अंग 319

अंग
319
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਃ ੫ ॥
ਦਾਮਨੀ ਚਮਤਕਾਰ ਤਿਉ ਵਰਤਾਰਾ ਜਗ ਖੇ ॥
ਵਥੁ ਸੁਹਾਵੀ ਸਾਇ ਨਾਨਕ ਨਾਉ ਜਪੰਦੋ ਤਿਸੁ ਧਣੀ ॥੨॥
मः ५ ॥
दामनी चमतकार तिउ वरतारा जग खे ॥
वथु सुहावी साइ नानक नाउ जपंदो तिसु धणी ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ जगत का वरतारा उसी तरह है (जैसे) बिजली की चमक (थोडे ही समय के लिए) होती है। (इसलिए) हे नानक ! उस मालिक का नाम जपना – (असल में) यही चीज सुंदर (और सदा टिके रहने वाली) है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਸੋਧਿ ਸਭਿ ਕਿਨੈ ਕੀਮ ਨ ਜਾਣੀ ॥
ਜੋ ਜਨੁ ਭੇਟੈ ਸਾਧਸੰਗਿ ਸੋ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਮਾਣੀ ॥
ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਏਹ ਰਤਨਾ ਖਾਣੀ ॥
ਮਸਤਕਿ ਹੋਵੈ ਲਿਖਿਆ ਹਰਿ ਸਿਮਰਿ ਪਰਾਣੀ ॥
ਤੋਸਾ ਦਿਚੈ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਨਾਨਕ ਮਿਹਮਾਣੀ ॥੪॥
पउड़ी ॥
सिम्रिति सासत्र सोधि सभि किनै कीम न जाणी ॥
जो जनु भेटै साधसंगि सो हरि रंगु माणी ॥
सचु नामु करता पुरखु एह रतना खाणी ॥
मसतकि होवै लिखिआ हरि सिमरि पराणी ॥
तोसा दिचै सचु नामु नानक मिहमाणी ॥४॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ स्मृतियां-शास्त्र सब अच्छी तरह देखे हैं। किसी ने ईश्वर की कीमत नहीं पाई (कोई नहीं बता सकता कि प्रभू किस मोल मिल सकता है)। (सिर्फ) वह मनुष्य प्रभू (के मिलाप) का आनंद लेता है जो सत्संग में जा मिलता है। प्रभू का सच्चा नाम। करतार अकाल-पुरख – यही रत्नों की खान है (‘नाम’ सिमरन में ही सारे गुण हैं)। पर वही मनुष्य नाम सिमरता है। जिसके माथे के भाग्य हों। (हे प्रभू !) नानक की मेहमान-नवाजी यही है कि अपना सच्चा नाम (राह के लिए) खर्च के लिए दे। 4।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਅੰਤਰਿ ਚਿੰਤਾ ਨੈਣੀ ਸੁਖੀ ਮੂਲਿ ਨ ਉਤਰੈ ਭੁਖ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚੇ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਕਿਸੈ ਨ ਲਥੋ ਦੁਖੁ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
अंतरि चिंता नैणी सुखी मूलि न उतरै भुख ॥
नानक सचे नाम बिनु किसै न लथो दुखु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ जिस मनुष्य के मन में चिंता है उसकी माया की भूख बिल्कुल नहीं मिटती। देखने में भले ही वह सुखी लगता हो। हे नानक ! परमात्मा के नाम के बिना किसी का भी दुख दूर नहीं होता। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਮੁਠੜੇ ਸੇਈ ਸਾਥ ਜਿਨੀ ਸਚੁ ਨ ਲਦਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਸੇ ਸਾਬਾਸਿ ਜਿਨੀ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਇਕੁ ਪਛਾਣਿਆ ॥੨॥
मः ५ ॥
मुठड़े सेई साथ जिनी सचु न लदिआ ॥
नानक से साबासि जिनी गुर मिलि इकु पछाणिआ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ उन (जीव) व्यापारियों के टोले लूटे गए (समझो) जिन्होंने प्रभू का ‘नाम’ रूपी सौदा नहीं लादा। पर। हे नानक ! शाबाश है उनको जिन्होंने सतिगुरू को मिल के एक परमात्मा को पहिचान लिया है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਜਿਥੈ ਬੈਸਨਿ ਸਾਧ ਜਨ ਸੋ ਥਾਨੁ ਸੁਹੰਦਾ ॥
ਓਇ ਸੇਵਨਿ ਸੰਮ੍ਰਿਥੁ ਆਪਣਾ ਬਿਨਸੈ ਸਭੁ ਮੰਦਾ ॥
ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਣ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਸੰਤ ਬੇਦੁ ਕਹੰਦਾ ॥
ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਤੇਰਾ ਬਿਰਦੁ ਹੈ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਵਰਤੰਦਾ ॥
ਨਾਨਕੁ ਜਾਚੈ ਏਕੁ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਤਨਿ ਭਾਵੰਦਾ ॥੫॥
पउड़ी ॥
जिथै बैसनि साध जन सो थानु सुहंदा ॥
ओइ सेवनि संम्रिथु आपणा बिनसै सभु मंदा ॥
पतित उधारण पारब्रहम संत बेदु कहंदा ॥
भगति वछलु तेरा बिरदु है जुगि जुगि वरतंदा ॥
नानकु जाचै एकु नामु मनि तनि भावंदा ॥५॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जिस जगह पर गुरमुख मनुष्य बैठते हैं वह स्थान सुंदर हो जाता है। (क्योंकि) वह गुरमुख लोग (वहां बैठ के) अपने समर्थ प्रभू को सिमरते हैं (जिससे उनके मन में से) सारी बुराई का नाश हो जाता है। हे पारब्रहम ! तू (विकारों में) गिरे हुओं को बचाने वाला है, ये बात संत-जन भी कहते हैं और वेद भी कहते हैं। भक्तों को प्यार करना – यह तेरा मूल स्वभाव है। तेरा ये स्वभाव सदा कायम रहता है। नानक तेरा नाम ही मांगता है (नानक को तेरा नाम ही) मन तन में प्यारा लगता है। 5।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਚਿੜੀ ਚੁਹਕੀ ਪਹੁ ਫੁਟੀ ਵਗਨਿ ਬਹੁਤੁ ਤਰੰਗ ॥
ਅਚਰਜ ਰੂਪ ਸੰਤਨ ਰਚੇ ਨਾਨਕ ਨਾਮਹਿ ਰੰਗ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
चिड़ी चुहकी पहु फुटी वगनि बहुतु तरंग ॥
अचरज रूप संतन रचे नानक नामहि रंग ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ जब भोर होती है और पक्षी बोलते हैं। उस वक्त (भगत के हृदय में सिमरन की) तरंगें उठती हैं। हे नानक ! जिन गुरमुखों का प्रभू के नाम में प्यार होता है उन्होंने (इस पोह फूटने के समय) आश्चर्य रूप रचे होते हैं (भाव। वह लोग इस समय प्रभू के आश्चर्यजनक चमत्कार अपनी आँखों के सामने ले आते हैं)। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਘਰ ਮੰਦਰ ਖੁਸੀਆ ਤਹੀ ਜਹ ਤੂ ਆਵਹਿ ਚਿਤਿ ॥
ਦੁਨੀਆ ਕੀਆ ਵਡਿਆਈਆ ਨਾਨਕ ਸਭਿ ਕੁਮਿਤ ॥੨॥
मः ५ ॥
घर मंदर खुसीआ तही जह तू आवहि चिति ॥
दुनीआ कीआ वडिआईआ नानक सभि कुमित ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ उन घर-मन्दिरों में ही (असल) खुशियां हैं जहाँ (हे प्रभू !) तू याद आता है। हे नानक ! (यदि प्रभू बिसरे तो) दुनिया की सारी महानताएं खोटे मित्र हैं। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਹਰਿ ਧਨੁ ਸਚੀ ਰਾਸਿ ਹੈ ਕਿਨੈ ਵਿਰਲੈ ਜਾਤਾ ॥
ਤਿਸੈ ਪਰਾਪਤਿ ਭਾਇਰਹੁ ਜਿਸੁ ਦੇਇ ਬਿਧਾਤਾ ॥
ਮਨ ਤਨ ਭੀਤਰਿ ਮਉਲਿਆ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਜਨੁ ਰਾਤਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਗੁਣ ਗਾਇਆ ਸਭਿ ਦੋਖਹ ਖਾਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋਈ ਜੀਵਿਆ ਜਿਨਿ ਇਕੁ ਪਛਾਤਾ ॥੬॥
पउड़ी ॥
हरि धनु सची रासि है किनै विरलै जाता ॥
तिसै परापति भाइरहु जिसु देइ बिधाता ॥
मन तन भीतरि मउलिआ हरि रंगि जनु राता ॥
साधसंगि गुण गाइआ सभि दोखह खाता ॥
नानक सोई जीविआ जिनि इकु पछाता ॥६॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे भाईयो ! परमात्मा का नाम-रूप धन सदा कायम रहने वाली पूँजी है। (पर) किसी दुर्लभ ने ही ये बात समझी है। (और यह पूँजी) उसी को मिलती है जिसे ईश्वर (स्वयं) देता है। (जिन भाग्यशालियों को ये ‘नाम’ राशि मिलती है) वह मनुष्य प्रभू के रंग में रंगा जाता है। वह अपने मन तन में खिल जाता है। (ज्यों-ज्यों) सत्संग में वह प्रभू के गुण गाता है (त्यों-त्यों वह) सारे विकारों को समाप्त करता जाता है। हे नानक ! वही मनुष्य (दरअसल) जीता है जिसने एक प्रभू को पहिचाना है। 6।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਖਖੜੀਆ ਸੁਹਾਵੀਆ ਲਗੜੀਆ ਅਕ ਕੰਠਿ ॥
ਬਿਰਹ ਵਿਛੋੜਾ ਧਣੀ ਸਿਉ ਨਾਨਕ ਸਹਸੈ ਗੰਠਿ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
खखड़ीआ सुहावीआ लगड़ीआ अक कंठि ॥
बिरह विछोड़ा धणी सिउ नानक सहसै गंठि ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ (धतूरे की) ककड़ियां (तब तक) सुंदर लगती हैं (जब तक) धतूरे के गले (भाव। टहनियों से) लगी होती हैं। पर। हे नानक ! मालिक (धतूरे) से जब विछोड़ा हो जाता है तो उनके हजारों तूंबे हो जाते हैं। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਵਿਸਾਰੇਦੇ ਮਰਿ ਗਏ ਮਰਿ ਭਿ ਨ ਸਕਹਿ ਮੂਲਿ ॥
ਵੇਮੁਖ ਹੋਏ ਰਾਮ ਤੇ ਜਿਉ ਤਸਕਰ ਉਪਰਿ ਸੂਲਿ ॥੨॥
मः ५ ॥
विसारेदे मरि गए मरि भि न सकहि मूलि ॥
वेमुख होए राम ते जिउ तसकर उपरि सूलि ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ परमात्मा को बिसारने वाले मरे हुए (जानो)। पर वे अच्छी तरह मर भी नहीं सकते। जिन्होंने प्रभू की ओर से मुंह मोड़ा हुआ है वे इस तरह हैं जैसे सूली पर चढ़े हुए चोर। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਸੁਖ ਨਿਧਾਨੁ ਪ੍ਰਭੁ ਏਕੁ ਹੈ ਅਬਿਨਾਸੀ ਸੁਣਿਆ ॥
ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਪੂਰਿਆ ਘਟਿ ਘਟਿ ਹਰਿ ਭਣਿਆ ॥
ਊਚ ਨੀਚ ਸਭ ਇਕ ਸਮਾਨਿ ਕੀਟ ਹਸਤੀ ਬਣਿਆ ॥
ਮੀਤ ਸਖਾ ਸੁਤ ਬੰਧਿਪੋ ਸਭਿ ਤਿਸ ਦੇ ਜਣਿਆ ॥
ਤੁਸਿ ਨਾਨਕੁ ਦੇਵੈ ਜਿਸੁ ਨਾਮੁ ਤਿਨਿ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਮਣਿਆ ॥੭॥
पउड़ी ॥
सुख निधानु प्रभु एकु है अबिनासी सुणिआ ॥
जलि थलि महीअलि पूरिआ घटि घटि हरि भणिआ ॥
ऊच नीच सभ इक समानि कीट हसती बणिआ ॥
मीत सखा सुत बंधिपो सभि तिस दे जणिआ ॥
तुसि नानकु देवै जिसु नामु तिनि हरि रंगु मणिआ ॥७॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ एक परमात्मा ही सुखों का खजाना है जो (परमात्मा) अविनाशी सुनते हैं। पानी में। धरती के अंदर। धरती के ऊपर (वह प्रभू) मौजूद है। हरेक शरीर में वह प्रभू (बसता) कहा जाता है। ऊँच-नीच सारे जीवों में एक सा ही वरत रहा है। कीड़े (से ले के) हाथी (तक। सारे उस प्रभू से ही) बने हैं। (सारे) मित्र। साथी। पुत्र। संबंधी सारे उस प्रभू के ही पैदा किए हुए हैं। जिस जीव को (गुरू) नानक प्रसन्न हो के ‘नाम’ देता है उसने ही हरी-नाम का रंग पाया है। 7।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਜਿਨਾ ਸਾਸਿ ਗਿਰਾਸਿ ਨ ਵਿਸਰੈ ਹਰਿ ਨਾਮਾਂ ਮਨਿ ਮੰਤੁ ॥
ਧੰਨੁ ਸਿ ਸੇਈ ਨਾਨਕਾ ਪੂਰਨੁ ਸੋਈ ਸੰਤੁ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
जिना सासि गिरासि न विसरै हरि नामां मनि मंतु ॥
धंनु सि सेई नानका पूरनु सोई संतु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ जिन लोगों को साँस लेते और खाते हुए कभी भी ईश्वर नहीं भूलता। जिनके मन में परमात्मा का नाम-रूप मंत्र (बस रहा) है; हे नानक ! वही लोग मुबारक हैं। वही मनुष्य पूरन संत हैं। 2।
ਮਃ ੫ ॥
ਅਠੇ ਪਹਰ ਭਉਦਾ ਫਿਰੈ ਖਾਵਣ ਸੰਦੜੈ ਸੂਲਿ ॥
ਦੋਜਕਿ ਪਉਦਾ ਕਿਉ ਰਹੈ ਜਾ ਚਿਤਿ ਨ ਹੋਇ ਰਸੂਲਿ ॥੨॥
मः ५ ॥
अठे पहर भउदा फिरै खावण संदड़ै सूलि ॥
दोजकि पउदा किउ रहै जा चिति न होइ रसूलि ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ अगर कोई मनुष्य दिन रात खाने के दुख में (पेट पूर्ति के लिए) भटकता फिरे। तो उस के चित्त में गुरू पैग़ंबर के द्वारा रॅब ना याद हो तो वह दोज़क में पड़ने से कैसे बच सकता है?। 2।

संदर्भ: यह अंग 319 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Rajiv Chowk metro station की platform पर 9 PM की भीड़।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 51 पंक्तियों का है, 13 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 319” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 320 →, पीछे का: ← अंग 318

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।