीदास नाम के एक ऋषि थे, जिनकी माँ का नाम इतरा था और वो एक दासी थीं। पिता ने अपनी मुख्य पत्नियों के बच्चों को आगे रखा, और इतरा के बेटे को पीछे। इस अपमान से दुखी इतरा ने अपने बेटे को कहा कि वो भू-देवी से प्रार्थना करे। भू-देवी ने प्रकट होकर बच्चे को यह उपनिषद्-ज्ञान दिया। बच्चा बड़ा होकर बड़ा ऋषि बना, और यही उपनिषद् उसके नाम ‘ऐतरेय’ से जानी गई।
इस उपनिषद् का सबसे famous मन्त्र है ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ (consciousness is Brahman), जो चार महावाक्यों में से एक है। बाक़ी तीन: ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (बृहदारण्यक), ‘तत्त्वमसि’ (छान्दोग्य), और ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (माण्डूक्य)।
तीन अध्यायों में: पहला सृष्टि की कहानी है, बहुत original तरीक़े से। दूसरा ‘तीन जन्म’ का सिद्धान्त। तीसरा वो सबसे ऊँची identification, कि जो ‘मैं हूँ’ का बोध है, वही ब्रह्म है।
कथा-सार (Story in Brief)
कल्पना कीजिए कि कुछ भी नहीं है। पूरी तरह कुछ नहीं। फिर एक ‘आत्मा’ है, अकेला। वो सोचता है, ‘मैं अकेला क्यों? कुछ बनाऊँ।’ और चार लोक बनाता है: आकाश, अंतरिक्ष, पृथ्वी, और सब के नीचे का जल।
फिर सोचता है, ‘इन लोकों के देवता तो बनाने पड़ेंगे।’ तो पानी में से एक पुरुष निकालता है। उस पर अंग, इन्द्रियाँ, मन डालता है। हर इन्द्रिय का अपना देवता बनाता है: मुँह से अग्नि, नाक से वायु, आँख से सूर्य, कान से दिशाएँ। हर देवता अपने-अपने काम पर निकल जाता है।
मगर पुरुष भूखा है। उसके लिए भोजन चाहिए। आत्मा भोजन बनाता है। पुरुष लोग खाने को दौड़ते हैं, मगर पकड़ नहीं पाते। इन्द्रियों से नहीं, मन से नहीं, वाणी से नहीं। आख़िर में अपान-वायु से पकड़ते हैं। यह बहुत symbolic है: असली भोजन वो है जो हम absorb करते हैं, बाक़ी सब show है।
अब आत्मा सोचता है, ‘मेरी सृष्टि चल रही है, मगर मैं कहाँ हूँ? कैसे प्रवेश करूँ?’ और एक interesting choice करता है, सिर के बीच से चीरकर अंदर। इस entry point को ‘विदृति’ कहा गया। यह वही जगह है जिसे योगी ‘सहस्रार चक्र’ कहते हैं।
अंत में एक चौंकाने वाला statement: यह जो सब कुछ है, यह ब्रह्म है, और इस सब को जानने वाला जो ‘मैं’ है, यह भी ब्रह्म है। ‘प्रज्ञानं ब्रह्म।’ Story over।
Introduction
अगर कभी आपने एक काम में इतनी deep concentration में डूब गए हों कि ‘आप’ कौन हैं यह भी भूल गए हों, और फिर बाहर निकलकर सोचा हो ‘अरे, मैं तो यह सब कर रहा था’, तो आप ऐतरेय की पहली पंक्ति को समझेंगे।
उपनिषद् कह रही है कि सृष्टि भी कुछ ऐसा ही है। एक चेतना अपनी अकेली होने की बात पर concentrate करती है, और एक पूरा लोक बन जाता है। फिर वो चेतना उसी लोक में खो जाती है। हम सब वही खोए हुए हिस्से हैं, जो अभी खुद को याद करने की कोशिश में हैं।
अध्याय 1.1
मन्त्र 1.1.1
नान्यत् किञ्चन मिषत् ।
स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥
मन्त्र 1.1.2
अदोऽम्भः परेण दिवम् । द्यौः प्रतिष्ठाः ।
अन्तरिक्षं मरीचयः । पृथिवी मरो ।
या अधस्तात् ता आपः ॥
चार लोक: अम्भ, मरीचि, मर, आपः। मगर ध्यान दीजिए, यह वो standard ‘भू-भुवः-स्व’ तीन लोक नहीं हैं। यह एक अलग चार-तह की structure है।
शंकर का explanation: यह physical geography नहीं है। यह existence की चार layers है। अम्भ celestial waters (कारण-स्तर), मरीचि subtle realm (सूक्ष्म), मर earthly realm (स्थूल), और आपः लोअर waters (आधार)। सबसे साधारण कहें, तो यह four planes of being है।
मन्त्र 1.1.3
सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत् ॥
दूसरा thought: ‘लोक तो बना दिए, अब लोकपाल चाहिए।’ तो पानी में से एक ‘पुरुष’ निकाला, और उसे ‘अमूर्च्छयत्’ (मूर्ति में डाला)।
यहाँ ‘पुरुष’ सिर्फ़ इंसान नहीं है। यह cosmic Person है, जिससे सब देवता निकलेंगे। ‘पुरुष’ शब्द ऋग्वेद के पुरुष-सूक्त से जुड़ा है।
मन्त्र 1.1.4
मुखाद् वाक्, वाचोऽग्निः ।
नासिके निरभिद्येतां, नासिकाभ्यां प्राणः, प्राणाद्वायुः ।
अक्षिणी निरभिद्येतां, अक्षीभ्यां चक्षुः, चक्षुष आदित्यः ।
कर्णौ निरभिद्येतां, कर्णाभ्यां श्रोत्रं, श्रोत्राद्दिशः ।
त्वङ्निरभिद्यत, त्वचो लोमानि, लोमभ्य ओषधिवनस्पतयः ।
हृदयं निरभिद्यत, हृदयान्मनो, मनसश्चन्द्रमाः ।
नाभिर्निरभिद्यत, नाभ्या अपानः, अपानान्मृत्युः ।
शिश्नं निरभिद्यत, शिश्नाद्रेतो, रेतस आपः ॥
अब एक beautiful sequence। आत्मा पुरुष को तपाता है, और हर अंग खुलता है, और हर अंग से एक देव निकलता है।
मुँह से वाणी, वाणी से अग्नि। नाक से प्राण, प्राण से वायु। आँख से दृष्टि, दृष्टि से सूर्य। और ऐसे ही।
यह क्या बता रहा है? कि बाहर की दुनिया और अंदर का शरीर एक ही source से निकले हैं। आँख और सूर्य एक ही उत्पत्ति। कान और दिशाएँ। मन और चन्द्रमा। यह ‘micro-macro correspondence’ का सिद्धान्त है।
परिणाम? आप जब बाहर देखते हैं, असल में अंदर का ही प्रतिबिंब देखते हैं। और अंदर देखते हैं तो बाहर का ही extension।
अध्याय 1.2
मन्त्र 1.2.1
तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत् ।
ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि
यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदाम इति ॥
सब देवता निकल तो आए, मगर अब वो उस ‘महान् समुद्र’ में गिर पड़े। कौन सा समुद्र? वही पानी जिससे पुरुष निकला था।
और देवताओं को भूख-प्यास सताती है। यानी ये देवता भी पूर्ण नहीं हैं। उन्हें भी sustenance चाहिए।
वो आत्मा से प्रार्थना करते हैं, ‘हमें कोई घर दो जहाँ हम स्थिर होकर अन्न खा सकें।’ यानी हर देव अपने function के लिए एक body चाहिए।
मन्त्र 1.2.2
ताभ्योऽश्वमानयत् । ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ॥
एक twist। आत्मा पहले गाय लाता है। ‘क्या यह तुम्हारा घर बनेगा?’ देवता मना करते हैं। फिर घोड़ा। फिर भी मना।
क्यों? क्योंकि गाय, घोड़ा सिर्फ़ पशु हैं। उनमें वो capacity नहीं कि सब इन्द्रिय-देव एक साथ रह सकें।
मन्त्र 1.2.3
ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति ।
पुरुषो वाव सुकृतम् ।
ता अब्रवीद् यथायतनं प्रविशतेति ॥
फिर पुरुष लाता है। और देवता तुरंत खुश हो जाते हैं: ‘सुकृतं बत!’ = ‘वाह, यह तो बेहतरीन रचना है!’
उपनिषद् कहती है, ‘पुरुष ही सुकृत है।’ यानी मनुष्य-शरीर इस सृष्टि की सबसे ऊँची creation है। इसमें सब इन्द्रियाँ हैं, सब देव बैठ सकते हैं, और सबसे महत्वपूर्ण, इसमें self-awareness है।
यह एक powerful statement है: मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, बाक़ी सब जन्मों से ऊपर। बाद में यह विचार वेदान्त-परंपरा में बहुत प्रसिद्ध होगा।
मन्त्र 1.2.4
वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् ।
आदित्यश्चक्षुर्भूत्वाक्षिणी प्राविशत् ।
दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन् ।
ओषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशन् ।
चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशत् ।
मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशत् ।
आपो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् ॥
हर देव अपने मेल खाने वाले organ में प्रवेश करता है। अग्नि वाणी बनकर मुँह में। वायु प्राण बनकर नाक में। और ऐसे ही।
यह बहुत elegant idea है: हर organ का external counterpart है। आपकी आँख और सूर्य एक ही ‘family’ से। आपका कान और दिशाएँ। यह ‘देव-योग’ है, हर इन्द्रिय के पीछे एक cosmic force।
मन्त्र 1.2.5
ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति ।
तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते
भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः ॥
भूख-प्यास भी अपनी हिस्सेदारी माँगती हैं। आत्मा कहता है, ‘तुम भी हर देव में हिस्सेदार रहोगी।’ इसलिए जब किसी देव को हवि दी जाती है, भूख-प्यास भी share पाती हैं।
शंकर का comment: इसका मतलब है कि भूख-प्यास, कोई एक छोटी सी थिंग नहीं हैं, ये सृष्टि की fundamental forces हैं। हर experience के पीछे यह drive है।
अध्याय 1.3
मन्त्र 1.3.1
अन्नमेभ्यः सृजा इति ॥
अब अध्याय 1.3 शुरू। आत्मा ने सब बना दिया, मगर एक problem देखता है: देवताओं को भूख है। तो भोजन बनाना है।
मन्त्र 1.3.2
या वै सा मूर्तिरजायताऽन्नं वै तत् ॥
पानी को फिर से तपाया। उससे एक ‘मूर्ति’ (form) निकली। वही ‘अन्न’ है। पानी से रोटी-दाल नहीं निकलती, मगर metaphorically: सब भोजन का बीज जल में है। बारिश से अनाज, पानी से पेड़, पानी से जीव।
मन्त्र 1.3.3
तद्वाचाऽजिघृक्षत् । तन्नाशक्नोद् वाचा ग्रहीतुम् ।
स यद्धैनद्वाचाग्रहैष्यद् अभिव्याहृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥
एक मज़ेदार scene। अन्न बना, मगर भागने लगा। ‘पराङ्क्’ = पीछे की तरफ़, ‘अजिघांसत्’ = भागने लगा।
आत्मा पहले वाणी से पकड़ने की कोशिश करता है। यानी ‘अन्न’ कहकर ही पकड़ लो। नहीं हुआ।
अगर हो जाता, उपनिषद् कहती है, तो हम सब ‘अन्न’ बोलकर ही पेट भर लेते। यानी हम एक mantra को बोलकर भूख मिटा देते। मगर नहीं हुआ।
मन्त्र 1.3.4
स यद्धैनत्प्राणेनाग्रहैष्यद् अभिप्राण्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥
फिर प्राण से। सूँघने से। नहीं हुआ। अगर हो जाता, तो साँस लेने भर से ही भोजन पच जाता।
मन्त्र 1.3.5
स यद्धैनच्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥
फिर चक्षु से। देखने से। नहीं हुआ। अगर हो जाता, तो खाने को देखकर ही पेट भर जाता। (आज के world of food porn में यह बहुत relevant है, हम खाने की तस्वीर देखकर सोचते हैं भर गए, मगर पेट खाली रहता है।)
मन्त्र 1.3.6
स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यत् श्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥
श्रोत्र से। सुनने से। नहीं। ‘मेरी थाली में दाल आ रही है’ सुनकर भूख नहीं मिटती।
मन्त्र 1.3.7
स यद्धैनत् त्वचाग्रहैष्यत् स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥
त्वचा से। छूने से। नहीं। हाथ से भोजन छूकर भी भूख वहाँ रहती है।
मन्त्र 1.3.8
स यद्धैनन्मनसाग्रहैष्यत् ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥
मन से। सोचने से। नहीं। ‘मैं खा रहा हूँ’ सोचना भी काम नहीं आया।
मन्त्र 1.3.9
स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद् विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥
शिश्न से। उत्सर्ग से। नहीं हुआ।
मन्त्र 1.3.10
सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद्वायुः ।
अन्नायुर्वा एष यद्वायुः ॥
आख़िर एक succession चली। अपान-वायु से पकड़ा। अपान-वायु क्या है? वो वायु जो शरीर के निचले हिस्से में काम करती है, मल-मूत्र-गैस को बाहर निकालती है।
यहाँ एक बारीक बात है। ‘अपान’ का एक meaning है ‘down-flowing breath’। और digestion पर इसका role है। यानी असली अन्न-ग्रहण digestion के माध्यम से होता है, बाक़ी सब accessory हैं।
उपनिषद् कहती है, ‘अन्न-आयुर्वा एष यद् वायुः।’ ‘वायु ही अन्न से जीती है।’ यानी जो खाना है, वो जीवन-शक्ति बनती है, और जीवन-शक्ति ही उस खाने को पचाती है। यह एक loop है।
मन्त्र 1.3.11
स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति ।
स ईक्षत यदि वाचाभिव्याहृतं
यदि प्राणेनाभिप्राणितं
यदि चक्षुषा दृष्टं
यदि श्रोत्रेण श्रुतं
यदि त्वचा स्पृष्टं
यदि मनसा ध्यातं
यद्यपानेनाभ्यपानितं
यदि शिश्नेन विसृष्टम् ।
अथ कोऽहमिति ॥
अब आत्मा एक identity crisis में पड़ जाता है। ‘सब काम तो ये देवता कर रहे हैं। वाणी बोल रही, प्राण साँस ले रहा, चक्षु देख रहा, मन सोच रहा। फिर मैं कौन हूँ? मेरा क्या काम बचा?’
यह एक gorgeous moment है। ख़ुद creator ने अपने creation में इतना डाल दिया कि अब वो ख़ुद को नहीं पहचान पा रहा।
मन्त्र 1.3.12
सैषा विदृतिर्नाम द्वा ।
तदेतन्नान्दनम् ।
तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्ना अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥
तब आत्मा एक decision लेता है। ‘सिर के ऊपर का सीमा चीरकर वहाँ से प्रवेश करूँगा।’ यानी सिर के top से entry।
इस entry point का नाम ‘विदृति’ है, यानी ‘चीरा’ या ‘दरार’। योगी-परंपरा में यह सहस्रार चक्र से मेल खाता है। यानी ‘top of the head’ से consciousness का प्रवेश। यह आज भी yoga और tantra में central concept है।
‘तीन निवास, तीन स्वप्न-अवस्थाएँ’ का reference माण्डूक्य से directly जुड़ता है। आत्मा अब तीन states में रहता है: जागरण, स्वप्न, सुषुप्ति। (तुलना: माण्डूक्य उपनिषद्)
मन्त्र 1.3.13
किमिहान्यं वावदिषदिति ।
स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत् ।
इदमदर्शमिति ॥
आत्मा अब body के अंदर है। चारों ओर देखता है, सब प्राणी देखता है। एक पल को सोचता है, ‘और किस की बात करूँ? कुछ और बनाने की ज़रूरत है?’
पर फिर तुरंत समझता है: ‘यह जो पुरुष है, यही परम ब्रह्म है।’ और exclaim करता है, ‘इदम् अदर्शम्!’ ‘यह मैंने देख लिया!’ यानी जो था ढूँढना, वो मिल गया, और वो ख़ुद है।
मन्त्र 1.3.14
तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण ।
परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥
इसलिए उसका नाम ‘इदन्द्र’ (इस-को-देखने-वाला) पड़ा। मगर देवताओं को ‘परोक्ष’ (छिपा) नाम प्रिय है, सीधे नहीं कहना। तो उन्होंने इसे ‘इन्द्र’ कह दिया।
एक हलकी सी मज़ाक है उपनिषद् में: ‘देवताओं को परोक्ष-नाम प्रिय हैं, देवताओं को परोक्ष-नाम प्रिय हैं।’ (दोहराव से emphasis।) यानी देवता कभी directly नहीं कहते कि असली बात क्या है, हमेशा कोडित।
अध्याय 2
मन्त्र 2.1
यदेतद्रेतस्तदेतत्सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतम् ।
आत्मन्येवात्मानं बिभर्ति ।
तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनज्जनयति । तदस्य प्रथमं जन्म ॥
दूसरा अध्याय एक नए सिद्धान्त के साथ खुलता है: हर इंसान तीन बार जन्म लेता है।
पहला जन्म: पिता के अंदर। जब रेत (वीर्य) तैयार होता है। यह रेत सिर्फ़ एक biological liquid नहीं है, यह सब अंगों का तेज है। यानी पिता का ‘सत्व’ संक्षेपित।
जब वो स्त्री में जाता है, तब बच्चा ‘जन्म’ लेता है। यह पहला जन्म।
मन्त्र 2.2
यथा स्वमङ्गं तथा ।
तस्मादेनां न हिनस्ति ।
साऽस्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति ॥
दूसरा जन्म स्त्री के अंदर है। बीज स्त्री के शरीर का हिस्सा बन जाता है, उसके अपने अंग की तरह। इसलिए स्त्री का शरीर उसे reject नहीं करता।
मन्त्र 2.3
तं स्त्री गर्भं बिभर्ति ।
सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति ।
स यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येषां लोकानां सन्तत्या ।
एवꣳ सन्तता हीमे लोकाः ।
तदस्य द्वितीयं जन्म ॥
स्त्री बच्चे को पालती है, और इस process में बच्चे का दूसरा जन्म होता है। फिर पिता बच्चे को पालता है, जन्म से पहले और बाद। यह ‘खुद को पालना’ है, क्योंकि बच्चा पिता के तेज से बना है।
‘एवꣳ सन्तता हीमे लोकाः’ = ‘इसी से ये लोक चलते रहते हैं।’ यानी हर पिता-माँ-बच्चा का cycle ही सृष्टि की निरंतरता है।
मन्त्र 2.4
अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति ।
स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते ।
तदस्य तृतीयं जन्म ॥
तीसरा जन्म मरने के बाद का है। मनुष्य का यह शरीर एक दिन गिरता है, और उसके पुण्य-कर्मों के अनुसार वो फिर जन्म लेता है। यह तीसरा जन्म।
यानी तीन जन्म: पिता में, माँ में, और परलोक से वापस। हर मनुष्य इसी loop में है।
मन्त्र 2.5
गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा ।
शतं मा पुर आयसीररक्षन्
अधः श्येनो जवसा निरदीयमिति ।
गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच ॥
एक ऋषि-गाथा। वामदेव ऋषि ने गर्भ में रहते हुए ही सब देवताओं के जन्म जान लिए थे। उन्होंने कहा, ‘सौ लोह-दुर्ग मुझे रोक रहे थे, मगर बाज की तरह मैं तेज़ी से नीचे उतरा।’
क्या मतलब? ‘सौ लोह-दुर्ग’ = वो defenses जो हमें self-knowledge से रोकती हैं। बाज की तेज़ी = एक committed साधक की drive। वामदेव ने यह जागरण maa के गर्भ में ही पाया।
मन्त्र 2.6
‘जो ऐसा जानता है, वो शरीर के टूटने के बाद ऊपर उठकर स्वर्ग में सब इच्छाएँ पाकर अमर हो जाता है।’ Twice repeated, finality के लिए।
अध्याय 3
मन्त्र 3.1
येन वा पश्यति येन वा शृणोति
येन वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति
येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति ॥
तीसरा अध्याय। और सबसे शक्तिशाली पंक्तियों के साथ।
‘कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे? कतरः स आत्मा?’ = ‘यह आत्मा कौन है जिसकी हम उपासना करते हैं? कौन है वो?’
फिर एक list: ‘जिससे हम देखते हैं, सुनते हैं, सूँघते हैं, बोलते हैं, स्वाद लेते हैं।’ यानी हर experience के पीछे जो enabling factor है, वही आत्मा है।
मन्त्र 3.2
संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं
मेधा दृष्टिर्धृतिर्मतिर्मनीषा
जूतिः स्मृतिः सङ्कल्पः क्रतुरसुः
कामो वश इति ।
सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥
एक लंबी list आती है, सब पर्याय: संज्ञान, आज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, दृष्टि, धृति, मति, मनीषा, जूति, स्मृति, सङ्कल्प, क्रतु, असु, काम, वश।
हर शब्द consciousness का एक aspect है। उपनिषद् कह रही है, ये सब ‘प्रज्ञान’ (pure consciousness) के ही नाम हैं। आप कह सकते हैं cognition, intuition, understanding, intelligence, memory, will, intention, vitality, desire, control, सब एक ही चीज़ के facets।
मन्त्र 3.3
पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतीꣳषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव ।
बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि च
अश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किञ्चेदं प्राणि
जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरम् ।
सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम् ।
प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा ।
प्रज्ञानं ब्रह्म ॥
अब climax। एक लंबी पंक्ति जो पूरे ब्रह्मांड को एक shot में cover करती है।
‘एष ब्रह्म।’ यही ब्रह्म। ‘एष इन्द्र।’ यही इन्द्र। ‘एष प्रजापति।’ यही प्रजापति। सब देवता, पाँचों महाभूत, सब छोटे-बड़े जीव, पक्षी, मनुष्य, गाय, हाथी, हर चलने-उड़ने-स्थिर रहने वाला, सब का सब एक ही चीज़ है।
‘सर्वं तत् प्रज्ञानेत्रम्, प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम्।’ सब प्रज्ञान-नेत्र है, प्रज्ञान में स्थापित। यानी सब का guidance, सब का base, सब का substrate, प्रज्ञान है।
और final मन्त्र: ‘प्रज्ञानं ब्रह्म।’ Consciousness is Brahman। तीन शब्द, और चार महावाक्यों में से एक। यहाँ ऐतरेय climax पर पहुँचती है।
मन्त्र 3.4
अमुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वा
अमृतः समभवत् समभवत् ॥
आखिरी मन्त्र, comfort देने वाला। ‘जो इस तरह जान लेता है, इस शरीर से ऊपर उठकर स्वर्ग में सब इच्छाएँ पाकर अमर हो जाता है। अमर हो जाता है।’
दो बार ‘समभवत्’ (हो जाता है)। यह उपनिषदी पारंपरिक closing। ‘किताब बंद।’
तीन अध्याय में पूरा ब्रह्मांड cover। पहला: कैसे बना। दूसरा: हम कैसे आए। तीसरा: हम क्या हैं। और अंतिम सबक: हम ‘consciousness’ हैं, और वही ब्रह्म है।
पहली पंक्ति में ही ख़ास बात: ‘आत्मा वा इदमेक एव अग्रे आसीत्’। ‘पहले बस आत्मा था, अकेला।’ न ब्रह्मा, न विष्णु, न शिव। न कोई देवता। बस ‘आत्मा’।
‘नान्यत् किञ्चन मिषत्’। ‘और कुछ भी हलचल नहीं थी।’ ‘मिषत्’ का मतलब ‘आँख का झपकना’। तो कुछ इतना नहीं था कि एक झपकना भी हो। पूरी तरह से unmanifest।
‘स ईक्षत’। ‘उसने सोचा।’ यह बहुत interesting verb है। आत्मा ‘सोचता’ है, तो सृष्टि शुरू होती है। एक विचार से। ‘लोकान्नु सृजै’ = ‘चलो, लोक बनाऊँ।’ यानी सृष्टि का बीज एक intention है, एक sankalpa।