अंग 303

अंग
303
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਰਾਫੁ ਨਦਰਿ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਸੁਆਵਗੀਰ ਸਭਿ ਉਘੜਿ ਆਏ ॥
ਓਇ ਜੇਹਾ ਚਿਤਵਹਿ ਨਿਤ ਤੇਹਾ ਪਾਇਨਿ ਓਇ ਤੇਹੋ ਜੇਹੇ ਦਯਿ ਵਜਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਦੁਹੀ ਸਿਰੀ ਖਸਮੁ ਆਪੇ ਵਰਤੈ ਨਿਤ ਕਰਿ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਚਲਤ ਸਬਾਏ ॥੧॥
जा सतिगुरु सराफु नदरि करि देखै सुआवगीर सभि उघड़ि आए ॥
ओइ जेहा चितवहि नित तेहा पाइनि ओइ तेहो जेहे दयि वजाए ॥
नानक दुही सिरी खसमु आपे वरतै नित करि करि देखै चलत सबाए ॥१॥

हिन्दी अर्थ: (क्योंकि) जब सतिगुरू-सर्राफ ध्यान से परखता है तो सारे खुदगरज प्रगट हो जाते हैं (भाव। छुपे नहीं रह सकते)। जैसी उनके हृदय की भावना होती है। वैसा ही उनको फल मिलता है। और पति प्रभू के द्वारा वह उसी तरह नश्र कर दिए जाते हैं। (पर) हे नानक ! (जीव के भी क्या वश?) ये सारे चरित्र प्रभू खुद हमेशा करके देख रहा है और दोनों तरफ (गुरसिखों में और स्वावगीरों में) स्वयं ही परमात्मा मौजूद है। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਇਕੁ ਮਨੁ ਇਕੁ ਵਰਤਦਾ ਜਿਤੁ ਲਗੈ ਸੋ ਥਾਇ ਪਾਇ ॥
ਕੋਈ ਗਲਾ ਕਰੇ ਘਨੇਰੀਆ ਜਿ ਘਰਿ ਵਥੁ ਹੋਵੈ ਸਾਈ ਖਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੋਝੀ ਨਾ ਪਵੈ ਅਹੰਕਾਰੁ ਨ ਵਿਚਹੁ ਜਾਇ ॥
ਅਹੰਕਾਰੀਆ ਨੋ ਦੁਖ ਭੁਖ ਹੈ ਹਥੁ ਤਡਹਿ ਘਰਿ ਘਰਿ ਮੰਗਾਇ ॥
ਕੂੜੁ ਠਗੀ ਗੁਝੀ ਨਾ ਰਹੈ ਮੁਲੰਮਾ ਪਾਜੁ ਲਹਿ ਜਾਇ ॥
ਜਿਸੁ ਹੋਵੈ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਤਿਸੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਪ੍ਰਭੁ ਆਇ ॥
ਜਿਉ ਲੋਹਾ ਪਾਰਸਿ ਭੇਟੀਐ ਮਿਲਿ ਸੰਗਤਿ ਸੁਵਰਨੁ ਹੋਇ ਜਾਇ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕੇ ਪ੍ਰਭ ਤੂ ਧਣੀ ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਚਲਾਇ ॥੨॥
मः ४ ॥
इकु मनु इकु वरतदा जितु लगै सो थाइ पाइ ॥
कोई गला करे घनेरीआ जि घरि वथु होवै साई खाइ ॥
बिनु सतिगुर सोझी ना पवै अहंकारु न विचहु जाइ ॥
अहंकारीआ नो दुख भुख है हथु तडहि घरि घरि मंगाइ ॥
कूड़ु ठगी गुझी ना रहै मुलंमा पाजु लहि जाइ ॥
जिसु होवै पूरबि लिखिआ तिसु सतिगुरु मिलै प्रभु आइ ॥
जिउ लोहा पारसि भेटीऐ मिलि संगति सुवरनु होइ जाइ ॥
जन नानक के प्रभ तू धणी जिउ भावै तिवै चलाइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ४॥ मन एक है और एक तरफ ही लग सकता है। जहाँ जुड़ता है। वहाँ सफलता हासिल कर लेता है। बहुती बातें बाहर-बाहर से कोई करता रहे (भाव। बातें करने से कोई लाभ नहीं)। खा तो वही वस्तु सकता है जो घर में हो (भाव। मन जहाँ लगा हुआ है। प्राप्त तो वही चीज होनी है)। मन को सतिगुरू के अधीन किए बिना (ये बात) समझ नहीं आती और हृदय में से अहंकार दूर नहीं होता। अहंकारी जीवों को (सदा) तृष्णा और दुख (सताते हैं)। (तृष्णा के कारण) हाथ फैला के घर-घर मांगते फिरते हैं (भाव। उनकी तृप्ति नहीं होती इसी कारण वे दुखी रहते हैं)। उनका मुलम्मा पाज (दिखावा) उतर जाता है और झूठ और ठॅगी छुपी नहीं रह सकती। (पर उन बिचारों के भी क्या वश?) पिछले किए अच्छे कर्मों के मुताबिक जिनके हृदय पर भले संस्कार लिखे हुए हैं। उन्हें पूरा सतिगुरू मिल जाता है। और जैसे पारस लग के लोहा सोना बन जाता है वैसे ही संगति में मिल के (वह भी अच्छे बन जाते हैं)। हे दास नानक के प्रभू ! (जीवों के हाथ कुछ नहीं) तू खुद ही सब का मालिक है जैसे तुझे ठीक लगता है वैसे ही जीवों को चलाता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਜਿਨ ਹਰਿ ਹਿਰਦੈ ਸੇਵਿਆ ਤਿਨ ਹਰਿ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਗੁਣ ਕੀ ਸਾਝਿ ਤਿਨ ਸਿਉ ਕਰੀ ਸਭਿ ਅਵਗਣ ਸਬਦਿ ਜਲਾਏ ॥
ਅਉਗਣ ਵਿਕਣਿ ਪਲਰੀ ਜਿਸੁ ਦੇਹਿ ਸੁ ਸਚੇ ਪਾਏ ॥
ਬਲਿਹਾਰੀ ਗੁਰ ਆਪਣੇ ਜਿਨਿ ਅਉਗਣ ਮੇਟਿ ਗੁਣ ਪਰਗਟੀਆਏ ॥
ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ਵਡੇ ਕੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਲਾਏ ॥੭॥
पउड़ी ॥
जिन हरि हिरदै सेविआ तिन हरि आपि मिलाए ॥
गुण की साझि तिन सिउ करी सभि अवगण सबदि जलाए ॥
अउगण विकणि पलरी जिसु देहि सु सचे पाए ॥
बलिहारी गुर आपणे जिनि अउगण मेटि गुण परगटीआए ॥
वडी वडिआई वडे की गुरमुखि आलाए ॥७॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिन जीवों ने प्रभू का सिमरन किया। उन्हें प्रभू (अपने में) मिला लेता है। उनके साथ (उनके) गुणों की जिन्होंने सांझ की है। उनके सारे पाप शबद द्वारा जल जाते हैं। (पर) हे सच्चे प्रभू ! अवगुणों को पराली के भाव बेचने के लिए (अर्थात। सहजे ही नाश करने के लिए) गुणों की ये सांझ उसी को मिलती है जिसे तू खुद देता है। मैं सदके हूँ अपने सतिगुरू से जिसने (जीव के) पाप दूर करके गुण प्रगट किए हैं। जो जीव सतिगुरू के सनमुख होता है। वही महान प्रभू की महान सिफतसालाह करने लग जाता है। 7।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਵਿਚਿ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ਜੋ ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਰਮਤ ਸੁਚ ਸੰਜਮੁ ਹਰਿ ਨਾਮੇ ਹੀ ਤ੍ਰਿਪਤਾਵੈ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਤਾਣੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦੀਬਾਣੁ ਹਰਿ ਨਾਮੋ ਰਖ ਕਰਾਵੈ ॥
ਜੋ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ਪੂਜੇ ਗੁਰ ਮੂਰਤਿ ਸੋ ਮਨ ਇਛੇ ਫਲ ਪਾਵੈ ॥
ਜੋ ਨਿੰਦਾ ਕਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਤਿਸੁ ਕਰਤਾ ਮਾਰ ਦਿਵਾਵੈ ॥
ਫੇਰਿ ਓਹ ਵੇਲਾ ਓਸੁ ਹਥਿ ਨ ਆਵੈ ਓਹੁ ਆਪਣਾ ਬੀਜਿਆ ਆਪੇ ਖਾਵੈ ॥
ਨਰਕਿ ਘੋਰਿ ਮੁਹਿ ਕਾਲੈ ਖੜਿਆ ਜਿਉ ਤਸਕਰੁ ਪਾਇ ਗਲਾਵੈ ॥
ਫਿਰਿ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸਰਣੀ ਪਵੈ ਤਾ ਉਬਰੈ ਜਾ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈ ॥
ਹਰਿ ਬਾਤਾ ਆਖਿ ਸੁਣਾਏ ਨਾਨਕੁ ਹਰਿ ਕਰਤੇ ਏਵੈ ਭਾਵੈ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
सतिगुर विचि वडी वडिआई जो अनदिनु हरि हरि नामु धिआवै ॥
हरि हरि नामु रमत सुच संजमु हरि नामे ही त्रिपतावै ॥
हरि नामु ताणु हरि नामु दीबाणु हरि नामो रख करावै ॥
जो चितु लाइ पूजे गुर मूरति सो मन इछे फल पावै ॥
जो निंदा करे सतिगुर पूरे की तिसु करता मार दिवावै ॥
फेरि ओह वेला ओसु हथि न आवै ओहु आपणा बीजिआ आपे खावै ॥
नरकि घोरि मुहि कालै खड़िआ जिउ तसकरु पाइ गलावै ॥
फिरि सतिगुर की सरणी पवै ता उबरै जा हरि हरि नामु धिआवै ॥
हरि बाता आखि सुणाए नानकु हरि करते एवै भावै ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ सतिगुरू में ये बहुत बड़ा गुण है कि वह हर रोज प्रभू नाम का सिमरन करता है। सतिगुरू की सुच और संयम हरी-नाम का जाप है और वह हरी-नाम में ही तृप्त रहता है। हरी का नाम ही आसरा और नाम ही सतिगुरू के लिए रक्षा करने वाला है। जो मनुष्य इस गुर-मूरति का पूजन चिक्त लगा के करता है (भाव। जो जीव ध्यान से सतिगुरू के उक्त लिखे गुणों को धारण करता है) उसे वही फल मिल जाता है जिसकी मन में इच्छा करे। जो मनुष्य पूरे सतिगुरू की निंदा करता है। उसे प्रभू मार पड़वाता है। अपने हाथों से निंदा के बीज बीजने का फल उसे भोगना पड़ता है (तब पछताता है। पर) फिर जो समय (निंदा करने में बीत गया है) उसे मिलता नहीं। और जैसे चोर को गले में रस्सी डाल के ले जाते हैं वैसे मुँह काला करके (मानो) डरावने नरक में (उसको भी) डाल दिया जाता है। फिर इस (निंदा-रूपी घोर नरक में से) तब ही बचता है। अगर सतिगुरू की शरण पड़ कर प्रभू का नाम जपे। नानक परमात्मा (के दर) की बातें कह के सुना रहा है; परमात्मा को ऐसे ही भाता है (कि निंदक ईष्या के नर्क में खुद ही जलता रहे)। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕਾ ਹੁਕਮੁ ਨ ਮੰਨੈ ਓਹੁ ਮਨਮੁਖੁ ਅਗਿਆਨੁ ਮੁਠਾ ਬਿਖੁ ਮਾਇਆ ॥
ਓਸੁ ਅੰਦਰਿ ਕੂੜੁ ਕੂੜੋ ਕਰਿ ਬੁਝੈ ਅਣਹੋਦੇ ਝਗੜੇ ਦਯਿ ਓਸ ਦੈ ਗਲਿ ਪਾਇਆ ॥
ਓਹੁ ਗਲ ਫਰੋਸੀ ਕਰੇ ਬਹੁਤੇਰੀ ਓਸ ਦਾ ਬੋਲਿਆ ਕਿਸੈ ਨ ਭਾਇਆ ॥
ਓਹੁ ਘਰਿ ਘਰਿ ਹੰਢੈ ਜਿਉ ਰੰਨ ਦੋੁਹਾਗਣਿ ਓਸੁ ਨਾਲਿ ਮੁਹੁ ਜੋੜੇ ਓਸੁ ਭੀ ਲਛਣੁ ਲਾਇਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ਸੁ ਅਲਿਪਤੋ ਵਰਤੈ ਓਸ ਦਾ ਪਾਸੁ ਛਡਿ ਗੁਰ ਪਾਸਿ ਬਹਿ ਜਾਇਆ ॥
मः ४ ॥
पूरे गुर का हुकमु न मंनै ओहु मनमुखु अगिआनु मुठा बिखु माइआ ॥
ओसु अंदरि कूड़ु कूड़ो करि बुझै अणहोदे झगड़े दयि ओस दै गलि पाइआ ॥
ओहु गल फरोसी करे बहुतेरी ओस दा बोलिआ किसै न भाइआ ॥
ओहु घरि घरि हंढै जिउ रंन दोुहागणि ओसु नालि मुहु जोड़े ओसु भी लछणु लाइआ ॥
गुरमुखि होइ सु अलिपतो वरतै ओस दा पासु छडि गुर पासि बहि जाइआ ॥

हिन्दी अर्थ: महला ४ ॥ जो मनुष्य पूरे सतिगुरू का हुकम नहीं मानता। वह अपने मन के पीछे चलने वाला बेसमझ आदमी माया (रूपी जहर) का ठगा (हुआ है। ) उसके मन में झूठ है (सत्य को वह) झूठ ही समझता है। इस वास्ते पति ने (झूठ बोलने से पैदा हुए) व्यर्थ के झगड़े उसके गले में डाल दिए हैं। ऊल-जलूल बोल के रोटी कमाने के वह बहुत यत्न करता है। पर उसके वचन किसी को अच्छे नहीं लगते। छुटॅड़ औरत की तरह वह घर घर घूमता है। जो मनुष्य उससे मेल-मुलाकात रखता है उसको भी कलंक लग जाता है। जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख होता है वह मनमुख से अलग रहता है। मनमुख का साथ छोड़ के सतिगुरू की संगति करता है।

संदर्भ: यह अंग 303 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।

दिल्ली मेट्रो की सुबह 7 बजे की rush hour, हर चेहरा अपनी जल्दी में, और मन के अंदर यह विचार।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 34 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 303” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 304 →, पीछे का: ← अंग 302

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।